ऑपरेशन सिंदूर: जिहादी आतंकवाद के ख़िलाफ़ भारत का प्रचंड प्रहार
- “ऑपरेशन सिंदूर” का नाम पीड़ितों की हिंदू पहचान और हिंदू विवाहित महिलाओं के लिए गर्व के प्रतीक सिंदूर के गहरे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है।
- ऑपरेशन सिंदूर का तेज़ी से योजनाबद्घ और कार्यान्वित किए जाना भारत की आतंकवाद विरोधी रणनीति में एक निर्णायक विकास को दर्शाता है।
- ऑपरेशन सिंदूर को लेकर भारत के लिए विश्व की एक संतुलित और नपी तुली वैश्विक प्रतिक्रिया देखने को मिली है, परंतु । हालांकि अभी भी वैश्विक समुदाय खुलकर भारत के आत्मरक्षा के अधिकार का स्पष्ट रूप से समर्थन करता नहीं दिख रहा है।
- वाम-उदारवादी मीडिया आउटलेट्स के अथक प्रोपेगंडा के बावजूद भारत इस प्रचार युद्ध में दृढ़ता से अपनी पोज़ीशन पर कायम है।
7 मई को भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा शुरू किया गया ‘ऑपरेशन सिंदूर’—22 अप्रैल 2025 को कश्मीर के पहलगाम में हुए पाकिस्तानी आतंकवादी हमले का निर्णायक और लक्षित प्रत्युत्तर था। इस ऑपरेशन के पहले चरण में उन ठिकानों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया, जिनका इस्तेमाल लंबे समय से भारत के खिलाफ आतंकी साजिशें रचने और हमलों का संचालन करने के लिए किया जा रहा था। भारत की यह प्रतिक्रिया संतुलित और संयमित रही—इसका हर पहलू यह सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया था कि किसी भी पाकिस्तानी सैन्य ठिकाने या आम नागरिक क्षेत्र को नुकसान न पहुंचे। इससे भारत की न्यायप्रियता और अनावश्यक उकसावे से दूर रहने की नीति स्पष्ट रूप से उजागर होती है।[1]
एक अभूतपूर्व सैन्य अभियान के अन्तर्गत, भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर के अंदर नौ अलग-अलग स्थानों पर हमला किया, जिसमें लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) जैसे आतंकवादी संगठनों के ठिकाने शामिल थे। बताया जाता है कि शुरुआती चरण में कम से कम 100 आतंकवादियों को मार गिराया गया,[2] जिसमे सटीक हथियारों का इस्तेमाल करते हुए 25 मिनट तक एक साथ क्रियाशील हमले किये गए।[3]
हिंदू पारिवारिक मूल्यों की पवित्रता और शुद्धता के पावन प्रतीक और एक विवाहित महिला की पहचान के अभिन्न अंग सिंदूर का आह्वान करके, ऑपरेशन सिंदूर पहलगाम हत्याकांड को लेकर भारत की सभ्यतागत प्रतिक्रिया के रूप में खड़ा हुआ, जहाँ 26 हिंदुओं को बेरहमी से मार दिया गया था, जिनमें से कुछ को उनकी पत्नियों की आँखों के सामने निर्ममता से मार दिया गया था। इस संदर्भ में ऑपरेशन का नाम एक सीधा और साफ़ संदेश देता है: यह हमले के पीड़ितों की हिंदू पहचान को स्वीकार करता है और सिंदूर के माध्यम से हिंदू नारी की गरिमा, श्रद्धा और पवित्र रिश्ते के सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व को सामने लाता है।
“ऑपरेशन सिंदूर” उस छद्म नारीवादी आख्यान को भी करारा झटका है जो पवित्र हिंदू परंपराओं को पितृसत्ता और महिला दमन से ग़लत तरीक़े से जोड़कर चित्रित करता है। भारत के लिए, सिंदूर का महत्व न केवल एक सांस्कृतिक चिह्न के रूप में है, बल्कि यह संगठित राष्ट्रीय पहचान और बुराई के खिलाफ प्रतिरोध का एक शक्तिशाली प्रतीक है, जो भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना में “शक्ति” की केंद्रीय भूमिका को उजागर करता है। दो महिला सैन्य अधिकारियों, कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह, की शानदार उपस्थिति जिहादी आतंकी नेटवर्क को एक प्रतीकात्मक झटका देती है, और एक ऐसी जगह चोट पहुँचाती है, जहां घाव का असर सबसे ज़्यादा हो। ऑपरेशन सिंदूर की यह सांकेतिक पृष्ठभूमि भारत के महिला सशक्तिकरण के मॉडल और विविधता में एकता के उसके स्थायी लोकाचार का एक अद्वितीय नमूना है जो पाकिस्तान की कट्टरपंथी इस्लामिस्ट मशीनरी के ज़हरीले विमर्श के बिलकुल उलट है।
अपनी प्राचीन सांस्कृतिक चेतना के पुनरुत्थान के साथ, भारत अब अपनी सभ्यतागत शर्तों पर दुनिया के साथ जुड़ रहा है। भारत की भू-राजनीतिक दृढ़ता इसके हिंदू जागरण के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। इसीलिए ऑपरेशन सिंदूर को केवल एक सामरिक सैन्य प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि तेज़ी से बदलती वैश्विक व्यवस्था में एक साहसिक सभ्यतागत बयान के रूप में देखा जाना चाहिए।
जिस तत्परता से पहलगाम हमलों का बदला लिया गया है, वह हिंदू मुद्दों को संबोधित करने के मामले में नेतृत्व की प्राथमिकताओं में बदलाव का भी संकेत देता है।
आतंकवाद के ख़िलाफ़ भारत की प्रतिक्रिया में एक नया युग
ऐसा लगता है कि भारत उस समय से बहुत आगे निकल आया है जब वह मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को खुश करने और संवाद और कूटनीति में सद्गुणों का प्रदर्शन करने पर ध्यान केंद्रित करता था। न्यूज़18 द्वारा प्रकाशित एक लेख में[4] पिछले दो दशकों में आतंकवाद के प्रति भारत की प्रतिक्रिया में महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव के बारे में विस्तार से बताया गया है। पहलगाम आतंकी हमलों के बाद की गई निर्णायक कार्रवाई और 26/11 के मुंबई हमलों के प्रति संयमित प्रतिक्रिया के बीच एक तीव्र अंतर दर्शाते हुए, लेख में कहा गया है कि 26/11 के आतंकवादियों में से एक अजमल कसाब के जीवित पकड़े जाने के बावजूद, तत्कालीन सरकार ने पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने तक ही सीमित रखा, और जवाबी कार्रवाई में बहुत कम रुचि दिखाई। नागरिकों की हत्या और बंदूक की नोक पर लोगों को बंधक बनाए जाने के बावजूद भी वह “शांति” और “भाईचारे” का घिसा पिटा राग अलापती रही।
पहले की कमजोर नीतियों के बजाय, अब भारत ने पहलगाम हमलों के बाद एक मजबूत और सोच-समझकर किया गया कदम उठाया है। इसमें सेना, विदेश नीति और आर्थिक दबाव जैसे उपायों का संतुलित इस्तेमाल किया गया है, ताकि पाकिस्तान को दुनिया में अकेला किया जा सके, उसकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचे और आतंकवाद के पूरे ढांचे को खत्म किया जा सके।
पहलगाम हमलों और ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत के बीच भारत ने एक मजबूत और स्पष्ट रुख अपनाया है — पाकिस्तान की सेना और आतंकियों की मिलीभगत को बेनकाब किया है, और जरूरत पड़ने पर आतंकवाद को लेकर पश्चिमी देशों की दोहरी नीति को भी सामने लाया है। ऑपरेशन सिंदूर से पहले के दिनों में, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यूरोपीय देशों की उनके दोगलेपन की सार्वजनिक रूप से आलोचना करते हुए,[5] कहा, “जब हम दुनिया को देखते हैं… तो हम भागीदारों की तलाश करते हैं। हम उपदेशकों की तलाश नहीं करते, खासकर ऐसे उपदेशकों की जो विदेश में जो उपदेश देते हैं, उसे घर पर नहीं अपनाते। और मुझे लगता है कि यूरोप का कुछ हिस्सा अभी भी उस समस्या से जूझ रहा है। हालाँकि इस रवैये में कुछ बदलाव तो आ रहा है।”
हालांकि जयशंकर की यह टिप्पणी एक विशिष्ट प्रश्न के जवाब में की गई थी, लेकिन पहलगाम आतंकी हमलों पर पश्चिम की पाखंडी प्रतिक्रिया के मद्देनजर यह बेहद महत्वपूर्ण है।[6] जबकि पश्चिमी देश पाकिस्तान को खुश करने के अपने पहले के रुख के तयशुदा ढाँचे से कुछ हद तक बाहर निकल चुके हैं, वे भारत और पाकिस्तान को एक ही पायदान पर रखना जारी रखते हैं। उन्हें परस्पर संवाद और जुड़ाव के लिए बार-बार आह्वान करते हैं, जबकि वास्तविकता को आज भी अनदेखा कर देते हैं कि भारत एक लोकतंत्र है जो लंबे समय से पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद का शिकार रहा है। अपराधी को पीड़ित के बराबर मानना न केवल सच्चाई को विकृत करता है, बल्कि न्याय को भी कमज़ोर करता है।
पहलगाम हमलों के बाद भारत ने दुनिया में समर्थन जुटाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का प्रभावी इस्तेमाल किया है। भारत ने प्रमुख वैश्विक शक्तियों के सामने साफ़ कहा कि अपने नागरिकों की हत्या का जवाब देना उसका संप्रभु अधिकार है। इन लगातार प्रयासों का असर अब साफ़ दिखने लगा है। पाकिस्तान धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़ता जा रहा है जिसका ताज़ा उदाहरण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान की हालिया हार है, जो भारत की बहुपक्षीय रणनीति की सफलता को दर्शाता है।
5 मई को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव पर एक बंद कमरे में बैठक की। यह बैठक पाकिस्तान के अनुरोध पर बुलाई गई थी, जो इस समय परिषद का गैर-स्थायी सदस्य है। लेकिन पाकिस्तान का यह दांव उल्टा पड़ गया। पहलगाम हमलों को लेकर उसने जो झूठा प्रचार फैलाने की कोशिश की, उसे सदस्य देशों ने गंभीर संदेह की नज़र से देखा। उसे न तो कोई समर्थन मिला, और न ही अपने मकसद में सफलता। इसके बजाय, पाकिस्तान को लश्कर-ए-तैयबा की इस हमले में कथित भूमिका को लेकर तीखे सवालों का सामना करना पड़ा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि सुरक्षा परिषद के अधिकांश सदस्यों ने पहलगाम में हुए नरसंहार की कड़ी निंदा की और पाकिस्तान से जवाबदेही की मांग की। इससे न सिर्फ पाकिस्तान की ‘पीड़ित देश’ वाली छवि को झटका लगा, बल्कि भारत को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक जीत भी हासिल हुई।[7]
वैश्विक दृष्टिकोण में बदलाव
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अमेरिका ने खुलकर पाकिस्तान का पक्ष लिया। उसने तानाशाह याह्या खान की सैन्य सरकार का समर्थन किया और लोकतांत्रिक भारत को दबाव में लाने के लिए अपना 7वां नौसैनिक बेड़ा भेजा। हालांकि युद्ध में भारत को निर्णायक जीत मिली और बांग्लादेश का जन्म हुआ, लेकिन अमेरिका की इस पक्षपातपूर्ण भूमिका से भारत-अमेरिका संबंधों को उस समय गहरा झटका लगा।[8]
पचपन साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज भारत और अमेरिका के बीच आज़ादी के बाद के दौर के सबसे मजबूत द्विपक्षीय रिश्ते हैं। ये रिश्ते रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और तकनीक जैसे कई क्षेत्रों में फैली एक व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी पर आधारित हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल के दौरान दोनों देशों ने आतंकवाद, खासकर कट्टरपंथी इस्लामी चरमपंथ, के खिलाफ मिलकर लड़ने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।[9] 26/11 मुंबई हमलों के पीछे के मास्टरमाइंडों में से एक तहव्वुर राणा को प्रत्यर्पित करने के अमेरिकी फैसले ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ वाशिंगटन के कड़े रुख को और रेखांकित किया और सीमा पार आतंकवाद फैलाने में उसकी भूमिका को लेकर पाकिस्तान को एक कड़ा संदेश दिया।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद, राष्ट्रपति ट्रम्प और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस सहित अमेरिकी नेताओं द्वारा कई बयान जारी किए गए हैं। हालाँकि इन टिप्पणियों ने काफी हद तक तटस्थ स्वर अपनाया है, लेकिन उनकी प्रकृति उस समय के मुक़ाबले एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती है, जब ऐसी स्थिति में अमेरिका चुपचाप पाकिस्तान का समर्थन कर सकता था। एक उल्लेखनीय टिप्पणी में, उपराष्ट्रपति वेंस ने कहा कि हालाँकि अमेरिका दोनों पक्षों को तनाव कम करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है, “हम एक ऐसे युद्ध के बीच में शामिल नहीं होने जा रहे हैं जिसका मूल रूप से हमसे कोई लेना देना नहीं है और इसका अमेरिका की इसे नियंत्रित करने की क्षमता से कोई लेना-देना नहीं है।”[10]
इस बार पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान को खुला समर्थन नहीं दिया और मौजूदा संघर्ष में तटस्थ बने रहे — यह भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक सफलता है। पहले ऐसी स्थितियों में अक्सर पश्चिम भारत पर परोक्ष दबाव बनाता था, कभी प्रतिबंधों की धमकी देकर और कभी तनाव कम करने की सारी ज़िम्मेदारी भारत पर डालकर। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। फिर भी, कई पश्चिमी देश अब भी औपनिवेशिक सोच में फंसे हुए हैं और भारत के बदले हुए वैश्विक दर्जे को पूरी तरह स्वीकार करने में झिझकते हैं। वे भारत और पाकिस्तान को एक ही स्तर पर रखने की पुरानी आदत से बाहर नहीं आ पा रहे, जो भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और एक जिम्मेदार लोकतंत्र के रूप में उसकी छवि को नज़रअंदाज़ करता है।
इज़राइल को छोड़कर कुछ ही प्रमुख शक्तियाँ हैं जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत के आत्मरक्षा के अधिकार का खुलकर समर्थन किया है। फ्रांस ने भले ही भारत की आतंकवाद से सुरक्षा की जरूरत को स्वीकार किया, लेकिन इसके तुरंत बाद उसने दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील कर दी, जिससे उसका समर्थन कमजोर सा लगने लगा। वहीं ब्रिटेन की प्रतिक्रिया और भी अधिक अस्पष्ट रही; उसने भारत और पाकिस्तान, दोनों से संयम बरतने और बातचीत के ज़रिए समाधान खोजने की बात कही, लेकिन आतंकवादी हमले, जिसने ऑपरेशन की शुरुआत की, उसका ज़िक्र तक नहीं किया गया। यह कूटनीतिक रवैया भारत की स्थिति की गंभीरता को नजरअंदाज़ करने जैसा है।[11]
हालांकि कई पश्चिमी सांसदों ने स्वतंत्र रूप से आतंकवाद के ख़िलाफ़ भारत के सख्त रुख का पुरजोर समर्थन किया है। इनमें ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक, कंजर्वेटिव सांसद बॉब ब्लैकमैन, शैडो फॉरेन सेक्रेटरी प्रीति पटेल और डच सांसद गीर्ट वाइल्डर्स शामिल हैं – इन सभी ने स्पष्ट रूप से भारत के अपने नागरिकों की रक्षा करने के संप्रभु अधिकार की पुष्टि की है। [12] [13] [14]
भारत का बढ़ता आर्थिक और वाणिज्यिक प्रभाव भारत-पाकिस्तान संघर्ष के संदर्भ में वैश्विक प्रतिक्रियाओं को तेज़ी से आकार दे रहा है। इसका एक प्रमुख उदाहरण हाल ही में यू के के साथ किया गया मुक्त व्यापार समझौता (FTA) है – ऑपरेशन सिंदूर के आरंभ होने से कुछ ही घंटे पहले इसकी घोषणा की गयी।[15] अब चाहे यह पूर्व निर्धारित रणनीतिक सोच के तहत किया गया हो या महज़ एक संयोग हो, इस समझौते के टाइमिंग का स्पष्ट प्रतीकात्मक महत्व है। इसने रणनीतिक दूरदर्शिता और आंतरिक स्थिरता का संदेश दिया, जिसने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को संकेत दिया कि भारत सुरक्षा चुनौतियों के बीच भी केंद्रित, सक्षम और आर्थिक रूप से दूरदर्शी बना हुआ है।
यह विरोधाभास वाकई चौंकाने वाला है। एक ओर ऐसा देश है जो आतंकवादियों को शरण देता है, जिसकी अर्थव्यवस्था ढह रही है, जनता रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए जूझ रही है, और जिसकी सेना के शीर्ष अधिकारी भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आरोपों में घिरे हैं। ऐसा लगता है कि उसका अस्तित्व ही भारत का विरोध करने और उसे अस्थिर करने के लिए है। दूसरी ओर भारत है—एक स्थिर और लोकतांत्रिक राष्ट्र, जो तमाम चुनौतियों के बीच भी शांति से अपनी कूटनीतिक और रणनीतिक नीतियाँ चला रहा है। इन दोनों के बीच का यह साफ अंतर वैश्विक समुदाय की सोच को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा कि वह ऑपरेशन सिंदूर को किस नज़र से देखता है।
इस लेख के लिखे जाने तक भारत और पाकिस्तान पूर्ण और तत्काल युद्ध विराम पर सहमत हो गए हैं। जबकि अमेरिका ने समझौते को सुगम बनाने का श्रेय लिया है, भारत की आधिकारिक ब्रीफिंग में अमेरिका की किसी भी भागीदारी का कोई उल्लेख नहीं किया गया।[16] ये घटनाक्रम तब सामने आए हैं जब भारत सरकार ने यह घोषणा करके एक नई मिसाल कायम की है कि उसकी धरती पर भविष्य में होने वाले किसी भी आतंकवादी हमले को एक युद्ध घोष (act of war) माना जाएगा – यह सीमा पार आतंकवाद के ख़िलाफ़ उसके सख्त रुख का स्पष्ट संकेत है।[17]
भारत वैश्विक मीडिया विकृतियों का सामना कैसे कर रहा है
ऑपरेशन सिंदूर के बाद, एलीट पश्चिमी मीडिया के एक वर्ग ने एक बार फिर भारत के ख़िलाफ़ प्रोपेगंडा अभियान चलाया – पक्षपातपूर्ण और भ्रामक कवरेज पेश करते हुए भारत को आक्रांता के रूप में चित्रित किया, जबकि आतंकवादी नेटवर्क के केंद्र के रूप में पाकिस्तान की भूमिका को कम करके आंका या अनदेखा किया, इसके बावजूद कि उसके आतंकवादी गतिविधियों में खुलेआम लिप्त होने को लेकर कितने ही प्रमाण मौजूद हैं।
ऑपरेशन सिंदूर के शुरुआती कवरेज में बीबीसी ने बताया, “भारत ने कहा कि उसने रात भर के ऑपरेशन में पाकिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में नौ जगहों पर मिसाइल और हवाई हमले किए, जिसमें उसने ‘विश्वसनीय ख़ुफ़िया जानकारी’ के आधार पर जिनको वो मिलिटेंट ठिकाने कहता है, उनपर निशाना साधा।”[18] बीबीसी ने अपने अंदाज में एक बार फिर अपनी जानी-पहचानी संपादकीय लाइन को अपनाया- आतंकवादियों को “उग्रवादी” या मिलिटेंट कहा और पाकिस्तान के जिहादी आतंकी तंत्र की प्रभावी ढंग से लीपापोती की।
द वाशिंगटन पोस्ट ने अपने शीर्षक के साथ भारत को बड़ी ही चतुरता से एक आक्रांता के रूप में पेश किया: “भारत ने कश्मीर हमले के बाद पाकिस्तान पर हमला किया, जिससे युद्ध की आशंका बढ़ गई।” वोक संपादकीय रणनीति का पूरी तरह पालन करते हुए, उसने आतंकवादी हमले को सिर्फ “उग्रवादी हमला” कहकर कमज़ोर बना दिया और पूरे मामले को दो “परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों” के बीच बढ़ते तनाव के रूप में पेश किया। इस तरह उसने भारत और पाकिस्तान के बीच एक भ्रामक तुलना खड़ी कर दी, जबकि पाकिस्तान की आतंकवाद को समर्थन देने वाली भूमिका का कोई सीधा ज़िक्र तक नहीं किया गया।[19] डॉयचे वेले, ब्लूमबर्ग और ग्लोबल टाइम्स जैसे अन्य वैश्विक आउटलेट्स ने अपने कवरेज में इसी तरह का पैटर्न अपनाया – सावधानीपूर्वक “आतंकवादी” शब्द से परहेज किया, पाकिस्तानी प्रोपेगंडा को बड़ी ही चालाकी से वैध बनाया और भारत द्वारा लक्षित जिहादी बुनियादी ढांचे की सच्चाई उजागर करने से इनकार किया।[20]
भारत के खिलाफ वामपंथी-उदारवादी तंत्र द्वारा चलाया जा रहा दुष्प्रचार कोई नई बात नहीं है। लेकिन बीते दशक में जो बात बदली है, वह है भारत की मुखर और आत्मविश्वास से भरी प्रतिक्रिया। आज का भारत अपनी हिंदू पहचान को लेकर आश्वस्त है और दुनिया के सामने अपनी सांस्कृतिक कहानी को नए सिरे से गढ़ रहा है। अब वह अंतरराष्ट्रीय मीडिया के पक्षपाती रवैये का मूक दर्शक नहीं है, बल्कि उसकी चुनौतियों का सक्रिय रूप से जवाब दे रहा है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत का यह नया और आत्मविश्वास से भरा रुख साफ़ दिखाई देता है। वामपंथी-उदारवादी मीडिया संस्थानों द्वारा लगातार फैलाए जा रहे दुष्प्रचार के बावजूद भारत अपनी बात मज़बूती से रख रहा है — वह नियमित रूप से आधिकारिक ब्रीफिंग जारी कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग की खुलकर आलोचना कर रहा है। खासतौर पर बीबीसी द्वारा आतंकियों को “उग्रवादी” कहने पर भारत ने सख्त आपत्ति जताई और चेतावनी दी कि भविष्य में उसकी रिपोर्टिंग पर नज़र रखी जाएगी।[21] इसके अलावा, भारत ने चीनी सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स की भी सार्वजनिक रूप से आलोचना की, जो भ्रामक सूचनाएँ फैला रहा था, और उसे रिपोर्ट प्रकाशित करने से पहले तथ्यों की पुष्टि करने और स्रोतों को क्रॉस-चेक करने की सलाह दी।[22] साथ ही, भारतीय नेटिज़न्स ने द हिंदू जैसे घरेलू वामपंथी मीडिया आउटलेट्स की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग को सक्रिय रूप से चुनौती दी, व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उनके पूर्वाग्रह और दोहरे मानदंडों को उजागर किया।[23] [24]
भारत अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक मूल्यों में रचे-बसे एक नए और भव्य आख्यान को सामने ला रहा है, जो वैश्विक विमर्श के दिशा को बदल रहा है। अब वह पश्चिमी नजरिए से परिभाषित होने को लेकर संतुष्ट नहीं है, बल्कि समाज, राजनीति, विकास, अर्थव्यवस्था और संस्कृति से जुड़े पुराने पश्चिमी नैरेटिव्स को सीधे चुनौती दे रहा है।[25] ऐसा करते हुए भारत उन नव-औपनिवेशिक सोचों को भी सवालों के घेरे में ला रहा है जो अब तक भारत की वैश्विक छवि को तय करती रही हैं। वह अब अपना खुद का विचार प्रतिमान, अपनी आवाज़ के साथ, दुनिया के सामने रख रहा है। ऑपरेशन सिंदूर केवल पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर एक रणनीतिक कार्रवाई नहीं है—यह भारत के बदलते सभ्यतागत दृष्टिकोण और आत्मविश्वास का भी प्रतीक है।
समापन विचार
भारत सावित्री की भूमि है – वह पतिव्रता जिसका प्रेम, भक्ति, बुद्धिमत्ता और साहस युगों से प्रतिध्वनित होता आया है। सत्यवान और सावित्री की कालजयी कहानी में, यह अंध समर्पण नहीं बल्कि गहन शक्ति है जो उसे परिभाषित करती है। मृत्यु के देवता यमराज का सामना करते हुए, सावित्री अपने पति के जीवन को पुनः प्राप्त करने के लिए बुद्धि और आध्यात्मिक संकल्प की लड़ाई में शामिल होती है। उसकी अटूट भक्ति, रणनीतिक बुद्धि और नैतिक स्पष्टता अंततः यमराज को झुकने के लिए मजबूर करती है, जिससे सत्यवान को पुनः जीवन मिलता है।
इस महान सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए ऑपरेशन सिंदूर गहरा प्रतीकात्मक महत्व रखता है। हिंदू विरोधी तंत्र द्वारा विकृत चित्रण से दूर, सावित्री असहाय या दक़ियानूसी नहीं है, बल्कि मानसिक बल, लचीलापन और प्रखर बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। इसी तरह, भारत का सांस्कृतिक और सभ्यतागत पुनरुत्थान आधुनिकता की अस्वीकृति नहीं है, बल्कि भारत का अपनी शर्तों पर आधुनिकता के साथ सामंजस्य स्थापित करने का एक सशक्त प्रयास है। यह वैदिक ज्ञान और समकालीन विचार के सम्मिश्रण का प्रतिनिधित्व करता है।
इस प्रकार ऑपरेशन सिंदूर को इस पुनरुत्थान का एक सूक्ष्म रूप माना जा सकता है। राम मंदिर उद्घाटन से लेकर हिंदू राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वृद्धि तक, भारत अपने सभ्यतागत आत्मविश्वास को पुनः प्राप्त कर रहा है। इस सांस्कृतिक आत्मविश्वास ने पहलगाम आतंकी हमले के ख़िलाफ़ उसकी प्रतिक्रिया को आकार दिया, जो धर्म में निहित पहचान और न्याय के निर्णायक दावे को दर्शाता है।
संदर्भ सूची
[1] Press Release: Press Information Bureau; https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2127370
[2] ऑपरेशन सिंदूर में मारे गये पाकिस्तान के 100 आतंकी, सरकार ने सर्वदलीय बैठक में किया खुलासा; https://www.abplive.com/news/india/operation-sindoor-100-terrorists-killed-government-said-operation-sindoor-is-still-underway-2939868
[3] 100 Terrorists Killed, Rajnath Singh Tells All-Party Meet On Op Sindoor; https://www.ndtv.com/india-news/100-terrorists-killed-rajnath-singh-tells-all-party-meet-on-op-sindoor-8360900
[4] Opinion | From Defence To Dominance: Bharat’s Shifting Response To Terrorism – News18; https://www.news18.com/opinion/opinion-from-defence-to-dominance-bharats-shifting-response-to-terrorism-ws-l-9327593.html
[5] India needs partners, not preachers’: Jaishankar once again tears into EU| India News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/india/india-needs-partners-not-preachers-jaishankar-once-again-tears-into-eu/articleshow/120869425.cms
[6] Pahalgam terror attack: EAM Jaishankar speaks to European Union counterpart Kaja Kallas – The Hindu; https://www.thehindu.com/news/national/pahalgam-terror-attack-eam-jaishankar-speaks-to-european-union-counterpart-kaja-kallas/article69533208.ece
[7] Pakistan rebuked at UNSC over Pahalgam attack; members reject ‘false flag’ narrative, call missile tests escalatory | Today News; https://www.livemint.com/news/pakistan-rebuked-at-unsc-over-pahalgam-attack-members-reject-false-flag-narrative-call-missile-tests-escalatory-11746504940172.html
[8] Role of the United States in the 1971 War: Implications for India-US Relations – MP – IDSA; https://www.idsa.in/publisher/journal-of-defence-studies/role-of-the-united-states-in-the-1971-war-implications-for-india-us-relations/
[9] MAGA Meets MIGA: Modi, Trump & US-India’s Future; https://stophindudvesha.org/when-maga-meets-miga-modi-trump-and-the-future-of-u-s-india-relations/
[10] JD Vance on India-Pakistan tensions: U.S. to stay out of war that’s none of our business – The Hindu; https://www.thehindu.com/news/international/us-to-stay-out-of-war-thats-none-of-our-business-vance-on-india-pak-tensions/article69555861.ece
[11] UK, France, Israel, Netherlands and more nations back Operation Sindoor, acknowledge India’s right to self-defence – The Economic Times; https://economictimes.indiatimes.com/news/india/uk-france-israel-netherlands-and-more-nations-back-operation-sindoor-acknowledge-indias-right-to-self-defence/articleshow/120990001.cms?from=mdr
[12] Ibid.
[13] UK Parliament debates India-Pakistan conflict, appeals for de-escalation; https://www.newindianexpress.com/world/2025/May/08/uk-parliament-debates-india-pakistan-conflict-appeals-for-de-escalation-2
[14] (290) “Justified Retaliation” UK MP Backs India’s Operation Sindoor Against Pakistan | N18G – YouTube;
https://www.youtube.com/watch?v=XVeNAO85QKU
[15] India-UK FTA | Pact Britannica – India Today; https://www.indiatoday.in/amp/magazine/up-front/story/20250519-india-uk-fta-pact-britannica-2722232-2025-05-10#
[16] India and Pakistan have agreed to a full and immediate ceasefire’: Donald Trump – Firstpost; https://www.firstpost.com/world/trump-announces-full-and-immediate-ceasefire-india-pakistan-operation-sindoor-pahalgam-attack-terrorism-tensions-13887350.html
[17] India-Pakistan agree to pause military action, but what makes an act of war? – CNBC TV18;https://www.cnbctv18.com/india/india-pakistan-war-ceasfire-act-of-war-meaning-provisions-explained-ws-l-19602707.htm
[18] India strikes – how will Pakistan respond? Four key questions; https://www.bbc.com/news/articles/cd020710v1ko
[19] India strikes Pakistan after Kashmir attack, raising fear of war – The Washington Post; https://www.washingtonpost.com/world/2025/05/06/india-strikes-pakistan-war-kashmir/
[20] ग्लोबल टाइम्स, ब्लूमबर्ग, DW…’ऑपरेशन सिंदूर’पर प्रोपेगंडा, आतंकी को आतंकी कहने में शर्म | DW, Global Times & Bloomberg spread propaganda against ‘Operation Sindoor’ and India; https://hindi.opindia.com/reports/media/foreign-media-propaganda-against-operation-sindoor-dw-bloomberg-global-times/
[21] Pahalgam terror attack: Government calls out BBC for biased coverage of Pahalgam terror attack – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/government-writes-to-bbc-india-head-strong-sentiments-pahalgam-terror-attack-reporting-ib-ministry-watchlist-2716097-2025-04-28
[22] India slams China’s Global Times on false info on Operation Sindoor:’Verify your facts’ | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/india-slams-chinas-global-times-on-false-info-on-operation-sindoor-verify-your-facts-101746619354014.html
[23] Manisha Singh on X https://x.com/Mini2411Singh/status/1920183413819990527
[24] Sabyasachi Upadhyay on X; https://x.com/sabyasachi4441/status/1920071244218847457
[25] Decolonizing India: Shaping Its Own Grand Narrative; https://stophindudvesha.org/decolonizing-indias-mindset-why-india-needs-to-create-its-own-grand-narrative/
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