वामपंथ का आत्मघाती समझौता: खतरनाक गठजोड़ और घातक आत्म-भ्रम
सारांश
एक ऐसा आंदोलन जिसने कभी सहिष्णुता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को अपना आधार बताया था, आज बढ़ती सेंसरशिप, वैचारिक कट्टरता और चरमपंथी ताकतों के प्रति बढ़ती नरमी से जुड़ता दिखाई देता है। विरोधाभास साफ हैं: जो वाम-उदारवादी एलजीबीटी अधिकारों के समर्थन में मार्च निकालते हैं, वही ऐसे शासन और आंदोलनों का भी बचाव करते दिखते हैं जो समलैंगिकों को मृत्युदंड देते हैं। कई बार वे उन क्रांतिकारी या अलगाववादी आंदोलनों का भी महिमामंडन करते हैं, जो सत्ता में आने पर सबसे पहले उन्हीं को निशाना बना सकते हैं — जैसा कि अरुंधति रॉय ने स्वयं एक बातचीत में हँसते हुए स्वीकार किया था।
यह समस्या असहमति के प्रति बढ़ती असहिष्णुता, राजनीतिक अतिशयोक्ति और चयनात्मक नैतिकता के रूप में सामने आती है। सीमा नियंत्रण जैसी नीतियों को “फासीवाद” कहा जाता है, लेकिन इस्लामी कट्टरता के कई रूपों को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। इसका परिणाम आम नागरिकों से बढ़ती दूरी के रूप में दिखाई देता है, जिसकी झलक भारत, ब्रिटेन, यूरोप और अमेरिका में बार-बार हुए चुनावी झटकों में देखी जा सकती है। यदि वामपंथ को अपनी विश्वसनीयता वापस पाना है, तो उसे वैचारिक ईमानदारी, आत्ममंथन और उन लोगों को सुनने की क्षमता फिर से विकसित करनी होगी, जिनकी आवाज़ बनने का वह दावा करता है। अन्यथा, आधुनिक वाम-उदारवाद अपने ही अंत का कारण बन सकता है।
“उदारवाद एक बिगड़े हुए बालक की तरह होता है — असंतुष्ट, मांग करने वाला, अनुशासनहीन, निरंकुश और बेकार। उदारवाद रोते-बिलखते बिगड़ैल बच्चों का दर्शन है।” — पी. जे. ओ’रूर्क, अमेरिकी लेखक [1]
स्थान था इटली। पत्रकारों से भरा एक कमरा। और अंतरराष्ट्रीय वामपंथ की चर्चित आवाज़, अरुंधति रॉय, ने अभी-अभी कुछ ऐसा कहा था जिसने कमरे को स्तब्ध कर देना चाहिए था।
रॉय ने पत्रकारों से कहा कि उनके और उनके दोस्तों के बीच एक मज़ाक चलता था। वे जिन आंदोलनों का समर्थन करते थे — भारत के जंगलों में माओवादी या कश्मीर में इस्लामी अलगाववादी — अगर वे कभी सचमुच जीत गए, तो “सबसे पहले हमें ही पास के किसी पेड़ पर लटका दिया जाएगा। कई बार आप ऐसे लोगों के पक्ष में लड़ रहे होते हैं, जिनकी दुनिया में आपके लिए कोई जगह ही नहीं होती। लेकिन खैर कोई बात नहीं।” और, यह कहते हुए वह हँस रही थीं। कमरे में मौजूद लोगों ने भी इसे सामान्य बात की तरह लिया। [2]
ज़रा इस बात के अर्थ पर गंभीरता से विचार कीजिए। वैश्विक प्रगतिशील आंदोलन की एक प्रमुख साहित्यिक आवाज़ खुले तौर पर यह स्वीकार कर रही थी कि जिन आंदोलनों का वह समर्थन करती हैं, वे सत्ता में आने पर सबसे पहले उन्हें ही खत्म कर सकते हैं — और उन्होंने इस संभावना को अपने ही शब्दों में “ठीक” बताया। न चिंता। न आत्ममंथन। न अपने राजनीतिक पक्ष पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत।
अमेरिकी राजनीतिक लेखक बिल वाइनबर्ग के अनुसार अरुंधति रॉय का यह बयान एक तरह से “क्रांतिकारी आत्महत्या” का समर्थन था — लगभग हँसते हुए यह स्वीकार करना कि जिन ताकतों के प्रति वह सहानुभूति रखती हैं, वे सत्ता मिलने पर सबसे पहले उन्हीं जैसे लोगों को फाँसी पर चढ़ा सकती हैं।
समकालीन वाम-उदारवाद के विरोधाभासों को समझाने के लिए इससे बेहतर उदाहरण मिलना कठिन है। इस एक प्रसंग में लगभग वे सभी समस्याएँ समा जाती हैं, जिन्होंने वॉशिंगटन से टोक्यो, इंग्लैंड के श्रमिक वर्ग से लेकर भारत के मध्यवर्ग तक लाखों लोगों को यह महसूस करने पर मजबूर किया है कि “प्रगतिशील” प्रतिष्ठान अपने मार्ग से भटक चुका है। साम्राज्यवाद-विरोध का ऐसा जुनून, जो धीरे-धीरे उन आंदोलनों के समर्थन में बदल गया जिनकी विचारधारा स्वयं हिंसा और कट्टरता से भरी है। इसके साथ जुड़ गई परिणामों के प्रति लापरवाही और सबसे बढ़कर आत्म-चिंतन की कमी, जिसे अक्सर बौद्धिक परिष्कार का रूप दे दिया जाता है।
विडंबना यह है कि अरुंधति रॉय को कभी किसी माओवादी नियंत्रित जंगल या शरीया कानून वाले कश्मीर में रहना नहीं पड़ेगा। वह दिल्ली में रहती हैं, साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं और ऐसे इंटरव्यू देती हैं जहाँ कठिन सवाल शायद ही पूछे जाते हों। जब फाँसी केवल एक काल्पनिक संभावना हो, तब उसे “कोई बात नहीं” कहना आसान होता है।
संवाद की जगह बहिष्कार की प्रथा
इटली में अरुंधति रॉय की वह टिप्पणी भले ही एक चरम उदाहरण लगे, लेकिन वह कोई अपवाद नहीं है। बल्कि वह उस सोच का स्वाभाविक परिणाम है जो धीरे-धीरे वाम-उदारवादी राजनीति के भीतर लगभग एक अनकहे नियम की तरह स्थापित हो चुकी है — किसे “सही पीड़ित” माना जाएगा, किन आंदोलनों का समर्थन किया जाएगा, और कौन से सवाल पूछना स्वीकार्य समझे जाएंगे।
वाम-उदारवादी स्वयं को बहुलवाद, स्वतंत्र चिंतन और खुले विमर्श का सबसे बड़ा रक्षक बताते हैं। लेकिन सचाई यह है कि जिस राजनीतिक और सांस्कृतिक माहौल को उन्होंने खड़ा किया है, उसमें असहमति के लिए जगह कई बार पहले से कहीं कम दिखाई देती है। इनके हथकंडे अब किसी से छिपे नहीं हैं, भले ही उन पर खुलकर चर्चा कम होती हो।
जो शिक्षाविद् लिंग, नस्ल, आव्रजन या पहचान की राजनीति जैसे विषयों पर मुख्यधारा की सोच से अलग राय रखते हैं, वे अक्सर संगठित अभियानों के निशाने पर आ जाते हैं। पत्रकार यदि ऐसी रिपोर्टिंग करें जो लोकप्रिय प्रगतिशील सोच से मेल न खाए, तो उन्हें खुलेआम अपमान, सामाजिक बहिष्कार या नौकरी तक गंवाने का खतरा उठाना पड़ सकता है। शिक्षक, नर्स, सरकारी कर्मचारी, यहाँ तक कि शेफ जैसे सामान्य पेशेवर भी यह समझ चुके हैं कि कुछ मुद्दों पर “गलत राय” रखने के लिए उन्हें भारी व्यक्तिगत कीमत चुकानी पड़ सकती है। [3]
अमेरिकी कॉमेडियन बिल माहेर ने वामपंथ में बढ़ती अभिव्यक्ति-विरोधी प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए कहा था: “कॉमेडियन अब क्लबों में मज़ाक करने से डरते हैं, क्योंकि कोई उसका वीडियो रिकॉर्ड करके ट्विटर पर डाल देगा और फिर भीड़ आपके पीछे पड़ जाएगी।” [4]
यह उस मानसिकता को दर्शाता है जिसमें बहस को विचारों के संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि किसी नैतिक अपराध की तरह देखा जाता है। मानो कुछ लोगों को विश्वास हो गया हो कि सत्य केवल उनके पक्ष में है, इसलिए असहमति उन्हें संवाद का अवसर नहीं, एक अस्वीकार्य चुनौती लगती है। परन्तु विडंबना और भी गहरी है। वो लोग जो फ्रैंकफर्ट स्कूल [5] का हवाला देते हैं और “सत्ता से सच बोलने” [6] की बात करते हैं, ऐसी मानसिकता का शिकार हो चुके हैं जिसमें केवल कुछ निश्चित “सच” ही कहे जा सकते हैं और केवल कुछ चुनिंदा शक्तियों को ही चुनौती देना स्वीकार्य माना जाता है।
साझे शत्रु को गिराने के लिए अस्थायी मित्रता
जैसे ही राजनीतिक इस्लाम सामने आता है, वाम-उदारवादी प्रतिष्ठान की “धर्मनिरपेक्षता” और “सहिष्णुता” की पूरी नैतिक मुद्रा डगमगाने लगती है। यही शायद उसका सबसे बड़ा वैचारिक विरोधाभास है।
जो वाम-उदारवादी शुक्रवार को एलजीबीटी अधिकारों के समर्थन में मार्च निकालते हैं, वही कई बार शनिवार को ऐसे शासन और राजनीतिक आंदोलनों का बचाव करते दिखाई देते हैं जो समलैंगिकों के लिए मौत की सज़ा को उचित मानते हैं। [7] जो लोग महिलाओं की स्वतंत्रता के सबसे मुखर पैरोकार बनते हैं, वे अक्सर उन धार्मिक-राजनीतिक व्यवस्थाओं के प्रति असहज चुप्पी ओढ़ लेते हैं जहाँ महिलाओं पर कठोर सामाजिक नियंत्रण है, शिक्षा सीमित है और धर्म परिवर्तन या त्याग अपराध माना जाता है। मानो एक अनकही सोच काम कर रही हो: यदि कोई आंदोलन पश्चिमी विदेश नीति या इज़राइल का विरोध करता है, तो उसे स्वतः नैतिक वैधता मिल जाती है, और उसके भीतर मौजूद कट्टरता या हिंसा पर सवाल उठाना गैरज़रूरी समझ लिया जाता है।
अरुंधति रॉय इस सोच में अकेली नहीं हैं। वह केवल इसकी सबसे मुखर और स्पष्ट प्रतिनिधियों में से एक हैं। उन्होंने अमेरिकी कब्जे के खिलाफ लड़ रहे इराकी प्रतिरोध को “साम्राज्य के खिलाफ लड़ाई की अग्रिम पंक्ति” बताया था [8], लेकिन उसी दौर में यह भी हो रहा था कि कई तथाकथित प्रतिरोधी समूह इराक के धर्मनिरपेक्ष वामपंथी नेताओं, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं, नारीवादियों और नागरिक समाज से जुड़े लोगों की व्यवस्थित हत्याएँ कर रहे थे। जिन जिहादी समूहों को रॉय प्रतिरोध का प्रतीक मान रही थीं, वे उन्हीं लोगों को खत्म कर रहे थे जिनके लिए एक वास्तविक प्रगतिशील आवाज़ उठनी चाहिए थी।
इसी तरह भारत में अरुंधति रॉय उन्होंने कश्मीरी मुस्लिम आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति प्रकट करती दिखाई देती हैं, परन्तु कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ हुए अत्याचारों को लेकर उनका रुख सहानुभूतिपूर्ण नहीं कहा जा सकता। [9] 2011 में एक विवादित बयान में उन्होंने भारत को “अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध लड़ने वाला औपनिवेशिक राज्य” बताया। इसी दौरान उन्होंने यह दावा भी किया कि पाकिस्तान ने कभी अपनी सेना अपने ही लोगों के खिलाफ नहीं उतारी। हालाँकि इस पर बलोच लिबरेशन फ्रंट ने सार्वजनिक प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तान सेना द्वारा हजारों बलोचों की हत्या और 1971 में लाखों बंगालियों के नरसंहार की याद दिलाई। [10]
ऐसी घटनाएँ “हैनलॉन रेज़र” की उस प्रसिद्ध उक्ति को फिर से याद दिलाती हैं: “हर गलत फैसले के पीछे दुर्भावना हो यह जरूरी नहीं है; कई बार केवल मूर्खता ही होती है।” [11]
यह पैटर्न केवल कुछ लेखकों या बुद्धिजीवियों तक सीमित नहीं है। कई आलोचकों — जिनमें मुस्लिम और अरब समाजों के धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी भी शामिल हैं — ने आरोप लगाया है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएँ, जैसे Human Rights Watch और Amnesty International, इज़राइल की आलोचना में तो बेहद सक्रिय रहती हैं, लेकिन Hamas, Hezbollah या Muslim Brotherhood जैसे समूहों के मामले में वही कठोरता नहीं दिखातीं। जब कोई संस्था सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों की बात करे, लेकिन उन्हें चुनिंदा ढंग से लागू करे तो उसकी विश्वसनीयता कमजोर पड़ने लगती है। [12]
मध्य-पूर्वी लेखक उमर दख़ाने, जिन्होंने इस्लामी कट्टरपंथ को करीब से देखा है, इस गठजोड़ को लेकर स्पष्ट चेतावनी देते हैं। उनके अनुसार: “कट्टर इस्लामवादी समूह वामपंथ के साथ केवल अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए खड़े हैं। अगर कभी उन्हें पूरी शक्ति मिल गई, तो सबसे पहले शिकार वही वामपंथी समर्थक होंगे जो आज उनके पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।” दख़ाने का कहना है कि जब उन्होंने इस्लामी चरमपंथ पर खुलकर लिखना शुरू किया, तो सबसे तीखे हमले इस्लामवादियों ने नहीं, बल्कि पश्चिमी वामपंथियों ने किए — ऐसे लोग जो न अरबी बोलते थे और न ही कभी अरब दुनिया में रहे थे। [13]
तुर्की-आधारित पत्रकार अली उमर फोरोज़िश इस “रेड-ग्रीन गठजोड़” को और सीधे शब्दों में समझाते हैं: “वामपंथ के लिए अपराधी कौन है और पीड़ित कौन है, यही सबसे महत्वपूर्ण है। यदि अपराधी पश्चिम का सहयोगी है, तो आक्रोश असीमित होता है। लेकिन यदि अपराधी पश्चिम-विरोधी है, तो अक्सर चुप्पी छा जाती है।” [14]
इतिहास में ऐसे रिश्तों को अक्सर एक अस्थायी स्वार्थपूर्ण गठजोड़ माना गया है — दो ऐसे समूहों का साथ, जिनके अंतिम लक्ष्य एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, लेकिन जो किसी साझा विरोधी के खिलाफ कुछ समय के लिए साथ खड़े हो जाते हैं। इतिहास गवाह है कि ऐसे गठबंधन अक्सर कमजोर पक्ष के लिए लाभकारी साबित नहीं होते। अरुंधति रॉय ने स्वयं हँसते हुए लगभग यही बात स्वीकार की थी। फर्क बस इतना था कि उन्हें इसमें कोई समस्या दिखाई नहीं देती थी।
राजनीतिक अतिशयोक्ति का दौर
पिछले दशक में किसी समय, संभवतः 2015 के आसपास, वाम-उदारवादी प्रतिष्ठान ने अनुपात और संतुलन की समझ खोनी शुरू कर दी — इतिहासकार शायद भविष्य में इस बदलाव की सटीक घड़ी तय करें।
एक समय था जब “फासीवादी” शब्द का प्रयोग सावधानी से किया जाता था, क्योंकि उसका अर्थ स्पष्ट भी था और भयावह भी। इसका इस्तेमाल उन शासन व्यवस्थाओं के लिए किया जाता था जो विपक्षी दलों पर प्रतिबंध लगाती थीं, राजनीतिक विरोधियों को जेल में डालती थीं या उनकी हत्या करती थीं, उग्र राष्ट्रवाद को संगठित करती थीं और नस्लीय हिंसा को सरकारी नीति का हिस्सा बना देती थीं। यह शब्द मुसोलिनी, फ्रांको और सबसे बढ़कर हिटलर जैसे शासन से जुड़ा था। इसकी गंभीरता इसलिए थी क्योंकि इसके पीछे गैस चैंबर, नरसंहार और राज्य-प्रायोजित हिंसा जैसी वास्तविक ऐतिहासिक त्रासदियाँ थीं।
लेकिन आज प्रगतिशील राजनीति की शब्दावली में “फासीवादी” शब्द का अर्थ काफी फैल चुका है। अब यह किसी ऐसे नेता के लिए इस्तेमाल हो सकता है जो सीमा सुरक्षा कड़ी करने की बात करे। या किसी ऐसे प्रधानमंत्री के लिए जो आक्रमणकारियों द्वारा तोड़े गए मंदिरों के पुनर्निर्माण की बात करे। “सचमुच हिटलर” जैसे आरोप अब उस राजनेता पर भी लगाए जाने लगे हैं जो लोकतांत्रिक चुनाव जीतकर कम टैक्स का वादा करे। क्रिसमस पर Nativity Scene लगाने वाला कोई स्कूल “श्वेत वर्चस्व” का प्रतीक बताया जा सकता है, और कोई कॉमेडियन गलत मज़ाक कर दे तो उसे “हिंसा फैलाने” वाला करार दिया जा सकता है। [15]
इस तरह की बढ़ा-चढ़ाकर की जाने वाली भाषा का एक गंभीर परिणाम होता है। जब हर चीज़ को फासीवाद कहा जाने लगे, तब असली फासीवाद को पहचानना कठिन हो जाता है। जब हर राजनीतिक विरोधी “हिटलर” बन जाए, तो इस शब्द का असर कमजोर पड़ने लगता है। और जब कोई राजनीतिक धारा वर्षों तक यह कहती रहे कि लोकतंत्र समाप्त होने वाला है, लेकिन लोकतंत्र फिर भी चलता रहे, तो उसकी विश्वसनीयता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है।
भारतीय पत्रकार अहमद शरीफ के अनुसार, “फासीवाद” के आरोप कई बार जानबूझकर विवाद खड़ा करने की राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं। उनके अनुसार, कुछ लोग जानते हैं कि सरकार वास्तव में फासीवादी नहीं है और उन्हें चुप कराने के लिए चरम कदम नहीं उठाएगी। इसलिए वे ऐसा माहौल बनाते हैं कि कोई प्रतिक्रिया दे बैठे, और फिर उसी प्रतिक्रिया को प्रचार अभियान में बदलकर स्वयं को पीड़ित के रूप में पेश किया जा सके। विडंबना यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के स्वयंभू रक्षक कई बार उन्हीं लोगों को चुप कराने की कोशिश करते दिखाई देते हैं, जो उनसे असहमत हों। [16]
हर चुनावी हार के बाद कुछ प्रगतिशील टिप्पणीकार मानो यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि मतदाता “फासीवादी” नहीं, बल्कि अलग चिंताओं और प्राथमिकताओं वाले सामान्य नागरिक भी हो सकते हैं। या ऐसे लोग, जिन्होंने वैचारिक विरोधाभासों से ऊबकर दूरी बना ली हो। लेकिन कई बार आत्ममंथन के बजाय उनकी प्रतिक्रिया और तीखी हो जाती है। वे मतदाताओं को गुमराह, अज्ञानी या अपने ही हितों को न समझ पाने वाला बताकर खारिज कर देते हैं। [17] यह संभावना कि लोगों ने शायद पूरे एजेंडे को ही अस्वीकार कर दिया हो, उनकी सोच के दायरे से परे लगती है।
विचारधारा का बंद कमरा
आधुनिक वाम-उदारवादी प्रतिष्ठान ने अपने विचारों को फैलाने और मजबूत करने के लिए बेहद प्रभावशाली संस्थाएँ खड़ी कर ली हैं — प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, बड़े समाचार संस्थान, गैर-सरकारी संगठनों का व्यापक नेटवर्क, मनोरंजन उद्योग और प्रशासनिक तंत्र के कई प्रभावशाली हिस्से। लेकिन जिस चीज़ की कमी सबसे अधिक दिखाई देती है, वह है आत्म-सुधार की व्यवस्था।
1950 में अमेरिकी साहित्यिक आलोचक लायनेल ट्रिलिंग ने लिखा था कि जब कोई विचारधारा लंबे समय तक प्रभुत्व में रहती है, तो वह धीरे-धीरे अपनी जिज्ञासा खोने लगती है। परिणामस्वरूप वह अधिक चिड़चिड़ी, आलोचना के प्रति असहिष्णु और अपनी गलतियों को स्वीकार करने में अनिच्छुक हो जाती है।
आज यह टिप्पणी पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक लगती है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि वाम-उदारवादी सोच वास्तविक असहमति और वास्तविक घृणा के बीच फर्क करने की क्षमता खो चुकी है। असहमति को सामान्य बहस का हिस्सा मानने के बजाय उसे नैतिक विफलता या सामाजिक अपराध की तरह देखा जाने लगा है। [18]
इसी प्रवृत्ति को समझाने के लिए एक दिलचस्प शब्द इस्तेमाल किया जाता है — “recreational outrage”, यानी हर बात पर आक्रोश जताने की आदत। ऐसी मानसिकता, जहाँ हर असहमति को खतरा और हर मतभेद को हमला समझ लिया जाए, अंततः खुले समाज की बुनियाद को कमजोर करती है। [19]
एक ऐसी विचारधारा जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं
हाल के वर्षों के चुनावी परिणाम केवल नस्लवादियों या कट्टर प्रतिक्रियावादियों का फैसला नहीं थे। यह उन लाखों सामान्य मतदाताओं का भी फैसला था, जिन्होंने वाम-उदारवादी प्रतिष्ठान को देखकर यह महसूस किया कि वह अब उनके वास्तविक जीवन की चिंताओं से कट चुका है।
भारत में पाँच दशकों में पहली बार ऐसा समय आया है जब किसी भी राज्य में वामपंथी दल सत्ता में नहीं रहे। यहाँ तक कि केरल जैसे लंबे समय से वामपंथी गढ़ माने जाने वाले राज्य में भी उसका प्रभाव कमजोर पड़ा। [20]
ब्रिटेन में 2019 के आम चुनाव में पारंपरिक रूप से लेबर पार्टी को समर्थन देने वाले श्रमिक वर्ग के क्षेत्रों — जिन्हें “रेड वॉल” कहा जाता था — ने बड़ी संख्या में अपना रुख बदल लिया, जिससे बोरिस जॉनसन को भारी जीत मिली। वाम-उदारवादी टिप्पणीकारों ने इसके कई कारण बताए: मतदाताओं को गुमराह किया गया, अंग्रेज़ी राष्ट्रवाद बढ़ गया, मीडिया पक्षपाती था। लेकिन किसी ने यह सम्भावना नहीं जताई कि शायद दशकों से चली आ रही अभिजात्य दूरी और उपेक्षा ने लोगों का धैर्य खत्म कर दिया हो। [21]
फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, इटली, स्वीडन और पूर्वी यूरोप के कई हिस्सों में वे राजनीतिक दल, जिन्हें दो दशक पहले हाशिए का माना जाता था, आज सरकार में हैं या उसके बेहद करीब पहुँच चुके हैं। भारत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने लगातार तीन आम चुनाव जीते। [22] अमेरिका में 2024 में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी को भी उसी अविश्वास के साथ देखा गया, जैसा 2016 में उनकी पहली जीत पर देखा गया था — मानो मतदाताओं का संदेश वामपंथियों के भेजे में अब भी घुस नहीं पा रहा हो।
ये सब मतदाता किसी एक विचारधारा के शिकार नहीं हैं। न वे सब राष्ट्रवादी हैं और न ही सभी दक्षिणपंथी या किसी प्रचार के शिकार। उनमें से बहुत से लोग अपने विचारों में संतुलित और मध्यमार्गी हैं। लेकिन उनमें एक समान भावना ज़रूर दिखाई देती है: यह विश्वास कि वाम-उदारवादी प्रतिष्ठान के कान बंद हो चुके हैं और वह अपनी ही बनाई वैचारिक दुनिया में सिमटता जा रहा है।
आखिर रास्ता कहाँ भटके?
इतिहास में वामपंथ ने कई बार वास्तविक बौद्धिक गंभीरता और नैतिक साहस का परिचय दिया है। श्रमिक आंदोलनों ने कल्याणकारी राज्य की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई, नागरिक अधिकार आंदोलनों ने नस्लीय भेदभाव वाले कानूनों को चुनौती दी, और नारीवादी आंदोलनों ने लोकतांत्रिक भागीदारी का दायरा बढ़ाया। ये ऐसे लोग थे जिन्होंने केवल नारे नहीं लगाए, बल्कि अपने विचारों के समर्थन में तर्क भी दिए। वे इसलिए प्रभावी साबित हुए क्योंकि वे केवल अपने विचारों को सही मानने तक सीमित नहीं थे, बल्कि लोगों को समझाने का धैर्य भी रखते थे।
आज भी वामपंथ में ऐसे लेखक, विचारक और कार्यकर्ता मौजूद हैं जो गंभीर बहस, आत्म-आलोचना और व्यावहारिक राजनीति में विश्वास रखते हैं। लेकिन वे धीरे-धीरे उसी व्यापक आंदोलन के भीतर हाशिए पर जाते दिखते हैं, जहाँ तर्क की जगह प्रदर्शन, विचारों की जगह पहचान की राजनीति और असहज आत्ममंथन की जगह भावनात्मक एकजुटता को अधिक महत्व मिलने लगा है। [23]
एक और चिंताजनक बदलाव यह है कि कुछ प्रगतिशील समूहों में राजनीतिक हिंसा को लेकर खतरनाक नरमी दिखाई देने लगी है। कई बार वैचारिक निकटता के कारण उस पर आँखें मूँद ली जाती हैं, उसे कमतर आँका जाता है, या परिस्थितियों के नाम पर उचित ठहराने की कोशिश की जाती है। Network Contagion Research Institute की एक रिपोर्ट के अनुसार, सार्वजनिक हस्तियों की हत्या का समर्थन करने वाली ऑनलाइन मानसिकता अब केवल हाशिए के समूहों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मुख्यधारा की ऑनलाइन चर्चा का हिस्सा बनने लगी है। रिपोर्ट में डोनाल्ड ट्रंप और एलन मस्क जैसे सार्वजनिक व्यक्तियों की हत्या को “कुछ परिस्थितियों में उचित” मानने वाले लोगों का उल्लेख किया गया है। इसी तरह, विरोध के नाम पर संपत्ति को नुकसान पहुँचाने को भी कई लोगों ने स्वीकार्य बताया। [24]
इसी संदर्भ में Cole Tomas Allen का मामला सामने आता है, जिस पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हत्या के प्रयास का आरोप लगा। अमेरिकी कॉमेडियन बिल माहेर ने इस तरह की हिंसक मानसिकता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कई बार यह केवल राजनीतिक गुस्सा नहीं होता, बल्कि व्यक्तिगत असफलताओं और निराशा का भी विस्फोट होता है। उनके अनुसार, अत्यधिक राजनीतिक आसक्ति कई बार व्यक्ति की अपनी असंतुष्टि का रूप ले लेती है। [25]
लेखक लियल लाइबोविट्ज़ आधुनिक उदारवाद की स्थिति को एक तीखी टिप्पणी में इस तरह वर्णित करते हैं: “उदारवाद को आखिरकार वही मिल गया जिसकी उसे हमेशा चाह थी — ऐसे लोग जो जड़ों से कटे हुए, अकेले, भयभीत और लगातार यह महसूस करते हों कि कहीं कोई उनके खिलाफ साज़िश कर रहा है।” [26]
यह टिप्पणी कठोर लग सकती है, लेकिन पूरी तरह निराधार नहीं। जब राजनीति लगातार नए खतरों, नए पीड़ितों और नए दुश्मनों की पहचान पर टिकी हो, तब वह स्थिर शासन की जगह अस्थिरता और अराजकता की ओर भी बढ़ सकती है।
क्या वापसी अब भी संभव है?
यदि वाम-उदारवाद अपनी घटती विश्वसनीयता वापस पाना चाहता है, तो उसे उन लोगों को सुनना होगा जो उससे असहमत हैं — यहाँ तक कि उन समुदायों के लोगों को भी, जिनका प्रतिनिधित्व करने का वह दावा करता है।
उसे अपने समर्थित आंदोलनों पर भी वही आलोचनात्मक कसौटी लागू करनी होगी, जो वह अपने विरोधियों पर लागू करता है। उसे यह स्वीकार करना होगा कि गलत होना कोई नैतिक अपराध नहीं है, और नए प्रमाणों के आधार पर अपना मत बदलना कमजोरी नहीं, बल्कि बौद्धिक परिपक्वता का संकेत है।
सबसे बढ़कर, उसे उस गुण को फिर से हासिल करना होगा जो कभी उसकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता था — बौद्धिक ईमानदारी।
अरुंधति रॉय आज भी इंटरव्यू दे रही हैं। प्रगतिशील प्रतिष्ठान का एक बड़ा हिस्सा अब भी ऐसे विचारों को विरोधाभास नहीं, बल्कि बौद्धिक गहराई की तरह देखता है। और कहीं न कहीं वे माओवादी और जिहादी ताकतें, जिनके प्रति सहानुभूति दिखाई जाती है, एक दिन अपने दुश्मनों के साथ-साथ अपने समर्थकों के खिलाफ भी मुड़ सकती हैं।
सन्दर्भ सूची
[1] PJ O’Rourke, “At the Core of Liberalism Is the Spoiled Child,” Goodreads Quotes, accessed via quote archive, https://www.goodreads.com/quotes/187883-at-the-core-of-liberalism-is-the-spoiled-child
[2] Bill Weinberg, “Arundhati Roy: Please Hang Me,” CounterVortex, https://countervortex.org/blog/arundhati-roy-please-hang-me/
[3] “Celebrity Indian Chef Atul Kochhar Loses Job at JW Marriott Dubai after His Derogatory Tweet on Islam Draws Flak on Twitter,” WION, https://www.wionews.com/india-news/celebrity-indian-chef-atul-kochhar-loses-job-at-jw-marriot-dubai-after-his-derogatory-tweet-on-islam-draws-flak-on-twitter-144152
[4] David Marchese, “Bill Maher Thinks Everyone Else Is Wrong,” New York Times Magazine, September 30, 2019, https://www.nytimes.com/interactive/2019/09/30/magazine/bill-maher-interview.html
[5] James Fieser and Bradley Dowden, “Critical Theory (Frankfurt School),” Internet Encyclopedia of Philosophy, https://iep.utm.edu/critical-theory-frankfurt-school/#H2
[6] “Speak Truth to Power: Human Rights Defenders Who Are Changing Our World,” Robert F. Kennedy Human Rights, https://kennedyhumanrights.org/our-impact/education/educators/speak-truth-to-power-human-rights-defenders-who-are-changing-our-world/
[7] Ali Omar Forozish, “The Great Betrayal: Why the Western Left Ignores Iranian Victims,” Fair Observer, https://www.fairobserver.com/politics/the-great-betrayal-why-the-western-left-ignores-iranian-victims/
[8] Andrew Sullivan, “The War, the Left and Revisionism,” The Atlantic, March 2006, https://www.theatlantic.com/daily-dish/archive/2006/03/the-war-the-left-and-revisionism/235851/
[9] “Kashmir: Hindus Still Waiting for Justice Decades after Exodus,” BBC News, https://www.bbc.com/news/articles/c3ggyz13m2po
[10] “Baloch Liberation Army Chief Slams Arundhati Roy for Praising Pakistani Army, Lists Its Human Rights Violations,” Swarajya, https://swarajyamag.com/insta/baloch-liberation-army-chief-slams-arundhati-roy-for-praising-pakistani-army-lists-its-human-right-violations
[11] Shane Parrish, “Hanlon’s Razor,” Farnam Street, https://fs.blog/mental-model-hanlons-razor/
[12] Eugene Kontorovich, “The Moral Mob and the Human Rights Industrial Complex,” Newsweek, https://www.newsweek.com/the-moral-mob-and-the-human-rights-industrial-complex-opinion-11882578
[13] Omar Dakhane, “The Dangerous Alliance of Faux Liberals and Islamists,” The Jerusalem Post Blogs, http://blogs.jpost.com/content/dangerous-alliance-faux-liberals-and-islamists
[14] Ali Omar Forozish, “The Great Betrayal: Why the Western Left Ignores Iranian Victims,” Fair Observer, https://www.fairobserver.com/politics/the-great-betrayal-why-the-western-left-ignores-iranian-victims/
[15] Vikram Sampath, “In Search of Fascism,” Swarajya, https://swarajyamag.com/books/in-search-of-fascism
[16] “Here Are the 5 Mind-Numbingly Stupid Things That Left-Liberals Say,” OpIndia, March 2019, https://www.opindia.com/2019/03/here-are-the-5-mind-numbingly-stupid-things-that-left-liberals-say/#google_vignette
[17] “As BJP Heads Towards a Historic Win in West Bengal, Liberals Suffer a Massive Meltdown, Ignore 15 Years of Anti-Incumbency and Declare BJP Victory Unfair,” OpIndia, May 2026, https://www.opindia.com/2026/05/as-bjp-heads-towards-a-historic-win-in-west-bengal-liberals-suffer-a-massive-meltdown-ignore-15-years-of-anti-incumbency-and-declare-bjp-victory-unfair/
[18] The Liberal Imagination, The New York Review of Books, https://www.nyrb.com/products/the-liberal-imagination
[19] “Recreational Outrage,” Urban Dictionary, https://www.urbandictionary.com/define.php?term=Recreational+Outrage
[20] “Left May Be Left with No Government after Kerala Elections,” NDTV, https://www.ndtv.com/india-news/kerala-assembly-elections-bengal-elections-kerala-elections-cpm-cpi-pinarayi-vijayan-left-front-communist-parties-left-may-be-left-with-no-government-11445519
[21] Anand Menon, “How the Conservatives Won the Red Wall,” UK in a Changing Europe, https://ukandeu.ac.uk/how-the-conservatives-won-the-red-wall/
[22] Sanjaya Baru, “Why Modi’s Third Victory Is Unique Not Only in India but Also Globally,” NDTV, https://www.ndtv.com/opinion/why-modis-third-victory-is-unique-not-only-in-india-but-also-globally-5847443
[23] Bruce Maxwell and Amélie Charbonneau, “The Problem with Cancel Culture,” Educational Philosophy and Theory (2021), https://www.tandfonline.com/doi/full/10.1080/00131857.2021.2017886
[24] “Assassination Culture Brief,” Network Contagion Research Institute, https://networkcontagion.us/reports/4-7-25-ncri-assassination-culture-brief/
[25] “Bill Maher Condemns Far-Left ‘Assassination Culture’ after String of High-Profile Attacks: ‘You’re Not a Hero,’” New York Post, May 12, 2026, https://nypost.com/2026/05/12/media/bill-maher-condemns-far-left-assassination-culture-after-string-of-high-profile-attacks-youre-not-a-hero/
[26] Liel Leibovitz, “Liberalism Is Stupid,” Tablet Magazine, https://www.tabletmag.com/sections/news/articles/liberalism-stupid-liel-leibovitz
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