जब भारत ने अपना इतिहास खुद लिखना शुरू किया, तो पश्चिम बेचैन क्यों हो उठा?

यह बहस केवल इतिहास के तथ्यों की नहीं, बल्कि उनकी व्याख्या के अधिकार की भी है। नए पुरातात्विक और वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ भारत अपनी सभ्यतागत कथा को नए आत्मविश्वास के साथ पुनर्स्थापित कर रहा है।
सारांश

भारत आज पुरातत्व, आनुवंशिकी और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर अपनी सभ्यतागत निरंतरता को नए आत्मविश्वास के साथ सामने रख रहा है। लेकिन इस प्रयास ने पश्चिमी अकादमिक जगत के कुछ वर्गों, वैचारिक समूहों और पाकिस्तान में तीखी प्रतिक्रियाएँ भी जन्म दी हैं। यह लेख सिंधु-सरस्वती सभ्यता, हड़प्पा की पशुपति मुहर, सरस्वती नदी, राखीगढ़ी के डीएनए अध्ययन और बदलते इतिहासबोध पर उभरती बहसों का विश्लेषण करता है। लेख का तर्क है कि विवाद केवल नए ऐतिहासिक साक्ष्यों का नहीं, बल्कि उनकी व्याख्या और भारत की सभ्यतागत कथा पर अधिकार का भी है। जैसे-जैसे भारत औपनिवेशिक आख्यानों से आगे बढ़कर अपने अतीत को अपनी दृष्टि से समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है, वैसे-वैसे स्थापित इतिहासबोध को चुनौती भी मिल रही है।

भारत में चल रहा सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण आज पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित कर रहा है। एक ओर पश्चिम में भारत की प्राचीन हिंदू सभ्यता को नए दृष्टिकोण से समझने की उत्सुकता दिखाई देती है, तो दूसरी ओर उसी प्रक्रिया को लेकर तीखी असहजता और विरोध भी सामने आ रहा है। इस बहस के केंद्र में भारत का वह प्रयास है, जिसके माध्यम से वह अपनी प्राचीन हिंदू सभ्यता पर आधारित ऐतिहासिक और सभ्यतागत कथा को नए सिरे से स्थापित करना चाहता है।

इस विमर्श का एक महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर उपेक्षित पक्ष है, भारत द्वारा अपनी हजारों वर्षों पुरानी सभ्यतागत निरंतरता को पुनः रेखांकित करने का प्रयास। अखंड भारत और सिंधु-सरस्वती सभ्यता जैसी अवधारणाएँ केवल ऐतिहासिक या राजनीतिक विचार नहीं हैं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं। उनके लिए भारत केवल एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य नहीं, बल्कि ऐसी अखंड सभ्यता का प्रतिनिधि है, जिसकी यात्रा सिंधु-सरस्वती काल से लेकर आज तक बिना टूटे जारी रही है।

लेकिन लंबे समय तक मुख्यधारा के अकादमिक विमर्श ने एक अलग ही तस्वीर प्रस्तुत की। औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक दौर में यह धारणा स्थापित की गई कि सिंधु सभ्यता का हिंदू सभ्यता से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। आर्य आक्रमण सिद्धांत, जिसे बाद में आर्य प्रवास सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया गया, ने इस दृष्टिकोण को और मजबूत किया। कुछ व्याख्याएँ तो इससे भी आगे बढ़कर हिंदू धर्म को अपेक्षाकृत बाद की रचना बताती रहीं, न कि एक प्राचीन और निरंतर विकसित होती परंपरा।

इन सिद्धांतों के पीछे एक गहरी औपनिवेशिक मानसिकता काम करती थी। मानो यह मान लेना कठिन था कि भारतीय सभ्यता अपने बल पर एक सतत स्वदेशी परंपरा के रूप में विकसित हो सकती थी। इसलिए उसकी उत्पत्ति किसी बाहरी स्रोत से जोड़ना अधिक स्वीकार्य समझा गया। यही श्रेष्ठताबोध दशकों तक भारत के अतीत से जुड़े शोध और इतिहासलेखन को प्रभावित करता रहा।

अब जब भारत सिंधु-सरस्वती सभ्यता और आधुनिक हिंदू संस्कृति के बीच मौजूद इस सभ्यतागत निरंतरता को अधिक स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ सामने रख रहा है, तो उसका विरोध भी उसी अनुपात में तेज़ हो रहा है। हाल ही में संस्कृति मंत्रालय द्वारा साझा की गई हड़प्पा कालीन पशुपति मुहर पर उठे विवाद ने एक बार फिर दिखा दिया कि भारत की सभ्यतागत पहचान को लेकर संघर्ष केवल अकादमिक नहीं, बल्कि वैचारिक और राजनीतिक भी है।

जब इतिहास की स्थापित धारणाएँ हिलने लगीं

भारत की प्राचीन विरासत को सार्वजनिक जीवन में अधिक प्रमुखता देने के प्रयास अब पहले से कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं। हड़प्पा और अन्य पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त साक्ष्यों को संग्रहालयों, प्रदर्शनियों, पाठ्यपुस्तकों, जन-जागरूकता अभियानों और शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से व्यापक समाज तक पहुँचाया जा रहा है। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल एक प्राचीन सभ्यता का परिचय कराना नहीं, बल्कि यह दिखाना भी है कि उसकी सांस्कृतिक धारा आज के भारत तक निरंतर बहती चली आई है।

यह बदलाव शब्दों में भी दिखाई देता है। अब “इंडस वैली सिविलाइजेशन” (Indus Valley Civilization) की जगह “सिंधु-सरस्वती सभ्यता” (Sindhu Sarasvati Civilization) या “इंडस-सरस्वती सभ्यता” (Indus Sarasvati Civilization) जैसे शब्द तेजी से प्रचलन में आ रहे हैं। इसके समर्थकों का कहना है कि यह नाम उस सभ्यता के वास्तविक भौगोलिक विस्तार को अधिक सही ढंग से व्यक्त करता है, क्योंकि बड़ी संख्या में पुरातात्विक स्थल अब सूख चुकी सरस्वती नदी के प्राचीन प्रवाह क्षेत्र में मिले हैं। पिछले कुछ वर्षों में यह शब्दावली धीरे-धीरे सरकारी और अकादमिक दोनों विमर्श का हिस्सा बनती जा रही है।

यह बदलाव एक दिन में नहीं आया। 2017 में हरियाणा सरस्वती हेरिटेज डेवलपमेंट बोर्ड ने उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर सिंधु घाटी सभ्यता का नाम बदलकर “सरस्वती नदी सभ्यता” रखने का प्रस्ताव दिया था[1] बाद में 2023 में भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान आयोजित Culture Corridor प्रदर्शनी में भी “सिंधु-सरस्वती सभ्यता” शब्द का उपयोग किया गया[2]

हालाँकि इन प्रयासों का स्वागत सर्वत्र नहीं हुआ। आलोचकों ने इन्हें इतिहास का “भगवाकरण”, “हिंदुत्ववादी इतिहासलेखन” और भारत की बहुलतावादी विरासत को संकीर्ण दृष्टि से प्रस्तुत करने का प्रयास बताया[3] [4] [5]

इसी सोच का प्रभाव शिक्षा के क्षेत्र में भी दिखाई देता है। NCERT की 2024 की कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक Exploring Society: India and Beyond में हड़प्पा समाज को “सिंधु-सरस्वती सभ्यता” कहा गया है। इससे स्पष्ट है कि अब हड़प्पा सभ्यता को भारत के व्यापक सभ्यतागत विकासक्रम के भीतर रखकर देखने पर अधिक बल दिया जा रहा है[6]

संस्कृति मंत्रालय भी सोशल मीडिया और अन्य जनसंपर्क माध्यमों से सिंधु-सरस्वती सभ्यता से जुड़ी पुरातात्विक खोजों को प्रमुखता से सामने ला रहा है। इन्हें भारत की दीर्घकालिक सभ्यतागत निरंतरता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यदि इन सभी प्रयासों को एक साथ देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि बात केवल इतिहास के पुनर्पाठ की नहीं है। भारत अब अपनी सभ्यतागत कहानी स्वयं लिखना और दुनिया को अपनी दृष्टि से सुनाना चाहता है।

पशुपति मुहर से छिड़ी बड़ी बहस

हाल ही में संस्कृति मंत्रालय की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने इस बहस को और तेज़ कर दिया। पोस्ट में लगभग 4,500 वर्ष पुरानी प्रसिद्ध हड़प्पा कालीन पशुपति मुहर को भारत की “सभ्यतागत निरंतरता के सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में से एक” बताया गया। साथ ही, योग मुद्रा में विराजमान आकृति की पहचान उस व्याख्या के आधार पर की गई, जिसे अनेक विद्वान शिव-पशुपति से जोड़ते रहे हैं[7]

पोस्ट में यह भी कहा गया कि भले ही इस सभ्यता के कुछ प्रमुख स्थल आज भारत की सीमाओं के बाहर हों, लेकिन इस मुहर में दिखाई देने वाली आध्यात्मिक परंपरा आज भी भारत में शिव उपासना, योग और सांस्कृतिक जीवन के रूप में जीवित है।

यहीं से विवाद शुरू हुआ। इतिहासकार ऑड्री ट्रश्के ने इस व्याख्या को चुनौती देते हुए कहा कि यह आकृति संभवतः यूरेशियाई परंपराओं में मिलने वाले “लॉर्ड ऑफ एनिमल्स” रूपांकन का उदाहरण है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इसकी प्रेरणा प्रोटो-एलामाइट कला से आई हो सकती है[8] [9]

वैकल्पिक व्याख्याओं का होना इतिहास अध्ययन का स्वाभाविक हिस्सा है। समस्या मतभेद नहीं, बल्कि उस सहज निश्चितता में है जिसके साथ भारत के सभ्यतागत दृष्टिकोण को अक्सर खारिज कर दिया जाता है। जब किसी देश का संस्कृति मंत्रालय उपलब्ध ऐतिहासिक समझ के आधार पर अपनी सभ्यता की एक व्याख्या प्रस्तुत करता है, तो उसका उत्तर तर्क से दिया जाना चाहिए, उपहास से नहीं। विशेष रूप से तब, जब ऐसी प्रतिक्रियाएँ उन विद्वानों की ओर से आएँ जिनका हिंदू परंपराओं और भारत की सभ्यतागत पहचान की आलोचना का एक लंबा इतिहास रहा है।

ट्रश्के ने केवल यह नहीं कहा कि यह शिव नहीं हैं। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि “भारतीय इतिहास अद्भुत है, इसलिए उसे सही ढंग से समझना ज़रूरी है।” लेकिन यहाँ एक समान रूप से महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। क्या अकादमिक प्रतिष्ठा का इस्तेमाल नए भारतीय दृष्टिकोणों से संवाद करने के लिए हो रहा है, या उन्हें शुरू से ही खारिज करने के लिए?

इस विवाद के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा छिड़ गई। अनेक भारतीय विद्वानों और टिप्पणीकारों ने शिव-पशुपति की व्याख्या के समर्थन में विभिन्न पुरातात्विक और सांस्कृतिक तर्क प्रस्तुत किए। साथ ही उन्होंने एक दोहरे मानदंड की ओर भी ध्यान दिलाया। उनका कहना था कि यूनानी और रोमन सभ्यताओं की सांस्कृतिक निरंतरता को सामान्यतः सहज स्वीकार कर लिया जाता है, जबकि भारत को वही दावा करने के लिए कहीं अधिक कठोर प्रमाण देने पड़ते हैं। मानो भारतीय सभ्यता को उसके अपने विकासक्रम से नहीं, बल्कि केवल बाहरी प्रभावों के आधार पर ही समझा जा सकता है[10] [11]

ऐसा यह पहला अवसर नहीं था। कुछ समय बाद संस्कृति मंत्रालय ने सिंधु-सरस्वती सभ्यता से प्राप्त लगभग 4,500 वर्ष पुराने टेराकोटा के पासों पर एक और पोस्ट साझा की। उसमें इन कलाकृतियों को भारत की जीवित सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बताते हुए ऋग्वेद और अथर्ववेद में वर्णित पासों के खेल का उल्लेख किया गया। इस बार भी वही वैचारिक आपत्तियाँ लगभग उसी स्वर और उसी तर्क के साथ सामने आ गईं[12]

कौन तय करेगा भारत का अतीत?

भारत शायद उन विरले देशों में है, जहाँ विदेशी विद्वान उसके इतिहास का अध्ययन भर नहीं करते, बल्कि उसकी सभ्यतागत पहचान की व्याख्या करने का अधिकार भी अपने पास मानते हैं। यही कारण है कि जैसे-जैसे भारत औपनिवेशिक इतिहासबोध से आगे बढ़कर अपनी सभ्यतागत निरंतरता को अधिक स्पष्टता से सामने रख रहा है, वैसे-वैसे पश्चिमी अकादमिक जगत, मीडिया और कुछ वैचारिक समूहों की असहजता भी बढ़ती दिखाई दे रही है।

मामला केवल इतिहासलेखन का नहीं है। इसके पीछे एक ऐसी विश्वदृष्टि भी रही है, जिसने सदियों तक बाइबिल-आधारित इतिहास और अब्राहमिक सभ्यताओं को मानव इतिहास का मानक मानकर देखा। इस दृष्टिकोण का प्रभाव आज भी अकादमिक और सार्वजनिक विमर्श में कहीं न कहीं दिखाई देता है।

उदाहरण के लिए, बाइबिल की कथाओं को शायद ही कभी “मिथक” कहा जाता है, जबकि हिंदू ग्रंथों के संदर्भ में यही शब्द सहज रूप से इस्तेमाल किया जाता है। बात केवल शब्दों की नहीं है। यह उस मानसिकता का संकेत है, जो पहले से तय कर लेती है कि किन परंपराओं को इतिहास माना जाएगा और किन्हें केवल किंवदंती या मिथकीय आख्यान।

इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ बाइबिल की व्याख्याओं का उपयोग राजनीतिक और साम्राज्यवादी उद्देश्यों के लिए किया गया। नूह के पुत्रों और तथाकथित “कनान के अभिशाप” की कथा का सहारा लेकर नस्लीय श्रेष्ठता और औपनिवेशिक शासन को वैध ठहराने की कोशिश की गई[13] इसी प्रकार पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पोप द्वारा प्रतिपादित Doctrine of Discovery ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि जिन भूभागों पर ईसाइयों का शासन नहीं था, उन्हें ईसाई शक्तियाँ अपने अधिकार में लेकर वहाँ शासन और धर्मांतरण कर सकती हैं[14] [15]

इन धारणाओं ने यूरोपीय उपनिवेशवाद की वैचारिक नींव तैयार की। यहीं से एक ऐसी विश्वदृष्टि विकसित हुई, जिसने गैर-पश्चिमी सभ्यताओं को अक्सर सांस्कृतिक और धार्मिक हीनता की दृष्टि से देखा। इसी संदर्भ में भारत की सभ्यतागत कथा को लेकर आज का विवाद केवल इतिहास का प्रश्न नहीं रह जाता। यह इस बात का भी संघर्ष है कि इतिहास लिखने और उसकी व्याख्या करने का अधिकार किसके पास होगा।

भारत के बारे में प्रचलित अनेक प्रभावशाली सिद्धांत, चाहे वह आर्य प्रवास सिद्धांत हो, औपनिवेशिक जाति-आधारित वर्गीकरण हो या वे आधुनिक ढाँचे जो हिंदू सभ्यता को लगभग पूरी तरह जाति और उत्पीड़न के दृष्टिकोण से देखते हैं, सभी व्यापक यूरोकेंद्रित बौद्धिक परंपरा के भीतर विकसित हुए। आलोचकों का कहना है कि इन ढाँचों का प्रभाव आज भी इंडिक स्टडीज़ और सार्वजनिक विमर्श के बड़े हिस्से पर बना हुआ है।

इसीलिए जब भारत अपनी सभ्यता की प्राचीनता और उसकी निरंतरता पर ज़ोर देता है, तो उसका विरोध केवल किसी एक ऐतिहासिक तथ्य का विरोध नहीं होता। वह उन स्थापित धारणाओं को चुनौती देता है, जिन्होंने लंबे समय तक विश्व इतिहास की केंद्रीय भूमिका पश्चिम को सौंपे रखी। यदि भारत सचमुच दुनिया की सबसे प्राचीन जीवित सभ्यताओं में से एक है, तो इतिहास की कई स्थापित व्याख्याओं की पुनर्समीक्षा स्वाभाविक हो जाती है।

वास्तव में सिंधु-सरस्वती सभ्यता, हिंदू सभ्यता की प्राचीनता और भारत की सभ्यतागत निरंतरता पर उठे प्रश्न केवल पुरातत्व या इतिहासलेखन तक सीमित नहीं हैं। इनके केंद्र में एक बड़ा प्रश्न है: भारत के अतीत को परिभाषित करने का अधिकार किसके पास होगा, और विश्व समुदाय भारत की सभ्यतागत भूमिका को किस दृष्टि से देखेगा?

राखीगढ़ी से उठते नए सवाल

भारत की सभ्यतागत निरंतरता पर प्रश्न उठाने वाले आलोचक अक्सर उन पुरातात्विक और वैज्ञानिक साक्ष्यों की अनदेखी कर देते हैं, जो सिंधु-सरस्वती सभ्यता और आधुनिक भारत के बीच गहरे सांस्कृतिक संबंधों की ओर संकेत करते हैं।

ऐसा ही एक महत्वपूर्ण उदाहरण है हरियाणा के हिसार जिले में स्थित राखीगढ़ी, जिसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता का सबसे बड़ा ज्ञात नगर माना जाता है। यहाँ 1995 से लगातार उत्खनन चल रहा है और इस दौरान मिली खोजों ने भारत के प्राचीन इतिहास को समझने के नए द्वार खोले हैं।

2019 में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण डीएनए अध्ययन ने इस बहस को नई दिशा दी। An Ancient Harappan Genome Lacks Ancestry from Steppe Pastoralists or Iranian Farmers शीर्षक वाले इस शोध में राखीगढ़ी से मिले मानव अवशेषों का आनुवंशिक विश्लेषण किया गया। अध्ययन में परीक्षण किए गए नमूने में न तो स्टेपी के पशुपालक समुदायों और न ही प्राचीन ईरानी कृषकों से जुड़ी आनुवंशिक वंशावली के स्पष्ट प्रमाण मिले। इन निष्कर्षों ने उन सिद्धांतों पर नए प्रश्न खड़े किए, जो हड़प्पा काल से पहले या उसके दौरान दक्षिण एशिया में बड़े पैमाने पर बाहरी आबादी के आगमन को निर्णायक मानते रहे हैं।

शोध ने यह भी संकेत दिया कि प्राचीन दक्षिण एशियाई आबादियों और बाद के भारतीय समुदायों के बीच उल्लेखनीय आनुवंशिक निरंतरता मौजूद रही है। शोधकर्ताओं के अनुसार दक्षिण एशिया के प्राचीन शिकारी-संग्रहकर्ता समुदायों का विकास स्थानीय स्तर पर हुआ और उन्होंने इसी भूभाग में स्थायी बस्तियों तथा संगठित सभ्यता के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डीएनए विश्लेषण यह भी दर्शाता है कि प्राचीन आबादियों से लेकर आधुनिक दक्षिण एशियाई समाजों तक आनुवंशिक निरंतरता की एक लंबी श्रृंखला दिखाई देती है[16] [17]

अध्ययन में यह भी कहा गया कि हड़प्पा सभ्यता की आबादी ने आज के अधिकांश दक्षिण एशियाई समुदायों की वंशावली में महत्वपूर्ण योगदान दिया। साथ ही कुछ प्रमाण पूर्व से पश्चिम की ओर जनसंख्या के आवागमन की ओर संकेत करते हैं, न कि केवल पश्चिम से पूर्व की ओर। शोधकर्ताओं ने यह सावधानी भी बरती कि केवल एक जीनोम के आधार पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते। फिर भी इस अध्ययन ने प्राचीन भारत के जनसंख्या इतिहास को समझने के लिए आनुवंशिकी को एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में स्थापित कर दिया[18]

इसी प्रकार भू-विज्ञान और रिमोट सेंसिंग के क्षेत्र में हुए अनुसंधानों ने भी सरस्वती नदी के प्रश्न को नए सिरे से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। उपग्रह चित्रों और भू-वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर हिमालय की तराई से लेकर कच्छ के रण तक प्राचीन नदी-पथों की पहचान की गई है, जिन्हें अनेक वैज्ञानिक सरस्वती नदी तंत्र से जोड़ते हैं[19]

इस सन्दर्भ में 2024 में राखीगढ़ी से मिली एक और महत्वपूर्ण खोज ने विशेष ध्यान आकर्षित किया। उत्खनन के दौरान एक विशाल जलाशय मिला। कुछ शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जब सरस्वती तंत्र की प्रमुख धारा मानी जाने वाली दृशद्वती का जलप्रवाह कम होने लगा, तब जल संरक्षण की आवश्यकता को देखते हुए इस जलाशय का निर्माण किया गया होगा। यद्यपि इस विषय पर शोध अभी जारी है, फिर भी यह खोज उस क्षेत्र के पर्यावरणीय और सभ्यतागत इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है[20]

इन्हीं पुरातात्विक और वैज्ञानिक निष्कर्षों के कारण “सिंधु-सरस्वती सभ्यता” शब्द का प्रयोग भी अधिक स्वीकार्यता प्राप्त कर रहा है। आलोचक इसे राजनीतिक परिवर्तन मानते हैं, लेकिन कई विद्वानों का कहना है कि यह परिवर्तन मुख्यतः नए शोध और उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित है। फ्रांसीसी-भारतीय विद्वान मिशेल डैनिनो ने भी इस बात की ओर संकेत किया है कि जोनाथन मार्क केनोयर, रेमंड ऑलचिन और जेन मैकइंटॉश जैसे प्रतिष्ठित पुरातत्वविद अपने शोध में लंबे समय से इसी प्रकार की शब्दावली का प्रयोग करते रहे हैं। इस दृष्टि से देखें तो “सिंधु-सरस्वती सभ्यता” केवल वैचारिक आग्रह नहीं, बल्कि विकसित होते अकादमिक विमर्श का भी परिणाम है[21]

पाकिस्तान की नई कवायद: भारत की विरासत पर दावा

स्टॉपहिंदुद्वेष (StopHindudvesha) पहले भी विस्तार से दिखा चुका है कि पाकिस्तान किस तरह एक ओर स्वयं को वैश्विक मंच पर “शांतिदूत” के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता है, जबकि दूसरी ओर “सैफ्रन टेरर” जैसे आख्यानों को बढ़ावा देकर आतंकवाद और कट्टरपंथी नेटवर्कों से अपने लंबे संबंधों से ध्यान हटाने का प्रयास करता है।

हाल के महीनों में एक और दिलचस्प प्रवृत्ति सामने आई है। सोशल मीडिया पर अनेक पाकिस्तानी उपयोगकर्ता पाकिस्तान को एक प्राचीन सभ्यता का उत्तराधिकारी सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए वे भारत की विभिन्न सभ्यतागत और सांस्कृतिक विरासतों पर दावा जताने का प्रयास करते दिखाई देते हैं।

विडंबना यह है कि जिस देश की राष्ट्रीय पहचान मुख्यतः इस्लामी आधार पर निर्मित हुई, जहाँ धार्मिक अल्पसंख्यकों और नास्तिकों को आज भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, वही अब सिंधु-सरस्वती सभ्यता और भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से अपनी ऐतिहासिक निरंतरता जोड़ने का प्रयास कर रहा है।

इन दावों पर प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग रही हैं, लेकिन वे एक व्यापक वैचारिक प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हैं। “साझी विरासत”, “समन्वयता” और “गंगा-जमुनी तहज़ीब” जैसी अवधारणाओं को अब “हिंदुत्व” या “हिंदू सभ्यतागत दृष्टिकोण” के विकल्प के रूप में अधिक मुखरता से प्रस्तुत किया जा रहा है[22] यह कहना कठिन है कि इसके पीछे कोई सुनियोजित रणनीति है या नहीं। फिर भी इतना स्पष्ट है कि ऐसे आख्यान भारत की सभ्यतागत पहचान में हिंदू परंपरा की केंद्रीय भूमिका को अपेक्षाकृत कम करके दिखाने का प्रयास करते हैं।

इसी क्रम में कुछ पाकिस्तानी टिप्पणीकारों और कुछ आधिकारिक आवाज़ों ने भारत की सभ्यतागत निरंतरता की अवधारणा पर भी आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि चूँकि हड़प्पा सभ्यता के कई प्रमुख स्थल आज पाकिस्तान की सीमाओं के भीतर स्थित हैं, इसलिए भारत उस सभ्यता पर कोई विशिष्ट दावा नहीं कर सकता, जो आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के अस्तित्व से हजारों वर्ष पहले की है। इस तर्क का उपयोग अक्सर सिंधु-सरस्वती सभ्यता को भारत की व्यापक सभ्यतागत कथा से जोड़ने के प्रयासों का विरोध करने के लिए किया जाता है[23]

लेकिन बहस केवल हड़प्पा सभ्यता तक सीमित नहीं है। सिंधु-सरस्वती सभ्यता से लेकर ओडिशी जैसी भारतीय शास्त्रीय परंपराओं तक, पाकिस्तान से जुड़े अनेक सभ्यतागत दावों में एक समान प्रवृत्ति दिखाई देती है[24] प्रयास यह रहता है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को उसके हिंदू मूलाधार से अलग करके देखा जाए।

इस प्रक्रिया में विशिष्ट रूप से हिंदू सभ्यतागत परंपराओं को “साझी”, “सामान्य” या केवल “सांस्कृतिक” विरासत के रूप में पुनर्परिभाषित करने की कोशिश की जाती है। इससे एक ओर भारत की ऐतिहासिक विरासत के हिंदू स्वरूप को धुंधला किया जाता है, तो दूसरी ओर उसी प्राचीन सांस्कृतिक प्रतिष्ठा और सभ्यतागत गौरव से वैधता प्राप्त करने का प्रयास भी किया जाता है, जिसे समानांतर रूप से कमजोर या संदिग्ध ठहराया जाता है।

निष्कर्ष

सिंधु-सरस्वती सभ्यता को लेकर चल रही बहस केवल पुरातत्व, शब्दावली या प्राचीन इतिहास तक सीमित नहीं है। इसके मूल में एक कहीं बड़ा प्रश्न है, भारत के अतीत की व्याख्या करने का अधिकार किसके पास है? और भारत की सभ्यतागत विरासत को समझने का आधार क्या होगा? औपनिवेशिक काल में गढ़े गए स्थापित आख्यान, या नए पुरातात्विक, वैज्ञानिक और ऐतिहासिक साक्ष्य?

जैसे-जैसे भारत अपनी सभ्यतागत निरंतरता को अधिक आत्मविश्वास के साथ सामने रख रहा है, उसे पश्चिमी अकादमिक जगत के कुछ वर्गों, वैचारिक कार्यकर्ताओं और पड़ोसी पाकिस्तान से आने वाले प्रतिरोध का सामना भी करना पड़ रहा है। इन सभी की दलीलें भले अलग-अलग हों, लेकिन वे अक्सर एक ही निष्कर्ष पर पहुँचती हैं, भारत की प्राचीनता, उसकी सांस्कृतिक निरंतरता और उसकी स्वदेशी सभ्यतागत यात्रा पर संदेह खड़ा करना।

दूसरी ओर, पुरातत्व, आनुवंशिकी, भू-विज्ञान और अन्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में हो रहे नए शोध इस चर्चा को लगातार नई दिशा दे रहे हैं। हर नए साक्ष्य के साथ लंबे समय से प्रचलित धारणाओं की समीक्षा हो रही है। कुछ स्थापित मान्यताएँ चुनौती झेल रही हैं, तो कुछ नई परिकल्पनाएँ उभर रही हैं। स्वाभाविक है कि इस प्रक्रिया के साथ बहस भी तेज़ होगी।

लेकिन इस पूरी बहस का सबसे अहम पहलू यह है कि भारत अब अपने इतिहास को केवल बाहरी नज़र से देखने को तैयार नहीं है। वह अपने अतीत को अपनी सभ्यतागत स्मृति, अपने अनुभवों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर समझने और समझाने का प्रयास कर रहा है।

इतिहास को लेकर मतभेद स्वाभाविक हैं, और रहेंगे भी। लेकिन किसी भी जीवंत सभ्यता को अपने अतीत की पुनर्समीक्षा करने, नए प्रमाणों के आलोक में पुराने निष्कर्षों को परखने और अपनी ऐतिहासिक कथा स्वयं गढ़ने का अधिकार है। भारत आज उसी अधिकार का अधिक आत्मविश्वास के साथ प्रयोग कर रहा है। यही इस पूरे सभ्यतागत पुनर्जागरण का सबसे महत्वपूर्ण संकेत है।

सन्दर्भ सूची

[1] Haryana proposes to rename the Indus Valley civilisation as Sarasvati river civilisation – India News | The Financial Express; https://www.financialexpress.com/india-news/haryana-proposes-to-rename-the-indus-valley-civilisation-as-sarasvati-river-civilisation/572057/

[2] G20 Culture Corridor: A Glimpse At Member Countries’ Shared Heritage;   https://special.ndtv.com/decoding-g20-ndtv-conclave-121/news-detail/g20-culture-corridor-a-glimpse-at-member-countries-shared-heritage-4380157/3

[3] Kanimozhi criticises Nirmala Sitharaman on  ‘Saraswati Sindhu civilisation’ statement; https://www.thenewsminute.com/tamil-nadu/kanimozhi-criticises-nirmala-sitharaman-saraswati-sindhu-civilisation-statement-117667

[4] Why does India want to rename Indus Valley Civilization? – South Asia Times;  https://southasiatimes.org/why-does-india-want-to-rename-indus-valley-civilization/

[5] 100 Years of the Discovery of the Indus Valley Civilization: How It Shaped Indian Politics – The Diplomat;  https://thediplomat.com/2024/11/100-years-of-the-discovery-of-the-indus-valley-civilization-how-it-shaped-indian-politics/

[6] New NCERT Textbook Refers To Harappan Society As ‘Sindhu-Sarasvati Civilisation’; https://www.ndtv.com/education/new-ncert-textbook-refers-to-harappan-society-as-sindhu-sarasvati-civilization-6153158

[7] Ministry of Culture on X;  https://x.com/MinOfCultureGoI/status/2059513219429826967

[8] US Historian Audrey Truschke Denies Shiva-Pashupati On Harappan Seal, Says It Represents ‘Lord of Animals’ | India News -News18;  https://www.news18.com/india/us-historian-audrey-truschke-denies-shiva-pashupati-on-harappan-seal-says-it-represents-lord-of-animals-ws-l-10119841.html

[9] Not Shiva-Pashupati on Harappan seal? US historian Audrey Truschke sparks outrage – India Today;  https://www.indiatoday.in/india/story/audrey-truschke-harappan-seal-row-mohenjo-daro-pashupati-shiva-debate-indian-history-explained-2919036-2026-05-29

[10] Kalina Arya on X;   https://x.com/KalingaArya/status/2060281048391725524

[11] Amish Tripathi on X; https://x.com/authoramish/status/2059928549856006278

[12] Ministry of Culture on X;  https://x.com/MinOfCultureGoI/status/2061015896118767743

[13] Fabrication of the History of India – Part 1 of 3;  https://stophindudvesha.org/fabrication-of-the-history-of-india-part-1-of-3/

[14] Ibid.

[15] The Doctrine of Discovery, 1493 | Gilder Lehrman Institute of American History;   https://www.gilderlehrman.org/history-resources/spotlight-primary-source/doctrine-discovery-1493

[16] 2500 BC Rakhigarhi skeletons have no traces of ‘Aryan gene’, finds DNA study;  https://theprint.in/india/aryan-invasion-theory-gets-a-setback-from-dna-study-of-2500-bc-rakhigarhi-skeletons/287454/

[17] Press Note by Prof. Vasant Shinde, Director of the Rakhigarhi Project on behalf of all the authors;  https://chapter.intach.org/pdf/press-note-prof-vasant-shinde.pdf

[18] Ibid.

[19] Unveiling the Ancient Saraswati: Tracing Paleochannels through Geological Signatures from foothills of Himalayas to Rann of Kutch | International Journal of Research in; https://journal.ijresm.com/index.php/ijresm/article/view/2979

[20] Rakhigarhi reservoir excavation gives clues on Saraswati River;  https://theprint.in/ground-reports/massive-reservoir-found-at-rakhigarhi-is-giving-us-more-clues-on-saraswati-river/2447317/

[21] Calling Harappan Civilisation ‘Sindhu – Sarasvati’ Is ‘Not a Hindutva Thing’, It Is ‘Factual’: French-Indian Professor Who Headed NCERT Social Science Panel;  https://swarajyamag.com/culture/calling-harappan-civilisation-sindhu-sarasvati-is-not-a-hindutva-thing-it-is-factual-french-indian-professor-who-headed-ncert-social-science-panel

[22] Nawab Asad Jutt on X; https://x.com/nawabasadjutt/status/2060818047469027370

[23] Syed Zulfikar Ali Shah on X; https://x.com/SyZulfiqarShah/status/2060685362750763076

[24] A masterclass in cultural piracy: Inside Sheema Kermani’s attempted historical heist of Odissi dance form | The Pamphlet; https://thepamphlet.in/a-masterclass-in-cultural-piracy-inside-sheema-kermanis-attempted-historical-heist-of-odissi-dance-form/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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