भारत की कूटनीतिक पहल ने पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क का किया पर्दाफ़ाश

भारत का सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क पर पश्चिमी देशों की चुप्पी को चुनौती दे रहा है, और वैश्विक आतंकवाद पर दोहरे मापदंडों को उजागर कर रहा है। वह एक नए आत्मविश्वासी सिद्धांत की बात कर रहा है — सटीक, नैतिक, धर्मसम्मत और अंतरराष्ट्रीय सहमति आधारित युद्ध का सिद्धांत।
  • अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में तेज़ी से फैल रही कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद की समस्या को मुख्यधारा के पश्चिमी मीडिया और वैश्विक समुदाय की शक्तिशाली इकाइयों ने लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया है।
  • ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की वैश्विक कूटनीतिक पहल का मकसद दुनिया में इस्लामिक कट्टरवाद और आतंकवाद को लेकर चले आ रहे वैश्विक विमर्श को सिरे से बदलना है।
  • भारत आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई में ग्लोबल साउथ (वैश्विक दक्षिण) को एकजुट कर रहा है। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों ने भारत की आतंकवाद-विरोधी नीति के साथ कई देशों को जोड़ने में ठोस सफलता हासिल की है।
  • पश्चिमी देश अब भी पाकिस्तान को तुष्ट करते नजर आते हैं। वे न केवल उसकी आतंकी भूमिका पर चुप हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से उसके नेटवर्क को परोक्ष समर्थन भी दे रहे हैं।
  • मुख्यधारा के पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा तो जैसे पाकिस्तानी शासन का प्रवक्ता बन गया है ऑपरेशन सिंदूर को लेकर वह लगातार पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा फैला रहा है।

नाइजीरिया की सेना ने हाल ही में चार पाकिस्तानी नागरिकों को आतंकवाद से जुड़े होने के शक पर गिरफ्तार किया। इन पर बोको हराम और इस्लामिक स्टेट वेस्ट अफ्रीका प्रोविंस (ISWAP) जैसे आतंकवादी संगठनों को रणनीतिक और सैन्य प्रशिक्षण देने का आरोप था।[1] लेकिन क्या आपने किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनल या अखबार में इस खबर को प्रमुखता से देखा? शायद नहीं।

दिसंबर 2023 में नाइजीरिया में ईसाइयों पर हुए एक आतंकवादी हमले में लगभग 200 लोगों की जान चली गई। हालाँकि यह घटना इतनी अधिक गंभीर और दर्दनाक थी, फिर भी मुख्यधारा के वैश्विक मीडिया ने इसे नज़रअंदाज़ कर दिया।[2] [3] इससे भी ज़्यादा हैरानी की बात तो यह है कि जिन रिपोर्टों में इस घटना का जिक्र हुआ भी, उनमे आतंकवादियों को सिर्फ “बंदूकधारी” (gunmen) कहकर संबोधित किया गया और हमले के असली मकसद को छुपाने की कोशिश की गयी।

अफ्रीका में होने वाले ऐसे अनेकों आतंकवादी हमलों को पश्चिमी मीडिया अक्सर नजरअंदाज कर देता है। जबकि पश्चिमी दुनिया में होने वाले आतंकी हमलों को वैश्विक वामपंथी तंत्र प्रमुखता से उठाता है, वहीं पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों में होने वाली हिंसा पर आंखें मूंद लेता है। इससे वामपंथी तंत्र के दोहरे मानदंडों का पता चलता है जो अफ़्रीका में तेज़ी से उभरते इस्लामिक कट्टरपंथ के मुद्दे को उठाने से तो हिचकिचाता है लेकिन हमास जैसे आतंकवादी संगठन की बर्बरता को नजरअंदाज करते हुए इज़रायल-गाज़ा संघर्ष की एकतरफा छवि खूब बढ़ चढ़कर पेश करता है।

ऐसे बढ़ते वैश्विक आतंकवाद के बीच, भारत सरकार ने हाल ही में एक अनोखी पहल की, जिस के तहत सात सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल विश्व के विभिन्न देशों में भेजे। इन प्रतिनिधिमंडलों में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के 51 वरिष्ठ सांसद शामिल थे, जिन्होंने 32 देशों और यूरोपीय संघ मुख्यालय का दौरा किया।[4]

यह वैश्विक संपर्क अभियान न केवल पाकिस्तान से भारत में फैले सीमापार आतंकवाद के ख़िलाफ़ भारत की प्रतिक्रिया में एक रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है, बल्कि चरमपंथ और आतंकवाद से जुड़े वैश्विक विमर्श को पुनर्गठित करने के भारत के बड़े उद्देश्य की ओर भी इशारा करता है।

लेख के आगे के भागों में हम देखेंगे कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की यह अलग वैश्विक रणनीति उसे इस लड़ाई में एक अहम भूमिका निभाती है। यह दृष्टिकोण आतंकवाद पर एक नया विमर्श पेश करता है—जो पुराने पश्चिमी नजरिए से हटकर वैश्विक दक्षिण के देशों की सुरक्षा चिंताओं को भी बराबरी से महत्व देता है।

भारत की आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई  

भारत के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मँझे हुए नेताओं की विशेषज्ञता का लाभ उठाया—जिनमें शशि थरूर जैसे नेता शामिल हैं, जो संयुक्त राष्ट्र में उच्च पदों पर कार्य कर चुके हैं। इन नेताओं ने वैश्विक मंचों पर आतंकवाद के ख़िलाफ़ भारत की दृढ़ और स्पष्ट नीति को मज़बूती से प्रस्तुत किया।

इस तरह का सर्वदलीय प्रतिनिधित्व विश्व को साफ संदेश देता है कि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत की आंतरिक एकता अडिग है और इस विषय पर सभी राजनीतिक दलों का राष्ट्रीय रुख एक जैसा है।

कांग्रेस नेता शशि थरूर के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल ने न्यूयॉर्क स्थित 9/11 स्मारक का दौरा किया। इस दौरे का गहरा प्रतीकात्मक महत्व किसी से छिपा नहीं, जिसने न केवल वैश्विक एकता की आवश्यकता को रेखांकित किया, बल्कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में  साझा संकल्प अपनाने की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया।[5] इस पहल के माध्यम से भारत ने पश्चिमी देशों को भी यह स्पष्ट संदेश दिया कि अब आतंकवाद की निंदा को लेकर पक्षपात नहीं चल सकता—आतंकवाद कहीं भी हो, किसी भी रूप में हो, उसका विरोध समान रूप से ज़रूरी है।

भारतीय सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ वैश्विक सहमति बनाने के लिए भारतीय प्रवासी समुदाय की ताकत का भी सफलतापूर्वक उपयोग किया। इन बैठकों और संवादों में न केवल पहलगाम आतंकी हमलों में पाकिस्तानी स्टेट की भूमिका को उजागर किया गया, बल्कि दुनिया को यह भी याद दिलाया गया कि पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर कई आतंकी हमलों की योजना और क्रियान्वयन में सक्रिय भागीदार रहा है। दक्षिण अफ्रीका के जोहानसबर्ग में एक कार्यक्रम के दौरान भाजपा प्रतिनिधि अनुराग ठाकुर ने स्पष्ट रूप से कहा कि पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की आतंकवाद से जुड़ी सूची में जहां की 52 संस्थाएं और व्यक्ति शामिल हैं।[6]

वहीं, एक अन्य प्रतिनिधि मनीष तिवारी ने पाकिस्तान द्वारा ओसामा बिन लादेन को पनाह दिये जाने की बात को दोहराते हुए कहा— एक ऐसा देश जो अमेरिका के नेतृत्व में आतंकवाद के ख़िलाफ़ बने वैश्विक गठबंधन से पैसे लेता रहा और उसी अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन ओसामा बिन लादेन को छुपाकर रखता है, यह पाकिस्तान के दोहरे रवैये का सबसे बड़ा सबूत है[7]

पूर्व भारतीय राजदूत तरणजीत सिंह संधू, जो इस प्रतिनिधिमंडल की ओर से बोले, ने रेखांकित किया कि भारत न केवल अपने लिए बल्कि पूरी दुनिया—विशेष रूप से अमेरिका—की ओर से आतंकवाद के विरुद्ध यह लड़ाई लड़ रहा है। क्योंकि जो आतंकी और आतंकवादी संगठन भारत की एकता व अखंडता के लिए खतरा हैं, वही अमेरिका और अन्य देशों के लिए भी गंभीर चुनौती बने हुए हैं।[8]

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत के वैश्विक कूटनीतिक प्रतिनिधित्व ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि जिहादी आतंकवाद से पीड़ित होने का अनुभव केवल कुछ देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक साझा वैश्विक संकट है। भारत के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों ने इसी सार्वभौमिक पीड़ा को केंद्र में रखते हुए आतंकवाद को लेकर पश्चिमी देशों के संकीर्ण दृष्टिकोण पर सवाल उठाए। हर ब्रीफिंग में ऑपरेशन सिंदूर के दो प्रमुख बिंदुओं को दोहराया गया:

  1. ऑपरेशन के लक्ष्य स्पष्ट और सीमित थे — यह हमले सिर्फ उन्हीं आतंकी शिविरों पर किए गए जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादियों और आतंकवादी संगठनों से जुड़े थे।
  2. भारत अब इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता कि आतंकवाद का तंत्र पाकिस्तानी स्टेट के भीतर गहराई से समाया हुआ है— आतंकवाद अब पाकिस्तान की स्टेट पालिसी का हिस्सा बन चुका है।

ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ पहलगाम हमलों की प्रतिक्रिया मात्र नहीं था, बल्कि यह भारत की आतंकवाद-विरोधी नीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि ऑपरेशन सिंदूर अब आतंकवाद को लेकर भारत की आधिकारिक नीति का प्रतीक है:
यदि पाकिस्तान भविष्य में भारत के ख़िलाफ़ किसी भी आतंकवादी हमले को अंजाम देता है, तो उसे “युद्ध की कार्यवाही” माना जाएगा और उसी स्तर पर जवाब दिया जाएगा। यह आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक नई रणनीति को दर्शाता है—सटीक, खुफिया-जानकारी पर आधारित हमले, जो पारंपरिक युद्ध की आवश्यकता के बिना ही प्रभावी हों। साथ ही, यह एक व्यापक नीति की ओर इशारा करता है जिसमें सैन्य कार्रवाई, कूटनीतिक दबाव और आर्थिक प्रतिबंध जैसे टूल्स के माध्यम से कई स्तरों पर आतंकवाद से निपटा जाएगा।

John Spencer, जो Modern War Institute में अर्बन वॉरफेयर स्टडीज़ के चेयर हैं, ने X (पूर्व ट्विटर) पर इस ऑपरेशन की प्रशंसा करते हुए इसे “एक बड़ी जीत” बताया और यह भी कहा कि आपरेशन अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है, बावजूद इसके कि आपरेशन के कुछ दिन बाद ही तत्काल युद्धविराम लग गया। उन्होंने कहा – भारत का संयम कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता है। उसने दुश्मन को कीमत चुकाने पर मजबूर किया, रणनीतिक सीमाओं को फिर से परिभाषित किया और सैन्य प्रभुत्व बनाए रखा। भारत ने केवल पाकिस्तानी हमले का जवाब ही नहीं दिया बल्कि उसने पूरे रणनीतिक समीकरण को बदल कर रख दिया”[9]

रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (RUSI) द्वारा प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने आतंकवाद से जुड़े ढाँचागत लक्ष्यों पर सटीक हमले किए, लेकिन इसके साथ ही अभूतपूर्व संयम भी दिखाया। भारत ने अपने रणनीतिक उद्देश्य—आतंकी ढांचे को ध्वस्त करना—स्पष्ट रखा और उस पर अडिग रहते हुए अभियान के जोखिमों को भी स्वीकार किया।[10] विश्लेषण आगे इस बात पर ज़ोर देता है कि यह उस नए युद्ध-चरण का संकेत है जहां रणनीतिक संदेश की स्पष्टता, सैन्य जीत जितनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।

ऑपरेशन सिंदूर उस युद्ध नीति का भी परिचायक है जो धर्म के सिद्धांतों पर आधारित है। इसमें नैतिक मूल्य रणनीतिक निर्णयों का हिस्सा होते हैं—जैसे कि जब तक अति आवश्यक न हो, तब तक सैन्य ठिकानों पर भी हमला न करना। यह सोच पश्चिमी विमर्श में निहित आक्रामक युद्ध शैली से बिल्कुल अलग हटकर है, जिसमें अक्सर नैतिकता की अनदेखा करते हुए व्यापक विनाश को प्राथमिकता दी जाती है। इराक, अफगानिस्तान और सीरिया जैसे देशों में पश्चिमी देशों की कार्रवाइयों को देखें—जहाँ युद्ध के नाम पर भीषण बर्बरता देखने को मिली और कितने ही निर्दोष लोगों की जानें चली गयीं। अब इसकी तुलना आप भारतीय संदर्भ में ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति से करें जो कि न केवल पश्चिमी युद्ध रणनीतियों से कहीं अधिक संतुलित(calibrated) है बल्कि नैतिक दृष्टिकोण से भी कहीं अधिक उत्तरदायी और विवेकपूर्ण है।

पिछले एक दशक में भारत ने पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के मुद्दे को वैश्विक मंचों पर लगातार उठाने के साथ-साथ आतंकवाद को वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में स्थापित करने के लिए अपने द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंधों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं का भी प्रभावी रूप से उपयोग किया है। इस रणनीति के तहत भारत ने कई स्तरों पर महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:

  • आतंकवाद के वित्त पोषण पर रोक लगाने के प्रयास।
  • द्विपक्षीय सहयोग में खुफिया साझाकरण को प्राथमिकता।
  • BRICS, SCO, G20, आदि बहुपक्षीय मंचों के एजेंडे में आतंकवाद को प्रमुखता से लाना।
  • वैश्विक शांति और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से वैश्विक सहमति बनाना।

इसलिए ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं है, वरन्  इसे एक संगठित, दीर्घकालिक और सिद्धांतगत नीति के निरंतर विस्तार के रूप में देखा जाना चाहिए।

आतंकवाद के खिलाफ ग्लोबल साउथ को जोड़ना

पिछले दस सालों में भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह उभर कर आया है कि उसने ग्लोबल साउथ (वैश्विक दक्षिण) के देशों को साझा सरोकारों के बैनर तले एकजुट किया है। हाल ही में भारत ने जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान हासिल किया है। भारत का वैश्विक क़द एक ऐसे समय में बढ़ता दिखाई दे रहा है जब पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाला पुराना वैश्विक ढांचा अपनी आख़िरी साँसे गिन रहा है। आगामी समय में तैयार होने वाला यह नया वैश्विक ढांचा कैसा होगा, यह अभी पूरी तरह से तय नहीं है, लेकिन भारत इसे विस्तार देने में एक अहम भूमिका निभा रहा है – खासकर ग्लोबल साउथ के देशों को बड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एकजुट करके।

भारत ने सिर्फ़ पश्चिमी देशों और खाड़ी देशों में बसे प्रवासी भारतीयों, राजनीतिक नेताओं और गणमान्य लोगों से बात नहीं की, बल्कि सभी दलों के प्रतिनिधिमंडलों ने ग्लोबल साउथ के देशों जैसे – दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, पनामा, गुयाना, कोलंबिया, सिएरा लियोन, अल्जीरिया, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, लाइबेरिया, इथियोपिया और मिस्र – का भी दौरा किया।[11]

जहाँ अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे पश्चिमी देशों ने भारत की चिंताओं को केवल औपचारिकता निभाते हुए सुना, वहीं ग्लोबल साउथ के देशों में भारत के प्रयासों को ज़मीनी स्तर पर काबिलेतारीफ़ सफलता मिली।

एक अहम घटनाक्रम में, कोलंबिया ने भारत के ऑपरेशन सिंदूर की वजह से पाकिस्तान में हुई मौतों पर जारी की गई अपनी पहले की संवेदना टिप्पणी को वापस ले लिया है और आतंकवाद पर भारत के रुख का मज़बूती से समर्थन किया है।[12] पनामा के राष्ट्रपति जोस राउल मुलिनो क्विंटेरो ने भी आतंकवाद के ख़िलाफ़ भारत के सख्त रुख का समर्थन किया।[13]

गयाना ने भी सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के सामने आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपने समर्थन की पुष्टि की[14] और इस बात की सराहना की कि भारत ने इस दौरे में विभिन्न राजनीतिक दलों को एकसाथ शामिल किया, जो भारत की राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। एकता और समर्थन के प्रतीक के रूप में, सिएरा लियोन और लाइबेरिया की संसदों में पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए लोगों की याद में एक मिनट का मौन रखा गया।[15]

भारत के पूर्व राजनयिक सुजन चिनॉय ने अफ्रीका में भारत की कूटनीतिक पहल की अहमियत पर ज़ोर दिया, खासकर एक ऐसे समय में जब इस क्षेत्र में आतंकवाद का खतरा बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा, “अफ्रीकन यूनियन में बड़ी संख्या में देश शामिल हैं और हाल ही में आई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, अब यह महाद्वीप भी वैश्विक आतंकवाद से अछूता नहीं रहा है। पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद की जड़ें दुनिया के कोने-कोने तक फैली हुई हैं। अफ्रीका में जो आतंकी नेटवर्क सक्रिय हैं, उनके संबंध भी पाकिस्तान से जुड़े नेटवर्क्स से हैं। पिछले कुछ वर्षों में अफ्रीका वैश्विक आतंकवाद का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। नाइजीरिया में बोको हराम, सोमालिया, तंज़ानिया और केन्या में अल-शबाब, और मोज़ाम्बिक से काम करने वाले कई अन्य आतंकी संगठन यहां सक्रिय हैं। विशेष रूप से अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में हाल के समय में आतंकवादी घटनाओं में भारी वृद्धि देखने को मिली है।”[16]

न्यूज़वीक में प्रकाशित स्टीफन एस. एनाडा का एक लेख अफ़्रीका के संदर्भ में पश्चिमी देशों की नीतियों की आलोचना करता है। लेख में कहा गया है कि पश्चिम का ध्यान जहां एक ओर इज़राइल और यूक्रेन जैसे संघर्षों पर ज़रूरत से ज़्यादा केंद्रित है, वहीं अफ्रीका में फैले आतंकवाद और हिंसा को वह ज़्यादातर नज़रअंदाज़ करता आया है। लेख आगे पश्चिम पर आरोप लगाता है कि वह अफ्रीका में होने वाले धार्मिक संघर्षों को लेकर एक झूठा विमर्श गढ़ता है कि इस संघर्ष का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है।[17]

AfricLaw में प्रकाशित एक अन्य लेख भी इसी मुद्दे को उठाता है और इस बात पर सवाल करता है कि जब अफ्रीका में इस्लामिक कट्टरपंथ और आतंकवाद तेज़ी से बढ़ रहा है, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय आख़िर चुप क्यों है। लेख में कहा गया है कि 2012 से 2022 के बीच पश्चिम अफ्रीका एक नया जिहादी युद्धक्षेत्र बन गया है। इसमें मोज़ाम्बिक का उदाहरण दिया गया है, जहाँ “इस्लामिक स्टेट से जुड़े आतंकी एक नया कैलिफेट स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।” लेख में अफ्रीका में जिहादी आतंकवाद के खतरनाक आँकड़े साझा करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की गई है।[18]

पश्चिमी देशों द्वारा अफ्रीका को लगातार नज़रअंदाज़ किए जाने के बीच, भारत के पास अफ्रीकी देशों के साथ अपने संबंध मज़बूत करने का एक बड़ा अवसर है। आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर साझा बनाकर भारत इन देशों के साथ गहरे और भरोसेमंद संबंध बना सकता है। जहाँ एक ओर चीन भी अफ्रीका में अपनी मज़बूत मौजूदगी बनाए हुए है, उसका रवैया आमतौर पर स्वार्थ पर आधारित होता है और मानवाधिकारों जैसे मुद्दों के प्रति वह उदासीन रहता है। इसके विपरीत, भारत की नीति सहयोगात्मक और समानता पर आधारित है। भारत अफ्रीकी देशों के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत कर सकता है और पूरे महाद्वीप में क्षेत्रीय साझेदारियाँ बना सकता है — जो संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों पर आतंकवाद के ख़िलाफ़ साझा आवाज़ उठाने में सहायक होंगी।

पाक आतंकवाद पर पश्चिम के दोहरे मानदंड

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति में नैतिकता की बातें अक्सर सिर्फ रणनीतिक फायदे के लिए की जाती हैं। पश्चिमी देश इस रणनीतिक पैंतरेबाज़ी के माहिर खिलाड़ी जान पड़ते हैं—जब बात अपने हित की हो, तो आतंकवाद की कड़ी निंदा करते हैं, और जब पीड़ित उनके रणनीतिक दायरे में न आते हों, तो इस आतंकवाद की समस्या को चुपचाप नजरअंदाज कर देते हैं।

पहलगाम में हुए आतंकी हमलों के बाद भारत के आत्मरक्षा के अधिकार पर पश्चिम का रुख बेहद ठंडा रहा। भले ही कई पश्चिमी देशों ने औपचारिक रूप से हमलों की निंदा की और सहानुभूति जताई, लेकिन पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों की सीधी आलोचना न होने से ये बातें खोखली लगती हैं। उल्टा, पश्चिमी देश पाकिस्तान का लगातार तुष्टिकरण करने में लगे है। इस बात के कमसकम दो ठोस सबूत मौजूद हैं  – 1. पाकिस्तानी सरकार की आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली भूमिका पर पश्चिमी देशों की चुप्पी, और 2. अंतरराष्ट्रीय संगठनों के ज़रिये मिलने वाली मदद द्वारा पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क का परोक्ष समर्थन।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की दो महत्वपूर्ण समितियों — तालिबान प्रतिबंध समिति और आतंकवाद निरोधक समिति — में पाकिस्तान को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की भूमिका सौंपी गई है।[19] जून 2024 में पाकिस्तान को UNSC का अस्थायी सदस्य चुना गया था, और वह यह पद दिसंबर 2026 तक संभालेगा। भले ही इन समितियों में उसकी भूमिका एक औपचारिकता मात्र हो, लेकिन यह बात बेहद चिंताजनक है कि दुनिया की किसी भी बड़ी ताकत ने इस फैसले को लेकर आपत्ति जताने की कोशिश तक नहीं की। इससे यह पता चलता है कि पश्चिमी देश भारत की सुरक्षा चिंताओं के प्रति किस कदर उदासीन रवैया अपनाते हैं।

पाकिस्तान इन पदों का इस्तेमाल आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक विमर्श को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए कर सकता है। भले ही इन समितियों में उसकी ताकत प्रत्यक्ष तौर पर सीमित हो, लेकिन चीन से उसकी मज़बूत साझेदारी और ट्रंप प्रशासन से बढ़ती निकटता उसे अपने पदों का दुरुपयोग करने के लिए प्रेरित कर सकती है। पाकिस्तान भारत पर झूठे आरोप लगाने की कोशिश कर सकता है, खासकर यह कहकर कि भारत बलूच संगठनों के ज़रिये उसके यहां आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। इसके अलावा, वह एक बार फिर से संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर मुद्दा उठाने की कोशिश कर सकता है।

इससे भी ज़्यादा हैरानी की बात यह है कि भारत द्वारा बार-बार चेतावनी दिये जाने के के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पाकिस्तान के लिए 1 अरब डॉलर का राहत पैकेज मंज़ूर कर दिया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पाकिस्तान को दिया गया यह फंड “आतंकवाद की परोक्ष रूप से फंडिंग” करने जैसा है। बावजूद इसके, IMF ने अपना फैसला सही ठहराया और कहा कि पाकिस्तान ने उनके तय किए गए लक्ष्य पूरे किए हैं और कुछ सुधारों में प्रगति भी की है, इसलिए उसे यह सहायता दी गई।[20]

ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक वर्ग का पश्चिमी मुख्यधारा मीडिया पाकिस्तान की सरकार का अनौपचारिक प्रवक्ता बन गया है, जो लगातार पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ा रहा है।[21] द वॉशिंगटन पोस्ट  ने हाल ही में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें उसने भारतीय मीडिया पर ऑपरेशन सिंदूर की रिपोर्टिंग के दौरान झूठ और फेक न्यूज फैलाने का आरोप लगाया[22]—वह भी बिना किसी ठोस सबूत या विश्वसनीय स्रोत के। लेख में केवल अस्पष्ट दावे और आधारहीन आरोप लगाए गए। इस लेख में भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को खासतौर पर निशाना बनाया गया और कहा गया कि “भारत के कुछ सबसे बड़े चैनल अब नियमित रूप से सरकार की भाषा बोलते हैं, या तो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से वैचारिक मेल के कारण या फिर स्टेट द्वारा डाले जा रहे दबाव के चलते, जिसमें पत्रकारों पर आतंकवाद, देशद्रोह और मानहानि जैसे मामलों में कार्रवाई की गई है, और आलोचक आवाज़ों को चुप कराने के लिए टैक्स छापों और नियामक हथकंडों का सहारा लिया गया है।”

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से चल रहे इस तरह के भारत-विरोधी प्रोपेगेंडा के बीच, भारत की वैश्विक कूटनीतिक पहल बहुत अहम हो जाती है। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की विदेश यात्राओं ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बात को मज़बूती से रखने में मदद की है। इनके समापन के बाद भी भारत लगातार द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों का उपयोग कर विश्व को यह बताने में जुटा हुआ है कि वैश्विक आतंकवाद आज दुनिया के लिए कितना बड़ा खतरा है।

अंत में

भारत को आज़ादी के बाद से ही पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का दंश झेलना पड़ा है, लेकिन वर्षों तक उसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को सीधे चुनौती देने या आतंकवाद फैलाने में उसकी भूमिका को उजागर करने से परहेज़ किया।

ऑपरेशन सिंदूर इस नीति में एक बड़ा बदलाव लेकर आया है। यह आतंकवाद के प्रति भारत के रुख में एक “न्यू नार्मल” स्थापित करता है। अब भारत खुद को केवल एक आतंकवाद पीड़ित देश के रूप में नहीं, बल्कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ इस संघर्ष में ख़ुद को एक वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में भी पेश कर रहा है।

इस बदले हुए रवैये के साथ, भारत आज पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत स्थिति में है—ऐसी स्थिति जिसमें वह दुनिया को आतंकवाद के ख़िलाफ़ एकजुट करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

संदर्भ सूची 

[1] Europe To Africa: Pakistan’s Terror Exports Aren’t India’s Problem Alone;    https://www.ndtv.com/opinion/europe-to-africa-pakistans-terror-exports-arent-indias-problem-alone-8593928

[2]  Where is the Outrage Over the Jihadist Attacks Against Black Africans? | Opinion- Newsweek;    https://www.newsweek.com/where-outrage-over-jihadist-attacks-against-black-africans-opinion-1862041

[3] Nearly 200 Nigerians killed in Christmas Eve Massacre – International Christian Concern;     https://www.persecution.org/2023/12/28/nearly-200-nigerians-killed-in-christmas-eve-massacre/

[4] India’s Operation Sindoor outreach with all-party delegation: Who will brief which country – Full list | India News – Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/india/indias-operation-sindoor-outreach-with-all-party-delegation-who-will-brief-which-country-full-list-shashi-tharoor-nishikant-dubey-owaisi/articleshow/121239733.cms

[5] All Party delegation led by MP Shashi Tharoor highlights India’s precise & calibrated response during Op Sindoor;  https://www.newsonair.gov.in/all-party-delegations-reaching-various-countries-to-convey-indias-zero-tolerance-stand-against-terrorism/

[6] India’s zero tolerance stance on terrorism hailed at all-party delegation address in South Africa – The Economic Times; https://economictimes.indiatimes.com/news/india/indias-zero-tolerance-stance-on-terrorism-hailed-at-all-party-delegation-address-in-south-africa/articleshow/121461569.cms?from=mdr

[7] “Litany of Pakistan’s crimes is endless”, says all-party delegation member Manish Tewari – The Economic Times;   https://economictimes.indiatimes.com/news/india/litany-of-pakistans-crimes-is-endless-says-all-party-delegation-member-manish-tewari/articleshow/121612181.cms?from=mdr

[8] India fighting battle on behalf of world, especially US: Ex-envoy Taranjit Singh Sandhu (The Economic Times); https://economictimes.indiatimes.com/news/india/india-fighting-battle-on-behalf-of-world-especially-us-ex-envoy-taranjit-singh-sandhu/articleshow/121636706.cms?from=mdr

[9] Operation Sindoor: US Military Expert John Spencer On Why Op Sindoor Is A Decisive Victory In Modern Warfare;  https://www.ndtv.com/world-news/operation-sindoor-us-military-expert-john-spencer-on-why-op-sindoor-is-a-decisive-victory-in-modern-warfare-8544411

[10] Calibrated Force: Operation Sindoor and the Future of Indian Deterrence | Royal United Services Institute; https://www.rusi.org/explore-our-research/publications/commentary/calibrated-force-operation-sindoor-and-future-indian-deterrence

[11] Kiren Rijiju on X;  https://x.com/KirenRijiju/status/1923790854168137909/photo/4

[12] Colombia Withdraws Statement On Pakistan Casualties After India’s Objections;     https://www.ndtv.com/world-news/colombia-withdraws-statement-on-pakistan-casualties-after-indias-objections-8550982

[13]  Operation Sindoor outreach: Panama backs India’s stance against terrorism during Tharoor-led delegation’s visit;   https://ddnews.gov.in/en/operation-sindoor-outreach-panama-backs-indias-stance-against-terrorism-during-tharoor-led-delegations-visit/#:~:text=Panama%20President%20Jose%20Raul%20Mulino,by%20Congress%20MP%20Shashi%20Tharoor

[14] Guyana affirms support against terrorism to All-Party Delegation led by Shashi Tharoor;  https://www.aninews.in/news/world/us/guyana-affirms-support-against-terrorism-to-all-party-delegation-led-by-shashi-tharoor20250528121102/

[15] After Sierra Leone, Liberia Observes Silence In Memory Of Pahalgam During All-Party Team’s Visit – News18; https://www.news18.com/india/after-sierra-leone-liberia-observes-silence-in-memory-of-pahalgam-during-op-sindoor-all-party-teams-visit-ws-l-9365100.html

[16] Pakistan-sponsored terrorism has tentacles across the world: Ambassador Sujan Chinoy on India-Africa counterterror push – The Tribune;   https://www.tribuneindia.com/news/world/pakistan-sponsored-terrorism-has-tentacles-across-the-world-ambassador-sujan-chinoy-on-india-africa-counterterror-push/

[17] Where is the Outrage Over the Jihadist Attacks Against Black Africans? | Opinion – Newsweek;    https://www.newsweek.com/where-outrage-over-jihadist-attacks-against-black-africans-opinion-1862041

[18]  Decoding the ignorance of the world towards rising terrorism in Africa: A new Jihadist battlefield? | AfricLaw;  https://africlaw.com/2022/01/17/decoding-the-ignorance-of-the-world-towards-rising-terrorism-in-africa-a-new-jihadist-battlefield/

[19] Pakistan’s UNSC posts present diplomatic challenge for India’s fight against terror | The Indian Express;    https://indianexpress.com/article/opinion/columns/pakistans-unsc-posts-present-diplomatic-challenge-for-indias-fight-against-terror-10057082/

[20] Days After India’s Message, IMF Defends Bailout Package To Pakistan; https://www.ndtv.com/world-news/days-after-indias-message-imf-defends-bailout-package-to-pakistan-8485567

[21] NYT downplays India’s Operation Sindoor, calls it a draw, quotes Menon to justify inaction, and equates India with terror exporting Pakistan.;  https://www.opindia.com/2025/05/nyt-bats-for-pakistan-denounces-op-sindoor-quotes-menon-to-defend-inaction/#google_vignette

[22] How misinformation overtook Indian newsrooms amid conflict with Pakistan – The Washington Post;    https://www.washingtonpost.com/world/2025/06/04/india-news-channels-misinformation-pakistan-conflict/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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