एम्पुरान: मलयालम फिल्मों में हिंदुओं के प्रति नफरत की बढ़ती भावना
- एम्पुरान पर वामपंथी और हिंदू-विरोधी प्रचार फैलाने का आरोप है, जिसमें 2002 के गुजरात दंगों को बढ़ा-चढ़ाकर और झूठे विवरणों के साथ प्रस्तुत किया गया है, साथ ही हिंदू पात्रों और संस्थानों को खलनायक के रूप में दिखाया गया है।
- फिल्म मलयालम सिनेमा की उस व्यापक प्रवृत्ति को उजागर करती है, जहाँ हिंदू पहचान का उपहास किया जाता है, जबकि ईसाई और मुस्लिम पात्रों को सदैव महान और आदर्श रूप में दिखाया जाता है।
- सुपरस्टार मोहनलाल, जिनके पास अपार प्रभाव है, उन कई हिंदू-विरोधी प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बने हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या वे इन प्रवृत्तियों को सामान्य बनाने में सहायक हैं।
- जाति आधारित व्यंग्य और हिंदू-विरोध अब मलयालम फिल्मों की जड़ में समा चुका है , जैसा कि 1971: बियॉन्ड बॉर्डर्स और पट्टारुडे मटन करी जैसी फिल्मों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
- जैसे-जैसे केरल में हिंदू जनसंख्या घट रही है और फिल्म उद्योग पर गैर-हिंदू निवेशकों का प्रभाव बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हिंदू आवाज़ों और प्रतिनिधित्व को मिटाया या बदनाम किया जा रहा है।
मलयालम भाषा की फिल्म एम्पुरान को आलोचकों और दर्शकों दोनों ने तीव्र आलोचना का शिकार बनाया है क्योंकि यह फिल्म वामपंथी और मुस्लिम पक्ष के लिए एक प्रचार का साधन बनकर प्रस्तुत की गई है। फिल्म की शुरुआत 2002 के गुजरात दंगों के भयावह दृश्यों से होती है, जिसमें एक मुस्लिम गांव को जलाते हुए, हिंदू पुरुषों द्वारा एक मुस्लिम बच्चे पर बेरहमी से हमला करते हुए, और एक गर्भवती मुस्लिम महिला पर हिंसा करते हुए दिखाया गया है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, फिल्म में यह दर्शाया गया है कि दंगों के दौरान हिंदू राजनेता पुलिस और केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर रहे हैं।[1] यह फिल्म उन झूठे नैरेटिव्स को दोहराती है जिन्हें वामपंथी कार्यकर्ताओं ने गढ़ा, मुख्यधारा मीडिया ने प्रचारित किया, और उदारवादी बौद्धिक वर्ग ने और बढा चढ़ा कर प्रस्तुत किया।[2] फिल्म की मंशा इस बात से स्पष्ट हो जाती है कि जिन आरोपों को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 में खारिज कर दिया था, उन्हीं आरोपों को ये फिल्म सच्चाई के रूप में दर्शा रही है।[3][4] निर्देशक पृथ्वीराज सुकुमारन की फिल्मों में प्रायः हिंदू-विरोधी तत्व दिखाई देते हैं[5], इस लिए इसमे कोई संदेह नहीं है कि एम्पुरान को एक व्यापक हिंदू-विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए ही बनाया गया है।
जो लोग भारत की फिल्म इंडस्ट्री से अपरिचित हैं, उनके लिए यह जानना आवश्यक है कि मलयालम फिल्म इंडस्ट्री दक्षिण भारत के केरल राज्य में आधारित है। मुंबई स्थित बॉलीवुड की तुलना में, जो हिंदी फिल्में बनाता है, यह उद्योग आकार में छोटा है, लेकिन विदेशों में बसे केरलवासियों की बड़ी संख्या के कारण इसका प्रभाव काफी व्यापक है। शायद इसीलिए कि मलयालम फिल्मों की कहानियाँ अक्सर वामपंथी विचारधारा और हिंदू-विरोधी दृष्टिकोण को बढ़ावा देती हैं, यह इंडस्ट्री आज तक कोई ऐसी अखिल-भारतीय हिट फिल्म नहीं दे पाई जो बॉलीवुड को टक्कर दे सके। एम्पुरान को इस अवरोध को तोड़ने वाली और मलयालम सिनेमा को एक गंभीर राष्ट्रीय मंच देने वाली फिल्म के रूप में प्रचारित किया गया था।
हिंदू अस्तित्व पर संकट
मलयालम सिनेमा, ठीक उसी प्रकार जैसे भारत के अन्य हिस्सों का सिनेमा, राज्य और राष्ट्र की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना का प्रतिबिंब होता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति उभरी है — जहाँ जाति और धर्म को ऐसे ढंग से दर्शाया जाता है जो मूल रूप से हिंदू-विरोधी होता है। हिंदू पात्रों और धार्मिक परंपराओं को अक्सर नकारात्मक, तुच्छ या उपेक्षापूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। जब यह चित्रण फिल्म उद्योग की सत्ता-संरचनाओं से जुड़ता है, तो यह हिंदुओं और उनकी सांस्कृतिक पहचान के प्रतिनिधित्व पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि मलयालम फिल्मों की कथावस्तु में जातिवाद और हिंदू-विरोध की गहरी परतें समाई हुई हैं, जो न केवल कहानियों को प्रभावित करती हैं बल्कि यह भी तय करती हैं कि किन समुदायों को कैसे चित्रित किया जाएगा।
मोहनलाल – नायक या खलनायक?
एम्पुरान को स्टार पॉवर से बढ़ावा देने के लिए आलोचना झेलने के बाद, लीड एक्टर मोहनलाल विश्वनाथन ने अब खुद को इस फिल्म से दूरी बनाने की कोशिश की है। लेकिन क्या मलयालम सिनेमा का यह सुपरस्टार उतना ही मासूम है जितना वह दिखाने की कोशिश करता है? अगर हिंदुओं को नकारात्मक रूप में दिखाया गया है, तो फिर उन्होंने ऐसी फिल्म में काम करने के लिए हाँ क्यों की? हो सकता है कि वह खुद स्क्रिप्ट न लिखते हों, लेकिन 476 करोड़ रुपये (लगभग 55 मिलियन डॉलर)[6] की संपत्ति और इंडस्ट्री में उनकी जबरदस्त पकड़ को देखते हुए, उनके पास कहानी में बदलाव लाने या उसे प्रभावित करने की पूरी ताकत है। वे चाहते तो अपने करीबी दोस्त पृथ्वीराज से कह सकते थे कि स्क्रिप्ट में हिंदू-विरोधी बातें कम की जाएँ — लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
ऐसा पहली बार भी नहीं हुआ। दृश्यम (2013) जैसी मेगाहिट फिल्म में भी हीरो एक ईसाई होता है — जॉर्जकुट्टी — जो अपने परिवार की रक्षा के लिए सब कुछ करता है, जबकि विलेन एक हिंदू परिवार होता है। अगर आप फिल्म के क्रेडिट्स देखेंगे तो समझ में आ जाएगा क्यों — निर्माता हैं एंटनी पेरुंबवूर और निर्देशक-लेखक हैं जीतू जोसेफ।[7] इसके बावजूद, मोहनलाल को स्क्रिप्ट में मौजूद इस सूक्ष्म हिंदू-विरोध से कोई आपत्ति नहीं थी। इसे आप ‘ब्रोकन विंडो थ्योरी’ कह सकते हैं — जब किसी छोटे अपराध को रोका नहीं जाता, तो आगे चलकर बड़ा अपराध करना आसान हो जाता है।[8]
जाति को हथियार बनाना
मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के एक प्रमुख सदस्य मोहनलाल उस व्यवस्था का हिस्सा हैं जिसने वर्षों से जाति आधारित रूढ़ियों को सामान्य बना दिया है। जाति पर व्यंग्य (कास्ट फोबिया) से लेकर हिंदुओं को नकारात्मक रूप में दिखाने (हिंदूफोबिया) तक, मलयालम सिनेमा लगातार वामपंथी-मुस्लिम-ईसाई गठजोड़ के एजेंडे के अनुरूप चलता रहा है। एम्पुरान इस छिपे हुए एजेंडे का स्वाभाविक परिणाम है।
2021 की फिल्म पट्टारुडे मटन करी (ब्राह्मण की मटन करी) में एक लंबा दृश्य है, जिसमें एक ब्राह्मण पात्र को मटन करी बनाते हुए दिखाया गया है। सवाल यह है — क्या वे कभी “सैयद की पोर्क करी” नाम की फिल्म बना सकते हैं?
इस फिल्म को लेकर केरल ब्राह्मण संघ इतना आहत हुआ कि उन्होंने तिरुवनंतपुरम स्थित सेंसर बोर्ड को एक पत्र लिखा। उन्होंने बताया कि ‘पट्टर’ मलयालम में ब्राह्मणों को नीचा दिखाने वाला एक उपहासात्मक शब्द है। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि ‘मटन करी’ जैसे शब्द को शीर्षक में शामिल करना ब्राह्मण समाज का जानबूझकर अपमान करने की मंशा से किया गया है। उन्होंने लिखा, “यह सर्वविदित है कि ब्राह्मण शाकाहारी होते हैं। ऐसे में ‘पट्टर’ और ‘मटन करी’ जैसे शब्दों का संयोजन ब्राह्मण समुदाय का अपमान करने के इरादे से किया गया है।”[9]
जाति और धर्म का एक और स्पष्ट प्रयोग 2017 की फिल्म 1971: बियॉन्ड बॉर्डर्स में देखा गया। फिल्म में मोहनलाल का किरदार ‘सहदेवन’ एक मंदिर उत्सव में भाग ले रहा होता है, जहाँ वह ‘सुलेमान’ नामक मुस्लिम पात्र को भी उत्सव देखने के लिए आमंत्रित करता है। इस पर मंदिर का एक व्यवस्थापक टिप्पणी करता है, “सहदेवा, मुसलमानों को मंदिर में लाने की ज़रूरत नहीं है। हमारे पास शुद्धिकरण के लिए समय नहीं है। सुलेमान, तुम वापस जाओ।” इसके उत्तर में मोहनलाल का पात्र मंदिर व्यवस्थापक पर व्यंग्य करता है और कहता है, “तुम्हें धोती पहनने, तिलक लगाने और मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति मिले अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ है।”[10]
यह दृश्य दो बातों को स्थापित करता है। पहली, यह दर्शाता है कि मोहनलाल का पात्र एक पूर्व सवर्ण जाति से है — जो उनके अधिकतर फिल्मों में एक सामान्य पैटर्न है। दूसरी, यह दृश्य एक पूर्व निम्न जाति के व्यक्ति को उसकी ‘जगह’ दिखाता है। वह भले ही मंदिर का व्यवस्थापक हो, लेकिन एक पूर्व सवर्ण नायक के सामने उसे पीछे हटना पड़ता है और मुस्लिम को प्रवेश देने की अनुमति देनी पड़ती है। यह दृश्य हास्यास्पद लगता है क्योंकि वास्तविक जीवन में केरल में ऐसा होना असंभव है। बीते डेढ़ सौ वर्षों के सामाजिक सुधार और कल्याणकारी आंदोलनों के कारण आज केरल में किसी की जाति का उल्लेख करना एक गंभीर सामाजिक अपराध माना जाता है। यदि कोई ऐसा करता है, तो उसे तुरंत सांप्रदायिक या जातिवादी करार दे दिया जाता है।[11]
दिलचस्प बात यह है कि 1971: बियॉन्ड बॉर्डर्स के हिंदी संस्करण में यह विवादित दृश्य पूरी तरह हटा दिया गया, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह दृश्य केवल केरल के दर्शकों के लिए ही रखा गया था। सच तो ये है कि वह जातिवादी और हिंदू-विरोधी सामग्री, जिसे केरल के विचारधारात्मक रूप से प्रभावित वामपंथी दर्शक सहजता से स्वीकार कर लेते हैं, राज्य के बाहर स्वीकार्य नहीं है। यह दृश्य हिंदी संस्करण में 22वें मिनट के आसपास नहीं मिलता:[12] https://www.youtube.com/watch?v=rmFcQ7DFbNM
वास्तविक जीवन में मुसलमान हिंदू मंदिरों में जाने को लेकर इच्छुक नहीं होते, क्योंकि एक आस्थावान मुसलमान के लिए मंदिर में प्रवेश करना ‘शिर्क’ होता है — जो इस्लाम में सबसे बड़ा पाप माना जाता है। यही कारण है कि भारत में अधिकतर मुसलमान हिंदू मंदिरों से दिया गया प्रसाद तक स्वीकार नहीं करते।[13]
छिपा हुआ पक्षपात
बियॉन्ड बॉर्डर्स में मंदिर व्यवस्थापक का यह संवाद कि मुस्लिम के प्रवेश के बाद शुद्धिकरण की आवश्यकता होगी — यह संकेत देता है कि मुस्लिम और ईसाई समुदायों को द्वितीय श्रेणी का नागरिक समझा जाता है, और जैसे कि केरल के मंदिरों में उनके प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध है। यह वही ‘अत्याचार साहित्य’ (atrocity literature) है, जिसमें वामपंथी गिरोह माहिर है।[14]
सच्चाई यह है कि केवल कुछ ही हिंदू मंदिर — जैसे कि गुरुवायूर — गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाते हैं। इसका कारण है मुस्लिम और ईसाई आक्रमणकारियों का सदियों से अनेक मंदिरों को लूटना, तोड़ना और अपवित्र करना । यह प्रतिबंध मुख्यतः उसी आक्रमणकारी इतिहास की प्रतिक्रिया में है।[15] केरल के 99% मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है।
अब नज़र डालिए बॉलीवुड की पुरानी फिल्मों पर। अधिकांश भारतीयों ने हिंदुस्तान की कसम, ललकार, हकीकत और बॉर्डर जैसी हिंदी फिल्मों के साथ अपना बचपन बिताया है। हालांकि बॉलीवुड में भी हिंदूफोबिया की कुछ झलकियाँ मिलती हैं, फिर भी इन फिल्मों ने कभी खुले रूप से हिंदू-विरोधी एजेंडा नहीं फैलाया। कल्पना कीजिए कि अगर बॉर्डर में सनी देओल, जो एक सिख सैनिक की भूमिका में हैं, जातिवाद पर भाषण देते या शांति की बातें करते तो दर्शक उस फिल्म को सिरे से खारिज कर देते, और निर्माता-मंडली उपहास का पात्र बन जाती।
लेकिन केरल में, मोहनलाल की प्रशंसा की जाती है क्योंकि वहाँ जातिगत व्यंग्य और तिरस्कार को बड़े पर्दे पर सामान्य बना दिया गया है। दशकों से चल रहे इस जाति-आधारित व्यंग्य ने एक तरह का ‘निहित जातिवाद’ (implicit casteism) जन्म दे दिया है, जिसमें लोग अपनी ही जाति पर किए गए कटाक्ष को देखकर हँसते हैं — और विरोध करने की नैतिक शक्ति खो चुके हैं।
विषाक्त लॉबी
कैंसिल कल्चर, यौन शोषण, अपराधी गिरोह, आधी रात के छापे, साइबर बुलिंग और कर्मचारियों के साथ अमानवीय व्यवहार — यह सब एक बी-ग्रेड थ्रिलर की कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन जस्टिस के. हेमा समिति की रिपोर्ट के अनुसार, यह मलयालम फिल्म इंडस्ट्री की वास्तविकता है। जब यह रिपोर्ट 2024 में सार्वजनिक हुई, कुछ लोगों को आश्चर्य हुआ, परंतु अधिक ने कहा कि “हमें तो पहले से ही पता था“।[16]
लेकिन इस सड़े हुए तंत्र की सबसे पहली और साहसिक पोल 2010 में दिग्गज अभिनेता थिलकन ने खोली थी। उन्होंने केरल की फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय एक ‘मूवी माफिया’ की ओर इशारा किया था, जो कलाकारों पर गुप्त प्रतिबंध लगाता है।[17] उन्होंने AMMA (Association of Malayalam Movie Artists) पर गंभीर आरोप लगाए थे, जिनके कारण उन्हें अपने करियर में भारी नुकसान उठाना पड़ा।[18] एझावा समुदाय से आने वाले 75 वर्षीय थिलकन को एक साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया। जब हेमा समिति की रिपोर्ट ने 2024 में उनके दावों की पुष्टि की, तब तक 12 वर्ष से भी अधिक समय हो चुका था।
हिंदुओं को पराया बनाना
केरल की फिल्मों में जो हो रहा है, वह ‘स्लिपरी स्लोप सिंड्रोम’ — यानी धीरे-धीरे गिरते जाने की प्रवृत्ति — का स्पष्ट उदाहरण है। दशकों तक वहाँ की फिल्म इंडस्ट्री ने जाति को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया, ताकि हिंदुओं के भीतर ही फूट डाली जा सके। अब मलयालम सिनेमा खुलकर हिंदू-विरोधी सामग्री प्रस्तुत कर रहा है। जैसे-जैसे केरल में हिंदू जनसंख्या (अब 50% से भी कम मानी जा रही है) घट रही है, वैसे-वैसे फिल्मों में हिंदू पात्रों की उपस्थिति भी घटती जा रही है। अब यह आम बात हो गई है कि प्रमुख पात्र ईसाई या मुस्लिम हों, जबकि हिंदू पात्र केवल गौण भूमिकाओं तक सीमित रह जाएँ। आज के मलयालम सिनेमा में हिंदुओं को लालची, कामुक, हिंसक या भ्रष्ट के रूप में दिखाना एक सामान्य बात बन चुकी है। चिंताजनक यह है कि न तो जनता और न ही मीडिया इस प्रवृत्ति का विरोध कर रहा है। इसके परिणामस्वरूप, मलयालम फिल्म इंडस्ट्री अब बड़े पैमाने पर हिंदू-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी ताकतों के प्रभाव में आ चुकी है।
केरल के एक रूढ़िवादी स्तंभकार राजीव श्रीनिवासन लिखते हैं कि मुख्यधारा की मलयालम फिल्मों में उन्होंने सबसे पहले हिंदुओं और हिंदू धर्म पर लगातार, कभी-कभी जानबूझकर किया गया हमला देखा। यह प्रवृत्ति अब सामान्य हो गई है।[19]
1973 की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माल्यम में चरम दृश्य यह है कि एक वेलिचापाडु (मंदिर का ओरेकल), जो जीवन भर एक गरीब हिंदू मंदिर की सेवा करता रहा है, अंत में निराश होकर देवी-देवता की मूर्ति पर थूक देता है और मर जाता है। खास बात यह है कि इस पात्र को निभाने वाला अभिनेता जोसेफ नामक एक ईसाई था।
राजीव श्रीनिवासन लिखते हैं: “जो बात मुझे सबसे अधिक चौंकाने वाली लगी, वह यह थी कि किसी अन्य धर्म के विरुद्ध ऐसा दृश्य दिखाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती, चाहे फिल्म कितनी भी ‘प्रगतिशील’ क्यों न हो — क्योंकि वह ईशनिंदा मानी जाएगी और गंभीर परिणाम होंगे। लेकिन वामपंथी ‘बुद्धिजीवियों’ की भाषा में हिंदुओं को नीचा दिखाना पूरी तरह स्वीकार्य है, और ऐसा करने वाले निर्देशक को साहित्यिक पुरस्कार तक मिल जाते हैं।”
मलयालम फिल्मों में, श्रीनिवासन ने यह भी गौर किया कि हिंदू संन्यासियों (स्वामियों) को लगभग हर बार ठग, धोखेबाज़ या भ्रष्ट व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके विपरीत, ईसाई पादरी हमेशा पवित्र और दयालु होते हैं, और मुस्लिम मौलवी सख्त ज़रूर होते हैं, लेकिन उनके पास एक ‘सोने का दिल’ होता है। श्रीनिवासन कहते हैं, “यह वामपंथी नैरेटिव का एक मानक प्रारूप है। समय के साथ यह कथा इतनी जड़ हो गई कि यहाँ तक कि उन काल्पनिक कहानियों में भी, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित होती हैं और जिनमें कोई अब्राहमिक किसी हिंदू को नुकसान पहुँचाता है, वहाँ भी भूमिकाएँ पलट दी जाती हैं — और खलनायक हमेशा हिंदू ही होता है।”
समय के साथ जैसे-जैसे ईसाई वर्ग ने फिल्मों को आर्थिक रूप से समर्थन देना शुरू किया, उनकी कहानियाँ केंद्र में आ गईं — लेकिन हिंदू-विरोधी भावना बनी रही। आज अधिकांश मलयालम फिल्मों का वित्तपोषण मुस्लिम वर्ग द्वारा किया जा रहा है, फिर भी हिंदू-विरोध ज्यों का त्यों बना हुआ है। यही पैटर्न हमें बॉलीवुड में भी देखने को मिलता है, जहाँ हिंदुओं, उनकी धार्मिक परंपराओं और देवी-देवताओं का मज़ाक उड़ाना सामान्य बात हो गई है।
श्रीनिवासन का निष्कर्ष है कि मलयालम फिल्मों में हिंदुओं का दानवीकरण (demonization) इस हद तक पहुँच गया है कि 2022 की फिल्म मेप्पडीयन को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि इसमें एक धार्मिक, प्रतिबद्ध हिंदू नायक था, और फिल्म में एक एंबुलेंस दिखाई गई थी जो हिंदू सेवा संगठन सेवा भारती द्वारा दान की गई थी। वे लिखते हैं, “यह कैंसिल कल्चर की उस चरम अवस्था तक पहुँच चुका है जहाँ हिंदुओं के अस्तित्व के अधिकार को ही नकारा जा रहा है। यह धीरे-धीरे जातीय सफ़ाए और नरसंहार की मानसिकता को सामान्य करने जैसा है।”
मलयालम सिनेमा: केरल के इस्लामीकरण की पटकथा
2021 में मोपला दंगों[20] की शताब्दी के अवसर पर अभिनेता पृथ्वीराज ने ‘वारीयमकुनन’ नामक एक फिल्म बनाने की योजना बनाई। यह फिल्म वारीयम कुन्नाथु कुंजाहम्मद हाजी नाम के एक कट्टर इस्लामी चरित्र पर आधारित थी, जिसने 1921 के दौरान केरल में हिंदुओं के नरसंहार का नेतृत्व किया था। इस नरसंहार में 10,000 से अधिक हिंदुओं की हत्या हुई, जबरन धर्मांतरण कराए गए, महिलाओं और बच्चों के साथ बलात्कार हुआ, तथा मंदिरों व हिंदू संपत्तियों को नष्ट कर दिया गया।
इस बायोपिक में पृथ्वीराज स्वयं मुख्य भूमिका निभाने वाले थे, जिसमें कुंजाहम्मद को एक साहसी स्वतंत्रता सेनानी और हिंदुओं को अंग्रेजों के सहयोगी खलनायक की तरह चित्रित किया गया था। केरल की मुस्लिम बिरादरी और वामपंथी सरकारों ने वर्षों से कुंजाहम्मद को एक ऐसा नायक सिद्ध करने की कोशिश की है, जिसने ब्रिटिशों को खदेड़ कर कुछ समय के लिए ‘मलयाला नाडु’ नामक एक स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था। लेकिन सच्चाई यह है कि उसने एक इस्लामी शासन ‘अल-दौला’ की स्थापना की थी, जिसमें हिंदुओं पर जज़िया नामक धार्मिक कर लगाया गया था।
बात यहीं खत्म नहीं होती। फिल्म से जुड़े कई प्रमुख पद—निर्माण से लेकर निर्देशन तक—ऐसे लोगों को सौंपे गए थे जिनका झुकाव पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और इस्लामिक स्टेट जैसे कट्टरपंथी संगठनों की ओर था। फिल्म के एक लेखक ने सोशल मीडिया पर कहा था कि “सिनेमा के माध्यम से केरल के इस्लामीकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है।” एक अन्य व्यक्ति, जो इस परियोजना से जुड़ा था, कथित रूप से सीरिया जाकर इस्लामिक स्टेट में शामिल होकर ‘जिहाद’ छेड़ने की असफल कोशिश कर चुका था।[21] अंततः जब फिल्म निर्माताओं को हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को छिपाने के प्रयासों को लेकर भारी जनविरोध का सामना करना पड़ा, तो परियोजना को स्थगित कर दिया गया[22]।
हालाँकि पृथ्वीराज इस तरह की विचारधारा से प्रभावित पहले फिल्मकार नहीं थे। 1988 में मलयालम सिनेमा में ‘1921’ नाम की एक फिल्म बनाई गई थी, जिसका निर्देशन प्रसिद्ध हिंदू निर्देशक आईवी शशि ने किया था। इस फिल्म में कुंजाहम्मद को एक नायक के रूप में glorify किया गया और हिंदू नरसंहार की घटनाओं को पूरी तरह छुपा दिया गया।[23] यह फिल्म वामपंथी और उदारवादी हलकों में प्रशंसा का पात्र बनी और इसे हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बताया गया, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत थी।
अब आते हैं 2022 पर। केरल के एक अन्य फिल्म निर्माता अली अकबर, जिन्होंने अब स्वयं को रामसिंहान कहना शुरू कर दिया है, ने इसी ऐतिहासिक विषय पर एक नई फिल्म बनाने का निर्णय लिया। लेकिन इस बार उद्देश्य था सच्चाई दिखाना—कैसे मुसलमानों ने हिंदुओं पर अत्याचार किए, ब्राह्मण परिवारों को जबरन गोमांस खिलाया गया, हिंदुओं के शवों से कुएँ भर दिए गए और कैसे हज़ारों लोगों को इस्लाम में परिवर्तित किया गया।[24]
रामसिंहान को शुरुआत से ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पृथ्वीराज समेत कई निवेशकों ने इस परियोजना से दूरी बना ली, जिससे उन्हें जनता से धन जुटाने (crowdsourcing) का सहारा लेना पड़ा। शूटिंग के दौरान राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने उन्हें चेतावनी दी कि उन्हें इस्लामी चरमपंथियों से गंभीर खतरा है। उन्होंने बताया, “केंद्रीय एजेंसियाँ मेरे घर आईं और आठ सुरक्षा कैमरे लगवाने की सलाह दी।”[25]
फिल्म के पूर्ण होने के बाद, सेंसर बोर्ड—जिसमें वामपंथी, उदारवादी और मुस्लिम सदस्य शामिल थे—ने अनेक महत्वपूर्ण दृश्यों को हटाने की मांग की। इन कटौतियों से फिल्म का मूल संदेश ही नष्ट हो जाता। अंततः रामसिंहान को केरल हाई कोर्ट की शरण लेनी पड़ी, जिसने उनकी फिल्म ‘1921: पुझा से पुझा तक’ को सात प्रमुख दृश्यों को हटाने की शर्त पर पास किया। यह पूरे तंत्र की एक झलक है—जो किसी भी ऐसी कोशिश के विरोध में एकजुट हो जाता है, जहाँ कोई हिंदुओं के दृष्टिकोण से सच्चाई दिखाने का प्रयास करता है।[26]
निष्कर्ष
केरल के वे हिंदू जो मार्क्सवादी और कथित सेक्युलर विचारधारा के प्रभाव में डूबे हुए हैं, संभवतः मोहनलाल, पृथ्वीराज और उनके साथियों का समर्थन करते रहेंगे। उन्हें इस बात से कोई आपत्ति नहीं है कि मलयालम फिल्म इंडस्ट्री अब एक मार्क्सवादी-मुल्ला-मिशनरी गठजोड़ के अधीन है, जिसका वास्तविक उद्देश्य केरल से हिंदू पहचान को मिटाना है। उन्हें इस पर भी आपत्ति नहीं होती कि पृथ्वीराज भारत के पहले शरिया-अनुपालन वाले अपार्टमेंट्स का समर्थन करते हैं, जिनके सभी फ्लैट मक्का की दिशा में बनाए गए हैं, जहाँ निवासी एक ही धर्म, खान-पान और पहनावे को साझा करते हैं। यानी वहाँ कोई गैर-मुस्लिम पड़ोसी नहीं होगा। लेकिन यदि आप इसे हाउसिंग अपार्थेड (धार्मिक अलगाव) कहें, तो आपकी सेक्युलर छवि पर सवाल उठ खड़े हो सकते हैं।[27]
आज केरल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत हो चुकी है। ऐसे में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री को इस्लाम-समर्थक और हिंदू-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने का और भी ज़्यादा प्रलोभन मिल सकता है। लेकिन एम्पुरान के उदाहरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब हिंदू समाज इन झूठे और पक्षपाती नैरेटिव्स के विरुद्ध प्रतिक्रिया देने लगा है।
ऐसे माहौल में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के लिए अब यह ज़रूरी हो गया है कि वह पर्दे पर और पर्दे के पीछे मौजूद अपने वैचारिक पक्षपात को स्वीकार करे और उसका ईमानदारी से सामना करे। इस इंडस्ट्री को अधिक विविध आवाज़ों की आवश्यकता है — ऐसे फिल्मकारों की जो संकीर्ण वैचारिक खाँचों से बाहर निकलकर सोच सकें, और ऐसी कहानियाँ गढ़ सकें जो वास्तव में केरल की सामाजिक संरचना को प्रतिबिंबित करें — जिसका सांस्कृतिक आधार निस्संदेह हिंदू धर्म है।
जब तक यह नहीं होता, तब तक इस इंडस्ट्री की जातिगत और वैचारिक संरचना में छिपा हुआ हिंदूफोबिया न केवल पूर्वग्रहों को बढ़ाता रहेगा, बल्कि सामाजिक विभाजन को भी और अधिक गहरा करता रहेगा। और तब तक मलयालम सिनेमा को अखिल-भारतीय दर्शकवर्ग का समर्थन मिल पाना असंभव रहेगा।
संदर्भ सूची
[1] Malayalam star Mohanlal expresses regret after his film ‘Empuraan’ shows Hindus in bad light, regrets distress to fans, assures removal of such references (OpIndia, 2025); https://www.opindia.com/2025/03/malayalam-star-mohanlal-issues-apology-after-outrage-over-his-film-empuraan-showing-hindus-in-bad-light/
[2] Sanjiv Bhatt, Teesta Setalvad, Congress, leaked emails and BlackBerry: How the ‘ecosystem’ was united to play politics over the dead (OpIndia, 2022); https://www.opindia.com/2022/06/how-teesta-setalvad-sanjiv-bhatt-congress-spread-lies-against-pm-modi-on-gujarat-riots/#google_vignette
[3] ‘Narendra Modi fought for 19 years, braved pain’: Amit Shah defends PM after ruling on Gujarat riots (The Economic Times, 2022); https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/narendra-modi-fought-for-19-years-braved-pain-amit-shah-defends-pm-after-ruling-on-gujarat-riots/articleshow/92450438.cms?from=mdr
[4] Gujarat Riots Verdict: Will Those Who Created An ‘Industry Of Lies’ Finally Be Made To Pay? (Swarajya, 2022); https://swarajyamag.com/politics/gujarat-riots-verdict-will-those-who-created-an-industry-of-lies-finally-be-made-to-pay
[5] Unmasking the anti-Hindu and anti-Bharat narrative in Malayalam film ‘Empuraan’ (Organiser, 2025); https://organiser.org/2025/03/30/285110/bharat/unmasking-the-anti-hindu-and-anti-bharat-narrative-in-malayalam-film-empuraan/
[6] Mohanlal Net Worth, Salary, House (MoneyMint, 2024); https://moneymint.com/mohanlal-net-worth-salary-house/
[7] https://www.imdb.com/title/tt3417422/fullcredits/?ref_=tt_cst_sm
[8] Broken Windows Theory (Psychology Today); https://www.psychologytoday.com/nz/basics/broken-windows-theory#:~:text=The%20broken%20windows%20theory%20states,to%20work%20and%20educational%20environments
[9] Kerala Brahmins Association takes offence to ‘Pattarude Mutton Curry’ short film title (The News Minute, 2021); https://www.thenewsminute.com/kerala/kerala-brahmins-association-takes-offence-pattarude-mutton-curry-short-film-title-145335
[10] 1971 Beyond Borders Malayalam Superhit Movie Scene 1971 (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=A9PMI8epX60
[11] Life of Sree Narayana Guru: What impact did he have on our society? (Organiser, 2021); https://organiser.org/2021/08/20/21408/analysis/life-of-shree-narayana-guru-his-reforms-and-philosophies/
[12] 1971: Beyond Borders | Hindi Dubbed Full Movie | | Mohanlal | Arunoday Singh | Allu Sirish (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=rmFcQ7DFbNM
[13] Are Muslims allowed to eat Prasad from Hindu temple and can they eat food cooked by Hindus? Here is what Darul Uloom Deoband says (OpIndia, 2022); https://www.opindia.com/2022/09/are-muslims-allowed-to-eat-prasad-from-hindu-temple-what-darul-uloom-deoband-says/
[14] Breast Tax: A False Story to Attack Hindus (Hindupost, 2016); https://hindupost.in/society-culture/breast-tax-a-false-story-to-attack-hindus/
[15] https://www.prekshaa.in/tipu-sultan-temple-destroyer-par-excellence
[16] Hema committee reveals 17 forms of exploitation in Malayalam film industry in Kerala including sexual harassment, assault (The Economic Times, 2024); https://economictimes.indiatimes.com/news/india/hema-committee-reveals-17-forms-of-exploitation-in-malayalam-film-industry-in-kerala/articleshow/112643493.cms?from=mdr
[17] Thilakan (Malayalam actor) speaks out against Mammootty, AMMA and FEFKA (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=UvNkxH7-yiU&t=325s
[18] Thilakan In Nerechowe – Old Episode | Manorama News (YouTube); https://www.youtube.com/watch?app=desktop&v=uDT8EhMXsYs
[19] Cinema As Metaphor: Enough With Trashing Hindu Sentiment, Especially As Streaming Largesse Fades (Swarajya, 2022); https://swarajyamag.com/culture/cinema-as-metaphor-enough-with-trashing-hindu-sentiment-especially-as-streaming-largesse-fades
[20] What MK Gandhi said while Moplah Muslims massacred thousands of Hindus in 1921: Support to Khilafat and asking Hindus to die without a fight (OpIndia, 2021); https://www.opindia.com/2021/09/what-mk-gandhi-said-moplah-genocide-of-hindus-1921-support-khilafat/
[21] Moplah riots were a pogrom against Hindus (Sunday Guardian, 2020); https://sundayguardianlive.com/opinion/moplah-riots-pogrom-hindus#google_vignette
[22] Malayalam movie ‘Vaariyamkunnan’ glorifying the Jihadis behind Moplah Hindu genocide in Kerala shelved after outrage (OpIndia, 2021); https://www.opindia.com/2021/09/malayalam-movie-vaariyamkunnan-hailing-jihadis-shelved-after-protests/
[23] Nineteen Twenty One (IMDB, 1988); https://www.imdb.com/title/tt0271675/
[24] Here’s how Kerala censor board killed Ramasimhan’s film based on Malabar Hindu Genocide (Organiser, 2022); https://organiser.org/2022/09/06/93270/bharat/heres-how-kerala-censor-board-killed-ramasimhans-film-based-on-malabar-hindu-genocide/
[25] The exclusive story on how Ramasimhan’s movie on 1921 Malabar Genocide of Hindus is being stonewalled: Cuts by CBFC, threats by Islamists and more (OpIndia, 2022); https://www.opindia.com/2022/09/exclusive-how-ramasimhan-ali-akbar-movie-1921-moplah-genocide-hindus-stonewalled-cbfc/
[26] 1921 Puzha Muthal Puzhavare Official Trailer (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=eM3JCLwNhWA
[27] In a first, Sharia compliant apartments come up in Kerala (Times of India, 2018); https://timesofindia.indiatimes.com/city/kochi/shariah-model-flats-facing-mecca-clocks-in-sync-with-azan/articleshow/64151619.cms#:~:text=The%20high%2Dend%20apartments%20coming,be%20heard%20clearly%20in%20all
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