भारत को लेकर USCIRF का वैचारिक झुकाव: गुनिशा कौर की नियुक्ति पर उठते प्रश्न

गुनिशा कौर की नियुक्ति उस धारणा को और मजबूत करती है जो भारत में पहले से मौजूद है: कि USCIRF अब निष्पक्ष निगरानी संस्था कम और भारतीय सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करने वाला वैचारिक मंच बन चुका है, जिससे भारत में उसकी विश्वसनीयता और कमजोर हुई है।
सारांश

गुनिशा कौर की USCIRF में नियुक्ति ने भारत में इस आयोग की विश्वसनीयता और भारत से जुड़े मुद्दों पर उसके वैचारिक झुकाव को लेकर चिंताओं को और बढ़ा दिया है। जर्नैल सिंह भिंडरांवाले के प्रति उनका दृष्टिकोण, खालिस्तानी सक्रियता पर उनका लेखन, और भारत में अलगाववादी या चरमपंथी गतिविधियों से जुड़े लोगों के बारे में उनकी सार्वजनिक टिप्पणियों ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में भारत का निष्पक्ष मूल्यांकन संभव होगा। यह नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब USCIRF और भारत के संबंध पहले से ही तनावपूर्ण रहे हैं, खासकर भारत को बार-बार Country of Particular Concern (CPC) घोषित करने की सिफारिशों के कारण। तनाव कम होने के बजाय, यह नियुक्ति भारत में बढ़ते अविश्वास को और गहरा कर सकती है, जहाँ USCIRF की निष्पक्षता, विश्वसनीयता और संतुलन पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

भारत और United States Commission on International Religious Freedom (USCIRF) के संबंध कभी भी सहज नहीं रहे हैं। वर्षों से नई दिल्ली उसके निष्कर्षों को राजनीतिक रूप से प्रेरित, उसकी कार्यप्रणाली को पक्षपाती और उसकी सिफारिशों को एक संप्रभु लोकतंत्र के आंतरिक मामलों में दखल के रूप में देखता रहा है। गुनिशा कौर [1]  — एक शिक्षाविद् जिनका सार्वजनिक लेखन खालिस्तानी अलगाववादी कथाओं की लीपा पोती करने से जुड़ा रहा है — की नियुक्ति से इस धारणा में कोई बड़ा बदलाव आने की संभावना नहीं दिखती। बल्कि, यह उस आशंका को और मजबूत करती है जो भारत लंबे समय से जताता आया है: कि USCIRF वैश्विक धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष प्रहरी कम और भारत को विशेष रूप से निशाना बनाने वाली संस्था अधिक बन चुकी है।

गुनिशा कौर का चयन कुछ हद तक हताशा से प्रेरित लगता है। अतीत में पाकिस्तानी मुसलमानों और धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं को आयुक्त नियुक्त करने के बावजूद भारत के खिलाफ प्रतिबंधों की मांग को अपेक्षित समर्थन न मिलने के बाद, अब USCIRF ने भारत पर और आरोप लगाने के लिए एक खालिस्तान समर्थक सिख चेहरे को आगे किया है, इस उम्मीद में कि कुछ न कुछ असर अवश्य होगा।

चिंता इस बात को लेकर नहीं है कि गुनिशा कौर सिख हैं। भारत दुनिया की सबसे बड़ी सिख आबादी का घर है; सिख देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, थलसेना प्रमुख और अनेक अन्य प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पदों पर रह चुके हैं। चिंता इस बात को लेकर है कि सार्वजनिक जीवन में गुनिशा कौर की भूमिका और रुख क्या रहे हैं, उन्होंने क्या लिखा है, किन लोगों का बचाव किया है, और किस प्रकार उन्होंने भारत के आतंकवाद-रोधी प्रयासों को प्रशासनिक आवश्यकता के बजाय उत्पीड़न के रूप में प्रस्तुत किया है। इसलिए यह प्रश्न धार्मिक नहीं, संस्थागत  हैं।

गुनिशा कौर के रिकॉर्ड का अनकहा पक्ष

अमेरिकी सीनेटर चक शूमर ने 21 मई 2026 को गुनिशा कौर की नियुक्ति की घोषणा करते हुए उन्हें चिकित्सक, मानवविज्ञानी, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समर्थक और सिख समुदाय की नेता बताया[2] शूमर ने उन्हें USCIRF में सेवा देने वाली पहली सिख सदस्य कहा, जबकि Sikh Coalition, जिसने उनकी नियुक्ति के लिए सक्रिय रूप से प्रयास किए थे, ने इसे एक ऐतिहासिक क्षण के रूप में प्रस्तुत किया[3]

जो बात सबसे अधिक खटकती है, वह यह है कि गुनिशा कौर के सार्वजनिक लेखन और काम के महत्वपूर्ण पहलुओं का लगभग कोई उल्लेख नहीं किया गया। इनके लेखन में वह पुस्तक भी शामिल है जो खालिस्तानी आतंकवादी जर्नैल सिंह भिंडरांवाले [4]  की छवि को अपेक्षाकृत नरम रूप में प्रस्तुत करती है, और प्रमुख पश्चिमी प्रकाशनों में लिखे गए ऐसे लेख शामिल हैं जिनमें खालिस्तान से जुड़ी शिकायतों को असंबंधित नीतिगत बहसों से जोड़ा गया, और वह लगातार दिखने वाली प्रवृत्ति भी शामिल है जिसमें भारत द्वारा आतंकवादी घोषित व्यक्तियों को केवल “कार्यकर्ता” या “नागरिक” कहकर प्रस्तुत किया गया। आधिकारिक परिचय ने कौर की एक सीमित और सावधानी से गढ़ी गई छवि सामने रखी — ऐसी छवि, जो पंजाब उग्रवाद के दौर से गुजरे लाखों हिंदू और सिख भारतीयों, या उसके पीड़ितों के परिवारों को शायद बिल्कुल अलग दिखाई दे।

भिंडरांवाले की हिंसक विरासत को नरम रूप में पेश करना

गुनिशा कौर की इस भूमिका का कोई भी गंभीर आकलन उनकी पुस्तक Lost in History: 1984 Reconstructed [5]  से शुरू होना चाहिए, विशेष रूप से जर्नैल सिंह भिंडरांवाले के प्रति उनके दृष्टिकोण से।

इस पुस्तक में गुनिशा कौर भिंडरांवाले को “1970 और 1980 के शुरुआती वर्षों में सिखों के एक करिश्माई और प्रभावशाली नेता[6]  के रूप में प्रस्तुत करती हैं और उन्हें मुख्यतः राज्य की कथाओं के शिकार एक धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में चित्रित करती हैं। ऐसी ही सोच की झलक एक सिख विरासत वेबसाइट पर प्रकाशित समीक्षा [7] में भी दिखाई देती है, जिसमें कहा गया कि पुस्तक भिंडरांवाले को ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है जिसने “आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के आधार पर अल्पसंख्यक अधिकारों और सत्ता के विकेंद्रीकरण की मांग वाला अभियान शुरू किया।” इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि कौर का लेखन भिंडरांवाले के आंदोलन  द्वारा हुए हिंदू-विरोधी हिंसक हमलों के आरोपों पर भी प्रश्न उठाता है और संकेत देता है कि ऐसी घटनाओं को भारतीय राज्य ने राजनीतिक कारणों से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हो सकता है।

1980 के दशक में पंजाब उग्रवाद [8]  के दौरान मारे गए हजारों लोगों — हिंदुओं, सिखों और उन अन्य लोगों के परिवारों के लिए जिन्होंने लक्षित हत्याओं, बम धमाकों और सांप्रदायिक हिंसा [9]  का सबसे अधिक दंश झेला — भिंडरांवाले कोई जटिल या गलत समझे गए धार्मिक नेता नहीं हैं। वे स्वतंत्र भारत के सबसे विनाशकारी घरेलू आंदोलन के सबसे प्रभावशाली वैचारिक चेहरों में से एक थे, जिसकी अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूदगी ने ऑपरेशन ब्लूस्टार  [10]  की पृष्ठभूमि तैयार की और जिसके अनुयायियों ने सांप्रदायिक रक्तपात का ऐसा अभियान चलाया जिसने पंजाबियों की एक पूरी पीढ़ी को गहरे घाव दिए।

पश्चिमी प्रकाशनों में कौर के लेखन से एक स्पष्ट वैचारिक शैली सामने आती है, और वो है सिख अलगाववाद से जुड़ी बातों को मानवाधिकार, नागरिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय जैसे अधिक स्वीकार्य विचारों की भाषा में पेश करना।

2020–21 के कृषि कानून विरोध प्रदर्शनों के दौरान, उन्होंने CNN के लिए एक सहलेख लिखा, जिसमें कृषि नीति पर केंद्रित बहस के बीच अचानक से सिख अलगाववाद से जुड़ी शिकायतों और तर्कों को बहस में शामिल करने का प्रयास किया गया, जो स्पष्ट रूप से जानबूझकर जोड़ा गया प्रयास लगता है[11]

इससे भी अधिक ध्यान खींचने वाली बात भारत और विदेशों में सक्रिय खालिस्तानी नेटवर्क के बीच तनाव पर उनका लेखन है। इसी संदर्भ में उन्होंने हरदीप सिंह निज्जर — जिसे भारत सरकार ने खालिस्तान समर्थक गतिविधियों में संलिप्तता के कारण Unlawful Activities Prevention Act के तहत आतंकवादी घोषित किया था [12]  और जो प्रतिबंधित Khalistan Tiger Force का प्रमुख था — को मुख्यतः “एक कनाडाई नागरिक” बताया। गुरपतवंत सिंह पन्नून, जो Sikhs for Justice [13]  का प्रमुख है और जिसे भारत के गृह मंत्रालय ने 2020 में आतंकवादी घोषित किया था [14]  — तथा जिसने भारतीय विमानों, राजनयिक प्रतिष्ठानों और भारतीय मूल के कनाडाई नागरिकों के खिलाफ खुली धमकियाँ दी हैं — को गुनिशा कौर ने केवल “एक सिख कार्यकर्ता और अमेरिकी नागरिक” के रूप में वर्णित किया। इसी संदर्भ में उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि भारत सिख आत्मनिर्णय की मांगों से “खतरा” क्यों महसूस करता है।

गुनिशा कौर का तथ्यों को प्रस्तुत करने का खालिस्तान से जुड़ी पश्चिमी सक्रियता की एक खास धारा को परिभाषित करता है: हिंसा का खुलकर समर्थन किए बिना उसके पूरे संदर्भ को धीरे-धीरे धुंधला करना —आतंकवादी घोषित किए जाने की बात को गौण बना देना, पिछले रिकॉर्ड को नजरअंदाज करना, अलगाववादी अभियानों के चेहरों को नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के रूप में पेश करना, और राज्य की सुरक्षा प्रतिक्रिया को ही वास्तविक आक्रामकता के रूप में चित्रित करना। कौर के सार्वजनिक लेखन में यह प्रवृत्ति अनेक मंचों पर लंबे समय तक लगातार दिखाई देती है।

भारत को लेकर USCIRF का लगातार टकरावपूर्ण रवैया

गुनिशा कौर की नियुक्ति को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। इसे भारत के साथ USCIRF के लंबे और टकरावपूर्ण संबंधों की पृष्ठभूमि में समझना होगा — ऐसे संबंध, जिन्हें भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और अधिकारियों ने बार-बार न तो निष्पक्ष माना है और न ही विश्वसनीय।

USCIRF ने 2009 से भारत को अपनी निगरानी सूची में शामिल किया हुआ है [15], पहले Tier 2 श्रेणी में, और फिर 2020 में एक बड़े बदलाव के साथ, जब उसने पहली बार भारत को Country of Particular Concern (CPC) घोषित करने की सिफारिश की[16]  यह वह श्रेणी है जिसमें आमतौर पर दुनिया के कुछ सबसे दमनकारी धर्मतांत्रिक और अधिनायकवादी देशों — जैसे उत्तर कोरिया, चीन और इरिट्रिया — को रखा जाता है। USCIRF ने इसके बाद अपनी हर वार्षिक रिपोर्ट, जिसमें 2026 की रिपोर्ट भी शामिल है, में यही सिफारिश दोहराई [17]  — जिससे यह लगातार सातवाँ वर्ष बन गया जब भारत को CPC घोषित करने की अनुशंसा की गई[18]

2026 की रिपोर्ट और भी आगे बढ़ गई। इसमें अमेरिका से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी RAW पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई [19]  — जो एक असाधारण सुझाव और जिसे भारत के विदेश मंत्रालय ने तुरंत खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने रिपोर्ट को “भारत की विकृत और चयनात्मक तस्वीर” बताते हुए कहा कि यह “तथ्यों की निष्पक्ष समझ के बजाय संदिग्ध स्रोतों और वैचारिक कथाओं पर आधारित” है। उन्होंने यह भी कहा कि “बार-बार की जा रही ऐसी गलत प्रस्तुतियाँ स्वयं आयोग की विश्वसनीयता को ही कमजोर करती हैं।” [20]

महत्वपूर्ण बात यह है कि लगातार आई अमेरिकी सरकारों — चाहे वे डेमोक्रेटिक रही हों या रिपब्लिकन — ने USCIRF की सिफारिश न मानते हुए, भारत को कभी भी Country of Particular Concern घोषित नहीं किया है। USCIRF की सिफारिशों और वास्तविक अमेरिकी विदेश नीति के बीच यह अंतर अपने आप में महत्वपूर्ण है। इससे संकेत मिलता है कि भारत को लेकर आयोग का आकलन मुख्यधारा की रणनीतिक और नीतिगत सोच से इतना अलग हो चुका है कि निर्णय लेने की स्थिति में बैठे लोगों ने भी लगातार उसे स्वीकार करना उचित नहीं समझा।

USCIRF की दिशा को लेकर उठते प्रश्न

गुनिशा कौर की नियुक्ति को लेकर उठे विवाद को USCIRF की व्यापक संरचना और भारत से जुड़े मामलों में उसके बढ़ते वैचारिक झुकाव से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

USCIRF के पूर्व उपाध्यक्ष आसिफ महमूद [21]  — एक पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी चिकित्सक, जिन्हें प्रतिनिधि सभा के अल्पसंख्यक नेता हकीम जेफ्रीज़ ने नियुक्त किया था — भी भारत को लेकर अत्यधिक सक्रिय रहे। उन्होंने बार-बार अमेरिका और कनाडा में खालिस्तान समर्थकों के खिलाफ हिंसा को भारत से जोड़ने की कोशिश की। भारतीय टिप्पणीकारों ने उन पर उन रिपोर्टों को आकार देने का आरोप लगाया, जिनमें भारतीय संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई थी। महमूद के बारे में कहा गया कि उनके सार्वजनिक रुख अक्सर भारत-विरोधी कथाओं के साथ मेल खाते थे [22] और वे पहले Association of Physicians of Pakistani Descent of North America [23] से भी जुड़े रहे थे, जिसे कुछ भारतीय विश्लेषकों ने इस्लामाबाद समर्थक समूह के रूप में देखा। आयोग में मोहम्मद एलसानूसी भी शामिल हैं, और समय-समय पर यह ऐसे प्रवासी वकालत समूहों से भी प्रभावित रहा है, जिन्होंने लंबे समय तक भारत के प्रति टकरावपूर्ण रुख अपनाया है।

यहाँ चिंता किसी आयुक्त के धर्म या जातीय पहचान को लेकर नहीं है। ऐसा तर्क न केवल अनुचित होगा, बल्कि विश्लेषण की दृष्टि से भी कमजोर होगा। चिंता एक विशेष प्रकार की वैचारिक एकरूपता को लेकर है: क्या आयोग में अनुपातहीन रूप से ऐसे लोग शामिल होते जा रहे हैं जिनकी भारत को लेकर पहले से बनी हुई नकारात्मक धारणाएँ हैं, जो भारत के आतंकवाद-रोधी कदमों को उत्पीड़न के रूप में देखते हैं, अलगाववादी कार्यकर्ताओं को नागरिक अधिकारों के नायक की तरह प्रस्तुत करते हैं, और भारत की लगभग हर घरेलू नीति को बहुसंख्यक वर्चस्व के नजरिए से समझते हैं।

जब किसी एक देश को लेकर किसी आयोग का झुकाव लगातार एक ही वैचारिक दिशा में दिखाई देने लगे, तो वह विश्लेषण की विविधता नहीं कहलाती। वह पहले से बनी धारणाओं का प्रतिबिंब बन जाती है — और गुनिशा कौर के मामले में ऐसी धारणाएँ उनके लिखित रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।

भारत में इस नियुक्ति को किस रूप में देखा जा रहा है

यह नियुक्ति नई दिल्ली और व्यापक भारतीय समाज में धारणाओं को प्रभावित कर सकती है। भारत के लिए यह उन आशंकाओं को कम करने के बजाय और मजबूत कर सकती है, जो पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी संस्थागत रवैये को लेकर बनी हैं। विशेष रूप से, भारत में यह धारणा और भी गहरी हो सकती है कि अलगाववाद और चरमपंथ से जुड़े प्रश्नों को कुछ अमेरिकी संस्थागत हलकों में हमेशा एक समान सुरक्षा दृष्टिकोण से नहीं देखा जाता।

ये चिंताएँ खास तौर पर खालिस्तानी नेटवर्क को लेकर अधिक प्रबल हैं । यह एक ऐसा आंदोलन है जिसे एक देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री की हत्या [24], 329 लोगों की जान लेने वाले एक यात्री विमान विस्फोट [25], लक्षित सांप्रदायिक हत्याओं और विदेशों से संचालित आतंकी नेटवर्क से जोड़ा जाता रहा है[26] भारतीय कानून के तहत अलगाववादी या चरमपंथी गतिविधियों से जुड़े लोगों को मुख्यतः “कार्यकर्ता” या “समुदाय के प्रतिनिधि” के रूप में प्रस्तुत करना इस धारणा को और मजबूत करता है कि “हिंसक चरमपंथ” को समझने और परिभाषित करने के मानदंड हर जगह समान नहीं हैं।

व्यापक स्तर पर देखें तो यह नियुक्ति भारत और USCIRF के बीच लंबे समय से बने अविश्वास को कम नहीं कर सकती। 2009 से लगातार बढ़ा यह अंतर 2020 में भारत को CPC घोषित करने की सिफारिश के बाद और गहरा हुआ है। भारतीय जनमत में ऐसी नियुक्तियों को अब तटस्थ संस्थागत निर्णय कम और भारत को लेकर एक विशेष वैचारिक दृष्टिकोण का प्रतिबिंब अधिक माना जाने लगा है।

भारत ने अब सार्वजनिक रूप से USCIRF को चुनौती देना भी शुरू कर दिया है। भारत ने आयोग से कहा है कि वह 1.4 अरब लोगों वाले लोकतंत्र को उपदेश देने के बजाय अमेरिका में हिंदू मंदिरों पर हमलों और भारतीय मूल के लोगों को डराने-धमकाने की घटनाओं पर भी ध्यान दे[27]  दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र जब एक अमेरिकी आयोग को उसके अपने घर की कमियाँ दिखाने लगे, तो यह अपने आप में बताता है कि भारत में USCIRF की साख कितनी कमजोर हुई है।

निष्कर्ष: विश्वसनीयता की कीमत

इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत — या कोई भी अन्य देश — आलोचना से ऊपर होना चाहिए। लोकतंत्रों को आलोचना स्वीकार करनी पड़ती है, और भारत के अतीत के कुछ अध्याय, जैसे इंदिरा गांधी सरकार के दौरान आपातकाल के समय हुए दमन [28], गंभीर चर्चा और समीक्षा की माँग करते हैं। एक वास्तविक और संतुलित संवाद की आवश्यकता है — ऐसा संवाद जिसे कोई सचमुच स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था विश्वसनीयता के साथ आगे बढ़ा सके।

लेकिन USCIRF अपने वर्तमान स्वरूप में यह भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं है। एक ऐसा आयोग जिसकी हाल की रिपोर्टें भारत की खुफिया एजेंसियों और एक प्रमुख सांस्कृतिक संगठन पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश करती रही हैं; जिसका उपाध्यक्ष ऐसा व्यक्ति रह चुका है जिस पर भारत-विरोधी रुख अपनाने के आरोप लगते रहे; और जिसमें अब ऐसी आयुक्त शामिल हैं जिनके लेखन में खालिस्तानी अलगाववाद से जुड़े चेहरों को अधिक स्वीकार्य रूप में प्रस्तुत करने और आतंकवादी घोषित व्यक्तियों को समुदाय प्रतिनिधियों के रूप में चित्रित करने के उदाहरण मिलते हैं — ऐसा आयोग नई दिल्ली में अपनी विश्वसनीयता और निष्पक्षता दोनों को कमजोर करता दिखाई देता है।

गुनिशा कौर की नियुक्ति USCIRF की भारत संबंधी समस्या का कारण नहीं है। यह  वर्षों से चली आ रही पुरानी समस्या की नई अभिव्यक्ति है। प्रश्न यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता पर नज़र रखने वाला कोई आयोग आखिर कितना प्रभावी रह सकता है, यदि उसका सबसे बड़ा लक्ष्य देश — और वह भी अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों के दौरान — यह मानने लगे कि उससे संवाद करना अब उपयोगी नहीं रह गया है।

यह भारत की विफलता नहीं है। यह USCIRF की विफलता है।

सन्दर्भ सूची

[1] United States Commission on International Religious Freedom. “Gunisha Kaur.” USCIRF. https://www.uscirf.gov/about-uscirf/commissioners/gunisha-kaur

[2] “NY Senator Chuck Schumer Appoints Dr. Gunisha Kaur to US Commission on International Religious Freedom.” News India Times. https://newsindiatimes.com/ny-senator-chuck-schumer-appoints-dr-gunisha-kaur-to-us-commission-on-international-religious-freedom/

[3] Sikh Coalition. “Dr. Gunisha Kaur Appointed to USCIRF by Senator Schumer.” Sikh Coalition, 2026. https://www.sikhcoalition.org/blog/2026/dr-gunisha-kaur-appointed-to-uscirf-by-senator-schumer/

[4] “Khalistan Movement: Sikh Militancy on Rise Again.” Boloji. https://www.boloji.com/articles/53677/khalistan-movement-sikh-militancy-on-rise-again

[5] Gunisha Kaur. Lost in History: 1984 Reconstructed. PDF. https://www.vidhia.com/Historical%2C%20Political%2C%20Philosophical%20and%20Informational/Lost_in_History_Second_Edition-_Gunisha_Kaur.pdf

[6] “Who Is Gunisha Kaur, New USCIRF Commissioner? Anti-India, Pro-Khalistani Exposed Details.” OpIndia, May 2026. https://www.opindia.com/2026/05/who-is-gunisha-kaur-new-uscirf-commissioner-anti-india-pro-khalistani-exposed-details/

[7] “Lost in History: 1984 Reconstructed.” SikhChic. https://www.sikhchic.com/article-detail.php?cat=12&id=907

[8] James Sterba, “The Punjab Torn by Terror.” New York Times Magazine, September 8, 1985. https://www.nytimes.com/1985/09/08/magazine/the-punjab-torn-by-terror.html

[9] “Punjab Insurgency / Khalistan Violence.” YouTube Video. https://www.youtube.com/watch?v=9pcV0cYmsbk

[10] Brut India. “What Led to Operation Bluestar and Who Were the Men Behind It?” Facebook Video. https://www.facebook.com/brutindia/videos/what-led-to-operation-bluestar-and-who-were-the-men-behind-it/26300906336238767/

[11] Simran Jeet Singh and Gunisha Kaur, “Indian Farmer Protests Are About More Than Agriculture.” CNN Opinion, December 11, 2020. https://edition.cnn.com/2020/12/11/opinions/indian-farmer-protests-simran-singh-gunisha-kaur

[12] “Hardeep Nijjar Death: Canada’s Shocking Report Contradicts Trudeau’s Claims.” NDTV Video. https://www.ndtv.com/video/hardeep-nijjar-death-canada-s-shocking-report-contradicts-trudeau-s-claims-on-hardeep-s-death-895547

[13] “Centre Extends Ban on Pro-Khalistani Fringe Group Sikhs for Justice by Another 5 Years.” News on Air. https://newsonair.gov.in/centre-extends-ban-on-pro-khalistani-fringe-group-sikhs-for-justice-by-another-5-years/

[14] “Gurpatwant Singh Pannun among Nine Designated as Terrorists under UAPA.” The Tribune. https://www.tribuneindia.com/news/nation/gurpatwant-singh-pannun-among-nine-designated-as-terrorists-under-uapa-107197

[15] “USCIRF’s Anti-India Obsession: Freedom Crusade or a Political Smear?” Stop Hindu Dvesha. https://stophindudvesha.org/uscirfs-anti-india-obsession-freedom-crusade-or-a-political-smear/

[16] “US Panel on Religious Freedom Wants Donald Trump Administration to Designate India as Country of Particular Concern.” Deccan Herald. https://www.deccanherald.com/world/us-panel-on-religious-freedom-wants-donald-trump-administration-to-designate-india-as-country-of-particular-concern-831232.html

[17] United States Commission on International Religious Freedom. “Religious Minorities in India Suffer Escalating Attacks.” USCIRF. https://www.uscirf.gov/news-room/releases-statements/religious-minorities-india-suffer-escalating-attacks

[18] “Assault on India’s Sovereignty: The Misleading and False Narrative of USCIRF.” Organiser, March 17, 2026. https://organiser.org/2026/03/17/344455/bharat/assault-on-indias-sovereignty-the-misleading-and-false-narrative-of-uscirf/

[19] “USCIRF’s India Report ‘Distorted’: MEA Calls Out US Panel’s Recommendation to Sanction RAW, RSS.” Republic World. https://www.republicworld.com/india/uscirf-s-india-report-distorted-mea-calls-out-us-panel-s-motivated-and-biased-recommendation-to-sanction-raw-rss

[20] “USCIRF’s India Report: India Rejects Findings, Calls Report Biased and Motivated.” Organiser, May 11, 2026. https://organiser.org/2026/05/11/352670/bharat/uscirfs-india-report-india-rejects-findings-calls-report-biased-and-motivated/

[21] “Who Is Asif Mahmood? USCIRF Commissioner, Pakistani-American, Anti-India Conspiracies, Propaganda, Unverified Claims.” News18. https://www.news18.com/world/who-is-asif-mahmood-uscirf-commissioner-pakistani-american-anti-india-conspiracies-propaganda-unverified-claims-9276723.html

[22] “USCIRF’s Bharat Narrative: A Politicised Assault on Bharat’s Sovereignty and Civilisational Identity.” HinduPost. https://hindupost.in/world/uscirfs-bharat-narrative-a-politicised-assault-on-bharats-sovereignty-and-civilisational-identity/

[23] “India Questions USCIRF’s Credibility amid Diplomatic Concerns.” Organiser, March 29, 2026. https://organiser.org/2026/03/29/346138/bharat/india-questions-uscirfs-credibility-amid-diplomatic-concerns/

[24] Encyclopaedia Britannica. “Why Was Indira Gandhi Assassinated?” https://www.britannica.com/question/Why-was-Indira-Gandhi-assassinated

[25] “Air India Flight 182: The Bombing That Killed 329 People.” BBC News. https://www.bbc.com/news/world-asia-india-66909820

[26] “Blood for Blood: Book Review.” CoHNA. https://cohna.org/blood-for-blood-book-review/

[27] “Distorted, Selective Picture: India on USCIRF Recommendation to Sanction.” NewKerala. https://www.newkerala.com/news/a/distorted-selective-picture-india-mea-uscirfs-recommendation-sanction-385.htm

[28] “48 Years of Emergency: Atrocities Suffered, Unwavering Resistance Have Profoundly Influenced Nation’s Collective Memory.” Firstpost. https://www.firstpost.com/opinion/48-years-of-emergency-atrocities-suffered-unwavering-resistance-have-profoundly-influenced-nations-collective-memory-12786642.html

Som Misha
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Som Misha is an investment banker. After hours, he sometimes wears his writer's hat and writes on current affairs topics. He has a passion for crafting compelling narratives that impact people's lives.
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