हिंदू पुनर्जागरण: कैसे भारत की हिंदू सभ्यतागत बहुसंख्या अपनी पहचान और आत्मविश्वास को दोबारा स्थापित कर रही है

एक अधिक आत्मविश्वासी हिंदू समाज, जो गर्व और स्पष्टता के साथ अपनी सांस्कृतिक-सभ्यतागत पहचान व्यक्त कर रहा है, भारत की सभ्यतागत यात्रा में एक निर्णायक मोड़ का प्रतीक है। समुदाय अब औपनिवेशिक विकृतियों को चुनौती देकर सनातनी मूल्यों और राष्ट्रीय आकांक्षाओं पर केंद्रित आंदोलन विकसित कर रहा है।
  • भारत में उभरते सभ्यतागत पुनर्जागरण के साथ ही, हिंदुत्व-विरोधी जड़बद्ध धारणाएँ धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं, और हिंदू समुदाय पुनः सार्वजनिक जीवन में अपनी सांस्कृतिक उपस्थिति दृढ़ता से स्थापित कर रहा है।
  • अब हिंदू समाज अपने मुद्दों को सामने रखने में पहले से कहीं अधिक आत्मविश्वास प्रदर्शित कर रहा है—चाहे वह धर्म संसदें हों, रैलियाँ हों, शांतिपूर्ण प्रदर्शन हों, या समूचे भारत को एक साझा सनातनी पहचान से जोड़ने वाली पदयात्राएँ।
  • सनातन हिंदू एकता यात्रा देशभर के हिंदुओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण संगठित मंच के रूप में उभरी, जहाँ गौ-रक्षा, हिंदू राष्ट्र की आवश्यकता, जातिगत भेदभाव की समाप्ति, और प्रमुख धर्मिक धरोहरों के पुनरुद्धार जैसे केन्द्रीय मुद्दों को प्रमुखता दी गई।
  • यद्यपि हिंदू समाज पूर्णतः एकीकृत राष्ट्रीय शक्ति बनने से अभी कुछ दूरी पर है, धर्म-सभाओं, धर्म-संसदों, रैलियों और पदयात्राओं की बढ़ती सक्रियता स्पष्ट संकेत देती है कि भारतीय सार्वजनिक जीवन में हिंदू मुद्दों की उपस्थिति निरंतर सशक्त होती जा रही है।

भारत में एक समय ऐसा था जब हिंदू होने का अर्थ ही अपनी पहचान को कमतर दिखाना मान लिया गया था। स्वयं को हमेशा सेक्युलर रूप में प्रस्तुत करना, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को दबाकर रखना, और उसे केवल निजी दायरे तक सीमित रखना—भारतीय हिंदुओं के लिए यही आचरण सामाजिक रूप से स्वीकार्य समझा जाता था। “अच्छा हिंदू” वही माना जाता था जो शांत रहे, अपने समुदाय से जुड़े मुद्दों पर खुलकर न बोले, और विशेष रूप से हिंदू विषयों पर पूर्णतया चुप्पी साधे रहे। स्पष्ट शब्दों में कहें तो आदर्श हिंदू वही समझा जाता था, जो अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को गुप्त रखकर सार्वजनिक जीवन में किसी भी प्रकार के विवाद से दूरी बनाए रखे।

विडंबना यह है कि यह चुप्पी तब भी बनी रही जब हिंदू मुद्दों को लगातार हाशिये पर धकेला गया, हिंदू-विरोधी नफ़रत बढ़ती गई, और समय-समय पर हिंदुओं पर लक्षित हिंसा की घटनाएँ सामने आती रहीं। धीरे-धीरे समाज में सांस्कृतिक और सभ्यतागत विस्मृति की एक व्यापक प्रवृत्ति घर करती चली गई। पश्चिमी संस्कृति के महिमामंडन और अपनी संस्कृति के प्रति उपेक्षा का भाव, जो कभी मैकॉले की विरासत था, स्वतंत्रता के बाद के नेहरूवादी दौर में एक सामान्य जीवन शैली में बदल गया।

परंतु पिछले एक दशक से यह स्थिति बदलनी शुरू हुई है। भारत का हिंदू समाज आज एक गहन सांस्कृतिक और सभ्यतागत पुनर्जागरण का अनुभव कर रहा है। इसका प्रमाण अयोध्या राम मंदिर का निर्माण, संबल जैसे प्राचीन धरोहर स्थलों का पुनरुद्धार, धर्मिक पर्यटन की तीव्र वृद्धि, और राष्ट्रीय राजनीति में हिंदू मुद्दों की बढ़ती प्रमुखता में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण पहलू, जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई है, वह है अपने मुद्दों को खुले तौर पर उठाने का हिंदू समुदाय में विकसित हुआ नया आत्मविश्वास। धर्म संसदों, रैलियों, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और पूरे देश को सनातन पहचान के सूत्र में जोड़ने वाली विशाल पदयात्राओं में इस नवचेतना का स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देता है। परंपरागत रूप से हिंदू समुदाय सार्वजनिक मंचों पर एक संगठित इकाई के रूप में शायद ही कभी उभरता था, लेकिन वर्तमान पुनरुत्थान इस पुराने पैटर्न को तोड़ते हुए एक ऐसे नवजागरण की ओर संकेत करता है, जिसमें आज का हिंदू सार्वजनिक जीवन में अपनी बात रखने से नहीं कतराता।

आगे के भागों में इसी विकसित होती सामूहिक हिंदू पहचान का विश्लेषण किया गया है, साथ ही इस बात पर भी विचार किया गया है कि यह परिवर्तन किस प्रकार उस वाम-उदारवादी नैरेटिव को चुनौती देता है, जो लंबे समय से हिंदू-विरोधी दृष्टिकोण को बढ़ावा देता रहा है।

 सर्वभारतीय हिंदू पहचान का निर्माण

हिंदू धर्म लंबे समय से बाहरी आक्रमणों और वैचारिक विकृतियों का लक्ष्य रहा है। यूरोपीय उपनिवेशवाद और मिशनरी संस्थानों ने इंडोलॉजी के नाम पर हिंदू धर्म और उसकी शास्त्रीय परंपराओं को गलत रूप में प्रस्तुत करने की आधारशिला रखी। इसके बाद औपनिवेशिक काल में जाति-सम्बंधी एक विभाजनकारी नैरेटिव गढ़ा गया, जिसने वर्ण व्यवस्था की मूल भावना को विकृत कर हिंदू समाज के भीतर गहरी दरारें उत्पन्न कर दीं। स्वतंत्रता के बाद इन विकृतियों को सुधारने के बजाय, दुर्भाग्यवश नेहरूवादी व्यवस्था ने उन्हें और सुदृढ़ किया। समय के साथ वाम-उदारवादी तंत्र सामाजिक संरचना में गहराई तक स्थापित हो गया, जिससे इन औपनिवेशिक विचारों को और अधिक फैलने का अवसर मिला, और परिणामस्वरूप हिंदू समाज धीरे-धीरे और भी खंडित होता चला गया।

यद्यपि ये आंतरिक दरारें अभी पूरी तरह भर नहीं पाई हैं, समुदाय अब इन विकृत नैरेटिव्स को चुनौती देने लगा है और एक व्यापक सर्वभारतीय पहचान की दिशा में आगे बढ़ रहा है। देशभर के धर्मगुरु और आध्यात्मिक नेता इस जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। पदयात्राओं और जन-आंदोलनों के माध्यम से वे हिंदू समाज को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास कर रहे हैं। हाल ही में हिंदू आध्यात्मिक नेता पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, जिन्हें बागेश्वर धाम सरकार के रूप में भी जाना जाता है, ने अनेक संतों और आध्यात्मिक नेताओं के सहयोग से ‘सनातन हिंदू एकता यात्रा’ का नेतृत्व किया। अपनी प्रकृति में यह एक विशिष्ट पहल थी, जो 7 नवंबर 2025 को दिल्ली के छतरपुर मंदिर परिसर से आरंभ होकर 16 नवंबर को वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में सम्पन्न हुई। दस दिनों की इस पदयात्रा में देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए, और पंजीकरण की सुविधा सभी नागरिकों के लिए ऑनलाइन तथा ऑफलाइन दोनों माध्यमों से उपलब्ध कराई गई थी[1] [2]

आयोजकों के अनुसार, इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य सनातनियों के बीच एकता को सुदृढ़ करना और जाति, पंथ, आर्थिक स्थिति तथा अन्य सामाजिक विभाजनों से परे एक संगठित समुदाय-बोध विकसित करना था। पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने स्पष्ट किया कि यह यात्रा राजनीतिक नहीं, बल्कि पूर्णतः आध्यात्मिक स्वरूप की थी। उनके अनुसार, 150 किलोमीटर की इस पदयात्रा का लक्ष्य भारत के 150 करोड़ नागरिकों तक एकता और समरसता का संदेश पहुँचाना था।

यात्रा में जैसे-जैसे हिंदू समाज के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते गए, वातावरण “जय श्री राम”, “भारत माता की जय” और “सनातन धर्म अमर रहे” जैसे पावन नारों से गूंजता चला गया। मार्ग में विभिन्न स्थानों पर धार्मिक सभाओं और भजन कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया, जिससे सम्पूर्ण यात्रा का वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा और उत्साह से परिपूर्ण हो उठा[3] [4]

पंडित धीरेंद्र शास्त्री लगातार इस बात पर जोर देते आए हैं कि हिंदू समाज को बाहरी तौर पर थोपे गए जाति-आधारित विभाजनों से आगे बढ़कर एक एकीकृत सनातनी पहचान अपनानी चाहिए। जुलाई 2025 में उन्होंने जातीय जनगणना करवाने के सरकारी फैसले की आलोचना की थी। उनका कहना था कि ऐसी प्रक्रिया राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाती है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस प्रकार की जनगणना का फोकस जाति के बजाय आर्थिक मानकों पर होना चाहिए, और यह भी कहा कि हिंदू समाज को जातिगत भेदभाव को खत्म करने की दिशा में सार्थक कदम उठाकर अपनी ख़ुद की भीतरी चुनौतियों से लड़ना होगा[5]

समकालीन भारत में हिंदू एकता का उल्लेख अब वर्जित नहीं रहा, भले ही वाम-उदारवादी समूह इसकी आलोचना जारी रखे। देश भर में समुदाय-आधारित पहलें तेजी से उभर रही हैं, जो हिंदू एकता के महत्व को सामने ला रही हैं। सनातन बोर्ड की मांगों से लेकर मंदिरों, धरोहरों और समुदायिक अधिकारों की सुरक्षा पर महाकुंभ 2025 में उठे नए संकल्प[6], नवंबर 2024 में आध्यात्मिक गुरु देवकीनंदन ठाकुर द्वारा बुलाया गया धर्म संसद, और राष्ट्रीय सनातन बोर्ड की बढ़ती मांग[7]—इन सभी गतिविधियों का मिला जुला स्वरूप यह साफ़ संकेत देता है कि हिंदू मुद्दे अब एक संगठित हिंदू पहचान के ढांचे में व्यक्त होने लगे हैं।

इन घटनाओं ने वाम-उदारवादी तंत्र को असहज कर दिया है, जो लंबे समय से हिंदुत्व को बदनाम करने पर टिका रहा है और किसी भी हिंदू मुद्दे को उठाने की कोशिश को तुरंत “अल्पसंख्यक विरोधी” या “हिंदू मेजॉरिटेरियन” कहकर खारिज कर देता है। पंडित धीरेंद्र शास्त्री, हिंदू समाज में अपनी व्यापक लोकप्रियता के कारण, देशभर में बड़े पैमाने पर रैलियां और धार्मिक सभाएं आयोजित करते आये हैं। साधारण हिंदू—चाहे वे किसी भी जाति, पंथ या आर्थिक पृष्ठभूमि से हों—इन आयोजनों में बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। पंडित धीरेंद्र शास्त्री की लोकप्रियता ने उन्हें वाम-उदारवादी समूहों का आसान निशाना भी बना दिया है, जो अक्सर उन्हें मोदी सरकार के कथित “हिंदू मेजॉरिटेरियन” एजेंडे का प्रतिनिधि बताने की कोशिश करते हैं।

हिंदुत्व का सामान्यीकरण

StopHinduDvesha ने अपने लेखों के माध्यम से यह बात विस्तार के साथ रेखांकित की है कि किस तरह वाम-उदारवादी तंत्र ने बड़े पैमाने पर हिंदुत्व को बदनाम करने और उसकी एक विकृत छवि प्रस्तुत करने की कोशिश की है[8] पश्चिमी विश्वविद्यालयों और वहां के विशिष्ट अकादमिक हलकों ने इस विमर्श को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है—जहाँ हिंदुत्व ही नहीं, बल्कि हिंदू पहचान की साधारण से साधारण अभिव्यक्ति को भी संदेह और शत्रुता की दृष्टि से देखा जाता है।

“उत्तरी अमेरिका में बसे कुछ दक्षिण एशिया स्कॉलर-एक्टिविस्टों” द्वारा कथित तौर पर बनाई गयी Hindutva Harassment Field Manual नामक पूरी की पूरी एक वेबसाइट इसी सोच को मज़बूत करती है। यह मंच खुले तौर पर हिंदू समुदाय के प्रति शत्रुता को बढ़ावा देता है और दावा करता है कि बीजेपी और आरएसएस “संगठित हिंदुत्व उत्पीड़न के ढांचे” का हिस्सा हैं[9]

हिंदुत्व के इस घोर विकृतीकरण का दुष्परिणाम यह निकला कि हिंदू पहचान का कोई भी सार्वजनिक प्रदर्शन तुरंत फासीवादी या अल्पसंख्यक-विरोधी के तौर पर लेबल किया जाने लगा, जिसके कारण हिंदू समाज के मुद्दे सार्वजनिक विमर्श में हाशिये पर चले गए। लेकिन भारत में जारी सभ्यतागत पुनरुत्थान के बीच ये घिसी पिटी धारणाएँ अब कमजोर पड़ रही हैं। भारत के हिंदू एक नये आत्मविश्वास के साथ सार्वजनिक स्थानों में अपनी पहचान और गर्व को दोबारा स्थापित कर रहे हैं।

2025 में अपनी स्थापना के 100 साल पूरे होने के अवसर पर आरएसएस पूरे देश में रैलियां आयोजित कर रहा है। इन रैलियों में स्वयंसेवक परंपरागत आरएसएस वेशभूषा पहनकर रूट मार्चों में शामिल होते हैं। इसके साथ ही संगठन की उपलब्धियों, कार्यसंस्कृति और वैचारिक मूल्यों को सामने लाने के लिए सेमिनारों और कार्यशालाओं की शृंखला भी तय की गई है। उत्तर प्रदेश में ऐसे कई कार्यक्रम पहले ही हो चुके हैं, और इस व्यापक संपर्क अभियान के पूरे राज्य के हजारों केंद्रों तक पहुंचने की उम्मीद है[10]

आरएसएस के शताब्दी वर्ष में भारतीय सड़कों पर स्वयंसेवकों का गौरवपूर्ण मार्च अत्यंत महत्वपूर्ण सांकेतिक अर्थ रखता है। स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक आरएसएस को नज़रअंदाज़ किया गया, बदनाम किया गया, और कई बार संगठन को अमानवीय रूप में प्रस्तुत किया गया। इतिहास में इसे तीन अलग-अलग अवसरों पर प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा—1948 में, उसके बाद 1975 की आपातकाल अवधि में, और पुनः 1992 में। अंततः जुलाई 2024 में सरकारी कर्मचारियों के आरएसएस से जुड़ने पर लगी 44 वर्ष पुरानी रोक भी हटा दी गई।

दशकों तक चले हिंदू-विरोधी विमर्श ने ऐसी स्थिति बना दी थी कि सामान्य हिंदू भी आरएसएस जैसी संस्थाओं से दूरी बनाए रखते थे। हिंदू मूल्यों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को इस हद तक नकारात्मक रूप से पेश किया गया कि भारत के बड़े हिस्से में अंग्रेज़ी-शिक्षित एलीट वर्ग किसी भी सार्वजनिक हिंदू पहचान—चाहे वह कांवर यात्रा हो, शोभा यात्राएं, या आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा आयोजित धर्म संसद—को संदेह की नजर से देखने लगा।

यद्यपि यह परिवर्तन क्रमिक है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में “हिंदुत्व” और “हिंदू पहचान” के सामान्यीकरण की प्रक्रिया अब स्पष्ट रूप से प्रारंभ हो चुकी है। भारतीय नागरिक अपनी हिंदू पहचान को स्वीकारने और उसे सहज रूप से व्यक्त करने में पहले की तुलना में अधिक आत्मविश्वासी हो रहे हैं। आरएसएस के वर्षभर चलने वाले शताब्दी समारोह इस उभरती हुई प्रवृत्ति को और सुदृढ़ करने की क्षमता रखते हैं।

संगठन ने एक व्यापक लक्ष्य घोषित किया है—देश के प्रत्येक राज्य के हर प्रशासनिक ब्लॉक तक पहुँचकर आत्मनिर्भरता, एकता और धर्मिक पुनर्जीवन का संदेश देश के सबसे दूरस्थ क्षेत्रों तक ले जाना। इसके साथ ही, पूरे देश में 1,500 से अधिक हिंदू सम्मेलनों के आयोजन की भी योजना है। यह आशा की जाती है कि ये सम्मेलन एक जीवंत नेटवर्क के रूप में कार्य करेंगे—स्वयंसेवकों, संतों, विद्वानों, समुदायिक नेताओं, कलाकारों और युवाओं को एक मंच पर लाकर, समग्र हिंदू समाज को और अधिक सुदृढ़ रूप से जोड़ते हुए[11]

महत्वपूर्ण हिंदू मुद्दों पर जन- सहमति निर्माण की मुहिम

हिंदू समुदाय सड़कों पर उतरकर अपने मुद्दों के पक्ष में आवाज उठाये, ऐसा ऐतिहासिक रूप से कम ही देखने को मिला है। उल्टा धर्मनिरपेक्षता की विकृत अवधारणाओं के प्रभाव में, कई हिंदू—कभी जानबूझकर, तो कभी अनजाने में—वाम-उदारवादी या खुले तौर पर हिंदू-विरोधी आंदोलनों से जुड़ते रहे। लेकिन गाय संरक्षण, लव जिहाद, या मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण जैसे मुद्दों पर बड़ी संख्या में हिंदुओं का संगठित होना अब तक दुर्लभ ही रहा है।

लेकिन यह पैटर्न अब बदलता दिख रहा है। धर्म सभाएं, धर्म-संसद और पदयात्राएं—जो हिंदू आध्यात्मिक नेताओं द्वारा आयोजित की जाती हैं—भले ही वाम-उदारवादी शैली के विरोध प्रदर्शनों जैसी नहीं दिखतीं, लेकिन वे हिंदू मुद्दों को सार्वजनिक विमर्श में लाने का बेहद महत्वपूर्ण काम कर रही हैं। वोक और वाम-उदारवादी प्रदर्शनों में अक्सर अधिकार जताने की अतिशयता और शिकायत-प्रधान स्वर होते हैं। इसके विपरीत, हिंदू सभाएं और पदयात्राएं विवेकपूर्ण चर्चा और सामूहिक सोच-विचार के मंच की तरह काम करती हैं। ये न सिर्फ हिंदू समुदाय बल्कि समूचे भारतवासियों को उन मुद्दों को समझने का अवसर देती हैं, जो हिंदू राष्ट्र की व्यापक अवधारणा से जुड़े हैं।

सनातन हिंदू एकता पदयात्रा 2025 ने सात प्रमुख मुद्दों पर फोकस रखा है:

  • समाज में सद्भाव बढ़ाना और जातिगत भेदभाव खत्म करना।
  • भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना।
  • लव जिहाद और अवैध धर्मांतरण पर रोक।
  • माँ यमुना (यमुना नदी) की स्वच्छता सुनिश्चित करना।
  • ब्रज धाम को मांस और शराब-मुक्त क्षेत्र बनाना।
  • गौ माता को “राष्ट्र माता” घोषित करना।
  • श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण[12]

इन मुद्दों में से कई बातें हिंदू आध्यात्मिक नेता अलग-अलग मंचों पर लंबे समय से उठाते रहे हैं। लेकिन जब ये सभी मांगें एक सर्वभारतीय पदयात्रा के तहत एक साथ सामने आती हैं—और स्थानीय मीडिया भी उन्हें मजबूती से कवरेज देता है—तो इनकी पहुंच कई गुना बढ़ जाती है। इससे व्यापक हिंदू समाज इन मुद्दों से अधिक गहराई से जुड़ पाता है।

यात्रा की सबसे उल्लेखनीय बातों में से एक थी—मुस्लिम समुदाय के 300 से अधिक सदस्यों का इसमे शामिल होना[13] भले ही इसे प्रतीकात्मक माना जा सकता है, लेकिन वोक वाम-उदारवादी हिंदू-विरोधी प्रोपेगंडा-तंत्र द्वारा फैलाए गए ज़हर का यह सीधा जवाब है। यह दिखाता है कि वामपंथी और कट्टर इस्लामिस्ट समूह जिस तरह से हिंदू राष्ट्र की छवि एक कट्टर बहुसंख्यकवादी व्यवस्था के रूप में पेश करते हैं, वास्तविकता उससे बिलकुल उलट है। वास्तविकता में हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना एक ऐसी समावेशी इकाई के रूप में की गयी है, जिसमे सनातनी मुसलमानों की भी बहुमूल्य भागीदारी होगी। अतः यात्रा में सनातनी मुसलमानों की भागीदारी से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि हिंदू राष्ट्र वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना पर आधारित है, जो सभी भारतीयों को एक सूत्र में जोड़ती है, फिर चाहे वे किसी भी धार्मिक समुदाय के हों।

पिछले कुछ वर्षों में हिंदू सार्वजनिक जीवन के विस्तार ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनाने में अहम भूमिका निभाई है। उदाहरण के लिए, लव जिहाद पर खुलकर चर्चा—जो दस साल पहले तक लगभग असंभव लगती थी—अब समुदाय में आम है। देशभर में सक्रिय हिंदू समूहों और संगठनों की बढ़ती भूमिका ने इस जागरूकता को काफी बढ़ाया है। वे अब लव- जिहाद के मामलों पर अलग-अलग शहरों और कस्बों में सक्रिय रूप से विरोध दर्ज करते हैं, रैलियां निकालते हैं, और पीड़ित परिवारों का साथ देते हैं[14] [15] इनमें से कई विरोध-प्रदर्शन बड़े जुलूसों में बदल गए, और राष्ट्रीय तथा स्थानीय समाचारों में इन्हें प्रमुख कवरेज मिली—क्योंकि हिंदू समुदाय के लोग भारी संख्या में इन प्रदर्शनों में शामिल हुए।[16]

समुदाय अब गौ-हत्या जैसे मुद्दों पर भी पहले से कहीं अधिक मुखर होता दिखाई दे रहा है। जून 2025 में VHP तेलंगाना ने “चलो ओल्ड सिटी – ऑपरेशन गौ माता” अभियान शुरू किया, जिसका उद्देश्य मौजूदा प्रतिबंध कानूनों के बावजूद होने वाली अवैध पशु तस्करी को उजागर करना था। VHP के नेतृत्व में समुदाय ने पुलिस से कड़ी कार्रवाई की मांग की, और यह भी कहा कि ज़ब्त की गई सभी गायों को पंजीकृत गौशालाओं में भेजा जाना चाहिए[17]

जैसे-जैसे हिंदू समाज अधिक एकजुट हो रहा है और सभ्यता तथा धर्म से जुड़े मुद्दों पर आत्मविश्वास के साथ बोलने लगा है, उसी के समानांतर एक प्रोपेगंडा अभियान भी लगातार चलता रहा है—जो इन चिंताओं को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करता है। वाम-उदारवादी प्रोपेगैंडा मशीनरी गौ-रक्षा को “काउ विगिलेंटिज़्म” लेबल कर बदनाम करने की कोशिश करती है, हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को एक बहुसंख्यकवादी dystopia के रूप में पेश करती है, और अयोध्या राम मंदिर को “हिंदुत्व के दमन” के प्रतीक के रूप में चित्रित करने की कोशिश करती है। इसके बावजूद, ऐसी वैमनस्यपूर्ण कथाओं के बीच भी हिंदू समुदाय बड़े धार्मिक आयोजनों और सार्वजनिक मंचों का उपयोग कर सनातन धर्म से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर खुलकर चर्चा कर रहा है।

उदाहरण के लिए, महाकुंभ 2025 हिंदू समाज को कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर एकजुट करने वाला एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा—जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर जारी अत्याचार, पश्चिमी देशों में तेज़ी से बढ़ती हिंदू-विरोधी भावना, मंदिर स्वायत्तता का प्रश्न, हिंदू राष्ट्र की आवश्यकता, इत्यादि[18] इसी तरह, नव-निर्मित अयोध्या राम मंदिर आज सभी सनातनियों के लिए एक प्रमुख केंद्र बन चुका है, जो पूरे भारत के हिंदुओं को जोड़ने वाला प्रतीक बन रहा है। 2025 में अयोध्या लगातार भारत के शीर्ष घरेलू पर्यटन स्थलों में शामिल रही,[19] और यह बढ़ती लोकप्रियता वाम-उदारवादी तंत्र के उस लंबे समय से चले जा रहे हिंदू-विरोधी नैरेटिव्स पर एक वास्तविक और प्रतीकात्मक चोट है—जो राम जन्मभूमि आंदोलन और व्यापक रूप से हिंदू धर्म को विकृत रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर हिंदू मुद्दों की पैकेजिंग

StopHinduDvesha के एक पूर्व लेख में[20] हमने इस बात पर चर्चा की थी कि हिंदू समुदाय को अपने मुद्दों को अधिक प्रभावी ढंग से सामने रखने और एक ऐसा नैरेटिव तंत्र बनाने की आवश्यकता है, जो वैश्विक मंचों पर हिंदुओं की आवाज़ को मजबूती से पहुँचाए।

जनसमर्थन और सार्वजनिक प्रदर्शन के माध्यम से हिंदू चिंताओं को उजागर करना आज के नैरेटिव संघर्ष का एक अहम हिस्सा बन चुका है। सनातन हिंदू एकता पदयात्रा इसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम प्रतीत होती है।

भले ही मुख्यधारा का पश्चिमी मीडिया अब भी हिंदू मुद्दों को हाशिये पर डालने या उनकी नकारात्मक छवि बनाने की प्रवृत्ति रखता है, लेकिन बागेश्वर धाम सरकार की सनातन हिंदू एकता यात्रा को मिली मज़बूत स्थानीय मीडिया कवरेज ने एक सकारात्मक संकेत दिया है।

इस यात्रा में कई चर्चित सार्वजनिक हस्तियों ने भी हिस्सा लिया, जिनमें पहलवान द ग्रेट खली, पूर्व भारतीय क्रिकेटर शिखर धवन और भारतीय क्रिकेटर उमेश यादव भी शामिल थे[21] इससे पहले भी धीरेंद्र शास्त्री ने नवंबर 2024 में एक ऐसी ही पदयात्रा निकाली थी, जिसमें बॉलीवुड की कई जानी मानी हस्तियाँ भी शामिल हुई थीं[22]

अगर सेलिब्रिटी भागीदारी से अलग हटकर बात करें, तो भी हज़ारों हिंदुओं का भगवा ध्वज लहराते हुए, जय श्री राम के जयकारों के साथ संतों, साधुओं और आध्यात्मिक गुरुओं के साथ भारतीय सड़कों पर निकलना—एक दशक पहले तक कल्पना से परे था। वाम-उदारवादी तंत्र की हिंदू संस्कृति और मूल्यों के सार्वजनिक प्रदर्शन के प्रति निरंतर शत्रुता, और हिंदू एक्टिविज़्म को बदनाम करने के उनके प्रयासों ने हिंदुओं को सार्वजनिक जीवन में हाशिये की ओर धकेल दिया था, जबकि अन्य धार्मिक समुदाय अपने प्रतीकों और पहचान को खुलकर प्रदर्शित करते रहे।

लेकिन भारत में जारी सांस्कृतिक और सभ्यतागत पुनर्जागरण इस परिदृश्य को बदल रहा है। भले ही हिंदू समाज अभी एक पूर्णत: एकीकृत अखिल-भारतीय शक्ति बनने से कुछ दूरी पर है, लेकिन आध्यात्मिक गुरुओं और समुदाय के सदस्यों द्वारा आयोजित धर्म-सभाओं, धर्म-संसदों, रैलियों और पदयात्राओं में लगातार हो रही वृद्धि यह संकेत देती है कि हिंदू मुद्दे अब पहले से कहीं अधिक बड़े पैमाने पर सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन रहे हैं।

अक्सर कहा जाता है कि हिंदू सड़कों पर बहुत कम उतरते हैं, और यदि उतरते भी हैं, तो प्रायः धर्मनिरपेक्ष कारणों के लिए। किंतु दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सड़कों पर पंडित धीरेंद्र शास्त्री की सनातन हिंदू एकता यात्रा के दौरान उमड़ा विशाल जनसमूह यह संकेत देता है कि हिंदू उदासीनता का पारंपरिक और रूढ़िगत ढांचा अब तीव्र गति से बदल रहा है।

यदि यह प्रवाह इसी प्रकार आगे बढ़ता रहा, तो वैश्विक मंचों पर हिंदुओं के संबंध में स्थापित नैरेटिव भी परिवर्तित होगा, और हिंदू मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं अधिक स्पष्टता, आत्मविश्वास और प्रभावशीलता के साथ प्रस्तुत किया जा सकेगा।

निष्कर्ष

वाम-उदारवादी तंत्र द्वारा लंबे समय से किया जाने वाला हिंदुत्व का दानवीकरण दरअसल हिंदू एक्टिविज्म और हिंदू अधिकारों की मुखर पैरवी के प्रति उसकी पुरानी चिढ़ से ही जुड़ा हुआ है। हिंदुओं को एक पिक्चर पोस्टकार्ड, आज्ञाकारी व शान्तिप्रिय समुदाय के तौर पर तभी स्वीकार किया जाता है, जब वे सेक्युलर मुखौटा ओढ़े रहें, अपने मुद्दों को पीछे रखें और अपनी सांस्कृतिक व सभ्यतागत पहचान को निजी दायरे से बाहर न आने दें।

लेकिन जैसे ही हिंदू अपनी परंपराओं को खुले में अपनाना शुरू करते हैं, सार्वजनिक स्थानों पर अपनी पहचान खुलकर व्यक्त करते हैं, और अपने मुद्दों को साफ़-साफ़ सामने रखते हैं—उन्हें तुरंत “अत्याचारी” और “दमनकारी” करार दे दिया जाता है। लंबे समय तक भारत के हिंदू समाज ने भी अनजाने में इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया—अपनी सार्वजनिक पहचान को छिपाकर, और अपनी सभ्यतागत व सांस्कृतिक चिंताओं को मुख्यधारा की बहस से बाहर रखकर।

मगर आज, भारत में चल रहे सभ्यतागत पुनरुत्थान के दौर में, हिंदू संस्कृति का गर्वपूर्ण सामाजिक प्रदर्शन और समुदाय के मुद्दों पर सामूहिक आवाज़ उठाना अब कोई वर्जित बात नहीं रह गई है। समाज अपनी सनातनी पहचान को एक नए आत्मविश्वास के साथ अपनाते हुए, उस धार्मिक सार्वजनिक जीवन को धीरे-धीरे पुनर्जीवित कर रहा है, जो लंबे समय से धुंधला पड़ गया था।

सन्दर्भ सूची

[1] हिंदू एकता यात्रा में उमड़ा भक्तों का सैलाब, धीरेंद्र शास्त्री बोले – सनातन भारत की आत्मा- bageshwar dham dheerendra shastri sanatan hindu ekta yatra delhi chhatarpur vrindavan  ntcpbt  – AajTak; https://www.aajtak.in/india/news/story/bageshwar-dham-dheerendra-shastri-sanatan-hindu-ekta-yatra-delhi-chhatarpur-vrindavan-ntcpbt-rpti-2379859-2025-11-07

[2] कब तक चलेगी बाबा बागेश्वर की सनातन एकता पदयात्रा, क्या है इसका उद्देश्य, कैसे हो सकते हैं इसमें शामिल – India TV Hindi;  https://www.indiatv.in/religion/news-bageshwar-dham-padyatra-route-today-snatan-hindu-ekta-padyatra-dhirendra-shastri-padyatra-live-today-2025-11-10-1175080

[3] Ibid.

[4] हिंदू एकता यात्रा में उमड़ा भक्तों का सैलाब, धीरेंद्र शास्त्री बोले – सनातन भारत की आत्मा – bageshwar dham dheerendra shastri sanatan hindu ekta yatra delhi chhatarpur vrindavan  ntcpbt  – AajTak;     https://www.aajtak.in/india/news/story/bageshwar-dham-dheerendra-shastri-sanatan-hindu-ekta-yatra-delhi-chhatarpur-vrindavan-ntcpbt-rpti-2379859-2025-11-07

[5] Caste Politics vs. Hindu Unity: The Struggle for Bharat’s Soul; https://stophindudvesha.org/caste-politics-vs-hindu-unity-the-struggle-for-bharats-soul/

[6] “Maha Kumbh 2025: Uniting Voices to Uphold Sanatan Dharma”; https://stophindudvesha.org/maha-kumbh-2025-a-platform-for-collective-discourse-against-anti-sanatan-rhetoric/

[7] “Safeguarding Dharma: Call for National Sanatan Board”; https://stophindudvesha.org/safeguarding-hindu-dharma-the-growing-demand-for-a-national-sanatan-board/

[8] Vilification of Hindu Dharma Through Misguided Gender Narratives – Hindudvesha;  https://stophindudvesha.org/vilification-of-hindu-dharma-through-misguided-gender-narratives/

[9] Organized Harassment – Hindutva Harassment Field Manual; https://www.hindutvaharassmentfieldmanual.org/organized

[10] 100 years of RSS: Volunteers hold route marches across UP to show strength | Lucknow News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/city/lucknow/100-years-of-rss-volunteers-hold-route-marches-across-up-to-show-strength/articleshow/124220373.cms

[11] RSS @ 100: Nationawide outreach & celebrations begin August 26;   https://organiser.org/2025/06/30/300080/bharat/rss100-sangh-to-organise-hindu-conferences-nationwide-to-mark-centenary-year/

[12] Dhirendra Krishna Shastri and Jaya Kishori Lead Sanatan Ekta Yatra from Delhi to Vrindavan – Madhya Pradesh News | Bhaskar English;  https://www.bhaskarenglish.in/local/mp/news/bageshwar-dham-jaya-kishori-lead-sanatan-ekta-padyatra-from-delhi-to-vrindavan-promoting-unity-and-harmony-136357647.html

[13] Dhirendra Krishna Shastri and Jaya Kishori Lead Sanatan Ekta Yatra from Delhi to Vrindavan – Madhya Pradesh News | Bhaskar English;  https://www.bhaskarenglish.in/local/mp/news/bageshwar-dham-jaya-kishori-lead-sanatan-ekta-padyatra-from-delhi-to-vrindavan-promoting-unity-and-harmony-136357647.html

[14] Protest in Kottarakkara against love Jihad incident; Hindu Groups Demand Action – VSK Telangana; https://www.vsktelangana.org/Encyc/2025/8/20/protest-kottarakkara-love-jihad-hindu-groups-demand-action.html

[15] Hundreds in Mumbai March Against ‘Love Jihad’, Demand Anti-Conversion Laws;   https://www.ndtv.com/india-news/rss-bajrang-dal-leaders-march-against-love-jihad-in-mumbai-3733648

[16] Mobilisation Against ‘Love Jihad’: Why Thousands of Hindus Are Taking Out Rallies In Maharashtra;   https://swarajyamag.com/politics/why-thousands-of-hindus-are-holding-rallies-in-maharashtra

[17] VHP calls for ‘Chalo Old City – Operation Gau Mata’ today; https://www.thehansindia.com/news/cities/hyderabad/vhp-calls-for-chalo-old-city-operation-gau-mata-today-976225

[18] “Maha Kumbh 2025: Uniting Voices to Uphold Sanatan Dharma”;  https://stophindudvesha.org/maha-kumbh-2025-a-platform-for-collective-discourse-against-anti-sanatan-rhetoric/

[19] UP tourism soars: Ayodhya, Varanasi, Prayagraj drive record domestic footfall | Lucknow News – The Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/city/lucknow/up-tourism-soars-ayodhya-varanasi-prayagraj-drive-record-domestic-footfall/articleshow/125102696.cms

[20] The Missing Voice: Why Hindu Suffering Rarely Makes Headlines;  https://stophindudvesha.org/the-missing-voice-why-hindu-suffering-rarely-makes-headlines/

[21] धीरेंद्र शास्त्री की ‘सनातन हिंदू एकता पदयात्रा’ में उतरे सेलिब्रिटी, ग्रेट खली से लेकर शिखर धवन तक ने दिया समर्थन – dhirendra shastris sanatan hindu ekta padyatra gains celebrity support; https://www.jagran.com/haryana/faridabad-dhirendra-shastris-sanatan-hindu-ekta-padyatra-gains-celebrity-support-40032941.html

[22] Guruji Is My Brother:’ Sanjay Dutt Adds Star Power To Dhirendra Shastri’s Padyatra, Khali Joins In Too | India News – News18;  https://www.news18.com/india/guruji-is-my-brother-sanjay-dutt-adds-star-power-to-dhirendra-shastris-padyatra-khali-joins-in-too-9134419.html

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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