भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की राह में रोड़ा: औपनिवेशिक सोच और वोक उपभोक्ता

आज भारतीय अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व तो करते हैं, पर जीवनशैली, फैशन और भाषा में अब भी पश्चिमी स्वीकृति की मुहर तलाशते हैं। यह विरोधाभास — औपनिवेशिक सोच और वोक उपभोक्तावाद से पोषित — हमारी परंपराओं को दिखावे की वस्तु बना रहा है और संस्कृति को बाज़ार में धीरे-धीरे गलाता जा रहा है।
  • विदेशियों की सदियों की हुकूमत और हमलों ने भारतीयों के मन में एक तरह की ग़ुलामी की आदत बसा दी है, जिससे हम अपने दमन करने वालों को ही महान मानने और उनकी सोच को अपनाने लगे हैं।
  • भारत में आज की उपभोक्तावादी संस्कृति अक्सर पश्चिम की नकल करती है और हमारे अंदर की असुरक्षा और हीन भावना का फ़ायदा उठाती है।
  • वोक सोच और नई ग़ुलामी का यह खतरनाक मेल भारत को बाज़ार और विचारों की परीक्षण भूमि बना रहा है।
  • सच्चाई यह है कि हम अपनी कला, परंपरा और शिल्प को तब तक अहमियत नहीं देते जब तक उसे पश्चिम वाले चुरा कर, चमका कर, और मॉडर्नबताकर वापिस हमें न बेच दें।
  • भारतीयों के दिल-दिमाग में बैठी यह हीन भावना ही हमारे सांस्कृतिक जागरण की सबसे बड़ी रुकावट है।

उपमन्यु चटर्जी के उपन्यास इंग्लिश अगस्त में भारत के गाँव-क़स्बों के परिवेश का चित्रण कहानी के मुख्य पात्र अगस्त्य सेन के दृष्टिकोण से किया गया है। अगस्त्य एक ऐसा युवा सिविल सेवक है जो अंग्रेज़ी बोलने वाले शहरी संभ्रांत वर्ग से आता है, और हर उस चीज़ से नफ़रत करता है जिसका “भारतीयता” से कोई भी लेना देना हो। अगस्त्य पूरी तरह पश्चिमी सोच से प्रभावित है। वह अपने ही देश और संस्कृति को इस कदर हिकारत और घृणा के भाव से देखता है कि मानो उपनिवेशीकरण के दौर के सारे घिसे पिटे मानक उसने अपने मन-मस्तिष्क में समेट लिए हों।

कहानी के नायक अगस्त्य की सोच ऐसे बहुत से भारतीयों की मानसिकता को दर्शाती है, जो आज भी उपनिवेशीकरण की चाशनी में लिपटी हीनभावना से ग्रस्त हैं। ऐसे लोगों ने अपनी सभ्यता की जड़ों से न केवल एक तयशुदा दूरी बना ली है, बल्कि वे उन जड़ों को काटने तक पर आमादा हैं। सबसे ज़्यादा चिंताजनक बात तो यह है कि उन्हें अपने इस व्यवहार के दुष्परिणामों के नतीजे का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है।

अगर आप आज के भारत के छोटे शहरों या कस्बों से होकर गुजरें, तो कुछ ऐसे दिलचस्प नज़ारे देखने को मिलते हैं जो अपनी चुप्पी में भी बहुत कुछ कह जाते है। गली-मोहल्लों में आपको जगह-जगह ऐसी दुकानों और संस्थानों के बोर्ड मिलेंगे, जिनके नामों से “अंग्रेज़ीयत” टपक रही होगी। और इनमें से कई नाम तो इतने बेतुके और अजीबोग़रीब  होते हैं कि इन्हें सुनकर शायद आपकी हंसी छूट पड़े।आपको जगह-जगह “इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स” कराने वाले कोचिंग सेंटर भी मिलेंगे — जो आज एक भरे-पूरे उद्योग में तब्दील हो चुके हैं। इन कोचिंग सेंटरों की संख्या तो बहुत है, लेकिन इनमें पढ़ाई की गुणवत्ता अक्सर भरोसे के लायक नहीं होती। फिर भी लोग अपनी मेहनत की कमाई इस उम्मीद में इन सेंटरों में लगा देते हैं कि अगर उनकी इंग्लिश अच्छी हो गई तो शायद उनकी ज़िंदगी सुधर जाएगी, या कम से कम वो ‘उच्च वर्ग’ का हिस्सा बन पाएँगे।

इस में जो हास्यास्पद पहलू है, वह तो लोगों को फिर भी दिख जाता है, लेकिन इसके पीछे छिपे गहरे अवसाद के भाव पर चर्चा होना तो दूर की बात, उस को शायद ही कोई समझता है। सदियों की गुलामी और औपनिवेशिक शासन का हमारी अंतरात्मा पर इतना गहरा असर है कि बहुत से भारतीयों के अंदर एक अजीब-सी मानसिक स्थिति घर कर गई है, जिसे हम ‘कॉलोनियल स्टॉकहोम सिंड्रोम’ (Colonial Stockholm Syndrome) कह सकते हैं।

हालाँकि पिछले दस सालों में भारत में सांस्कृतिक जागरूकता तेज़ी से बढ़ी है। लोग अब अपनी धर्म-संस्कृति पर गर्व करने लगे हैं, मंदिरों की यात्रा बढ़ी है, और दुनिया भी भारतीय सभ्यता को ज़्यादा सम्मान देने लगी है। लेकिन इसके बावजूद कई भारतीयों के मन से अंग्रेज़ियत का मोह नहीं गया है। आज भी बड़ी संख्या में लोग अंदर ही अंदर पश्चिमी तौर-तरीकों और जीवनशैली को अपनाने की चाह रखते हैं।

यह स्थिति एक अजीब सा द्वन्द पैदा करती है, या फिर यूँ कहिए कि एक विरोधाभास को जन्म देती है। एक तरफ़ तो भारतीय अपने धर्म और परंपरागत मूल्यों को लेकर असीम गर्व महसूस कर रहे है, लेकिन दूसरी तरफ़ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वह पश्चिमी जीवनशैली और मूल्यों की तरफ़ चुपचाप खिंचे चले जा रहे हैं। यह कुछ कुछ वही भाव है, जिसके बारे में इंडिया: ए वाउंडेड सिविलाइज़ेशन (India: A Wounded Civilization) में वी.एस. नायपॉल ने लिखा था कि भारत आज भी उस मानसिक और सांस्कृतिक चोट को झेल रहा है, जो सदियों के विदेशी शासन ने उसे विरासत में दी है। यह द्वन्द हमारी सभ्यतागत पहचान को एक ऐसी खींचातन में उलझा कर रख देता है, जो हमारे मन-मस्तिष्क को दो पाटों में बाँट देती है। मस्तिष्क का एक हिस्सा भारत के सांस्कृतिक और सभ्यता की ओर खिंचता चला जाता है, तो दूसरा हिस्सा औपनिवेशिक काल में मिली मानसिक ग़ुलामी की बेड़ियों में ही जकड़ा रहना पसंद करता है। इस तरह व्यक्ति एक ऐसे भ्रमजाल में उलझा रह जाता है, जहां उसकी पहचान न तो पूरी तरह से देशी हो पाती है, और न ही विदेशी।

इस उलझन का फ़ायदा बाज़ार की उपभोक्तावादी संस्कृति ने बख़ूबी उठाया है। इसके फलस्वरूप भारत की कंज्यूमर कल्चर इंडस्ट्री में एक ऐसे मिले-जुले अधकचरे सौन्दर्य शास्त्र (शायद इसे कुरूप शास्त्र कहना ज़्यादा उचित रहेगा) का चलन बढ़ा है जिसने भारतीयों को अपने ही देश में एक बेढंगा बहरूपिया बना दिया है। विज्ञापन जगत से लेकर हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री और फ़ैशन जगत तक, हर जगह भारतीयों को यही संदेश दिया जाता है कि अगर आगे बढ़ना है, तो अपनी परंपरा छोड़ो और पश्चिमी सभ्यता को अपनाओ। लेकिन ऐसी सोच के कारगर होने की मुख्य वजह यही है कि भारतीयों के मन में वो गुलामी वाली हीनभावना अब भी कहीं न कहीं बैठी हुई है।

असल में यह एक गहरा दुष्चक्र है। बाज़ार की ये बीमारी तो बस उस गहरे मानसिक ज़हर की झलक है, जो आज भी हमारे सामूहिक अवचेतन में बसा हुआ है।

भारतीय उपभोक्ता में एलीट बनने की छटपटाहट

भारत की “एलीट” हॉस्पिटैलिटी संस्कृति अक्सर पश्चिमी सौंदर्यशास्त्र की एक हास्यास्पद नक़ल बनकर रह जाती है—चाहे बात सर्विस की हो, इंटीरियर डेकोर की, जगह के ‘वाइब’ (vibe) यानी माहौल की, स्टाफ के व्यवहार की, या फिर पहनावे की। महंगे कैफ़े और रेस्तराँ में यह आम चलन है कि स्टाफ हर ग्राहक को “सर” या “मैडम” कहकर संबोधित करे, जो एक ऐसा औपचारिक अंदाज़ है जो सीधे तौर पर औपनिवेशिक काल के तौर-तरीक़ों की याद दिलाता है।

कई जगहों पर तो कर्मचारियों को सख़्त हिदायत होती है कि वे ग्राहकों से सिर्फ़ अंग्रेज़ी में ही बात करें, भले ही सामने वाला व्यक्ति हिंदी या अपनी मातृभाषा में आराम से स्टाफ की बात समझ सकता हो।

कोई बाहर से आने वाला व्यक्ति इस पूरे माहौल को देखकर यह तुरंत भाँप जाता है कि कुछ तो अजीब ज़रूर है — और यह बात सिर्फ़ सिर्फ़ होटलों या रेस्टॉरेंट्स तक सीमित नहीं। भारत के कई शहरों में आजकल यह आम नज़ारा है कि लोग एक साझा स्थानीय भाषा जानते हुए भी आपस में अंग्रेज़ी में बातचीत करते हैं। कल्पना कीजिये की एक विदेशी व्यक्ति जो पहली बार भारत आया हो, अगर उसके सामने दो भारतीय ऐसे आपस में सिर्फ़ अंग्रेज़ी में गिटर पिटर करें, तो उसे भला कैसा लगेगा? वह तो शायद यही निष्कर्ष निकालेगा कि भारतीय एक गहरे आत्म-संदेह या सांस्कृतिक हीनभावना से बुरी तरह ग्रस्त हैं। जब मैं यूनिवरिस्टी ऑफ़ लीड्स (यूके) में पढ़ाई कर रही थी, तो मेरे साथ भी एक ऐसा ही अनुभव हुआ था। मेरी एक स्पैनिश दोस्त ने एक दिन मुझसे बड़ी ही सहजता से पूछा, “तुम लोग (भारतीय) हमेशा आपस में अंग्रेज़ी में ही क्यों बात करते हो?” यह सवाल सुन मैं हक्की-बक्की रह गयी। और भारतीयों की तरह मेरे पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

जहाँ एक तरफ़ बाहरी लोग इस स्थिति के बेतुकेपन को एक नज़र में भाँप लेते हैं, वहीं हम भारतीयों ने इस उपनिवेशी सोच को इस कदर आत्मसात कर लिया है, कि हमें न तो अब यह अजीब लगती है, और न ही असामान्य। यह हमारी रोज़मर्रा की आदतों में इस कदर घुल चुकी है कि हमने इस विषय को लेकर सवाल करना ही छोड़ दिया है।

मूल भाषा और लोकपरंपरा से दूरी बनाकर अंग्रेज़ी से चिपके रहने की जो बेचैनी है, वह भारत के मध्यमवर्ग की एक पहचान बन चुकी है। लेकिन यह बात सिर्फ़ भाषा तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक गहरी और अक्सर अनकही इच्छा काम करती है: हर उस चीज़ को अपनाने की प्रबल इच्छा, जो ‘पश्चिमी’ मानी जाती है, ख़ासकर जीवनशैली और सांस्कृतिक पसंद-नापसंद के स्तर पर। आजकल “कॉस्मोपॉलिटन” या “ग्लोबल” जैसे शब्दों का इस्तेमाल बड़ी चालाकी से उस नक़लची मानसिकता को ढँकने के लिए किया जाता है, जो असल में पश्चिमी सोच की एक सस्ती कॉपी है। विडंबना देखिए कि भारतीयता या भारतीय होने का सार—जो भारत की हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री की आत्मा होनी चाहिए, अब महज़ एक “थीम” तक सीमित हो कर रह गयी है। यह एक ऐसा बनावटी अनुभव बन गया है, जिसमें खुद की कोई जीवित संस्कृति नहीं लगती, बल्कि मानो यह सिर्फ किसी संग्रहालय की चीज़ भर हो।

इस सोच का सबसे बड़ा असर यह होता है कि परंपरागत भारतीय मूल्यों को मानने वाले लोग अब अपने ही देश में पराये बना दिए जाते हैं। दिल्ली के एक हाई-फाई रेस्तराँ में 2021 में ऐसा ही एक विवाद सामने आया। एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक कर्मचारी एक ग्राहक को यह कहता दिखा कि साड़ी रेस्तराँ के “स्मार्ट कैज़ुअल” ड्रेस कोड के अन्तर्गत नहीं आती, इसलिए रेस्तराँ में साड़ी में प्रवेश की अनुमति नहीं है। रेस्तराँ के रवैये का सोशल मीडिया पर जमकर विरोध हुआ — भारत की सबसे लोकप्रिय पोशाक को अपमानित करने के लिए लोगों ने उस रेस्तराँ को जमकर लताड़ा[1]

ऐसा ही एक और मामला 2020 में दिल्ली में सामने आया, जब एक महिला को सिर्फ इसलिए एक रेस्तराँ में घुसने नहीं दिया दिया गया, क्योंकि उसने पारंपरिक भारतीय कपड़े पहने हुए थे। महिला ने जो वीडियो पोस्ट किया, उसमें रेस्तराँ स्टाफ यह कहते सुना गया — “हम यहाँ एथनिक अलाउ नहीं करते।”[2]

इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली घटना मुंबई में घटी, जहाँ एक आदमी को तमिलनाडु की पारंपरिक पोशाक—सफेद शर्ट और वेष्ठी (धोती)—पहनने की वजह से एक मशहूर रेस्तराँ में घुसने नहीं दिया गया। वह रेस्तराँ भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली का था। बाद में उस व्यक्ति ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक वीडियो पोस्ट कर इसे तमिल संस्कृति और लोगों का सीधा अपमान बताया।[3]

भारतीय पारंपरिक परिधानों के ख़िलाफ़ हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में हो रहा भेदभाव अब एक गंभीर मुद्दा बन चुका है, जिस पर स्थानीय राजनेता भी ध्यान देने लगे हैं। सितंबर 2021 में, दिल्ली के एक वार्ड पार्षद ने दक्षिणी दिल्ली नगर निगम (SDMC) में एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें मांग की गई कि उन सभी होटलों, रेस्टॉरेंट्स, या बार्स पर भारी जुर्माना लगाया जाए, जो पारंपरिक भारतीय पोशाक पहनने वाले लोगों को प्रवेश करने से रोकते हैं[4] 

हालाँकि हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री इस भेदभाव को यह कहकर सही ठहराने की कोशिश करती है कि हर रेस्तराँ या क्लब को यह अधिकार है कि वह अपने स्थान की “वाइब” यानी वातावरण के अनुसार ड्रेस कोड तय करे[5] दुनियाभर में कुछ रेस्तराँ और क्लब अपने ब्रांड की ‘एक्सक्लूसिव’ या विशिष्ट छवि बनाए रखने के लिए ड्रेस कोड जैसी पाबंदियाँ लगाते हैं — ताकि वे एक ख़ास वर्ग को आकर्षित कर सकें। लेकिन भारत में समस्या ड्रेस कोड से ज़्यादा इस बात की है कि यह ‘एक्सक्लूसिविटी’ यानी विशिष्टता, अपनी ही संस्कृति और जीवनशैली को नीचा दिखाने की मानसिकता पर टिकी होती है।

इसके विपरीत, पश्चिमी देशों में जब कोई रेस्तराँ अपनी अलग पहचान बनाता है, तो वह अपनी ही सांस्कृतिक परंपराओं के किसी हिस्से को “विशिष्ट” बना देता है — उसका मज़ाक नहीं उड़ाता। लेकिन भारत में ठीक इसका उल्टा होता है।

आज भारत में सार्वजनिक स्थानों, कैफ़ेज और एंटरटेनमेंट वेन्यूज़ में लोगों पर एक ख़ास तरह से दिखने और एक ख़ास प्रकार का व्यवहार करने का दबाव लगातार बना रहता है — और यह दबाव पश्चिम-परस्त उपभोक्तावादी संस्कृति से आता है। नतीजा यह होता है कि भारतीयों के भीतर जो कल्चरल एमनेसिया यानी सांस्कृतिक विस्मृति पहले से ही घर कर चुकी है, वह और अभी ज़्यादा गहरी होती जाती है। इसका परिणाम एक गहरे पहचान-संकट  के रूप में सामने आता है — एक ऐसा संकट जो हमें लगातार परेशान करता है, और जिसके कारण अंततः हम उस सांस्कृतिक स्टॉकहोम सिंड्रोम से आज़ाद नहीं हो पा रहे हैं, भले ही हमारी सांस्कृतिक चेतना कितनी ही तेज़ी से पुनर्जागरण की ओर क्यों न बढ़ रही हो।

ब्रहत (Brhat) में प्रकाशित एक लेख में[6] इस संकट की जड़ें बहुत सटीक रूप से उजागर की गई हैं। लेख के अनुसार भारत में यह सांस्कृतिक विस्मृति दरअसल उस औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली की देन है, जिसे अंग्रेज़ों ने जानबूझकर इस उद्देश्य से लागू किया था कि भारतीयों की सामूहिक मानसिकता को बदला जा सके — और शिक्षा को एक वैचारिक औज़ार बनाकर हर क्षेत्र में उन पर वर्चस्व कायम किया जा सके। स्वतंत्रता के बाद भी भारत इस औपनिवेशिक विरासत को पूरी तरह खत्म नहीं कर सका — और यही वजह है कि आज भी हममें से बहुत से लोग अंग्रेज़ियत से जुड़ी हीनभावनाओं को ढो रहे हैं।

‘वोकउपभोक्ता संस्कृति

स्टॉपहिंदूद्वेष (https://StopHInduDvesha.Org) के ही एक पूर्व प्रकाशित लेख [7] में भारतीय युवाओं पर वोकिज़्म के दुष्प्रभाव का विश्लेषण किया गया था। इस लेख में बताया गया था कि किस तरह से वोक संस्कृति और सोच भारत के युवा वर्ग के सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश पर हावी होती जा रही है। यह सोच विशेषकर उन युवाओं को अपनी चपेट में ले रही है जो दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में रहते हैं। लेख ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि किस तरह से वोक विचारधारा शहरी भारत के संस्कृति और समाज में पूरी तरह से घुसपैठ कर चुकी है। दो दशक पहले उपभोक्ता ट्रेंड्स निर्धारित करने में पूँजीवाद की भूमिका सबसे अहम मानी जाती थी, परन्तु आज मामला कहीं ज़्यादा पेंचीदा है। आज के समय में उपभोक्ता संस्कृति के बाज़ार की दिशा सिर्फ़ पूँजीवाद ही तय नहीं करता, बल्कि वामपंथी राजनीति से जुड़ी वोक विचारधारा भी एक अहम भूमिका निभाती है। आसान शब्दों में कहें तो आज वामपन्थ और पूँजीवाद का एक अजीबोग़रीब गठजोड़ देखने को मिलता है, जो वोकिज़्म के नाम से जाना चाहता है। और यही बेमेल गठजोड़ आज के समय में बाज़ार की दिशा तय करता है।

औपनिवेशिक मानसिकता और वोकिज़्म का यह ज़हरीला मेल भारतीयों को वोक मार्केटिंग का शिकार बना रहा है। जब किसी व्यक्ति के भीतर छिपी हीनभावना उसे “प्रगतिशील” और “जागरूक” दिखने की चाह से मिलती है, तो एक गंभीर सांस्कृतिक संकट जन्म लेता है। भारतीय मानस में गहराई तक बैठी यह हीनता, लोगों को हर उस चीज़ का प्रशंसक बना देती है जो पश्चिम से आई हो। वहीं, जो कुछ भी भारतीयता और अपनी संस्कृति से जुड़ा हो, उसे वे हीनता या शर्म की नज़र से देखने लगते हैं। इसी मानसिक कमजोरी का फायदा उठाकर भारत और हिंदू धर्म विरोधी विचार धीरे-धीरे समाज में जगह बना रहे हैं।

इसका नतीजा यह निकलता है कि भारतीय परंपराओं को लगातार पिछड़ा, रूढ़िवादी या अमानवीय बताया जाता है, और ‘सोशल जस्टिस’ यानी सामाजिक न्याय की भाषा का इस्तेमाल सिर्फ़ एक आवरण के रूप में किया जाता है — ताकि असल में एक विभाजनकारी और विषैले विमर्श को आगे बढ़ाया जा सके।

पिछले कुछ सालों में वोक विज्ञापनों ने भारत में तेज़ी से जगह बना ली है। मई 2023 में, स्टारबक्स इंडिया ने एक विज्ञापन जारी किया जो ट्रांसजेंडर स्वीकार्यता के संदेश के साथ आया। लेकिन यह विज्ञापन विवादों में घिर गया। आलोचकों का कहना था कि इसमें एक भावनात्मक कहानी के ज़रिए लोगों को लिंग परिवर्तन ऑपरेशन के लिए संवेदनशील और तैयार करने की कोशिश की गई थी। सीधे शब्दों में कहें तो यह विज्ञापन ट्रांसजेंडर स्वीकार्यता से ज़्यादा सेक्स चेंज ऑपरेशन को बढ़ावा देता दिखा। विज्ञापन की पटकथा और भावनात्मक प्रस्तुति को लेकर यह आरोप लगा कि इसमें संवेदनशीलता के नाम पर एक वैचारिक एजेंडे को बड़े चालाकी से परोसा गया, जिसे आम लोग, यह मानकर कि यह ‘प्रगतिशील’ सोच है, सहजता से स्वीकार कर लें।

इस विज्ञापन में अर्पिता नाम की एक युवती को दिखाया गया है जो कैफ़े में अपने माता-पिता से मिलने आती है। उसके बैठते ही, पिता कैफ़े स्टाफ से कप पर “अर्पिता” नाम लिखने को कहते हैं — और यहीं पता चलता है कि अर्पिता दरअसल पहले उनके बेटे “अर्पित” के नाम से जानी जाती थी। विज्ञापन का उद्देश्य ट्रांसजेंडर स्वीकार्यता और पारिवारिक मेल-मिलाप का संदेश देना था। लेकिन इसे इस तरह पेश किया गया मानो लिंग परिवर्तन एक आसान, सामान्य और हर हाल में अपनाने योग्य प्रक्रिया हो। विज्ञापन में ट्रांसजेंडर जीवन से जुड़ी कई गंभीर बातों — जैसे स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति या सुरक्षा — की कोई चर्चा नहीं की गई। इसलिए इसकी आलोचना हुई कि यह अमेरिकी वोक सोच को भारतीय समाज पर थोपने की कोशिश करता है, जबकि ऐसे विषय ज़्यादा संवेदनशीलता और समझदारी की माँग करते हैं[8]

विज्ञापन को लेकर सोशल मीडिया पर भारी विरोध देखने को मिला। कई यूज़र्स का मानना था कि यह भारत में ‘वोक ट्रांसजेंडरिज़्म’ को हल्के-फुल्के तरीके से बेचने की एक कोशिश है — और इसके पीछे का उद्देश्य मध्यमवर्गीय भारतीय परिवारों को भ्रमित और विखंडित करना है। स्वतंत्र लेखिका और कॉलमनिस्ट शेफाली वैद्य ने इस विज्ञापन में छिपे हिन्दू-विरोधी पक्ष की ओर इशारा करते हुए तंज़ कसते हुए पूछा: “क्या स्टारबक्स इतनी हिम्मत कर पाता कि वो ऐसा विज्ञापन दिखाए जहाँ ‘आसिफ’ ‘आसिफा’ बन जाये, या ‘जॉन’ ‘जेन’ में तब्दील हो जाये?[9]

ऐसा ही एक और विवादास्पद मामला 2020 में सामने आया था, जब मशहूर आभूषण ब्रांड तनिष्क ने एक विज्ञापन चलाया था, जिसमें एक अंतरधार्मिक जोड़ा दिखाया गया था — एक मुस्लिम परिवार अपनी हिंदू बहू के लिए गोदभराई की रस्म आयोजित करता है। यह विज्ञापन सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना का शिकार हुआ। बहुत से लोगों ने इसे ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा देने वाला ‘नैरेटिव’ बताया। अंततः कंपनी को यह विज्ञापन वापस लेना पड़ा[10]

आज के समय में औपनिवेशिक हीनभावना और ‘वोकिज़्म’, दोनों ही विचारधाराएँ भारतीय मन मस्तिष्क पर बुरी तरह से हावी हैं। इन दोनों के मिले जुले प्रभाव ने बहुत से भारतीयों के भीतर यह लालसा पैदा कर दी है कि वे स्वयं को ‘प्रगतिशील’ दिखाएँ — और इसी चक्कर में वे अपनी ही संस्कृति को ठुकराकर एक नकली, सतही और दिखावटी वोक सौंदर्यबोध के पीछे भागने में लगे हैं।

अब पारंपरिक भारतीय शादियाँ भी धीरे-धीरे पश्चिम के रंग में ढलती जा रही हैं। डिज़ाइनर गाउन और क्रिश्चियन-स्टाइल विवाह समारोह,[11] जिन्हें बॉलीवुड ने खूब बढ़ावा दिया है, अब ‘एलीट’ समाज में भी ख़ासा लोकप्रिय हो चले हैं — और इसका असर धीरे धीरे आम लोगों पर भी दिखने लगा है।

भारत की वेडिंग प्लानिंग इंडस्ट्री इस सांस्कृतिक असुरक्षा को भुनाने में पूरी तरह से लगी हुई है। प्री-वेडिंग शूट्स जैसे ट्रेंड्स, जो पूरी तरह से वोक संस्कृति की देन हैं, और जिनका हमारी पारंपरिक संस्कृति से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं, अब भारतीय विवाह समारोहों में एक अनिवार्य चलन बन चुके हैं। वोक सोच ने हिन्दू विवाह संस्कार की पवित्रता को एक तरह के ‘तमाशे’ में बदल का रख दिया है — जहाँ अब साज-सज्जा, लोकेशन और कपड़े, सब कुछ यह ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं कि इंस्टाग्राम या फ़ेसबुक पर यह सब कैसा दिखेगा, बजाय इस आधार पर कि विवाह एक पारिवारिक मिलन का संस्कार है, जिसका गहरा आध्यात्मिक महत्व भी है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के एक लेख में[12] भारत में बढ़ते हुए एक नए चलन की ओर इशारा किया गया — जिसे उन्होंने “फेक शादी बूम” कहा। इसमें शादी को एक पारंपरिक संस्कार के बजाय क्लब-जैसे माहौल में एक ‘स्टेज शो’ की तरह आयोजित किया जाता है — ताकि Gen Z को भारतीय विवाह का एक मॉडर्न, पार्टी जैसा अनुभव दिया जा सके — वो भी बिना उन “रिवाज़ों और रस्मों” के, जिन्हें आज की पीढ़ी एक ऐसे दक़ियानूसी बोझ के रूप में देखती है, जो अब अपनी प्रासंगिकता खो चुका है।

इस तरह के चलन भारतीय संस्कृति को धीरे-धीरे एक संग्रहालय की वस्तु में बदल रहे हैं, यानी एक ऐसी वस्तु जिसकी आज के समय में बस इतनी ही उपयोगिता है कि वह किसी संग्रहालय के कलेक्शन के रूप में दशकों के मन में कौतूहल जगाये। एक जीवंत और आत्मीय सांस्कृतिक परंपरा को अब एक अजीबोगरीब या आकर्षक दिखने वाली चीज़ की तरह पेश किया जा रहा है — जबकि दूसरी ओर, पश्चिमी सौंदर्यबोध का सतही और सजावटी संस्करण भारतीय सोच और संवेदनाओं पर जबरन थोपा जा रहा है।

मार्च 2023 में इंडिया टुडे के ब्राइडल प्लेटफ़ॉर्म ब्राइड टुडे ने एक ऐसा कवर प्रकाशित किया, जिसने अच्छा ख़ासा विवाद खड़ा कर दिया। इस कवर पर भारतीय मूल के ट्रांस एक्टिविस्ट आलोक वैद-मेनन को पारंपरिक भारतीय स्त्री परिधान और आभूषणों में प्रस्तुत किया गया था। इसके साथ ही ब्राइड टुडे ने मेनन का एक साक्षात्कार भी प्रकाशित किया जिसमे उन्होंने यह दावा किया कि भारत LGBTQ+ समुदाय के ख़िलाफ़ भेदभाव करता है, क्योंकि यहाँ समलैंगिक विवाहों को “सामान्य” नहीं माना जाता[13]

जब फिरंगीअपनाएँ, तभी भारतीय संस्कृति कूल बनती है

आधुनिक भारत की सबसे शर्मनाक विडंबनाओं में से एक यह है कि बहुत से लोग अपनी ही समृद्ध सांस्कृतिक और कलात्मक परंपराओं की क़द्र तभी करते हैं, जब उन्हें पश्चिम बाक़ायदा चुराता है, उनकी नये सिरे से पैकेजिंग करता है, और फिर “आधुनकिता ” और “स्टाइल” की चाशनी में लपेट उन्हें वापस भारतीयों को ही बेच देता है।

इसका सबसे सटीक उदाहरण योग है। योग सिर्फ़ कसरत या तन का साज-शृंगार नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है — जिसकी जड़ें हिंदू धर्म-दर्शन से गहराई से जुड़ी हैं। यह शरीर को साधने से ज़्यादा आत्मा को जोड़ने का मार्ग है। फिर भी, शहरी भारत में लोग अब भी वेस्टर्न-स्टाइल जिम्स में पसीना बहाना ज़्यादा पसंद करते हैं, और योग को अक्सर बुज़ुर्गों के काम में आने वाली ‘स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज़’ कहकर नज़रअंदाज़ कर देते है। आज Gen Z की फिटनेस दिनचर्या “पिलाटेस” और “बॉडीवेट ट्रेनिंग” जैसे शब्दों की मोहताज बन चुकी है — जबकि सच्चाई यह है कि इन ‘ट्रेंडी’ वर्कआउट्स की बुनियाद भी कहीं न कहीं पारंपरिक योगासनों पर ही टिकी है।

पतंजलि योगसूत्र के अनुसार, योग एक अष्टांगिक मार्ग है — जिसमें ध्यान, नैतिक जीवन और भक्ति को एक साथ साधा जाता है। इसकी जड़ें वैदिक अग्निहोत्र यज्ञों और उपनिषदों की अंतर्दृष्टि में हैं (1500–500 ई.पू.), जिसे आगे चलकर हिंदू ऋषियों ने परिष्कृत किया। इन ऋषियों के लिए शरीर केवल मांस-पिंड नहीं, बल्कि परमात्मा से मिलन का एक माध्यम था। लेकिन पश्चिम ने योग को इस कदर तोड़ मरोड़ कर अपनाया है कि उसकी आध्यात्मिक आत्मा ही गायब कर दी गई है। अब वहाँ योग का मतलब महज़ “माइंडफुलनेस” और “ब्रीदवर्क” तक ही सीमित हो कर रह गया है, यानी इस प्राचीन परंपरा को इसकी आध्यात्मिक जड़ों से पूरी तरह से अलग थलग कर दिया गया है।[14]

आज योग के आध्यात्मिक और दार्शनिक सार को को गोट (बकरी) योगा, पॉवर योगा, क्रिश्चियन योगा, और योगा बार्बी डॉल्स (Yoga Barbie Doll) जैसे बेहूदा ट्रेडों में बदल दिया गया है। फ़र्स्टपोस्ट में 2023 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में योग का बाज़ारीकरण किस हद तक पहुँच चुका है, यह हैरान कर देने वाला है: वहाँ के पेटेंट और ट्रेडमार्क विभाग ने योग से जुड़े 150 कॉपीराइट, योग एक्सेसरीज़ से जुड़े 134 ट्रेडमार्क्स, और योग के नाम पर 2,315 ट्रेडमार्क्स जारी कर दिए हैं[15]

यह हमारी ग़ुलामी की मानसिकता का एक विकार ही है कि हम अपनी ही संस्कृति की गहराई को पहचानने में असमर्थ हैं। इस कमज़ोरी का फायदा उठाकर पश्चिम हमारे आध्यात्मिक ज्ञान, जैसे हमारी योग परंपरा, को अपना लेता है, फिर उसे नया नाम और ब्रांडिंग देकर, वापस हमें ही ऊँचे दामों पर बेचता है। विडंबना देखिए कि जब योग को “माइंडफुलनेस” या “पिलाटेज़” कहकर बेचा जाता है, तो सबसे पहली कतार में खड़े होने वाले क़द्रदान अक्सर वही “एलीट भारतीय” होते हैं, जो पहले इसे तुच्छ समझते थे।

ऐसा ही कुछ व्यवहार भारत की एक और प्राचीन सभ्यतागत धरोहर — आयुर्वेद — के साथ होता है। जिसे भारत में कई पढ़े-लिखे लोग “अवैज्ञानिक” कहकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, उसी आयुर्वेद को पश्चिम बड़ी चतुराई से अपनाता है और फिर “नवीन वैज्ञानिक खोज” के रूप में दुनिया को परोसता है। भारतीय रसोई में सदियों से प्रयोग में लाये जा रहे घरेलू नुस्खों की तो कई भारतीय आये दिन मज़ाक़ भी उड़ाते रहते हैं, लेकिन वही लोग तब अचानक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, जब कोई विदेशी ब्रांड सामान्य मसाले को ‘सुपरफ़ूड’ या ‘बायोएक्टिव एजेंट’ कहकर बेचने लगती है।

हल्दी का ही उदाहरण लीजिए: भारतीय घरों में सर्दी-ज़ुकाम से लेकर ज़ख्म तक ठीक करने के लिए हल्दी वाला दूध एक सामान्य नुस्ख़ा रहा है। लेकिन जब यही हल्दी किसी अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के “टर्मरिक लैट्टे” या “हेल्थ बूस्टर ड्रिंक” की रेसिपी में प्रयोग में लाई जाती है, तो वही लोग जो पहले इसके नाम से नाक-भौं सिकोड़ते थे, अब उसे बड़े चाव से पीते हैं।

भारतीयों की इस औपनिवेशिक मानसिकता का एक और सटीक उदाहरण अंतराष्ट्रीय ब्रांड प्रादा (Prada) से संबंधित हालिया विवाद के संदर्भ में देखने को मिलता है। दरअसल हुआ यह कि प्रादा ने भारत की पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पल की हूबहू नक़ल कर एक “डिज़ाइनर स्लिपर” पेश की, पर उसने न तो इसे भारतीय शिल्प परंपरा से जोड़ा, और न ही किसी भारतीय कारीगर को मूल डिज़ाइन का श्रेय दिया। भारी आलोचना और विरोध के बाद प्रादा को आख़िरकार यह स्वीकार करना पड़ा कि उसकी डिज़ाइन भारत की पारंपरिक कोल्हापुर चप्पलों की कारीगरी से ही प्रेरित थी[16]

ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि किसी अंतरराष्ट्रीय लक्ज़री ब्रांड ने भारतीय कला या शिल्प को चुरा अपना प्रोडक्ट डिज़ाइन कर बाज़ार में उतारा हो। लेकिन दुःखद सच्चाई यह है कि ऐसे “फैशन आइटम्स” को पहनने या घर में सजाने वाले कई लोग भारत के उसी एलीट वर्ग से ताल्लुक़ रखते हैं, जो एक स्थानीय कारीगर से तो बेहिसाब मोलभाव करेगा, लेकिन प्रादा कोल्हापुरिस पर लाख रुपये खर्च करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचायेगा।

लेकिन हमारे भीतर की इस हीन भावना को जो चीज़ सबसे ज़्यादा निर्ममता से बेनकाब करती है, वह है सोशल मीडिया। और यह निर्ममता कुछ कुछ ज़रूरी भी है, ताकि हमें सोशल मीडिया के आईने में अपना अक्स देख ख़ुद की इस औपनिवेशिक मानसिकता पर कुछ तो शर्म आये। जब कोई विदेशी, ख़ासतौर पर कोई गोरा, भारत की संस्कृति की तारीफ़ करता है या भारतीय परंपराओं पर रील बनाता है, तो भारतीय दर्शक उसकी प्रशंसा के पुल बांध देते हैं। शायद यही वजह है कि आजकल कई पश्चिमी लोग रातोंरात “भारतीय संस्कृति” का गुणगान करने वाले इंफ्ल्युएंसर्स बन जाते हैं। लेकिन जब कोई सांवले या देसी रंग-रूप वाला व्यक्ति इसी तरह का कंटेंट बनाता है, तो भारतीयों की प्रतिक्रिया कुछ फीकी रहती है।

यह हमारी मानसिक ग़ुलामी की सबसे कड़वी मिसाल है — कि अपनी विरासत के मोल के प्रति आश्वस्त होने के लिए हमें आज भी किसी विदेशी मुहर की ज़रूरत पड़ती है।

समापन

औपनिवेशिक मानसिकता आज भी भारतीयों के मन-मस्तिष्क में घुस कर बैठी हुई है। इस ज़बरदस्त हीन भावना ने एक आम जन मानस के मन मस्तिष्क में इस कदर घुसपैठ कर रखी है, की यह बाहर निकलने का नाम ही नहीं ले रही। और हमारे सांस्कृतिक और सभ्यतागत पुनर्जागरण की राह में यही सबसे बड़ी रुकावट है। जब तक भारतीय खुद अपनी परंपराओं की गरिमा को पूरी तरह नहीं पहचानेंगे और उन पर पूरी तरह से गर्व करना नहीं सीखेंगे, तब तक यह जागृति अधूरी ही रहेगी।

दूसरी ओर, वैश्विक स्तर पर वोकिज़्म के बढ़ते प्रभाव ने हिंदू-विरोधी नैरेटिव्स को और ज़्यादा हवा दी है। भारत में यह विचारधारा “सामाजिक न्याय” और “प्रगतिशील मूल्यों” की आड़ में घुसपैठ कर चुकी है, जिससे भारतीय समाज वोक विचारधारा और औपनिवेशिक मानसिकता के एक विषैले मिश्रण का शिकार होता जा रहा है।

इस समस्या का कोई जादू की छड़ी वाला समाधान नहीं है। यह समस्या तो तभी जड़ से ख़त्म होगी, जब हम अपने भीतर से ही एक बदलाव लाने की भरसक कोशिश करेंगे  — आत्मचिंतन और सांस्कृतिक आत्मबोध के ज़रिए। वर्तमान में जो सभ्यता-बोध की लहर उठी है, वह इस बात को लेकर एक आशा की किरण तो अवश्य जगाती है, कि भारत का सांस्कृतिक और सभ्यतागत जागरण धीरे धीरे भारतीय जन मानस की मानसिकता को भी ग़ुलामी की बेड़ियों से मुक्ति दिलायेगा।

सन्दर्भ सूची

[1] Barred from Delhi eatery for wearing saree, says woman; staff denies | Delhi News – Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/barred-from-eatery-for-wearing-saree-says-woman-staff-denies/articleshow/86439063.cms

[2] Woman refused entry into Delhi restaurant for wearing Indian ethnic dress – The Week;  https://www.theweek.in/news/india/2020/03/13/woman-refused-entry-into-delhi-restaurant-for-wearing-indian-ethnic-dress.html

[3] Virat Kohli’s Restaurant Denies Entry to Tamil Nadu Man Wearing Veshti – WATCH;  https://www.india.com/sports/virat-kohlis-restaurant-denies-entry-to-tamil-nadu-man-wearing-veshti-watch-6557878/

[4] Proposal in SDMC seeks action against restaurants denying entry to those wearing traditional attire | Today News;  https://www.livemint.com/news/india/sdmc-councillor-seeks-rs-5-lakh-fine-against-restaurants-denying-entry-over-indian-attire-11632665308076.html

[5] Rights to admission reserved at restaurants: Colonial hangover or a vibe thing? – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/more-lifestyle/rights-to-admission-reserved-at-restaurants-colonial-hangover-or-a-vibe-thing/story-3bkdeN7eVAeaiplAuZEutN.html

[6] Colonial Education, Cultural Amnesia and Pathologies of the Raj;  https://www.brhat.in/dhiti/colonialeducationculturalamnesia

[7] Indian Youth, Identity Politics, and the Rise of Wokesim – Hindu Dvesha; https://stophindudvesha.org/indian-youth-identity-politics-and-the-rise-of-wokeism/

[8] Starbucks India’s woke agenda leads to boycott calls against the coffee giant in the USA; https://www.opindia.com/2023/05/starbucks-india-woke-agenda-boycott-calls-usa/

[9] Boycott Starbucks’: Coffee Giant Receives Backlash Over Viral Ad on Transgender Inclusion | Viral News – News18;  https://www.news18.com/viral/boycott-starbucks-coffee-giant-receives-backlash-over-viral-ad-on-transgender-inclusion-7797721.html

[10] Those asking what if Tanishq ad had religions reversed, answer is – bomb blast, Read why;  https://www.opindia.com/2020/10/tanishq-ad-interfaith-couple-hindu-muslim-reverse-mani-ratnam-bombay/

[11] Unravelling the subtle secularization and wokeization of the Hindu Vivaah Sanskar; https://hindupost.in/dharma-religion/unraveling-the-subtle-secularization-and-wokeization-of-the-hindu-vivaah-sanskar/

[12] No pheras but the party’s real: Inside India’s fake shadi boom – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/toi-plus/society-culture/no-pheras-but-the-partys-real-inside-indias-fake-shaadi-boom/articleshow/122405900.cms

[13] India Today puts controversial trans activist on the cover of its bridal  magazine; https://www.opindia.com/2023/04/india-today-controversial-trans-activist-cover-brides/#google_vignette

[14] The sacred theft: How Yoga’s Christianization is erasing its Hindu heritage;   https://www.opindia.com/2025/06/yogas-hindu-roots-being-erased-christian-appropriation-and-spiritual-theft-rampant-it-is-about-time-sanatan-dharma-reclaims-its-spiritual-core/

[15] Western appropriation of Indic culture and why it matters – Firstpost; https://www.firstpost.com/opinion/western-appropriation-of-indic-culture-and-why-it-matters-12924352.html

[16] Prada ‘Kolhapuri’ ‘scandal’: How the controversy sparked a big surge sales of this Indian sandal; centuries-old craft sees boost – Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/prada-kolhapuri-scandal-how-the-controversy-sparked-a-big-surge-sales-of-this-indian-sandal-centuries-old-craft-sees-boost/articleshow/122210637.cms

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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