USCIRF का हिंदुत्व विमर्श: नीति के बहाने हिंदू पहचान का दमन
सारांश
यह लेख इस बात की जांच करता है कि USCIRF की हाल की रिपोर्ट किस तरह पश्चिमी अकादमिक जगत, मीडिया और नीति-निर्माण से जुड़े विमर्श में उभर रहे एक बड़े पैटर्न को सामने लाती है, जहाँ “हिंदुत्व” को एक सुरक्षा खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस तरह की रूपरेखा हिंदू पहचान और उससे जुड़े मुद्दों को सार्वजनिक रूप से रखने के वैध प्रयासों को भी गलत ठहराने लगती है। साथ ही, अकादमिक जगत और नागरिक समाज के कुछ हिस्सों द्वारा ऐसे नैरेटिव को बढ़ावा दिए जाने से पश्चिमी देशों में बढ़ रही हिंदू-विरोधी सोच और भारत-विरोधी माहौल से ध्यान हट जाता है। रटगर्स रिपोर्ट, लीसेस्टर की हिंसा पर SOAS की जांच, और ऑनलाइन नफरत के रुझानों पर NCRI के आंकड़ों जैसे उदाहरण यह दिखाते हैं कि ऐसी पक्षपातपूर्ण प्रस्तुति किस तरह जनधारणा और नीतिगत फैसलों को प्रभावित करती है। नैरेटिव, संस्थागत प्रभाव और ज़मीनी घटनाओं का यह मेल एक ऐसा माहौल बना देता है, जिसमें हिंदू समुदायों की चिंताएँ पीछे छूट जाती हैं, और यही स्थिति अधिक संतुलित, तथ्यों पर आधारित और निष्पक्ष चर्चा की आवश्यकता को स्पष्ट करती है।
पश्चिमी विमर्श में हिंदू मुद्दों को लेकर एक स्पष्ट पैटर्न उभर रहा है: पहले किसी मुद्दे की वैधता को खारिज किया जाता है और फिर संवाद का आभास पैदा किया जाता है। हाल के वर्षों में एक विशेष प्रकार का हिंदू-विरोधी विमर्श प्रभावी हुआ है, जिसमें “हिंदुत्व” नामक एक गढ़े गए वैचारिक ढाँचे का बार-बार उपयोग कर पश्चिमी लोकतंत्रों में हिंदू मुद्दों की अभिव्यक्ति को संदेह के घेरे में लाया जाता है। वैध हिंदू सरोकारों को दबाने की यह प्रवृत्ति न केवल हिंदूद्वेष को परोक्ष रूप से बढ़ावा देती है, बल्कि पश्चिमी समाजों में रह रहे एक छोटे अल्पसंख्यक समुदाय की स्थिति को भी असुरक्षित बनाती है। परिणामस्वरूप उसी समुदाय को “शोषक” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वह भी “हिंदुत्व वर्चस्व”, “हिंदुत्व फासीवाद” और “भगवा आतंकवाद” जैसे व्यापक आरोपों के सहारे, जिनका ठोस तथ्यात्मक आधार नहीं होता।
U.S. Commission on International Religious Freedom की हालिया रिपोर्ट इसी स्थापित ढाँचे का अनुसरण करती प्रतीत होती है। यह भारत में अल्पसंख्यकों के दमन का एक विवादित नैरेटिव आगे बढ़ाती है, जो केवल विश्लेषण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पश्चिमी समाजों में बढ़ते हिंदूद्वेष से ध्यान हटाने और विदेशों में हिंदू पहचान तथा उससे जुड़े मुद्दों की अभिव्यक्ति पर अधिक निगरानी को उचित ठहराने का आधार भी बनता है।
रिपोर्ट का रुख मात्र वर्णनात्मक नहीं, बल्कि निर्देशात्मक भी दिखता है। इसमें Rashtriya Swayamsevak Sangh पर प्रतिबंध लगाने, उससे जुड़े व्यक्तियों या संस्थाओं की संपत्ति जब्त करने और अमेरिका में उनके प्रवेश पर रोक लगाने जैसी सिफ़ारिशें शामिल हैं, जो इसे सीधे नीति-निर्माण के क्षेत्र में हस्तक्षेपकारी बनाती हैं।
यह परिघटना एक व्यापक विमर्श से जुड़ी है, जो मीडिया, अकादमिक जगत और नागरिक समाज के कुछ हिस्सों में गहराई से स्थापित हो चुका है। इस नैरेटिव में “हिंदुत्व” की अवधारणा का उपयोग वैध हिंदू सरोकारों को खारिज करने के लिए किया जाता है, जिससे प्रवासी हिंदू समुदाय की वास्तविक समस्याएँ—जैसे मंदिरों पर हमले, हिंदू-विरोधी घृणा अपराध, जाति-आधारित प्रोफाइलिंग और अकादमिक पक्षपात—पृष्ठभूमि में चली जाती हैं।
यह विश्लेषण इसी बात को रेखांकित करता है कि यह नैरेटिव किस प्रकार एक्टिविस्ट नेटवर्क्स, अकादमिक संस्थानों के कुछ वर्गों, नागरिक समाज संगठनों और थिंक टैंकों के संयुक्त तंत्र के माध्यम से व्यवस्थित रूप से निर्मित और प्रसारित होता है, और कैसे यह ढाँचा पश्चिम में हिंदू मुद्दों की सार्वजनिक अभिव्यक्ति को सीमित और कलंकित करता है।
USCIRF रिपोर्ट: विश्लेषण या वैचारिक आरोप-पत्र?
U.S. Commission on International Religious Freedom लंबे समय से एक भारत-विरोधी एजेंडा चलाते आया है, जिसमें अल्पसंख्यकों के दमन और धार्मिक असहिष्णुता की एक भ्रामक तस्वीर पेश की जाती है। [1] इसके अलावा, USCIRF अक्सर भारत के विभिन्न राज्यों में लागू धर्मांतरण-विरोधी कानूनों पर निशाना साधता है और उन्हें धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध रचे गये एक व्यापक षड्यंत्र के रूप में पेश करता है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार USCIRF एक बड़े नेटवर्क से जुड़ा है, जिसमें मिशनरी एजेंडा से जुड़े दबाव समूह भी शामिल हैं। [2]
USCIRF ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में असामान्य रूप से अधिक आक्रामक और प्रत्यक्ष रुख अपनाते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सीधा आरोप लगाया है। भारत से संबंधित निष्कर्षों में न तो ठोस विश्लेषण दिखाई देता है और न ही किसी विश्वसनीय तथ्यात्मक आधार का संकेत मिलता है। समग्र रूप से यह भाग वस्तुनिष्ठ अध्ययन की अपेक्षा वैचारिक आरोप-पत्र अधिक प्रतीत होता है। इसमें बिना ठोस प्रमाण के यह दावा किया गया है कि 2025 के दौरान “कई राज्यों में हिंदू राष्ट्रवादी भीड़ों ने मुसलमानों और ईसाइयों को परेशान किया, उकसाया और उनके विरुद्ध हिंसा भड़काई, और यह सब ऐसे वातावरण में हुआ जहाँ किसी भी प्रकार के दंड का भय नहीं था।” [3]
रिपोर्ट में भारत में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने की कथित घटनाओं का चयनात्मक उल्लेख किया गया है, जबकि उनकी पृष्ठभूमि और संदर्भ को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया है। पूरे विवरण में हिंदू समुदाय को मुख्य दोषी के रूप में प्रस्तुत किया गया है और “हिंदू राष्ट्रवाद” को खुलकर दानवीकृत किया गया है। सबसे चिंताजनक पहलू तब सामने आता है, जब रिपोर्ट पहलगाम आतंकी हमले का उल्लेख करते हुए घटना के बाद मुसलमानों को कथित तौर पर निशाना बनाए जाने पर चिंता जताती है। यह प्रस्तुति केवल पक्षपातपूर्ण ही नहीं, बल्कि असंतुलित भी प्रतीत होती है, क्योंकि पहलगाम में धार्मिक पहचान के आधार पर हिंदू पर्यटकों की निर्मम हत्या की स्पष्ट और ठोस निंदा तक नहीं की गई, जबकि उसी घटना का उपयोग यह संकेत देने के लिए किया गया है कि उसके बाद भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया। [4]
रिपोर्ट में भारत को “विशेष चिंता वाले देश” (Country of Particular Concern) के रूप में नामित करने की सिफारिश की गई है और साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लक्षित प्रतिबंध लगाने की मांग भी की गई है, जिससे उसके अमेरिका में प्रवेश पर प्रभावी रूप से रोक लग सकती है। इसके अतिरिक्त, रिपोर्ट यूनाइटेड स्टेट्स कांग्रेस से Transnational Repression Reporting Act of 2024 को दोबारा पेश कर पारित करने का आग्रह करती है। इस प्रस्तावित कानून के तहत अमेरिकी सरकार के लिए यह अनिवार्य किया जाना है कि वह हर वर्ष उन कथित घटनाओं पर रिपोर्ट प्रस्तुत करे, जिनमें भारत सरकार पर अमेरिका में धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए सीमा-पार दमन, अर्थात transnational repression, के आरोप लगाए जाते हैं। [5]
USCIRF द्वारा ट्रांसनेशनल रिप्रेशन से जुड़े विधायी प्रयासों के समर्थन को अमेरिकी हिंदू समुदाय को परोक्ष रूप से लक्षित करने का प्रयास जैसा लगता है। समुदाय के कई सदस्यों और अमेरिका में सक्रिय विभिन्न हिंदू संगठनों ने ऐसे प्रस्तावों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है, जिनमें California Senate Bill SB509 भी शामिल है। उनका कहना है कि “ट्रांसनेशनल रिप्रेशन” से निपटने के नाम पर इन कानूनों का दुरुपयोग कर समुदाय के लोगों को विदेशी सरकारों के प्रतिनिधि के रूप में पेश किया जा सकता है, जिससे उनकी सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। Coalition of Hindus of North America (CoHNA) और Hindu American Foundation (HAF) जैसे संगठनों ने इस बिल का खुलकर विरोध किया है। HAF के वकील समीर कालरा ने चेतावनी दी है कि इस तरह के कानून वैध असहमति को दबाने के उपकरण बन सकते हैं, खासकर तब जब उग्रवाद या आतंकवाद जैसे मुद्दों पर चिंता जताने वाले व्यक्तियों को “विदेशी एजेंट” के रूप में चिह्नित कर दिया जाए। [6]
USCIRF रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर किया गया हमला पश्चिम में हिंदू एडवोकेसी पर एक परोक्ष आघात के रूप में देखा जा सकता है। RSS भारत में सक्रिय एक संगठन है, जिसने हिंदू संस्कृति और पहचान के संरक्षण के साथ-साथ हिंदू सरोकारों की सार्वजनिक अभिव्यक्ति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यद्यपि RSS सीधे तौर पर पश्चिमी देशों में सक्रिय नहीं है, फिर भी अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में कई स्वतंत्र हिंदू संगठन समान सांस्कृतिक और सभ्यतागत मूल्यों से प्रेरित होकर प्रवासी हिंदू समुदाय की पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए कार्य करते हैं। इस संदर्भ में वाम-उदारवादी और इस्लामिस्ट झुकाव वाले कुछ तंत्रों द्वारा RSS को लगातार निशाना बनाया जाना पश्चिम में हिंदू पक्षधरता को कमजोर करने के एक व्यापक और समन्वित प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।
अमेरिका में RSS पर प्रतिबंध लगाने का तर्क प्रस्तुत कर USCIRF रिपोर्ट प्रभावी रूप से पश्चिमी देशों में सक्रिय हिंदू संगठनों के अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित करने का वैचारिक आधार तैयार करती है। इस प्रक्रिया में इन संगठनों की गतिविधियों को “हिंदुत्व वर्चस्व” जैसे मनगढ़ंत नैरेटिव के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है।
चूँकि भारत हिंदुओं की सभ्यतागत मातृभूमि है, इसलिए पश्चिम में हिंदू प्रवासी समुदाय से जुड़े मुद्दे अक्सर भारत में व्यापक हिंदू समाज की वैध चिंताओं से भी जुड़े होते हैं। भारत में समय-समय पर कुछ नीतियों को लेकर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की आशंका व्यक्त की जाती रही है, और साथ ही हिंदू-विरोधी घृणा अपराध तथा अवैध धर्मांतरण से संबंधित चिंताएँ भी महत्वपूर्ण विषय बने रहे हैं। राष्ट्रवादी विमर्श के उभार के साथ समुदाय के कुछ हिस्सों में अपनी चिंताओं को बिना संकोच सार्वजनिक रूप से रखने का आत्मविश्वास बढ़ा है। किंतु इस परिवर्तन ने कुछ हित समूहों को असहज किया है, जिसके परिणामस्वरूप मीडिया, अकादमिक जगत और नागरिक समाज के कुछ वर्गों में “हिंदुत्व” को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति तेज हुई है।
USCIRF की रिपोर्ट भी इसी प्रवृत्ति का प्रतिबिंब प्रतीत होती है। ट्रांसनेशनल रिप्रेशन बिल जैसे कदमों के समर्थन के माध्यम से यह रिपोर्ट अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका में बसे हिंदू समुदाय को भी हिंदुत्व संबंधी विमर्श के दायरे में लाकर खड़ा कर देती है।
“हिंदुत्व खतरे” के नैरेटिव में अकादमिक जगत की भूमिका
पिछले एक दशक में पश्चिमी अकादमिक जगत के कुछ हिस्सों ने “हिंदुत्व” के उदय का अध्ययन और उसकी आलोचना में असामान्य रुचि दिखाई है। 2021 में आयोजित Dismantling Global Hindutva Conference इसका एक प्रमुख उदाहरण है। कई प्रतिष्ठित अमेरिकी विश्वविद्यालयों के समर्थन से आयोजित इस सम्मेलन में मुख्य रूप से चरम-वामपंथी वैचारिक पृष्ठभूमि से जुड़े वक्ताओं को शामिल किया गया, जिनमें हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी का लंबा रिकॉर्ड रखने वाले कुछ विद्वान, उग्रवादी आंदोलनों के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग और भारत के सभ्यतागत पुनरुत्थान के कट्टर आलोचक भी सम्मिलित थे। [7]
अक्टूबर 2025 में Rutgers University में “Hindutva in America: An Ethnonationalist Threat to Equality and Religious Pluralism” शीर्षक वाली एक रिपोर्ट पर पैनल चर्चा आयोजित की गई। अकादमिक विश्लेषण के रूप में प्रस्तुत इस रिपोर्ट में हिंदू-अमेरिकी संगठनों पर व्यापक आरोप लगाए गए। इसमें दावा किया गया कि ये संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं और जातिगत भेदभाव, इस्लामोफोबिया तथा अल्पसंख्यक-विरोधी राजनीति को बढ़ावा देते हैं। उल्लेखनीय है कि ये आरोप ठोस प्रमाणों के अभाव में लगाए गए और मुख्यतः वैचारिक अटकलों तथा “संबंध के आधार पर दोषारोपण” जैसी तार्किक रूप से कमजोर धारणा पर आधारित थे। [8] [9]
फरवरी 2026 में 2022 की लिसेस्टर हिंसा पर एक रिपोर्ट जारी की गई, जिसकी अगुआई School of Oriental and African Studies (SOAS) ने की, जो यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन से संबद्ध एक सार्वजनिक शोध संस्थान है। स्वयं को एक स्वतंत्र अकादमिक संस्था के रूप में प्रस्तुत करने के बावजूद, आलोचकों का मानना है कि SOAS भू-राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर अक्सर वाम-झुकाव वाला दृष्टिकोण अपनाता है। इस रिपोर्ट में अशांति के लिए मुख्य रूप से “हिंदुत्व” या “हिंदू राष्ट्रवाद” को ज़िम्मेदार ठहराया गया और यह दावा किया गया कि उस दौरान सोशल मीडिया पर फैली गलत सूचनाएँ “अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव—विशेषकर भारत से आने वाले” प्रभावों से प्रेरित थीं। साथ ही यह भी कहा गया कि ऑनलाइन विमर्श में घटनाओं को “हिंदुत्व” के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया, जिसमें हिंदुओं को “पाकिस्तानी” और “इस्लामिस्ट” गिरोहों का शिकार बताया गया। आलोचकों के अनुसार यह रिपोर्ट पश्चिम में हिंदू दृष्टिकोण के प्रति अकादमिक पक्षपात के एक व्यापक पैटर्न को दर्शाती है और अप्रत्यक्ष रूप से लिसेस्टर हिंसा को नरेंद्र मोदी सरकार तथा भारतीय जनता पार्टी से जुड़े तथाकथित हिंदू राष्ट्रवाद से जोड़ने का प्रयास करती है। [10]
दिलचस्प बात यह है कि रिपोर्ट “राजनीतिक इस्लामिस्ट्स” की भूमिका का संक्षेप में उल्लेख तो करती है, लेकिन हिंसा के लिए असंतुलित रूप से “हिंदू राष्ट्रवाद” या “हिंदुत्व” को ही जिम्मेदार ठहराती है। बिना ठोस प्रमाण के यह गंभीर आरोप भी लगाया गया है कि मोदी सरकार ने ब्रिटेन में सांप्रदायिक तनाव को परोक्ष रूप से भड़काया। रिपोर्ट में “हिंदुत्व” पर एक अलग खंड शामिल है, जिसमें इसे स्वभावतः ईसाई-विरोधी और मुस्लिम-विरोधी बताया गया है। साथ ही, लीसेस्टर अशांति के दौरान हिंदू संगठनों और राजनीतिक प्रतिनिधियों के बीच हुए संवाद को भी “मुसलमानों के खिलाफ समन्वित हिंदुत्व प्रयास” के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन बिंदुओं से रिपोर्ट का झुकाव स्पष्ट हो जाता है: हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद की एक खास अकादमिक व्याख्या के आधार पर ब्रिटेन में हिंदू समुदाय की सुरक्षा, नागरिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी चिंताओं को अवैध ठहराने की कोशिश की गई है।
ब्रिटेन में हिंदू संगठनों ने इस रिपोर्ट की कड़ी आलोचना की और इसकी फंडिंग, निष्पक्षता तथा योगदानकर्ताओं के वैचारिक झुकाव पर गंभीर सवाल उठाए। यह भी इंगित किया गया कि इस रिपोर्ट को मिली वित्तीय सहायता Open Society Foundations से जुड़ी बताई जाती है, जिसके बारे में उनका कहना है कि उसने पहले भी ऐसे रुख अपनाए हैं जिन्हें वे हिंदू हितों और भारत के प्रति आलोचनात्मक मानते हैं। [11]
लीसेस्टर हिंसा पर School of Oriental and African Studies की जांच के निष्कर्ष नवंबर 2022 में प्रकाशित Henry Jackson Society की रिपोर्ट से स्पष्ट रूप से भिन्न थे। हिंदू और मुस्लिम निवासियों के साक्षात्कार, वीडियो साक्ष्यों, पुलिस रिकॉर्ड और सोशल मीडिया विश्लेषण के आधार पर तैयार उस रिपोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह अशांति मूलतः स्थानीय सामुदायिक तनाव का परिणाम थी, जिसे बाद में संगठित हिंदुत्व गतिविधि के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। [12] उस रिपोर्ट ने यह भी दिखाया कि हिंदुत्व की भूमिका से जुड़े दावों को किस तरह बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। साथ ही, उसमें कुछ मीडिया नैरेटिव और कट्टर इस्लामिस्ट समूहों की भूमिका को भी रेखांकित किया गया, जिन्होंने “हिंदुत्व साज़िश” जैसी रूपरेखा को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। [13]
Dismantling Global Hindutva Conference से लेकर Rutgers University की रिपोर्ट और School of Oriental and African Studies की लीसेस्टर जांच तक एक स्पष्ट रुझान उभरता है। हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद को लेकर अस्पष्ट और वैचारिक रूप से प्रेरित सामान्यीकरण किए जाते हैं, नरेंद्र मोदी सरकार को अल्पसंख्यक-विरोधी बताया जाता है, और फिर भारत की घटनाओं तथा पश्चिम में हिंदू चिंताओं की सार्वजनिक अभिव्यक्ति के बीच कृत्रिम समानताएँ स्थापित की जाती हैं। इस तर्क को आगे बढ़ाया जाए तो पश्चिमी समाजों में कट्टर इस्लाम के बढ़ते प्रभाव की आलोचना या हिंदू-विरोधी घटनाओं पर चिंता जताना भी “हिंदुत्व” का विस्तार बताकर स्वतः अवैध ठहराया जा सकता है।
अकादमिक जगत, मीडिया और थिंक टैंकों द्वारा निर्मित व्यापक विमर्श में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। “हिंदुत्व” को प्रायः संकुचित और वैचारिक रूप से पक्षपाती व्याख्याओं के माध्यम से परिभाषित किया जाता है, जबकि हिंदू चिंताओं की सार्वजनिक अभिव्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। कई बार हिंदुत्व और इस्लामिस्ट उग्रवाद के बीच कृत्रिम समानताएँ स्थापित कर एक ऐसा नैरेटिव तैयार किया जाता है, जिसमें सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर आधारित एक सभ्यतागत दृष्टिकोण को स्वभावतः आक्रामक या हिंसक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
हिंदू-विरोधी घृणा का सामान्यीकरण
हिंदू दृष्टिकोणों के प्रति अकादमिक शत्रुता एक ऐसा माहौल बनाती है, जिसमें पश्चिम में बढ़ते हिंदूद्वेष को या तो पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है या कम करके आँका जाता है। जब हिंदू-विरोधी घृणा अपराध सामने आते हैं—यहाँ तक कि वे घटनाएँ भी, जिनमें कट्टर इस्लामिस्ट तत्वों की भूमिका बताई जाती है—तो उन्हें अक्सर हाशिये पर डाल दिया जाता है। इसके विपरीत, तथाकथित “हिंदू खतरे” के नैरेटिव को मीडिया और नागरिक समाज के कुछ हिस्सों में बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है। हिंदू-विरोधी घटनाओं पर यह चुप्पी और हिंदुत्व के कथित खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की प्रवृत्ति, दोनों मिलकर, एक ऐसे पूर्वाग्रह की ओर संकेत करती हैं जो धीरे-धीरे सामान्यीकृत होता जा रहा है।
मार्च 2026 में लंदन के कुछ इलाकों में हिंदुओं, सिखों और भारतीय स्वामित्व वाले व्यवसायों को निशाना बनाकर किए गए हिंसक हमलों की एक श्रृंखला ने समुदाय के भीतर गंभीर चिंता पैदा की। एक प्रतिष्ठान को कुछ ही दिनों के भीतर दो बार निशाना बनाया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 15–20 हमलावर पास की एक मस्जिद की दिशा से आए और परिसर में तोड़फोड़ की। 3 मार्च 2026 को Harrow में आयोजित होली समारोह को भी कथित रूप से मुस्लिम युवकों के एक समूह ने बाधित किया; बताया जाता है कि कुछ लोग समारोह के दौरान परिसर में घुस आए, गाली-गलौज की और वस्तुएँ फेंकीं, जिसके बाद स्थिति व्यापक हमले में बदल गई। [14]
ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमैन ने इस मुद्दे को यूके की संसद में उठाते हुए कहा कि होली की घटना पर चर्चा के बावजूद हिंसा नहीं रुकी और “होली हमले के मूल आरोपी अब भी फरार हैं।” उन्होंने मेट्रोपोलिटन पुलिस से जवाबदेही की भी मांग की और कहा कि 20 लोगों के समूह द्वारा समारोह बाधित किए जाने के बावजूद अब तक केवल एक गिरफ्तारी हुई है।[15]
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि School of Oriental and African Studies द्वारा लीसेस्टर हिंसा पर जारी रिपोर्ट, जिसमें “कट्टर और उग्र हिंदुत्व” को प्रमुख कारक के रूप में प्रस्तुत किया गया, उसे व्यापक मीडिया कवरेज मिला, जबकि हालिया होली समारोहों के दौरान सामने आई हिंदू-विरोधी घटनाओं को काफी हद तक कम करके दिखाया गया या पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि पश्चिम में हिंदू प्रवासी समुदाय के खिलाफ बढ़ती शत्रुता को अक्सर सामान्य “सामुदायिक तनाव” कहकर सीमित कर दिया जाता है, जहाँ घटनाओं के सांप्रदायिक पहलू को या तो कम करके आँका जाता है या पूरी तरह नकार दिया जाता है। जब हिंदू संगठन हिंदूद्वेष फैलाने में कट्टर इस्लामिस्ट तत्वों की भूमिका को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं, तो उन्हें तुरंत “इस्लामोफोबिक” करार दे दिया जाता है।
इस्लामोफोबिया के प्रति बढ़ी संवेदनशीलता और हिंदूद्वेष को स्वीकार करने में दिखाई देने वाली हिचकिचाहट ने पश्चिम में हिंदू प्रवासी समुदाय को एक जटिल स्थिति में ला खड़ा किया है, जहाँ कट्टर इस्लामिस्ट उग्रवाद की वैध आलोचना भी इस्लामोफोबिया के रूप में प्रस्तुत की जा सकती है। हिंदू समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा के लिए समान रूप से मजबूत ढाँचे के अभाव में, हिंदू-विरोधी घटनाएँ अक्सर बिना किसी ठोस कार्रवाई के ही रह जाती हैं।
बढ़ते हिंदूद्वेष का दंश झेलता हिंदू प्रवासी समुदाय
हाल के वर्षों में कई पश्चिमी देशों में हिंदू-विरोधी घृणा अपराधों से जुड़ी चिंताजनक घटनाएँ सामने आई हैं। फरवरी 2026 में San Jose State University के परिसर में एक सिख छात्र पर हमला किया गया, क्योंकि हमलावरों ने उसे हिंदू समझ लिया था। रिपोर्टों के अनुसार हमलावरों ने उसे ज़मीन पर गिराया, उसकी पगड़ी उतार दी और “हिंदू” शब्द का अपमानजनक गाली के रूप में प्रयोग किया। [16]
अप्रैल 2025 में रॉकलैंड, ओंटारियो (कनाडा) में 27 वर्षीय भारतीय नागरिक धर्मेश कथीरिया की उनके 83 वर्षीय पड़ोसी ने चाकू मारकर हत्या कर दी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार हमलावर पहले भी धर्मेश और उनकी पत्नी के खिलाफ भारत-विरोधी और नस्लवादी टिप्पणियाँ कर चुका था। इसी तरह, 2024 में अमेरिका में भारतीय मूल के छात्रों की अचानक बढ़ती मौतों ने भी गंभीर चिंता पैदा की। उस वर्ष कम से कम 11 भारतीय छात्रों की संदिग्ध या अस्पष्ट परिस्थितियों में मृत्यु हुई, जिनमें से सात मौतें केवल तीन सप्ताह—15 जनवरी से 5 फरवरी—के बीच दर्ज की गईं। हालांकि इन घटनाओं को सीधे तौर पर हिंदूद्वेष से जोड़ना कठिन है, लेकिन कई मामलों में स्पष्टता की कमी इन्हें चिंताजनक बनाती है और पश्चिमी समाजों में बढ़ती भारत-विरोधी तथा हिंदू-विरोधी मानसिकता के व्यापक संदर्भ में गहन जांच की आवश्यकता की ओर संकेत करती है। [17]
सोशल मीडिया पर भारतीय मूल के लोगों और हिंदुओं को निशाना बनाते नस्लवाद में वृद्धि, और अमेरिका, यूके और कनाडा जैसे पश्चिमी लोकतंत्रों में मंदिरों पर बढ़ते हमलों के बीच, हिंदू प्रवासी समुदाय खुद को एक अस्थिर और संवेदनशील स्थिति में पाता है। उससे अक्सर यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी सुरक्षा और पहचान से जुड़ी वैध चिंताओं को खुलकर व्यक्त करने के बजाय राजनीतिक शिष्टाचार के प्रचलित मानकों के अनुरूप व्यवहार करे। जब ठोस हिंदू-विरोधी हिंसा और घृणा की घटनाओं पर ध्यान देने के बजाय “हिंदुत्व” को नकारात्मक रूप में पेश करने और जाति-आधारित भेदभाव के अप्रमाणित आरोपों को बढ़ावा देने पर ज़ोर दिया जाता है, तो इससे यह संदेश जाता है कि समुदाय को लगातार डिफेंसिव मोड की तरफ़ धकेला जा रहा है।
वाम-उदारवादी और कट्टर इस्लामिस्ट तंत्र द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा हिंदुत्व नैरेटिव इसी चिर- परिचित पैटर्न को दर्शाता है, जहाँ कथित खतरों की एक लंबी सूची गिनाकर समुदाय के लगातार हाशिये पर धकेले जाने को ही उचित ठहराने की कोशिश की जाती है।
समापन टिप्पणी
“हिंदुत्व” की फ्रेमिंग के संदर्भ में अकादमिक विमर्श, नीतिगत सक्रियता, और मीडिया नैरेटिव का जो मिला-जुला रूप सामने आ रहा है, वह अब मात्र बौद्धिक बहस तक सीमित नहीं रहा। इसके ठोस और वास्तविक प्रभाव सामने आने लगे हैं, विशेषकर पश्चिमी समाजों में हिंदू पहचान को किस तरह देखा और समझा जा रहा है, इसके परिपेक्ष्य में। जब किसी सभ्यतागत ढाँचे को लगातार खतरे के रूप में पेश किया जाता है, तो इससे धीरे-धीरे उससे जुड़े समुदायों के प्रति संदेह, उपेक्षा और शत्रुता का माहौल तैयार होता है।
Network Contagion Research Institute की रिपोर्ट इस बदलाव को रेखांकित करती है और दिखाती है कि डिजिटल नैरेटिव किस तेज़ी से वास्तविक दुनिया में समुदायों को निशाना बनाने की घटनाओं में बदल सकते हैं। भारत-विरोधी ऑनलाइन विमर्श में वृद्धि, समन्वित नेटवर्कों के माध्यम से उसका प्रसार, और इन ऑनलाइन रुझानों का ऑफलाइन घटनाओं में बदलना, जैसे हिंदू मंदिरों की टार्गेटिंग या “Deport H-1B Scammers” [18] जैसे पोस्टरों के साथ विरोध प्रदर्शन, ये सब अलग-थलग घटनाएँ नहीं हैं। ये एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा हैं, जहाँ वैचारिक ढाँचे जनधारणा को आकार देते हैं और अंततः ज़मीनी हक़ीक़त को प्रभावित करते हैं।
यहाँ मुद्दा मात्र हिंदू-विरोधी विमर्श की भाषाई संरचनायों की बहस पर केंद्रित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक जीवन में हिंदू पहचान और हिंदू मुद्दों की एडवोकेसी की वैधता से जुड़ा है। यदि मौजूदा प्रवृत्ति जारी रहती है, जहाँ वैध चिंताओं को वैचारिक उग्रवाद बताकर खारिज किया जाता है और समुदाय की आवाज़ों को पहले से ही अवैध ठहरा दिया जाता है, तो इसका परिणाम पूरे प्रवासी समुदाय को भुगतना पड़ सकता है, जिसके चलते उनके लिए नागरिक दायरे का विमर्श पूर्णतया सिमट कर रह जायेगा।
इसलिए पश्चिम में हिंदूद्वेष से निपटने के लिए केवल अलग-अलग घटनाओं पर प्रतिक्रिया देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए उन नैरेटिवों की गंभीर समीक्षा आवश्यक है, जो हिंदू पहचान को परिभाषित करते हैं; अकादमिक और नीतिगत विमर्श में तथ्यों पर आधारित सख्ती की प्रतिबद्धता जरूरी है; और ऐसे संस्थागत सुरक्षा तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है, जो हिंदू समुदायों को बिना किसी कलंक या प्रतिशोध के डर के अपनी चिंताओं को व्यक्त करने का अवसर दें।
सन्दर्भ सूची
[1] USCIRF’s Anti-India Obsession; https://stophindudvesha.org/uscirfs-anti-india-obsession-freedom-crusade-or-a-political-smear/
[2] New Faces in the White House, Same Old Policy Towards India; https://stophindudvesha.org/new-faces-in-the-white-house-same-old-policy-toward-india/
[3] United States Commission on International Religious Freedom 2026 Annual Report https://www.uscirf.gov/sites/default/files/2026-03/USCIRF_2026_AR%20(2).pdf
[4] Ibid.
[5] Ibid.
[6] Indian-Americans in California alarmed as Senate advances transnational repression bill – India Today; https://www.indiatoday.in/world/us-news/story/hindus-indian-american-express-concern-california-bill-passed-senate-vote-transnational-repression-khalistani-2742496-2025-06-18
[7] Oxford to Academia: Inquiry or Anti-Hindu? https://stophindudvesha.org/from-oxford-to-academia-at-large-free-inquiry-or-scripted-discourse-against-hindus/
[8] Hit Job: Rutgers Fuels Anti-Hindu Hate with Dubious Report; https://stophindudvesha.org/hit-job-rutgers-fuels-anti-hindu-hate-with-dubious-report/
[9] Rebuttal to Rutgers’ Hindutva Report; https://stophindudvesha.org/a-hindu-american-rebuttal-to-the-genocidal-subtext-of-rutgers-hindutva-in-america-report/
[10] Understanding the 2022 Violence in Leicester; https://static1.squarespace.com/static/6505d742fdd85426286c1396/t/699c3b9fe74d01125aaa433b/1771846559583/Executive+Summary+Leicester.pdf
[11] Hindu groups in UK slam SOAS-led report into 2022 Leicester unrest – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/world/uk/hindu-groups-in-uk-slam-soas-led-report-into-2022-leicester-unrest/articleshow/128728249.cms
[12] Is the SOAS inquiry into Leicester violence biased and rigged against Hindus?; https://hindupost.in/world/is-the-soas-inquiry-into-leicester-violence-biased-and-rigged-against-hindus/
[13] Unmasking the Rise of Hindudvesha in the West; https://stophindudvesha.org/the-conspiracy-of-silence-unmasking-the-rise-of-hindudvesha-in-the-west/
[14] UK Violence: Hindu festival disrupted & shops of Indians vandalised; https://organiser.org/2026/03/12/343770/world/uk-rising-islamist-hostility-hindu-festival-disrupted-shops-of-indians-vandalised-at-wembley/
[15] Perpetrators still at large’: British MP Bob Blackman flags Harrow Holi clash after Indian shops attacked in Wembley – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/world/uk/perpetrators-still-at-large-bob-blackman-flags-harrow-holi-clash-after-indian-shops-attacked-in-wembley/articleshow/129681089.cms
[16] Sikh student assaulted after being mistaken for ‘Hindu’ at San Jose State University, Hindu groups condemn attack | World News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/world/us/sikh-student-assaulted-after-being-mistaken-for-hindu-at-san-jose-state-university-hindu-groups-condemn-attack/articleshow/128364915.cms
[17] Unmasking the Rise of Hindudvesha in the West; https://stophindudvesha.org/the-conspiracy-of-silence-unmasking-the-rise-of-hindudvesha-in-the-west/
[18] “From Policy Drift to Purity Grift: How a Small Network Hijacked the Immigration Debate”, NCRI Report; https://networkcontagion.us/reports/from-policy-drift-to-purity-grift-how-a-small-network-hijacked-the-immigration-debate/
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