जिमखाना क्लब: औपनिवेशिक मानसिकता के अंतिम गढ़ का सफ़ाया

जैसे-जैसे भारत अपनी सभ्यतागत जड़ों की ओर लौट रहा है, लुटियंस एलीट के साथ उसकी खींचतान भी तेज होती जा रही है। दिल्ली जिमखाना क्लब विवाद पुराने और नए भारत के बीच बढ़ती खाई का सबसे ताजा उदाहरण बन गया है।

 

सारांश

जैसे-जैसे भारत अपनी सभ्यतागत जड़ों से पुनः जुड़ने और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की ओर बढ़ रहा है, दिल्ली जिमखाना क्लब विवाद पुराने और नए भारत के बीच बढ़ती खाई को उजागर कर रहा है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के हवाले से लुटियंस दिल्ली स्थित इस ११३ वर्ष पुराने क्लब को खाली करने का निर्देश दिया है। लुटियंस एलीट वर्ग इसे “धरोहर” बताकर बचाने में जुटा है, जबकि नए भारत का बड़ा वर्ग मानता है कि आधुनिक आत्मनिर्भर भारत में ऐसे औपनिवेशिक अवशेषों के लिए अब कोई जगह नहीं बची है। यह विवाद मात्र एक क्लब का नहीं, बल्कि दो विरोधी दृष्टिकोणों — अतीत की गुलामी को गौरव मानने वाले और सभ्यतागत पुनरुत्थान का सपना देखने वाले — के बीच की लड़ाई है।

जैसे-जैसे भारत अपनी प्राचीन सभ्यतागत जड़ों से पुनः जुड़ने की दिशा में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे उसके भीतर औपनिवेशिक मानसिकता वाले एलीट वर्ग के साथ खींचतान भी अधिक मुखर और स्पष्ट होती जा रही है। देश आज दो विपरीत संस्कारों, दो दृष्टियों और दो भारतों — पुराने और नए — के बीच खड़ा है। यह तनाव पहले से कहीं अधिक तीव्र और दृश्यमान हो चुका है।

पुराना भारत औपनिवेशिक अभिजात वर्ग और लुटियंस तंत्र की सोच का प्रतिनिधि है। यह “ब्राउन साहिब” मानसिकता वाला भारत है, जो औपनिवेशिक विरासत को प्रतिष्ठा का प्रतीक मानता है। पुरानी प्रशासनिक परंपराएँ, अप्रासंगिक रीति-रिवाज, औपनिवेशिक मानक और एलीट वर्चस्व बनाए रखने वाले नियम इसके आधार स्तंभ हैं। इनके लिए संस्कृति सिर्फ सीमित एलीट दृष्टिकोण तक सिमट जाती है और औपनिवेशिक प्रतीकों को “धरोहर” का दर्जा मिल जाता है।

दूसरी ओर एक नया भारत उभर रहा है, जो अपनी प्राचीन सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान को पुनः स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। इस नए भारत में आम लोगों की आस्थाएँ, परंपराएँ, जीवन-पद्धति और मूल्य ही संस्कृति का वास्तविक आधार हैं। धरोहर की जड़ें स्वदेशी परंपराओं और भारतीय चिंतन में खोजी जाती हैं, न कि विदेशी विरासत में।

दिल्ली जिमखाना क्लब को लेकर चल रहा विवाद इस बढ़ती दूरी का जीवंत उदाहरण है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के हवाले से लुटियंस दिल्ली स्थित क्लब को अपना परिसर खाली करने का निर्देश दिया है। ब्रिटिश काल के प्रतीक इस क्लब को मिले विशेषाधिकारों के समर्थन में लुटियंस एलीट जिस तीव्रता से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है, उससे स्पष्ट होता है कि पुराना तंत्र अभी भी भारत की पहचान को औपनिवेशिक चश्मे से देखना चाहता है।

वहीं नए भारत का बड़ा वर्ग मानता है कि आधुनिक आत्मनिर्भर भारत में ऐसे औपनिवेशिक अवशेषों के लिए अब बहुत कम जगह बची है। यह विवाद मात्र एक क्लब का नहीं, बल्कि दो विरोधी दृष्टिकोणों के बीच की लड़ाई है — एक जो अतीत की गुलामी को गौरव मानता है और दूसरा जो सभ्यतागत पुनरुत्थान का सपना देखता है।

सरकार के फैसले पर लुटियंस एलीट वर्ग में हलचल

हाल ही में भारत सरकार ने दिल्ली जिमखाना क्लब को 5 जून तक लुटियंस दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित इलाके में स्थित अपने 27.3 एकड़ के विशाल परिसर को खाली करने का निर्देश दिया। सरकार का कहना है कि क्लब जिस भूमि पर स्थित है, वह अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र में आती है। इस ज़मीन की तत्काल आवश्यकता रक्षा अवसंरचना को मजबूत करने, प्रशासनिक सुविधाओं के विस्तार और जनहित की परियोजनाओं के लिए है।

सरकार के इस आदेश के बाद क्लब के सदस्यों में सख्त नाराज़गी फैल गई और मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुँच गया। अदालत ने क्लब को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया, पर सरकार के आश्वासन को दर्ज किया कि बिना विधिसम्मत प्रक्रिया और पूर्व सूचना के कोई जबरन बेदखली नहीं होगी[1] [2]

दिल्ली जिमखाना क्लब कोई साधारण क्लब नहीं है। यह औपनिवेशिक काल की उस विरासत का जीवंत प्रतीक है, जिसकी नींव विशेषाधिकारों और वंशानुगत अभिजात्यवाद पर रखी गई थी। 113 वर्ष पुराने इस संस्थान की सदस्यता सूची में कम से कम 30 वर्षों की प्रतीक्षा बताई जाती है। सदस्यता के मानदंड आज भी अपारदर्शी और कई बार मनमाने हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अपार संपत्ति या शानदार उपलब्धियाँ भी इस क्लब में प्रवेश की गारंटी नहीं देतीं।

यह क्लब वास्तव में वंशानुगत विशेषाधिकारों का एक ऐसा अवशेष है, जहाँ सदस्यता अक्सर “सही खानदान” या “सही संपर्कों” पर निर्भर करती है। स्वतंत्र भारत के सत्ता-केंद्र के बीचों-बीच स्थित यह औपनिवेशिक संस्थान लंबे समय से केंद्रीय मंत्रियों, सेवानिवृत्त जनरलों, न्यायाधीशों, बड़े उद्योगपतियों और राजनयिकों का पसंदीदा अड्डा रहा है[3] [4]

लेकिन यह विवाद केवल एक क्लब तक सीमित नहीं है। इससे विशेषाधिकार, वर्चस्व और औपनिवेशिक मानसिकता से जुड़े उन गहरे सवालों को फिर से उठाया गया है, जो इस संस्थान की चारदीवारी से कहीं आगे तक फैले हैं।

जिमखाना क्लब की औपनिवेशिक जड़ें

एक ऐसे समय में जब भारत अपनी स्वदेशी सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत विरासत को लेकर पहले से कहीं अधिक सहज और आत्मविश्वासपूर्ण होता जा रहा है, तथा पुरानी एलीट व्यवस्थाएँ — जो सामाजिक पूंजी और वंशानुगत वर्चस्व पर टिकी हैं — तेजी से कमजोर पड़ रही हैं, तब दिल्ली जिमखाना क्लब जैसी संस्थाएँ एक सभ्यतागत विसंगति की तरह दिखाई देती हैं।

ये संस्थाएँ उस पुराने दौर का प्रतीक हैं, जहाँ विशेषाधिकार ही व्यवस्था का आधार था। एक मायने में ये औपनिवेशिक काल के उस भेदभावपूर्ण माहौल की याद दिलाती हैं, जिसे “Dogs and Indians Not Allowed” जैसी मानसिकता से पहचाना जाता है। आज भले ही ऐसे बोर्ड दिखाई नहीं देते, लेकिन विशिष्टता और बहिष्कार की भावना अब भी कई रूपों में मौजूद है।

इस गढ़ के द्वारों की निगरानी आज भी उन्हीं अभिजात मानकों से होती है — जहाँ यह परखा जाता है कि तथाकथित ब्राउन साहिब औपनिवेशिक शिष्टाचार, रहन-सहन और कुलीन आचरण के नियमों को कितनी अच्छी तरह आत्मसात कर चुके हैं, और उनका सामाजिक वंश-वृक्ष कितना प्रभावशाली है।

इस बहिष्करणकारी विशेषाधिकार को “धरोहर” का नाम देकर, लुटियंस अभिजात वर्ग सरकार द्वारा इस परिसर को वापस लेने के फैसले का जिस दृढ़ता से विरोध कर रहा है, वह दरअसल उसी औपनिवेशिक सामाजिक और सांस्कृतिक भेदभावपूर्ण व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की कोशिश है, जो अधिकांश भारतीयों की पहुँच से हमेशा बाहर रही — और वह भी सिर्फ उनकी भारतीय पहचान के कारण।

दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना 1913 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। उस समय इसका नाम “इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब” था। ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासक स्पेंसर हार्कोर्ट बटलर इसके पहले अध्यक्ष बने थे। भारत की स्वतंत्रता के बाद 1947 में इसके नाम से “इम्पीरियल” शब्द हटा दिया गया, लेकिन इसके इतिहास और संरचना में औपनिवेशिक विरासत के कई निशान आज भी बने हुए हैं। फरवरी 1928 में ब्रिटिश सरकार ने इस भूमि को क्लब को लीज़ पर दिया था। दिलचस्प बात यह है कि आज भी यह क्लब सरकार को सालाना किराये के रूप में मात्र 1,000 रुपये अदा करता है, जबकि इसकी सदस्यता फीस आम तौर पर 20 लाख रुपये से अधिक बताई जाती है[5] [6] [7]

ये आँकड़े और तथ्य इस विवाद के भीतर मौजूद गहरे अंतर्विरोधों को फिर से सुर्खियों में ला खड़े हुए हैं।

ब्राउन साहबों का गढ़

दिल्ली जिमखाना क्लब विवाद पर लुटियंस एलीट वर्ग की प्रतिक्रिया उस पुरानी ख़ानदानी मानसिकता की याद दिलाती है, जिसमें खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने का भाव गहराई से समाया हुआ है। जो लोग अपनी मेहनत, प्रतिभा और योग्यता के बल पर आगे बढ़ते हैं, उन्हें अक्सर तिरस्कारपूर्ण ढंग से “नवधनाढ्य” (nouveau riche) कहकर खारिज कर दिया जाता है — मानो उनकी उपस्थिति ही ब्राउन साहबों के तथाकथित परिष्कृत नज़रिए पर एक दाग हो।

इससे भी अधिक चिंताजनक है कि दिल्ली जिमखाना क्लब जैसी औपनिवेशिक संस्थाएँ समय के साथ समानांतर शक्ति केंद्रों का रूप ले चुकी हैं। लुटियंस एलीट वर्ग — जिसमें प्रशासनिक और राजनीतिक हलके के लोग भी शामिल हैं — के लिए ये क्लब सामाजिक ठिकानों से आगे बढ़कर विशिष्ट नेटवर्किंग के प्रमुख केंद्र बन गए हैं। साथ ही, ये इको-चैंबर भी बनकर रह गए हैं, जहाँ नेहरूवादी दौर की औपनिवेशिक सोच को लगातार पोषित किया जाता है। आलोचकों का कहना है कि यह सोच भारत की बदलती सभ्यतागत कथा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण से निरंतर टकराव की स्थिति में है[8]

कई आलोचकों का मानना है कि दिल्ली जिमखाना क्लब स्वतंत्र भारत में औपनिवेशिक सत्ता और शासन संरचनाओं के लगभग निर्बाध हस्तांतरण का प्रतीक बन गया। यह ब्रिटिश साहबों और ब्राउन साहबों के बीच एक मौन समझौते का प्रतिनिधित्व करता था, जिसमें ब्राउन साहिब उन्हीं बहिष्करणकारी व्यवस्थाओं, पदानुक्रमों और सामाजिक रस्मों को आगे बढ़ाते रहे जो औपनिवेशिक शासन की पहचान थीं: सुव्यवस्थित लॉन्स और औपनिवेशिक वास्तुकला के पीछे छिपा यह क्लब सत्ता, विशेषाधिकार और पुराने प्रभाव का प्रतीक बन गया — एक ऐसी जगह, जहाँ नौकरशाह, जनरल, राजनयिक, राजनेता और उद्योगपति पेय-पार्टियों, ब्रिज के खेल और टेनिस मैचों के दौरान चुपचाप अपने नेटवर्क मज़बूत करते थे[9]

वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव अपनी पुस्तक Modi Vs. Khan Market Gang में लुटियंस तंत्र को एक शक्तिशाली नेटवर्क के रूप में वर्णित करते हैं, जिसमें वंशवादी राजनीति से जुड़े नेता, प्रभावशाली नौकरशाह, अंग्रेज़ी मीडिया का एलीट वर्ग, वामपंथी इतिहासकार, चुनिंदा उद्योगपति और स्वयंभू बुद्धिजीवी शामिल हैं। उनका तर्क है कि यह समूह इस विश्वास के साथ काम करता है कि सरकार में औपचारिक सत्ता चाहे किसी के पास हो, व्यवस्था पर वास्तविक प्रभाव अंततः उसी का बना रहता है। [10]

गहरी जड़ें जमा चुके इस नेटवर्क और बदलाव के प्रति उसके प्रतिरोध ने ही सरकार के निर्देश के बाद आई तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया की पृष्ठभूमि तैयार की है।

 वामपंथी खेमे की तीखी प्रतिक्रिया

दिल्ली जिमखाना क्लब की ज़मीन खाली कराने के सरकार के निर्देश ने वामपंथी-उदारवादी हलकों में हलचल मचा दी है। इस फैसले को लेकर तंत्र की तरफ़ से तीखी प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। कई लोगों का आरोप है कि यह प्रशासनिक निर्णय दरअसल भारत की धरोहर पर सीधा प्रहार है।

कहीं हरे-भरे लॉन्स पर टेनिस खेलते बुजुर्ग सदस्यों के भावुक चित्र पेश किए जा रहे हैं, तो कहीं क्लब को महत्वपूर्ण सार्वजनिक संस्था बताने की कोशिश हो रही है। लुटियंस एलीट वर्ग प्रधानमंत्री आवास के बगल वाली इस बहुमूल्य ज़मीन को नाममात्र के किराये पर रखने के अपने तथाकथित अधिकार का नाटकीय ढंग से बचाव कर रहा है।

लेखिका तवलीन सिंह ने एक साक्षात्कार में सवाल उठाया कि आखिर क्लब की यह लोकेशन अचानक राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा कैसे बन गई। उनका कहना था कि ऐसे क्लब केवल अमीर लोगों के लिए नहीं होते और भवन के ख़िलाफ़ किसी भी कार्रवाई को उन्होंने तोड़फोड़ की संज्ञा दी। उन्होंने प्रधानमंत्री को स्थायी आवास में स्थानांतरित होने की सलाह भी दी[11]

भारतीय मूल के टेक उद्यमी सबीर भाटिया ने दिल्ली जिमखाना क्लब को “भारत की जीवंत धरोहर का हिस्सा” बताया। औपनिवेशिक दौर के इस विशिष्ट क्लब का अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे स्थान बौद्धिक संवाद और विचारों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देते हैं, और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर इन्हें समाप्त करना दूरदर्शिता की कमी दर्शाता है[12] [13] [14]

ऐसी औपनिवेशिक संरचनाओं के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क अक्सर एक काल्पनिक पुरानी यादों के भ्रम पर टिके दिखाई देते हैं — एक ऐसी सुनहरी औपनिवेशिक स्मृति के प्रति अतार्किक मोह, जिसका वास्तविकता में कभी वैसा अस्तित्व ही नहीं था, जैसा आज उसका महिमामंडन हो रहा है। “The Last Supper at Delhi Gymkhana?” (दिल्ली जिमखाने में आखिरी भोजन?) शीर्षक वाला लेख, जो द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ, इसी अतिशयोक्तिपूर्ण भावुकता को उजागर करता है[15]

वहीं द प्रिंट में प्रकाशित एक लेख का शीर्षक था — “Modi govt vs Delhi Gymkhana Club is not class war: It’s a distraction from Billionaire Raj”। लेख में आरोप लगाया गया कि सरकार कथित तौर पर पूंजीपतियों के साथ मिलीभगत रखती है और इस तथ्य से ध्यान भटकाने के लिए लुटियंस एलीट वर्ग को निशाना बना रही है। लेखक का दावा है कि “दुनिया भर के दक्षिणपंथी लोकलुभावन नेताओं की तरह मोदी सरकार भी एलीट वर्ग के ख़िलाफ़ लड़ाई का दिखावा करती है, जबकि उसने भारतीय इतिहास में राजनीतिक और आर्थिक शक्ति के सबसे बड़े केंद्रीकरण को संभव बनाया है।” [16]

क्लब के पक्ष में सामने आई यह तीखी प्रतिक्रिया और इसके समर्थन में दिए गए तर्क एक बुनियादी प्रश्न खड़ा करते हैं कि आखिर आज के भारत में धरोहर की परिभाषा क्या होनी चाहिए और किन संस्थाओं को वास्तव में उस श्रेणी में रखा जाना चाहिए?

भारत की वास्तविक विरासत क्या है?

विडंबना यह है कि जैसे-जैसे भारत औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति पाने और मैकालेवादी सोच को पीछे छोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वामपंथी-उदारवादी वर्ग सभ्यतागत पुनर्स्थापन और उपनिवेशवाद-मुक्तिकरण से जुड़ी लगभग हर पहल का विरोध कर रहा है। चाहे सड़कों-शहरों के औपनिवेशिक नाम बदलने की बात हो, राष्ट्रपति भवन से लुटियंस युग के प्रतीकों को हटाने की, या पुरानी संस्थाओं का नाम बदलने की — वाम-उदारवादी हलकों का प्रतिरोध हर कदम पर स्पष्ट दिखाई देता है।

दिल्ली जिमखाना क्लब विवाद ने एक बार फिर उस बुनियादी बहस को जन्म दिया है: आखिर किसी राष्ट्र की वास्तविक विरासत क्या होती है? क्या एक स्वतंत्र देश की पहचान और उसकी धरोहर को हमेशा औपनिवेशिक अतीत के चश्मे से ही देखा जाना चाहिए? क्या औपनिवेशिक दौर की संस्थाओं को सांस्कृतिक प्रतिनिधि की भूमिका निभाते रहने दिया जाए, जबकि वास्तविक धरोहर — जिसे औपनिवेशिक शासन के दौरान व्यवस्थित रूप से नुकसान पहुँचाया या नष्ट किया गया — आज भी हाशिए पर बनी रहे?

इस बहस का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि इस क्लब को बचाने के लिए मुखर लुटियंस एलीट वर्ग के कई लोग वही हैं जो भारत की प्राचीन सभ्यतागत विरासत और हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। साहब और मेमसाहबों की दुनिया, और आयातित तहज़ीब पर आधारित औपनिवेशिक सामाजिक ढांचा तेज़ी से पुराना पड़ रहा है, जिसे स्वीकार करना इस वर्ग के लिए बेहद कठिन हो रहा है।

भारत की वास्तविक विरासत की पहचान उसके स्वदेशी मूल्यों, परंपराओं और सांस्कृतिक निरंतरता से होती है, न कि औपनिवेशिक काल की खुरचन से। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, संसद में सेंगोल की स्थापना, आम जनमानस के बीच मंदिर पर्यटन की बढ़ती लोकप्रियता, प्राचीन हिंदू तीर्थस्थलों का पुनरुद्धार, शिक्षा ढाँचे में भारतीय भाषाओं का बढ़ता महत्व और भारतीय ज्ञान परंपराओं पर नया ज़ोर — ये सभी उस जीवंत सभ्यतागत पुनर्जागरण के प्रतीक हैं, जो भारत की सच्ची धरोहर है।

भारत की जीवंत सभ्यतागत विरासत को अपनी वैधता सिद्ध करने के लिए औपनिवेशिक अतीत की स्वीकृति की कोई आवश्यकता नहीं है। परंपरा और आधुनिकता का संतुलित समन्वय — जहाँ देश की गहरी सभ्यतागत जड़ों का मेल वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी नवाचार और सतत विकास से हो — यही भारत के आगे बढ़ने का सबसे उपयुक्त मार्ग है[17]

निष्कर्ष: औपनिवेशिक अवशेषों को विदा करने का समय

भारत के प्रधानमंत्री ने समय-समय पर मैकाले की औपनिवेशिक विरासत की आलोचना की है और भारतीय मानस को उपनिवेशवादी सोच से मुक्त करने का आह्वान किया है। इन विचारों ने वामपंथी-उदारवादी हलकों में लगातार तीखी प्रतिक्रियाएँ जन्म दी हैं। इस वर्ग के कई लोग मैकाले को वंचित तबकों का उद्धारक बताने का प्रयास करते हैं, जबकि उनकी विरासत की किसी भी आलोचना को हिंदुत्व के लेंस से जोड़कर पेश करते हैं।

औपनिवेशिक विरासत के पक्ष में बौद्धिक एलीट वर्ग की यह मुखर पैरवी भारत में लंबे समय से चली आ रही एक विचित्र प्रवृत्ति है। लुटियंस तंत्र ने दशकों तक औपनिवेशिक संस्कृति का इतना बढ़-चढ़कर गुणगान किया कि गुलामी के प्रतीकों का महिमामंडन सामान्य बात बन गया। ऐसे में इन अवशेषों को हटाना मात्र प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि भारत के सभ्यतागत पुनर्स्थापन के लिए प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जब औपनिवेशिक शासन के प्रतीकों को लंबे समय तक देश की संस्कृति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्र की सामूहिक चेतना पर गहरे घाव स्थायी हो जाते हैं। जब एलीट वर्ग का छोटा लेकिन अत्यधिक प्रभावशाली हिस्सा सदियों तक औपनिवेशिक संस्कृति का महिमामंडन कर उसे राष्ट्र की मूल संस्कृति बताता है, तब आम नागरिकों के लिए गुलामी की मानसिक जंजीरों से मुक्त होना और भी कठिन हो जाता है।

निजी तौर पर किसी क्लब का सदस्य बनना कोई असामान्य बात नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब औपनिवेशिक दौर की किसी संस्था को महान सार्वजनिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में लगातार प्रस्तुत किया जाए, जिसे सभी भारतीयों को आदर की दृष्टि से देखना चाहिए।

हाल ही में कांग्रेस नेता शशि थरूर ने 1960 के दशक की घटना का जिक्र किया, जब मुंबई के प्रतिष्ठित ब्रीच कैंडी क्लब ने उन्हें प्रवेश देने से इनकार कर दिया था। यह प्रसंग याद दिलाता है कि ऐसे कई क्लब लंबे समय तक नस्लीय भेदभाव की नीतियाँ अपनाते रहे, जहाँ सदस्यता यूरोपीय पासपोर्ट तक सीमित थी[18]

21वीं सदी के भारत में औपनिवेशिक विशेषाधिकारों के ऐसे गढ़ों का अस्तित्व चिंता का विषय है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अधिकांश भारतीयों के खिलाफ भेदभाव करते हैं। लेकिन इससे भी गंभीर है कि कई बुद्धिजीवी आज भी इन्हें भारत की “संस्कृति” और “धरोहर” बताकर बचाव करते हैं।

जैसे-जैसे भारत गुलामी की मानसिकता से मुक्त हो रहा है और अपनी हिंदू सभ्यतागत विरासत को नए आत्मविश्वास के साथ अपना रहा है, वैसे-वैसे साहबों-मेमसाहबों की पुरानी दुनिया के आखिरी गढ़ों को अतीत के हवाले कर देना चाहिए।

सन्दर्भ सूची

[1] Delhi Gymkhana Club vs. Centre: The legal fight over one of India’s most elite social addresses – The Economic Times; https://economictimes.indiatimes.com/news/india/delhi-gymkhana-club-vs-centre-the-legal-fight-over-one-of-indias-most-elite-social-addresses/articleshow/131323563.cms?from=mdr

[2] Delhi High Court Refuses Interim Relief To Gymkhana club: Daily Pioneer;   https://dailypioneer.com/news/slug-lite/delhi-hc-denies-interim-relief-to-gymkhana-club-in-eviction-dispute?year=2026

[3] Delhi Gymkhana Club vs. Centre: The legal fight over one of India’s most elite social addresses – The Economic Times; https://economictimes.indiatimes.com/news/india/delhi-gymkhana-club-vs-centre-the-legal-fight-over-one-of-indias-most-elite-social-addresses/articleshow/131323563.cms?from=mdr

[4] Delhi Gymkhana Club Membership Fees: Even babus can’t save Delhi Gymkhana from its old boys’ club image – India Today;   https://www.indiatoday.in/india/story/delhi-gymkhana-eviction-lutyens-club-land-row-elitism-prime-minister-residence-7-lok-kalyan-marg-2916677-2026-05-25

[5] Gymkhana: Delhi’s most exclusive former ‘imperial’  club has survived over 100 years – but now faces closer order | The Independent; https://www.independent.co.uk/asia/india/delhi-gymkhana-club-modi-government-b2983518.html

[6] About Club – Delhi Gymkhana Club; https://delhigymkhana.org.in/about-club/

[7] Explained: The Delhi Gymkhana Club eviction row, and the rules governing land in the capital | Explained News – The Indian Express;  https://indianexpress.com/article/explained/delhi-gymkhana-club-controversy-land-law-10708478/

[8] Delhi Gymkhana Row: Heritage or Reordering Power Map? – The Raisina Hills;  https://theraisinahills.com/delhi-gymkhana-club-notice-heritage-elite-spaces-modi-narrative/

[9] Delhi Gymkhana Club faces fresh scrutiny;  https://organiser.org/2026/05/28/355480/bharat/the-last-sahib-standing-why-the-delhi-gymkhana-club-must-finally-go/

[10] Modi Vs. Khan Market Gang by Ashok Shrivastav, p.. 3

[11] News18 on X;  https://x.com/CNNnews18/status/2059231574176981417

[12] Sabeer Bhatia on X; https://x.com/sabeer/status/2058573795976466932

[13] Sabeer Bhatia on X; https://x.com/sabeer/status/2058928277717451212

[14] Row over Sabeer Bhatia saying India should ‘appreciate every chapter of its history’, Sridhar Vembu responds- The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/world/us/row-over-sabeer-bhatia-saying-india-should-appreciate-every-chapter-of-its-history-sridhar-vembu-responds/articleshow/131350609.cms

[15] The last supper at Delhi Gymkhana?:  https://www.newindianexpress.com/states/delhi/2026/May/28/the-last-supper-at-delhi-gymkhana

[16] Delhi Gymkhana Club row is a distraction from Modi’s billionaire raj; https://theprint.in/opinion/delhi-gymkhana-club-row-modi-billionaire-raj/2942465/

[17] Gen Z : Reclaiming Faith and Identity; https://stophindudvesha.org/gen-z-as-a-civilizational-vanguard-reclaiming-culture-faith-and-identity/

[18] I Was Thrown Out’: Shashi Tharoor Exposes Breach Candy Club’s ‘Racist’ Europeans-Only Provision;  https://www.ndtv.com/india-news/i-was-thrown-out-shashi-tharoor-exposes-breach-candy-clubs-racist-europeans-only-provision-11553439

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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