शाकाहारी हिन्दू कहाँ सर छुपाएँ? शाकाहार को ‘कट्टर’ बताकर हिन्दू धर्म को  कलंकित करने का नया हथकंडा

हिंदू शाकाहार को ‘कट्टर’ कहकर बदनाम करने का एजेंडा अब त्योहारों, आस्थाओं और खान-पान की परंपराओं तक फैल गया है, जिससे सांस्कृतिक पहचान को कलंकित करने और हिंदू समाज पर वैचारिक हमले करने का एक नया तरीका तैयार हो चुका है।
  • शाकाहार पर लगातार निशाना साधे जाना – विशेषकर हिंदू त्योहारों के दौरान, हिंदू समाज को बदनाम करने का एक आसान तरीका बन गया है।
  • वोक सोच से प्रभावित पॉपुलर कल्चर, हिंदुओं की ख़ान-पान परंपराओं का लगातार मजाक उड़ाता है और उनका अपमान करता है, खासकर पवित्र त्योहारों पर।
  • वाम उदारवादी तंत्र कांवड़ यात्रा करने वालों (कांवड़ियों) पर लगातार निशाना साधता है। उनकी शाकाहारी भोजन परंपराओं का यह न सिर्फ़ मज़ाक़ उड़ाता है, बल्कि कांवड़ियों की भोजन से जुड़ी पसंद का बेहद विकृत और नकारात्मक चित्रण करता है।
  • लेफ़्ट-लिबरल सोच का दोगुलापन साफ दिखता हैवे अल्पसंख्यक धर्मों की खान-पान मान्यताओं का तो आदर करते हैं, लेकिन हिंदुओं की परंपराओं का मज़ाक उड़ाते हैं।
  • हिंदू शाकाहार पर बढ़ते वैचारिक हमलों को, ग्लोबल हिंदूफ़ोबिया को हवा देने वाले वृहत वोक विमर्श के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

 जब इन्फोसिस फ़ाउंडेशन की चेयरपर्सन सुधा मूर्ति ने जुलाई 2023 में एक मीडिया इंटरव्यू के दौरान यूँ ही सहजता से कह दिया कि विदेश यात्रा करते समय वे अपना खाना और खाना पकाने का सामान साथ ले जाना पसंद करती हैं, तो शायद उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी नहीं होगा कि उनके इस कथन को लेकर कितना बवाल मच जाएगा। अपने ख़ान पान को लेकर सुधा मूर्ति की निजी पसंद का बेहद साधारण सा मुद्दा, रातोंरात सनसनीख़ेज़ बन गया। ख़ान पान से जुड़ी अपनी निजी पसंद को लेकर उन्होंने जो टिप्पणी की, वह उनकी शाकाहारी जीवन-शैली से जुड़ी थी। लेकिन इस साधारण सी टिप्पणी ने तथाकथित प्रगतिशील हलकों में रातोंरात इस कदर हलचल मचा दी, कि एक पूरा तंत्र सुधा मूर्ति के कथन को नकारात्मक और दक़ियानूसी साबित करने पर तुल गया। तथाकथित ‘वोक’ एक्टिविस्ट्स ने उन पर “पैसिव-एग्रेसिव जातिवादी” होने, “ब्राह्मणवादी वर्चस्व” को बढ़ावा देने, और दूसरों की खान-पान की संस्कृति का अनादर करने के आरोप बढ़ चढ़कर लगाए।[1] [2]

सुधा मूर्ति के आलोचक उनके “शुद्ध शाकाहारी” होने की वजह से तो नाराज़ थे ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा खीझ उन्हें इस बात की थी कि वे अपनी हिंदू पहचान को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थीं। यूँ तो किसी व्यक्ति का “शुद्ध शाकाहारी” होना ही वाम उदारवादी गिरोह के लिये ख़ासा आपत्तिजनक है, लेकिन जब कोई हिंदू शुद्ध शाकाहारी अपने खान-पान की पसंद खुलकर बताए, तो यह उनकी आँखों में और भी ज़्यादा खटकता है, बल्कि एक अक्षम्य अपराध बन जाता है। इसलिए सुधा मूर्ति पर हुआ यह वैचारिक हमला सिर्फ उनके खान-पान  की आदतों के विरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि इस विमर्श का असली टारगेट उनकी हिंदू  पहचान थी।

शाकाहार विरोधी विमर्श अक्सर हिंदू विरोधी विमर्श फैलाने का ही एक बहाना होता है, जिसकी आड़ मे हिंदुओं पर निशाना साधा जाता है। जब ‘वोक’ विचारधारा के प्रभाव में यही शाकाहार “वीगनिज़्म” के नाम से जाना जाता है, तो उसे एक ऐसी सकारात्मक जीवन शैली के रूप में दर्शाया जाता है, जिससे सेहत, पर्यावरण और नैतिक जीवन को बढ़ावा मिलता है।  लेकिन जब यही शाकाहार हिंदू समाज की धार्मिक मान्यताओं, आध्यात्मिक मूल्यों, सांस्कृतिक परंपराओं और जीवन-पद्धति से जुड़ा हो, तो उसका मज़ाक उड़ाया जाता है, उसे बदनाम किया जाता है, और उसकी लगातार आलोचना की जाती है।

पिछले दस साल में भारत में तेज़ हुए सांस्कृतिक पुनर्जागरण के कारण हिंदू अपनी परंपराओं और मान्यताओं को लेकर पहले से अधिक खुलकर बोलने लगे हैं। इसी वजह से वामपंथी और उदारवादी समूहों ने हिंदू धर्म और संस्कृति पर अपने हमले भी बढ़ा दिए हैं।

यह लेख इसी बात को लेकर चर्चा करता है कि “हिंदू शाकाहारी” के संदर्भ में किस प्रकार से एक दोहरी प्रक्रिया चल रही है, जिस के चलते ख़ान-पान को हिंदू-विरोध और “हिंदुत्व” पर हमले का वैचारिक हथियार बना दिया गया है। साथ ही, “हिंदुत्व का विरोध” करने के नाम पर हिंदू सांस्कृतिक परंपराओं और रिवाजों को अमानवीय रूप से पेश कर उनका दानवीकरण किया जाता है।

हिंदू शाकाहारी परंपराओं पर हमला

वाम-उदारवादी हलकों के लिए हिंदू धर्म एक आसान बहाना बन गया है। उसकी कथित कमियों के विरोध के नाम पर वे अपना वैचारिक एजेंडा आगे बढ़ाते हैं। उनका तरीका है कि “हिंदुत्व फासीवाद” और “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसे नारे उछालकर हिंदुओं के असली मुद्दों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को कमजोर किया जाए। जैसा कि पहले भी चर्चा हुई है[3], प्रगतिशील आलोचना के नाम पर हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं को अकसर तोड़-मरोड़कर नकारात्मक रूप में पेश किया जाता है। इस वजह से आम हिंदू एक आसान निशाना बन गए हैं और बड़े वैचारिक संघर्ष का बोझ उठाने को मजबूर हैं।

शाकाहार पर हमला करना भी हिंदू समाज को चोट पहुँचाने का एक आसान ज़रिया बन चुका है, खासकर त्योहारों के समय। इसका नतीजा यह निकलता है कि हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखकर जब भी कोई सरकारी आदेश जारी किया जाता है, तो उसे अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ की जाने वाली साजिश के रूप में पेश किया जाता है।

अप्रैल 2022 में, साउथ दिल्ली म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (SDMC) ने नवरात्रि के दौरान मंदिरों के पास स्थित सभी मांस की दुकानों को अस्थायी रूप से बंद करने का आदेश दिया। उत्तर भारत के कई हिस्सों में नवरात्रि पर इस तरह के अल्पकालिक प्रतिबंध आम हैं, ताकि हिंदू श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान किया जा सके, क्योंकि नवरात्रि के समय कई भक्त सख्त शाकाहार का पालन करते हैं। लेकिन भारत का वाम-उदारवादी तंत्र ऐसे प्रशासनिक फ़ैसलों को अक्सर अल्पसंख्यकों के अधिकारों के ख़िलाफ़ होने वाली साज़िश की तरह पेश करता है, और आग में घी डालने में कोई कसर नहीं छोड़ता।[4]

नवरात्रि में मांस की सेल को लेकर लगे अस्थायी प्रतिबंध के जवाब में, द वायर के संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन ने एक राष्ट्रीय अख़बार के लिए एक लेख लिखा, जिसमे उन्होंने श्रद्धालुओं की खान-पान से जुड़ी आदतों पर तीखी टिप्पणी की: नवरात्रि के दौरान गाज़ियाबाद या कहीं और मांस की दुकानें भला क्यों बंद हों? जो लोग व्रत रखते हैं या शाकाहारी हैं, वे अपनी तरह से जी सकते हैं, लेकिन उनकी खान-पान की आदतें सभी भारतीयों पर क्यों थोपी जाएँ और मांस विक्रेताओं के कारोबार को नुकसान क्यों पहुँचाया जाए?[5]

द प्रिंट के संस्थापक शेखर गुप्ता ने X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि भारत में ऐसा कोई शहर या इलाका खोजना नामुमकिन है जहाँ 99% लोग शाकाहारी हों। उन्होंने कहा, “मान लो अगर होते भी, तो यह एक आज़ाद देश है और कोई बहुसंख्यक अपने खाने-पीने की पसंद दूसरों पर नहीं थोप सकता। और अगर सच में वे थोप सकते, तो शाकाहारियों को सावधान रहना चाहिए, क्योंकि भारत में एक बहुत बड़े बहुमत में मांसाहारी लोग हैं।

स्वयंभू पत्रकार आदित्य मेनन ने X पर हिंदू समाज की खान-पान सबंधी परंपराओं का मज़ाक उड़ाते हुए लिखा, “मैं मांस नहीं खरीद सकता क्योंकि आप प्याज़-लहसुन नहीं खाते? यह तो एक बेहद अजीब धर्म है।[6]

ऐसे असंख्य उदाहरण हैं, जहाँ स्थानीय प्रशासन के फ़ैसले—जैसे नवरात्रि और कांवड़ यात्रा के दौरान मांस की दुकानों का अस्थायी रूप से बंद होना—को मीडिया के कुछ वर्ग और तथाकथित “बौद्धिक समुदाय” दबंगई, अल्पसंख्यक विरोधी रवैया, और “हिंदुत्व वर्चस्व” के प्रतीक के रूप में पेश करते हैं। पश्चिमी मीडिया भी इसी विचार को और आगे बढ़ाता है। अप्रैल 2022 में बीबीसी द्वारा प्रकाशित एक लेख की एक हेडलाइन थी—“मीट बैन: इंडिया इज़ंट वेजिटेरियन बट हू विल टेल द राइट-विंग?[7] लेख में परोक्ष रूप से यह सुझाया गया था कि नवरात्रि के दौरान दिल्ली सरकार का मांस की दुकानों को अस्थायी रूप से बंद करने का फ़ैसला किसी दक्षिणपंथी साजिश का हिस्सा था। 2017 में प्रकाशित एक और लेख—इंडिया मीट क्रैकडाउन लीव्स बुचर्स कंसर्नेड — में बीबीसी ने उत्तर प्रदेश सरकार के गोमांस प्रतिबंध पर सवाल उठाते हुए हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का मज़ाक उड़ाने जैसा रुख अपनाया। हिंदू धार्मिक संवेदनाओं को नज़रअंदाज़ करते हुए बीबीसी ने कसाइयों की शिकायतों पर कहीं ज़्यादा सहानुभूति दिखाई।[8]

फिर आती है ‘वोक’ सोच से प्रभावित पॉप कल्चर की दुनिया, जो त्योहारों के समय हिंदुओं के खान-पान की पसंद का मज़ाक उड़ाने, और उनकी ख़ान-पान संबंधी परंपराओं का तिरस्कार करने का कोई मौका नहीं छोड़ती। आज के समय में ऐसी वेबसाइट्स भी मौजूद हैं, जो दिवाली जैसे त्योहारों पर सेलिब्रेशन के लिये “नॉन-वेज़” विकल्प सुझाने से भी नहीं चूकतीं[9] नवरात्रि जैसे अवसरों पर सोशल मीडिया पर हिंदू शाकाहारियों की ट्रोलिंग और शाकाहारी ख़ान पान को लेकर उनका मज़ाक उड़ाया जाना अब इतनी ज़्यादा आम बात हो चुकी है, कि कोई इस पर आपत्ति तक नहीं जताता।[10]

कुल मिलाकर, हिंदू त्योहारों के दौरान शाकाहार पर किए जाने वाले वैचारिक हमले अब एक राजनीतिक हथियार बन चुके हैं। “हिंदुत्व वर्चस्व” या “हिंदू बहुसंख्यकवाद” के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के नाम पर सीधे हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं पर ही निशाना साधा जाता है। यह एक दुष्चक्र पैदा करता है—शाकाहार को बदनाम करना “हिंदुत्व” पर हमला करने का बहाना बन जाता है, और “हिंदुत्व” का हवाला देकर हिंदू समाज की सांस्कृतिक परंपराओं, रिवाजों और जीवनशैली को नीचा दिखाना आसान हो जाता है।

कांवड़ियों की परंपराओं पर मीडिया का हमला

हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन के महीने (जुलाई के मध्य से अगस्त के मध्य) में हर साल कांवड़ यात्रा आयोजित होती है। इस दौरान भगवान शिव के भक्त अपने कंधों पर “कांवड़” उठाकर, नंगे पांव हरिद्वार, गौमुख या गंगोत्री से गंगाजल लाते हैं। यह गंगाजल बाद में शिवलिंग पर अर्पित किया जाता है।[11]

चूँकि कांवड़िए कई दिनों तक पैदल चलते हैं, वे रास्ते में खाने-पीने और आराम के लिए कई जगहों पर रुकते हैं। यात्रा के दौरान वे सख़्त शाकाहार का पालन करते हैं, इसलिए वे अक्सर ऐसे भोजनालय चुनते हैं जहाँ मांसाहारी भोजन न बनता हो, ताकि उनके धार्मिक अनुशासन और खान-पान की परंपरा का सम्मान बना रहे।

पिछले कुछ वर्षों में, कई राज्य सरकारों ने कांवड़ियों की धार्मिक आस्था के सम्मान हेतु इस यात्रा के मार्ग पर कुछ प्रशासनिक कदम उठाए हैं—जैसे कांवड़ मार्ग के किनारे मांस की बिक्री पर अस्थायी रोक, और इन इलाकों में भोजनालयों व रेस्टोरेंट्स के मालिकों का पहचान- संबंधी विवरण (नाम,पता) सार्वजनिक करना। इन उपायों का उद्देश्य कांवड़ियों की धार्मिक भावनाओं और खान-पान की पसंद का सम्मान करना है। लेकिन वाम-उदारवादी तंत्र ने अपने पुराने हथकंडे अपनाते हुए इन प्रशासनिक फ़ैसलों को भी तोड़ मरोड़ कर पेश करने की कोशिश की, जिससे सामने वाले को यह लगे कि इस तरह के फ़ैसले अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के लोगों के ख़िलाफ़ भेदभाव करने की एक साज़िश हैं। वाम – उदारवादी तंत्र कांवड़ियों की खाने से जुड़ी पसंद के एक सामान्य मसले को भी एक ऐसे विकृत रूप में पेश करता है, मानो श्रद्धालु मात्र अपनी धार्मिक आस्थाओं पर अडिग रहने के कारण अपराधी हों।

जुलाई 2024 में, सुप्रीम कोर्ट ने कुछ राज्य सरकारों के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित होटलों और ढाबों को मालिकों और कर्मचारियों के नाम, पते और मोबाइल नंबर सार्वजनिक करने को कहा गया था। यह रोक तथाकथित ‘वोक’ एक्टिविज़्म से प्रेरित याचिकाओं के बाद लगाई गई। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इन होटलों और ढाबों को अपने यहाँ परोसे जाने वाले भोजन से जुड़ी जानकारी अब भी सार्वजनिक रूप से साझा करनी पड़ सकती है, ताकि कांवड़ियों के पास इतनी जानकारी उपलब्ध हो जिससे वे यात्रा के दौरान अपने खान-पान के चुनाव को लेकर इच्छानुसार निर्णय ले सकें।[12]

2025 में, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की राज्य सरकारों ने एक आदेश जारी किया, जिसके तहत कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित रेस्टॉरेंट्स और होटलों के लिए QR कोड लगाना और स्कैन की सुविधा देना अनिवार्य कर दिया गया, ताकि यात्री इन प्रतिष्ठानों का लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन विवरण आसानी से देख सकें। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन शीर्ष अदालत ने इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि ग्राहकों को यह जानने का अधिकार है कि कोई भोजनालय केवल शाकाहारी खाना परोसता है, या फिर शाकाहारी और मांसाहारी दोनों। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उपभोक्ता की पसंद सर्वोपरि है, और लोगों को यह जानने का अधिकार है कि क्या पहले कभी उस प्रतिष्ठान में मांसाहारी भोजन पकाया गया है। [13] [14]

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि मीडिया का एक खास वर्ग कांवड़ यात्रा के दौरान मानो एक अभियान छेड़ देता है, जिसके तहत आम हिंदू श्रद्धालुओं को बदनाम किया जा सके। इन भक्तों पर अक्सर “हिंदुत्व वर्चस्व” फैलाने, “हिंदू बहुसंख्यकवाद” को बढ़ावा देने, और अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों का उल्लंघन करने जैसे आरोप लगाए जाते हैं—सिर्फ इसलिए कि वे अपने धार्मिक विश्वास और आस्था के अनुसार शाकाहारी भोजन का सेवन करना चाहते हैं।

कुछ मीडिया संस्थानों में यह चलन आम हो चुका है कि कांवड़ियों को गुंडे-लफंगे दिखाने के लिए इक्का-दुक्का घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाए, ताकि हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों को बदनाम किया जा सके। जुलाई 2025 में, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कांवड़ियों को चेतावनी दी कि यात्रा के दौरान अनुशासनहीनता करने वाले असल में “अराजक तत्व” होते हैं, जो श्रद्धालुओं के बीच घुसकर उनकी छवि खराब करते हैं।[15]

कांवड़ियों को बदनाम करने और हिंदू सांस्कृतिक परंपराओं के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह भड़काने के लिए फर्जी खबरें फैलाने का चलन भी अब आम होता जा रहा है। जुलाई 2017 की ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट ने उस साल की कांवड़ यात्रा से जुड़ी कई भ्रामक खबरों का पर्दाफाश किया। रिपोर्ट के अनुसार, कई मीडिया संस्थानों ने यह दावा किया कि यात्रा के दौरान एक उत्तर भारतीय शहर में मांसाहारी भोजन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। इस खबर से सोशल मीडिया पर गुस्सा भड़क उठा, और कई लोगों ने इसे एक अनुचित कदम बताया। लेकिन जल्द ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपने आधिकारिक X अकाउंट से स्पष्ट किया कि कोई संपूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया था। दरअसल, यह लंबे समय से चली आ रही परंपरा है कि कांवड़ यात्रा के दौरान सड़क किनारे मांसाहारी भोजन बेचने वाले ठेले—खासतौर पर वे जो मंदिरों या मुख्य यात्रा मार्ग के पास हों—श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं के सम्मान में, अस्थायी तौर पर थोड़ी दूरी पर स्थानांतरित कर दिए जाते हैं।[16]

रमज़ान पवित्र है परन्तु नवरात्रि ‘अंधविश्वास’ है

पश्चिमी मीडिया मुस्लिम समुदाय की धार्मिक खान-पान परंपराओं—जैसे इस्लाम में सूअर के मांस के सेवन की मनाही—को लेकर अपनी कथित संवेदनशीलता दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ता।[17] लेकिन जब हिंदू आस्था के सम्मान हेतु भारत में गाय के वध पर प्रतिबंध लगाने जैसी पहल की जाती है, तो यही मीडिया “दक्षिणपंथी राजनीति” का राग अलाप उसे तुरंत खारिज कर देता है।[18]

रमज़ान के रोज़ों की बात हो, तो पश्चिमी मीडिया उन्हें सांस्कृतिक समझ और संवेदनशीलता के साथ पेश करता है। इसके विपरीत, नवरात्रि के नौ पवित्र दिनों के व्रत को अक्सर हल्के-फुल्के अंदाज़ में चित्रित किया जाता है, या फिर इसे गैर-ज़रूरी आत्मसंयम, या एक दक़ियानूसी परंपरा के रूप में पेश किया जाता है।[19]

यह दोहरापन हलाल सर्टिफिकेशन और सात्विक सर्टिफिकेशन के प्रति पश्चिमी मीडिया के रवैये में भी साफ़ झलकता है। ‘वोक’ विचारधारा से प्रभावित तंत्र हलाल सर्टिफिकेशन को खुलेआम सराहता है और इसे वैध ठहराता है, जबकि यह सर्टिफ़िकेशन कई बार आर्थिक नियंत्रण स्थापित करने, और इस्लामिक वर्चस्व को बढ़ावा देने के एक परोक्ष साधन के रूप में काम करता है। लेकिन जैसे ही “सात्विक सर्टिफिकेशन” की बात आती है—जो हिंदू खान-पान सिद्धांतों और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित है—उसे तुरंत मज़ाक और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। और फिर उन्हीं घिसे पिटे आरोपों की झड़ी लग जाती है—“हिंदुत्व वर्चस्व”, “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता”, वग़ैरह वग़ैरह। इन खोखले आरोपों से वोक तंत्र का वैचारिक दोगुलापन और मानसिक दिवालियापन साफ़ ज़ाहिर होता है।[20] [21]

जातिवाद” के चश्मे से शाकाहार को बदनाम करने की मुहिम

‘वोकिज़्म’ और हिंदू-विरोध का ज़हरीला मेल, शाकाहार को बदनाम करने के उद्देश्य से गढ़े  गये वैश्विक नैरेटिव को लगातार हवा दे रहा है, खासकर तब जब शाकाहार हिंदू धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं, जीवनशैली और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से जुड़ा हो।

केवल “Vegetarianism and caste” गूगल करने पर आपको ऐसे ढेरों लेख मिल जाएँगे जो यह जताने की कोशिश करते हैं कि शाकाहार का ताल्लुक ख़ान-पान, सेहत, या पर्यावरण से कम, और “जाति” से ज़्यादा है। यह शाकाहार-विरोधी अभियान अब एक पूरी इंडस्ट्री का रूप ले चुका है, जिसमें वाम-उदारवादी मीडिया व ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंसेज़ के कुछ अकादमिक हलके प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इनका मकसद है शाकाहार को “जातिगत उत्पीड़न” से ज़बरदस्ती जोड़ना—चाहे ऐसा करने का कोई तर्कसंगत आधार हो या न हो।

“हिंदू शाकाहारियों” पर बढ़ते वैचारिक हमले दरअसल वोकिज़्म की देन हैं, जिसके अंतर्गत  क्रिटिकल रेस थ्योरी जैसे पश्चिमी अकादमिक सिद्धांतों को भारतीय संदर्भ में “जाति” की परिकल्पना पर जबरन लागू किया जाता है, और फिर यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि दुनिया की सारी संरचनात्मक असमानताओं की जड़ हिंदू जाति-व्यवस्था ही है। “शाकाहार को जाति के चश्मे से देखने ” का यह नज़रिया[22] अंततः हिंदू समाज पर ही निशाना साधता है। “शुद्ध शाकाहारी” जैसे शब्द को तोड़ मरोड़कर पेश कर, उसे जातिवाद से जबरन जोड़ना वोक लॉबी का एक ख़ास हथकंडा है।

हिंदू शाकाहारियों को नकारात्मक रूप में दिखाने के लिए “Militant Vegetarianism” जैसे नए शब्द बनाए जा रहे हैं। गूगल पर खोजने पर कई लेख मिलेंगे जो भारतीय शाकाहारियों पर दूसरों को अलग-थलग करने के आरोप लगाते हैं। फ़्री प्रेस जर्नल के नवंबर 2022 के एक लेख में हिंदू शाकाहारियों पर खानपान में कट्टरता फैलाने का आरोप लगाया गया है और कुछ घटनाओं का हवाला देकर शाकाहार व हिंदू धर्म दोनों को बदनाम करने की कोशिश की गई है। इसमें यह भी आपत्ति जताई गई है कि शाकाहारी लोग मांसाहार को “तामसिक” मानते हैं और कुछ हिंदू धार्मिक आस्था से प्याज़, लहसुन और जड़ वाली सब्जियां तक नहीं खाते।[23]

इसी तरह फ्रंटलाइन पत्रिका में नवंबर 2015 में प्रकाशित एक लेख, “Diet and diktat[24] गौहत्या और “एक्सट्रीम वेजीटेरियनिज्म” को लेकर संघ परिवार के “चरमपंथी और ग़लत राजनीतिक रवैये” पर अफ़सोस जताता है। इस तीखे हिंदू-विरोधी लेख को यह भी खलता है कि भारत के प्रधानमंत्री को नवरात्रि के दौरान “सात्विक भोजन करते” हुए दिखाया जाए। “उन्हें एक गर्वित हिंदू नेता के रूप में पेश किया जाता है, जो धार्मिक अवसरों पर उपवास रखते हैं और फल व सादा सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं”, लेख यह कुछ इस अन्दाज़ में बताता है, मानो किसी बहुत बड़े अपराध का पर्दाफाश किया जा रहा हो ।

इसलिए, हिंदू त्योहारों के समय शाकाहार पर बढ़ते हमलों को वोकिज़्म द्वारा हिंदू-विरोधी नैरेटिव को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने के व्यापक संदर्भ में समझना ज़रूरी है।

समापन

हिंदू समाज में सांस्कृतिक और सभ्यतागत पुनर्जागरण की एक नयी लहर ने जिस तरह से ज़ोर पकड़ा है, उसे देख वामपंथी-उदारवादी तंत्र बुरी तरह से घबरा गया है। अपनी सकपकाहट और खीझ में, वह हिंदू सांस्कृतिक प्रथाओं, परंपराओं और जीवनशैली (जिनमें शाकाहार भी शामिल है), पर और भी तीव्र गति से हमले कर रहा है।

शाकाहार को लेकर फैलाए जा रहे भ्रामक प्रोपेगेंडा का मुकाबला करने के लिए, हिंदू समाज को चाहिए कि वह आध्यात्मिकता और विज्ञान के मेल पर आधारित अपने ख़ुद के सकारात्मक नैरेटिव्स तैयार करे, और फिर इन नैरेटिव्स को अलग-अलग मंचों के ज़रिए प्रभावी ढंग से आम जन मानस तक पहुँचाया जाए।

इसके साथ ही, समय की माँग यह भी है कि डिजिटल माध्यम का उपयोग कर एक ऐसे वृहत् सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन की नींव डाली जाये, जिसके माध्यम से समाज के जागरूक लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय रहकर शाकाहार-विरोधी नैरेटिव्स का प्रभावी जवाब दें।

सन्दर्भ सूची 

[1] Sudha Murty’s extreme vegetarianism has ruffled some feathers on the internet: Read – Times of India;    https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/food-news/sudha-murtys-extreme-vegetarianism-has-ruffled-some-feathers-on-the-internet-read/articleshow/102164553.cms

[2] Sudha Murty gets trolled for carrying food during foreign visits; Here’s why | Today News;  https://www.livemint.com/news/india/sudha-murty-gets-trolled-for-carrying-food-during-foreign-visits-heres-why-11690344795765.html

[3] Vilification of Hindu Dharma Through Misguided Gender Narratives – Hindu Dvesha;    https://stophindudvesha.org/vilification-of-hindu-dharma-through-misguided-gender-narratives/

[4] Navratri meat ban: How it has been used as a political tool to hurt religious sentiments of Hindus during festivals; https://www.opindia.com/2022/04/meat-consumption-ban-navratri-politication/

[5] Ibid.

[6] Ibid.

[7] Meat ban: India isn’t vegetarian, but who’ll tell the right-wing?”;  https://www.bbc.com/news/world-asia-india-61020025

[8] India meat crackdown leaves butchers concerned – BBC News;  https://www.bbc.com/news/world-asia-india-39364448

[9] Diwali 2024: Easy Chicken Recipes For Your Diwali Party;  https://www.slurrp.com/article/diwali-2022-easy-chicken-recipes-for-your-diwali-party-1666174791015

[10] Demonizing Vegetarianism – A Direct Attack on Hindu Identity – Hindu Dvesha;   https://stophindudvesha.org/demonizing-vegetarianism-a-direct-attack-on-hindu-identity/

[11] Events & Festivals in India | A Ministry of Tourism Initiative; https://utsav.gov.in/view-event/kanwar-yatra

[12] ‘No need to display owners’ names, show menu’, SC stays UP, Uttarakhand order to eateries on Kanwar Yatra route; https://www.newindianexpress.com/nation/2024/Jul/22/no-need-to-display-owners-names-show-menu-sc-stays-up-uttarakhand-order-to-eateries-on-kanwar-yatra-route

[13] Supreme Court upholds UP, Uttarakhand QR code mandate in restaurants, stating consumers must know if non-veg was served before; https://www.opindia.com/2025/07/customer-is-king-supreme-court-refuses-to-stay-up-and-uttarakhand-govts-orders-to-display-qr-codes-in-restaurants-during-kanwar-yatra/

[14] Kanwar Yatra: SC directs eateries to display only license & registration info; refuses to interfere in QR code row | India News – Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/india/kanwar-yatra-sc-directs-eateries-to-display-only-license-registration-info-refuses-to-interfere-in-qr-code-row/articleshow/122830238.cms

[15] Kanwar Yatra Row: Adityanath Blames Miscreants for Defaming Devotees;   https://www.deccanherald.com/india/uttar-pradesh/days-after-kanwariyas-assault-crpf-jawan-adityanath-says-people-trying-to-defame-kanwar-yatris-3639071

[16] Media spreads Fake News about eggs and non-veg being banned in Greater Noida for Kanwar Yatra;  https://www.opindia.com/2017/07/media-spreads-fake-news-about-eggs-and-non-veg-being-banned-in-greater-noida-for-kanwar-yatra/

[17] Anger over pork sausages at Germany Islam event; https://www.bbc.com/news/world-europe-46406120

[18] Meat ban: India isn’t vegetarian, but who’ll tell the right-wing?;  https://www.bbc.com/news/world-asia-india-61020025

[19] Festivals and political opportunism of media: ‘The Guardian’ and its anti-Hindu agenda;   https://www.opindia.com/2019/06/festivals-and-political-opportunism-of-media-the-guardian-and-its-anti-hindu-agenda/#google_vignette

[20] Is Malhar certification the answer to Halal?; https://theprint.in/opinion/is-malhar-the-answer-to-halal-food-standards-shouldnt-be-a-hindu-muslim-issue/2547709/

[21] Satvik vs Halal: Exclusion Served  with a Side of Communal Politics – The Wire;  https://thewire.in/religion/satvik-vs-halal-exclusion-served-with-a-side-of-communal-politics

[22] Demonizing Vegetarianism – A Direct Attack on Hindu Identity – Hindu Dvesha;  https://stophindudvesha.org/demonizing-vegetarianism-a-direct-attack-on-hindu-identity/

[23] Enough of militant vegetarianism!; https://www.freepressjournal.in/analysis/enough-of-militant-vegetarianism

[24] Diet and diktat – Frontline; https://frontline.thehindu.com/the-nation/diet-and-diktat/article7866053.ece

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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