मानसिकता का स्वदेशीकरण: भारत को स्वयं के भव्य आख्यान की आवश्यकता
- भारत में एक समेकित भव्य आख्यान का अभाव है, जिससे यह विरोधाभासी विचारधाराओं, वामपंथी प्रचार और हिंदू विरोधी आख्यानों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है, जो राष्ट्रीय पहचान व सांस्कृतिक गौरव को नुकसान पहुंचाते हैं।
- सभी प्रमुख सभ्यताओं के अपने अपने भव्य आख्यान हैं, जो आंतरिक एकता व वैश्विक छवि को आकार देते हैं। भारत को भी अपनी सभ्यतागत विरासत व हिंदू दर्शन पर आधारित अपना आख्यान विकसित करना चाहिए।
- शिक्षा का गैर-उपनिवेशीकरण आवश्यक है, क्योंकि भारत का सामाजिक विज्ञान और मानविकी पश्चिमी दृष्टिकोण से प्रभावित हैं; अपनी बौद्धिक व सांस्कृतिक विरासत पुनः स्थापित करने के लिए स्वदेशी दृष्टिकोण अपनाना होगा।
- हिंदूफोबिया और भारत-विरोधी आख्यानों के बढ़ते प्रभाव से हिंदू पहचान की रक्षा, वैचारिक हमलों का प्रतिकार और राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए भव्य आख्यान की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
- हालांकि भारत अब धीरे धीरे अपने भव्य आख्यान का निर्माण कर रहा है, लेकिन इसे वैश्विक स्तर पर मजबूती से स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।
एक विचित्र लेकिन पूर्वानुमानित घटनाक्रम में, तमिलनाडु सरकार केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के कथित तौर पर थोपे जाने को लेकर नाराज़ है। विवाद का केंद्र एनईपी (NEP – National Education Policy) का त्रि-भाषा फार्मूला है, जिसमें यह सिफ़ारिश की गई है कि छात्र अपनी मातृभाषा और अंग्रेजी के साथ-साथ एक तीसरी भाषा भी सीखें। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके (DMK) इसे तमिल लोगों पर हिंदी थोपने की साज़िश के तौर पर देख रही है।[1]
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार पर क्षेत्रीय भाषाओं की कीमत पर “एकात्मक हिंदी पहचान” थोपने का आरोप लगाया। हिंदी के कथित तौर पर थोपे जाने के खिलाफ एमके स्टालिन का तीखा हमला तब और तेज़ हो गया जब उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदी भाषा को बढ़ावा देने पर अधिक ध्यान देने से “प्राचीन मातृभाषाएँ” और मैथिली, भोजपुरी, गढ़वाली, कुमाऊँनी जैसी क्षेत्रीय भाषाएँ नष्ट हो रही हैं।[2]
डीएमके, एक कट्टर कम्युनिस्ट पार्टी है, जिसके नेताओं ने कई अवसरों पर सनातन धर्म पर भी क्रूर हमला किया है, यहां तक कि इसकी तुलना डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों से की है। डीएमके जैसी पार्टी का मूल वामपंथी मानसिकता है, जो अखिल-राष्ट्रीय सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देने के एजेंडे से दूर-दूर तक जुड़ी किसी भी चीज के प्रति घृणा और उपहास की भावना रखती है।
इस तरह के बयानों के अक्सर दिए जाने और इस प्रकार की बहसों को भारतीय मीडिया में इतनी प्रमुखता मिलने की एक वजह यह है कि भारत ने अभी तक अपना कोई भव्य आख्यान नहीं बनाया है। भारत को उसकी सभ्यतागत और सांस्कृतिक प्रकृति के प्रकाश में प्रस्तुत करने वाले एक एकीकृत भव्य आख्यान के अभाव में, कई परस्पर विरोधी आख्यान ध्यान आकर्षित करने के लिए संघर्ष करते हैं – धर्मनिरपेक्षता का आख्यान, वाम-उदारवादी तंत्र द्वारा प्रचारित आख्यान, कट्टरपंथी इस्लाम का आख्यान, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के महिमामंडन का आख्यान, आदि।
अगर तर्क से सोचें तो भारतीयों को अंग्रेज़ी थोपे जाने का विरोध करना चाहिए, क्योंकि यह वही विदेशी भाषा है, जिससे भारत ने उपनिवेशवाद का कड़वा अनुभव झेला। लेकिन इसके उलट, भारत में अंग्रेज़ी को बिना किसी सवाल के सम्मान दिया जाता है, जबकि हिंदी को हीन समझा जाता है। कुछ लोग इसे “गैर-भाषा” कहकर अपमानित करते हैं और दावा करते हैं कि इसका कोई ठोस इतिहास नहीं है। वामपंथी गुट हमेशा भारत की क्षेत्रीय भाषाओं की कमजोरियों को ढूंढने और हिंदी पर हमले करने के लिए इन भाषाओं के बोलने वालों की भावनात्मक कमजोरियों का फायदा उठाते रहे हैं।
अगर भारत के पास अपना मजबूत भव्य आख्यान होता, तो हिंदी को पूरे देश की एकता की ताकत के रूप में देखा जाता, जो क्षेत्रीय भाषाओं को कमजोर करने के बजाय उनके विकास में सहायक होती। यह भाषा विवाद नहीं, बल्कि भारतीय पहचान को और सशक्त करने का माध्यम बनती। अगर भारत ने अपना आख्यान खुद गढ़ा होता, तो आज की स्थिति बिल्कुल अलग और सकारात्मक होती।
लेकिन इसके विपरीत, भारत की संस्कृति और सभ्यता की गौरवशाली छवि प्रस्तुत करने और प्राचीन व आधुनिक भारत के बीच संबंध स्थापित करने वाले एक मजबूत भव्य आख्यान की कमी ने भारत के खिलाफ़ वामपंथी दुष्प्रचार को बढ़ावा दिया है।
आगे के खंडों में, हम विस्तार से चर्चा करेंगे कि भारत के लिए एक विशिष्ट और सशक्त भव्य आख्यान बनाना क्यों आवश्यक है और इस आख्यान की मूल संरचना कैसी हो सकती है।
भव्य आख्यान क्या होता है?
भव्य आख्यान (ग्रैंड नैरेटिव) किसी संस्कृति, उसके मूल्यों और विश्वास प्रणाली का व्यापक और सार्वभौमिक प्रस्तुतीकरण होता है। किसी राष्ट्र के संदर्भ में, यह एक ऐसी व्यापक कथा है जो उसके इतिहास, राजनीति, संस्कृति, सभ्यतागत मूल्यों, ज्ञान प्रणाली और विकास के पहलुओं को सरल और एकीकृत रूप में प्रस्तुत करती है। भव्य आख्यान सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि एक व्यापक दृष्टिकोण है, जो किसी देश की पहचान को परिभाषित करता है। यह उस देश के मूल सिद्धांतों और आदर्शों को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करने का काम करता है। सबसे अहम बात यह है कि भव्य आख्यान यह तय करता है कि विश्व उस देश को किस नजरिए से देखेगा। यह मीडिया, शिक्षाविदों, बौद्धिक संस्थानों और नागरिक समाज की चर्चाओं का आधार बनता है और यह तय करने में मदद करता है कि किसी देश से जुड़े मुद्दों को किस रूप में प्रस्तुत किया जाए।
“ग्रैंड नैरेटिव” शब्द, जिसे “मास्टर नैरेटिव” के नाम से भी जाना जाता है, को सबसे पहले फ्रांसीसी दार्शनिक जीन-फ्रैंकोइस ल्योटार्ड ने गढ़ा था। ल्योटार्ड ने ग्रैंड नैरेटिव को कहानी कहने के एक ऐसे रूप के तौर पर परिभाषित किया है जो मिथकों के निर्माण की ओर ले जाता है जो “मौजूदा शक्ति संबंधों, रीति-रिवाजों आदि को वैध बनाने का काम करते हैं।”[3]
हालाँकि, भव्य आख्यान (ग्रैंड नैरेटिव) की अवधारणा को अब तक ज्यादातर मार्क्सवादी विचारधारा के तहत ही अध्ययन किया गया है, जहाँ इसे आमतौर पर वैचारिक और राजनीतिक नियंत्रण का साधन माना जाता है। लेकिन वास्तव में, यह किसी राष्ट्र की वैश्विक छवि को आकार देने और एक मजबूत राष्ट्रवादी और सभ्यतागत विमर्श बनाने के लिए बहुत प्रभावी हो सकता है।
इसलिए, भव्य आख्यानों की अवधारणा वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के लिए सशक्त बनने का एक अवसर हो सकती है। गैर-पश्चिमी देश अपने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ में खुद के महाकाव्य आख्यान तैयार कर औपनिवेशिक दृष्टिकोण के प्रभुत्व को चुनौती दे सकते हैं और तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य का लाभ उठा सकते हैं।
सभी प्रमुख सभ्यताओं की अपनी-अपनी महाकथाएँ हैं
दुनिया भर की सभी प्रमुख सभ्यताओं की अपनी-अपनी महाकथाएँ हैं, जो आंतरिक और बाह्य दोनों ही तौर पर उस सभ्यता के ग्रहणबोध के लिए रूपरेखा तैयार करती हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका अपने “अमेरिकन ड्रीम” के लिए जाना जाता है, एक ऐसा देश जो दुनिया भर के लोगों को अपने में समाहित करता है, परंतु फिर भी यह देश अपने संस्थापकों और अपनी महानता के लिए जाना जाता है। दिलचस्प बात यह है कि शासन में बदलाव के बावजूद, व्यापक कथा वही रहती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की प्राथमिकताओं और दृष्टिकोण यूँ तो उनके पहले के शासकों से बिल्कुल अलग हैं, लेकिन फिर भी ट्रम्प शासन के अंतर्गत भी, “अमेरिकन ड्रीम” और दुनिया में सर्वश्रेष्ठता का प्रतिनिधित्व करने वाले देश की महाकथा बरकरार है।
इसी तरह, जब कोई यूरोप की बात करता है, तो ब्रिटिश उपनिवेशवाद तुरंत ज़ेहन में आता है। लंबे समय से, ब्रिटेन की भव्य कथा उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की लीपापोती में निहित है। अंग्रेज़ी भाषा की “विरासत” और ब्रिटिश संस्कृति का परिष्कृत आकर्षण उस कथा का एक प्रमुख हिस्सा है, विशेषकर ऐसे देशों के संदर्भ में जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हुआ करते थे। ब्रिटेन के उपनिवेशवाद को चाँदी के वर्क में लपेटकर एक श्रेष्ठतम सभ्यतागत कथानक के तौर पर इन देशों को अभी भी परोसा जाता है। इस प्रकार, भले ही ब्रिटेन एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है, ब्रिटिश मीडिया, शिक्षाविद और नागरिक समाज शायद ही कभी उपनिवेशवाद या साम्राज्यवाद के शोषणकारी आधार पर सवाल उठाते हैं, या इसकी आलोचना करते हैं। इसके बजाय, उपनिवेशवाद के महिमामंडन की ब्रिटिश महाकथा इतनी व्यापक और शक्तिशाली हो गई है कि यह भारत जैसे पूर्व उपनिवेशों में लोगों की धारणा को भी प्रभावित करती है। ब्रिटिश भव्य कथा भारतीय समाज में इस हद तक व्याप्त हो गई है कि ब्रिटिश साम्राज्य की लीपापोती और महिमामंडन भारतीय संदर्भ में प्रचलित कई प्रतिस्पर्धी कथाओं में से एक बन गई है।
दूसरी तरफ़, हमारे पास चीन की महाकथा है जो उनके प्राचीन सभ्यतागत मूल्यों पर आधारित है, और परफेक्शन यानी उत्तमता की भावना के साथ मिलकर चीन को एक बार फिर महान बनाने का उद्देश्य प्रसारित करती है। कन्फ्यूशियस दर्शन पर आधारित चीनी कथा में बौद्ध धर्म और ताओवाद के तत्वों के साथ-साथ आधुनिकता के अपने अनूठे विचार भी शामिल हैं।
2018 में शिमला स्थित इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ में दिए गए अपने व्याख्यान में लेखक और शोधकर्ता राजीव मल्होत्रा ने प्रमुख सभ्यताओं के संबंधित भव्य आख्यानों के बारे में कुछ रोचक जानकारी प्रस्तुत की। उनका कहना है कि अमेरिकी भव्य आख्यान अमेरिकी असाधारणवाद (American Exceptionalism) के सिद्धांत में दृढ़ता से निहित है। फ्रांस के संदर्भ में, मल्होत्रा कहते हैं कि उसका भव्य आख्यान उसे मध्ययुगीन यूरोप के पुनर्जागरण (रेनेसां) आंदोलन का उत्तराधिकारी बताने पर आधारित है। यह छवि फ्रांस को एक उदार और प्रगतिशील देश के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसकी संस्कृति इतनी उच्च स्तर पर मानी जाती है कि अन्य देश भी उसे अपनाना चाहते हैं। मल्होत्रा आगे बताते हैं कि जापानी संस्कृति खुद को एक ही नस्ल, भाषा, संस्कृति और बौद्ध मूल्यों पर आधारित मानती है और इसी पहचान को आगे बढ़ाती है।[4]
इसके विपरीत, भारत में अलग-अलग विचारधाराओं से प्रभावित कई विरोधाभासी आख्यान चलाए जा रहे हैं। यह स्थिति उन ताकतों को फायदा पहुँचाती है जो भारत को कमजोर करना चाहती हैं और यहाँ तरह-तरह के भारत विरोधी विचार फैलाने के लिए इसे प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल करती हैं।
एक मजबूत भव्य आख्यान न होने की वजह से भारतीय समाज, खासकर हिंदू समुदाय, हिंदू विरोधी और भारत विरोधी विचारों से आसानी से प्रभावित हो जाता है।
भारत को अपने स्वयं के भव्य आख्यान की आवश्यकता क्यों है?
नवंबर 2023 में, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पुणे में सिम्बायोसिस इंटरनेशनल में व्याख्यान देते हुए भारत के लिए अपने स्वयं के भव्य आख्यान के निर्माण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत को “पश्चिमी विचारों के मापदंडों से परे” एक नए दृष्टिकोण से अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के प्रति अपने नज़रिए को फिर से परिभाषित करने के लिए अपना स्वयं का आख्यान विकसित करने की आवश्यकता है।[5]
उन्होंने कहा, “अर्थव्यवस्था में बदलाव हो सकता है, और राजनीति में भी बदलाव हो सकता है, लेकिन अगर संस्कृति इन बदलावों के साथ आगे नहीं बढ़ती है, तो ये बदलाव हमेशा अधूरे ही रहेंगे। जब तक हम अपने मुद्दों को लेकर ख़ुद का सटीक दृष्टिकोण विकसित नहीं करेंगे, विश्व हमें कभी भी उस तरह से नहीं देखेगा जिससे हमारे हितों की सबसे बेहतर तरीके से पूर्ति हो।”[6]
विदेश मंत्री की टिप्पणी इस बात को स्पष्ट करती है कि भारत को वैश्विक मंच पर अपनी सांस्कृतिक पहचान और प्रभाव को मजबूत करने के लिए एक भव्य आख्यान की जरूरत है। इस तरह के आख्यान से भारत की सभ्यता और संस्कृति को दुनिया के सामने इस तरह प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिससे उसके राष्ट्रीय हितों को लाभ मिले।
लेकिन वामपंथी उदारवादी गुट ने भारत-विरोधी आख्यानों को आक्रामक रूप से फैलाकर सार्वजनिक विमर्श पर अपनी पकड़ बना ली है। इसलिए, सबसे जरूरी बात यह है कि भारत को अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित एक मजबूत भव्य आख्यान तैयार करना चाहिए, ताकि आज़ादी के बाद से उस पर थोपे गए वामपंथी प्रचार के प्रभाव को कम किया जा सके।
आइए इसे एक हालिया उदाहरण के माध्यम से समझते हैं। समाजवादी पार्टी के विधायक (विधानसभा सदस्य) अबू आज़मी ने हाल ही में यह दावा करके विवाद खड़ा कर दिया कि मुगल बादशाह औरंगज़ेब एक क्रूर राजा नहीं था, बल्कि एक दयालु राजा था जिसने कई मंदिर बनवाए थे। उन्होंने कथित तौर पर कहा, “जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है, वह गलत है। औरंगज़ेब ने कई मंदिर बनवाए और मैं उसे क्रूर नेता नहीं मानता। इसके अलावा, छत्रपति संभाजी महाराज और औरंगज़ेब के बीच संघर्ष राज्य प्रशासन को लेकर था, न कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच धार्मिक लड़ाई।” समाजवादी पार्टी के विधायक को एक क्रूर मुगल शासक की खुलकर तारीफ करने पर पार्टी से अलग हटकर कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और शिवसेना सांसद नरेश म्हास्के ने उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग भी की। विवाद बढ़ने के बाद, अबू आज़मी को महाराष्ट्र विधानसभा से पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया।[7]
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह कोई नई बात नहीं है। कई भारतीय, राजनेता या अन्य, नियमित रूप से आक्रमणकारियों, उपनिवेशवादियों और आतंकवादियों का महिमामंडन करते हुए, राष्ट्रवाद का मज़ाक उड़ाते हुए, या हिंदू धर्म और संस्कृति को बदनाम करते हुए ऐसी बेतुकी टिप्पणियाँ करते रहते हैं। वे इस तरह की टिप्पणियाँ इसलिए कर पाते हैं क्योंकि भारत के पास कोई भव्य आख्यान नहीं है। अगर भारत ने आज़ादी के बाद एक सुसंगत भव्य आख्यान बनाया होता, जो उसके सभ्यता और सांस्कृतिक लोकाचार में निहित होता और हिंदू धर्म और प्राचीन भारतीय दर्शन और शासन कला के सिद्धांतों पर आधारित होता, तो ऐसी टिप्पणियाँ दुर्लभ होतीं। हालाँकि ये स्वीकार करना होगा की वे शायद बिल्कुल समाप्त नहीं होतीं क्योंकि भारत, चीन जैसा ना होकर, एक लोकतंत्र है, जहाँ एक सत्तावादी व्यवस्था आख्यानों को नियंत्रित करना आसान बनाती है। लेकिन, एक मज़बूत, एकीकृत आख्यान ऐसी टिप्पणियों को हतोत्साहित अवश्य कर सकता था।
भारत को एक भव्य आख्यान की इसलिए भी तत्काल रूप से आवश्यकता है ताकि राष्ट्रवाद और देशभक्ति को बढ़ावा मिल सके। किसी राष्ट्र की पहचान उसके नागरिकों में राष्ट्रीय गौरव पैदा करने की क्षमता पर आधारित होती है। कट्टरपंथी वामपंथी तंत्र देशभक्ति जैसी अवधारणाओं को सतही और अंधराष्ट्रवादी बताकर खारिज कर देता है, व इसके बजाय प्रगतिशील मूल्यों और वैश्विक नागरिकता को बढ़ावा देने के नाम पर खतरनाक और विभाजनकारी राष्ट्र-विरोधी विमर्श को बढ़ावा देता है।
यही कारण है कि अरुंधति रॉय जैसी राष्ट्र-विरोधी शख्सियत को भारत के अंग्रेज़ी बोलने वाले अभिजात वर्ग के बीच व्यापक रूप से सराहा जाता है, इस तथ्य के बावजूद कि उन्होंने खुले तौर पर आतंकवाद का महिमामंडन किया है और जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करने का आह्वान किया है, और इस प्रकार पाकिस्तानी कथानक को दोहराया है।[8]
अरुंधति रॉय की कथित अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि का मुख्य कारण यह है कि वे स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता और अलगाववादी विचारों का खुलकर समर्थन करती हैं और आलोचनात्मक सोच के नाम पर भारत विरोधी बयानबाजी करती हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि भारतीय युवा ऐसे राष्ट्रविरोधी विचारों से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत के पास कोई मजबूत भव्य आख्यान नहीं है, जो राष्ट्रवाद, देशभक्ति और सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा दे सके। इस कमी की वजह से भारत विरोधी विचार ही एकमात्र प्रभावी आख्यान बन जाते हैं।
चूंकि हिंदूफोबिया वैश्विक स्तर पर तेज़ी से बढ़ रहा है, इसलिए भारत को हिंदू पहचान और संस्कृति की रक्षा के लिए सनातनी मूल्यों पर आधारित एक भव्य आख्यान की तत्काल आवश्यकता है। भारत में हिंदुओं को धर्म परिवर्तन के लिए आक्रामक रूप से निशाना बनाया जा रहा है, जबकि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति और धर्मनिरपेक्षता की बयानबाज़ी ने लगातार सरकारों को इस मुद्दे को गंभीरता से लेने से रोका है।[9] हिंदू मूल्यों और संस्कृति पर आधारित एक मजबूत भव्य आख्यान की कमी ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है। अगर भारत ने स्वतंत्रता के बाद अपने ही भव्य आख्यान को विकसित करने पर ध्यान दिया होता—जहाँ प्राचीन वैदिक मूल्यों, सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ संतुलित तरीके से जोड़ा जाता—तो आज हालात इतने विकट नहीं होते। इसके बजाय आज़ादी के बाद भारत ने बिना सोचे समझे पश्चिमी मूल्यों को अपनाया, उनकी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थाओं को सीधे स्वीकार कर लिया, और यहाँ तक कि उनकी शिक्षा प्रणाली को भी बिना सवाल उठाए स्वीकार कर लिया। इस प्रक्रिया में, भारत ने अपने ही उपनिवेशी अतीत को महिमामंडित कर दिया। भारत की अनूठी सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने वाले एक भव्य आख्यान को विकसित करने में रुचि की कमी ने भारत, भारतीय समाज और हिंदू धर्म के लिए गंभीर और हानिकारक परिणाम पैदा किए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भव्य आख्यानों का वैश्विक नीति निर्माण पर व्यापक प्रभाव हो सकता है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्र ने अभी तक हिंदूफोबिया के अस्तित्व को आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं दी है, जबकि उसने इस्लामोफोबिया और यहूदी धर्म और ईसाई धर्म जैसे अन्य अब्राहमिक धर्मों के खिलाफ भेदभाव को स्पष्ट रूप से मान्यता दी है। भारत ने 2022 में हिंदूफोबिया के साथ-साथ सिख विरोधी और बौद्ध विरोधी फोबिया का मुद्दा उठाया[10] और संयुक्त राष्ट्र से ऐसे संवेदनशील विषयों पर चर्चा करते समय अधिक संतुलन सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
भारत सरकार द्वारा हिंदुओं के ऐतिहासिक उत्पीड़न और बढ़ते हिंदूफोबिया के मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करने के अथक प्रयासों के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र ने कभी भी हिंदू विरोधी हिंसा और भेदभाव के मुद्दे को लेकर विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई। हिंदू विरोधी भावना की निंदा करने के मामले में पश्चिमी मीडिया भी पक्षपातपूर्ण रुख अपनाता है। जनवरी 2024 में अयोध्या राम मंदिर उद्घाटन समारोह की कवरेज इसका एक उदाहरण है। हिंदू मुद्दों के प्रति इतनी व्यापक उदासीनता इसलिए मौजूद है क्योंकि भारत ने ऐतिहासिक रूप से अपने प्राचीन हिंदू अतीत और सभ्यतागत मूल्यों के आलोक में अपने भव्य आख्यान को परिभाषित करने का कुछ ख़ास प्रयास नहीं किया।
संक्षेप में, भारत को वैश्विक मंच पर अपनी सॉफ्ट पावर का सशक्त प्रचार-प्रसार करने, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने, और आंतरिक और बाहरी खतरों से खुद को बचाने के लिए एक भव्य आख्यान की तत्काल आवश्यकता है। वामपंथी तंत्र द्वारा लगातार किए जाने वाले भारत विरोधी प्रचार का मुकाबला करने के लिए एक सशक्त आख्यान आवश्यक है, ताकि राष्ट्र की पहचान और स्थिरता को निरंतर कमज़ोर करने वाले ज़हरीले वामपंथी विमर्श पर अंकुश लगाया जा सके। इसके अतिरिक्त, नागरिकों के बीच राष्ट्रवाद और देशभक्ति को बढ़ावा देना एक मजबूत राष्ट्रीय ताने-बाने को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। एक भव्य आख्यान हिंदू पहचान और संस्कृति को संरक्षित करने, हिंदुओं के बड़े पैमाने पर किए जाने वाले धर्मांतरण को रोकने और हिंदूफोबिया की बढ़ती चुनौतियों का समाधान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसके अलावा, यह भारत को अपने लोगों से संबंधित मुद्दों पर वैश्विक नीति निर्धारण को प्रभावित करने में सक्षम करेगा, और यह सुनिश्चित करेगा कि दुनिया भर में इसके सभ्यतागत लोकाचार का सही ढंग से प्रतिनिधित्व और सम्मान किया जाए।
भारत के उभरते हुए भव्य आख्यान की रूपरेखा
पिछले दशक में भारत ने अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक प्रकृति को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया का प्रारंभ कर एक भव्य आख्यान गढ़ना शुरू कर दिया है।
भारत की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के दृष्टिकोण से “भारतीय संस्कृति” को फिर से परिभाषित करने पर नए सिरे से ज़ोर दिया जा रहा है। इस्लामी आक्रमणकारियों और यूरोपीय उपनिवेशवादियों के महिमामंडन से जुड़े भारतीय इतिहास के वामपंथी-उदारवादी आख्यानों को कड़ी चुनौती दी जा रही है। वैकल्पिक आख्यान ढाँचे का निर्माण किया जा रहा है।
भारत के संदर्भ में प्रचलित पश्चिमी औपनिवेशिक आख्यानों को सरकार आलोचनात्मक दृष्टिकोण से जांच-परख रही है। उदाहरण के लिए, भारत का विदेश मंत्रालय पश्चिमी बुद्धिजीवी संस्थानों द्वारा प्रकाशित विभिन्न सूचकांकों के भारत विरोधी रवैये को लेकर ख़ासा मुखर रहा है, जो लोकतंत्र, प्रेस स्वतंत्रता, खुशी, आदि मानदंडों को लेकर भारत की छवि धूमिल करते हैं।[11] भारत हाल ही में मानवाधिकारों, लोकतंत्र, धार्मिक स्वतंत्रता, आदि के स्वयंभू संरक्षक के रूप में कार्य करने वाले और इन मुद्दों को लेकर भारत को उपदेश देने वाले पश्चिम के पाखंड और दोहरे मानदंडों को उजागर करने में भी मुखर रहा है।[12] [13] [14]
इस प्रकार, भारत अब भारतीय राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, विकास, संस्कृति आदि के संदर्भ में प्रचलित पश्चिमी आख्यानों को सक्रिय रूप से चुनौती दे रहा है। वह भारतीयों के जीवंत अनुभवों और सरकार की नीतिगत बारीकियों को प्रदर्शित करके भारत पर छींटाकशी करने वाले पश्चिमी विमर्श के जवाब में एक ज़ोरदार वैकल्पिक आख्यान प्रस्तुत करने का भी प्रयास कर रहा है।
उदाहरण के तौर पर, हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने लोकतंत्र को लेकर पश्चिमी देशों को करारा जवाब दिया। म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में हिस्सा लेते हुए, उन्होंने “वैश्विक लोकतांत्रिक गिरावट” को लेकर पश्चिमी नजरिए को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि भारत का लोकतंत्र अपने मजबूत और सक्रिय कार्यान्वयन के कारण पश्चिमी दावों को गलत साबित कर रहा है।
अपनी तर्जनी उठाते हुए, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वे हाल ही में अपने राज्य में हुए चुनाव में मतदान कर चुके हैं। उन्होंने कहा, “तो, पहला संदेश यह है कि लोकतंत्र वैश्विक स्तर पर संकट में है, लेकिन मुझे खेद है, मैं इससे असहमत हूँ। हम यहाँ अच्छे से रह रहे हैं, ठीक से मतदान कर रहे हैं, और अपने लोकतंत्र के भविष्य को लेकर आशावादी हैं। हमारे लिए, लोकतंत्र एक सुचारु और प्रभावी व्यवस्था की तरह काम कर रहा है।”
जयशंकर का यह बयान न सिर्फ भारत की लोकतांत्रिक मजबूती को रेखांकित करता है, बल्कि पश्चिमी देशों द्वारा फैलाए गए लोकतंत्र संबंधी दुष्प्रचार को भी सीधे चुनौती देता है।[15]
भारत की नई उभरती हुई भव्य कथा की व्यापक रूपरेखा इसकी प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक लोकाचार के पुनरुद्धार के माध्यम से परिभाषित की जा रही है। अयोध्या राम मंदिर का उद्घाटन, संभल में पवित्र कुओं, मूर्तियों और मंदिरों की खोज, महाकुंभ 2025, आदि घटनाक्रम एक अद्वितीय भव्य कथा गढ़ने की दिशा में भारत की यात्रा में मील के पत्थर हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जनवरी 2024 में हुए उद्घाटन के बाद के पहले छह महीनों के भीतर अयोध्या राम मंदिर ने लगभग 110 मिलियन भक्तों को आकर्षित किया। इसके अलावा, सितंबर 2024 तक, यह उत्तर प्रदेश का सर्वाधिक लोकप्रिय पर्यटन स्थल बन गया था, जिसने ताजमहल को पीछे छोड़ते हुए 13.5 मिलियन घरेलू और 3,153 अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित किया। मीडिया रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि अयोध्या राम मंदिर में हर दिन लगभग 150,000 तीर्थयात्री दर्शन के लिए आते हैं।[16]
अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन से समग्र रूप से धार्मिक पर्यटन में तीव्र वृद्धि हुई, जो आक्रमणकारियों की विरासत का महिमामंडन करने से हटकर अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों के साथ गहरे संबंध को बढ़ावा देने की दिशा में एक सार्थक बदलाव का संकेत है।[17]
एक समय था जब भारत में मंदिर पर्यटन को लेकर दूर दूर तक कुछ सुनने को नहीं मिलता था। और यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है। यह एक ऐसा समय था जब कम से कम, सरकारें इतने बड़े पैमाने पर धार्मिक संस्कृति को बढ़ावा नहीं देती थीं। अधिकतर विदेशी पर्यटकों के लिए, भारत की एक छोटी यात्रा में ताजमहल की पारंपरिक यात्रा और शायद दिल्ली की इस्लामी वास्तुकला – लोधी गार्डन, हुमायूं का मकबरा, आदि की एक झलक शामिल थी। हिंदू संस्कृति और विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शायद ही कभी बढ़ावा दिया जाता था। भारतीय वास्तुकला और विरासत इस्लामी आक्रमणकारियों और यूरोपीय उपनिवेशवादियों की विरासत का पर्याय बन कर रह गई थी। पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में जो मूलभूत परिवर्तन हुए हैं, वे भारत की हिंदू विरासत के दृष्टिकोण के माध्यम से भारत की भव्य कथा के निर्माण की बहुत ज़रूरी प्रक्रिया की और इशारा करते हैं।
हिंदू राष्ट्र, यानी सनातन धर्म के मूल्यों और संस्कृति पर आधारित राष्ट्र का विचार, अब तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। हालांकि, वामपंथी और उदारवादी गुट इसे लेकर डर का माहौल बनाते रहे हैं, जिससे यह अब तक मुख्यधारा में पूरी तरह नहीं आ पाया है। उनका दावा है कि हिंदू राष्ट्र बनते ही भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकार खत्म हो जाएंगे। लेकिन इसके बावजूद, सनातनी मूल्यों पर आधारित राष्ट्र का विचार अब बहुत से लोगों द्वारा स्वीकार किया जा रहा है।
भारत अपनी शिक्षा प्रणाली को गैर-पश्चिमी दृष्टिकोण से पुनर्गठित करने का भी प्रयास कर रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने और कला, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, अर्थशास्त्र, कला और संस्कृति आदि में ज्ञान की विभिन्न धाराओं में भारत के योगदान को उजागर करने पर ध्यान केंद्रित करती है। यह संस्कृत भाषा की शिक्षा को मुख्यधारा में लाने और इसे गणित, खगोल विज्ञान, भाषा विज्ञान, नाट्यशास्त्र, दर्शन, योग आदि जैसे विषयों के साथ एकीकृत करने पर भी ध्यान केंद्रित करती है।[18]
अंत में, भारत भी नई उभरती विश्व व्यवस्था में वैश्विक दक्षिण के नेता के रूप में खुद को आगे बढ़ाकर अपने उभरते हुए भव्य आख्यान में गैर-औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य को एकीकृत करने का प्रयास कर रहा है।
समापन
हालाँकि भारत ने अपनी भव्य कथा के निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी है, लेकिन यह केवल आरंभ है, और इस क्षेत्र में अभी बहुत अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है।
भारतीय शिक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता है। हालांकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 इस दिशा में एक सार्थक पहल है, परंतु यह केवल सतह को खरोंचने जैसा प्रयास है। वैसे भी इसका कार्यान्वयन कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और केवल एक व्यापक रूपरेखा के रूप में कार्य करता है। भारतीय शिक्षा, विशेष रूप से सामाजिक विज्ञान और मानविकी में, पश्चिमी ढांचे में गहराई से निहित है। इसलिए, एक सुसंगत अखिल भारतीय भव्य कथा की स्थापना में पहला कदम गैर-पश्चिमी दृष्टिकोण से मानविकी और सामाजिक विज्ञान शिक्षा का गहन पुनर्गठन होना चाहिए।
शिमला स्थित इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ में 2018 में दिए गए एक व्याख्यान में राजीव मल्होत्रा ने वैदिक दृष्टिकोण और प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणालियों के माध्यम से भारत की शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने के बारे में बहुमूल्य जानकारी दी।
वास्तव में एक अखिल भारतीय भव्य आख्यान का निर्माण करने के लिए, भारत को अपनी समृद्ध भारतीय ज्ञान परंपराओं से प्रेरणा लेनी चाहिए और अपनी शिक्षा प्रणाली को उपनिवेशवाद से मुक्त करने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।
संदर्भ सूची
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[2] ‘Push for monolithic Hindu identity’: It’s MK Stalin vs. Ashvini Vaishnaw over language row | India News – The Indian Express; https://indianexpress.com/article/india/push-for-monolithic-hindi-identity-war-of-words-erupts-between-tamil-nadu-cm-mk-stalin-union-minister-ashwini-vaishnaw-over-hindi-imposition-9859984/
[3] Glossary of Terms: Gr; https://www.marxists.org/glossary/terms/g/r.htm#:~:text=Grand%20narrative%20or%20 “master%20narrative,and%20ideological%20forms%20of%20knowledge.
[4] Weaving India’s Mahakatha ( Grand Narrative ) for the 21st Century by Rajiv Malhotra; https://infinityfoundation.com/wp-content/uploads/2018/04/Weaving-Indias-MAHAKATHA-Grand-Narrative-for-the-21st-Century_RML-20Mar2018.docx.pdf
[5] Bharat needs its own narrative: EAM Jaishankar | India News-Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/india/bharat-needs-its-own-narrative-eam-jaishankar/articleshow/105504377.cms
[6] Ibid.
[7] Abu Azmi suspended – Abu Azmi suspended from Maharashtra Assembly for Aurangzeb remark – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/samajwadi-party-mla-abu-azmi-suspended-from-maharashtra-assembly-for-his-remarks-on-aurangzeb-2689164-2025-03-05
[8] Read the 2010 anti-India speech of Arundhati Roy, for which she faces UAPA charges: https://www.opindia.com/2024/06/arundhati-roy-anti-india-speech-pakistani-propaganda-secessionism/
[9] The Silent Threat: Illegal Conversions of Hindus in India”; https://stophindudvesha.org/the-silent-threat-unlawful-religious-conversions-of-hindus-in-india/
[10] Acknowledge ‘Hinduphobia’, India urges UN | India News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/india/acknowledge-hinduphobia-india-urges-un/articleshow/89028174.cms
[11] Jaishankar calls World Press Index’ mind games’: Why the ranking is questionable- Firstpost; https://www.firstpost.com/explainers/jaishankar-world-press-freedom-index-mind-games-ranking-process-controversial-12561312.html
[12]Is democracy in danger? S Jaishankar shows inked finger after US Senator’s remark | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/is-democracy-in-danger-s-jaishankar-shows-inked-finger-after-us-senators-remark-101739593437243.html
[13] India rejects ‘malicious report’ by USCIRF on religious freedom abuses: ‘Desist from agenda driven efforts’ | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/india-rejects-malicious-report-by-uscirf-on-religious-freedom-abuses-desist-from-such-agenda-driven-efforts-101727958001074.html
[14] India slams US human rights report, says, ‘reflects poor understanding’ | India News – Business Standard; https://www.business-standard.com/india-news/india-slams-us-human-rights-report-says-reflects-poor-understanding-124042500955_1.html
[15] Is democracy in danger? S Jaishankar shows inked finger after US Senator’s remark | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/is-democracy-in-danger-s-jaishankar-shows-inked-finger-after-us-senators-remark-101739593437243.html
[16] Ayodhya Ram Mandir Records You Need to Know from Prana Pratishtha till First Anniversary ( 11 January); https://www.jagranjosh.com/general-knowledge/ayodhya-ram-mandir-records-you-need-to-know-from-prana-pratishtha-till-now-1736541527-1
[17] Temples spark India’s cultural reset”; https://stophindudvesha.org/beyond-mausoleums-temples-tourism-drives-indias-cultural-reset/
[18] National Education Policy 2020; https://www.education.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/NEP_Final_English_0.pdf , p.53-55
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