भोजशाला फैसला: क्या भारत सभ्यतागत न्याय की ओर बढ़ रहा है?
सारांश
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का भोजशाला संबंधी फैसला भारत में सभ्यतागत न्याय और ऐतिहासिक निरंतरता पर चल रही बहस में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। धार स्थित भोजशाला को मां सरस्वती को समर्पित मंदिर के रूप में स्वीकार करते हुए और हिंदुओं को यहां पूजा का विशेष अधिकार प्रदान करते हुए अदालत ने मंदिर पुनर्प्राप्ति तथा पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की संवैधानिक सीमाओं पर चर्चा को फिर से गति दी है। अदालत का निर्णय मुख्य रूप से पुरातात्त्विक साक्ष्यों, ऐतिहासिक अभिलेखों, शिलालेखों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की जांच पर आधारित रहा। इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि विवादित विरासत स्थलों से जुड़े दावों के समाधान में वैज्ञानिक जांच और साक्ष्यों की भूमिका लगातार अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। कानूनी पहलुओं से आगे बढ़कर, भोजशाला का मामला भारत की सभ्यतागत विरासत, ऐतिहासिक स्मृति और उस महत्वपूर्ण प्रश्न को भी सामने लाता है कि क्या ऐतिहासिक रूप से विवादित पवित्र स्थलों से जुड़े मामलों में न्याय पाने के लिए समुदायों को अधिक व्यापक संवैधानिक अवसर मिलने चाहिए।
यदि कोई राष्ट्र सचमुच औपनिवेशिक मानसिकता और ऐतिहासिक पराधीनता से मुक्त होना चाहता है, तो उसे अपने राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे में सभ्यतागत न्याय को अपने राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे में उचित स्थान देना होगा। सच यह है कि उपनिवेशवाद से मुक्ति का विचार अपने मूल में सभ्यतागत न्याय की मांग से जुड़ा हुआ है, क्योंकि कोई भी समाज तब तक आत्मविश्वास के साथ आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक वह अपने इतिहास के असुविधाजनक या पीड़ादायक अध्यायों का ईमानदारी से सामना न करे। सांस्कृतिक और सभ्यतागत पुनर्प्राप्ति की प्रक्रिया भी तब तक अधूरी रहती है, जब तक इतिहास के दौरान हुए विध्वंस, विरासत के साथ हुई छेड़छाड़ और पवित्र स्थलों पर हुए अतिक्रमणों को स्वीकार कर उनसे जुड़े प्रश्नों का समाधान खोजने का प्रयास न किया जाए। इसलिए मंदिरों और पवित्र स्थलों की पुनर्प्राप्ति केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं हैं, बल्कि उन ऐतिहासिक संबंधों को फिर से जोड़ने का प्रयास हैं, जो सदियों के आक्रमणों और सत्ता परिवर्तनों के दौरान बाधित या टूट गए थे।
भारत में लंबे समय तक प्राचीन हिंदू स्थलों की पुनर्प्राप्ति की मांग को संदेह की दृष्टि से देखा गया। कभी हिंदू आस्था के प्रमुख केंद्र रहे, लेकिन आक्रमणों के दौरान ध्वस्त, परिवर्तित या इस्लामी संरचनाओं में बदले गए स्थलों के पुनरुद्धार की मांग को अक्सर सांप्रदायिक या धर्मनिरपेक्षता-विरोधी कहकर खारिज किया गया। आलोचकों का कहना है कि नेहरूवादी अभिजात वर्ग और वाम-उदारवादी विमर्श के प्रभावशाली हिस्सों ने धर्मनिरपेक्षता की ऐसी व्याख्या को बढ़ावा दिया, जिसमें हिंदू सभ्यतागत चिंताओं के लिए सार्वजनिक चर्चा में सीमित स्थान दिया गया।
हाल के वर्षों में यह स्थिति बदलती दिखाई दी है। 2019 में अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जिसने राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया, ने संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से भारत की प्राचीन धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत की पुनर्स्थापना को नया कानूनी और वैचारिक आधार दिया।
इसी पृष्ठभूमि में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का भोजशाला संबंधी हालिया फैसला विशेष महत्व रखता है। अदालत ने धार स्थित भोजशाला को मां सरस्वती को समर्पित मंदिर माना और हिंदू समुदाय को वहां विशेष पूजा-अधिकार प्रदान किए। अनेक हिंदुओं ने इसे एक महत्वपूर्ण सभ्यतागत उपलब्धि के रूप में देखा है।
इन बहसों के केंद्र में पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 है। आलोचकों का तर्क है कि यह कानून 1947 की धार्मिक स्थिति को स्थिर मानकर हिंदुओं, जैनों और सिखों की ऐतिहासिक विवादों में न्यायिक समाधान मांगने की क्षमता सीमित कर देता है। हालांकि काशी-ज्ञानवापी जैसे मामलों में यह बाधा बना हुआ है, लेकिन ASI-संरक्षित स्मारक इसके दायरे से बाहर हैं। यही कारण है कि भोजशाला का फैसला भारत में सभ्यतागत पुनर्प्राप्ति की सीमा और संभावनाओं पर बहस को फिर से केंद्र में ले आया है।
भोजशाला फैसला: एक ऐतिहासिक मोड़
मई 2026 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए धार स्थित विवादित भोजशाला परिसर को वाग्देवी, यानी मां सरस्वती के प्राचीन मंदिर के रूप में मान्यता दी। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को परिसर के भीतर प्रत्येक शुक्रवार नमाज़ अदा करने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने यह भी कहा कि भारत सरकार को लंदन के एक संग्रहालय में दशकों से रखी वाग्देवी की मूर्ति को वापस लाने पर विचार करना चाहिए। साथ ही अदालत ने यह सुझाव दिया कि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी या कोई अन्य वक्फ निकाय धार में मस्जिद निर्माण के लिए वैकल्पिक भूमि मांग सकता है। फैसले के बाद ASI ने हिंदू समुदाय को पूजा और अन्य धार्मिक गतिविधियों के लिए इस स्थल तक निर्बाध पहुंच प्रदान कर दी।[1] [2]
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्त्विक साक्ष्यों, शिलालेखों और दस्तावेजी अभिलेखों को विशेष महत्व दिया। प्राचीन हिंदू शिलालेखों, प्राप्त मूर्तियों, विशिष्ट मंदिर स्थापत्य, और परमार कालीन अवशेषों से संबंधित निष्कर्ष कार्यवाही के दौरान महत्वपूर्ण रहे। अपने विस्तृत फैसले में अदालत ने कहा कि भोजशाला परिसर में हिंदू पूजा कभी पूरी तरह बंद नहीं हुई। अदालत ने उन ऐतिहासिक ग्रंथों को भी महत्व दिया, जिनमें इस स्थल को परमार वंश के राजा भोज के शासनकाल में संस्कृत शिक्षा के एक प्रमुख केंद्र के रूप में वर्णित किया गया है।[3]
दशकों तक भोजशाला हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच परस्पर विरोधी धार्मिक दावों का केंद्र बनी रही। हिंदू पक्ष का लगातार यह कहना रहा कि यह परिसर मूल रूप से मां सरस्वती को समर्पित एक प्राचीन मंदिर था और भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष का तर्क था कि यह संरचना कमाल मौला मस्जिद के रूप में कार्य करती रही है, जिसका आधार स्थल पर लगातार नमाज अदा किए जाने की परंपरा थी।[4]
भोजशाला को आधिकारिक रूप से प्राचीन स्मारक और पुरातात्त्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत संरक्षित स्मारक माना गया है।[5] इसी कारण पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 इस स्थल पर लागू नहीं होता। इस अपवाद ने अदालत को ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर विवाद की जांच और निर्णय का कानूनी आधार दिया।
पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 हिंदू समुदाय के बीच लंबे समय से बहस और विवाद का विषय बना हुआ है। यह कानून 15 अगस्त 1947 को मौजूद पूजा स्थलों की धार्मिक स्थिति को स्थिर मानता है। हालांकि अधिनियम बनाते समय अयोध्या विवाद को स्पष्ट रूप से इसके दायरे से बाहर रखा गया था, लेकिन भोजशाला जैसे कई विवादित स्थल ASI-संरक्षित स्मारकों की श्रेणी में आते हैं। इसी वजह से अदालतें ऐसे स्थलों की प्राचीनता और मूल धार्मिक स्वरूप की जांच के लिए वैज्ञानिक पुरातात्त्विक सर्वेक्षण का आदेश दे सकती हैं। भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मार्च 2024 में ASI को विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया था। जुलाई 2024 में प्रस्तुत 2,000 पृष्ठों की रिपोर्ट अंतिम फैसले के लिए एक प्रमुख साक्ष्य आधार बनी।[6]
भोजशाला: ज्ञान और विद्या का केंद्र
परमार वंश के राजा भोज (1000–1055 ईस्वी) ने अपनी राजधानी धार में भोजशाला की स्थापना देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर-विद्यापीठ के रूप में की थी। ऐतिहासिक साहित्य और शास्त्रीय संदर्भों से यह संकेत मिलता है कि भोजशाला आगे चलकर शिक्षा और ज्ञान का एक प्रतिष्ठित केंद्र बन गई, जहां उसके स्वर्णिम काल में लगभग 1,400 कवि, विद्वान और धर्मशास्त्री सक्रिय थे।
भारतीय इतिहास के सबसे प्रसिद्ध विद्वान-राजाओं में गिने जाने वाले राजा भोज के बारे में माना जाता है कि उन्होंने व्याकरण, दर्शन, खगोलशास्त्र, आयुर्वेद, सैन्य विज्ञान, और वास्तुकला सहित अनेक विषयों पर अस्सी से अधिक ग्रंथों की रचना की थी। भोजशाला की नगरी धार उस समय के प्रमुख बौद्धिक केंद्रों में विकसित हो गई थी। सरस्वती कंठाभरण (संस्कृत व्याकरण पर एक महत्वपूर्ण ग्रंथ), राजमार्तंड (चिकित्सा संबंधी ग्रंथ) और अवनि कूर्मशतम जैसे महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ उस विद्वानों की परंपरा से जुड़े माने जाते हैं, जिसका केंद्र भोजशाला थी।[7]
भोजशाला परिसर का इतिहास प्राचीन और प्रारंभिक मध्यकालीन भारत की व्यापक मंदिर व्यवस्था को समझने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। एक समृद्ध मंदिर अर्थव्यवस्था के सहारे संचालित होने वाले मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं थे, बल्कि शिक्षा, बौद्धिक विमर्श, कला संरक्षण, और सांस्कृतिक निरंतरता के सजीव केंद्र भी हुआ करते थे।
इस दृष्टि से भोजशाला एक धार्मिक संरचना मात्र नहीं थी। यह उस व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक व्यवस्था का प्रतीक थी, जिसमें ज्ञान, अध्यात्म, शासन और सांस्कृतिक सृजन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे। इसलिए इस स्थल का ऐतिहासिक महत्व केवल पूजा-अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की बौद्धिक और सभ्यतागत विरासत की एक महत्वपूर्ण धारा के संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है।
भोजशाला विवाद की ऐतिहासिक जड़ें
ASI के सर्वेक्षण निष्कर्षों, ऐतिहासिक साहित्य, और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों के अनुसार, भोजशाला परिसर पर इस्लामिक शासन के विभिन्न चरणों के दौरान उस पर बार-बार हमले हुए, कब्ज़ा किया गया, और उसकी संरचना में परिवर्तन किए गए। यह सिलसिला दिल्ली सल्तनत के दौर से शुरू हुआ था। ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि भोजशाला पर पहला बड़ा हमला 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में हुआ। इस दौरान हिंदू शासक महाकालदेव और उनके कई सैनिकों के आक्रमण का प्रतिरोध करते हुए मारे जाने की बात कही जाती है। कुछ ऐतिहासिक विवरण यह भी दावा करते हैं कि धर्म परिवर्तन से इनकार करने पर भोजशाला से जुड़े लगभग 1,200 हिंदू आचार्यों और विद्यार्थियों ने अपने प्राण गंवाए। ये सभी ऐतिहासिक संदर्भ इस स्थल से जुड़े संघर्ष की तीव्रता को दर्शाते हैं।
भोजशाला विवाद में एक और महत्वपूर्ण मोड़ 1514 में महमूद शाह खिलजी द्वितीय के शासनकाल के दौरान आया। इसी अवधि में मंदिर परिसर से लगी भूमि पर कब्ज़ा हुआ और वहां कमाल मौला दरगाह के रूप में पहचानी जाने वाली एक संरचना का निर्माण किया गया। समय के साथ यह दरगाह विवाद का केंद्र बन गई। हिंदू पक्ष का तर्क रहा कि भोजशाला परिसर को धीरे-धीरे दरगाह के रूप में पुनर्परिभाषित किया गया, जिससे उसकी मूल ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान या तो बदल दी गई या धीरे-धीरे ओझल कर दी गई।[8]
ब्रिटिश शासन के दौरान यह विवाद एक नए चरण में प्रवेश कर गया। 1907 में एक प्रशासनिक व्यवस्था के अन्तर्गत परिसर में शुक्रवार की नमाज़ की अनुमति दी गई, जबकि हिंदुओं को केवल बसंत पंचमी के अवसर पर सीमित पूजा-अर्चना की अनुमति मिली। दो वर्ष बाद, 1909 में, धार रियासत ने इस स्थल को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया। स्वतंत्रता के बाद 1952 में भोजशाला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के नियंत्रण में आ गई।[9]
स्वतंत्रता के बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों ने विवाद को और जटिल बना दिया। समय के साथ हिंदू समुदाय के पूजा-अधिकारों पर प्रतिबंध बढ़ने लगे। 1997 में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम तब सामने आया, जब मध्य प्रदेश सरकार ने परिसर में शुक्रवार की नमाज़ की अनुमति दी, जबकि हिंदुओं के प्रवेश को बसंत पंचमी तक सीमित कर दिया गया। निर्धारित शर्तों के तहत केवल उसी दिन सरस्वती पूजा की अनुमति थी।
2003 में यह विवाद तब और भी अधिक गहरा गया, जब हिंदू समुदाय ने स्थल पर अपने दावों को अधिक मुखरता से उठाना शुरू किया, और बसंत पंचमी के आयोजनों में नौ लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इसके बाद धारा 144 लागू कर दी गई, जिसके चलते कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया और अन्य लोगों के घायल होने की भी खबरें सामने आईं।
2006, 2013, और 2016 में भी तनाव बार-बार उभरकर सामने आया, विशेष रूप से तब जब बसंत पंचमी और शुक्रवार की नमाज़ एक ही दिन पड़ी। ऐसे अवसरों पर टकराव की घटनाएं हुईं और पूजा के लिए एकत्र हुए हिंदू श्रद्धालुओं के ख़िलाफ़ पुलिस बल प्रयोग की खबरें भी सामने आईं। अंततः मार्च 2024 में एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ आया, जब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ASI को भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया। बाद में यही सर्वेक्षण अंतिम फैसले का निर्णायक आधार साबित हुआ।[10]
जब साक्ष्यों ने बदली बहस की दिशा
भोजशाला परिसर के वैज्ञानिक सर्वेक्षण से सामने आए निष्कर्षों ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के अंतिम फैसले को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभाई।
अदालत में प्रस्तुत ASI की 2,000 पृष्ठों की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, परिसर से 1,700 से अधिक पुरावशेष प्राप्त हुए, जिनमें वाग्देवी (मां सरस्वती) की एक खंडित मूर्ति भी शामिल थी। सर्वेक्षण में कम से कम 94 स्थापत्य अवशेषों का दस्तावेजीकरण किया गया। वहीं ब्रह्मा, कृष्ण, शिव, गणेश, पार्वती, हनुमान और नरसिंह सहित विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं की 37 पूर्ण या खंडित मूर्तियां मस्जिद की दीवारों में जड़ी हुई पाई गईं। इसके अलावा इंडो-सासानी काल से लेकर ब्रिटिश युग तक के 31 सिक्के भी मिले। एक महत्वपूर्ण शिलालेख भी प्राप्त हुआ, जिसमें परमार वंश के राजा नरवर्मन (1094–1133 ईस्वी) का उल्लेख है।
अपने निर्णय में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि स्थापत्य विश्लेषण, ASI के निष्कर्षों, शिलालेखों और ऐतिहासिक साहित्य से प्राप्त समग्र साक्ष्य इस निष्कर्ष का दृढ़ समर्थन करते हैं कि भोजशाला संस्कृत शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र थी और राजा भोज से जुड़े एक मंदिर के रूप में कार्य करती थी।[11]
भोजशाला का यह फैसला भविष्य में विवादित धार्मिक स्थलों की ऐतिहासिक प्रकृति से जुड़े मामलों में अदालत-निर्देशित वैज्ञानिक सर्वेक्षणों की भूमिका को और भी अधिक मजबूत कर सकता है। 2023 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ज्ञानवापी परिसर के ASI सर्वेक्षण की अनुमति देने का निर्णय—भले ही वह ASI-संरक्षित स्मारक नहीं है—पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की सीमाओं के भीतर भी हिंदू पक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी संभावना खोल दी।[12] [13] इस फैसले ने यह स्पष्ट किया कि किसी स्थल की प्राचीनता और उसके ऐतिहासिक धार्मिक स्वरूप की जांच के लिए अदालतों को वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने का विवेकाधिकार प्राप्त है।
हालांकि इस दृष्टिकोण की अपनी सीमाएं भी हैं। कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि यदि सर्वेक्षण के निष्कर्ष हिंदू पक्ष के दावों का मज़बूत समर्थन करते भी प्रतीत हों, तो भी 1991 के अधिनियम के प्रतिबंधात्मक प्रावधान अंतिम कानूनी समाधान के रास्ते में बाधा बने रह सकते हैं। ज्ञानवापी विवाद के इर्द-गिर्द बनी हुई अनिश्चितता इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
फिर भी, पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों पर बढ़ती निर्भरता साक्ष्य-आधारित न्यायिक निर्णयों की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देती है। आलोचकों का कहना है कि अतीत में ऐसे सर्वेक्षणों का अक्सर विरोध किया जाता रहा, विशेषकर राम जन्मभूमि विवाद के दौरान, जब वामपंथी झुकाव रखने वाले अकादमिक जगत के कुछ वर्गों ने ASI के निष्कर्षों की पद्धति और निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। लेकिन 2019 के अयोध्या फैसले और ऐतिहासिक साक्ष्यों के प्रति बढ़ती सार्वजनिक रुचि के बाद, पुरातात्त्विक जांच विवादित स्थलों की ऐतिहासिक उत्पत्ति निर्धारित करने के सबसे महत्वपूर्ण साधनों में से एक के रूप में उभरती दिखाई दे रही है।
पूजा से परे: पवित्र स्थलों का सभ्यतागत महत्व
भारत के अनेक विवादित स्थल, भले ही विशिष्ट देवी-देवताओं से जुड़े हों और ऐतिहासिक रूप से पूजा-अर्चना के केंद्र रहे हों, लेकिन उनका महत्व केवल धार्मिक नहीं है। वे भारत की सांस्कृतिक, बौद्धिक और ऐतिहासिक निरंतरता की कई परतों को अपने भीतर समेटे हुए हैं और इसलिए उनका चरित्र सभ्यतागत भी है।
भारत की हिंदू विरासत केवल हिंदू समुदाय तक सीमित नहीं है। यह भारत की व्यापक सभ्यतागत धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी कारण अनेक लोगों का मानना है कि चाहे कोई नागरिक किसी भी धर्म का अनुयायी हो, इस सभ्यतागत धरोहर के संरक्षण, अध्ययन और पुनर्जीवन में प्रत्येक भारतीय का स्वाभाविक हित जुड़ा हुआ है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के भोजशाला फैसले का स्वागत करते हुए विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने इस स्थल के व्यापक पुनरुत्थान की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने भोजशाला के ऐतिहासिक विद्वत स्वरूप को पुनर्स्थापित करने की बात कही और सरकार तथा नागरिक समाज से आग्रह किया कि भोजशाला की नगरी धार को फिर से वैदिक शिक्षा के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जाए, जहां बौद्ध, जैन और सिख परंपराओं के अध्ययन को भी समान महत्व मिले। कुमार ने भारत सरकार से यह भी अपील की कि लंदन के एक संग्रहालय में रखी हुई मां सरस्वती की मूर्ति को भारत वापस लाने की दिशा में प्रयास किए जाएं और विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा के बाद उसे भोजशाला में पुनः स्थापित किया जाए।[14]
पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के आलोचकों का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि यह कानून ऐतिहासिक अन्यायों के समाधान की संभावनाओं को कमज़ोर करता है। वरिष्ठ वकील और लेखक जे. साई दीपक का कहना है कि यह अधिनियम 1991 में “प्रभावित भारतीय धार्मिक समुदायों से किसी भी प्रकार के परामर्श के बिना” लागू किया गया था। उनका यह भी तर्क है कि “संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रभावित समुदायों के अधिकारों पर इस कानून के प्रभाव को लेकर कोई गंभीर या विश्वसनीय चर्चा नहीं हुई।” उनके अनुसार यह अधिनियम ऐतिहासिक शिकायतों के लिए उपलब्ध न्यायिक उपायों को प्रभावी रूप से बंद कर देता है और इसलिए इसकी संवैधानिक समीक्षा आवश्यक है।[15]
इस कानून के एक अन्य प्रमुख आलोचक वकील अश्विनी उपाध्याय हैं। उनका तर्क है कि 1991 का अधिनियम तुगलक, बाबर और हुमायूं जैसे शासकों तथा आक्रमणकारियों के दौर में हुई ऐतिहासिक घटनाओं के परिणामों को व्यवहारिक मान्यता प्रदान करता है। उनका मानना है कि विवादित धार्मिक स्थलों की ऐतिहासिक प्रकृति का निर्धारण वैज्ञानिक सर्वेक्षणों और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए।[16]
उपाध्याय ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम को निरस्त करने की भी वकालत की है। इसके स्थान पर उन्होंने भारतीय धरोहर संहिता(Bharatiya Dharohar Sanhita) लागू करने का प्रस्ताव रखा है, जिसमें विवादित धार्मिक स्थलों की ऐतिहासिक और धार्मिक उत्पत्ति निर्धारित करने के लिए वैज्ञानिक सर्वेक्षणों की स्पष्ट और संस्थागत व्यवस्था का प्रावधान हो।[17]
पूजा स्थल अधिनियम और आगे की राह
भोजशाला पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला केवल एक संपत्ति विवाद या पूजा-अधिकार का मामला नहीं है। यह एक बड़े प्रश्न को फिर सामने लाता है: क्या भारत अपने इतिहास से जुड़े कठिन और विवादास्पद प्रश्नों का ईमानदारी से सामना करने को तैयार है? यदि किसी स्थल के बारे में ऐतिहासिक अभिलेख, पुरातात्त्विक साक्ष्य और वैज्ञानिक जांच उसके मूल स्वरूप की ओर संकेत करते हैं, तो क्या प्रभावित समुदायों को न्यायिक समाधान तलाशने का अवसर मिलना चाहिए? यही वह प्रश्न है जिसे भोजशाला विवाद ने फिर से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।
काशी ज्ञानवापी, मथुरा शाही ईदगाह और संभल के मामले इसी बहस के केंद्र में हैं। आलोचकों का कहना है कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 ऐतिहासिक विवादों पर कानूनी समाधान की गुंजाइश को बहुत सीमित कर देता है। अब जब सुप्रीम कोर्ट इस कानून की संवैधानिक वैधता की समीक्षा कर रहा है, यह बहस और तेज़ होना स्वाभाविक है।
भोजशाला फैसले ने एक बात स्पष्ट कर दी है: विवादित विरासत स्थलों पर बहस अब केवल आस्था या राजनीतिक नारों तक सीमित नहीं रहेगी। ऐसे मामलों में अदालतें अब आस्था से अधिक पुरातात्त्विक साक्ष्यों, शिलालेखों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और वैज्ञानिक जांच को महत्व देती दिखाई दे रही हैं। इससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक साक्ष्य-आधारित बन सकती है।
अंततः सभ्यतागत न्याय का अर्थ प्रतिशोध नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्मृति के साथ ईमानदार संवाद है। कोई भी राष्ट्र अपने अतीत के कठिन अध्यायों को अनदेखा करके आत्मविश्वास से आगे नहीं बढ़ सकता। भारत के सामने चुनौती यही है कि वह इतिहास, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक संतुलन के बीच ऐसा मार्ग खोजे, जो न्यायसंगत भी हो और टिकाऊ भी।
सन्दर्भ सूची
[1] Bhojshala complex is temple of Goddess Vagdevi, Hindus have right to worship: Madhya Pradesh high court; https://timesofindia.indiatimes.com/city/bhopal/bhojshala-complex-is-temple-of-goddess-vagdevi-hindus-have-right-to-worship-madhya-pradesh-high-court/articleshow/131110112.cms
[2] ASI allows Hindus unrestricted access to Bhojshala temple after Madhya Pradesh High Court verdict | Akashvani News; https://newsonair.gov.in/asi-grants-hindus-unrestricted-access-to-monument-at-bhojshala-complex-in-dhar-madhya-pradesh/
[3] Bhojshala Verdict 2026: ASI findings, historical evidence & more; https://organiser.org/2026/05/17/353808/bharat/bhojshala-case-know-all-about-bhojshala-kamal-maula-dispute-from-raja-bhoj-to-2026-verdict/
[4] Ibid.
[5] Breaking | MP High Court Declares Bhojshala A Saraswati Temple, Directs State To Consider Alternate Mosque Land | BREAKING | MP High Court Declares Bhojshala A Saraswati; https://lawbeat.in/news-updates/breaking-mp-high-court-declares-bhojshala-a-saraswati-temple-directs-state-to-consider-alternate-mosque-land-1591744
[6] Ayodhya to Bhojshala: ASI unearths Bharat’s temple legacy; https://organiser.org/2026/05/23/354422/bharat/from-ayodhya-to-bhojshala-how-asi-reports-are-reclaiming-bharats-buried-mandir-civilisation/
[7] Ibid.
[8] Bhojshala Verdict 2006: ASI findings, historical evidence & more; https://organiser.org/2026/05/17/353808/bharat/bhojshala-case-know-all-about-bhojshala-kamal-maula-dispute-from-raja-bhoj-to-2026-verdict/
[9] Ibid.
[10] Ibid.
[11] Ayodhya to Bhojshala: ASI unearths Bharat’s temple legacy; https://organiser.org/2026/05/23/354422/bharat/from-ayodhya-to-bhojshala-how-asi-reports-are-reclaiming-bharats-buried-mandir-civilisation/
[12] Energy: Gyanvapi survey to go on in non-invasive way: Supreme Court | India News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/india/gyanvapi-survey-to-go-on-in-non-invasive-way-supreme-court/articleshow/102435424.cms
[13] Gyanvapi case: Supreme Court says ASI survey a “report”, refuses to stay it; https://theleaflet.in/due-process/gyanvapi-case-supreme-court-says-asi-survey-a-report-refuses-to-stay-it
[14] VHP welcomes Bhojshala verdict, seeks Vagdevi murti return; https://organiser.org/2026/05/16/353691/bharat/bhojshala-vhp-hails-madhya-pradesh-hc-verdict-calls-for-return-of-vagdevi-murti/
[15] Places of Worship Act impedes civilizational justice: J Sai Deepak – Saurabh Sharma | BHARATA BHARATI; https://bharatabharati.in/2021/04/23/places-of-worship-act-impedes-civilizational-justice-j-sai-deepak-saurabh-sharma/
[16] No law can legalise work of Babar, Ghazni’: Advocate Ashwini Upadhyay who moved plea in SC against Places of Worship Act | India News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/india/no-law-can-legalise-work-of-babar-ghazni-advocate-ashwini-upadhyay-who-moved-plea-in-sc-against-places-of-worship-act/articleshow/116255557.cms
[17] भोजशाला केस में हिंदुओं की बड़ी जीत! – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=tc8eQnKqbqM
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