घटती प्रजनन दर: क्या हिंदू समाज एक नए मोड़ पर है?

जब एक बच्चे वाले परिवार सामान्य बन जाएँ और निःसंतान रहना भी स्वीकार्य होने लगे, तब सवाल केवल जनसंख्या का नहीं रहता। असली चुनौती यह होती है कि क्या संस्कृति, परंपराएँ और सभ्यतागत विरासत उसी तरह आगे बढ़ पाएँगी।
सारांश

DINK (डबल इनकम, नो किड्स) परिवारों की बढ़ती संख्या और घटती प्रजनन दर को अक्सर व्यक्तिगत पसंद, करियर और आर्थिक निर्णयों के रूप में देखा जाता है। लेकिन यह बदलाव केवल जनसंख्या तक सीमित नहीं है। भारत और दुनिया भर में बसे हिंदू समाज में परिवार लगातार छोटे हो रहे हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियों तक संस्कृति, परंपराओं और सभ्यतागत विरासत पहुँचाने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। हिंदू सभ्यता का आधार केवल ग्रंथ, मंदिर या संस्थाएँ नहीं, बल्कि परिवार और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली सांस्कृतिक परंपराएँ रही हैं। यदि जन्मदर लंबे समय तक आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक स्तर से नीचे बनी रहती है, तो इसका असर सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी नेतृत्व और सांस्कृतिक निरंतरता पर भी पड़ सकता है। इसलिए घटती प्रजनन दर केवल जनसंख्या का नहीं, बल्कि हिंदू समाज के दीर्घकालिक सभ्यतागत भविष्य का भी प्रश्न है।

पिछले लगभग पचास वर्षों में दुनिया के अधिकांश देशों में प्रजनन दर लगातार घटी है[1] कभी जिन देशों की सबसे बड़ी चिंता तेजी से बढ़ती आबादी थी, आज वही देश घटती जनसंख्या, बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी और कामकाजी लोगों की कम होती संख्या जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। जापान, दक्षिण कोरिया, इटली, जर्मनी, स्पेन और चीन जैसे देशों में कई वर्षों से इतने कम बच्चे पैदा हो रहे हैं कि उनकी आबादी को स्थिर बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है[2] [3]

भारत को लंबे समय तक युवा आबादी वाला और तेजी से आगे बढ़ता देश माना जाता रहा है। लेकिन अब यहाँ भी एक बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि भारत की कुल प्रजनन दर, यानी एक महिला द्वारा अपने जीवनकाल में जन्म दिए जाने वाले बच्चों की औसत संख्या, कई राज्यों और सामाजिक वर्गों में आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए ज़रूरी स्तर के आसपास या उससे नीचे पहुँच चुकी है[4] यह बदलाव शहरों, उच्च शिक्षित पेशेवरों और आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों में सबसे स्पष्ट दिखाई देता है[5]

इसी पृष्ठभूमि में DINK (डबल इनकम, नो किड्स) जीवनशैली चर्चा का विषय बनी है[6] इसमें पति-पत्नी दोनों कमाते हैं, लेकिन बच्चे न रखने का निर्णय लेते हैं। इसे आर्थिक स्वतंत्रता, करियर और अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने की सोच से जोड़ा जाता है। यह केवल एक जीवनशैली नहीं, बल्कि विवाह, परिवार और माता-पिता बनने को लेकर बदलती सामाजिक सोच का भी संकेत है[7]

लेकिन DINK परिवार इस बदलाव की पूरी तस्वीर नहीं दिखाते। असली बदलाव यह है कि परिवार लगातार छोटे होते जा रहे हैं। लोग पहले की तुलना में देर से माता-पिता बन रहे हैं और एक बच्चे वाले परिवार तेजी से सामान्य होते जा रहे हैं। यही प्रवृत्ति केवल भारत के महानगरों में ही नहीं, बल्कि उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे हिंदू प्रवासी समाजों में भी साफ दिखाई देती है।

अब सवाल यह है कि हिंदू समाज में घटती प्रजनन दर का असर केवल जनसंख्या तक सीमित है, या इससे हमारी धार्मिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत भी प्रभावित होगी।

जनसांख्यिकीय परिवर्तन और सिकुड़ता परिवार

प्रजनन दर एक दिन में नहीं घटती। इसके पीछे समाज में लंबे समय तक चलने वाले बदलाव होते हैं। जैसे-जैसे आर्थिक समृद्धि, शहरीकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ और महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, परिवारों का आकार छोटा होने लगता है।

इन बदलावों से समाज को कई लाभ भी मिले हैं। लोगों का स्वास्थ्य बेहतर हुआ है, शिक्षा का स्तर बढ़ा है और आर्थिक अवसर भी बढ़े हैं। लेकिन इसके साथ ही कुछ नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। उनमें सबसे बड़ी चुनौती है घटती प्रजनन दर।

ध्यान देने वाली बात यह है कि इसकी शुरुआत निःसंतान परिवारों से नहीं होती। बल्कि धीरे-धीरे परिवारों का आकार छोटा होने लगता है। जहां पहले बड़े परिवार थे, वहाँ मध्यम आकार के परिवार बन जाते हैं। जहां मध्यम आकार के परिवार थे, वहाँ एक बच्चे वाले परिवार बन जाते हैं। धीरे धीरे निःसंतानता सामाजिक रूप से सामान्य हो जाती है[8]

डिंक जीवनशैली इस प्रवृत्ति का मात्र एक उदाहरण है। भले ही अधिकांश दंपतियों के एक ही बच्चा हो, फिर भी जनसंख्या समय के साथ घटती ही जाएगी। गणित सरल है: जब प्रत्येक पीढ़ी अपनी पीढ़ी को प्रतिस्थापित करने के लिए आवश्यक बच्चों की संख्या से कम बच्चे पैदा करती है, तो समाज धीरे-धीरे सिकुड़ता जाता है।

इसलिए, महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि कुछ दंपत्ति निःसंतान रहना चुनते हैं या नहीं। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या समाज का एक बड़ा और प्रभावशाली वर्ग अब इतने कम बच्चे पैदा कर रहा है कि आने वाले समय में वही प्रवृत्ति पूरे समाज की जनसंख्या, उसकी संस्थाओं और उसकी सांस्कृतिक निरंतरता को प्रभावित करने लगे। यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं रह जाता, बल्कि समाज के दीर्घकालिक भविष्य का प्रश्न बन जाता है। लेकिन आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? इसके पीछे केवल आर्थिक कारण नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक बदलाव भी काम कर रहे हैं।

बदलती जीवनशैली, बदलते परिवार

समकालीन फर्टिलिटी दर में गिरावट को केवल आर्थिक कारकों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। कई समृद्ध समाजों में, आय में वृद्धि और जीवन स्तर में सुधार के बावजूद जन्म दर में गिरावट जारी है। इसका अर्थ है कि यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक भी है।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि आधुनिक समाज में व्यक्ति की पसंद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। परिवार, धर्म और समाज के लोगों के निजी फैसलों पर पहले जैसा प्रभाव नहीं रहा। अब लोग अपने करियर, अपनी इच्छाओं और अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने को अधिक महत्व देने लगे हैं। ऐसे में, माता-पिता बनने का निर्णय भी अब केवल भावनात्मक या पारिवारिक नहीं रह गया है। बहुत से लोग इसे अपने समय, करियर और जीवनशैली पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखकर भी देखते हैं[9]

बच्चों का पालन-पोषण केवल आर्थिक जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए समय, मेहनत, भावनात्मक जुड़ाव और अपनी जीवनशैली में कई बदलाव करने पड़ते हैं। इसलिए आज कई लोग परिवार बढ़ाने का निर्णय लेते समय यह भी सोचते हैं कि इसका उनके करियर, जीवनशैली, कहीं भी जाकर रहने की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत योजनाओं पर क्या असर पड़ेगा।

यहीं एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। पहले लोग अपनी मेहनत और सफलता को अगली पीढ़ी के भविष्य को बेहतर बनाने का माध्यम मानते थे। आज बढ़ती संख्या में लोग उसी सफलता का उपयोग अपने जीवन को अधिक आरामदायक और संतोषजनक बनाने तथा अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने में करना चाहते हैं। यह बदलाव जरूरी नहीं कि स्वार्थ का संकेत हो। बल्कि, यह इस बात को दिखाता है कि समाज की प्राथमिकताएँ बदल रही हैं और लोग अपने जीवन से जुड़े फैसले पहले से अधिक अपनी पसंद के आधार पर लेने लगे हैं। इस बदलती सोच का असर जनसंख्या पर भी पड़ता है। लेकिन इन बदलावों का असर हर समाज पर एक जैसा नहीं पड़ता। प्रवासी समाजों के लिए इसके परिणाम कहीं अधिक गहरे हो सकते हैं।

प्रवासी समाज और सांस्कृतिक निरंतरता

प्रवासी समाजों में घटती प्रजनन दर का असर और भी गहरा हो सकता है। अपने देश में किसी संस्कृति को जीवित रखने का काम केवल परिवार नहीं करता। भाषा, त्योहार, स्कूल, धार्मिक स्थल, स्थानीय परंपराएँ और पूरा सामाजिक माहौल मिलकर सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाए रखते हैं। इसलिए यदि किसी एक कड़ी में कमजोरी भी आ जाए, तो दूसरी कड़ियाँ उसकी भरपाई कर देती हैं। लेकिन प्रवासी समाजों की स्थिति अलग होती है। वहाँ संस्कृति और पहचान को बचाए रखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी परिवार पर आ जाती है[10] मंदिर, सांस्कृतिक संगठन, भाषा विद्यालय और अन्य संस्थाएँ इस काम में महत्वपूर्ण सहयोग देती हैं, लेकिन परिवार की जगह नहीं ले सकतीं।

प्रवासी समाजों में संस्कृति को बचाए रखने का सबसे बड़ा माध्यम परिवार होता है[11] बच्चे अपनी भाषा, धार्मिक परंपराएँ, संस्कार और सांस्कृतिक पहचान सबसे पहले घर में ही सीखते हैं[12] इसीलिए प्रवासी समाजों में छोटे परिवारों का असर केवल जनसंख्या तक सीमित नहीं रहता। जब बच्चों की संख्या घटती है, तो भविष्य के स्वयंसेवकों, शिक्षकों, मंदिर कार्यकर्ताओं, दानदाताओं और सामाजिक नेतृत्व का आधार भी छोटा होने लगता है। यदि यह प्रवृत्ति कई पीढ़ियों तक बनी रहे, तो अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान बनाए रखना और कठिन हो सकता है। इसलिए यह केवल जनसंख्या का नहीं, बल्कि संस्कृति और सभ्यतागत विरासत के भविष्य का भी प्रश्न है।

हिंदू सभ्यता में परिवार की भूमिका

हिंदू समाज में घटती प्रजनन दर का महत्व केवल जनसंख्या तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध हमारी सांस्कृतिक निरंतरता से भी है। कई अन्य धार्मिक परंपराओं की तरह हिंदू समाज किसी एक केंद्रीय संस्था पर आधारित नहीं है। सदियों से हिंदू समाज की ताकत परिवारों, रिश्तों, मंदिरों, तीर्थ परंपराओं और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं से मिलती रही है।

हिंदू जीवन की कई सबसे महत्वपूर्ण परंपराएँ घर-परिवार में ही सीखी जाती हैं। त्योहार परिवार के साथ मनाए जाते हैं। पूजा-पद्धति, रीति-रिवाज और संस्कार देखकर और उनमें भाग लेकर सीखे जाते हैं। भाषा, खान-पान, पारिवारिक कहानियाँ और स्थानीय परंपराएँ भी रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनकर अगली पीढ़ी तक पहुँचती हैं। बच्चे इन्हें किताबों से कम और अपने घर-परिवार को देखकर अधिक सीखते हैं। यही कारण है कि हिंदू सभ्यता की निरंतरता में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।

हिंदू परंपराएँ केवल ग्रंथों, मंदिरों और संस्थाओं के सहारे जीवित नहीं रह सकतीं। उन्हें आगे बढ़ाने वाली नई पीढ़ियाँ भी उतनी ही ज़रूरी हैं। इसलिए जनसंख्या में गिरावट का असर केवल आँकड़ों में नहीं, बल्कि संस्कृति की निरंतरता में भी दिखाई देता है।

जन्म-विरोधीवाद और समकालीन सांस्कृतिक दृष्टिकोण

लेकिन बदलती प्रजनन दर के पीछे केवल सामाजिक और आर्थिक कारण ही नहीं हैं। कुछ दार्शनिक विचारों ने भी आधुनिक सोच को प्रभावित किया है। जन्म और माता-पिता बनने को लेकर एक ऐसी विचारधारा विकसित हुई है, जो इन प्रश्नों को पारंपरिक दृष्टि से अलग तरीके से देखती है। इसकी जड़ें बहुत पुरानी हैं और सोफोक्लीज, आर्थर शोपेनहावर, पीटर वेसेल ज़ाप्फे तथा हाल के वर्षों में डेविड बेनाटर जैसे विचारकों के लेखन में दिखाई देती हैं[13] [14]

हालाँकि इन सभी विचारकों के विचार एक जैसे नहीं हैं, फिर भी उनमें एक बात समान है। वे मानव जीवन के मूल्य और संतानोत्पत्ति की नैतिकता पर अलग-अलग स्तरों पर सवाल उठाते हैं। यह भी सही है कि आज जो लोग माता-पिता बनने में देर करते हैं या बच्चे न रखने का फैसला करते हैं, उनमें से अधिकांश किसी जन्म-विरोधी दर्शन से सीधे प्रभावित नहीं होते। फिर भी, इस सोच के कुछ तत्व धीरे-धीरे लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

आज जीवन को पहले की तुलना में अधिक तनावपूर्ण और अनिश्चित माना जाने लगा है। माता-पिता बनने को कई लोग खुशी से अधिक जिम्मेदारी और त्याग के रूप में देखने लगे हैं। जिम्मेदारियाँ को अक्सर बोझ समझा जाता है और स्वतंत्रता को हर तरह के बंधन से मुक्ति के रूप में। ये विचार सीधे-सीधे संतानोत्पत्ति का विरोध नहीं करते, लेकिन ऐसा माहौल जरूर बनाते हैं जिसमें बच्चे पैदा करना पहले जितना स्वाभाविक निर्णय नहीं रह जाता।

पितृऋण और पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व

हिंदू परंपरा इस विषय को अलग दृष्टि से देखती है। हिंदू विचार में पितृऋण की अवधारणा का विशेष महत्व है। इसका अर्थ है कि हम अपने पूर्वजों के प्रति भी उत्तरदायी हैं और आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी। इस दृष्टि से व्यक्ति को केवल एक स्वतंत्र इकाई के रूप में नहीं देखा जाता। वह अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाली एक सतत श्रृंखला की कड़ी माना जाता है। हमें अपने पूर्वजों से भाषा, संस्कृति, संस्कार, ज्ञान और जीवन-मूल्यों की एक अमूल्य विरासत मिलती है। इसलिए हमारी जिम्मेदारी केवल अपने लिए जीने तक सीमित नहीं रहती। हमारी जिम्मेदारी है कि इस विरासत को सँभालें और अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँ।

यहीं हिंदू दृष्टि और आधुनिक व्यक्तिवादी सोच में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। आधुनिक सोच में परिवार बनाने का निर्णय अक्सर व्यक्तिगत पसंद और सुविधा के आधार पर लिया जाता है। इसके विपरीत, हिंदू परंपरा व्यक्ति को पूर्वजों और आने वाली पीढ़ियों, दोनों से जुड़ा हुआ मानती है। इसलिए माता-पिता बनना केवल संतान पैदा करने का प्रश्न नहीं है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से संस्कृति, संस्कार और सभ्यतागत विरासत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है।

 जनसांख्यिकीय गिरावट और संस्थाओं का भविष्य

जनसंख्या में बदलाव का असर समाज की संस्थाओं पर भी पड़ता है। जब नई पीढ़ी छोटी होती जाती है, तो मंदिरों, शैक्षिक संस्थानों, सांस्कृतिक संगठनों, स्वयंसेवी समूहों और सामाजिक संस्थाओं से जुड़ने वाले लोगों की संख्या भी घटने लगती है। इसका सीधा असर भविष्य के स्वयंसेवकों, कार्यकर्ताओं और नेतृत्व पर पड़ता है।

अल्पसंख्यक समाजों में यह चुनौती और भी बड़ी होती है, क्योंकि वहाँ की अधिकांश संस्थाएँ कुछ समर्पित लोगों के सहयोग से ही चलती हैं। इतिहास बताता है कि कोई भी सभ्यता एक झटके में नहीं टूटती। उसका क्षय धीरे-धीरे होता है। पहले लोगों की भागीदारी घटती है। फिर परंपराओं और ज्ञान का प्रवाह कमजोर पड़ने लगता है। संस्थाएँ छोटी होने लगती हैं और सामूहिक स्मृति धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाती है। समय के साथ केवल बाहरी पहचान बची रह जाती है, जबकि परंपराओं को आगे बढ़ाने वाली जीवंत व्यवस्था कमजोर हो जाती है। इसलिए चुनौती केवल मंदिरों, ग्रंथों या सांस्कृतिक धरोहर को बचाने की नहीं है। असली चुनौती उन परिवारों, संस्थाओं और परंपराओं को जीवित रखने की है, जिनके माध्यम से यह विरासत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है।

निष्कर्ष

आज DINK जीवनशैली और घटती प्रजनन दर पर होने वाली चर्चा अक्सर व्यक्तिगत पसंद, आर्थिक स्थिति और जीवनशैली तक सीमित रह जाती है। ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं दिखातीं। घटती प्रजनन दर केवल जनसंख्या का प्रश्न नहीं है। यह संस्कृति, परंपराओं और सभ्यतागत निरंतरता का भी प्रश्न है।

भारत और दुनिया भर में बसे हिंदू समाज के लिए यह विषय विशेष महत्व रखता है, क्योंकि हमारी परंपराएँ सदियों से परिवारों के माध्यम से ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रही हैं। जैसे-जैसे परिवार छोटे होते जाते हैं, वैसे-वैसे परंपराओं, संस्कारों, स्मृतियों और सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया भी कमजोर पड़ने लगती है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि लोग बच्चे पैदा करना चाहते हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि आने वाली पीढ़ियों तक हमारी सभ्यतागत विरासत किस तरह पहुँचेगी।

यदि जन्मदर लंबे समय तक आबादी को स्थिर रखने के लिए ज़रूरी स्तर से नीचे बनी रहे, तो क्या समाज अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने वाले परिवारों, संस्थाओं और परंपराओं को पहले की तरह जीवित रख पाएगा?

आखिरकार, कोई भी सभ्यता केवल विचारों, ग्रंथों, मंदिरों, स्मारकों या संस्थाओं के सहारे जीवित नहीं रहती। वह इसलिए जीवित रहती है क्योंकि हर नई पीढ़ी अपनी विरासत को अपनाती है, उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाती है और फिर उसे आगे बढ़ाती है।

यह भी सच है कि केवल बड़ी आबादी किसी सभ्यता के भविष्य की गारंटी नहीं देती। लेकिन यदि नई पीढ़ियाँ लगातार छोटी होती जाएँ, तो किसी सभ्यता की निरंतरता बनाए रखना कठिन हो जाता है। किसी भी सभ्यता का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह अपने अतीत को कितना याद रखती है। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि आने वाली पीढ़ियों में उसे समझने, जीने और आगे बढ़ाने वाले लोग कितने हैं।

सन्दर्भ सूची

[1] The Lancet: Dramatic declines in global fertility rates set to transform global population patterns by 2100; https://www.healthdata.org/news-events/newsroom/news-releases/lancet-dramatic-declines-global-fertility-rates-set-transform#:~:text=The%20global%20TFR%20has%20more,per%20female%20as%20of%202021

[2] Fertility Rate | Our World in Data; https://ourworldindata.org/fertility-rate

[3] Gender Data Portal; https://genderdata.worldbank.org/en/home

[4] Where Are Fertility Rates Headed? | Economic and Political Weekly; https://www.epw.in/journal/2026/25/editorials/where-are-fertility-rates-headed.html#:~:text=Between%202014%20and%202024%2C%20the,primary%2C%20and%20middle%20school%20education

[5] State of Fertility | Interactive Dashboard; https://cdn.downtoearth.org.in/dte-interactive/state_of_fertility_dashboard_aligned_master.html

[6] Dual income, no kids: What we know about ‘DINKs’ in the U.S.; https://www.pewresearch.org/short-reads/2025/11/03/dual-income-no-kids-what-we-know-about-dinks-in-the-us/#:~:text=In%20the%20United%20States%2C%2012,slightly%20over%20the%20past%20decade

[7] The Rise of DINKs: How Childfree Couples are Reshaping Economies; https://www.researchgate.net/publication/376751607_The_Rise_of_DINKs_How_Childfree_Couples_are_Reshaping_Economies#:~:text=families%20with%20children.-,This%20paper%20explores%20the%20economic%20influence%20of%20the%20growing%20DINK,voluntary%20childlessness%20have%20shifted%2C&text=The%20economic%20impact%20of%20the,and%20extended%20leisure

[8] View of An Exploratory Study on the Spending Pattern of DINK (Double Income No Kids) Community from India; https://jier.org/index.php/journal/article/view/226/245#:~:text=Philip%20Kotler%20of%20North%2Dwestern,DINK%20have%20entered%20middle%20age

[9] Raising kids in this economy: To DINK or not? Why more Indian couples are rethinking parenthood – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/raising-kids-in-this-economy-to-dink-or-not-why-more-indian-couples-are-rethinking-parenthood/articleshow/128913569.cms#:~:text=Rohit%20Saran%20explains%20in%20his,reaching%20nearly%20Rs%201.83%20crore

[10] Preserving and Promoting Indian Diaspora’s Socio-Cultural Heritage Globally; https://sociology.institute/diaspora-transnational-communities/indian-diaspora-socio-cultural-heritage-global/

[11] Cultural transmission of attitudes and behaviours from parents, peers and grandparents – PMC; https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC12851453/

[12] Parenting Attributions and Attitudes in Cross-Cultural Perspective – PMC; https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC3173779/

[13] Better Never to Have Been, Better to Cease to Be?; https://www.cambridge.org/core/services/aop-cambridge-core/content/view/C8F5A3A04DE6D4C7D9EA389FF9CE10DC/S0953820826100259a.pdf/better_never_to_have_been_better_to_cease_to_be.pdf

[14] Anti-Natalism | Internet Encyclopedia of Philosophy; https://iep.utm.edu/anti-natalism/

Aditi Joshi
Aditi Joshi
Aditi Joshi is a Delhi-based history graduate, researcher, writer, content strategist, and cultural commentator focused on reclaiming Indic civilizational perspectives and historical accuracy. She is the Founder of Itihasdhir (इतिहासधीर), launched in 2023, a platform for thoughtful discussions on Indian history, historians’ influence, book reviews, scholar interviews, and forgotten aspects of Bharat’s past. Currently, she serves as Content Manager at Upword Foundation, contributing to content strategy and creation on cultural, historical, and societal topics aligned with Indic values. An aligned effort of the Upword Foundation and Itihasdhir is a bookclub namely, Bookmarkers. A passionate folklore enthusiast, she is also an artist and translator, blending creativity with scholarship to highlight India’s cultural depth and challenge misrepresentations. Her work addresses colonial distortions of Hindu Dharma, erasure of symbols, caste narratives, and Sanātana traditions’ survival.
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