हिंदुत्व आखिर क्या है? हिन्दुत्व का वैचारिक सिद्धांत और आधुनिक विकृतियाँ

हिंदुत्व से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ, महत्वपूर्ण हस्तियों और सामान्य भ्रांतियों की समीक्षा
  • 1866 में सबसे पहले ऋषि राज नारायण बोस ने हिंदू पुनरुत्थानवाद और राष्ट्रवाद पर विचार दिए थे। इस विचार ने स्वामी दयानंद और बंकिम चंद्र जैसी हस्तियों को प्रेरित किया और फिर इन लोगों ने वार्षिक हिंदू मेले का आयोजन शुरू करवाया।
  • बंगाली विचारक चंद्रनाथ बसु ने पहली बार 1892 में इस शब्द का इस्तेमाल किया। उन्होंने अद्वैत वेदांत और हिंदुओं की अद्वितीय आध्यात्मिक चेतना की बात की।
  • लोकमान्य तिलक ने वेदों की प्रमाणिकता और आध्यात्मिकता के आधार पर हिंदुत्व को पारिभाषित करने का प्रयास किया। लेकिन, उन्हें हिंदू धर्म के भीतर विभिन्न मान्यताओं को इससे बाहर रखने के लिए आलोचना झेलनी पड़ी।
  • वीर सावरकर ने हिंदू धर्म और हिंदुत्व को अलग-अलग माना। उन्होंने सांस्कृतिक, भाषाई, सामाजिक और राजनीतिक आयामों पर जोर दिया, जिसका लक्ष्य दुनिया भर के हिंदुओं को एकजुट करना और उन्हें प्रेरित करना था।

हिंदुत्व आज के समय में हिंदुओं से संबंधित सबसे अधिक विवादास्पद शब्दों में से एक है। स्वयं को उदारवादी और प्रगतिशील कहने  वाला एक विशेष वर्ग हिंदुत्व को निंदनीय शब्द मानता है। ये लोग हिंदू-केंद्रित दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा के रूप में इसकी निंदा करते हैं। वे मानते हैं कि हिंदुत्व, कथित तौर पर अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देती है।

विकिपीडिया हिंदुत्व शब्द की व्याख्या इस प्रकार करता है[1]:

“हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है। यह हिंदू राष्ट्रवाद के लिए एक सांस्कृतिक आधार तैयार करती है और भारत को एक हिन्दू राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की बात करती है। यह राजनीतिक विचारधारा 1922 में विनायक दामोदर सावरकर द्वारा तैयार की गई थी। यह पूर्णत:, यूरोपीय फासीवाद (Fascism) से प्रेरित है। हिंदुत्व आंदोलन, दक्षिणपंथी चरमपंथ और फासीवाद का एक रूप है और यह हिन्दू बहुमत और हिन्दू सांस्कृतिक आधिपत्य की अवधारणा का पालन करता है। कुछ लोगों ने हिंदुत्व को एक अलगाववादी विचारधारा भी बताया है। कुछ विश्लेषक हिंदुत्व की पहचान फासीवाद से करने को ले कर अलग राय रखते हैं। वे कहते हैं कि हिंदुत्व रूढ़िवाद या जातीय-राष्ट्रवाद का एक चरम रूप है।“

वही विकिपीडिया इस्लामवाद के बारे में यह कहता है[2]:

“इस्लामवाद (इसे राजनीतिक इस्लाम भी कहा जाता है) एक धार्मिक-राजनीतिक विचारधारा है। इस्लामवाद के समर्थक, जिन्हें “अल-इस्लामियुन” के रूप में जाना जाता है, राज्य या समाज के लिए इस्लाम की अपनी वैचारिक व्याख्या करते हैं। उनमें से ज्यादातर इस्लामिक संस्थाओं या सामाजिक आंदोलनों से जुड़े हैं, जिन्हें “अल-हराकत अल-इस्लामियाह” कहा जाता है। ये इस्लामवादी लोग शरिया के क्रियान्वयन, अखिल इस्लामिक राजनीतिक एकता, इस्लामिक देशों के गठन और गैर-मुस्लिम प्रभावों को अस्वीकार करने पर जोर देते हैं। ख़ास कर ये लोग पश्चिमी आर्थिक, सैन्य, राजनीतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक प्रभाव को खारिज करते हैं। इस्लामवाद एक ऐसी विचारधारा की बात करता है, जो इस्लाम को उसका पुराना गौरव वापस दिला सके। इसे विदेशी प्रभावों से मुक्त करा सके और “सामाजिक-राजनीतिक-व्यक्तिगत जीवन” में इसकी भूमिका को फिर से महत्वपूर्ण बना सके। और सबसे अहमय बात यह कि “इस्लाम द्वारा निर्धारित कानूनों के अनुसार सरकार और समाज की “पुनर्व्यवस्था” की जा सके। सरल शब्दों में कहे तो शरिया क़ानून को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके।“

अब, इन दो अवधारणाओं को ध्यानपूर्वक देखिए कि कैसे इनके लिए अलग-अलग शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इस्लामवाद के नाम हिंसा और आतंकवाद का एक लंबा इतिहास है। फिर भी इसके पुराने गौरव को हासिल किए जाने की बात की जा रही है। जबकि हिंदुत्व का कभी कोई संगठित हिंसा का इतिहास नहीं रहा है। लेकिन, हिंदुत्व को सांस्कृतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए एक फासीवादी विचारधारा के रूप में दिखाया जाता है। तो, आइये ऐसे नफ़रत के माहौल में हम हिंदुत्व के इतिहास का पता लगाते हैं। हम उनकी खोज पर चलते हैं, जिनका हिंदुत्व के विकास में प्रमुख योगदान रहा है।

हिंदुत्व को आकार देने वाली महान विभूतियां

हिंदुत्व आंदोलन के दर्शन में योगदान देने वाले कई प्रमुख व्यक्तित्व हैं। इन में सबसे पहला नाम ऋषि राज नारायण बोस (1826-1899) [3] का हैं, जो एक प्रखर विचारक और लेखक थे। उनके बाद, स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883)[4] का नाम आता हैं, जो आर्य समाज के संस्थापक थे। स्वामी जी ने वेदों की ओर लौटने की सलाह दी, जो असल में एक सुधार आंदोलन था। स्वामी विवेकानंद (1863-1902)[5]  ने वेदांत और योग के भारतीय दर्शन को पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाई। लोकमान्य तिलक (1856-1920)[6] एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने भी हिंदुत्व दर्शन को प्रभावित किया। ऋषि राज नारायण बोस के नाना योगी अरबिंदो (1872-1950)[7] एक क्रांतिकारी, दार्शनिक और आध्यात्मिक गुरु थे। गणेश दामोदर (1879-1945)[8], जिन्हें बाबाराव सावरकर के नाम से भी जाना जाता है, एक क्रांतिकारी और हिंदुत्व के प्रमुख समर्थक थे। बाबाराव, वीर सावरकर (1883-1966) के बड़े भाई थे। गोलवलकर (1906-1973)[9] जी को गुरुजी के नाम से जाना जाता है और वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दूसरे प्रमुख और विश्व हिंदू परिषद के सह-संस्थापक थे। इन महान विभूतियों ने मिल कर हिंदुत्व के विकास और प्रचार में योगदान दिया। इनके हर आंदोलन का दृष्टिकोण अनूठा था। इन लोगों ने हिंदुत्व आंदोलन को एक सार्थक आकार दिया। लेकिन असल में उनमें से किसी ने भी “हिंदुत्व” शब्द नहीं गढ़ा। इसका श्रेय एक बंगाली विचारक और लेखक को जाता है। उनका नाम है, चंद्रनाथ बसु (1844-1910)[10]। उन्होंने पहली बार “हिंदुत्व” शब्द का इस्तेमाल अपनी किताब (बंगाली में) “हिंदुत्व: हिंदूर प्राकृत इतिहास” में किया था। यह किताब 1892 में लिखी गई थी। चंद्रनाथ बसु ने अद्वैत वेदांत विचारधारा का समर्थन किया। उनका मानना ​​था कि हिंदू आध्यात्मिक चेतना इसलिए भी पा सकते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि मानवता ही देवत्व का एक रूप है।

ऐतिहासिक संदर्भ और विकास

चंद्र बसु से बहुत पहले, 1866 में, ऋषि राज नारायण बोस आए, जो कोलकाता के एक स्कूल के प्रधानाध्यापक थे। उन्होंने भारतीय संदर्भ में हिंदू पुनरुत्थानवाद और हिंदू राष्ट्रवाद पर अपने विचार दिए। बसु एक प्रभावशाली विचारक थे, जिन्होंने स्वामी दयानंद और बंकिम चंद्र जैसे अन्य लोगों को प्रेरित किया। उन्होंने अपने पोते, योगी अरबिंदो और दो युवकों, नवगोपाल मित्रा[11] और रवींद्रनाथ टैगोर के भाई विजेंद्रनाथ टैगोर[12] को भी प्रभावित किया। उन्होंने 1867 में हिंदू मेला[13] की स्थापना की, जो 1880 तक हर साल आयोजित होने वाला एक कार्यक्रम था।

यह उस समय की बात है, जब भारत, ब्रिटेन का गुलाम था। अंग्रेजों इस विचार से भ्रमित थे कि भारत के हिंदुओं सहित “विधर्मियों” को भी सभ्य बनाना उनका कर्तव्य है। कल्पना कीजिए, ऐसे समय में राज नारायण बोस ने 1866 में ब्रिटिश भारत की राजधानी कोलकाता में एक भाषण दिया। इसमें उन्होंने अन्य धर्मों के मुकाबले हिंदू धर्म की श्रेष्ठता पर जोर दिया था। जरा सोचिये कि बोस के ऐसे भाषण से कितनी हलचल मची होगी?

अपने भाषण में, राज नारायण बोस ने 12 बिंदुओं पर बात रखी। उन्होंने बताया कि वे क्यों मानते हैं कि हिंदू धर्म अन्य धर्मों से श्रेष्ठ है। उन्होंने तर्क दिया कि हिंदू धर्म का नाम किसी एक व्यक्ति के नाम पर नहीं है। इसमें ईश्वर और इंसान के बीच कोई मध्यस्थ नहीं है। हिंदू हर समय ईश्वर की पूजा करते हैं, चाहे व्यापार कर रहे हो या आनंद का क्षण हो। वे ईश्वर की खातिर ईश्वर की पूजा करते हैं, पुण्य के लिए पुण्य करते हैं, न कि किसी काल्पनिक स्वर्ग सुख के लालच में। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू धर्म पूरी दुनिया की भलाई चाहता है। यह गैर-सांप्रदायिक, गैर-धर्मांतरणकारी और सहिष्णु है। इसका इतिहास प्राचीन काल से चला आ रहा है।

हिंदू को पारिभाषित करने का एक और महत्वपूर्ण प्रयास लोकमान्य तिलक ने किया। उन्होंने संस्कृत भाषा में छह पंक्तियों में एक परिभाषा तैयार की। लेकिन ये पंक्तियाँ एक साथ नहीं लिखी गईं। पहली दो पंक्तियाँ 1900 में एक ब्रिटिश उत्सव में दिए गए उनके भाषण का हिस्सा थीं। इस भाषण में, उन्होंने तीन प्रमुख विशेषताओं के आधार पर हिंदू धर्म को परिभाषित किया: वेदों की प्रमाणिकता, आध्यात्मिकता के लिए विभिन्न मार्गों की स्वीकृति और किसी एक पूजा पद्धति पर जोर न देना।

1915 में, तिलक ने एक पत्रिका में चार और पंक्तियाँ जोड़ीं। इसमें हिंदू शब्द का और अधिक वर्णन किया गया। उन्होंने कहा कि हिंदू वह व्यक्ति है जो पिछली पंक्तियों में परिभाषित धर्म को स्वीकार करता है। श्रुति, स्मृति और पुराणों के अनुसार अनुष्ठान करता है। आस्था और भक्ति के साथ कार्य करता है। शास्त्रों द्वारा निर्धारित आचरण का पालन करता है।

तिलक के अनुसार,  सनातन धर्म हिंदू शब्द का निर्माण करता है। हालाँकि, तिलक की परिभाषा में एक महत्वपूर्ण दोष था। वह यह कि यह हिंदू धर्म के भीतर विश्वासों की विविधता का ध्यान नहीं रख सका। वेदों की प्रमाणिकता पर जोर देकर, उन्होंने कई समुदायों को बाहर रखा, जिन्हें हिंदू धर्म का हिस्सा माना जाता है।  जैसे, जैन, बौद्ध और लिंगायत। लेकिन ये लोग वेदों को अंतिम नहीं मानते।

कई प्रमुख हस्तियों ने हिंदुत्व दर्शन को बढाने में योगदान दिया है। लेकिन, केवल तीन ने इस विषय पर महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। हम एक महत्वपूर्ण व्यक्ति पर ध्यान केंद्रित करेंगे। लेकिन अन्य का भी संक्षेप में उल्लेख करेंगे। बाबाराव सावरकर (गणेश दामोदर सावरकर) ने 1934 में “राष्ट्र मीमांसा” [14] नामक एक मराठी पुस्तक लिखी। इसका अर्थ है “राष्ट्र का स्पष्टीकरण।” 78 पन्नों की इस पुस्तक ने कई लोगों को प्रभावित किया, जिनमें एम.एस. गोलवलकर (गुरुजी) भी शामिल थे। गुरूजी ने 1939 में इसे संक्षिप्त करके “वी और आवर नेशनहुड डिफाइंड’ नाम से इसका अनुवाद किया।[15] गोलवलकर की पुस्तक न केवल राष्ट्र मीमांसा का अनुवाद है, बल्कि इसमें उनके अपने विचार भी शामिल हैं।

वीर सावरकर

अब हम हिंदुत्व के विकास में योगादान देने वाले एक महत्वपूर्ण व्यक्ति, वीर सावरकर पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उनके लेखन और विचारों ने हिंदुत्व विचारधारा को मजबूत बनाया। सावरकर के प्रभाव की जाँच करने से हिंदुत्व की जटिल प्रकृति, ऐतिहासिक संदर्भ और समकालीन भारतीय समाज पर इसके प्रभाव के बारे में गहरी जानकारी मिलती है।

हालाँकि सावरकर का साहित्यिक कार्य 10,000 से अधिक पन्नों का है, लेकिन उनका प्रमुख लेखन तीन पुस्तकों में ही पाए जा सकते हैं। पहली और सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक, “हिंदुत्व” [16] है, जो ऑनलाइन उपलब्ध है। इसके पढ़ने की सबसे ज्यादा सलाह दी जाती है। दूसरी पुस्तक, “हिंदू राष्ट्र दर्शन,”[17] 1937 से 1942 तक हिंदू महासभा सत्रों में उनके छह अध्यक्षीय भाषणों का संग्रह है। तीसरी पुस्तक “हिंदुत्वचे पंच प्राण” नाम की एक मराठी कृति है। यह पहली दो पुस्तकों में उठाए गए बिंदुओं को शामिल करती है। “हिंदू कौन है?” के सवाल के साथ सावरकर का प्रभाव तब शुरू हुआ जब वे 1906 और 1910 के बीच लंदन में क्रांति का बिगुल बजा रहे थे। अंडमान के सेलुलर जेल में अपने कारावास के दौरान ही उन्होंने इस सवाल पर महत्वपूर्ण ऊर्जा और विचार खर्च किया। वहाँ वे साथी राजनीतिक कैदियों के साथ चर्चा में शामिल रहते थे। बाद में, जेल से रिहा होने के बाद, महाराष्ट्र की रत्नागिरी जेल में उन्होंने गुप्त रूप से “मराठा”  छद्म नाम से अपनी पुस्तक “हिंदुत्व” लिखी। पुस्तक का पहला संस्करण मई 1923 में प्रकाशित हुआ था।

“हिंदुत्व” शब्द एक मौलिक रचना है। इसे लिखे जाने के लगभग 100 साल बाद भी यह समकालीन हिंदू आंदोलन का बौद्धिक आधार बनी हुई है। सावरकर, महान लेखक शेक्सपियर को कोट करते हुए पुस्तक की शुरुआत करते हैं, “नाम में क्या रखा है?” उनका तर्क है कि नाम महत्वपूर्ण होते हैं और उन्हें मनमाने ढंग से नहीं बदला जा सकता। उदाहरण के लिए, अयोध्या को होनोलुलु नहीं कहा जा सकता और जॉर्ज वाशिंगटन को चंगेज खान नहीं कहा जा सकता। इसी तरह, हिंदुत्व नाम का भी गहरा अर्थ और महत्व है। यही वजह है कि कई लोगों ने इसकी रक्षा के लिए संघर्ष किया है।

सावरकर, जो एक अच्छे बैरिस्टर भी थे, सटीक भाषा के महत्व पर जोर देते हैं। उन्होंने कहा, “शब्दों में भ्रम विचारों में भ्रम पैदा करता है।” इसलिए, वे दो शब्दों के बीच अंतर करते हैं: हिंदू और हिंदुत्व। उनके अनुसार, हिंदू धर्म आध्यात्मिक या धार्मिक प्रणालियों पर आधारित एक सिद्धांत है। यह आध्यात्मिक परंपराओं और संप्रदायों के लिए एक सामूहिक शब्द है, जो भारत  को अपनी पितृभूमि और पवित्र भूमि (पुण्यभूमि) मानते हैं। हालाँकि, हिंदुत्व का अर्थ और भी व्यापक है। हिंदू धर्म भी व्यापक है, फिर भी यह हिंदुत्व का एक उपसमूह है। हिंदुत्व में न केवल हिंदू लोगों के धार्मिक पहलू शामिल हैं, बल्कि उनके सांस्कृतिक, भाषाई, सामाजिक और राजनीतिक आयाम भी शामिल हैं। यह हिंदू राजनीति के समान है। अगर कोई इसका अंग्रेजी में अनुवाद करे, तो सबसे करीबी शब्द “हिंदूनेस” होगा, जो हिंदू होने के सार को दर्शाता है।

वैश्विक हिंदू प्रवासी को संबोधित करते हुए, सावरकर ने सामूहिक हिंदू दुनिया को “हिंदू धर्म” कहा। उन्होंने एक एकीकृत हिंदू समुदाय की कल्पना की। यह हिंदुत्व की भावना और सिद्धांतों को मूर्त रूप देता है। हिंदू और हिंदुत्व के बीच सावरकर के अंतर को समझने से हमें सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत में शामिल एकीकृत हिंदू पहचान से जुड़े उनके दृष्टिकोण कोई समझना होगा।

हिंदू पहचान पर सावरकर

सावरकर ने जोर देकर कहा कि “हिंदू” शब्द विदेशी मूल का नहीं है। आम धारणा है कि यह हमें अरबों या फारसियों द्वारा दिया गया था। वह बताते हैं कि हमारे पूर्वजों की सभ्यता सात नदियों के किनारे पनपी, जिन्हें सप्तसिंधु के नाम से जाना जाता है। इन नदियों में से, सिंधु नदी साझा राष्ट्रीयता और संस्कृति का एक प्रमुख प्रतीक थी। विशेष रूप से सिंधु के प्रति कृतज्ञता जाहिर करते हुए सावरकर कहते हैं कि हमारे पूर्वजों ने अपने राष्ट्र और लोगों का नाम इसके नाम पर रखा।

सावरकर कुछ भाषाई नियमों की ओर इशारा करते हैं: प्राकृत भाषा में “सह” शब्द “हा” बन जाता है। उदाहरण के लिए, “सप्ताह” शब्द “हप्ताह” बन जाता है। इसी तरह, “सिंधु” शब्द “हिंदू” बन गया। उनका तर्क है कि अगर प्राकृत पुरानी है, तो “हिंदू” शब्द “सिंधु” से पुराना शब्द हो सकता है। फारसियों समेत अन्य राष्ट्रों ने हमें हिंदू कहा, यूनानियों ने हमें इंडोस कहा और चीनी लोगों ने हमें इंदु कहा। इसलिए, “हिंदू” सांस्कृतिक अर्थों के साथ एक भौगोलिक अवधारणा है।

सावरकर के अनुसार, किसी व्यक्ति को हिंदू के रूप में परिभाषित करने के दो मानदंड हैं। पहला, हिंदू वह व्यक्ति है जिसकी उत्पत्ति सिंधु नदी से लेकर समुद्र तक फैली भूमि से हुई हो। दूसरा, एक हिंदू इस भूमि को अपनी पवित्र भूमि मानता है और उसने अपने इतिहास, नायकों, साहित्य, कला, कानून, त्योहारों, संस्कारों और अनुष्ठानों के साथ हिंदू सभ्यता को विरासत में पाया है।

सावरकर ने इस परिभाषा को संस्कृत के एक श्लोक में खूबसूरती से प्रस्तुत किया है, जिसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि जो कोई भी इस भूमि को अपनी जन्मभूमि और पवित्र भूमि मानता है, वह हिंदू है। वह इस बात पर जोर देते हैं कि हिंदुत्व की परिभाषा में लोगों के किसी भी महत्वपूर्ण वर्ग को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए, हिंदुत्व में केवल वेदों का पालन करने वाले ही नहीं बल्कि जैन, बौद्ध, सिख, आर्य समाजी, वैष्णव, शैव, लिंगायत और यहां तक ​​कि तथाकथित एनिमिस्ट (जीववाद) भी शामिल हैं।

सावरकर हिंदू शब्द के दुरुपयोग के भी खिलाफ हैं। उनका कहना है कि परिभाषा सत्य हो और यह बहुत कठोर या बहुत लचीली नहीं होनी चाहिए। वह स्वीकार करते हैं कि कुछ भारतीय, जो मूल रूप से हिंदू हैं, को जबरन गैर-हिंदू धर्मों में परिवर्तित कर दिया गया है। उनका सुझाव है कि अगर वे अपने मूल धर्म में लौटते हैं तो उन्हें फिर से हिंदू माना जा सकता है। लेकिन तब तक उन्हें हिंदू के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती, क्योंकि उनके नए धर्मों में उनकी पितृभूमि से ज़्यादा अन्य पवित्र भूमि को प्राथमिकता दी जाती है।

हिंदू प्रवासियों के बारे में सावरकर कहते हैं कि भारत से बाहर रहना किसी को हिंदू होने से वंचित नहीं करता। वे हिंदुओं को प्रोत्साहित करते हैं कि वे जहाँ भी रहें, मानवता के लिए सकारात्मक योगदान दें। वे कहते हैं कि हिंदुत्व उनकी आकांक्षाओं को सीमित नहीं करता, बल्कि उन्हें वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। सावरकर मानते हैं कि हिंदुत्व की उनकी परिभाषा बहुत कठोर नहीं हो सकती, लेकिन इसकी कुछ सीमाएँ होनी चाहिए। वे मानते हैं कि कुछ अपवाद भी हैं, जैसे कि सिस्टर निवेदिता और डॉ. एनी बेसेंट, जो उनकी सख्त परिभाषा में फिट नहीं बैठतीं, लेकिन फिर भी उन्हें हिंदू माना जाता है।

इस सब के बाद भी, सावरकर सबसे पहले एक महत्वपूर्ण मानवतावादी थे। वे अपनी मौलिक पुस्तक को एक उम्मीद भरे संदेश के साथ समाप्त करते हैं कि हिंदुत्व अंततः मानवतावाद में विलीन हो जाएगा। वे एक ऐसे भविष्य की कल्पना करते हैं जहाँ गीता के सिद्धांत और बुद्ध की शिक्षाएँ दुनिया का मार्गदर्शन करें। सावरकर का मानना ​​है कि एक हिंदू सबसे सच्चा हिंदू तब होता है जब वह सार्वभौमिक मानवतावाद को अपनाता है। वे महाराष्ट्र के संत तुकाराम का हवाला देते हैं, जिन्होंने कहा था, “ब्रह्मांड की सीमाएँ मेरे देश की सीमाएँ हैं।”

यह सावरकर की अंतर्दृष्टि का प्रमाण है कि भारतीय संविधान, हिंदू को स्पष्ट रूप से परिभाषित न करते हुए भी, सावरकर की परिभाषा को स्वीकार करता है। उनकी समावेशी परिभाषा ने अमेरिका के विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों को प्रभावित किया है, जो इसका उपयोग सदस्यों को स्वीकार करने के लिए करते हैं।

संक्षेप में, हिंदुत्व पर सावरकर का काम हिंदू होने का क्या अर्थ है, इसकी एक व्यापक और सटीक परिभाषा प्रदान करता है। वह हिंदू पहचान के सांस्कृतिक, भौगोलिक और आध्यात्मिक आयामों पर जोर देते हैं। यह व्यापक हिंदू सभ्यता के भीतर विभिन्न संप्रदायों और विश्वासों को शामिल करता है। उनका दृष्टिकोण न केवल हिंदुत्व को परिभाषित करना था, बल्कि साझा विरासत और सामान्य उद्देश्य की भावना को बढ़ावा देते हुए वैश्विक स्तर पर हिंदुओं को एकजुट और प्रेरित करना था।

डॉ. केबी हेडगेवार, गुरु जी (एमएस गोलवलकर) और आरएसएस

डॉ. हेडगेवार[18] एक क्रांतिकारी, कांग्रेस कार्यकर्ता और जेल जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने माना कि मुख्यधारा का हिंदू समाज खंडित था। ऐतिहासिक रूप से भूलने की बीमारी से पीड़ित था और विदेशी शर्तों और आंतरिक सांप्रदायिक रेखाओं पर आधारित संघर्षों में उलझा हुआ था। 1925 में, उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की। यह हिंदू समाज के भीतर विभाजनों को हटाने के लिए सबसे बड़ा आंदोलन था। उन्होंने इस बात पर ध्यान केंद्रित नहीं किया कि हिंदू कौन है। जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने अक्सर इस सवाल को खारिज कर दिया, और हमेशा एकता पर जोर दिया।

सावरकर की हिंदुत्व की परिभाषा, विशुद्ध रूप से धार्मिक न हो कर सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं को शामिल करती है। डॉ. हेडगेवार ने हिंदुत्व को राष्ट्रत्व के रूप में देखा। यह अवधारणा राष्ट्रवाद की पश्चिमी धारणाओं से नहीं बल्कि वेदों से उत्पन्न हुई है, जिसमें अक्सर राष्ट्र, सभा (विधानसभा), समिति (परिषद) और जनपद (क्षेत्र) जैसे शब्दों का उपयोग किया जाता है।

हेडगेवार के उत्तराधिकारी, गुरुजी (एमएस गोलवलकर)[19] ने इसी विजन को आगे बढ़ाया। 1957 में, विभाजन की त्रासदी के बाद, गुरुजी ने घरवापसी की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने हिंदू धर्म छोड़ने वालों से वापस लौटने का आग्रह किया। उनका मानना ​​​​था कि धर्म परिवर्तन लोगों को उनकी जड़ों और परंपराओं से अलग कर देता है, जिससे भारतीय संस्कृति और राष्ट्र के बीच एक अलगाव पैदा होता है। गुरुजी ने हिंदुत्व की अवधारणा का विस्तार किया। 1972 में, अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले, उन्होंने एक ऐसा विजन दिया, जिसमें हमारे पूर्वजों, इतिहास और सांस्कृतिक जड़ों वाले लोगों का स्वागत किया गया। भले ही उनका मौजूदा धर्म जो भी हो। उन्होंने मुसलमानों और अल्पसंख्यकों की भारतीयता पर जोर दिया। उन्होंने धार्मिक समानता की जगह विरासत के आधार पर एकता बढाने पर जोर दिया।

उनका समावेशी दृष्टिकोण वैदिक विचार से उत्पन्न सभी स्वदेशी धर्मों तक फैला हुआ था। इसमें सुझाव दिया गया था कि उन्हें मुख्यधारा के हिंदू समाज में एकीकृत किया जाना चाहिए और उनके लिए मंदिर खोले जाने चाहिए। गुरुजी ने घरवापसी का समर्थन जारी रखा, इस विचार को मजबूत किया कि धर्म और रिलिजन अलग-अलग हैं। धर्म समाज, परिवार और व्यक्तियों को बनाए रखता है, जबकि रिलीजन ऐसा नहीं करता।

हिंदुत्व का धार्मिक आधार

हिंदुत्व के पुराधाओं ने हमेशा धर्म और religion (पंथ) के बीच अंतर पर जोर दिया। संस्कृत के “धृ” धातु से उत्पन धर्म का अर्थ है “वह जो बनाए रखता है”। यह सामाजिक व्यवस्था, पारिवारिक संरचना और व्यक्तिगत आचरण को बनाए रखने वाले सिद्धांत है।

भारत का सर्वोच्च न्यायालय हिंदुत्व को जीवन शैली के रूप में परिभाषित करता है। इसी बात को स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रसिद्ध शिकागो संबोधन में “सत्य एक है, बुद्धिमान इसे कई नामों से पुकारते हैं” के रूप में कहा था। यह सिद्धांत केवल सहिष्णुता से परे सभी धर्मों के प्रति सम्मान पर जोर देता है। हिंदू विचारधारा के मुख्य सिद्धांतों में कर्म शामिल है। कर्म इस बात पर जोर देता है कि हमारे कर्म ही हमारे भाग्य का निर्धारण करते हैं, जो बाहरी न्याय विचार को खारिज करता है। पुनर्जन्म की अवधारणा भी कर्म पर आधारित है और सभी वैदिक परंपराओं में समान है।

हिंदू प्रकृति का सम्मान करते हैं और उसकी पूजा करते हैं। ऐसा वे अंधविश्वास के कारण नहीं, बल्कि इस समझ के कारण करते हैं कि सारा जीवन सूर्य जैसी प्राकृतिक शक्तियों पर निर्भर है। मुक्ति, निर्वाण और शून्य जैसी अवधारणाएँ भारतीय परंपराओं के मूल में है। चाहे कोई आस्तिक हो या नास्तिक, साकार रूप या निराकार में विश्वास करता हो, सभी को हिंदू माना जाता है। एक ईश्वर या एकमात्र सही मार्ग की धारणा भारतीय दर्शन के लिए अलग है।

वैदिक, इंडिक, भारतीय, सनातनी और हिंदुत्व जैसे शब्द एक दूसरे के स्थान पर प्रयोग किए जा सकते हैं, जो एक एकीकृत विश्वदृष्टि को दर्शाते हैं। सभ्यतागत मूल्यों में निहित हिंदू धर्म की अवधारणा धार्मिक या आध्यात्मिक मूल्यों से परे कई तत्वों को समाहित करता है। उदाहरण के लिए, हिंदू अपने कार्यस्थल का बहुत सम्मान करते हैं। अक्सर कोई नया उद्यम शुरू करने से पहले भूमि पूजा करते हैं। यह प्रथा, महज अंधविश्वास न होकर, प्रकृति के प्रति ऋण चुकाने जैसा है। किसान हल चलाने से पहले धरती की पूजा करते हैं, इसे जीवन का स्रोत मानते हैं। इसी तरह, कलाकार भी मंच को श्रद्धापूर्वक छूते हैं, इसे एक पवित्र स्थान के रूप में पहचानते हैं, जहाँ वे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते है।

पुण्य कार्य के रूप में मुफ्त पानी उपलब्ध कराने का विचार एक अनूठी भारतीय प्रथा है। आज भी, दूरदराज के गांवों में, लोग पैसे की अपेक्षा किए बिना आगंतुकों को भोजन और पानी देते हैं, जो भारतीय संस्कृति के लिए कर्तव्य और सेवा की भावना को दर्शाता है।

कर्तव्य की यह भावना “ऋण” और “धर्म” की अवधारणाओं में निहित है। भारतीय विभिन्न ऋणों की बात करते हैं: पितृऋण (पूर्वजों का ऋण), मातृऋण (माँ का ऋण), गुरुऋण (शिक्षक का ऋण), और सामाजिक ऋण। यह संस्कृति अधिकारों से अधिक कर्तव्यों पर जोर देती है, जो धार्मिक परंपराओं में गहराई से समाई हुई है।

इन प्रथाओं को देख कर हम समझ सकते है कि “हिंदू राष्ट्र” एक धार्मिक अवधारणा नहीं है। धर्म स्वयं धार्मिक नहीं है। यह कर्तव्यों और नैतिक दिशानिर्देशों का एक समूह है। प्राचीन भारतीय शासन में, राजा “राज धर्म” का पालन करते थे, जबकि प्रजा अपने-अपने धर्मों का पालन करती थी। हिंदुत्व की सुंदरता इसके सभ्यतागत मूल्यों में निहित है, जो विशुद्ध रूप से धार्मिक सिद्धांतों तक सीमित न हो कर सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक सिद्धांतों का एक विस्तार है।

यह विविध परंपराओं, प्रथाओं और दर्शन को एकीकृत करता है। यह भारतीय सभ्यता के समग्र सार को दर्शाता है। यह समावेशिता एक साझा सांस्कृतिक विरासत बनाती है, जो धार्मिक सीमाओं को पार करती है। यह विभिन्न मान्यताओं के लोगों के बीच एकता को बढ़ावा देती है और उनकी विशिष्ट पहचान को संरक्षित करती है। जो लोग इन सभ्यतागत मूल्यों में विश्वास करते हैं, चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में रहे,  उन्हें हिंदू माना जा सकता है।

 निष्कर्ष

हिंदुत्व की अक्सर हिंदू-केंद्रित दक्षिणपंथी विचारधारा के रूप में आलोचना की जाती है। माना जाता है कि हिंदुत्व अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देती है। यह लेख हिंदुत्व की अवधारणा को इसके निर्माताओं के दृष्टिकोण को सामने लाने का प्रयास करता है। साथ ही, यह एक बेहतर समझ के लिए इतिहास और प्रमुख व्यक्तियों की खोज करता है। ऋषि राज नारायण बोस, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और लोकमान्य तिलक जैसी प्रमुख हस्तियों ने हिंदू पहचान के सांस्कृतिक और सामाजिक आयामों पर जोर देकर हिंदुत्व के दर्शन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विनायक दामोदर सावरकर की मौलिक रचना, “हिंदुत्व” एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है, जिसमें धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषाई, सामाजिक और राजनीतिक पहलू शामिल हैं।

डॉ. हेडगेवार ने हिंदू समाज के विखंडन को रोका। इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की। उनके उत्तराधिकारी, एमएस गोलवलकर (गुरुजी) ने हिंदुत्व के समावेशी दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया। इन विचारकों ने हिंदुत्व को विशुद्ध धार्मिक सिद्धांतों के बजाय सभ्यतागत मूल्यों में निहित माना। धर्म के नाम पर कर्तव्य पर जोर दिया। यह उन सिद्धांतों को दर्शाता है जो सामाजिक व्यवस्था, परिवार और व्यक्तिगत आचरण को बनाए रखते हैं। हिंदुत्व विविध परंपराओं को एकीकृत करता है, विभिन्न मान्यताओं के लोगों के बीच एकता को बढ़ावा देता है और उनकी विशिष्ट पहचान को संरक्षित करता है।

Citations

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[19] MS Golwalkar, the RSS chief who remains ‘Guruji’ to some, a ‘bigot’ to others (theprint.in); https://theprint.in/theprint-profile/ms-golwalkar-the-rss-chief-who-remains-guruji-to-some-a-bigot-to-others/245534/

Dr. Jai G. Bansal
Dr. Jai G. Bansal
Dr. Jai Bansal is a retired scientist, currently serving as the VP Education for the Vishwa Hindu Parishad America (VHPA)
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