हिंदू पीड़ा पर दुनिया की चुप्पी: केवल संयोग या सुनियोजित अनदेखी?

लंबे समय से चले आ रहे अत्याचार और मौजूदा हिंसा के बावजूद हिंदुओं का दर्द अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सांस्कृतिक विमर्श में जगह नहीं पाता। गाज़ा के लिए हॉलीवुड आवाज़ उठाता है, पर हिंदुओं की त्रासदी पर दुनिया चुप्पी ओढ़ लेती है। यह खामोशी नैरेटिव की गंभीर असमानता का सबूत है।
  • हॉलीवुड और वैश्विक सांस्कृतिक एलीट गाज़ा के लिए तो ज़ोर-शोर से एकजुट हो जाते हैं, लेकिन पहलगाम, 26/11, बांग्लादेश के नरसंहार या पश्चिम में बढ़ते एंटी-हिंदू अपराधों पर पूरी तरह खामोश रहते हैं।
  • इस्लामिस्ट और वाम-उदारवादी ग्रुप अपने मुद्दों को बहुत आक्रामक और योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाते हैं। नतीजा यह है कि उनके मुद्दे मीडिया, कला और अकादमिक जगत में छा जाते हैं। इसके उलट हिंदू समाज के पास अपनी सही चिंताओं को दुनिया तक पहुँचाने की कोई मज़बूत व्यवस्था नहीं है।
  • पश्चिमी यूनिवर्सिटीज़ अक्सर हिंदू मुद्दों को “कट्टरपंथी” या “अल्पसंख्यक-विरोधी” कहकर उनकी नकारात्मक छवि बनाती हैं। यही छवि मीडिया और सांस्कृतिक जगत में दोहराई जाती है। नतीजतन हिंदुओं के मुद्दे या तो नज़रअंदाज़ हो जाते हैं या फिर अमान्य घोषित कर दिए जाते हैं।
  • दुख की बात यह है कि कई हिंदू अरबपति उन्हीं संस्थानों को दान देते हैं जो हिंदुओं के खिलाफ़ माहौल बनाते हैं। जबकि ज़रूरत इस बात की है कि वे वैश्विक स्तर पर हिंदू नैरेटिव खड़ा करने वाले सांस्कृतिक और बौद्धिक ढाँचों में निवेश करें।
  • अब वक्त आ गया है कि हिंदू, इस्लामिस्ट्स की रणनीति से सीख लें—यहूदी समुदाय जैसे साथियों से गठबंधन करें, सांस्कृतिक संस्थान खड़े करें, युवाओं को जोड़ें और ऐसा नैरेटिव सिस्टम बनाएँ जिससे दुनिया के मंचों पर हिंदुओं की आवाज़ दब न सके।

हाल ही में फ़िल्म वर्कर्स फ़ॉर पैलेस्टाइन द्वारा जारी किए गए एक खुले पत्र पर दुनिया भर के फ़िल्मकारों ने हस्ताक्षर किए। इसमें 4,000 से ज़्यादा लोग शामिल हुए, और सबने मिलकर उन इज़रायली संस्थानों के बहिष्कार की शपथ ली जिन पर “फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ नरसंहार और रंगभेद” भड़काने के आरोप लगे हैं। इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वाली हस्तियों की लिस्ट में मशहूर निर्देशक अवा डुवर्ने, जोनाथन ग्लेज़र, असीफ़ कपाड़िया, जोशुआ ओपेनहाइमर और बूट्स राइली के साथ एमा स्टोन, एंड्रयू गारफ़ील्ड, ओलिविया कोलमन, जोश ओ’कॉनर और सिंथिया निक्सन जैसे कई जाने-माने सितारे भी शामिल थे।

इज़रायल-ग़ाज़ा संघर्ष बढ़ने के बाद हॉलीवुड ने जिस तरह से ग़ाज़ा के पक्ष में आवाज़ उठाई, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। अब तो मनोरंजन जगत में फ़िलिस्तीन समर्थक होना एक तरह की सांस्कृतिक पहचान का द्योतक बन गया है। कंसर्ट्स, खुले पत्र और सोशल मीडिया मुहिमें, यह सभी “वोक” एकजुटता दिखाने का सांकेतिक सामान बन चुके हैं। इंटरनेट पर “celebrities supporting Gaza” सर्च करने पर बेला हदीद, दुआ लीपा, एंजेलिना जोली, नेटली पोर्टमैन, बिली आइलीश, मार्क रफ़ालो सहित कई और बड़े नाम तुरंत सामने आ जाते हैं। [1] [2]

लेकिन जब हम हिंदुओं पर हुए हमलों पर आई खामोशी से इसकी तुलना करते हैं तो तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है। पहलगाम का आतंकी हमला हो, 26/11 का मुंबई हमला, बांग्लादेश में हिंदुओं पर लगातार हमले, पश्चिम बंगाल की राजनीतिक हिंसा या पश्चिमी देशों में बढ़ते एंटी-हिंदू अपराध—इन सब पर फ़िल्म इंडस्ट्री चुप रहती है। हॉलीवुड ही नहीं, बॉलीवुड के कलाकार भी गाज़ा पर तो बोलते हैं, पर हिंदुओं की त्रासदी पर चुप्पी साध लेते हैं।

यह विरोधाभास साफ़ दिखाता है कि इस्लामिस्ट्स और वामपंथी-उदारवादी समूह नैरेटिव  यानी विमर्श गढ़ने की और उसका प्रचार-प्रसार करने की कला में माहिर हैं। वे अपने मुद्दों को इतनी ज़्यादा आक्रामकता से सामने रखते हैं और अपना नैरेटिव इस कदर आत्मविश्वास के साथ बार बार दोहराते हैं कि झूठ भी सच लगने लगता है, और हिंसा भी “प्रतिरोध” की तरह नज़र आने लगती है। हॉलीवुड और दूसरे सांस्कृतिक मंच उनके विमर्श को बौद्धिकता, कला और संस्कृति की चाशनी में लपेट उसे चमक-दमक देते हैं, और बेहद प्रभावशाली तरीक़े से इन समूहों के मुद्दों को लोगों के सामने पेश करते हैं। दूसरी तरफ़, हिंदू समुदाय अभी तक इस नैरेटिव बनाने की कला में बुरी तरह से पिछड़ा हुआ है। जबकि हिंदुओं के सरोकार सच्चे हैं, जो उनके धर्म और संस्कृति की सुरक्षा व उनके अस्तित्व की रक्षा से जुड़े हैं, लेकिन फिर भी उनकी आवाज़ विभिन्न वैश्विक मंचों तक नहीं पहुँच पाती। यह खामोशी यूँ ही नहीं है; इसके पीछे शिक्षा और सांस्कृतिक संस्थानों के हिंदू विरोधी रुझान का वह कुचक्र छिपा है, जिसके तहत लंबे समय से हिंदू धर्म, संस्कृति व हिंदुओं के मुद्दों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता रहा है।

आगे के भागों में हम इस बात को लेकर चर्चा करेंगे कि आख़िर हिंदू समाज अपनी चिंताओं को विभिन्न मंचों तक असरदार तरीके से क्यों नहीं पहुँचा पाता, और विमर्श गढ़ने-फैलाने की इस कला में वह इतना कमजोर क्यों है।

हिंदू आवाज़ क्यों दबती है?

अपनी किताब Snakes in the Ganga: Breaking India 2.0 में राजीव मल्होत्रा और विजया विस्वनाथन ने दिखाया है कि कैसे पश्चिम के बड़े विश्वविद्यालयों, खासकर समाजशास्त्र और मानविकी विभागों, का फ़ंडिंग नेटवर्क काम करता है। उनकी राय में, इन विभागों से आने वाला अधिकांश रिसर्च हिंदू-विरोधी सोच से प्रेरित है। उनकी किताब में दिए गए तथ्य बताते हैं कि इसी वजह से हिंदू समाज दुनिया के सांस्कृतिक विमर्श में अपनी स्थिति मज़बूत नहीं कर पाया।

पश्चिमी विश्वविद्यालयों की यह तथाकथित “एलीट अकादमिक दुनिया” कला, साहित्य और क्रिएटिव इंडस्ट्रीज़ का रुख़ तय करती है। जिन मुद्दों को ये विभाग उठाते हैं, वही जल्दी से फ़िल्मों, संगीत और किताबों में गूंजने लगते हैं—और इन्हें भरपूर पैसा और सहारा भी मिलता है। इसका साफ़ उदाहरण ग़ाज़ा को मिला ज़बरदस्त समर्थन है। आज पॉपुलर कल्चर में इसकी मौजूदगी सीधे-सीधे हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालयों में हो रहे शोध और वहाँ बन रहे विमर्श का नतीजा है।

हिंदुओं से जुड़े मुद्दे शायद ही कभी संगीत समारोहों, कला प्रदर्शनियों, साहित्य महोत्सवों या बड़े सांस्कृतिक आयोजनों में दिखते हैं। वजह साफ़ है—जो संस्थान आज सांस्कृतिक एजेंडा तय करते हैं, वे पहले से ही हिंदू-विरोधी सोच से प्रभावित रहते हैं। इसी कारण हिंदुओं की चिंताओं को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। हालात तब और बिगड़ते हैं जब हिंदू समाज अपनी बात उस “प्रगतिशील” नज़रिए में फिट नहीं कर पाता, जो आज की सांस्कृतिक दुनिया पर हावी है। नतीजा यह होता है कि हिंदुओं के मुद्दे धीरे-धीरे और पीछे धकेल दिए जाते हैं।

दिक़्क़त यह भी है कि अकादमिक जगत में हिंदू सरोकारों को कैसे पेश किया जाता है। जैसे ही हिंदू अपने अधिकारों या परेशानियों पर सवाल उठाते हैं, उन्हें तुरंत “हिंदुत्ववादी,” “कट्टरपंथी,” या “अल्पसंख्यक-विरोधी” कहकर बदनाम कर दिया जाता है। लेफ्ट और इस्लामिस्ट ग्रुप्स इन ठप्पों का इस्तेमाल कर हिंदू नज़रिए को ग़ैर-वैध साबित करते हैं। इसका असर यह होता है कि हिंदू समाज खुद ही अपराधबोध से भर जाता है और अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने से डरने लगता है। यही वजह है कि बड़े-बड़े हिंदू सेलेब्रिटी भी अपने समुदाय के मुद्दों पर चुप्पी साध लेते हैं। नतीजतन, वैश्विक सांस्कृतिक मंचों पर हिंदुओं की आवाज़ लगभग सुनाई ही नहीं देती।

समस्या यहीं तक सीमित नहीं है। भारत में कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए जो फंड मिलता है, वह कई बार हिंदू-विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाने में खर्च होता है। राजीव मल्होत्रा और विजया विस्वनाथन ने अपनी किताब में इस पर रोशनी डाली है। उन्होंने बताया कि किस तरह उद्योगपति लक्ष्मी मित्तल ने हार्वर्ड में “मित्तल इंस्टिट्यूट” और उसके “विज़िटिंग आर्टिस्ट प्रोग्राम” को फंड किया। लेकिन इस प्रोग्राम में कई बार ऐसे कलाकार-कार्यकर्ता चुने गए जिनका एजेंडा साफ़ राजनीतिक और वैचारिक था—जैसे मल्लिका साराभाई और टी.एम. कृष्णा। यहाँ क़व्वाली जैसी प्रस्तुतियों को बढ़ावा दिया गया और “जाति” तथा “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसे विवादित विषयों को कला के नाम पर पेश किया गया।[3]

इसके बिल्कुल उलट, इस्लामिस्ट ताक़तों ने अपना एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए मज़बूत नेटवर्क बना रखे हैं। वे बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों और फ़िल्मकारों के साथ मिलकर काम करते हैं और ऐसी रणनीतियाँ अपनाते हैं जिनका असर लंबे समय तक रहता है। अपने मक़सद को पाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं—पब्लिक में बदनाम करना, सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग करना और संगठित बहिष्कार करना—सब कुछ इस्तेमाल करते हैं, ताकि विरोध करने वाली आवाज़ें चुप करा दी जाएँ।

इसका सबसे अच्छा उदाहरण बॉयकॉट, डाइवेस्टमेंट, सैंक्शन्स (BDS) आंदोलन है।[4] यहाँ कट्टर इस्लामिस्ट ताक़तों ने लेफ्ट-लिबरल ग्रुप्स के साथ मिलकर इज़रायल के खिलाफ़ एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव खड़ा किया। BDS पीआर और प्रोपेगेंडा के ज़रिये कंपनियों व व्यक्तियों पर दबाव बनाता है और बहिष्कार की मुहिम चलाता है।

भारत में भी कई तथाकथित वोक बुद्धिजीवी, जिनके नाम हिंदू प्रतीत होते हैं, खुलेआम BDS का समर्थन करते हैं।[5] वहीं वाम-उदारवादी मीडिया ऐसे रुख़ की आलोचना को तुरंत “हिंदुत्व प्रोपेगेंडा” कहकर खारिज कर देता है।[6] BDS नेटवर्क ने हिंदू-विरोधी “जाति राजनीति तंत्र” से भी हाथ मिला लिया है।[7] यह गठजोड़ आंतरिक हिंदू मतभेदों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है और उन्हें अपने वैचारिक ढांचे में फिट बिठाने की कोशिश करता है। आज हिंदू समाज उस मोड़ पर है जहाँ विरोधी ताक़तें पहचान की राजनीति का लाभ उठाकर अपनी आवाज़ को और तेज़ करती हैं, जबकि हिंदुओं के पास अपनी बात रखने का ठोस माध्यम नहीं है।

हिंदू समाज को अब एक ऐसे सामूहिक मंच की ज़रूरत है, जो BDS जैसी संगठित ताक़त दिखा सके। ऐसा हिंदू आंदोलन न सिर्फ़ हिंदू मुद्दों को समर्थन दे सकता है, बल्कि उन फंडिंग ढाँचों को भी चुनौती दे सकता है, जो हिंदू-विरोधी नैरेटिव को ज़िंदा रखते हैं। ख़ास तौर पर, अगर यहूदी समुदाय से गठबंधन हो तो यह पहल और दमदार हो जाएगी—क्योंकि दोनों ही समुदायों को कट्टर इस्लामिस्ट ताक़तों ने बराबर निशाना बनाया है। यहूदी समुदाय प्रभावशाली, और संसाधन-संपन्न तो है ही, साथ ही यह हिंदू सरोकारों के प्रति संवेदनशील भी है। इसलिए हिंदू समुदाय और यहूदी समुदाय द्वारा गठित एक साझा प्लेटफार्म समय की माँग है, जो BDS की तर्ज़ पर गढ़ा गया हो, और जो हिंदू-विरोध का प्रतिकार करने पर केंद्रित हो।

हिंदू और यहूदी एकजुटता की बुनियाद पहले से मौजूद है। दोनों ही समुदायों ने सदियों तक अत्याचार और गलत तस्वीर पेश किए जाने का दर्द झेला है। दोनों अपनी सभ्यता और परंपरा को ज़िंदा रखने को बेहद अहम मानते हैं। अगर इन रिश्तों को आगे बढ़ाया जाए और इन्हें मिलकर क्रिएटिव इंडस्ट्रीज़ और सांस्कृतिक संस्थानों में असर डालने वाले कामों में बदला जाए, तो यह बड़ा बदलाव ला सकता है।

हिंदू और यहूदी अपने अनुभव, संसाधन और नेटवर्क जोड़कर अकादमिक दुनिया और पॉपुलर कल्चर में फैली हिंदू-विरोधी सोच को चुनौती दे सकते हैं। सच कहें तो हिंदुओं को अपने विरोधियों से सीखना होगा। जैसे इस्लामिस्ट और वामपंथी ताक़तें मजबूत संगठन बनाकर दबाव डालती हैं, वैसे ही हिंदुओं को भी संगठित होना होगा। कारोबार, मीडिया, सांस्कृतिक मंचों और विश्वविद्यालयों पर असर डालने वाले स्थायी और ताक़तवर संस्थान खड़े करने होंगे। साथ ही, ऐसा फंडिंग नेटवर्क भी बनाना होगा जो हिंदू सरोकारों पर शोध और कला-साहित्य में हिंदू दृष्टिकोण को जगह दिला सके।

हिंदू अरबपति और आत्मघाती दान की विडंबना

Snakes in the Ganga: Breaking India 2.0 में राजीव मल्होत्रा और विजया विस्वनाथन ने एक गंभीर विडंबना पर रोशनी डाली है। आनंद महिंद्रा, लक्ष्मी मित्तल और अजय पिरामल जैसे बड़े हिंदू उद्योगपति हार्वर्ड जैसे नामी पश्चिमी विश्वविद्यालयों को खुले दिल से दान देते हैं। लेकिन इस दान का नतीजा हिंदू मुद्दों के पक्ष में संतुलित या सहानुभूतिपूर्ण रवैये के रूप में सामने नहीं आता। बल्कि, पारदर्शिता की कमी और पड़ताल न होने की वजह से यह पैसा कई बार हिंदू-विरोधी सोच और नैरेटिव को और मज़बूत बना देता है।

किताब यह भी दिखाती है कि यह फंडिंग कैसे “हार्वर्ड-आयातित” विचारधाराओं के लिए एक पाइपलाइन बन जाती है। पश्चिमी विश्वविद्यालयों में तैयार की गई वोक सोच भारतीय कॉरपोरेट पहलों के ज़रिये वापस भारत लाई जाती है। धीरे-धीरे ये विचार भारतीय विश्वविद्यालयों के मानविकी और समाजशास्त्र विभागों में घुसपैठ कर वहाँ का माहौल हिंदू-विरोधी बना देते हैं।

अजीब बात यह है कि वही अरबपति जो पश्चिमी विश्वविद्यालयों को दान देते हैं, दूसरी ओर हिंदू परंपराओं को संभालने वाले कामों में भी मदद करते हैं। वे मंदिर बनवाने में मदद करते हैं, गौशालाओं को चलाते हैं, सामूहिक विवाह कराते हैं और सांस्कृतिक उत्सवों को प्रायोजित करते हैं। लेकिन जब बात अकादमिक, मीडिया या पॉपुलर कल्चर में हिंदू-विरोधी नैरेटिव को चुनौती देने की आती है, तो वहाँ उनका योगदान लगभग न के बराबर है।

StopHinduDvesha के एक विश्लेषण में इस प्रवृत्ति को “ब्राउन साहब मानसिकता” कहा गया है। बहुत से अमीर भारतीयों को असली प्रतिष्ठा अपने समुदाय की बौद्धिक नींव को मज़बूत करने में नहीं, बल्कि आइवी लीग संस्थानों से जुड़ने और पश्चिमी एलीट समाज में जगह बनाने में नज़र आती है। उनके लिए पश्चिम से मिली मान्यता ही सफलता का सबसे ऊँचा पैमाना बन गई है।[8]

जब बड़े उद्योगपति हिंदू दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने वाले शोध और संस्थानों में मदद नहीं करते, तो विरोधियों के लिए पूरा मैदान खुला रह जाता है। इसका असर यह होता है कि विरोधी ताक़तें और गहरी पकड़ बना लेती हैं। इससे अकादमिक और मीडिया की पहले से मौजूद कमज़ोरियाँ और बढ़ जाती हैं। हिंदुओं के सबसे संपन्न वर्ग की यह उदासीनता उन ढेर सारी समस्याओं को और साफ़ कर देती है जो ज़मीनी स्तर पर पहले से मौजूद हैं। नतीजा यह है कि विदेशों में रहने वाले हिंदू मज़बूत संस्थानों की कमी के कारण लगातार भेदभाव और संरचनात्मक असमानता झेलते हैं।

समृद्धि के नीचे छिपी बेबसी: हिंदू डायस्पोरा की असलियत

पश्चिम में रहने वाला हिंदू समुदाय एक अजीबोग़रीब स्थिति में है। यदि सतही तौर पर देखा जाये तो वे संपन्न, शिक्षित, और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली दिखते हैं। लेकिन इस सफलता की चमक-दमक के नीचे एक कड़वी सच्चाई छिपी है—हिंदुओं के पास न तो अपने पक्ष में नीतियाँ बनाने की कोई क्षमता है और न ही व्यवस्था-जनित भेदभाव से बचाव का कोई पुख़्ता साधन। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कैलिफ़ोर्निया का एंटी-कास्ट डिस्क्रिमिनेशन बिल SB403।[9] हिंदू संगठनों के विरोध, ज़मीनी स्तर पर हुए प्रदर्शनों, और इस क़ानून में निहित हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रहों को उजागर करने के अनेकों प्रयासों के बावजूद, स्टेट लेजिस्लेचर ने इस बिल को पारित कर दिया।

हालाँकि बाद में गवर्नर गैविन न्यूज़ॉम ने इस बिल को, यह कह कर कि जाति-आधारित भेदभाव पहले से ही ग़ैरक़ानूनी है, वीटो कर दिया।[10] लेकिन असल मुद्दा है कि इस प्रकार का बिल आख़िर स्टेट लेजिस्लेचर में पास कैसे हो गया? स्पष्ट है कि हिंदू समुदाय को बहुत आसानी से निशाना बनाया जा सकता है और उन्हें “स्वभावतः भेदभाव करने वाला” बताकर कलंकित किया जा सकता है। यह उस गहरे पक्षपात को दिखाता है, जो सिस्टम के भीतर बैठा है और बिना सबूत के ही हिंदू पहचान को नकारात्मक तरीके से दिखाता है।

इस्लामिस्ट्स, वामपंथियों और खालिस्तानियों का मज़बूत गठजोड़, जो नैरेटिव की पूरी व्यवस्था पर हावी है, स्थिति को और भी ज़्यादा चुनौतीपूर्ण बनाता है। यह गठबंधन लगातार हिंदू एडवोकेसी को “हिंदुत्व राजनीति” की एक शाखा बताता है, मानो यह भारत से आयात किया गया कोई एजेंडा हो जो प्रधानमंत्री मोदी की सरकार से ताक़त पाता हो। इसका नतीजा यह निकलता है कि पश्चिम में हिंदू संगठनों को “विदेशी एजेंट” के रूप में लेबल कर दिया जाता है। यही नहीं, वे वामपंथ और दक्षिणपंथ, दोनों ही तरफ़ से दोहरी मार झेलते हैं। एक तरफ़ तो चरम वामपंथी एक्टिविस्ट्स उन्हें बहुसंख्यकवादी कहकर बदनाम करते हैं, तो दूसरी तरफ़ चरम-दक्षिणपंथी उन्हें शक की निगाह से देखते हैं।

वैश्विक हिंदू समुदाय की एक और बड़ी कमजोरी यह है कि वह अब तक अन्य हाशिए पर जीवन बिता रहे समूहों—जैसे अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय, विभिन्न प्रवासी समुदाय और प्रगतिशील मानवाधिकार संगठनों के साथ मजबूत गठजोड़ बनाने में नाकाम रहा है। जबकि इस्लामिस्ट लॉबियों ने इन गठबंधनों पर कब्ज़ा कर रखा है, हिंदू समुदाय अपने मुद्दों को वैश्विक न्याय और समानता की भाषा में पेश करने में लगातार संघर्ष करता रहा है।

फिर भी हिंदू समुदाय के लिये अब भी अवसर हैं। सही रणनीति के साथ, हिंदू डायस्पोरा प्रगतिशील साझेदारियाँ बना सकता है, ख़ासकर अफ्रीकी अमेरिकी और यहूदी समुदायों के साथ। इससे हिंदू मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक वैधता और स्वीकार्यता मिल सकती है।

सहानुभूति बनाम चुप्पी: इस्लामोफ़ोबिया को मान्यता, हिंदूफ़ोबिया को नकार

इस्लामोफ़ोबिया और हिंदूफ़ोबिया की तुलना बहुत कुछ उजागर करती है। पिछले दो दशकों में इस्लामोफ़ोबिया को वैश्विक स्तर पर इतनी अहमियत मिली कि संयुक्त राष्ट्र ने इसके ख़िलाफ़ एक विशेष दिन भी तय कर दिया।[11] इसने इस्लामिस्ट्स को पीड़ित दिखाने का एक ताक़तवर हथियार दिया। अब उनका यह नैरेटिव यूनिवर्सिटी से लेकर मीडिया और पॉपुलर कल्चर तक हर जगह गूंजता है। इसका नतीजा यह है कि फिलिस्तीन के नाम पर एक्टिविज़्म एक बड़ी इंडस्ट्री बन गया है और यहां तक कि हमास जैसी हिंसक ताक़तों को भी सही ठहराने की कोशिशें आम हो गई हैं।

इसके उलट, हिंदूफ़ोबिया लगभग अदृश्य है। भारत ने कई बार संयुक्त राष्ट्र में हिंदुओं के ख़िलाफ़ होने वाले भेदभाव को मान्यता देने की बात उठाई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसे लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया।[12] नतीजा यह हुआ कि हिंदुओं के ख़िलाफ़ फैली हुई नफ़रत, कट्टरता और हिंसा—चाहे वह बांग्लादेश, पाकिस्तान, पश्चिम बंगाल में हो, या फिर पश्चिमी समाजों में – उसको लेकर न तो कोई ख़ासा चर्चा हुई, और न ही उसे किसी प्रकार की कोई मान्यता मिली। वैश्विक कला, साहित्य, शिक्षा जगत और मीडिया जगत में जगह बनाने के लिए हिंदू आवाज़ों को लगातार जूझना पड़ता है।

असल समस्या यह है कि हिंदू समुदाय ने खुद को वैश्विक विमर्श में एक पीड़ित समूह के रूप में पेश करने की कभी ढंग से कोशिश ही नहीं की। अपने लंबे उत्पीड़न और भेदभाव के इतिहास को व्यवस्थित तरीके से दर्ज कराने के बजाय, हिंदू अक्सर बिखरे हुए प्रयासों पर निर्भर रहते हैं। आज ज़रूरत है ठोस संसाधनों की—

  • हिंदू-विरोधी नरसंहारों का विस्तृत रिकॉर्ड।
  • साम्प्रदायिक हिंसा और बड़े पैमाने पर विस्थापन का दस्तावेज़।
  • घृणा अपराधों के रिकॉर्ड।
  • भारत और विदेशों में हिंदुओं को निशाना बनाने वाले भेदभावपूर्ण कानूनों पर महत्वपूर्ण अध्ययन।

हालाँकि कुछ संगठन इस तरह की रिपोर्टें बनाना शुरू कर चुके हैं, लेकिन उनका काम बिखरा हुआ है और उसमें वह संगठित ताक़त नहीं है, जो अंतरराष्ट्रीय मीडिया, थिंक टैंकों और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संस्थानों को प्रभावित कर सके।

यहाँ हिंदू समुदाय इस्लामिस्ट रणनीतियों से कुछ सीख ले सकता है। पहचान की राजनीति का कुशल इस्तेमाल कर, इस्लामिस्ट्स ने हाशिए पर जीवन जी रहे अन्य समूहों के साथ गठबंधन बनाए और खुद को प्रणालीगत उत्पीड़न के शिकार के रूप में प्रस्तुत किया। हिंदुओं को भी कुछ इसी तरह का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए—अपने मुद्दों को मानवाधिकारों की व्यापक भाषा में पेश करना, अन्य पीड़ित समूहों के साथ गठबंधन बनाना, और अपने विमर्श को कई मंचों पर ज़ोर देकर पहुँचाना।

मीडिया की तानाशाही: हिंदू आवाज़ का गला घोंटना

StopHinduDvesha ने पश्चिमी मीडिया में हिंदू मुद्दों के प्रस्तुतीकरण का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया है। ज़्यादातर विश्लेषण इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि द न्यूयॉर्क टाइम्स, द वॉशिंगटन पोस्ट, बीबीसी, द गार्डियन, और डॉयचे वेले जैसे बड़े मीडिया संस्थान हिंदू धर्म और हिंदू पहचान को लगातार नकारात्मक नज़रिए से दिखाते हैं। यह प्रस्तुति अक्सर हिंदूफोबिया यानी हिंदू विरोधी दृष्टिकोण से भरी होती है।[13] [14] [15] [16]

इस पक्षपात की सबसे अहम झलक “जाति” पर लगातार ज़ोर देने की प्रवृत्ति में देखने को मिलती है। जहां बात भारत की प्राचीन हिंदू सभ्यता और संस्कृति की आती है, पश्चिमी मीडिया तुरंत जातिगत विमर्श का चश्मा पहन लेता है। इसका नतीजा यह निकलता है कि एक गहरी और बहुआयामी सभ्यता को केवल जातिवाद के सतही विमर्श तक सीमित कर दिया जाता है। वहीं इस्लाम के मामले में यही मीडिया संवेदनशील हो जाता है और उसकी संस्कृति व परंपराओं को सम्मान की नज़र से दिखाता है। मुस्लिम समुदाय की भावनाओं का ख़ास तौर पर ख्याल रखा जाता है।[17] [18] “इस्लामोफोबिया” को मीडिया में बहुत जगह मिलती है और बात हमेशा सहानुभूति से भरी होती है। इसके उलट, “हिंदूफोबिया” पर या तो चुप्पी साध ली जाती है या उसे “बीजेपी/संघ परिवार का प्रोपेगेंडा” बताकर खारिज कर दिया जाता है।

नतीजा यह है कि हिंदू मीडिया नैरेटिव की जंग हार रहे हैं। इन बड़े-बड़े संस्थानों में कई हिंदू मूल के पत्रकार और लेखक मौजूद होने के बावजूद, समुदाय अपनी तरफ़ से संपादकीय एजेंडा तय नहीं करा पाया है। उल्टा कुछ ऐसे पत्रकार जो नाम से हिंदू लगते हैं, वे अपनी ही परंपरा के ख़िलाफ़ लिखकर पश्चिमी पाठकों के सामने जहरीले एंटी-हिंदू नैरेटिव मीडिया जगत में व्याप्त हिंदूद्वेष को और भी ज़्यादा मज़बूती देते हैं। ऐसे लोग उन “brown sepoys”[19] की भाँति है, जो पश्चिमी लोगों के सामने अपने ही समाज और संस्कृति की छवि खराब करने में लगे रहते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने अपनी किताब Modi vs Khan Market Gang में इस पूरी प्रवृत्ति पर रोशनी डाली है। वे बताते हैं कि किस तरह “खान मार्केट गैंग”, यानी दिल्ली के कुछ चुनिंदा पत्रकारों और मीडिया मालिकों का समूह एक समय में इतना ज़्यादा ताक़तवर और प्रभावशाली था कि वह कथित रूप से कैबिनेट की नियुक्तियाँ तक प्रभावित कर सकता था। यानि कि भारतीय मीडिया जगत में भी हिंदू-विरोधी ताक़तें कितनी गहराई से जड़ें जमाए बैठी हैं। यही वजह है कि भारत में “हिंदू बहुसंख्यक” माने जाने वाली सरकार के एक दशक के शासन के बाद भी मुख्यधारा मीडिया में हिंदू मुद्दों की कवरेज में महज़ कुछ मामूली सुधार हुआ है। कहने का मतलब यह है कि परेशानी ढांचे में ही है, और यह भारत और पश्चिम दोनों पर लागू होती है।

आलोचना से आगे: निर्माण ही है असली जवाब

हिंदू समाज ने इस विषय पर बहुत कोशिशें की हैं, लेकिन ज़्यादातर प्रयास बिखरे हुए और सिर्फ़ जवाब देने तक ही सीमित रहे हैं। रिपोर्टें, लेख और सोशल मीडिया पोस्ट अक्सर यह दिखाते हैं कि मीडिया हिंदुओं के साथ पक्षपात करता है। यह करना ज़रूरी है, लेकिन सिर्फ़ आलोचना करने से समस्या हल नहीं होगी। केवल पक्षपात को दिखा देने से निष्पक्ष व्यवहार की गारंटी नहीं मिलती। अगर हिंदू हमेशा सिर्फ़ प्रतिक्रिया देंगे, तो उनकी बात हमेशा पीछे धकेली जाएगी।

ज़रूरत है कि हिंदू अपनी मज़बूत नैरेटिव मशीनरी खड़ी करें। उन्हें सिर्फ़ गलतियों को उजागर नहीं करना चाहिए, बल्कि अपना कंटेंट बनाकर खुद विमर्श की दिशा तय करनी होगी। इसके लिए शिक्षा, रिसर्च और फंडिंग में कमियों को दूर करना होगा और इस प्रयास को मीडिया व सांस्कृतिक दुनिया तक ले जाना होगा।

हिंदू नैरेटिव कैसे मज़बूत किया जाये?
  1. युवा सक्रियता: हिंदू तंत्र युवाओं को जोड़ने में कमज़ोर है, जबकि यह क्षेत्र पूरी तरह वामपंथियों, इस्लामिस्ट्स और उनके सहयोगियों के कब्ज़े में है। हिंदू मुद्दों को युवा दर्शकों के लिए प्रगतिशील भाषा, रचनात्मक सांस्कृतिक मंच और युवा नेतृत्व वाली पहलों के माध्यम से पेश किया जाना चाहिए।
  2. कैंपस पहुंच: विश्वविद्यालय वैचारिक बदलाव के मैदान हैं। हिंदू संगठन नवाचारी कैंपस प्रोग्राम चलाएँ, जिसमें हिंदू मुद्दों को उदार कारणों के साथ संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि अपने आप में मान्यता पाने योग्य वास्तविक चिंता के रूप में पेश किया जाए।
  3. संस्थागत संरचना: मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक आदान-प्रदान के केंद्र बनें। अमीर हिंदुओं को सामुदायिक हब, सांस्कृतिक क्लब, आर्ट गैलरी और साहित्यिक मंचों में निवेश करना चाहिए। ये स्थान न केवल हिंदू परंपराओं को प्रदर्शित करेंगे बल्कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए भी प्लेटफ़ॉर्म देंगे।
  4. संगठित सोशल मीडिया रणनीति: सोशल मीडिया का उपयोग हिंदुओं द्वारा अभी तक पर्याप्त नहीं हुआ। ज़रूरत है एक समन्वित, बहु-स्तरीय डिजिटल अभियान की, जो वैश्विक स्तर पर हिंदू मुद्दों को बढ़ावा दे। उच्च गुणवत्ता वाली मल्टीमीडिया सामग्री, सुसंगत संदेश और लक्षित पहुंच से ऑनलाइन परिदृश्य बदल सकता है।
  5. राजनीतिक समर्थकों का निर्माण: डायस्पोरा में हिंदू राजनेताओं को सक्रिय और वकालत करने वाले बनना चाहिए। हिंदू मुद्दों को मुख्यधारा की राजनीतिक बातचीत में लाकर वे उन मुद्दों को वैधता दे सकते हैं जिन्हें अन्यथा “सीमा-पार” या “सांप्रदायिक” कहकर खारिज किया जाता है।
  6. संगठित डिजिटल संसाधन: बिखरी वकालत को एकजुट किया जाना चाहिए। एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म हिंदूफ़ोबिया पर विश्वसनीय संसाधन बन सकता है, जिसमें रिपोर्ट, केस स्टडीज़, घृणा अपराधों का डेटा और भेदभावपूर्ण कानूनों का विश्लेषण शामिल हो। यह प्लेटफ़ॉर्म पत्रकारों, शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के लिए अमूल्य साधन बन सकता है।
  7. मीडिया पहुँच: हिंदू को अगले पीढ़ी के पत्रकार तैयार करने होंगे जो मुख्यधारा के समाचार कक्षों में प्रवेश कर सकें और संतुलित दृष्टिकोण पेश कर सकें। साथ ही, हिंदू परोपकारी उन मीडिया आउटलेट्स का निर्माण या फंडिंग करें जो मुख्यधारा के प्रारूप में काम करें लेकिन हिंदू मूल्यों से जुड़े रहें। इसके बिना, विरोधी आवाज़ों का एकाधिकार चुनौतीहीन रहेगा।

हिंदू समुदाय की चुनौती केवल आलोचना करने या विरोध दर्ज कराने की नहीं है, बल्कि अपनी ठोस बौद्धिक और सांस्कृतिक ताक़त खड़ी करने की है। जब तक संगठित नैरेटिव मशीनरी, मज़बूत संस्थान और दूरगामी रणनीति नहीं बनती, तब तक हिंदुओं की आवाज़ वैश्विक विमर्श में दबती रहेगी। अब समय है कि हिंदू समाज शिकायत से आगे बढ़कर निर्माण की ओर कदम बढ़ाए।

सन्दर्भ सूची

[1] Hollywood stars among thousands who join pledge not to work with Israeli film institutions ‘implicated in genocide’; https://www.nbcnews.com/pop-culture/pop-culture-news/hollywood-stars-thousands-pledge-not-work-israeli-film-institutions-rcna230463#

[2] Gal Gadot blames ‘pressure on celebrities to speak out against Israel’ for box office failure of Snow White | Film | The Guardian;  https://www.theguardian.com/film/2025/aug/18/gal-gadot-celebrities-speak-out-against-israel-box-office-failure-snow-white

[3] Snakes in the Ganga by Rajiv Malhotra and Vijaya Viswanathan; p.p. 392-393.

[4] BDS Movement | BDS MOVEMENT;  https://bdsmovement.net

[5] A Call from India to boycott, divestment & sanction Israel;  https://www.milligazette.com/news/8-international/13975-a-call-from-india-to-boycott-divesment-sanction-israel/

[6] Why Zionism rules the hearts of Hindutva acolytes – Frontline; https://frontline.thehindu.com/politics/why-zionism-rules-the-hearts-of-hindutva-acolytes/article67637346.ece

[7] “When I See Them, I See Us”: Building together the Dalit and Palestinian movements for Justice – Round Table India;  https://www.roundtableindia.co.in/when-i-see-them-i-see-us-building-together-the-dalit-and-palestinian-movements-for-justice/

[8] “Brown Billions, Ivy Hate: India’s Elite Fund War”; https://stophindudvesha.org/brown-money-red-agendas-how-indian-billionaires-are-funding-the-ivy-leagues-war-on-india/

[9] California passes ‘anti-caste discrimination’ SB 403 bill: All you need to know | World News;  https://www.hindustantimes.com/world-news/california-passes-anti-caste-discrimination-sb-403-bill-all-you-need-to-know-101693310233017.html

[10] California governor vetoes bill that would ban caste discrimination | CNN;   https://edition.cnn.com/2023/10/09/us/california-caste-discrimination-bill-veto

[11] International Day to Combat Islamophobia | United Nations; https://www.un.org/en/observances/anti-islamophobia-day

[12] Acknowledge ‘Hinduphobia’, India urges UN | India News – Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/india/acknowledge-hinduphobia-india-urges-un/articleshow/89028174.cms

[13] “Woke Agenda Targets Indian Nationalist Media”;  https://stophindudvesha.org/label-demonize-erase-the-woke-ecosystems-coordinated-assault-on-indian-nationalistic-media/

[14] From Diwali to Holi: The Media War on Hindu festivals;  https://stophindudvesha.org/from-diwali-to-holi-the-media-war-on-hindu-festivals/

[15] Western Media’s Whitewashing of Hindu Genocide in Bangladesh;   https://stophindudvesha.org/western-medias-whitewashing-of-hindu-genocide-in-bangladesh/

[16] Western Media’s Biased Portrayal of Women’s Issues in India; https://stophindudvesha.org/western-medias-biased-portrayal-of-womens-issues-in-india/

[17] Workplace habits may make Muslim colleagues uncomfortable, says report | Islam | The Guardian;  https://www.theguardian.com/world/2021/mar/02/workplace-habits-may-make-muslim-colleagues-uncomfortable-says-report

[18] Sacred Islamic artefacts go on display at Scunthorpe school; https://www.bbc.com/news/articles/c79ljwqyg9ro

[19] Indian-Origin Journalists’ Role in Fueling Anti-India Bias;  https://stophindudvesha.org/role-of-indian-origin-journalists-in-spreading-biased-narratives-against-india/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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