स्मृतियों की हत्या: 1946 के बंगाल के हिन्दू नरसंहार को कैसे छुपाया जा रहा है

The Wire का एक लेख 1946 के बंगाल नरसंहार को किसानों के विद्रोह की तरह पेश करता है। असल में यह इतिहास को तोड़-मरोड़ने की कोशिश है। ऐसी कोशिशें हिंदुओं की पीड़ा को नगण्य दिखाती हैं, इस्लामी राजनीति के असली मक़सद छिपाती हैं और विभाजन को प्रगतिशील कदम बनाकर पेश करती हैं।
  • अहमद हुसैन ने The Wire में लिखा कि 1946 की हिंसा “न्याय के लिए किसानों का विद्रोह” थी। जबकि सच्चाई यह है कि यह हिंदुओं को निशाना बनाकर पाकिस्तान के नाम पर रचा गया सुनियोजित नरसंहार था।
  • यह दावा कि इस्लाम ने दलितों को सम्मान और हिंदू उत्पीड़न से मुक्ति दी, भ्रामक है। मुस्लिम समाज में आज भी ‘पसमांदा’ जैसी गहरी जातिगत असमानताएँ मौजूद हैं, जो इस मिथक को झुठलाती हैं।
  • जोगेंद्रनाथ मंडल को एक दलित उत्थान का उदाहरण बताना गलत है। पाकिस्तान में उनका राजनीतिक जीवन धोखे और निराशा में खत्म हुआ। हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को देखकर वे 1950 में निर्वासन के लिए मजबूर हुए।
  • साम्प्रदायिक हिंसा को वर्गीय टकराव बताना हकीकत को झूठ में बदल देना है। यह बलात्कार, हत्याओं और जबरन धर्मांतरण जैसे अपराधों के पीछे की धार्मिक नीयत को ढक देता है और हिंदू पीड़ितों की याद का अपमान करता है।
  • जिहादी हिंसा को प्रगतिशील भाषा में लपेटकर पेश करना इतिहास को झूठा दिखाने जैसा है। इससे असलियत पर पर्दा पड़ता है और समाज विभाजन-काल की कड़वी सच्चाइयों को भूलने लगता है।

डायरेक्ट एक्शन डे को 79 साल हो गए, लेकिन कुछ लोग अब भी विभाजन की खून-खराबे वाली सच्चाई को “न्याय की लड़ाई” कहकर धोने की कोशिश कर रहे हैं। The Wire में अहमद हुसैन का हाल का लेख भी यही करता है।[1] उसमें बंगाल की हिंसा को साम्प्रदायिक नरसंहार नहीं, बल्कि जमींदारी शोषण के खिलाफ किसानों का विद्रोह बताया गया है। उनके लेख के अनुसार पाकिस्तान की माँग कर्ज़ में दबे किसानों का संघर्ष था और इस्लाम शोषितों का स्वाभाविक उद्धारक।

असलियत यह है कि यह इतिहास नहीं, बल्कि याददाश्त मिटने के लिए लिखा गया झूठ है। मुस्लिम लीग की अलगाववादी राजनीति को न्याय की लड़ाई बताकर हुसैन यह असलियत  छिपाने की कोशिश कर रहे हैं कि 1946 के बंगाल नरसंहार इज़्ज़त या बराबरी के लिए नहीं थे, बल्कि हिंदुओं को डराने, मारने और गुलाम बनाने के लिए सुनियोजित हिंसा थी। “सामाजिक न्याय” शब्द का डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखली नरसंहार के साथ इस्तेमाल करना केवल धोखा नहीं है, बल्कि उन हजारों हिंदू औरतों, मर्दों और बच्चों का अपमान है जिन्हें मारा गया, जिनका बलात्कार हुआ और जबरन धर्म बदलवाया गया। इतिहास को मीठे शब्दों से छिपाना, असल में इतिहास से गद्दारी है।

यह प्रत्युत्तर हुसैन की तीन प्रमुख दलीलों की परतें खोलता है: हिंसा का बचाव करने वाली व्याख्या, इस्लाम की खोखली बराबरी की छवि और मंडल के नाम का राजनीतिक दुरुपयोग। 1946 की सच्चाई और उसके डरावने नतीजे तभी समझे जा सकते हैं, जब इन झूठे मिथकों का सामना किया जाए।

1946 बंगाल नरसंहार की असलियत

अगस्त 1946 में मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने पूरे भारत के मुसलमानों की ओर से बोलने का दावा करते हुए “डायरेक्ट एक्शन” का ऐलान किया। इसका नतीजा आंदोलन नहीं, बल्कि नरसंहार निकला।

चार दिनों तक, 16 से 19 अगस्त, कलकत्ता मौत का शहर बन गया। मुस्लिम लीग के गुंडे और भीड़, पाकिस्तान के नारे लगाते हुए, हिंदू मोहल्लों पर टूट पड़े। हुसैन शाहिद सुहरावर्दी की सरकार के अधीन पुलिस और प्रशासन पूरे कत्लेआम के दौरान मूक दर्शक बने रहे। चश्मदीद गवाहों ने लिखा कि गलियों में खून बह रहा था, आँगनों में परिवारों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया, और औरतों को घरों से घसीटकर खुलेआम बलात्कार किया गया या जबरन नकली “शादियों” में धकेला गया। सिर्फ 48 घंटों में 40,000 से अधिक हिंदुओं की हत्या कर दी गई।[2] घर और दुकानें लूटी गईं, जलाकर राख कर दी गईं।

अमेरिकी फोटो पत्रकार मार्गरेट बर्क-व्हाइट, जो उस समय कलकत्ता में मौजूद थीं, ने इस भयावहता को कैमरे में कैद किया—नालियों में बिखरी हड्डियाँ, लावारिस लाशों पर मंडराते गिद्ध। उनकी तस्वीरें Time और The New York Times में छपीं और दुनिया का दिल दहला गईं।[3]

दो महीने बाद वही आतंक पूर्वी बंगाल के नोआखली और टिपरा तक पहुँच गया।[4] यहाँ उद्देश्य केवल डराना नहीं, बल्कि पूरी तरह हिंदू सफाई था। गाँव-गाँव हिंदू बस्तियाँ खाली करवाई गईं

शहादा  पढ़ने को मजबूर किया गया—यानी इस्लाम में जबरन धर्मांतरण का सबूत। मंदिर तोड़े गए, मूर्तियाँ चकनाचूर की गईं, पवित्र स्थल मलबे में बदल दिए गए। हिंदू समाज के नेताओं को पहचानकर, सार्वजनिक रूप से मार डाला गया; उनके सिर गाँव-गाँव घुमाकर बाकी लोगों को डराने का काम किया गया।

यह पूरी मुहिम आतंक और सफाए की थी। और आज, हुसैन उसी को “सामाजिक न्याय” का नाम देकर ढकने की कोशिश कर रहे हैं।

हुसैन इसे किस रूप में दिखाते हैं

हुसैन “डायरेक्ट एक्शन डे” और नोआखली की हिंसा को समझाने के लिए दो बड़े दावे पेश करते हैं:

  • सामाजिक न्याय” का तर्क: उनके अनुसार पूर्वी बंगाल में पाकिस्तान की माँग मजहब और राष्ट्रवाद से प्रेरित नहीं थी, बल्कि एक सामाजिक बराबरी की माँग थी। इसे वह किसानों की जमींदारी गुलामी, दलितों के शोषण, गरीबी और औपनिवेशिक नीतियों से जोड़ते हैं, जिन के कारण वे सदा के लिए कर्ज़ से दब गए थे और अपनी जमीनों से बेदखल हो गए थे।
  • इस्लाम एक बराबरी का साधन: हुसैन इस्लाम को दलितों के लिए “समानता देने वाला मजहब” बताते हैं। उनका कहना है कि धर्मांतरण और मुस्लिम लीग की राजनीति ने दलितों को वह सहारा और सुरक्षा दी जो हिंदू समाज ने उन्हें नहीं दी। वह जोगेंद्रनाथ मंडल का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि लीग के साथ उनका गठजोड़ प्रतिनिधित्व और सुरक्षा पाने का व्यावहारिक तरीका था। पाकिस्तान को वह धार्मिक परियोजना नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का औज़ार मानते हैं।

यही दोनों आधार हैं जिन्हें यह प्रत्युतर पूरी तरह खारिज करता है।

‘सामाजिक असमानता’ तर्क का खंडन

हुसैन के लेख का सबसे घिनौना पहलू यह है कि वह नरसंहार को सही ठहराने के लिए “न्याय” की भाषा का इस्तेमाल करते हैं। यह कहना कि पाकिस्तान की माँग बराबरी की लड़ाई थी, कि गरीब मुसलमान जमींदारों के खिलाफ उठ खड़े हुए, असल में योजनाबद्ध हत्याओं को नैतिक आड़ देना है। यह वैसा ही है जैसे रवांडा नरसंहार[5] को “भूमि सुधार” कहना या क्रिस्टालनाख़्ट [6] को “मज़दूर विद्रोह” कहना।

सच्चाई यह है कि यह कोई अपने आप से पैदा हुआ विद्रोह नहीं था, बल्कि पूरी तरह संगठित हिंसा थी। जुलूसों में नारे “पाकिस्तान ज़िंदाबाद” के थे, “न्याय” या “सुधार” के नहीं। लूट, आगज़नी और कत्लेआम सब एक तयशुदा तरीके से हुए और कलकत्ता को तबाह कर दिया गया।

हिंदुओं की हत्या ज़मीन या दौलत के लिए नहीं हुई, वे केवल इसलिए मारे गए क्योंकि वे हिंदू थे। ऐसा दुनिया में कौन सा न्याय है जो औरतों के सार्वजनिक रूप से बलात्कार को सही ठहराता है?  कौन सा न्याय शास्त्र यह बताता है कि गरीब किसानों को उनकी झोपड़ियों में काट डाला जाए? और उन छोटे छोटे कपड़े दुकानदारों की दुकानें जलाने से किस सुधार की आशा कर रहे थे, जिनका अपराध केवल हिन्दू होना था?

इस तरह की हिंसा को “वर्ग संघर्ष” कहना घोर अनैतिकता है। कोई भी आंदोलन जो धर्म के नाम पर भीड़ को इकठ्ठा करे, धर्म की पहचान के आधार पर शिकार चुने और आतंक को हथियार बनाए— क्रांति नहीं, बल्कि सुधार का मुखौटा ओढ़े साम्प्रदायिक हिंसा होता है।

और अगर मक़सद सचमुच सामाजिक समानता पाना था, तो वह पूरी तरह असफल रहा। हुकूमत फिर भी पुराने हाथों में ही रही, असमानताएँ बनी रहीं, और भेदभाव मिटा नहीं बल्कि और गहरा गया। हुसैन का लेख ईमानदारी से किया गया विश्लेषण नहीं है, बल्कि आज की राजनीति के लिए पैक किया गया प्रोपेगेंडा है।

इस्लाम और सामाजिक बराबरी के तर्क का खंडन 
हुसैन का दावा कि इस्लाम ने दलितों को हिंदू उत्पीड़न से निकलने का सम्मानजनक रास्ता दिया, दो पुराने झूठों पर खड़ा है जिन्हें इस्लामवादी प्रचारक सालों से दोहराते आ रहे हैं। पहला झूठ यह कि इस्लाम में कोई जाति नहीं होती, और वह सबको भाईचारे में जोड़ता है। दूसरा झूठ यह कि यह “शांति का धर्म” है।

दोनों दावे इतिहास की कसौटी पर टिक नहीं पाते। इस्लाम का इतिहास आक्रमण, जबरन धर्मांतरण, नरसंहार और धार्मिक ग्रंथों में हिंसा को वैध ठहराने जैसी घिनौनी धारणाओं से भरा हुआ है, और यह सिलसिला शुरुआती खिलाफ़त से लेकर आज के जिहादी आतंक तक चला आ रहा है। और सबसे बड़ा सबूत तो दक्षिण एशिया की ज़मीनी हक़ीक़त है, जहाँ मुस्लिम समाज अब भी गहरी जातिगत खाई से बँटा है और “भाईचारे” की बातें वंचितों को कोई असली बराबरी नहीं देतीं।

A. 1971 का नरसंहार
“भाईचारे” की धारणा को सबसे गहरा झटका बांग्लादेश के खूनी इतिहास से लगता है। 1971 में पश्चिमी पाकिस्तान की सेना, जिस पर पंजाबी मुसलमानों का दबदबा था, ने पूर्वी पाकिस्तान पर नरसंहार किया। तीन मिलियन (30 लाख) से ज़्यादा बंगालियों की हत्या हुई। हिंदू सबसे अधिक मारे गए, लेकिन लाखों बंगाली मुसलमान भी काट डाले गए।

उनका अपराध “काफ़िर” होना नहीं था, बल्कि बंगाली होना था—अपनी भाषा बोलना, अपनी पहचान पर अडिग रहना और अधीनता को न मानना। वे मुसलमान थे, पर पंजाबी मुसलमानों की नज़र में वे “कमतर मुसलमान” थे— इतने देशज कि अस्वीकार्य, इतने विद्रोही कि असहनीय, इतने सस्ते कि मिटा देने योग्य। इस विश्वासघात ने यह साबित कर दिया कि साझा मजहब अपने आप कभी एकजुटता नहीं ला सकता। सच्चाई यह है कि “भाईचारा” हमेशा सीमाओं में बँधा रहा है—और बंगाली मुसलमानों ने उन सीमाओं को पार करने की भारी कीमत चुकाई।[7] [8]

B. पसमांदा: इस्लामी भाईचारे का छलावा
भारत में इस्लामी बराबरी का दावा ज़मीनी सच्चाई और आँकड़ों के सामने टिक नहीं पाता। दक्षिण एशिया का इस्लाम कोई जातिविहीन आदर्श दुनिया नहीं है, बल्कि अपनी ही एक कठोर जाति-व्यवस्था में बँधा हुआ है। मुसलमानों को अशराफ़ (उच्च), अजलाफ़ (साधारण) और अरज़ल (तुच्छ) में बाँटा गया है। अजलाफ़ और अरज़ल मिलकर “पसमांदा” कहलाते हैं—यानी “पीछे छूटे हुए।” यह नाम ही इस भेदभाव की गवाही देता है।[9]

अशराफ़ मुसलमान, जो अपने को अरब, फ़ारसी या मध्य एशियाई नस्ल से जोड़ते हैं, मस्जिदों से लेकर राजनीति और व्यापार तक, हर जगह दबदबा बनाए रखते हैं। वहीं पसमांदा, जिनके पूर्वज ज़्यादातर हिंदू या बौद्ध समाज से गरीबी या दबाव में मुसलमान बने थे, हमेशा हाशिये पर धकेले जाते हैं। यह कोई इत्तफ़ाक नहीं, बल्कि समाज में गहराई से जड़ा हुआ ढांचा है।

भारत के लगभग 85% मुसलमान पसमांदा हैं, लेकिन सत्ता में उनकी हिस्सेदारी लगभग न के बराबर है। आज़ादी के बाद संसद में चुने गए करीब 400 मुस्लिम सांसदों में से केवल लगभग 60 पसमांदा पृष्ठभूमि से आए। नेतृत्व हमेशा अशराफ़ के हाथों में ही रहा।[10] अगर इस्लाम सचमुच जाति मिटा देता, तो यह असंतुलन क्यों बना रहता?

यह भेदभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी साफ़ दिखता है। बहुत-सी जगहों पर पसमांदा अब भी अलग बर्तनों में पानी पीने को मजबूर होते हैं। उन्हें अशराफ़ मस्जिदों में घुसने नहीं दिया जाता या पिछली कतारों में धकेल दिया जाता है।[11] यहाँ तक कि मरने के बाद भी भेदभाव जारी रहता है; पसमांदा को अशराफ़ कब्रिस्तानों में दफनाने की इजाज़त नहीं है[12] 2016 की एक BBC रिपोर्ट “Untouchable Muslims” में पाया गया कि 13% दलित मुसलमानों को खाना-पानी अलग परोसा जाता है और 8% बच्चों को स्कूलों में अलग बैठाया जाता है। मदरसों और धार्मिक संस्थानों में यह भेदभाव और भी गहरा है, क्योंकि वहाँ कोई सरकारी निगरानी नहीं होती।[13]

पसमांदा मुस्लिम महाज़ जैसे संगठन, जो 1998 से आवाज़ उठा रहे हैं, अशराफ़ मौलवियों द्वारा “ग़ैर-इस्लामी” कहकर बदनाम किए जाते हैं।[14] पसमांदा कार्यकर्ता अमाना बेगम अंसारी कहती हैं कि जातिगत अलगाव के साथ-साथ सांस्कृतिक भेदभाव भी उतना ही चोट पहुँचाता है। पसमांदा का मज़ाक सिर्फ उनकी वंशावली को लेकर नहीं उड़ाया जाता, बल्कि इसलिए भी कि वे “अरबीकृत” पहनावे, भाषा और रस्मों में फिट नहीं बैठते।[15] यह हक़ीक़त साफ़ करती है कि जिस “इस्लामी भाईचारे” की तस्वीर बराबरी के रूप में दिखाई जाती है, वह असल में नस्ल, संस्कृति और वर्ग की नई दीवारें खड़ी करने का तरीका है।

यह वही अपनापन नहीं है जिसे हुसैन अपने लेख में दिखाना चाहते हैं। यह तो शोषण की एक और परत है—पक्की, संस्थागत और मजहब के नाम पर नकार दी गई।

C. सार्वभौमिक भाईचारे की असलियत
भाईचारे की बात अक्सर नारे की तरह सुनाई देती है, लेकिन असलियत कुछ और है। पूरी इस्लामी दुनिया में शिया–सुन्नी नरसंहार, अहमदिया समुदाय पर ज़ुल्म, और पाकिस्तान, ईरान व खाड़ी देशों में जातीय अल्पसंख्यकों का दमन यह साबित करता है कि यह “एकता” बेहद नाज़ुक है—कभी थोड़ी सी दरार से टूट जाती है, तो कभी हिंसा में पूरी तरह बिखर जाती है। पसमांदा कार्यकर्ता फ़ाइज़ अहमद फ़ैज़ी कहते हैं कि निचले वर्गों के साथ भेदभाव सिर्फ दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इस्लामी केंद्रों में भी गहराई से मौजूद है।[16]

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) की बहस को ही देख लीजिए। कई कार्यकर्ता चाहते थे कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से आए मुस्लिम शरणार्थियों को भी इसमें शामिल किया जाए। लेकिन किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि अगर ये देश यदि इस्लामी बराबरी के सिद्धांत पर बने थे, तो वहाँ से मुसलमान शरणार्थी बनकर क्यों भाग रहे हैं? सचाई यह है कि सिर्फ धार्मिक पहचान किसी को उत्पीड़न से नहीं बचाती। इस्लामी राज्य अपनी ही श्रेणियाँ, बहिष्कार और ज़ुल्म पैदा करते हैं।

D. जोगेंद्रनाथ मंडल
जोगेंद्रनाथ मंडल[17] को हुसैन सबूत की तरह पेश करते हुए यह दावा करते हैं कि दलितों ने हिंदू उत्पीड़न से बचने के लिए पाकिस्तान चुना और मुस्लिम सत्ता में उन्हें सम्मान मिला। लेकिन सच इसके बिल्कुल उलट है।

यह सही है कि मंडल को पाकिस्तान का पहला क़ानून और श्रम मंत्री का पद दिया गया, लेकिन असली सत्ता मुस्लिम अभिजात वर्ग के हाथों में रही। 1948 में जिन्ना की मौत के बाद, पूर्वी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अपहरण, जबरन धर्मांतरण और पुलिस की छत्रछाया में हुए नरसंहार टूट पड़े। मंडल ने विरोध किया, लेकिन किसी ने उनकी सुनी तक नहीं। धीरे-धीरे उन्हें किनारे कर दिया गया, गिरफ्तारी की धमकी दी गई और 1950 में उन्हें भारत भागना पड़ा। जीवन का बाकी समय उन्होंने उन्हीं हिंदू शरणार्थियों की मदद में बिताया, जो उसी “भाईचारे” से भागकर जान बचा रहे थे जिस पर उन्होंने कभी भरोसा किया था।

मंडल की कहानी इस्लामी बराबरी का सबूत नहीं, बल्कि उसकी पूरी विफलता का सबसे कड़ा सबूत है।

इतिहास को यूँ तोड़-मरोड़ कर दिखाना क्यों ख़तरनाक है

उन्नासी बरस गुजर जाने पर भी डायरेक्ट एक्शन डे का सबक़ मिटा नहीं; वह अब भी हमारी चेतना को झकझोरने का काम करता है। 1946 की हिंसा कोई सामाजिक न्याय का आंदोलन नहीं थी, बल्कि विभाजन का खाका था—जहाँ मजहब हथियार बना, पड़ोसी जल्लाद बने, और मुक्ति के नाम पर विचारधारा ने हत्याओं को ढक दिया।

इन नरसंहारों को “सामाजिक संघर्ष” कहकर पेश करना उसी प्रोपेगेंडा को दोहराना है जिसने उस हिंसा को संभव बनाया। हुसैन का यह पुनर्लेखन सिर्फ इतिहास का ही मजाक नहीं उड़ाता,  बल्कि पीड़ितों की स्मृति का भी अपमान करता है और आने वाली पीढ़ियों की आँखों पर परदा डालने का काम करता है।

दुनियां को इस सच को स्वीकार करना होगा कि बंगाल में जो हुआ, वह मुक्ति नहीं, संहार था; सुधार नहीं, बल्कि धार्मिक सफ़ाया था। अगर इतिहास को नैतिक बहानों में बदल दिया जाए, तो उसका सबक हमेशा के लिए खो जाएगा। फिर वही गलती न हो, इसके लिए सिर्फ़ स्पष्टता ही सुरक्षा है। 1946 को उसकी क्रूर, साम्प्रदायिक और पूर्व नियोजित सच्चाई के रूप में देखना हमारी कोई सांप्रदायिकता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। पीड़ितों के प्रति पहला कर्तव्य है सच कहना। जो सच से कुछ भी कम हो, वह केवल विश्वासघात है।

सन्दर्भ सूची

[1] Ahemed Hussain: ‘Not Just Religion or Nationalism, the Call for Pakistan in East Bengal Was About Social Justice and Equality’ (The Wire, 2025); https://thewire.in/history/not-just-religion-nationalism-call-for-pakistan-bengal-social-justice

[2] Majumdar, R.C. History of the Freedom Movement in India, Vol. 3. Calcutta: Firma K.L. Mukhopadhyay, 1963; https://archive.org/details/historyoffreedom03maju/page/864/mode/2up

[3] “India: Calcutta Killings,” Life Magazine, 2 September 1946

[4] Noakhali riots – Wikipedia; https://en.wikipedia.org/wiki/Noakhali_riots

[5] Rwanda genocide of 1994 | Summary, History, Date, Background, Deaths, & Facts | Britannica; https://www.britannica.com/event/Rwanda-genocide-of-1994

[6] Kristallnacht (Holocaust Encyclopedia); https://encyclopedia.ushmm.org/content/en/article/kristallnacht

[7] 1971 Bangladesh Genocide: Pakistan’s Brutal Legacy (StopHinduDvesha.Org, 2025); https://stophindudvesha.org/remembering-the-1971-bangladesh-genocide-pakistans-brutal-legacy/

[8] The Unfinished Business of the 1971 War and Its Impact on Bangladesh Hindus (StopHindudvesha.Org, 2025); https://stophindudvesha.org/the-unfinished-business-of-the-1971-war-and-its-impact-on-bangladesh-hindus/

[9] Pasmanda: Explained: Who are the Pasmanda Muslims? (The Times of India, 2022); https://timesofindia.indiatimes.com/india/explained-who-are-the-pasmanda-muslims-the-group-that-bjp-is-trying-to-woo/articleshow/92766145.cms

[10] India’s Muslim community under a churn: 85% backward Pasmandas up against 15% Ashrafs (The Print, 2019); https://theprint.in/opinion/indias-muslim-community-under-a-churn-85-backward-pasmandas-up-against-15-ashrafs/234599/

[11] Islamic caste (Britannica); https://www.britannica.com/topic/Islamic-caste

[12] Backward Muslims protest denial of burial (rediff.com, 2003)); https://www.rediff.com/news/2003/mar/06bihar.htm

[13] Why are many Indian Muslims seen as untouchable? (BBC News, 2016); https://www.bbc.com/news/world-asia-india-36220329.amp

[14] Pasmanda Muslim Mahaz (Wikipedia); https://en.wikipedia.org/wiki/Pasmanda_Muslim_Mahaz

[15] Understanding the Muslim Lived Experience in India (CoHNA.Org, 2022); https://cohna.org/understanding-the-muslim-lived-experience-in-india/

[16] Pasmanda Muslims missing from positions of power— Waqf Board to Jamaat-e-Islami (ThePrint.in, 2021); https://theprint.in/opinion/pasmanda-muslims-missing-from-positions-of-power-waqf-board-to-jamaat-e-islami/746464/

[17] Jogendra Nath Mandal (Wikipedia); https://en.wikipedia.org/wiki/Jogendra_Nath_Mandal

Dr. Jai G. Bansal
Dr. Jai G. Bansal
Dr. Jai Bansal is a retired scientist, currently serving as the VP Education for the Vishwa Hindu Parishad America (VHPA)
See All Contributions

Donate to HINDUDVESHA

Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.

SUPPORT US