हिंदू दृष्टिकोण से दक्षिणपंथ की वैश्विक लहर: अवसर और चिंताएँ

पश्चिमी देशों में वोक विचारधारा के खिलाफ हो रही कार्रवाई और पारंपरिक मूल्यों की ओर लौटते रुझान ने हिंदुओं के लिए नई चुनौतियों और बड़े मौके दोनों ही पैदा किए हैं। दशकों से हिंदू सभ्यता को गलत ढंग से पेश किया जाता रहा है और अब अवसर है उसे सुधारने का।
  • पश्चिमी देशों की राष्ट्रवादी सरकारें वोक विचारधारा को रोकने की कोशिश कर रही हैं। यह वोक सोच न सिर्फ पारंपरिक पश्चिमी मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि हिंदू संस्कृति और सभ्यता के प्रति भी अक्सर द्वेष ही दिखाती रही है।
  • ये सरकारें इस्लामी कट्टरपंथ और आतंकवाद के खिलाफ भी सख्त कदम उठा रही हैं, जिससे दुनियाभर के हिंदू समुदायों की सुरक्षा को लेकर अच्छे संकेत मिलते हैं।
  • ट्रम्प प्रशासन में कई हिंदू अमेरिकियों को अहम जिम्मेदारियाँ मिलीं। इससे उम्मीद है कि अमेरिकी राजनीति में हिंदू मुद्दों को अब ज़्यादा गंभीरता से लिया जाएगा।
  • राष्ट्रवादी सरकारें जॉर्ज सोरोस जैसे नेटवर्क को भी चुनौती दे रही हैं, जो लंबे समय से हिंदू विरोधी कहानियों को बढ़ावा देते रहे हैं। इस नेटवर्क के कमज़ोर होने से ऐसे नैरेटिव भी कमजोर पड़ेंगे।
  • भारत के पास यह मौका है कि वह बदलते वैश्विक हालात का फायदा उठाकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदू मुद्दों को बेहतर ढंग से सामने लाए और अपनी सभ्यतागत सोच के अनुरूप नीतियों को आकार दे।

दुनिया आज एक बड़े और अहम बदलाव के दौर से गुजर रही है। यह ऐसा समय है जब बहुत कुछ अनपेक्षित रूप से बदल रहा है और नए गठजोड़ बन रहे हैं। अब दुनिया के कई हिस्सों के देश, खासकर ‘वैश्विक दक्षिण’ (Global South), मिलकर एक मज़बूत ताकत बनकर उभर रहे हैं। इससे पश्चिमी देशों का पारंपरिक दबदबा तेज़ी से कम हो रहा है। इसी के साथ, लंबे समय से चली आ रही वामपंथी और उदारवादी सोच भी कमजोर पड़ रही है।

इस समय यूरोप के कम से कम छह देश – इटली, हंगरी, फिनलैंड, क्रोएशिया, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य – दक्षिणपंथी सरकारों के नेतृत्व में हैं।[1] अमेरिका में हाल ही में चुनी गई ट्रम्प सरकार ने भी ‘वैश्विक डीप स्टेट’ के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। यह डीप स्टेट एक अंतरराष्ट्रीय वामपंथी नेटवर्क माना जाता है, जिसे अरबपति जॉर्ज सोरोस जैसे लोगों से जोड़ा जाता है।[2]

जैसे-जैसे वामपंथी और ‘वोक’ विचारधाराओं पर सवाल उठ रहे हैं, दुनिया की सोच अब धीरे-धीरे पारंपरिक सामाजिक और नैतिक मूल्यों की ओर लौटती दिख रही है। यह बदलाव वैश्विक हिंदू समुदाय के लिए खास मायने रखता है, क्योंकि दक्षिणपंथी ताकतें उन वामपंथी विचारों को चुनौती दे रही हैं जो लंबे समय से हिंदू सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ रहे हैं।

हालाँकि, यह भी सच है कि दक्षिणपंथ की यह लहर अपने साथ कुछ जटिल चुनौतियाँ लेकर आई है। दक्षिणपंथ की कुछ धाराएँ अब भी हिंदू विरोधी सोच को बढ़ावा देती हैं, जो अक्सर श्वेत वर्चस्व और कट्टरपंथी ईसाई विचारों से जुड़ी होती हैं। फिर भी, चूंकि ज़्यादातर राष्ट्रवादी सरकारें अपने देश की प्राथमिकताओं और देशभक्ति से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देती हैं, इसलिए यह माहौल वामपंथी गठजोड़ की हिंदू विरोधी प्रचार-प्रक्रिया के मुकाबले कुछ राहत ज़रूर देता है।

इसके अलावा, कट्टरपंथी इस्लामवाद और चरम-वामपंथी सक्रियता के बीच का गठबंधन, जो अक्सर वोकिज़्म के बैनर तले एकजुट होते हैं, इन बदलते वैश्विक समीकरणों के अन्तर्गत कमज़ोर हो सकता है। चूंकि राष्ट्रवादी शासन अक्सर इस्लामिक चरमपंथ के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाते हैं,[3] [4] [5] [6] इसलिए यह बदलाव वैश्विक हिंदू समुदाय की सुरक्षा और प्रभाव को बढ़ा सकता है।

निम्नलिखित अनुभाग इस तेज़ी से बदलते वैश्विक परिवेश की और अधिक सूक्ष्मता से विवेचना करेंगे।

हिंदू मुद्दों पर ट्रंप सरकार के निहितार्थ

फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा का एक अहम नतीजा यह रहा कि भारत और अमेरिका ने मिलकर कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ने की नई प्रतिबद्धता जताई। द्विपक्षीय बातचीत के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बताया कि 2008 के मुंबई हमलों में शामिल एक पूर्व पाकिस्तानी सैन्य डॉक्टर तहव्वुर राणा को जल्द ही अमेरिका से भारत प्रत्यर्पित किया जाएगा। ट्रंप ने यह भी कहा कि दोनों देश कट्टरपंथी इस्लामी चरमपंथ के ख़तरे से मिलकर निपटना चाहते हैं।[7]

बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में आतंकवाद के ख़िलाफ़ सहयोग को मज़बूत करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया। दोनों नेताओं ने आईएसआईएस (ISIS), अल-कायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई की बात कही। बयान में पाकिस्तान से यह भी मांग की गई कि वह 26/11 मुंबई और पठानकोट हमलों के दोषियों को सज़ा दिलाए और अपने क्षेत्र को सीमा पार आतंकवाद के लिए इस्तेमाल होने से रोके।[8]

इसके अलावा भी ट्रम्प प्रशासन ने कट्टरपंथी इस्लामी चरमपंथ के खिलाफ़ एक उल्लेखनीय रूप से कठोर रुख अपनाया है, जो उनसे पहले वाले शासनों की वोक बयानबाज़ी से एक अलग रवैया दर्शाता है। ट्रम्प प्रशासन द्वारा उठाये गये विभिन्न सख़्त कदमों में USAID को वैश्विक स्तर पर समाप्त करने का निर्णय शामिल था – इस कदम से कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवादी समूहों के वित्तपोषण नेटवर्क पर काफ़ी हद तक लगाम लगने की उम्मीद है। मीडिया जांच से पता चला है कि USAID के फंड, जिन्हें पाकिस्तान जैसे देशों में विकास और सांस्कृतिक परियोजनाओं के लिए नामित किया गया था, का अक्सर आतंकवादी गतिविधियों का समर्थन करने के लिए दुरुपयोग किया जाता था।[9] ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट इस बात पर और प्रकाश डालती है कि कैसे USAID ने अपने एन जी ओज़  के विशाल नेटवर्क के ज़रिए पाकिस्तान में लश्कर से लेकर गाजा में हमास जैसे आतंकवादी संगठनों की मदद की।[10]

कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद पर ट्रम्प प्रशासन का कड़ा रुख वैश्विक हिंदू समुदाय के दृष्टिकोण से एक स्वागत योग्य कदम है। यह दुनिया भर में हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक मज़बूत प्रतिबद्धता का संकेत देता है। इस संबंध में सबसे प्रभावशाली कदमों में से एक USAID फंडिंग नेटवर्क को खत्म करना है, जो पहले हिंदू विरोधी भावना के इतिहास वाले संगठनों का समर्थन करने से जुड़ा था। इन वित्तीय चैनलों को बंद करके, प्रशासन ने हिंदूद्वेष को बढ़ावा देने वाली भौतिक और वैचारिक मशीनरी दोनों के ही प्रचार प्रसार  पर अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और इस प्रकार हिंदू मान्यताओं, संस्कृति और सभ्यता के प्रति व्यवस्थित शत्रुता वाला दृष्टिकोण फैलाने वाले तंत्र के विस्तार पर रोकथाम लगाई है।

हालांकि यह सोचना सही नहीं होगा कि ट्रम्प प्रशासन की नीतियों से अमेरिका में मौजूद हिंदू विरोधी नेटवर्क एकदम खत्म हो जाएगा। लेकिन अगर इस नेटवर्क को फंड देने वाले स्रोतों पर रोक लगती है, तो यह एक अहम शुरुआत होगी। इस तंत्र के कमजोर होने से हिंदू समुदाय को कुछ हद तक राहत जरूर मिलेगी, जिसे लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गलत तरीके से पेश किया जाता रहा है और निशाना बनाया गया है।

साथ ही, जब अमेरिका जैसी बड़ी ताकत कट्टरपंथी इस्लामी चरमपंथ के खिलाफ सख्त रुख अपनाती है, तो इससे हिंदुओं के लिए अंतरराष्ट्रीय नीतियों में हिस्सा लेने और उन्हें प्रभावित करने के नए मौके बनते हैं — खासकर उनके अधिकारों और प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दों पर।

प्रभावशाली राजनीतिक पदों पर भारतीय अमेरिकियों की बढ़ती मौजूदगी इस बदलाव को और अधिक सशक्त करती है। उल्लेखनीय रूप से, वर्तमान में ट्रम्प प्रशासन में दो प्रमुख हिंदू अमेरिकी कार्यरत हैं- एफबीआई प्रमुख काश पटेल और अमेरिकी राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड। ब्रह्म माधव गौड़ीय संप्रदाय की एक धर्मनिष्ठ वैष्णवी गबार्ड को अमेरिकी कांग्रेस में चुनी गई पहली हिंदू और भगवद गीता पर अपने पद की शपथ लेने वाली पहली व्यक्ति होने का गौरव प्राप्त है।[11] गुजराती माता-पिता के घर न्यूयॉर्क में पैदा हुए काश पटेल भी खुले तौर पर अपनी हिंदू पहचान को स्वीकार करते हैं। अपनी सीनेट समिति की पुष्टि सुनवाई के दौरान, उन्होंने अपने माता-पिता का  “जय श्री कृष्ण” के साथ अभिवादन किया और उनके प्रति सम्मान दर्शाने के पारंपरिक प्रतीक के रूप में उनके पैर छुए – एक ऐसा पारंपरिक भाव प्रदर्शन जिसकी हिंदू प्रवासी समुदाय में व्यापक रूप से सराहना हुई।[12]

ट्रम्प प्रशासन में हिंदू धर्म मानने वाले लोगों को ऊँचे पदों पर जगह मिलने से हिंदू अमेरिकी समुदाय को यह उम्मीद जगी है कि उनके मुद्दों को अब ज़्यादा गंभीरता से लिया जाएगा। हाल के वर्षों में हिंदू विरोधी घृणा अपराधों में बढ़ोतरी, जातिगत भेदभाव के नाम पर हिंदू रीति-रिवाजों को बदनाम करना, अमेरिकी स्कूलों की किताबों में हिंदू धर्म का ग़लत चित्रण और कुल मिलाकर हिंदूफोबिया का फैलाव — ये सभी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं।

हालाँकि, जब बात वैश्विक स्तर पर हिंदुओं से जुड़ी नीतियों की आती है, तो ट्रम्प प्रशासन से ज़रूरत से ज़्यादा उम्मीद करना व्यवहारिक नहीं होगा। तुलसी गबार्ड और काश पटेल जैसे प्रमुख हिंदू चेहरे सबसे पहले अमेरिकी जनता के प्रति जवाबदेह हैं। उनकी प्राथमिकता अमेरिकी राष्ट्रीय हित ही रहेंगे। फिर भी, उनकी मौजूदगी का प्रतीकात्मक और व्यावहारिक महत्व कम नहीं है। इन चेहरों से ये तो संकेत साफ है कि अब अमेरिका के सत्ता के गलियारों में हिंदू पहचान को एक अलग नजरिए से देखा जा रहा है। यह बदलाव अमेरिकी संस्थानों में हिंदू परंपराओं और मूल्यों के प्रति अधिक समझ और सम्मान की दिशा में एक कदम है।

अमेरिका की पहली भारतीय-अमेरिकी और हिंदू सेकंड लेडी, उषा वेंस, भी इस बदलाव को और मज़बूती देती हैं। उनकी राष्ट्रीय मंच पर मौजूदगी से उम्मीद है कि अमेरिका में हिंदू संस्कृति के प्रति नज़रिया और भी सकारात्मक बनेगा और लंबे समय से फैली कुछ नकारात्मक धारणाओं को चुनौती मिलेगी।

अपनी हाल ही में हुई भारत यात्रा में, तुलसी गबार्ड ने एएनआई (ANI) को दिए इंटरव्यू में बताया कि श्री मदभगवत गीता ने उनके जीवन पर गहरा असर डाला है। उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण के अर्जुन को दिए गए उपदेशों ने उन्हें कठिन हालात और चुनौतियों का सामना करने में ताकत और स्पष्ट सोच दी है।[13]

ट्रम्प प्रशासन के दौरान अमेरिका-भारत संबंधों में खासतौर पर सांस्कृतिक और सामाजिक कूटनीति के क्षेत्र में अहम बदलाव देखने को मिले हैं। इस नए सहयोग से वैश्विक स्तर पर हिंदू मुद्दों को सामने लाने के लिए नए रास्ते खुल रहे हैं। साथ ही, यह दुनिया भर में सांस्कृतिक संवाद, आपसी समझ और सहिष्णुता को बढ़ावा देने में भी मदद कर सकता है। हालांकि एक सवाल यह भी है कि क्या ये बदलाव ठोस नीतियों में तब्दील हो पाएंगे।

दूसरी ओर, अमेरिका की राजनीति में कुछ चुनौतियाँ भी बनी हुई हैं, जिनका ज़िक्र करना ज़रूरी है। ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) आंदोलन के कुछ हिस्सों में अब भी श्वेत वर्चस्व और नस्लवादी सोच से जुड़ी चरम दक्षिणपंथी बयानबाज़ी मौजूद है। यह तब ज़्यादा साफ़ दिखा जब ट्रम्प प्रशासन में संभावित हिंदू अमेरिकी नियुक्तियों की खबरें सामने आने लगीं — जिसके बाद ऑनलाइन मंचों पर हिंदू समुदाय के खिलाफ नस्लवादी (racist) टिप्पणियों की बाढ़ आ गई।

खासकर, जब कारोबारी विवेक रामास्वामी को एलन मस्क के साथ मिलकर सरकार की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए एक नई इकाई (DOGE) का नेतृत्व करने की बात चली, तब उन्हें ज़बरदस्त नस्लवादी ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा। भले ही उनकी इस भूमिका से हटने के पीछे सिर्फ नस्लवाद न रहा हो, लेकिन इसकी टाइमिंग ने कई सवाल खड़े किए हैं और अमेरिका में रह रहे हिंदू समुदाय की चिंताओं को और बढ़ाया है।[14]

इसी तरह, जनवरी में जब चेन्नई में जन्मे तकनीकी विशेषज्ञ श्रीराम कृष्णन को व्हाइट हाउस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर वरिष्ठ नीति सलाहकार बनाया गया, तो सोशल मीडिया पर विदेशों में रह रहे हिंदुओं को निशाना बनाते हुए नस्लभरे कमेंट्स की बाढ़ आ गई। यह घटना दिखाती है कि भले ही सरकारी संस्थानों में विविधता और समावेश को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन अमेरिकी समाज का एक हिस्सा अब भी ऐसे प्रतिनिधित्व का विरोध करता है।[15]

हालांकि, ऐसे नस्लवादी घटनाक्रमों को पूरे अमेरिकी समाज की सोच का प्रतीक मानना सही नहीं होगा। ट्रम्प प्रशासन में तुलसी गबार्ड, काश पटेल और श्रीराम कृष्णन जैसे प्रभावशाली हिंदू चेहरों की नियुक्तियाँ यह दिखाती हैं कि MAGA आंदोलन के भीतर हिंदू विरोधी भावनाएँ शायद एक छोटे, सीमित गुट तक ही सीमित हैं। आख़िर में यह देखना अहम होगा कि अमेरिका आगे समावेशिता की दिशा में बढ़ता है या कुछ सांस्कृतिक समुदायों को अलग-थलग करने वाली एक संकीर्ण सोच की ओर। यही तय करेगा कि अमेरिका घरेलू और वैश्विक स्तर पर हिंदू मुद्दों से किस हद तक और किस दिशा में जुड़ता है।

वैश्विक दक्षिणपंथी लहर का हिंदुओं पर प्रभाव

 सबसे पहले, हम यह स्पष्ट करना चाहेंगे कि यहाँ “दक्षिणपंथी” शब्द का इस्तेमाल केवल सुविधा के लिए किया गया है। इस शब्द के साथ इतिहास में फासीवाद (Fascism) और दमन (tyranny) जैसे कई नकारात्मक पहलू जुड़े रहे हैं। आज की वैश्विक राजनीति में जो राष्ट्रवादी लहर चल रही है, उसे सिर्फ वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ जैसे सीधे बंटवारे से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। इसलिए, “गैर-वामपंथी” या “राष्ट्रवादी सरकारें” जैसे शब्द ज़्यादा सही बैठते हैं, क्योंकि ये उन शासन व्यवस्थाओं को बेहतर ढंग से दर्शाते हैं जो वामपंथी और उदारवादी नैरेटिव को चुनौती दे रही हैं।

अब सवाल यह है कि इस उभरती दक्षिणपंथी (या राष्ट्रवादी) लहर का हिंदू मुद्दों पर क्या असर पड़ेगा? पश्चिमी देशों में राष्ट्रवादी सरकारों के आने से इसका कोई तात्कालिक या सीधे-सीधे असर दिखेगा, ऐसा जरूरी नहीं है। इसे मापने के लिए कोई तय पैमाना भी नहीं है। जैसे कि इटली की जियोर्जिया मेलोनी या हंगरी के विक्टर ओर्बन जैसे नेता शायद सीधे तौर पर हिंदू समुदाय से जुड़े मुद्दों पर कोई कदम न उठाएँ, क्योंकि उनकी प्राथमिकताएँ ज़्यादातर घरेलू होती हैं — जैसे नागरिकों की सुरक्षा, आर्थिक विकास, रोजगार और अप्रवासन। परंतु इन सरकारों ने जिस तरह से वोकिज़्म के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है, इसलिए इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई से हिंदू विरोधी वोक तंत्र को अप्रत्यक्ष रूप से ज़रूर झटका लग सकता है।

आज पश्चिम दुनिया में हिंदू विरोधी दुष्प्रचार का बड़ा केंद्र बन चुका है। मीडिया, विश्वविद्यालयों और कुछ बुद्धिजीवियों ने लंबे समय से हिंदू धर्म और संस्कृति को ग़लत तरीके से पेश किया है। इसलिए अगर इस तंत्र को कमजोर किया जाता है, तो हिंदू समुदाय को निशाना बनाने वाले ज़हरीले नैरेटिव में कुछ कमी आना तय है — भले ही यह पूरी तरह खत्म न भी हो। एक उदाहरण लें: हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन ने यह संकल्प लिया है कि वे हंगरी को अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस के नेटवर्क से बचाएँगे। उनका दावा है कि जब ट्रम्प प्रशासन के तहत यूएसएआईडी ने इन संगठनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की, तब उन्होंने अपना ध्यान बेल्जियम की तरफ मोड़ लिया।[16]

जैसा कि विभिन्न मीडिया रिपोर्टों ने उजागर किया है, सोरोस से जुड़ा एनजीओ नेटवर्क भारत विरोधी और हिंदू विरोधी कथाएँ फैलाने में सबसे आगे रहा है।[17] इस तरह की विध्वंसक गतिविधियाँ को अक्सर मानवाधिकार वकालत की भाषा की आड़ में अंजाम दिया जाता है। इन पहलों के लिए धन का प्राथमिक स्रोत पश्चिम है, और भारत जैसे देश इस तंत्र के निशाने पर होते हैं। जैसे-जैसे पश्चिम में एक के बाद एक राष्ट्रवादी सरकारें सत्ता हासिल कर रही हैं, इस बात की संभावना बनती दिखाई दे रही है कि इस तरह के हिंदू विरोधी तंत्र का जड़ से ही उन्मूलन कर दिया जाएगा।

जनवरी में, इटली की प्रधान मंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने कहा कि जॉर्ज सोरोस अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करते हैं और अपने धन का उपयोग राष्ट्रों को अस्थिर करने के लिए करते हैं। उनकी टिप्पणी यूरोपीय देशों की घरेलू राजनीति में उनकी कथित भागीदारी को लेकर एलोन मस्क पर की गई आलोचना के जवाब में आई थी। मेलोनी ने दोनों के बीच के अंतर को उजागर करने के लिए सोरोस का उदाहरण दिया, यह सुझाव देते हुए कि मस्क के  नकारात्मक चित्रण के पीछे यह वजह हो सकती है कि वह वामपंथियों के साथ नहीं जुड़े हैं।[18]

दुनिया भर की राष्ट्रवादी सरकारें लंबे समय से जॉर्ज सोरोस के निशाने पर हैं। उनकी कार्यप्रणाली में आम तौर पर जनता की राय को प्रभावित करके और आंतरिक कलह को बढ़ावा देकर शासन परिवर्तन की योजना बनाना शामिल है। सोरोस नेटवर्क विभिन्न हिंदू विरोधी तत्वों के लिए एक आश्रय स्थल बन गया है, जिसमें वोक एक्टिविस्ट्स, कट्टरपंथी इस्लामिस्ट्स, और खालिस्तानी गठजोड़ शामिल हैं। इस प्रकार, इस नेटवर्क का वैश्विक विघटन हिंदू विरोधी कथाओं को फैलाने के लिए ज़िम्मेदार तंत्र को तोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहला कदम है।

पश्चिमी देशों में राष्ट्रवादी सरकारों के उभार ने कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद के प्रति उनकी नीति में बड़ा बदलाव लाया है। लंबे समय तक हिंदू समुदाय इस्लामी चरमपंथ और आतंकवाद से पीड़ित रहा है, जबकि पश्चिम, विशेषकर अमेरिका, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को लेकर भारत की चिंताओं को अनदेखा करता रहा। परंतु आज का भू-राजनीतिक परिदृश्य काफी बदल चुका है। भारत अब एक मज़बूत राष्ट्रवादी नेतृत्व के तहत तीसरे कार्यकाल में है और वैश्विक मंच पर उसकी स्थिति पहले से कहीं अधिक सशक्त है। साथ ही, पश्चिमी देशों में वामपंथी-उदारवादी प्रभाव कम हुआ है और राष्ट्रवादी नेता प्रमुखता में आ चुके हैं। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प और यूरोप में अन्य नेताओं के नेतृत्व में इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ साझा रणनीतियों को बल मिला है।

यह स्थिति हिंदू समुदाय के लिए आशाजनक है, क्योंकि इससे उनकी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को मान्यता मिलने लगी है और वैश्विक मंच पर उनके मुद्दे ज़्यादा गंभीरता से सुने जा रहे हैं। हाल ही में भारत यात्रा के दौरान अमेरिकी खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड ने इस्लामी आतंकवाद को भारत, अमेरिका और मध्य पूर्व के लिए साझा ख़तरा बताया। उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की निंदा की और ट्रम्प प्रशासन की चिंता जताई।[19] भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गबार्ड से खालिस्तानी संगठनों, विशेषकर “सिख फॉर जस्टिस”, पर सख़्त कार्रवाई की माँग की।[20]

कुल मिलाकर, राष्ट्रवादी सरकारों के इस उभार ने इस्लामी आतंकवाद को लेकर पश्चिम की सोच में ठोस बदलाव किया है। इससे भारत में मुसलमानों के कट्टरपंथीकरण को रोकने और वैश्विक हिंदू समुदाय से जुड़े संवेदनशील मुद्दों के समाधान की संभावना बढ़ी है।

संयुक्त राष्ट्र का पुनरावलोकन: हिंदू मुद्दों पर प्रभाव

वैश्विक मुद्दों को सुलझाने में अमेरिका की भूमिका हमेशा अहम रही है, लेकिन ट्रम्प प्रशासन के दौरान अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, खासकर संयुक्त राष्ट्र, को लेकर अमेरिकी दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव आया। ट्रम्प सरकार ने यूएन की कार्यशैली, पक्षपात और निष्क्रियता को लेकर खुलकर आलोचना की है। अमेरिका पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से बाहर हो चुका है। फरवरी में राष्ट्रपति ट्रम्प ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) समेत कई एजेंसियों से अमेरिकी भागीदारी रोकने का आदेश दिया और यूएन को मिलने वाले फंड की व्यापक समीक्षा शुरू की। ट्रम्प का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र अपने मूल उद्देश्यों को पूरा करने में असफल रहा है और इसे तत्काल सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने लगातार वैश्विक संकटों को सुलझाने में यूएन की विफलता को उजागर किया है, जिससे इसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे हैं।[21]

संयुक्त राष्ट्र को दी जाने वाली फंडिंग की समीक्षा और संभावित कटौती ट्रम्प प्रशासन की व्यापक नीति का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य है – अमेरिकी टैक्सदाताओं के पैसे की फिजूलखर्ची पर रोक लगाना। प्रशासन का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र में सभी देशों के योगदान में भारी असमानता है। अमेरिका जहाँ सबसे अधिक वित्तीय सहायता देता है, वहीं यह संस्थान कई बार ऐसे एजेंडे को बढ़ावा देता है जो अमेरिका के राष्ट्रीय हितों से मेल नहीं खाते। ट्रम्प प्रशासन मानता है कि अमेरिकी नागरिकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डाला जा रहा है।[22]

मार्च में, एलन मस्क ने उस समय हलचल मचा दी जब उन्होंने सोशल मीडिया पर अमेरिका को NATO और UN जैसे संस्थानों से बाहर निकालने की मांग करने वाले पोस्ट पर “मैं सहमत हूँ” लिखकर समर्थन जताया।[23] यद्यपि अमेरिका का यूएन से पूरी तरह हटना फिलहाल व्यावहारिक नहीं लगता, लेकिन फंडिंग में कटौती एक संभव दिशा है — जिससे यूएन की कार्यक्षमता और वैश्विक प्रभाव दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

हिंदू दृष्टिकोण से देखें तो यह बदलाव पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। आज का संयुक्त राष्ट्र कई बार एक ऐसी संस्था की तरह काम करता है जो वैश्विक डीप स्टेट और कट्टरपंथी इस्लामी गुटों के प्रभाव में है। यह हिंदू समुदाय से जुड़े मानवाधिकार उल्लंघनों को या तो नज़रअंदाज़ करता है या बहुत हल्के में लेता है। इस्लामोफोबिया, ईसाई-विरोध और यहूदी-विरोध जैसी समस्याओं को वह मान्यता देता है, लेकिन ‘हिंदूफोबिया’ अब तक उसके एजेंडे में शामिल नहीं हो पाया है।

बांग्लादेश जैसे देशों में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर भी यूएन ने कभी स्पष्ट रुख नहीं अपनाया। यह उसकी एकतरफा प्रवृत्ति को दर्शाता है। ऐसे में अगर संयुक्त राष्ट्र की पकड़ ढीली पड़ती है, तो उन हिंदू विरोधी ताक़तों का असर भी घटेगा जो इस संस्था के भीतर वर्षों से जमे हुए हैं। भारत को चाहिए कि वह ऐसे विकल्पों की खोज करे जो अधिक संतुलित हों और हिंदू दृष्टिकोण को उचित प्रतिनिधित्व दें। वैश्विक दक्षिण के साथ उसकी बढ़ती भागीदारी इस दिशा में एक रणनीतिक अवसर है। साथ ही, ट्रम्प प्रशासन का दबाव अगर यूएन सुधार की दिशा में ले जाता है, तो इससे एक अधिक संतुलित और समावेशी वैश्विक नीति तंत्र विकसित हो सकता है — जो हिंदू समुदाय की चिंताओं को भी उचित स्थान दे।

निष्कर्ष

पश्चिमी देशों में राष्ट्रवादी सरकारों के उभार ने हिंदू बहुल भारत को यह अनोखा मौका दिया है कि वह वैश्विक स्तर पर हिंदू धर्म और संस्कृति को केंद्र में रखकर विमर्श को नया दिशा दे सके — ऐसा विमर्श जो हिंदू समुदाय की आकांक्षाओं और हितों के अनुरूप हो।

लगातार तीसरे कार्यकाल में राष्ट्रवादी सरकार के सत्ता में होने के साथ, भारत के पास अब यह लोकतांत्रिक अधिकार और अवसर है कि वह अपनी प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर अपने राष्ट्रीय नैरेटिव को फिर से गढ़ सके। भारत का यह सशक्त और मुखर हिंदू आख्यान, जब वैश्विक मंच पर प्रभावी रूप से प्रस्तुत होगा, तो इसका असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहेगा — बल्कि यह दुनिया भर के हिंदुओं के जीवन और आत्म-सम्मान पर सकारात्मक और दूरगामी प्रभाव डालेगा।

संदर्भ सूची

[1]  Mapped: Europe’s rapidly rising right – POLITICO;  https://www.politico.eu/article/mapped-europe-far-right-government-power-politics-eu-italy-finalnd-hungary-parties-elections-polling/

[2] Trump screwed Soros funding – EADaily, February 2nd, 2025 – Politics, Russia; https://eadaily.com/en/news/2025/02/02/trump-screwed-soros-funding

[3] Trump pledges action against Islamic terrorists, Khalistani subversives – The Times of India;     https://timesofindia.indiatimes.com/world/us/trump-pledges-action-against-islamic-terrorists-khalistani-subversives/articleshow/118253332.cms

[4] Viktor Orban: Hungary doesn’t want ‘Muslim invaders’ – POLITICO;   https://www.politico.eu/article/viktor-orban-hungary-doesnt-want-muslim-invaders/

[5] Islam was ‘Never Part of Europe’: Hungary’s Viktor Orban; https://www.ndtv.com/world-news/islam-was-never-part-of-europe-hungarys-viktor-orban-1233239

[6] No place for Islamic culture in Europe, says Italy’s Giorgia Meloni at far right event – The Economic Times;  https://economictimes.indiatimes.com/news/international/world-news/italy-pm-giorgia-meloni-makes-loaded-comment-on-islam-at-far-right-event/articleshow/106079509.cms?from=mdr

[7] Trump pledges action against Islamic terrorists, Khalistani subversives – The Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/world/us/trump-pledges-action-against-islamic-terrorists-khalistani-subversives/articleshow/118253332.cms

[8] India-US. Joint Statement ( February 13, 2025);  https://www.mea.gov.in/bilateral-documents.htm?dtl/39066

[9] India-US factor, freezing of USAID hits ISI’s notorious plans in Bangladesh; https://organiser.org/2025/02/24/279708/world/india-us-factor-freezing-of-usaid-hits-isis-notorious-plans-in-bangladesh/

[10]  From LeT to Hamas: Read how USAID has been funding terror organisations across the globe through intermediary NGOs;  https://www.opindia.com/2025/02/usaid-stands-exposed-under-trump-how-it-helped-terrorist-organisations-from-let-in-pakistan-to-hamas-in-gaza-via-ngos/

[11] ISKCON News | Tulsi Gabbard Becomes First Hindu to Lead U.S. Intelligence, Drawing Strength from Vaishnava Teachings | ISKCON News; https://iskconnews.org/tulsi-gabbard-becomes-first-hindu-to-lead-u-s-intelligence-drawing-strength-from-vaishnava-teachings/

[12]  Why Kash Patel, FBI Chief Pick, Said “Jai Shri Krishna” At Senate Hearing;   https://www.ndtv.com/world-news/donald-trump-fbi-chief-pick-kash-patel-greets-parents-with-jai-shri-krishna-at-us-senate-hearing-7600337

[13] Turn to Lord Krishna’s teachings in Bhagavad Gita in hard times’: US spy chief Tulsi Gabbard | India News- The Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/india/turn-to-lord-krishnas-teachings-in-bhagavad-gita-in-hard-times-spy-chief-tulsi-gabbard-donald-trump-pm-modi-tariff-reciprocal-hindu-bilateral-ties/articleshow/119110391.cms

[14] Why MAGA will never fully embrace Usha Vance or Vivek Ramaswamy | World News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/world/us/why-maga-will-never-fully-embrace-usha-vance-or-vivek-ramaswamy/articleshow/117488533.cms

[15] Explosion of racism against Indians reflects ineptitude and irreversible decay of Western society – Firstpost;  https://www.firstpost.com/opinion/explosion-of-racism-against-indians-reflects-ineptitude-and-irreversible-decay-of-western-society-13850189.html

[16] Soros Network Fleeing To Europe After Trump’s USAID Crackdown? Hungary PM Says ‘Won’t Let Them…’ News 18;  https://www.news18.com/world/soros-network-fleeing-to-europe-after-trumps-usaid-crackdown-hungarys-pm-says-wont-let-them-9232253.html

[17] How George Soros is fueling anti-India narrative through media and NGOs;    https://www.opindia.com/2021/07/how-george-soros-fund-open-society-foundation-anti-india-narrative-media-ngos/

[18] George Soros Indulges in Political Interference: Italy’s Giorgia Meloni; https://www.ndtv.com/world-news/george-soros-indulges-in-political-interference-italys-giorgia-meloni-7443886

[19] Persecution, killing of Hindus in Bangladesh a concern for US: Tulsi Gabbard | Latest News India – Hindustan Times;   https://www.hindustantimes.com/india-news/persecution-killing-of-hindus-in-bangladesh-a-concern-for-us-tulsi-gabbard-101742223750159.html

[20] India tells US to crackdown on anti-India activities  of Khalistani terror outfit SFJ: Report | India News – The Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/india/india-tells-us-to-crackdown-on-anti-india-activities-of-khalistani-terror-outfit-sfj-report/articleshow/119111830.cms

[21] Donald Trump Halts US Involvement With UN Rights Body Over “Anti-American Bias”;  https://www.ndtv.com/world-news/donald-trump-halts-us-involvement-with-un-rights-body-over-anti-american-bias-7636974

[22] Ibid.

[23] ‘I agree’: Elon Musk supports US withdrawal from NATO  and United Nations – What could it mean? – World News | The Financial Express; https://www.financialexpress.com/world-news/i-agree-elon-musk-supports-us-withdrawal-from-nato-and-united-nations-what-could-it-mean/3765074/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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