सभ्यता-पुनरुत्थान से भारत के आत्मबोध और वैश्विक भूमिका का पुनर्रचना
- स्वतंत्रता के बाद के नेहरूवादी ढांचे ने भारत की सभ्यतागत कथा को बड़े पैमाने पर नज़रअंदाज़ किया और इसके बजाय “भारतीयता” को इस रूप में पेश किया कि हम पश्चिमी मूल्यों और आदर्शों को अपनाने में कितनी “तरक्की” कर पाए हैं।
लेकिन पिछले एक दशक में, जैसे जैसे वामपंथी-उदारवादी कथानक गंभीर चुनौती का सामना करने लगे और देश में एक अभूतपूर्व हिंदू जागरण देखा गया, वैसे वैसे इस प्रवृत्ति में भी एक बड़ा बदलाव आया।
• भारत की सभ्यतागत और सांस्कृतिक कथा अब उसकी अपनी पहचान और वैश्विक छवि निर्धारित करने वाली एक मुख्य कसौटी बनती जा रही है।
• भारत का रणनीतिक और सभ्यतागत विमर्श भले ही पहली नज़र में एक दूसरे से अलग जान पड़े, लेकिन ज़रा गहराई से जाँचने-परखने पर दोनों में एक साझा सूत्र दिखाई देता है।
• भारत अब अपनी सभ्यता की ताकत का सहारा केवल धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में ही नहीं ले रहा, बल्कि शासन और नीति निर्माण के क्षेत्र में भी वह इससे प्रेरणा ले रहा है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अक्सर सिर्फ भू-राजनीति से जोड़ कर देखा जाता है। लेकिन सच तो यह है कि किसी भी देश का सभ्यतागत नज़रिया भी वैश्विक मामलों के आकलन हेतु उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना कि भूराजनीतिक दृष्टिकोण। ज़्यादातर देश यह कोशिश करते हैं कि उनकी आंतरिक शासन प्रणाली और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में उनके सांस्कृतिक और सभ्यतागत मूल्य भी सम्मिलित हों। उदाहरण के लिए, चीन अपनी प्राचीन सभ्यता की उपलब्धियों पर आधारित एक मज़बूत राष्ट्रीय कथानक गढ़ता है। इसी तरह, अमेरिका की पहचान भी एक खास सोच — “अमेरिकन ड्रीम” — पर टिकी है। इस सोच के अन्तर्गत अमेरिका दुनिया भर के लोगों का खुले दिल से स्वागत तो करता ही है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर देता है कि आख़िर “अमेरिकन” होने का ख़ास मतलब क्या है।[1]
भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है जिसके पास अपनी समृद्ध और जीवंत सभ्यतागत विरासत का एक अटूट ख़ज़ाना है। एक ऐसा देश, जिसने सैकड़ों सालों तक विदेशी आक्रमणों और उपनिवेशवाद की मार सही हो, उसके लिए सभ्यतागत नज़रिया अपनाना बेहद ज़रूरी हो जाता है। एक ऐसा सभ्यतागत नज़रिया जो न सिर्फ़ उसकी आंतरिक पहचान को, बल्कि बाहरी दुनिया के साथ उसके रिश्तों को भी परिभाषित करे। लेकिन आज़ादी के बाद की नेहरूवादी व्यवस्था ने इस विरासत को काफी हद तक नजरअंदाज कर दिया। भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों का उत्सव मनाने के बजाय, उस दौर में “भारतीयता” की ऐसी छवि गढ़ी गई, जो पश्चिमी सोच और आधुनिकता पर टिकी थी। इसका नतीजा यह हुआ कि “भारत” अपनी हिंदू सभ्यतागत पहचान से दूर होता चला गया।
भारत की वैश्विक पहचान को कई दशकों तक एक वाम-उदारवादी नज़रिये से गढ़ा गया, जिसमें भारत को सिर्फ एक उत्तर- औपनिवेशिक (post-colonial) देश के रूप में प्रस्तुत किया गया। देश की एक ऐसी छवि गढ़ी गयी जिसमे पुराने इस्लामिक शासकों की सांस्कृतिक छाप का भी महिमामंडन किया गया। अंग्रेज़ी को कूटनीति की भाषा और एलीट यानी संभ्रांत वर्ग की बातचीत की भाषा बना दिया गया। वहीं दूसरी तरफ़ भारतीय भाषाओं, परंपराओं, या सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी किसी भी चीज़ को पिछड़ा या दक़ियानूसी करार दे दिया गया।
लेकिन पिछले कुछ दस सालों में स्थिति तेज़ी से बदली है। एक ज़ोरदार हिंदू नवजागरण के उदय के साथ, भारत अब अपनी सभ्यतागत पहचान को पुनः प्राप्त कर रहा है। अयोध्या राम मंदिर के भव्य उद्घाटन से लेकर 2025 के महाकुंभ जैसे आयोजनों में बढ़ती वैश्विक दिलचस्पी तक, एक नया विमर्श उभरता दिख रहा है — ऐसा विमर्श जो भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान को गर्वपूर्वक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में रखता है।
लेख के अगले भागों में हम यह जानेंगे कि भारत का सभ्यतागत दृष्टिकोण कैसे उसके आंतरिक ढांचे और वैश्विक भूमिका की दिशा तय कर रहा है।
भारत की सभ्यतागत दृष्टि और उसकी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति
ग्रीस, मेसोपोटामिया और मध्य एशिया जैसी अनेक प्राचीनतम सभ्यताओं से भारतीय सभ्यता के तार जुड़े हुए हैं। प्राचीन ग्रीस की धार्मिक परंपराओं (ईसाई-पूर्व) और हिंदू धर्म के बीच कई समानताएं पाई जाती हैं। विज्ञान और खगोलशास्त्र जैसे क्षेत्रों में भारत और ग्रीस एक-दूसरे के विशाल ज्ञान भंडार से लाभान्वित होते रहे। उदाहरण के लिए, ऋग्वेद में खगोलशास्त्र से जुड़े ऐसे ग्रंथ हैं, जिनमे ग्रीक ज्योतिषियों की ख़ासा दिलचस्पी थी। ग्रीक खगोल परंपरा में यह माना जाता है कि सप्ताह के दिनों के नामकरण और वर्ष की अवधि की सटीक गणना में भारत का महत्वपूर्ण योगदान रहा।[2]
इसी तरह, प्राचीन भारत और मेसोपोटामिया के बीच समुद्री व्यापारिक संबंध थे। ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि मेसोपोटामिया के लोग भारतीय उपमहाद्वीप को समझने के लिए हिंदू धर्म के पहलुओं का अध्ययन करते थे। सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों और विभिन्न प्रतीकों का मेसोपोटामिया में मिलना इस बता का ठोस प्रमाण है कि इन दो महान प्राचीन सभ्यताओं के बीच एक समय पर गहरे सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध रहे हैं।[3]
जैसे-जैसे भारत अपनी वैश्विक पहलों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सभ्यतागत दृष्टि को ज़्यादा से ज़्यादा स्थान देने लगा है, वैसे-वैसे विभिन्न देशों से उसके सबंध भी उन प्राचीनतम सभ्यतागत कड़ियों की आभा में आलोकित होने लगे हैं।
भारत की सभ्यतागत सोच अब उसकी सॉफ्ट पावर की एक मज़बूत आधारशिला बनती जा रही है, और उसकी वैश्विक पहुंच को भी आकार दे रही है। इसका एक अच्छा उदाहरण भारत और ग्रीस के संबंधों में देखा जा सकता है, जहां दोनों देशों के साझा सभ्यतागत मूल्य कूटनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने में मददगार साबित हो रहे हैं। फरवरी 2025 में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने नई दिल्ली में ग्रीस के विदेश मंत्री जॉर्ज जेरापेट्रिटिस से उच्च स्तरीय बातचीत की। इस बैठक में डॉ. जयशंकर ने ग्रीस के साथ भारत के बढ़ते रिश्तों पर ज़ोर दिया, वहीं जेरापेट्रिटिस ने पर्यटन, संस्कृति और व्यापार जैसे कई क्षेत्रों में संबंध मज़बूत करने में ग्रीस की दिलचस्पी जताई।[4]
अगस्त 2023 में भारत के प्रधानमंत्री मोदी की ग्रीस यात्रा के दौरान, उनके ग्रीक समकक्ष क्यारीकोस मित्सोताकिस ने दोनों देशों के प्राचीन सभ्यतागत संबंधों के विषय में बात की। दो प्राचीनतम सभ्यताओं के ऐतिहासिक आदान-प्रदान को याद करते हुए वे कुछ कुछ भावुक भी हो उठे। उन्होंने ख़ासकर “पुराने व्यापार मार्गों और सिकंदर द ग्रेट के रास्ते” का ज़िक्र किया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत और ग्रीस की सभ्यताएं शांति, न्याय और लोकतंत्र जैसे समान मूल्यों के तार से जुड़ी हुई हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भी भारत और ग्रीस की प्राचीन सभ्यताओं की विरासत के महत्व पर ज़ोर दिया, और काशी और एथेंस के बीच एक भावनात्मक और प्रतीकात्मक समानता का पुल बनाया। 2024 में एक अहम पुरातात्विक खोज हुई, जिससे प्राचीन भारत और ग्रीस के सभ्यतागत रिश्ते और भी ज़्यादा मज़बूत हुए। इस बेहद महत्वपूर्ण खोज में वडनगर में खुदाई के दौरान इंडो-ग्रीक राजा अपोलोदातुस के ज़माने की चीजें (कलाकृतियां) मिलीं।[5] [6] [7]
भारत और ग्रीस ने एक और अहम सभ्यतागत मुद्दे पर आपसी सहमति बनाई है — ब्रिटेन से अपनी लूटी हुई धरोहरों को वापस पाने की कोशिश। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत ने एक ऐसी वैश्विक पहल की अगुवाई की है जिसके अंतर्गत उन देशों को समर्थन दिया जा सके, जिनकी सांस्कृतिक धरोहरें औपनिवेशिक दौर में विदेशी शासन द्वारा हथिया ली गयी थीं। यानी भारत एक ऐसी वैश्विक मुहिम का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो अंततः विश्व के ऐसे देशों को उनकी खोई हुई सांस्कृतिक धरोहरें वापस दिला सके। माना जा रहा है कि इस कदम से ग्रीस को अपनी पार्थेनॉन मूर्तियां या एल्जिन मार्बल्स को वापस लाने में भी मदद मिल सकती हैं, जो इस वक्त ब्रिटिश म्यूज़ियम के कलेक्शन का हिस्सा हैं।[8]
प्रधानमंत्री मोदी की साइप्रस और क्रोएशिया की हालिया यात्राएं भी भारत की सभ्यतागत और सांस्कृतिक सोच से जुड़ी हुई हैं। भले ही ज्यादातर विश्लेषण इन दौरों को भू-राजनीतिक और रणनीतिक नज़रिए से देखते हैं, लेकिन सभ्यतागत पहलू भी इस पूरी तस्वीर का एक अहम हिस्सा है। हाल ही में ऑर्गनाइज़र में छपा एक लेख[9] भारत और साइप्रस के बीच के सभ्यतागत रिश्तों पर रोशनी डालता है। इसमें लीला एरुलकर की दिलचस्प कहानी बताई गई है, जो कभी साइप्रस की फर्स्ट लेडी रहीं और अहमदाबाद (जिसे पहले कर्णावती कहा जाता था) में पैदा हुई थीं। लीला एरुलकर एक भारतीय यहूदी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उनके पिता डॉ. अब्राहम एरुलकर 1946 में लंदन में महात्मा गांधी के निजी डॉक्टर थे।
प्रधानमंत्री मोदी की हालिया साइप्रस यात्रा के सीधे तार भारत के उस संघर्ष से जुड़े हैं, जो उसने अपने सभ्यतागत और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा हेतु छेड़ा है। तुर्की का पाकिस्तान को खुलकर समर्थन देना दरअसल भारत के ख़िलाफ़ सक्रिय पाकिस्तानी जिहादी मशीनरी को भी बिना शर्त समर्थन देने के बराबर ही है। ऐसे में, साइप्रस की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने पर भारत का दोबारा ज़ोर देना, और आतंकवाद के ख़िलाफ़ भारत की लड़ाई में साइप्रस का उसके साथ एकजुटता दिखाना[10] सिर्फ एक रणनीतिक समझौता नहीं है। बल्कि यह तो एक सभ्यतागत संवाद है, जिसका मकसद दोनों सभ्यताओं के बुनियादी मूल्यों को हिंसक और कट्टरपंथी ताकतों के हमलों से बचाना है।
आज के समय में मीडिया का बोलबाला है। जो मीडिया पर दिखाई देता है, उसके बूते पर पल भर में धारणायें बनती और बिगड़ती हैं। इसलिए ऐसे समय में संकेतों का भी अपना ही महत्व है। आपसी समझ और सम्मान की परंपरा से जुड़े छोटे-छोटे व्यक्तिगत इशारे भी एक मज़बूत संदेश बन जाते हैं, जो सभ्यताओं के आपसी संवाद और सांस्कृतिक मेलजोल को दर्शाते हैं। इसका एक शानदार उदाहरण उस वक्त देखने को मिला, जब निकोसिया के केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी के पहुंचने पर एक साइप्रस के सांसद ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए।[11] यह भाव-प्रदर्शन दोनों देशों के बीच के गहरे सभ्यतागत सम्मान का प्रतीक बन गया।
भारत के प्रधानमंत्री की ऐतिहासिक क्रोएशिया यात्रा भी सभ्यतागत दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई। भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर अकादमिक शोध के क्षेत्र में क्रोएशिया मशहूर है। दुनिया की पहली प्रिंटेड संस्कृत व्याकरण की किताब क्रोएशिया के विद्वान इवान फिलिप वेज़्दिन ने प्रकाशित की थी।[12] क्रोएशिया ने भारत के सभ्यतागत लक्ष्यों का भी बड़े पैमाने पर समर्थन किया है — वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन करता है। इसके अलावा, क्रोएशिया ने भारत के आंतरिक मुद्दों -जैसे जम्मू-कश्मीर, पर हस्तक्षेप न करने की नीति भी अपनाई है।
क्रोएशिया की राजधानी ज़ाग्रेब में गायत्री मंत्र के उच्चारण के साथ प्रधानमंत्री मोदी का जो ज़ोरदार स्वागत हुआ,[13] वह पूरी दुनिया को सभ्यतागत एकजुटता का एक मज़बूत संदेश देने वाला क्षण था। आज भारत की सभ्यतागत सोच न सिर्फ उसकी विदेश नीति का सक्रिय हिस्सा बनती जा रही है, बल्कि दुनिया के कई देश भारत को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उसके सभ्यतागत मूल्यों से खुद को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं — भले ही कई बार ये कोशिशें केवल दिखावे के स्तर पर ही क्यों न हों।
एक्ट ईस्ट पॉलिसी: एक सभ्यतागत दृष्टिकोण
भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी 2014 से उसकी रणनीति का एक अहम हिस्सा रही है। इस नीति के ज़रिए भारत ने दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से अपने रिश्ते मज़बूत किए हैं। इसका मकसद प्राचीन सभ्यतागत संबंधों को फिर से जीवित करना है, ताकि साझा सांस्कृतिक विरासत के आधार पर विकास और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा दिया जा सके।
हिंदुओं का धार्मिक ग्रंथ रामायण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया की सभ्यताओं के बीच एक तरह का पुल बनकर उभरा है। रामायण के स्थानीय रूपांतरण — जैसे कम्बोडिया में रामकेर, म्यांमार में यामा ज़टडॉ, मलेशिया में हिकायत सेरी राम और थाईलैंड में रामकियन — इस बात का प्रमाण हैं कि यह पवित्र ग्रंथ वहां की संस्कृति में कितनी गहराई से रच-बस गया है। आज भी थाईलैंड के राजा को “राम” कहा जाता है और उन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है। वायंग सरीखे पारंपरिक कठपुतली थिएटर के माध्यम से आज भी रामायण और महाभारत की कहानियां जीवंत रूप में पूरे क्षेत्र में दिखाई जाती हैं।[14] अप्रैल में अपनी थाईलैंड यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने वहां की रामकियन (स्थानीय रामायण) का एक मंचन देखा। यह प्रस्तुति बेहद अनोखी थी क्योंकि इसमें भारत और थाईलैंड की कलाओं और संस्कृतियों का सुंदर संगम दिखा — थाईलैंड के अनूठे खोन नृत्य और भारत के भरतनाट्यम का बेहतरीन मिश्रण।[15]
दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत प्रधानमंत्री मोदी की थाईलैण्ड यात्रा का केंद्रबिंदु बन कर उभरी। इस दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने थाईलैंड के ऐतिहासिक वाट फो मंदिर में अपनी थाई समकक्ष पैटोंगटार्न शिनावात्रा के साथ दर्शन किए।[16] यह मंदिर अपनी अनोखी वास्तुकला और “Reclining Buddha” की विशाल प्रतिमा के लिए मशहूर है। प्राचीन सभ्यतागत संबंधों को सम्मान देने, और उन्हें उजागर करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने लेटे हुए बुद्ध के मंदिर (Reclining Buddha Shrine ) में अशोक स्तंभ के शेरमुख (लायन कैपिटल) की एक प्रतिकृति भी भेंट की।
इस तरह, हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म की अनेक परंपराओं से जुड़ी साझा सभ्यतागत विरासत प्रधानमंत्री मोदी की थाईलैंड यात्रा का केंद्रबिंदु बनी। साझा घोषणा में भी “भारत और थाईलैंड के बीच के गहरे सभ्यतागत, सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई रिश्तों और दोनों देशों के बीच 78 सालों से चले आ रहे राजनयिक संबंधों” को मान्यता दी गई।[17]
पिछले कुछ वर्षों में दक्षिण-पूर्व एशिया भारत की वैश्विक कूटनीति में एक बेहद प्राथमिकता वाला क्षेत्र बन गया है। 2024 में प्रधानमंत्री मोदी ने सिंगापुर और ब्रुनेई की यात्राएं कीं, वहीं मलेशिया और वियतनाम के प्रधानमंत्रियों ने भारत का दौरा किया। भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का भू-राजनीतिक मकसद इंडो-पैसिफिक रणनीति को मज़बूत करना है, जिसका उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक खुली, समावेशी और नियम-आधारित व्यवस्था कायम करना है।[18] लेकिन इस नीति का एक और पहलू भी है, जो भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे सभ्यतागत रिश्तों पर टिका है। ये रिश्ते एक ऐसी ताकतवर सभ्यतागत कथा गढ़ने की क्षमता रखते हैं जो उपनिवेशवादी सोच पर आधारित यूरो-केंद्रित पश्चिमी दृष्टिकोण को चुनौती दे सके।
सभ्यतागत दृष्टिकोण के आधार पर भारत वैश्विक दक्षिण के साथ साझेदारी बढ़ाता हुआ
पुरानी वैश्विक व्यवस्था तेज़ी से बिखर रही है। भले ही नई व्यवस्था के पूरी तरह से बनने में अभी काफ़ी समय हो, लेकिन बदलाव की बुनियाद रखी जा चुकी है। इस बदलाव के केंद्र में है वैश्विक दक्षिण या ग्लोबल साउथ की एकजुटता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वैश्विक दक्षिण की यह साझेदारी साझा सभ्यतागत और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर खड़ी है। यह उभरती एकता भविष्य की विश्व व्यवस्था को नया आकार देने में अहम भूमिका निभाने वाली है — जहां यूरो-केंद्रित वर्चस्व की जगह एक समावेशी और उपनिवेश-मुक्त सोच पर आधारित व्यवस्था कायम होगी, जो वैश्विक दक्षिण की बौद्धिक और सांस्कृतिक परंपराओं से प्रेरणा लेगी।
पिछले एक दशक के भीतर भारत की विदेश नीति में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि उसने वैश्विक दक्षिण को एक साझा आवाज़ देने में सक्रिय भूमिका निभाई है। जनवरी 2023 में भारत ने वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट की मेज़बानी की — यह एक ऐतिहासिक पहल थी, जो उन देशों को एक साझा मंच पर लायी, जिनकी विकास संबंधी चिंताएं और सांस्कृतिक रिश्ते एक समान हैं। अपनी भूमिका को और मज़बूत करते हुए भारत ने 2023 में अपनी G20 अध्यक्षता का इस्तेमाल वैश्विक दक्षिण की ज़रूरतों को प्रमुखता देने के लिए किया। इसका सबसे बड़ा नतीजा यह रहा कि अफ़्रीकन यूनियन को G20 का स्थायी सदस्य बनाया गया। यह प्रस्ताव सबसे पहले भारत ने रखा था। अतः: अफ़्रीकन यूनियन को G20 का स्थाई सदस्य बनाया जाना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक सफलता रही। यह निर्णय वैश्विक राजनीति में भी एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ।[19]
नेहरूवादी सोच ने दशकों तक भारत की सांस्कृतिक पहचान पर यूरो-केंद्रित दृष्टिकोण की छाया डाल दी थी। लेकिन पिछले एक दशक में भारत की वैश्विक दृष्टि में उसके प्राचीन सभ्यतागत मूल्यों की झलक साफ दिखाई देने लगी है। भारत अब अपनी भू-राजनीतिक नीतियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ रहा है, ताकि दुनिया में एक सच्ची और प्रभावशाली पहचान बना सके। इसी कारण जब वह वैश्विक दक्षिण से संवाद करता है, तो भारत दोनों की साझा सभ्यतागत परंपराओं और अनुभवों के विशाल खज़ाने से भरपूर प्रेरणा लेता है:
- उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के समान अनुभव।
- आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं में समानताएं (ईसाई धर्म के आने से पहले अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका की विविध धार्मिक परंपराएं हिंदू धर्म के काफी करीब थीं)।
- व्यक्ति केंद्रित सोच की जगह सामूहिक कल्याण को प्राथमिकता देने वाला मूल्य-तंत्र।
- मौखिक परंपराओं का समृद्ध इतिहास।
- और ग़ैर पश्चिमी दृष्टिकोण की परंपरा में समृद्ध ज्ञान, कला, और सांस्कृतिक परंपराओं का विशाल और बहुमूल्य भंडार।
जैसे जैसे भारत वैश्विक दक्षिण को जलवायु परिवर्तन, आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन, व्यापार, संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार, ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद और उग्रवाद, एवं विश्व शांति और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर एकजुट कर रहा है, वैसे-वैसे यह याद रखना भी बेहद ज़रूरी है कि इन सभी चुनौतियों का समाधान तभी संभव है जब हम अपनी साझा सभ्यतागत विरासत और मूल्यों का सही तरह से उपयोग करें। यही सभ्यतागत दृष्टिकोण इन मुद्दों पर ठोस और टिकाऊ समाधान की कुंजी है।
वैश्विक दक्षिण एक ऐसा समूह है, जो अब भी उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की गहरी छाप और उसके असर से जूझ रहा है। ऐसे में उसकी सभ्यतागत दृष्टि इस आकांक्षा से आकार ले रही है कि एक ऐसी विश्व-व्यवस्था बनाई जाए जो उपनिवेश-मुक्त मूल्यों पर आधारित हो, और जहां न्याय और समानता हो। इन देशों में भारत एक ऐसा अनूठा उदाहरण है, जहां विदेशी शासन के बावजूद देशी परंपराएं सिर्फ जीवित ही नहीं रहीं, बल्कि और अधिक समृद्ध होती चली गईं। भारत की यह सांस्कृतिक निरंतरता — खासकर हिंदू सभ्यता की विरासत का पुनर्जागरण — उसे एक खास ताकत देती है। इसी वजह से भारत साझा सभ्यतागत दृष्टिकोण के ज़रिए वैश्विक दक्षिण की एकता को मज़बूत करने की दिशा में अग्रसर हो सकता है।
भारत की सभ्यतागत आत्मा गढ़ रही उसकी आंतरिक पहचान
भारत अपनी सभ्यतागत पहचान की रोशनी में खुद को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है, और इसका असर उसकी अपनी छवि पर भी दिख रहा है। यह बदलाव ‘भारत’ के उस मूल भावना की ओर लौटने का संकेत है, जो उसकी सांस्कृतिक जड़ों और विरासत से गहराई से जुड़ी है। जनवरी 2024 में अयोध्या में श्रीराम मंदिर का भव्य उद्घाटन केवल भगवान राम के जन्मस्थान का पुनर्स्थापन नहीं था, बल्कि यह हमारी सभ्यता के पुनर्जागरण का शक्तिशाली प्रतीक बन कर उभरा। यह आयोजन धर्म की अधर्म पर विजय की गूंज था, जिसने दशकों से चलाए जा रहे हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी कथानकों की पोल खोली, और नव-जागृति की ओर बढ़ती हुई भारतीय सभ्यता की आत्मा का एक नये सिरे से आह्वान किया।
पिछले एक दशक में कुछ ऐसे घटनाक्रम देखने को मिले हैं जिन्होंने भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की रोशनी में एक नये सिरे से उसकी छवि गढ़ी है:
- अयोध्या में श्रीराम मंदिर का उद्घाटन।
- मंदिर पर्यटन का तेजी से बढ़ना।[20]
- संभल की हिंदू विरासत का पुनर्जागरण।[21]
- 2025 के महाकुंभ में दुनियाभर की बढ़ती दिलचस्पी।
- प्राचीन मंदिरों का बड़े पैमाने पर जीर्णोद्धार।
- और भारत द्वारा अपनी सभ्यतागत विरासत के ज़रिए सॉफ्ट पावर को बढ़ावा देना।
इन सभी ने मिलकर भारत की छवि को देश के भीतर और बाहर, दोनों जगह नए सिरे से गढ़ा है। आज भारतीयों में अपनी सभ्यता और संस्कृति को लेकर एक नये प्रकार के गर्व की अनुभूति है, और यही गर्व धीरे-धीरे दुनिया में भारत की पहचान को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में स्थापित कर रहा है, जो सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और आध्यात्मिक तौर पर परिपक्व हो।
भारत की अपनी छवि में आया यह बदलाव अब शासन व्यवस्था को भी प्रभावित कर रहा है। इसकी एक सशक्त मिसाल मई 2023 में नए संसद भवन के उद्घाटन के समय देखने को मिली, जब अध्यक्ष की कुर्सी के पास ऐतिहासिक सेंगोल को स्थापित किया गया। सेंगोल यानी सोने का राजदंड—न्यायपूर्ण और धर्मसम्मत शासन का पारंपरिक प्रतीक है, जिसका इस्तेमाल कभी चोला राजाओं द्वारा निष्पक्ष राजकाज के संकेत के रूप में किया जाता था। आज़ादी के समय यह सेंगोल भारत के पहले प्रधानमंत्री को सौंपा गया था। और अब, करीब सत्तर साल बाद भारतीय संसद में इसकी स्थापना एक गहरे प्रतीकात्मक अर्थ को दर्शाती है। यह स्थापना सांकेतिक तौर पर शक्ति के उस हस्तांतरण को दर्शाती है, जिसके माध्यम से भारत औपनिवेशिक ढांचे से बहार निकल अपने सभ्यतागत आदर्शों और धर्म आधारित मूल्यों पर टिके शासन की ओर कदम बढ़ा रहा है।[22] [23]
2023 में लागू हुई भारतीय न्याय संहिता भारत की न्याय व्यवस्था को उपनिवेशी सोच से मुक्त कराने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस नए कानून ने अंग्रेज़ों के ज़माने के आपराधिक कानूनों को हटाकर हमारी अपनी सोच पर आधारित न्याय व्यवस्था की नींव रखी है। ब्रिटिश शासन ने जानबूझकर भारत पर एक ऐसा कानून थोप दिया था जो पश्चिमी मूल्यों पर आधारित था, और जिसने भारत की पारंपरिक न्याय पद्धति को पीछे धकेल दिया था। इसके विपरीत, भारतीय न्याय संहिता दंड (सिर्फ सज़ा) के बजाय न्याय पर ज़ोर देती है। यह हमारी सभ्यतागत परंपराओं की ओर लौटने का संकेत है, जहां कानून का मकसद केवल सत्ता चलाना नहीं बल्कि धर्म (सच्चाई और न्याय) की रक्षा करना होता था।[24]
यह नया दृष्टिकोण हाल के वर्षों में शासन और नीतियों को प्रभावित करने वाली भारत की व्यापक सभ्यतागत पुनर्जागरण की लहर का हिस्सा है:
- भारतीय सशस्त्र सेनाओं में अहम सुधार हुए हैं, जहां पुरानी औपनिवेशिक परंपराओं को त्यागकर स्वदेशी परंपराओं को अपनाया जा रहा है।[25]
•राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मकसद भी शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाना है, जिसमें भारतीय ज्ञान परंपराओं और दृष्टिकोणों को शामिल किया जा रहा है।
• सार्वजनिक स्थानों की सभ्यतागत पहचान को लौटाने की एक जागरूक कोशिश की जा रही है—कई शहरों और स्थानों के नाम बदले गए हैं, ताकि वे उपनिवेशी धरोहर की जगह भारतीय सांस्कृतिक विरासत को दर्शाएं।
• काशी-तमिल संगमम जैसे सांस्कृतिक प्रयासों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों, खासकर उत्तर और दक्षिण के बीच के गहरे सभ्यतागत एकत्व को और मज़बूत किया है।
ये तमाम बदलाव मिलकर भारत की शासन नीति में एक सार्थक सभ्यतागत परिवर्तन का संकेत देते हैं। एक ऐसा समय था जब भारतीय शासन तंत्र की प्रकृति पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के मूल्यों की नक़ल पर आधारित थी। लेकिन अब यही शासन व्यवस्था एक नये सिरे से अपनी सभ्यतागत विरासत को फिर से अपनाने की ओर कदम बढ़ा रही है।
समापन
हालांकि आज भारत की अपनी छवि और वैश्विक पहचान पर उसके सभ्यतागत और सांस्कृतिक विमर्श का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, लेकिन भारतीय समाज में औपनिवेशिक विमर्श की जो गहरी पैठ है, वह अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है।
जहाँ एक ओर समाज में धर्मिक चेतना का विस्तार हुआ है और भारतीय अब अपनी सभ्यतागत विरासत को एक नए प्रकार के गर्व और आत्मसम्मान के साथ देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह बदलाव समाज के हर क्षेत्र में पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया है। उदाहरण के लिए, कॉरपोरेट जगत लगातार पश्चिमी रंग में ढलता जा रहा है। इसी तरह, अगर हम उपभोक्ता संस्कृति और ब्रांड की पहचान की बात करें तो अपनी रचना, क्रियांवन और मार्केटिंग रणनीति में भारत के गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेने वाली ब्रांड्स मुश्किल से इक्का दुक्का होंगी। भारत की तथाकथित “एलीट” उपभोक्ता संस्कृति का एक बड़ा हिस्सा आज भी पश्चिमी रुचियों और संवेदनाओं को केंद्र में रखकर बनाया और पेश किया जा रहा है।
इसलिए भारत के इस सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को पूरी तरह से साकार करने के लिए ज़रूरी है कि हर क्षेत्र के भारतीय अपनी सभ्यता और संस्कृति के अनमोल ख़ज़ाने से प्रेरणा लें। वे ऐसी सच्ची कहानियाँ गढ़ें, और साझा करें जो वैश्विक मंच पर भारत की असली गरिमा और गौरव को उजागर करें।
संदर्भ सूची
[1] Decolonizing India: Shaping Its Own Grand Narrative; https://stophindudvesha.org/decolonizing-indias-mindset-why-india-needs-to-create-its-own-grand-narrative/
[2] Ancient India and Ancient Greece: An exploration of the historical connections – Diplomatist; https://diplomatist.com/2022/11/03/ancient-india-and-ancient-greece-an-exploration-of-the-historical-connections/
[3] Connections between ancient India and ancient Mesopotamia; https://timesofindia.indiatimes.com/blogs/desires-of-a-modern-indian/connections-between-ancient-india-and-ancient-mesopotamia/
[4] EAM Jaishankar, Greek foreign minister discuss deepening India-Greece ties; https://ddnews.gov.in/en/eam-jaishankar-holds-talks-with-greek-foreign-minister-discuss-ways-to-advance-multifaceted-india-greece-ties/
[5] New Horizons: Exploring the Potential for India-Greece Bilateral Ties – South Asian Voices; https://southasianvoices.org/https-southasianvoices-org-geo-f-oth-r-india-greek-bilateral-ties-potential-05-15-2024/
[6] Prime Minister Kyriakos Mitsotakis’ statement following his meeting with the Prime Minister of India Narendra Modi | Prime Minister of the Hellenic Republic; https://www.primeminister.gr/en/2023/08/25/32405
[7] India & Greece have a special connection and a relationship spanning centuries: PM Modi; https://www.narendramodi.in/text-of-prime-minisrer-narendra-modis-address-to-indian-community-in-athens-greece-573276
[8] India to help Greece reclaim historical artefacts from UK, reports British media – India News News; https://www.wionews.com/india-news/india-to-help-greece-reclaim-historical-artefacts-from-uk-reports-british-media-592664
[9] The untold Bharat-Cyprus connection; https://organiser.org/2025/06/16/297368/bharat/from-gandhis-physician-to-the-mediterranean-power-play-the-untold-bharat-cyprus-connection/
[10] PM meets the President of the Republic of Cyprus | Prime Minister of India; https://www.pmindia.gov.in/en/news_updates/pm-meets-the-president-of-the-republic-of-cyprus/
[11] Cyprus lawmaker touches PM Modi’s feet during welcome ceremony – The Economic Times; https://economictimes.indiatimes.com/news/india/cyprus-lawmaker-touches-pm-modis-feet-during-welcome-ceremony/articleshow/121885720.cms?from=mdr
[12] What does PM Modi’s visit to Croatia mean for India?; https://organiser.org/2025/06/17/297495/bharat/bridging-centuries-and-continents-pm-modis-upcoming-visit-to-croatia-celebrates-shared-civilisational-roots/
[13] Watch: PM Narendra Modi Welcomed With Gayatri Mantra in Croatia’s Capital, Zagreb; https://www.ndtv.com/world-news/watch-pm-narendra-modi-welcomed-with-gayatri-mantra-in-croatias-capital-zagreb-8701646
[14] ASEAN – India: Cultural and Historical Linkages – India Foundation; https://indiafoundation.in/articles-and-commentaries/asean-india-cultural-and-historical-linkages/
[15] PM Modi witnesses Thai adaptation of Ramayana, calls it a “beautiful confluence of cultures”; https://ddnews.gov.in/en/pm-modi-witnesses-thai-adaptation-of-ramayana-calls-it-a-beautiful-confluence-of-cultures/
[16] PM Modi visits Thailand’s Wat Pho temple of Reclining Buddha; https://www.deccanherald.com/india/pm-modi-visits-thailands-wat-pho-temple-of-reclining-buddha-3478293
[17] Press Release: Press Information Bureau; https://www.pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=2118985
[18] Modi 3.0 Is Leaving Nothing To Chance With Southeast Asia; https://www.orfonline.org/research/modi-3-0-is-leaving-nothing-to-chance-with-southeast-asia
[19] The UN’s Future in a Multipolar World: Change or Perish; https://stophindudvesha.org/the-uns-future-in-a-multipolar-world-change-or-perish/
[20] “Temples spark India’s cultural reset”; https://stophindudvesha.org/beyond-mausoleums-temples-tourism-drives-indias-cultural-reset/
[21] “Reclaiming India’s Heritage: Sambhal’s Key Discoveries; https://stophindudvesha.org/reclaiming-indias-hindu-heritage-sambhal-discoveries-leading-the-way/
[22] Historic ‘Sengol’ installed in new Parliament building by PM Modi | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/historic-sengol-installed-in-new-parliament-building-by-pm-modi-101685240768840.html
[23] Historic ‘Sengol’ installed in new Parliament building by PM Modi | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/historic-sengol-installed-in-new-parliament-building-by-pm-modi-101685240768840.html
[24] Unfinished Agenda of 1947: Bharat finally decolonises its criminal laws; https://organiser.org/2025/03/02/280354/bharat/unfinished-agenda-of-1947-bharat-finally-decolonises-its-criminal-laws/
[25] Bharatiya Military gets rid of colonial-era systems and pratices; https://hindupost.in/defence/bharatiya-military-gets-rid-of-colonial-era-systems-and-practices/
Donate to HINDUDVESHA
Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.
SUPPORT US