शत्रुतापूर्ण परिवेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा: बांग्लादेश में स्थिति संतुलित करने को लेकर भारत के प्रयास
- संयुक्त राष्ट्र की एक तथ्य-खोजी रिपोर्ट ने यूनुस शासन के इस दावे को खारिज कर दिया है कि बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा की रिपोर्टें भारतीय दुष्प्रचार हैं।
- ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद, भारत के पास बांग्लादेश से निपटने के लिए अधिक रणनीतिक स्वायत्तता है।
- कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद पर ट्रम्प का कड़ा रुख यह सुनिश्चित करता है कि अमेरिका भारत पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश का इस्तेमाल नहीं करेगा।
- भारत को पाकिस्तान-बांग्लादेश के बढ़ते संबंधों के बारे में सतर्क रहना पड़ेगा और व्यापक पाकिस्तान-चीन-बांग्लादेश समीकरणों पर विचार करना पड़ेगा।
- ट्रम्प का समर्थन मोदी को बांग्लादेश के प्रबंधन में खुली छूट देता है, जिससे यूनुस शासन की भारत विरोधी बयानबाजी कमज़ोर होती है।
- बांग्लादेश संकट मोदी सरकार को अस्थिर करने के लिए रचा गया था, इसलिए भारत को आक्रामक लेकिन कूटनीतिक बने रहना चाहिए, ताकि तनाव को बढ़ने से रोका जा सके।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की एक हालिया तथ्य-खोजी रिपोर्ट ने यूनुस शासन द्वारा किए जा रहे उन तमाम दावों को ख़ारिज कर दिया है जो कहते हैं कि भारत में हिंदुओं के ख़िलाफ़ चल रहा अत्याचार मात्र भारत द्वारा फैलाया जा रहा दुष्प्रचार है। यूनुस प्रशासन के इन दावों को ख़ारिज करते हुए इस रिपोर्ट ने बांग्लादेश के हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ चल रहे व्यापक मानवाधिकार उल्लंघन और हिंसा को उजागर किया है। अंतरिम नेता मुहम्मद यूनुस के निमंत्रण पर की गई जांच में हिंदुओं के घरों, व्यवसायों और पूजा स्थलों पर हुए हमलों का विवरण दिया गया है, जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि एक सुनियोजित साज़िश के तहत बांग्लादेश के हिंदुओं का उत्पीड़न किया जा रहा है।[1] [2]
पीड़ितों के साक्षात्कारों के आधार पर, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में व्यापक आगजनी, संपत्ति के विनाश और धमकियों का उल्लेख किया गया है। गवाहों ने हिंदुओं के स्वामित्व वाले व्यवसायों और धार्मिक स्थलों पर लक्षित हमलों का वर्णन किया, जिसमें दुकानों को लूटा गया और घरों को आग लगा दी गई। इसके अतिरिक्त, साक्षात्कारों से यह भी पता चला कि बांग्लादेश के हिंदू शिक्षकों पर इस्तीफा देने का अत्यधिक दबाव बनाया जा रहा था, जो उत्पीड़न की प्रणालीगत प्रकृति को और अधिक रेखांकित करता है।[3]
हालाँकि, रिपोर्ट में शेख हसीना शासन के कथित मानवाधिकार हनन, विशेष रूप से छात्र विरोध प्रदर्शनों के उनके दमन पर महत्वपूर्ण ध्यान केंद्रित किया गया है। इसमें कहा गया है कि 15 जुलाई से 5 अगस्त के बीच, 1,400 से अधिक लोग मारे गए, और हज़ारों लोग घायल हुए, जिनमें से अधिकांश को कथित तौर पर बांग्लादेशी सुरक्षा बलों ने गोली मारी।[4] इसके विपरीत, हिंदू विरोधी हिंसा को संबोधित करने वाला खंड अपेक्षाकृत संक्षिप्त है और हमलों को सांप्रदायिक हत्याओं के रूप में स्पष्ट रूप से चित्रित करने से बचता है, इसके बजाय यह कथानक बनाए रखता है कि हसीना के बांग्लादेश से पलायन के बाद की हिंसा ने मुख्य रूप से अवामी लीग समर्थकों को निशाना बनाया। जब हिंदूफोबिया या हिंदू विरोधी भावना के अस्तित्व को स्वीकारने की बात आती है, तो इस मामले में अगर ऐतिहासिक तथ्यों पर नज़र डालेंगे तो पायेंगे कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे लेकर कभी कोई ख़ास रुचि नहीं दिखाई। अतः इस बात से कदापि भी आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि यह रिपोर्ट एक गंभीर हस्तक्षेप की तुलना में कूटनीतिक पैंतरेबाज़ी अधिक प्रतीत होती है। फिर भी, यह बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा को स्वीकार करने की दिशा में एक प्रारंभिक कदम का प्रतिनिधित्व तो ज़रूर करती है।
बांग्लादेश के हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा क्षेत्रीय स्थिरता और पड़ोसी देशों के बीच संबंधों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि यह सीधे तौर पर ढाका में एक स्थिर, उदार सरकार की आवश्यकता से जुड़ा है, जो मानवीय और भू-राजनीतिक दोनों कारणों से महत्वपूर्ण है। हालाँकि, भारतीय राजनयिकों द्वारा बार-बार संयुक्त राष्ट्र से हिंदू विरोधी हिंसा को स्वीकार करने का आग्रह करने के बावजूद, हिंदूफोबिया को कोई औपचारिक मान्यता नहीं दी गई है, जो हिंदू उत्पीड़न के प्रति अंतरराष्ट्रीय निकाय की व्यापक उदासीनता को दर्शाता है।[5] इसलिए बांग्लादेश में संयुक्त राष्ट्र के सीधे हस्तक्षेप की उम्मीद करना बेमानी है।
ट्रम्प प्रशासन के सत्ता में आने के साथ, भारत ने बांग्लादेश में निष्पक्ष चुनावों की वकालत करने के लिए अपना प्रभाव बढ़ा दिया है, जिससे शेख हसीना की अवामी लीग को फिर से चुनाव लड़ने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही यूनुस शासन के भेदभावपूर्ण रुख का मुकाबला करने हेतु भारत अपने बढ़ते भू राजनीतिक वर्चस्व और ‘पड़ोसी पहले’ की नीति का भी इस्तेमाल कर सकता है। चूंकि यूनुस प्रशासन महज़ एक कार्यवाहक सरकार है, जिसमें लोकतांत्रिक वैधता का अभाव है, इसलिए भारत के पास उसकी हिंदू विरोधी नीतियों को उजागर करने और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने का एक सुनहरा अवसर है। रणनीतिक रूप से अपनी कूटनीति कार्यान्वित कर और लक्षित भू-राजनीतिक पैंतरेबाज़ी करके, भारत हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करते हुए बांग्लादेश के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
इस लेख में हम इस विषय पर चर्चा करेंगे कि भारत अपने भू-राजनीतिक हितों और देश में हिंदुओं की सुरक्षा, दोनों सुनिश्चित करने के लिए बांग्लादेश की स्थिति को कैसे सँभाल सकता है।
ट्रम्प मोदी मीटिंग के निहितार्थ
भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की हालिया अमेरिका यात्रा के दौरान, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ उनकी बैठक ने कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद से निपटने के लिए एक मज़बूत प्रतिबद्धता को उजागर किया। उनकी चर्चाओं का एक प्रमुख केंद्र दुनिया भर में आतंकी नेटवर्क को खत्म करना था, जैसा कि भारत-अमेरिका संयुक्त वक्तव्य में रेखांकित किया गया है। इस वक्तव्य में जैश-ए-मोहम्मद, आईएसआईएस, अल-कायदा और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी समूहों के खिलाफ सहयोग की पुष्टि की गई, साथ ही 26/11 मुंबई हमलों की भी निंदा की गई। इसने पाकिस्तान से मुंबई और पठानकोट दोनों हमलों के अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाने और अपनी भूमि का इस्तेमाल सीमा पार आतंकवाद के लिए होने से रोकने का आग्रह किया।[6]
इस संयुक्त घोषणापत्र में पाकिस्तान के प्रति पिछले बाईडेन प्रशासन के दृष्टिकोण से अलग रुख अपनाया गया है, जो आतंकवाद को समर्थन देने में उसकी कथित भूमिका पर सख्त रवैये का संकेत देता है। ट्रम्प द्वारा कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद की स्पष्ट निंदा ने पाकिस्तान को एक सीधी चेतावनी दी, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि उनका प्रशासन पाकिस्तान को उसके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराएगा। पाकिस्तान ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बयान को “एकतरफा और भ्रामक” बताया, जबकि भारत पर आतंकवाद और न्यायेतर हत्याओं को प्रायोजित करने का आरोप लगाकर ध्यान भटकाने की कोशिश की।[7]
भारत के पास अब आतंकवाद के खिलाफ ट्रंप प्रशासन के दृढ़ रुख का लाभ उठाकर अपनी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर है, खास तौर पर बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के मद्देनज़र। हालांकि इस मीटिंग में बांग्लादेश चर्चा का मुख्य विषय नहीं था, लेकिन ट्रंप ने एक रिपोर्टर द्वारा वहां शासन परिवर्तन में बाईडेन प्रशासन की कथित भूमिका के बारे में पूछे जाने पर इस मुद्दे को संबोधित किया। उन्होंने बांग्लादेश में हुए सता परिवर्तन को लेकर अमेरिकी डीप स्टेट की भूमिका से इनकार किया और कहा कि वह बांग्लादेश के मामले को प्रधानमंत्री मोदी पर छोड़ते हैं। उनकी टिप्पणियों में अपने पड़ोस के प्रबंधन को लेकर भारत की भूमिका के प्रति असामान्य सम्मान झलकता है, जो यह संकेत देता है कि अमेरिका बांग्लादेश के प्रति भारत के दृष्टिकोण में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
ट्रंप की टिप्पणियों का खास महत्व है, खासकर शेख हसीना को हटाए जाने के बाद बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों के बाद। हालांकि कुछ लोगों को सीधे अमेरिकी हस्तक्षेप की उम्मीद थी, लेकिन बांग्लादेश मामले में ट्रम्प की प्रतिक्रिया उनके प्रशासन की व्यापक नीति के अनुरूप थी, जिसमें विदेशी मामलों में अमेरिकी भागीदारी को कम करना शामिल था। बाईडेन प्रशासन के विपरीत, ट्रंप की सरकार ने भारत को नियंत्रित करने या उसकी क्षेत्रीय नीतियों को प्रभावित करने में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई है, इसके बजाय उसने अपने पड़ोसियों से निपटने में भारत की स्वायत्तता का समर्थन किया है।[8]
ट्रम्प का रुख भारत को अमेरिका के बाहरी दबाव के बिना क्षेत्रीय चुनौतियों का प्रबंधन करने में अधिक सक्षमता प्रदान करता है। ऐतिहासिक रूप से, अमेरिकी प्रशासन ने अक्सर लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने की आड़ में अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया है। लेकिन, ट्रम्प के नेतृत्व में, भारत अमेरिकी हस्तक्षेप के बिना अपनी पड़ोस नीति को आगे बढ़ा सकता है। उनके प्रशासन का दृष्टिकोण भारत को आश्वस्त करता है कि दक्षिण एशिया में सुरक्षा खतरों और भू-राजनीतिक चिंताओं को संबोधित करते समय उसे वाशिंगटन से कूटनीतिक बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ेगा।
राष्ट्रपति ट्रम्प के विदेशी सहायता के पुनर्मूल्यांकन के कार्यकारी आदेश के तहत, अमेरिकी सरकार ने बांग्लादेश को दी जाने वाली सभी USAID फंडिंग को निलंबित कर दिया।[9] 25 जनवरी, 2025 के आदेश में राष्ट्रपति के निर्देश का हवाला देते हुए कार्यान्वयन भागीदारों को सभी अनुबंधों, सहायता कार्यक्रमों और अनुदानों को तुरंत रोकने का निर्देश दिया गया।[10]
अमेरिकी सरकार द्वारा USAID के वित्तपोषण को निलंबित करने के हालिया फ़ैसले के बांग्लादेश के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक परिणाम होंगे। देश अभी भी हिंसक विरोध प्रदर्शनों से उबरने के लिए संघर्ष कर रहा है, जिसके कारण 2024 में शेख हसीना की सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा। हालांकि, मौजूदा प्रमाणों से ज्ञात होता है कि USAID का वित्तपोषण भी अमेरिका के डीप स्टेट द्वारा शासन परिवर्तन को अंजाम देने के प्रयासों में उलझा हुआ था।
दिसंबर 2024 में न्यूयॉर्क में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान, मुहम्मद यूनुस ने खुद माना कि वह सत्ता में एक सुनियोजित तख्तापलट के जरिए आए थे। क्लिंटन ग्लोबल इनिशिएटिव (Clinton Global Initiative) की वार्षिक बैठक में बोलते हुए, जिसमें पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाईडेन और बिल क्लिंटन भी शामिल थे, यूनुस ने बताया कि हसीना को हटाने के लिए बांग्लादेश में छात्रों का विरोध अपने आप नहीं हुआ था, बल्कि इसे पहले से योजनाबद्ध तरीके से आयोजित किया गया था।।[11]
इसके अलावा, राष्ट्रपति ट्रम्प ने हाल ही में आरोप लगाया कि बांग्लादेश में “राजनीतिक परिदृश्य को मजबूत करने” के लिए दी गई अमेरिकी वित्तीय सहायता का उपयोग हसीना के हटने के बाद एक कट्टरपंथी वामपंथी कम्युनिस्ट सरकार स्थापित करने के लिए किया गया था। उन्होंने खासतौर पर $29 मिलियन की फंडिंग की आलोचना करते हुए कहा, “29 मिलियन डॉलर राजनीतिक परिदृश्य को मजबूत करने और उन्हें समर्थन देने के लिए दिए गए, ताकि वे बांग्लादेश में कट्टरपंथी वामपंथी कम्युनिस्ट को वोट दे सकें। आपको यह देखना चाहिए कि उन्होंने वास्तव में किसका समर्थन किया।”[12]
भारत सरकार बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन में डीप-स्टेट की भागीदारी को लेकर ट्रम्प प्रशासन की स्पष्ट स्वीकृति का लाभ उठा सकती है। ट्रम्प द्वारा यूनुस शासन को कठपुतली सरकार कहकर कड़ी आलोचना करने से यह धारणा और मजबूत होती है कि उसकी लोकतांत्रिक वैधता संदिग्ध है। इससे यूनुस सरकार की विश्वसनीयता और कमजोर होती है, विशेष रूप से तब जब वह शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग कर रही है—जो एक लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेता थीं और जिन्हें एक योजनाबद्ध तख्तापलट के जरिए हटाया गया था। ट्रम्प प्रशासन का यह रुख भारत को बांग्लादेश के राजनीतिक हालात का आकलन कर अपनी आगे की रणनीति तय करने में कूटनीतिक बढ़त दिला सकता है।
बांग्लादेश-पाकिस्तान के बीच बढ़ता गठजोड़ और भारत के लिए इसके निहितार्थ
बांग्लादेश में यूनुस शासन ने पाकिस्तान के साथ अप्रत्याशित निकटता को बढ़ावा दिया है, जो क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव को दर्शाता है। पिछले कुछ महीनों में, दोनों देशों में कट्टरपंथी इस्लामिक गुटों के बीच संबंध मज़बूत हुए हैं, जिससे भारत के लिए चिंताएँ बढ़ गई हैं। इस नए गठबंधन को जनवरी में पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) की बांग्लादेश यात्रा द्वारा उजागर किया गया था, जिसके बाद बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान की यात्रा की, जहाँ उन्होंने देश के शीर्ष सैन्य नेतृत्व से मुलाकात की।[13]
इतिहास में, दोनों देशों के बीच उच्च स्तर की बातचीत बहुत कम हुई है। आखिरी बार किसी वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी ने 2009 में ढाका का दौरा किया था। इसलिए, हाल ही में बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ता राजनयिक और सैन्य सहयोग भारत के लिए चिंता का कारण बन गया है। खासकर इसलिए क्योंकि 1990 और 2000 के दशक में, पाकिस्तान ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में विद्रोही समूहों का समर्थन करने के लिए बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल किया था।[14]
शेख हसीना के नेतृत्व वाली पिछली सरकार की नीतियों की तुलना में यूनुस शासन के तहत बदलाव स्पष्ट है। हसीना के नेतृत्व में, बांग्लादेश ने भारत के साथ मज़बूत संबंधों को प्राथमिकता दी, जिससे व्यापक व्यापार, सुरक्षा सहयोग और बुनियादी ढांचे का विकास हुआ। इसके अतिरिक्त, उनकी सरकार ने सक्रिय रूप से चीन के साथ संबंधों को संतुलित किया, और भारत के साथ संबंधों को बनाए रखते हुए बांग्लादेश के हितों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धी सौदे हासिल किए। हालाँकि, पाकिस्तान इस समीकरण से काफी हद तक गायब रहा।[15]
इसके विपरीत, यूनुस प्रशासन बांग्लादेश के सामाजिक-आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने के बजाय पाकिस्तान के साथ सैन्य संबंधों को फिर से मजबूत करने पर अधिक ध्यान देता हुआ दिखाई दे रहा है। यह बदलाव इस आशंका को जन्म देता है कि ढाका धीरे-धीरे पाकिस्तान के डीप-स्टेट नेटवर्क के प्रभाव में आ सकता है, जिससे भविष्य में बांग्लादेश की धरती भारत विरोधी गतिविधियों के लिए उपयोग होने की संभावना बढ़ सकती है।
भारत की चिंताएँ बेवजह नहीं हैं। न्यूज़18 की एक रिपोर्ट भारत में उग्रवाद को बढ़ावा देने में पाकिस्तान और बांग्लादेश की भूमिका पर दोबारा विचार करती है। 2004 में, दक्षिण एशिया के इतिहास में सबसे बड़ी हथियारों की खेप चटगाँव बंदरगाह पर पकड़ी गई थी, जिसमें 1,500 से अधिक चीनी गोला-बारूद के डिब्बे बरामद किए गए थे, जिनकी अनुमानित कीमत 4.5-7 मिलियन डॉलर थी। हालाँकि ये हथियार चीन से आए थे, लेकिन इस पूरे ऑपरेशन के पीछे कथित रूप से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ था। रिपोर्ट के अनुसार, इस खेप का उद्देश्य भारत के उग्रवादी समूह यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम (उल्फा) को हथियारों की आपूर्ति करना था, जिससे भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में अस्थिरता पैदा की जा सके।[16]
द इंटरप्रेटर की एक रिपोर्ट में यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश की पाकिस्तान और भारत के साथ कूटनीतिक भागीदारी में भारी अंतर को उजागर किया गया है। यूनुस ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से दो बार मुलाकात की है, लेकिन अभी तक भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधी बातचीत नहीं की है। इसके अलावा, 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद पहली बार, विभिन्न वस्तुओं को लेकर दो पाकिस्तानी मालवाहक जहाज 2024 के अंत में बांग्लादेश के चटगाँव बंदरगाह पर पहुँचे।[17]
इन चिंताओं को देखते हुए, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ते संबंधों को संभालने के लिए एक ठोस और व्यापक रणनीति की जरूरत है, जो क्षेत्र की सुरक्षा को ध्यान में रखे।
अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध बनाना, खासकर जब ट्रम्प प्रशासन कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपना रहा है, दक्षिण एशिया में सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी प्रयासों को मजबूत करने में मदद कर सकता है। अगर अमेरिका की आतंकवाद विरोधी नीतियों के साथ भारत अपनी सुरक्षा चिंताओं को जोड़ता है, तो इससे बांग्लादेश की अस्थायी सरकार पर चरमपंथी गुटों के खिलाफ सख्त कदम उठाने का दबाव बनाया जा सकता है।
इसके अलावा, पश्चिमी देशों का दक्षिण एशिया को लेकर पक्षपातपूर्ण रवैया भी चिंता का विषय है। अमेरिका की खुफिया एजेंसियों ने पारंपरिक रूप से भारत के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए पाकिस्तान को समर्थन दिया है। हाल ही में बांग्लादेश में हुए राजनीतिक बदलावों ने इस क्षेत्र को अस्थिर करने और आंतरिक सुरक्षा के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी करने की आशंका बढ़ा दी है। हालाँकि, ट्रम्प प्रशासन ने ऐसी रणनीतियों से दूरी बनाए रखी है, लेकिन कुछ पश्चिमी देश अब भी अपने हितों को साधने के लिए दक्षिण एशिया की राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं।
क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के प्रति आत्मनिर्भर और दृढ़ दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि बांग्लादेश मामले से उत्पन्न सुरक्षा खतरों को पश्चिमी मान्यता पर अनावश्यक निर्भरता के बिना संबोधित किया जाए। जबकि पश्चिमी देश रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे वैश्विक संघर्षों पर निर्णायक रुख़ लेने के लिए भारत पर लगातार दबाव बनाते रहे हैं, जब बात दक्षिण एशिया के महत्वपूर्ण क्षेत्रीय घटनाक्रमों की आती है – जैसे कि अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा और बांग्लादेश में राजनीतिक परिवर्तन – तो यही पश्चिमी देश स्थिति से आँख मूँद लेते हैं। उभरते सुरक्षा परिदृश्य को लेकर एक सक्रिय प्रतिक्रिया क्षेत्रीय स्थिरता की रक्षा करने और दक्षिण एशिया में उभरती चुनौतियों का मुकाबला करने में मदद कर सकती है।
चीन का बढ़ता प्रभाव बांग्लादेश-पाकिस्तान समीकरण में एक महत्वपूर्ण कारक है। अतः विशेषज्ञों का मत है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों दक्षिण एशिया में नियंत्रण का विस्तार करने और भारत को संतुलित करने की व्यापक चीनी रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं।[18] इसे देखते हुए, बांग्लादेश की स्थिति के प्रति भारत का संतुलित दृष्टिकोण उसे मज़बूत संबंधों के लाभों को सुदृढ़ करने की अनुमति देता है, जिससे वह बांग्लादेश के आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए खुद को अधिक विश्वसनीय भागीदार के रूप में स्थापित कर सकता है।
बांग्लादेश स्थिति को संभालना – भारत का रणनीतिक दृष्टिकोण
भारत ने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को शरण देकर वहाँ के मौजूदा हालात के संदर्भ में अपने रवैये को लेकर एक मज़बूत भू-राजनीतिक संकेत दिया है, साथ ही यूनुस शासन द्वारा किए गए उनके प्रत्यर्पण के अनुरोध के खिलाफ कड़ा रुख बनाए रखा है। बांग्लादेश की अनिर्वाचित कार्यवाहक सरकार इस बात से भली भाँति परिचित है की उसकी अपनी कोई लोकतांत्रिक वैधता नहीं है। अतः वह इस इस बात से भी अनजान नहीं है कि भारत पर इस मामले में दबाव बनाने के लिए उसके पास पर्याप्त आधार नहीं है। इसके अलावा, 2013 की प्रत्यर्पण संधि के तहत भारत के पास हसीना के प्रत्यर्पण से इनकार करने के लिए कानूनी आधार हैं, जिसे 2016 में संशोधित किया गया था। अमेरिका की नवनिर्वाचित डोनाल्ड ट्रम्प सरकार के चलते, यूनुस शासन वाशिंगटन से बहुत कम समर्थन की उम्मीद कर सकता है, जिससे भारत की कूटनीतिक स्थिति और भी अधिक सशक्त होगी। इससे भारत को बांग्लादेशी नेतृत्व पर कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद पर नकेल कसने और हिंदू अल्पसंख्यकों की रक्षा करने के लिए दबाव डालने का शक्तिशाली आधार मिलता है।
परंतु यूनुस सरकार को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास दिलाने हेतु मात्र कूटनीति पर्याप्त नहीं है। अंतरिम सरकार भारत के पड़ोस में अस्थिरता पैदा करने के लिए डीप-स्टेट तंत्र द्वारा स्थापित एक कठपुतली शासन प्रतीत होती है। ऐसा लगता है कि यह भारत को बांग्लादेश में सैन्य हस्तक्षेप के लिए उकसाने हेतु आयोजित एक ऐसा कुत्सित प्रयास था जो अंततः विफल हो गया। यदि डीप स्टेट की यह साज़िश अपना काम कर जाती तो भारत बांग्लादेश के बीच रूस-यूक्रेन जैसा संघर्ष परिदृश्य हो सकता था। अगर यह प्रयास सफल होता, तो मोदी सरकार अस्थिर हो सकती थी, जिससे भारत एक ऐसा देश बन सकता था जो पश्चिमी प्रभाव के अधीन हो। हालांकि, भारत के रणनीतिक संयम ने इन भू-राजनीतिक चालों को विफल करते हुए, तनाव को बढ़ने से रोका। इन अपेक्षाओं के विपरीत, भारत ने स्थिति का उचित मूल्यांकन करते हुए इस परिस्थिति से उबरने हेतु सीधे टकराव के बजाय कूटनीतिक संवाद, रणनीतिक विचार-विमर्श और अंतर्राष्ट्रीय पैरवी का मार्ग अपनाया है।
भारत ने बांग्लादेश में हिंदुओं के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा के बारे में लगातार चिंता व्यक्त की है, और अंतरिम सरकार से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।[19] यूनुस शासन सहित अनेकों आंतरिक और बाहरी इकाइयों के उकसावे के बावजूद, भारत ने संयम बरता है। कार्यवाहक सरकार, अपने डीप स्टेट समर्थकों की नकल करते हुए, भारत के साथ बेहतर संबंध बनाने का दावा करती है, लेकिन साथ ही हिंदू उत्पीड़न की रिपोर्टों को भारतीय मीडिया और सरकार द्वारा “निहित प्रोपोगैंडा” बताकर खारिज कर देती है। नवंबर 2024 में, यूनुस ने बांग्लादेश में व्याप्त हिंदू विरोधी हिंसा को न सिर्फ़ कमतर आंक कर ख़ारिज किया, बल्कि इसे बांग्लादेश को अस्थिर करने के लिए डिज़ाइन किया गया “बढ़ा-चढ़ाकर किया गया प्रचार” तक कह डाला।[20]
फिर भी यूनुस शासन कूटनीतिक सदाचार का पाखंड करते हुए तनावपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों के लिए भारत को दोषी ठहरा रहा है। इसकी नवीनतम रणनीति में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) को पुनर्जीवित करना शामिल है, जो भारत-पाकिस्तान तनाव के कारण लंबे समय से स्थगित एक पहल है। SAARC को लेकर बांग्लादेश का अति उत्साहित रवैया उसके व्यापक एजेंडे को दर्शाता है – घरेलू अस्थिरता से ध्यान हटाना और अपने आंतरिक संकटों को दूर करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को उकसाना।[21]
यूनुस शासन वैश्विक डीप-स्टेट के हितों से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है, जिसमें हर नीतिगत कदम का उद्देश्य भारत को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करना है। हालाँकि, भू-राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है। पश्चिम में दक्षिणपंथी सरकारों का उदय डीप-स्टेट नेटवर्क के प्रभाव को चुनौती दे रहा है, जिससे दक्षिण एशियाई मामलों को नियंत्रित करने की उनकी क्षमता सीमित हो रही है, जिस प्रकार से वे पहले करते थे।
मुख्यधारा के पश्चिमी और चीनी मीडिया बांग्लादेश की भारत विरोधी बयानबाज़ी को दोहराते रहते हैं, जो वर्तमान में चल रहे एक बड़े भू-राजनीतिक संघर्ष को रेखांकित करता है। यूनुस शासन की स्थापना का उद्देश्य संभवतः मोदी सरकार को कमज़ोर करना था, और जब वह विफल हो गया, तो इसका दूसरा उद्देश्य भारत के लिए आंतरिक और बाहरी चुनौतियाँ उत्पन्न करना था। यद्यपि चीन शेख़ हसीना के तख्तापलट में सीधे तौर पर शामिल नहीं था, लेकिन अब वह बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता का भरपूर लाभ उठाने की स्थिति में है। भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखने वाली बांग्लादेशी सरकार चीन और पश्चिम दोनों के हितों की पूर्ति करती है – इससे बीजिंग को दक्षिण एशिया में रणनीतिक तौर पर अपने पैर जमाने का मौक़ा मिलता है, और पश्चिमी शक्तियों को भारत के क्षेत्रीय समीकरणों पर अपना प्रभाव बनाए रखने का अवसर मिलता है।
बांग्लादेश में जनता की बदलती भावनाओं और पार्टी की घटती लोकप्रियता को देखते हुए निकट भविष्य में शेख हसीना की अवामी लीग के सत्ता में लौटने की संभावना अनिश्चित प्रतीत होती है। उनकी सरकार को बहाल करने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, व्यापक प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि बांग्लादेश जल्द से जल्द स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की ओर बढ़े।
युनुस शासन का दीर्घकालीन सुदृढ़ीकरण बहुत सी क्षेत्रीय चुनौतियों को प्रस्तुत करता है, विशेष रूप से अल्पसंख्यक अधिकारों और लोकतांत्रिक शासन से संबंधित। संयुक्त राष्ट्र सहित अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न के बारे में जागरूकता बढ़ाने से इस मुद्दे पर वैश्विक ध्यान आकर्षित हो सकता है। इसके अतिरिक्त, कार्यवाहक सरकार की अलोकतांत्रिक प्रकृति के बारे में चिंताओं को उजागर करने से इसकी अंतर्राष्ट्रीय वैधता प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा, वैश्विक मंच पर यूनुस शासन के राजनीतिक रुख में व्याप्त विसंगतियों को संबोधित करना व्यापक भू-राजनीतिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण पहलू बना हुआ है। भारत सरकार ने इस दिशा में पहले ही कदम उठा लिए हैं, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में बांग्लादेश के नेताओं को भारत के ख़िलाफ़ उनके निराधार आरोपों के लिए आड़े हाथों लिया। ओमान में अपने बांग्लादेशी समकक्ष तौहीद हसन के साथ हुई एक बैठक के कुछ दिन पश्चात, जयशंकर ने अंतरिम सरकार के दावों को “बिल्कुल हास्यास्पद” बताते हुए खारिज कर दिया, उन्होंने कहा:[22]
“अगर हर दिन अंतरिम सरकार में कोई खड़ा होकर हर चीज के लिए भारत को दोषी ठहराता है… अगर आप रिपोर्ट देखें तो उनमें से कुछ चीजें बिल्कुल हास्यास्पद हैं। आप एक तरफ यह नहीं कह सकते कि ‘मैं अब आपके साथ अच्छे संबंध रखना चाहता हूं’, लेकिन मैं हर सुबह उठता हूं और हर गलत चीज के लिए आपको दोषी ठहराता हूं। यह एक ऐसा निर्णय है जो उन्हें लेना ही होगा।“[23]
इस प्रकार, भारत यूनुस शासन के निरंतर उकसावे के बावजूद किसी भी अतिवादी या जल्दबाज़ी वाली कार्रवाई से बचते हुए, एक संतुलित और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाता हुआ दिखाई देता है। आवेगपूर्ण तरीके से प्रतिक्रिया करने के बजाय, उसे बांग्लादेश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की आवश्यकता पर ज़ोर देने के लिए ट्रम्प प्रशासन के साथ अपने मज़बूत संबंधों का लाभ उठाना जारी रखना चाहिए। यूनुस शासन के भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैये और कट्टरपंथी इस्लामिक चरमपंथ के साथ उसके बढ़ते जुड़ाव को देखते हुए, अमेरिका के साथ निरंतर कूटनीतिक सांझेदारी इन खतरों का मुकाबला करने और क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण होगी।
निष्कर्ष
बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों की दुर्दशा लंबे समय से भारत के लिए चिंता का विषय रही है। हालाँकि, इस मुद्दे को हल करने के प्रयासों को देश के भीतर कुछ वैचारिक गुटों से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है, जो अक्सर डीप स्टेट वैश्विक हितों से जुड़े होते हैं। यह ट्रेंड सीएए विरोधी प्रदर्शनों में स्पष्ट तौर पर दिखाई दिया , जिसका उद्देश्य इन देशों के सताये गये अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने के लिए बनाए गए कानून को बाधित करना था।
पाकिस्तान पहले से दक्षिण एशिया में लगातार चुनौतियाँ पेश कर रहा है, इसके साथ ही बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट से एक नया सुरक्षा खतरा पैदा हो गया है। यूनुस शासन का भारत के प्रति खुली शत्रुतापूर्ण रवैया, कट्टरपंथी इस्लामिक तत्वों का तुष्टिकरण और पाकिस्तान के साथ उसकी बढ़ती निकटता, एक जटिल चुनौती पेश करते हैं। इस स्थिति को रणनीतिक सटीकता के साथ प्रबंधित करना यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि बांग्लादेश स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के माध्यम से लोकतांत्रिक शासन की ओर बढ़े।
यदि भू-राजनीतिक तौर पर देखा जाये तो इस मामले में भारत का पलड़ा कुछ भारी है। कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ ट्रम्प प्रशासन का सख्त रुख भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं के अनुरूप है। बांग्लादेश में जो स्थिति बन रही है, उसका मुकाबला करने के लिए भारत इस संरेखण का कितना प्रभावी ढंग से लाभ उठाता है, यह आने वाले महीनों में उसकी कूटनीतिक और रणनीतिक सूझबूझ की एक महत्वपूर्ण परीक्षा होगी।
संदर्भ सूची
[1] Bangladesh Hindu News – UN report exposes Yunus on attacks on Hindus in Bangladesh – India Today; https://www.indiatoday.in/world/story/un-human-rights-report-exposes-muhammad-yunus-attacks-on-hindu-minority-bangladesh-2679359-2025-02-13
[2] United. Nations Human Rights Fact-Finding Report; https://www.ohchr.org/sites/default/files/documents/countries/bangladesh/ohchr-fftb-hr-violations-bd.pdf
[3] Ibid.
[4] Bangladesh: UN report finds brutal, systematic repression of protests,calls for justice for serious rights violations | OHCHR; https://www.ohchr.org/en/press-releases/2025/02/bangladesh-un-report-finds-brutal-systematic-repression-protests-calls
[5] Recognise ‘Hinduphobia’ and violence against Buddhists, Sikhs too: Indian envoy to U.N. – The Hindu; https://www.thehindu.com/news/national/recognise-hinduphobia-and-violence-against-buddhists-and-sikhs-too-indian-envoy-to-un/article38295761.ece
[6] Press Release: Press Information Bureau; https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=2103037
[7] ‘One-Sided, Misleading’: Pakistan Reacts To Bold India-US Joint Statement On Cross-Border Terrorism – News18; https://www.news18.com/world/one-sided-misleading-pakistan-reatcs-to-bold-india-us-joint-statement-on-cross-border-terrorism-9227332.html
[8] “No Role For Deep State, Leave It To PM Modi” – Trump On Bangladesh Crisis; https://www.ndtv.com/world-news/no-role-for-deep-state-leave-it-to-pm-narendra-modi-says-donald-trump-on-bangladesh-crisis-7711092
[9] US Suspends Funding To Bangladesh After Trump Orders 90-Day Freeze On All Foreign Aid – News18; https://www.news18.com/world/us-suspends-funding-to-bangladesh-after-trump-orders-90-day-freeze-on-all-foreign-aid-9203998.html
[10] US suspends all funding to Bangladesh under USAID; https://www.opindia.com/2025/01/us-suspends-all-funding-to-bangladesh-under-usaid/
[11] Hasina’s Ouster Planned’: Muhammad Yunus Admits Plot Behind Bangladesh Upheaval, Names Mastermind – News18; https://www.news18.com/world/bangladeshs-yunus-reveals-who-masterminded-ex-pm-sheikh-hasinas-ouster-at-event-hosted-by-biden-clinton-9063535.html
[12] $29 million goes to Bangladesh to Bring Radical Left in Power: Trump Questions USAID Funding Again | Republic World; https://www.republicworld.com/world-news/usaid-funding-29-million-goes-to-bangladesh-to-bring-radical-left-in-power-trump-questions-again
[13] Red flags in Delhi as a 4-member ISI team from Pak makes a quiet visit to Dhaka | World News – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/world-news/isi-team-in-dhaka-less-than-a-week-after-top-bangladesh-general-s-visit-to-pakistan-101737633641253.html
[14] Ibid.
[15] Bangladesh, China sign 21 agreements, MoU as PM Hasina meets President Xi – The Hindu; https://www.thehindu.com/news/international/bangladesh-china-sign-21-agreements-mou-as-pm-hasina-meets-president-xi/article68390283.ece
[16] Straight Talk | Bangladesh And Pakistan Are Cosying Up As Dhaka Defies India’s Red Lines – News18; https://www.news18.com/opinion/straight-talk-bangladesh-and-pakistan-are-cosying-up-as-dhaka-defies-indias-red-lines-9126301.html
[17] Straight Talk | Bangladesh And Pakistan Are Cosying Up As Dhaka Defies India’s Red Lines – News 18; https://www.news18.com/opinion/straight-talk-bangladesh-and-pakistan-are-cosying-up-as-dhaka-defies-indias-red-lines-9126301.html
[18] Bangladesh’s risky bet on Pakistan: Pawn in China’s strategic game? – World News – The Financial Express; https://www.financialexpress.com/world-news/bangladeshs-risky-bet-on-pakistan-pawn-in-chinas-strategic-game/3726997/
[19] Cannot Dismiss As Media Exaggeration’: MEA Condemns Violence Against Hindus In Bangladesh, Seeks Action From Yunus Government; https://swarajyamag.com/news-brief/cannot-dismiss-as-media-exaggerations-mea-condemns-violence-against-hindus-in-bangladesh-seeks-action-from-yunus-government
[20] Bangladesh Chief Advisor Muhammad Yunus calls attacks on Hindus ‘exaggerated propaganda’ – India Today; https://www.indiatoday.in/world/story/bangladesh-chief-advisor-muhammad-yunus-attacks-hindus-exaggerated-propaganda-2634937-2024-11-18
[21] India – Bangladesh ties – Bangladesh seeks India’s backing to revive SAARC: Bangladesh seeks India’s support to revive Saarc – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/bangladesh-muhammad-yunus-government-india-support-saarc-revival-2681647-2025-02-18
[22] Ridiculous’: S Jaishankar calls out Bangladeshi leaders for ‘blaming’ India for everything | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/ridiculous-s-jaishankar-calls-out-bangladeshi-leaders-for-blaming-india-for-everything-101740454984419.html
[23] ibid.
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