लिंग भेदभाव की विकृत धारणाओं द्वारा हिंदू धर्म का नकारात्मक चित्रण
- हिंदू मुद्दों पर विषाक्त पुरुषत्व का मिथ्या आरोपण कर उनकी छवि को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
- हिंदुत्व को नियमित रूप से पुरुषत्व संकट से उत्पन्न एक विषैली विचारधारा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
- हिंदू राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के विमर्श को तेज़ी से महिला विरोधी के रूप में पेश किया जा रहा है।
- हिंदू धर्म और उसके रीति-रिवाजों और परंपराओं को बदनाम करने के लिए “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है; हिंदू धर्म को आंतरिक रूप से पितृसत्तात्मक और स्त्री-द्वेषी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
- हिंदू देवताओं का मजाक उड़ाया जाता है और उन्हें राक्षसी बताया जाता है, और हिंदू देवी-देवताओं पर अति-पुरुषवादी प्रतिमानों को ज़बरदस्ती थोपा जाता है।
- हिंदू मुद्दों को विषैले पुरुषत्व के चश्मे द्वारा ज़बरदस्ती प्रस्तुत करने का अंतिम उद्देश्य हिंदू मुद्दों के सार्वजनिक प्रतिनिधित्व को चुप कराना और बदनाम करना है।
भारत के विपक्षी नेता राहुल गांधी ने हाल ही में अमेरिका यात्रा के दौरान कहा कि भारत की वर्तमान सरकार और आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) जैसे संगठनों का मानना है कि महिलाओं की समाज में एक ही भूमिका होनी चाहिए – घर पर रहना, खाना बनाना और चुप रहना। उन्होंने इस सोच को महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ बताया और उन लोगों से इसकी तुलना की जो महिलाओं को अपनी मर्जी से कुछ भी करने की आज़ादी देने का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं के प्रति यह दृष्टिकोण भाजपा और विपक्ष के बीच वैचारिक लड़ाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।[1]
राजनीतिक आडंबर के समीकरणों को अलग रखते हुए, श्री गांधी की यह टिप्पणी हिंदुत्व या “हिंदू होने के सार” पर कटाक्ष करने वाले वृहत वैचारिक विमर्श का एक हिस्सा है। हालांकि हिंदुत्व एक जटिल विषय है और इस पर गहराई से चर्चा इस लेख का उद्देश्य नहीं है, लेकिन हिंदुत्व विचारधारा पर अक्सर आलोचना होती है, खासकर जब यह हिंदू धर्म की राजनीतिक अभिव्यक्ति से जुड़ती है।
कुछ समूहों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों की आलोचना की है, क्योंकि वे “हिंदुत्व” का समर्थन करते हैं। अगर आप “संघ परिवार” की ऑनलाइन खोज करेंगे, तो आपको ऐसे कई लेख मिलेंगे जो इन संगठनों पर हिंसा, चरमपंथ और अल्पसंख्यक विरोधी होने का आरोप लगाते हैं। कुछ विरोधी समूहों ने तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को “अर्धसैनिक संगठन” भी कहा है।[2]
हिंदू धर्म और हिंदुत्व पर निशाना साधता यह विमर्श हिंदू राष्ट्रवादी समूहों को नियमित रूप से “पितृसत्तात्मक”, “महिला विरोधी” और “विषाक्त मर्दानगी” के प्रतीक के रूप में चित्रित करता है। “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” और “हिंदुत्व फासीवाद” जैसे शब्दों का इस्तेमाल हिंदू अधिकारों की पैरवी करने वाले हिंदू समूहों और संगठनों का जनता के सामने नकारात्मक चित्रण प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है। हिंदू संगठनों को शैतानी रूप में पेश किया जाता है, इस विकृतीकरण का उद्देश्य हिन्दू अधिकारों के क्षेत्र में इन समूहों द्वारा किए गए प्रयासों को नकार जनता की आँखों में धूल झोंकना है। विडंबना यह है कि जनता भी इन हिंदू संगठनों की जानकारी के लिए काफी हद तक मीडिया चित्रण पर ही निर्भर करती है। इसीलिए हिंदुत्व और हिंदू संगठनों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार का एक कुचक्र बन जाता है।
इस हिंदू विरोधी कथानक ने एक अकादमिक विमर्श का निर्माण किया है जो हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद को विषाक्त मर्दानगी से जोड़ता है। इन विचारधाराओं को विषाक्त मर्दानगी से जोड़ने का प्रयास एक प्रमुख अकादमिक प्रवृत्ति बन गया है। विभिन्न स्वघोषित नारीवादी, इतिहासकार, लेखक और पत्रकार इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं, जो हिंदुत्व और हिंदू धर्म को इन नकारात्मक रूपकों से जोड़ने में विशेषज्ञता का दावा करते हैं।
इस लेख में, हम हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद को वैश्विक वोक लॉबी द्वारा जबरन “महिला विरोधी”, “पितृसत्तात्मक” और “विषाक्त मर्दानगी” के रूप में चित्रित किए जाने वाले ट्रेंड का विस्तार से विश्लेषण करेंगे। अंततः, हम इस लेख में यह तर्क भी देते हैं कि हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद पर यह हमला हिंदू धर्म और इसकी संपूर्णता में इससे जुड़ी संस्कृति और परंपराओं पर हमला है।
हिंदुत्व को गलत तरीके से पेश करना: इसे विषाक्त मर्दानगी से जोड़ता पक्षतापूर्ण विमर्श
हिंदुत्व, भारत सरकार की हिंदू समर्थक नीतियों, और विषाक्त मर्दानगी के विचार के बीच निराधार संबंध बनाती सामग्री की मीडिया में तो भरमार है ही, साथ में अकादमिक और बौद्धिक संस्थानों में भी इस प्रकार के तथाकथित शोध का बोलबाला है। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) जैसे कानून, जिसका उद्देश्य अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से सताए गए अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करना है, को वामपंथी मीडिया द्वारा “आक्रामक मर्दानगी” कथानक के हिस्से के रूप में गलत तरीके से पेश किया गया है।
इसी तरह, राम जन्मभूमि आंदोलन और अयोध्या में श्री राम मंदिर के निर्माण के मुद्दे को आक्रामक मर्दाना शक्ति के प्रदर्शन के रूप में अतिरंजित रूप से चित्रित किया गया है। इस चित्रण का लक्ष्य स्पष्ट है – हिंदुत्व को इस हद तक बदनाम करना कि हिंदू मुद्दों की वकालत करने वाले किसी भी व्यक्ति को तुरंत खलनायक करार दे दिया जाए। इन आंदोलनों को बदनाम करने के लिए हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद पर जानबूझकर नारीवादी सिद्धांत लागू किए जाते हैं, हिंदू पहचान पर गर्व को “अति-मर्दाना” और महिला विरोधी के रूप में चित्रित किया जाता है।
आइए हिंदुत्व, हिंदू मुद्दों और हिंदू राष्ट्रवाद के बारे में इन खतरनाक रूढ़ियों को प्रचारित करने वाली कुछ जहरीली सुर्खियों पर नज़र डालें:
- हिंदू वर्चस्व के प्रतिरोध के रूप में अति-नारीत्व (द कारवां, मई 2022) [3]
- हिंदू पुरुष के पुरुषत्व का संकट हिंदुत्व को कैसे बढ़ावा देता है (न्यूज़ लॉन्ड्री, जनवरी 2020) [4]
- 56 इंच का Cult और विषाक्त पुरुषत्व (काउंटर-करंट्स, जून 2018)[5]
- अयोध्या मुद्दा भारत में राजनीति के बढ़ते पुरुषीकरण को दर्शाता है (फेमिनिज्म इंडिया, सितंबर 2020)[6]
- महिलाओं पर हिंदुत्व का युद्ध: ‘भगवा फासीवाद’ का लैंगिक चेहरा (न्यूज़ क्लिक, नवंबर 2020)[7]
- मोदीस्पीक: हिंदू राष्ट्र के लिए घोषणापत्र (द वायर, जून 2024)[8]
- एनिमल का इस्लामोफोबिया और हिंदुत्व परियोजना से इसकी कई समानताएँ (द न्यूज मिनट, दिसंबर 2023)[9]
- हिंदुत्व आंदोलन में लिंग की नई युग की राजनीति और आस्था-आधारित पहचान प्रतिस्पर्धिता (ओपन डेमोक्रेसी, दिसंबर 2019)[10]
- पुस्तक समीक्षा: वंदना सोनलकर द्वारा लिखित ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिंदू वुमन’ (फेमिनिज्म इंडिया, अक्टूबर 2022)[11]
- ‘हिंदुत्व नारीवाद’ और इसकी घृणा और बहिष्कार की बयानबाजी (फेमिनिज्म इंडिया, जुलाई 2018)[12]
इनमें से अधिकांश लेख हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद को पुरुष-प्रधान के रूप में चित्रित करते हैं, जिसमें महिलाएं, अल्पसंख्यक और सामाजिक रूप से वंचित शामिल नहीं हैं। यह विमर्श अकादमिक और मीडिया चर्चाओं में अधिक आम होता जा रहा है, जहां विभिन्न पहचान समूहों-महिलाओं, अल्पसंख्यकों और दलितों- को एक साथ रख दावा किया जाता है कि हिंदुत्व उन सभी का उत्पीड़न करता है। हालाँकि, ये आलोचनाएँ अक्सर खोखले दावों पर आधारित होती हैं। मुझे अभी तक ऐसा कोई लेख नहीं मिला है जो इस विचार का समर्थन करने के लिए ठोस तर्क या कारण प्रदान करता हो कि हिंदू मुद्दों को संबोधित करना स्वाभाविक रूप से महिला विरोधी है।
इस शैतानीकरण का एक विशिष्ट उदाहरण न्यूज़ लॉन्ड्री के एक लेख में मिलता है जिसका शीर्षक है “हिंदू पुरुष का पुरुषत्व का संकट हिंदुत्व को कैसे बढ़ावा देता है।” यह लेख हिंदू विरोधी रूढ़ियों और ज़बरदस्त घृणा से भरा हुआ है, जिससे इसे गंभीरता से लेना मुश्किल हो जाता है। लेख की शुरुआत हिंदुत्व समर्थकों को “क्रोधित पुरुषवादी” के रूप में लेबल करने से होती है, जो अपने प्रोफ़ाइल चित्र के रूप में भगवा और काले रंग में सराबोर “क्रोधित हनुमान” की छवि प्रदर्शित करते हैं। किसी भी सार्थक विश्लेषण की पेशकश करने के बजाय, लेख हिंदुत्व को बदनाम करने, बिना सबूत के विषैले पुरुषत्व की कहानी गढ़ने और हिंदू विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए भड़काऊ बयानबाजी पर ध्यान केंद्रित करता है।
लेखक, अपने विकृत दृष्टिकोण में, भारत में हर तरह की असमानता और उत्पीड़न को हिंदुत्व के तथाकथित विषैले पुरुषत्व का परिणाम मानता है। इस अतिरंजित विश्वदृष्टि में, शाकाहार जैसी सरल चीज़ को भी हिंदुत्व के कथित अति-आक्रामक पुरुषत्व के प्रतीक के रूप में चित्रित किया जाता है। लेख सुझाव देता है कि “पुरुषत्व को लेकर चिंता हिंदुत्व आंदोलन का आधार है,” और बेतुके ढंग से दावा करता है कि लव जिहाद का व्यापक रूप से चर्चित मुद्दा हिंदू पुरुषों की असुरक्षाओं का प्रतिबिंब मात्र है, जैसा कि हिंदुत्व द्वारा दर्शाया गया है। यह भ्रामक कथा हर सामाजिक मुद्दे को हिंदुत्व की कथित “पुरुषवादी प्रवृत्तियों” से जोड़ने का प्रयास करती है, सामान्य सांस्कृतिक प्रथाओं और राजनीतिक चिंताओं को पुरुष चिंता के दूरगामी सिद्धांतों में बदल देती है। तर्कसंगत बहस में शामिल होने के बजाय, लेख हिंदुत्व को सभी प्रकार के उत्पीड़न की जड़ के रूप में चित्रित करने का सहारा लेता है, और इन अतिरंजित दावों का उपयोग अपने पक्षपाती दृष्टिकोण को मजबूत करने के लिए करता है।
“अयोध्या मुद्दा भारत में राजनीति के बढ़ते पुरुषत्व को दर्शाता है”[13] शीर्षक वाला लेख यह संकेत देता है कि रथ यात्रा की शुरुआत और बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद से अयोध्या राम मंदिर की पूरी कहानी “पुरुषों द्वारा अत्यधिक नियंत्रित और वर्चस्व वाली” है और इस प्रकार यह हिंदुत्व की ज़हरीली मर्दवादी परियोजना का प्रतीक है। लेख का स्पष्ट उद्देश्य नारीवादी सिद्धांतों का जबरन उपयोग करके हिंदू राष्ट्रवाद की आलोचना करना है और इसे किसी ना किसी तरह से पितृसत्तात्मक और महिला विरोधी करार देना है। ऐसा करने से अयोध्या विवाद के कानूनी और ऐतिहासिक पहलुओं को दरकिनार कर दिया जाता है, इसके बजाय इस मुद्दे पर एक लैंगिक कथा को जबरन थोपने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। ब्लर्ब स्पष्ट रूप से लेख के एजेंडे को प्रकट करता है: “अयोध्या विवाद को नारीवादी लेंस के माध्यम से समझना मर्दवादी धारणाओं को खत्म करने और भारतीय राजनीति के बढ़ते मर्दवाद का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने के लिए महत्वपूर्ण है।” यह दृष्टिकोण हिंदुत्व को दमनकारी के रूप में पेश करने के जानबूझकर किए गए प्रयास को उजागर करता है, जिसमें पक्षपातपूर्ण व्याख्या को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया जाता है।
इसी तरह, लेख “हिंदुत्व का महिलाओं पर युद्ध: ‘भगवा फासीवाद’ का लैंगिक चेहरा”[14] तनिष्क के एक विज्ञापन के प्रति हिंदू प्रतिरोध को महिला विरोधी घृणा और वर्चस्ववादी मर्दवादी विचारधाराओं से भरा हुआ बताता है। यहाँ तनिष्क के उस विज्ञापन का ज़िक्र हो रहा है जिसमें एक हिंदू बहू को उसकी मुस्लिम सास द्वारा सम्मानित किया जा रहा है, जिसके ख़िलाफ़ हिंदू समाज की बड़े पैमाने पर प्रतिक्रिया आयी थी कि इस प्रकार का चित्रण सच्चाई से बिलकुल मेल नहीं खाता। लेख आगे यह भी संकेत देता है कि हिंदुत्व के प्रमुख दर्शन हिंसा का महिमामंडन करते हैं और हिंसा और आक्रामकता की अति-पुरुषवादी प्रवृत्तियों को राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हैं। लेख गांधी के आदर्शों की तुलना सावरकर के आदर्शों से करते हुए कहता है, “सावरकर का मानना था कि गांधी की अहिंसा और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण ने राष्ट्र को कमजोर कर दिया, जबकि उन्होंने हिंदू पुरुषों में सैन्य शक्ति और यौन क्षमता को बढ़ावा दिया।”
इसके अलावा, लेख यह सुझाव देकर खतरनाक और भ्रामक सूचनाएँ फैलाता है कि हिंदुत्व हिंदू पुरुषों को मुस्लिम महिलाओं का बलात्कार करके अपनी मर्दानगी साबित करने की वकालत करता है, इसे हिंदू महिलाओं के सम्मान को बहाल करने के साधन के रूप में चित्रित करता है। इस लेख का सार यह है कि हिंदुत्व बलात्कार को युद्ध के हथियार के रूप में वैध बनाता है। इस प्रकार यह लेख हिंदू राष्ट्रवाद और उसके सिद्धांतों का बेहद विकृत और भड़काऊ दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
इन विषैले शीर्षकों पर विस्तृत चर्चा इस लेख के दायरे से बाहर है, लेकिन दिए गए उदाहरण इस बात की जानकारी देते हैं कि कैसे वोक शिक्षाविद, बौद्धिक संस्थान और मीडिया तंत्र भारत में हिंदू मुद्दों को पेश करते हैं। नारीवादी दृष्टिकोण का उपयोग करके, वे हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद को “विषाक्त मर्दवादी” परियोजनाओं के रूप में लेबल करते हैं। जबकि पितृसत्ता और अति-पुरुषत्व ऐसे वैश्विक मुद्दे हैं जिनकी आलोचनात्मक रूप से जांच की जानी चाहिए, यह ज़हरीला विमर्श अक्सर सुझाव देता है कि हिंदू संस्कृति, आदर्श और हिंदू अधिकारों की राजनीतिक अभिव्यक्ति स्त्री-द्वेष और विषाक्त पुरुषत्व के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार हैं। जैसा कि हम तर्क देते हैं, यह अनुचित रूपरेखा हिंदू संस्कृति और मूल्यों पर सीधा हमला है, जो व्यापक, अधिक जटिल सामाजिक चुनौतियों को हिंदू धर्म में निहित बताकर गलत तरीके से प्रस्तुत करता है।
हिंदू संस्कृति को बदनाम करने के लिए “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” के मिथक का उपयोग करना
वैश्विक वोक शिक्षाविदों ने हिंदू धर्म और इसकी संस्कृति को बदनाम करने के लिए “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” और “हिंदुत्व फासीवाद” जैसे शब्दों को लोकप्रिय बनाया है। “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” शब्द को लेकर की गई एक साधारण Google खोज कई शत्रुतापूर्ण लेखों को प्रकट करती है, मुख्य रूप से वामपंथी प्रकाशनों से, जो विभिन्न प्रकार की संरचनात्मक असमानता और भेदभाव के लिए ब्राह्मणों को दोषी ठहराते हैं। यह कथा इस तथ्य को आसानी से अनदेखा करती है कि ब्राह्मणों सहित हिंदू, स्वयं सदियों के यूरोपीय और इस्लामी उपनिवेशवाद के शिकार थे। इसके बावजूद, यह विमर्श इस बात पर ज़ोर देता है कि “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” नस्लवाद, स्त्री-द्वेष और उत्पीड़न जैसी वैश्विक बुराइयों की जड़ है।
मानविकी अनुसंधान का अधिकांश हिस्सा इसी प्रकार के बेतुके शब्द जाल से प्रेरित शोध पर आधारित है। “यूरोपीय औपनिवेशिक पितृसत्ता” या “इस्लामी कट्टरपंथी पितृसत्ता” जैसे शब्दों को गढ़ने की कल्पना करें – ऐसे आख्यान जागरूक हलकों को पसंद नहीं आएंगे। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की कहानी हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली “विषाक्त मर्दानगी” की कहानी से बहुत करीब से जुड़ी हुई है। वोक तंत्र इस धारणा को आगे बढ़ाता है कि हिंदू राष्ट्र स्वाभाविक रूप से महिला विरोधी है और एक अति-पुरुषवादी नींव पर बना है। ऐसा करके, “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसे शब्दों को हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं पर हमला करने के लिए हथियार बनाया जाता है, और हिंदू संस्कृति को महिलाओं के लिए दमनकारी के रूप में चित्रित किया जाता है।
इस विमर्श का एक उदाहरण 2021 का वर्चुअल सम्मेलन था जिसका शीर्षक था “वैश्विक हिंदुत्व को जड़ से खत्म करना”, जिसे कई प्रमुख अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने समर्थन दिया था। इस सम्मेलन में हिंदूफोबिक विद्वानों ने हिंदुत्व की लिंग और यौन राजनीति जैसे विषयों पर चर्चा की, जिससे इस विमर्श को और अधिक विस्तार मिला कि हिंदू धर्म महिला विरोधी है। यह सम्मेलन उस शक्तिशाली गठजोड़ को दर्शाता है जो सक्रिय रूप से हिंदू धर्म को बदनाम करता है। हिंदुओं के उत्पीड़न जैसे वास्तविक मुद्दों को संबोधित करने के बजाय, यह तंत्र हिंदू धर्म को स्त्री-द्वेषी के रूप में चित्रित करने के लिए हानिकारक लेबल गढ़ता है। हिंदू धर्म में मौजूद समृद्ध नारीवादी परंपराओं – जैसे देवी की पूजा, शक्ति की अवधारणा और हिंदू महाकाव्यों में सशक्त महिला पात्रों – को नजरअंदाज किया जाता है, जबकि भारत में महिलाओं के मुद्दों को चुनिंदा रूप से हिंदू विरोधी नज़रिए से देखा जाता है।
आइए कुछ विषैले शीर्षकों पर नज़र डालें जो जानबूझकर हिंदू धर्म पर “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” का आरोप लगाकर उस पर हमला करते हैं।
- ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का अभिशाप (टाइम्स ऑफ इंडिया, सितंबर 2021)[15]
- ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को नष्ट करने’ का आह्वान घृणास्पद भाषण नहीं है – यह प्रगतिशील, जाति-विरोधी राजनीति है (स्क्रोल, नवंबर 2018)[16]
- नारीवादी होते हुए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के खिलाफ अंतहीन लड़ाई लड़ना (फेमिनिज्म इंडिया, सितंबर 2024)[17]
- ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को चुनौती देना एक महिला का काम नहीं है (यूथ की आवाज़, मार्च 2021)[18]
- ब्राह्मणवादी पितृसत्ता समुदाय के मानसिक स्वास्थ्य को कैसे सीधे प्रभावित कर सकती है (द वायर, नवंबर 2018)[19]
- ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को समझना और इसे नष्ट करना क्यों बुरा नहीं है (द क्विंट, नवंबर 2018)[20]
- भारतीय समाज की ब्राह्मणवादी प्रकृति पितृसत्ता (यूथ की आवाज़, मार्च 2023)[21]
- इसमें होली (पवित्र) क्या है? ब्राह्मणवादी-पितृसत्तात्मक भारत एक असुर बहुजन महिला होलिका के दहन का जश्न क्यों मनाएगा? (मकतूब मीडिया, मार्च 2018)[22]
- राय: विवाह की संस्था ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का एक साधन है (यूथ की आवाज़, फरवरी 2020)[23]
इन सभी लेखों में जो बात आम है, वह है हिंदू धर्म को बदनाम करने और भारत में महिलाओं के साथ कथित तौर पर खराब व्यवहार के लिए इसे दोषी ठहराने के लिए “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” शब्द का इस्तेमाल। ये लेख सुझाव देते हैं कि हिंदू धर्म स्वाभाविक रूप से स्त्री-द्वेषी और महिला-विरोधी है। इनमें से कुछ लेख, भारतीय महिलाओं द्वारा आत्मकथात्मक शैली में लिखे गए हैं, जो खुद को ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की शिकार के रूप में चित्रित करती हैं, इस तथ्य की अनदेखी करते हुए कि वे जिन मुद्दों का वर्णन कर रही हैं, वे दुनिया भर में पितृसत्ता के कारण होने वाली सार्वभौमिक समस्याएँ हैं। हिंदू धर्म को दोष देने से अंतर्निहित संदेश यह प्रतीत होता है कि पश्चिमी समाज महिलाओं के मुद्दों से मुक्त हैं, जो स्पष्ट रूप से सत्य नहीं है।
जिस तरह से वोक तंत्र भारतीय महिलाओं को अपनी संस्कृति, समाज और परिवार के प्रति उदासीन रवैया रखने के लिए प्रेरित करता है, वह लेख “नारीवादी होते हुए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के खिलाफ एक अंतहीन लड़ाई लड़ना” (फेमिनिज्म इंडिया) में स्पष्ट है। एक भारतीय महिला द्वारा लिखित, यह लेख सामान्य किशोरावस्था के विद्रोह और पीढ़ी के अंतर का वर्णन करता है, जिससे परिवार के साथ अस्थायी संघर्ष होता है। हालांकि यह सच है कि भारतीय माता-पिता अक्सर लड़कियों पर प्रतिबंध लगाते हैं, यह एक सार्वभौमिक मुद्दा है, न कि हिंदू धर्म की कोई अनोखी बात। हालांकि, लेखिका अपने अनुभवों को “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” से जोड़ने पर ज़ोर देती है, जो अतिरंजित और भ्रामक दोनों है। अपने परिवार के साथ अपने रिश्ते का इन शब्दों में वर्णन करना बेहद परेशान करने वाला है और यह हिंदू संस्कृति के अनावश्यक दानवीकरण को दर्शाता है:
समय के साथ, आपके अस्तित्व के कई हिस्सों में, आप उनकी पकड़ को ढीला करने में कामयाब हो जाते हैं, जबकि कुछ क्षेत्र उनकी जकड़ में जकड़े रहते हैं। और कभी-कभी, जंजीरें दिखाई भी नहीं देतीं, और आपको बहुत बाद तक एहसास नहीं होता कि आपका एक निश्चित हिस्सा आपकी जानकारी के बिना बंधा हुआ है। प्रक्रिया फिर से शुरू होती है, जहां आप खुद को ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की इन कभी न खत्म होने वाली बेड़ियों से मुक्त करने की कोशिश करते हैं। [24]
शायद आपको लगे कि ये विचार शिक्षा जगत तक ही सीमित हैं और ज़मीनी स्तर पर इनका सीमित महत्व है। परंतु वास्तविकता यह है कि शिक्षा जगत लोकप्रिय संस्कृति और मुख्यधारा के मीडिया को बहुत अधिक प्रभावित करता है, जो हिंदू विरोधी अकादमिक कथा के सरलीकृत संस्करण बनाता है। इन विचारों को फिर सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से बार-बार दोहराया जाता है, जो धीरे-धीरे जनता की राय को आकार देता है। दुर्भाग्य से, यह प्रक्रिया हिंदुओं के अपने संस्कृति और धर्म को देखने के तरीके को बदल देती है।
सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि हिंदू धर्म की राजनीतिक अभिव्यक्ति पर इसे अति-मर्दाना बताकर हमला किया जा रहा है। यह रणनीति हिंदुओं को अपने समुदाय को प्रभावित करने वाले मुद्दों को संबोधित करने से हतोत्साहित करती है, और एक खतरनाक मिसाल कायम करती है जो महत्वपूर्ण आवाजों को चुप करा देती है।
हिंदू देवताओं को बदनाम करने के लिए विषाक्त मर्दानगी के रूपक का हथियारीकरण
आखिरकार, हिंदू विरोधी लॉबी श्री राम और हनुमान जैसे हिंदू देवताओं का अपमान करने, उन्हें छोटा करने और उन्हें शैतान के रूप में प्रस्तुत करने के लिए ज़हरीले मर्दानगी के हथियार का इस्तेमाल करती है। कई मीडिया प्रकाशनों में, इन देवताओं को अति-मर्दाना और पितृसत्तात्मक के रूप में संदर्भित किया जाता है। इस प्रकार, जो हिंदू समर्थक अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर हनुमान जी की तस्वीरें प्रदर्शित करते हैं या गर्व से जय श्री राम का नारा लगाते हैं, उनका भी शैतानीकरण कर दिया जाता है और एक कथित अति-मर्दाना नारी विरोधी और अल्पसंख्यक विरोधी विचारधारा का प्रचार करने के लिए उनकी निंदा की जाती है।
अप्रैल 2024 में द न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा प्रकाशित एक लेख की हेडलाइन है “मोदी का झूठ का मंदिर”।[25] यह लेख हिंदू देवताओं के बारे में अपमानजनक और अति आपत्तिजनक रूढ़ियों से भरा हुआ है। अयोध्या में श्री राम मंदिर के निर्माण के बाद “श्री मोदी के हिंदू राष्ट्रवाद” की अपनी स्पष्ट आलोचना में लेख कहता है कि मंदिर के बाहर लगी स्मारिका की दुकानें जहरीली हिंदू मर्दानगी को प्रदर्शित करती हैं क्योंकि वे “स्टेरॉयड से भरे राम की छवियों वाली भड़कीली शर्ट बेचते हैं, जिनकी मांसपेशियाँ उभरी हुई हैं और सिक्स-पैक तराशे हुए हैं”। इसी तरह, लेख में श्रद्धेय हिंदू देवता को “राम का बुद्धिमान लेकिन थोड़ा शरारती बंदर साथी” कहा गया है। इस लेख की घोर हिंदू विरोधी प्रवृत्ति पर हिंदूद्वेष द्वारा प्रकाशित पिछले लेख में विस्तार से चर्चा की गई है; यदि आप इस आलोचना को और अधिक जानने में रुचि रखते हैं, तो आप मूल लेख पढ़ सकते हैं।[26]
स्क्रोल ने 2019 में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें कट्टर हिंदू विरोधी लेखक, शिक्षाविद और दलित अधिकार कार्यकर्ता कांचा इलैया शेफर्ड के विचार प्रस्तुत किए गए।[27] प्रश्नोत्तर शैली में लिखे गये इस लेख में, इलैया ने अपनी तीव्र हिंदू विरोधी भावना को यह कहकर प्रकट किया कि दुर्गा और काली जैसी देवियाँ भी हिंसा और आक्रामकता का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका पूरा लेख हिंदू देवताओं को बदनाम करने और उनका अपमान करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास है। हिंदू धर्म के प्रति अपनी अत्यधिक घृणा में, इलैया देवी पूजा की पूजनीय परंपरा को भी निशाना बनाते हैं, और देवी प्रतिमाओं के प्रतीकात्मक अर्थ को विकृत करते हैं। वह झूठा दावा करते हैं कि दुर्गा और काली जैसी देवियाँ तथाकथित आक्रामक और हिंसक अति-पुरुषत्व का प्रतीक हैं और अपने कथन में फिट होने के लिए उनके महत्व को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं। यह घोर गलत बयानबाज़ी हिंदू धर्म में इन देवी-देवताओं के गहरे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व का अनादर करती है।
हिंदू धार्मिक ग्रंथों को विकृत करने के लंबे इतिहास वाले एक अन्य लेखक देवदत्त पटनायक, “राम और शिव जैसे हिंदू देवताओं के पास अब बुरे लोगों को मारने के लिए अमेरिकी सुपरहीरो की तरह सिक्स पैक हैं” शीर्षक से एक लेख के साथ हिंदू विरोधी भावना के इस तंत्र को बढ़ावा देते हैं (द प्रिंट, जुलाई 2018)।[28] लेख में तर्क दिया गया है कि हिंदू देवताओं का लोकप्रिय संस्कृति का प्रतिनिधित्व अमेरिकी सुपरहीरो के ट्रेंड से तेज़ी से प्रभावित हो रहा है क्योंकि राजा रवि वर्मा की हिंदू देवताओं को कोमल कामुकता के साथ चित्रित करने की शैली को अमेरिकी सुपरहीरो सौंदर्यशास्त्र से प्रभावित अति-पुरुषवादी शैली के लिए त्याग दिया गया है। लेखक आगे कहते हैं, “इस प्रवृत्ति को दक्षिणपंथी राजनेताओं द्वारा अपनाया और वैध बनाया गया है, जो हिंदू धर्म के एक अनूठे ब्रांड का पालन करते हैं जिसे वे मुसलमानों से नफरत करने और विषाक्त मर्दानगी के पंथ का सम्मान करने के आधार पर हिंदुत्व कहते हैं।”
ये लेख हिंदू देवी-देवताओं को निशाना बनाने के लिए जानबूझकर ज़हरीली मर्दानगी के इस्तेमाल का उदाहरण देते हैं, जिसका उद्देश्य हिंदू राष्ट्रवाद या हिंदू मुद्दों के बारे में बोलने वाले किसी भी व्यक्ति को बदनाम करना है। यह हिंदू धर्म के इर्द-गिर्द बुने वोक कथानक के ताने बाने में फिट बैठता है, जो बताता है कि जब तक हिंदू अपने आस्था और विश्वास को निजी क्षेत्र तक सीमित रखते हैं, वे “अच्छे हिंदू” हैं। परंतु, जैसे ही वे हिंदू मुद्दों के बारे में अपनी चिंताएँ सार्वजनिक तौर पर उठाना शुरू करते हैं, उन्हें हिंसक “हिंदुत्व से नफरत करने वाले” के रूप में लेबल कर दिया जाता है। हिंदुओं को इस प्रकार से सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने की प्रवृत्ति का लक्ष्य हिंदू मुद्दों पर किसी भी चर्चा को दबाना और सदा के लिए हाशिये पर रखना है।
यह विमर्श रामायण और महाभारत जैसे हिंदू महाकाव्यों के विरूपण तक भी फैला हुआ है। हानिकारक दावों को फैलाने के लिए चुनिंदा घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सरलीकृत किया जाता है, जैसे कि भगवान राम को सीता पर भरोसा न करने के लिए एक स्त्री-द्वेषी के रूप में चित्रित करना या युधिष्ठिर को अपनी पत्नी को जुए में हारने के लिए अपमानित करना। हिंदू प्रतीकवाद की समझ की कमी वाला अब्राहमिक तंत्र इन कहानियों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है और उन्हें अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों के सामने प्रस्तुत करता है, एवं विकृत व्याख्याओं के माध्यम से हिंदुओं के ख़ुद के देवताओं के बारे में उनके विचारों को प्रभावित करता हैं।
निष्कर्ष
भारतीयों और हिंदुओं पर केंद्रित बहुत से औपनिवेशिक साहित्य में “हिंदू पुरुष” को लंबे, मज़बूत और रौबीले यानि आम तौर पर मर्दाना व्यक्तित्व और क़द काठी वाले पश्चिमी या श्वेत पुरुष की तुलना में कमज़ोर, ग़ैर मर्दाना और हीन व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है। यह कथानक उपनिवेशीकरण को सही ठहराने के प्रोजेक्ट का एक हिस्सा था, कि जिन लोगों पर शासन किया जा रहा है, उन्हें कमज़ोर, हीन, और अत्यंत दयनीय बनाकर प्रस्तुत करो ताकि उनके बारे में ऐसी छवि बन जाये कि ये निरीह प्राणी तो खुद के लिए निर्णय लेने में असमर्थ हैं और इसलिए इन्हें मर्दवादी औपनिवेशिक उद्यम के संरक्षण की आवश्यकता है।[29] विडंबना यह है कि, वोक मीडिया, एकेडेमिया और बौद्धिक संस्थान तंत्र जो हिंदू राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को सुविधाजनक रूप से अति-मर्दाना के रूप में लेबल करते हैं, ने कभी भी पूर्व औपनिवेशिक विषयों के इन समस्याग्रस्त प्रतिनिधित्वों की पूछताछ या आलोचना करने की आवश्यकता महसूस नहीं की।
हिंदू मुद्दों के प्रतिनिधित्व को खत्म करने और अंततः हिंदू धर्म के राक्षसीकरण की परियोजना को बड़े औपनिवेशिक आख्यान के एक हिस्से के रूप में देखा जा सकता है जो अभी भी एक समय पर पश्चिमी शासन के अधीन रहे लोगों द्वारा अपनी स्वतंत्र विचारधारा सामने रखने और आत्मविश्वास भरी शक्तिशाली छवि विकसित करने के विचार से सहज नहीं है।
संदर्भ
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[12] ‘Hindutva Feminism’ And Its Rhetoric of Hatred & Exclusion; https://feminisminindia.com/2018/07/11/hindutva-feminism-hatred-exclusion/
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[15] The curse of Brahmanical patriarchy; https://timesofindia.indiatimes.com/readersblog/blatheringovergreentea/the-curse-of-brahmanical-patriarchy-37102/#
[16] A call to ‘smash Brahmanical patriarchy’ is not hate speech – it’s progressive, anti-caste politics; https://scroll.in/article/902818/a-call-to-smash-brahmanical-patriarchy-is-not-hate-speech-it-s-progressive-anti-caste-politics
[17] Fighting An Endless Battle Against The Brahmanical Patriarchy While Being A Feminist | Feminism in India; https://feminisminindia.com/2024/09/18/fighting-an-endless-battle-against-the-brahmanical-patriarchy-while-being-a-feminist/
[18] Challenging The Brahmanical Patriarchy Isn’t A One-Woman Job; https://www.youthkiawaaz.com/2021/03/chosetochallengepatriarchy/
[19] How Brahmanical Patriarchy Can Directly Affect Community Mental Health – The Wire Science; https://science.thewire.in/health/how-the-brahmanical-patriarchy-can-directly-affect-community-mental-health/
[20] Understanding Brahminical Patriarchy and Why Smashing It Isn’t Bad | https://www.thequint.com/news/india/understanding-brahminical-patriarchy-why-smashing-it-isnt-bad
[21] The Brahmanical Nature of the Indian Patriarchy; https://www.youthkiawaaz.com/2023/03/the-brahmanical-nature-of-the-indian-patriarchy/
[22] What is Holi ( Holy) about this? Why would the Brahmanical-Patriarchal India celebrate the burning of Holika, an Asura Bahujan woman?; https://maktoobmedia.com/opinion/what-is-holi-holy-about-this-why-would-the-brahmanical-patriarchal-india-celebrate-the-burning-of-holika-an-asura-bahujan-woman/#:~:text=Holika%20sat%20with%20Prahlad%20on,victory%20of%20good%20over%20evil
[23] Opinion: “The Institution Of Marriage Is An Instrument Of Brahminical Patriarchy”; https://www.youthkiawaaz.com/2020/02/love-noir/
[24]Ibid.
[25] Opinion | Modi’s Hindu Utopia Is A Tawdry Mirage – The New York Times; https://www.nytimes.com/2024/04/18/opinion/india-election-modi-religion.html#
[26] Role of Indian-Origin Journalists in Spreading Biased Narratives against India – Hindu Dvesha; https://stophindudvesha.org/role-of-indian-origin-journalists-in-spreading-biased-narratives-against-india/
[27] Kancha Ilaiah Shepherd discusses violence, iconography and aesthetics in Hinduism; https://scroll.in/article/920722/kancha-ilaiah-shepherd-discusses-violence-iconography-and-aesthetics-in-hinduism
[28] Hindu gods Rama & Shiva have 6 packs now to kill bad guys, like US superheroes; https://theprint.in/opinion/hindu-gods-like-rama-shiva-have-six-packs-now-to-kill-bad-guys-like-american-superheroes/89072/
[29] Project MUSE – Effeminism; https://muse.jhu.edu/pub/166/oa_monograph/chapter/3629037
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