गाज़ा से कश्मीर तक: संयुक्त राष्ट्र का ‘आतंक पर मौन’ और नैतिक पाखंड
- पहलगाम से लेकर गाज़ा तक, संयुक्त राष्ट्र का रवैया ऐसा लगता है जैसे वह वामपंथी, तथाकथित उदारवादी और इस्लामिक चरमपंथी सोच के असर में काम कर रहा हो — जहाँ आतंकवाद के प्रति नरमी दिखाना और आतंकियों को सही ठहराना ही नैतिकता माना जाता है।
- आतंकवाद पर संयुक्त राष्ट्र की कमजोर और पक्षपाती नीति ने पाकिस्तान को बार-बार दुनिया के सामने खुद को ‘पीड़ित’ दिखाने का आसान मौका दे दिया है।
- पाकिस्तान अब आतंकवाद को लेकर एक नया विमर्श गढ़ने में जुटा है, जिसमें वह खुद को आतंकवाद का शिकार दिखाता है और भारत पर “आतंकी राज्य” का ठप्पा लगाने की कोशिश करता है।
- हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने UNGA में यह तक कह दिया कि “भारत का हिंदुत्व-प्रेरित उग्रवाद” पूरी दुनिया के लिए ख़तरा है।”
- हमास आतंकवाद पर संयुक्त राष्ट्र की आधी-अधूरी प्रतिक्रिया और उसका एकतरफ़ा नैतिक दिखावा, उस पूरी व्यवस्था को बढ़ावा दे रहा है जो आतंकवाद को छिपाने और सच्चाई को तोड़-मरोड़कर पेश करने का काम करती है।
जॉर्ज ऑरवेल की पुस्तक Animal Farm की मशहूर पंक्ति—“सभी जानवर बराबर हैं, लेकिन कुछ जानवर दूसरों से ज़्यादा बराबर हैं”—आज की वैश्विक व्यवस्था की पाखंड भरी सच्चाई को बखूबी बयान करती है। इस नैतिक पतन के केंद्र में है संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) । यह एक ऐसी संस्था है जो खुद को नैतिकता के सबसे बड़े प्रहरी के रूप में दिखाता है, लेकिन असल में अपने पक्षपातपूर्ण और दोगुले रवैये के लिए ज़्यादा जाना जाता है। जब बात अन्याय की निंदा करने की और न्यायिक सिद्धांतों के तहत पीड़ितों के पक्ष में आवाज़ उठाने की आती है, तो संयुक्त राष्ट्र अक्सर एक चुनिंदा नैरेटिव को आगे बढ़ाता देखा गया है।
जब गाज़ा संकट की बात आती है तो वह तुरंत इज़रायल को कठघरे में खड़ा कर देता है, लेकिन आतंकवाद को लेकर हमास की जवाबदेही पर चुप्पी साध लेता है। संयुक्त राष्ट्र का यही दोगुलापन भारत के प्रति उसके रवैये में भी साफ़ झलकता है—पाकिस्तान पर सैन्य कार्यवाही करने के बाद उसे “संयम” बरतने की सलाह दी जाती है, जबकि वही संयुक्त राष्ट्र संघ भारत में आतंकवाद फैलाने में पाकिस्तान की दशकों पुरानी भूमिका पर चुप्पी साध लेता है। संयुक्त राष्ट्र भारत को तो संयम बरतने की खूब नसीहत देता है, लेकिन पाकिस्तान को उसकी आतंकवाद फैक्ट्री पर अंकुश लगाने का अल्टीमेटम नहीं देता।
जून 2025 में, पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र की तालिबान प्रतिबंध समिति (Sanctions Committee) का अध्यक्ष और आतंकवाद-रोधी समिति (Counter-Terrorism Committee) का उपाध्यक्ष बना दिया गया। यानी एक ऐसे देश को वैश्विक आतंकवाद रोकने की ज़िम्मेदारी सौंप दी गयी, जो ख़ुद लंबे समय से आतंकी नेटवर्क को पालने-पोसने के लिए कुख्यात है। अगर आतंकवाद के सबसे बड़े समर्थक को ही आतंक खत्म करने की जिम्मेदारी दे दी जाए, तो उससे बढ़कर मज़ाक और क्या होगा? “रोटेशनल प्रक्रिया” के नाम पर लिया गया यह फैसला यह दर्शाता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ जैसा संस्थान ज़मीनी हक़ीक़तों से किस कदर अपना नाता तोड़ चुका है। एक ऐसा देश जो आतंकवादियों को शरण देने के लिए जाना जाता है, वह अब पूरी दुनिया को आतंक-विरोधी नीति पर उपदेश देगा—इससे बड़ा विरोधाभास भला क्या हो सकता है?
ऐसी नियुक्तियाँ यह भी दिखाती हैं कि संयुक्त राष्ट्र का रोज़मर्रा का संचालन अब मात्र एक औपचारिक रस्म-अदायगी बन के रह गया है। जो संस्था कभी शांति की रक्षक कही जाती थी, वही आज नौकरशाही के बोझ तले अपने मूल उद्देश्य से पूरी तरह से भटक गई है। वैश्विक न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बने इस संगठन ने नैतिकता के मूलभूत सिद्धांतों को पूरी तरह से ताक पर रख दिया है। आतंकवाद से लड़ने के वैश्विक अभियान की अगुवाई करने वाला संगठन अगर एक आतंक-समर्थक देश को ही यह ज़िम्मेदारी सौंप दे, तो यह कदम संस्थागत आत्मघात से कम नहीं।
किसी विडंबना से कम नहीं कि भारत जब आतंक के खिलाफ़ ऑपरेशन सिंदूर चला रहा था, तब संयुक्त राष्ट्र ने उसी वक्त पाकिस्तान को पुरस्कार की तरह प्रतिष्ठा और वैधता सौंप दी। ये मामला सिर्फ लापरवाही या अनदेखी का नहीं है। चाहे बात गाज़ा की हो, कश्मीर की या बांग्लादेश की, ये रवैया एक गहरे वैचारिक झुकाव को दिखाता है — ऐसा झुकाव जो वामपंथी और इस्लामिक सोच के साथ मेल खाता है। जहाँ कभी आतंकवाद को सही ठहराने की कोशिश की जाती है, तो कभी उसे ‘प्रतिरोध’ कहकर गौरवपूर्ण बना दिया जाता है। पहलगाम से लेकर गाज़ा तक, संयुक्त राष्ट्र अब न्याय का मंच कम और पक्षपात का मंच ज़्यादा लगने लगा है। ‘मानवाधिकार’ और ‘निष्पक्षता’ के नाम पर वहाँ सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है, जबकि असली अपराधियों को बचा लिया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र को ढाल बनाकर आतंक पर कहानी पलटने की कोशिश में पाकिस्तान
आतंकवाद पर संयुक्त राष्ट्र संघ का रवैया और उसका पूर्वाग्रह-युक्त ढाँचा, पाकिस्तान जैसे देशों को ख़ुद के पीड़ित के रूप में चित्रित कर आतंकवाद की लीपापोती करने का मौका देता है। भारत ने पहलगाम आतंकी हमले में टीआरएफ (The Resistance Front), जो लश्कर-ए-तैयबा की शाखा है, की भूमिका के ठोस सबूत संयुक्त राष्ट्र संघ को सौंपे हैं।[1] [2] फिर भी, संयुक्त राष्ट्र भारत और पाकिस्तान को एक ही तराजू में तोलता है। ऑपरेशन सिंदूर को वह ‘भारत-पाक संघर्ष’ की नजर से देखता है। ऊपर से आतंकवाद की निंदा तो करता है, लेकिन उसे साफ़-साफ़ परिभाषित करने से बचता है। जब बात ऑपरेशन सिंदूर की आती है, तो संयुक्त राष्ट्र यह मानने से कतराता है कि भारत पिछले कई दशकों से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का शिकार रहा है, और उसे उसका वैध जवाब देने का पूरा अधिकार है।
संयुक्त राष्ट्र की यह दुविधापूर्ण और “चयनात्मक निष्पक्षता” वाली नीति पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर “बेचारा” बनने का अवसर देती है। पाकिस्तान खुलेआम पहले पहलगाम हमले में अपनी भूमिका से इनकार करता है,[3] और फिर उल्टा भारत पर ही यह आरोप लगाता है कि उसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के नागरिकों को निशाना बनाया।[4] पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा भी इस झूठे विमर्श को हवा देता है, जिससे पाकिस्तान को फेक न्यूज़ फैलाने का और भी ज़्यादा हौसला मिलता है।[5]
और तो और, पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र संघ में साँठ-गाँठ करके पहलगाम आतंकी हमलों पर जारी किए गए सुरक्षा परिषद (UNSC) के बयान से The Resistance Front (TRF) का नाम ही हटवा लिया गया।[6] संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने हमलों की “कड़े शब्दों में” निंदा करते हुए कहा कि “आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है।” लेकिन बयान में न तो TRF का नाम था, और न ही उस सीमा-पार आतंकवाद का ज़िक्र, जिसे भारत दशकों से झेल रहा है।[7]
पहलगाम हमलों पर जारी किया गया UNSC प्रेस वक्तव्य मामले की गंभीरता को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर मात्र एक औपचारिक ख़ानापूर्ति करता प्रतीत होता है। यह रवैया दरअसल एक गहरी विकृति को दर्शाता है: वैश्विक आतंकवाद की जड़ों, उसे बढ़ावा देने वाले देशों, और चरमपंथी विचारधाराओं पर घोर चुप्पी। संयुक्त राष्ट्र अब आतंक की निंदा करते हुए सिर्फ शब्दों का खेल खेलता नज़र आता है — उसके बयान सख्त तो लगते हैं, लेकिन उनमें कोई असर नहीं होता। इस गोलमोल भाषा के ज़रिए अपराधियों को लगभग पूर्ण छूट मिल जाती है, और आतंकवाद की लीपापोती करने के लिए एक सुरक्षित मंच तैयार हो जाता है।
पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अंतरराष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल अपने झूठे नैरेटिव को बार-बार दोहराने के लिए करता रहा है। बलूच विद्रोह को लेकर वह लगातार भारत पर आरोप लगाता रहा है कि भारत बलूचिस्तान में आतंकवाद और अस्थिरता भड़का रहा है। मार्च 2025 में जाफ़र एक्सप्रेस हाईजैक कांड के दौरान पाकिस्तान की सेना ने यह दावा किया कि उसने बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) के 33 आतंकियों को मार गिराने का दावा किया।[8] लेकिन जैसे ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इस “घिनौने और कायरतापूर्ण आतंकी हमले” की निंदा की, पाकिस्तान ने तुरंत यह राग अलापना शुरू कर दिया कि भारत उसके दक्षिण-पश्चिमी इलाक़ों में आतंकवादी गुटों को “फंड” कर रहा है।[9]
असल में, पाकिस्तान अब पूरी कहानी ही पलट देना चाहता है — खुद को आतंक का शिकार दिखाकर सारा दोष भारत पर डालने में लगा है। सितंबर 2025 में, अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने मिलकर पाकिस्तान के उस प्रस्ताव पर “टेक्निकल होल्ड” लगा दिया जिसमें वह BLA और मजीद ब्रिगेड को संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध कमेटी के अन्तर्गत “आतंकवादी संगठन” घोषित कराना चाहता था।[10]
इसके बाद अगस्त 2025 में, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता शफक़त अली खान ने एक सनसनीखेज बयान दिया। उन्होंने कहा कि BLA और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे गुट “भारत के एजेंट” के रूप में काम कर रहे हैं। यानी पाकिस्तान अब खुले तौर पर यह विमर्श गढ़ रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान और भारत मिलकर उसके ख़िलाफ़ आतंकवाद का जाल बुन रहे हैं।[11]
असल में, पाकिस्तान की ये कूटनीतिक चालें एक सोची-समझी साज़िश का हिस्सा हैं। इसका मकसद दुनिया का ध्यान उस सच्चाई से भटकाना है, जिसके केंद्र में पाकिस्तान की अपनी आतंकवाद मशीनरी है — जिसकी जड़ें कट्टर इस्लामी उग्रवाद में हैं और जो दशकों से भारत को निशाना बना रही है। अब वही पाकिस्तान खुद को ‘आतंक का पीड़ित’ बताकर और ‘भारत-अफगानिस्तान के आतंकी गठजोड़’ जैसा झूठा नैरेटिव खड़ा कर, अपनी छवि सुधारने और आतंकवाद पर बने मौजूदा विमर्श को पूरी तरह पलटने की कोशिश कर रहा है।
पाकिस्तान के झूठ कई बार उजागर हो चुके हैं, क्योंकि वह अपने किसी भी दावे के समर्थन में आज तक ठोस सबूत नहीं दे पाया है। लेकिन यही तो उसकी असली रणनीति है — प्रोपेगंडा की राजनीति में सच्चाई की नहीं, बल्कि दोहराव की अहमियत होती है। किसी झूठ को बार-बार दोहराया जाए, तो धीरे-धीरे वही एक नया नैरेटिव बन जाता है और जनमत को प्रभावित करने लगता है।
पाकिस्तान खुद को ‘आतंकवाद का शिकार’ बताने वाला यह झूठा नैरेटिव बनाकर एक लंबी योजना पर काम कर रहा है। इसके नतीजे में कट्टर इस्लामी तंत्र को और ताकत मिलेगी, और हिंदू-विरोधी हिंसा को वैचारिक सहारा। दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र जैसा संस्थान, जो आज तक पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद की साफ़ और सख्त निंदा तक नहीं कर पाया, अब उसी आतंकवाद को ढकने-छिपाने की प्रक्रिया का हिस्सा बन चुका है।
इस नैतिक गिरावट की हद तब दिखी जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में भाषण दिया। उनका संबोधन विडंबना का जिंदा उदाहरण था — वे खुद को पीड़ित बताकर मानो ‘नैतिक योद्धा’ की भूमिका निभा रहे हों। शरीफ़ ने भारत पर आरोप लगाया कि वह ‘एक मानवीय त्रासदी’ का राजनीतिक फायदा उठा रहा है और पाकिस्तानी शहरों पर हमले कर रहा है। लेकिन जब उन्होंने यह कहा कि पाकिस्तान पिछले दो दशकों से वैश्विक आतंकवाद-विरोधी अभियान की अगुवाई कर रहा है, तो उनका यह दावा हास्यास्पदता की सारी सीमाएँ पार कर गया। एक ऐसा देश जो दशकों से आतंकवाद को पनाह देने और फैलाने के लिए बदनाम है, अगर खुद को आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाला बताने लगे, तो इससे बड़ा मज़ाक और क्या हो सकता है। शरीफ़ ने इतना ही नहीं, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन से होने वाले आतंकी हमलों का ठीकरा भी ‘विदेशी फंडिंग’ पर फोड़ दिया — जिसका इशारा साफ़ तौर पर भारत की ओर था। लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यहीं नहीं रुके। उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान की अंतरिम सरकार को शांति, सद्भावना और महिलाओं के अधिकारों पर भी भाषण दे डाला। एक ऐसा देश, जिसकी अपनी नीतियाँ कट्टरपंथी विचारधाराओं पर टिकी हों, अगर किसी और देश को मानवाधिकार का पाठ पढ़ाने लगे — तो इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है।[12]
सच कहा जाए तो पाकिस्तान से शांति और मानवाधिकारों पर भाषण सुनना वैसा ही है, जैसे कोई भेड़िया मेमनों को शाकाहार का उपदेश दे। आतंकवाद को पनपने का मौका देना और उसे दूसरे देशों में फैलाने की कला में माहिर होना ही पाकिस्तान की राज्य-नीति की सबसे बड़ी पहचान रही है।[13] लेकिन शहबाज़ शरीफ़ का भाषण महज़ खोखली बयानबाज़ी मानकर नज़रअंदाज़ करना, एक रणनीतिक भूल होगी। क्योंकि अब पाकिस्तान की असली कोशिश सिर्फ अपने अपराधों को ढकने की नहीं, बल्कि खुद को “आतंक-रोधी योद्धा” के रूप में पेश करने की है।
पाकिस्तान का यह दोहरा रवैया, पश्चिमी देशों की चयनात्मक चुप्पी और संयुक्त राष्ट्र की उदासीनता से और भी ताकत पाता है। जब वैश्विक संस्थाएँ इस्लामाबाद को जवाबदेह ठहराने से बचती हैं, तो वे अनजाने में एक आतंक-प्रायोजक देश को ‘पीड़ित’ का मुखौटा पहनने का मौका देती हैं। यही वह बिंदु है, जहाँ से तथाकथित ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ की साख कमजोर पड़ने लगती है — और इसके साथ ही क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता भी खतरे में आ जाती है।
कश्मीर पर झूठा नैरेटिव
संयुक्त राष्ट्र ने बार-बार पाकिस्तान को जाने-अनजाने यह मौक़ा दिया है कि वह उसके मंच का दुरुपयोग झूठ फैलाने के लिए करे, विशेषकर कश्मीर-मुद्दे के संदर्भ में, जहाँ उसे अकसर चीन का भी साथ मिलता है। 2019 में जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से, पाकिस्तान द्वारा UN में चलाई जा रही प्रोपेगेंडा मुहिम और भी ज़्यादा तेज़ और आक्रामक हो गयी है।
2022 में रूस–यूक्रेन युद्ध पर बुलाई गई संयुक्त राष्ट्र की आपात बैठक में भी पाकिस्तान के तत्कालीन राजदूत मुनिर अक़रम ने कश्मीर का मुद्दा उठा दिया। इससे साफ़ पता चलता है कि कश्मीर के प्रति इस्लामाबाद की सनक कितनी गहरी और असंगत है।[14] अगले ही साल प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने 2024 के UNGA संबोधन में अनुच्छेद 370 बहाल करने की माँग दोहराई,[15] और 2025 में भी वही नाटक जारी रखते हुए भारत पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए और कश्मीर में “निष्पक्ष जनमत संग्रह” की माँग की। ये बयानबाज़ियाँ साफ़ दिखाती हैं कि पाकिस्तान किस तरह अंतरराष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल अपनी नाकामियों को छिपाने, और आतंकवाद को बढ़ावा देने की अपनी नीति से ध्यान भटकाने के लिए करता है।[16]
आज पश्चिमी दुनिया अपने ही संकटों में उलझी हुई है — रूस–यूक्रेन युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, और बढ़ती प्रवासी-विरोधी भावना। ऐसे में कश्मीर जैसे बाहरी मुद्दों में उनकी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं रह गई है। पश्चिमी देश भले ही खुलकर भारत के पक्ष में न बोलें, लेकिन अब वे पाकिस्तान के साथ खड़े होने से भी बचते हैं। भारत के बढ़ते वैश्विक क़द और रणनीतिक महत्व के मद्देनज़र ज़्यादातर देश अब यह भली-भाँति समझ चुके हैं कि नई दिल्ली को नाराज़ करना उनके हित में नहीं। इसी वजह से, पाकिस्तान द्वारा हर साल UN में किया जाने वाला यह “कश्मीर ड्रामा” बस शोरगुल तक सीमित रह जाता है।
फिर भी, UN का पाकिस्तान के झूठों पर आँख मूँद लेना चिंता की बात है। इस्लामाबाद लगातार कश्मीर को “आत्म-निर्णय” यानी “self-determination” के मुद्दे के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। और सबसे ज़्यादा ख़तरनाक बात तो यह है कि कश्मीर को लेकर पाकिस्तान जो भाषा बोलता है, वह भारत के वाम-उदारवादी और इस्लामिस्ट समूहों की बयानबाज़ी से हुबहू मेल खाती है। पाकिस्तान अब कश्मीर की तुलना ग़ाज़ा से करने की कोशिश कर रहा है, जिससे वास्तविक मानवाधिकार मुद्दों और जिहादी आतंकवाद को जबरन एक्सपोर्ट करने की नीति के बीच की रेखा धुंधली पड़ती जा रही है। आतंकवाद को “प्रतिरोध” के रूप में पेश करके, पाकिस्तान अपनी छद्म नैतिकता के ज़रिए अपने प्रॉक्सी युद्ध को वैध ठहराना चाहता है।
असल में, यह लगातार चल रही प्रोपेगेंडा मुहिम कश्मीर पर शासन करने के लिए नहीं, बल्कि उग्रवाद को ज़िंदा रखने और उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर “जायज़” ठहराने के लिए है। पाकिस्तान के लंबे आतंकवाद-पोषण के इतिहास पर UN की चुप्पी इस झूठ को और भी ज़्यादा मज़बूत बनाती है, जिसे पश्चिमी मीडिया और कुछ अकादमिक समूह और अधिक बढ़ा-चढ़ाकर फैलाते हैं।
यदि संयुक्त राष्ट्र पाकिस्तान के आतंकी ढांचे पर निर्णायक कार्रवाई नहीं करता — वही ढांचा जो भारत में हुए अनगिनत हमलों, जिनमें 26/11 का मुंबई हमला भी शामिल है, के लिए ज़िम्मेदार रहा है — तो इस्लामाबाद की UN में की जाने वाली बयानबाज़ी सिर्फ़ प्रोपेगंडा नहीं रहेगी, बल्कि एक नैतिक धोखाधड़ी बन जाएगी। जब शांति और सुरक्षा पर दुनिया का सबसे बड़ा मंच एक आतंकवाद-प्रायोजक देश को ‘पीड़ित’ के रूप में प्रस्तुत होने देता है, तो वह अनजाने में आतंकवाद को वैधता प्रदान करता है। ऐसा करके, संयुक्त राष्ट्र न केवल अपनी साख को दांव पर लगाता है, बल्कि उन ताक़तों की आवाज़ भी बन जाता है जो धर्म और पीड़ितत्व की आड़ में हिंसा को ज़िंदा रखती हैं।
पाकिस्तान अपने “कश्मीर नैरेटिव” को आगे बढ़ाने के लिए लगातार नए सहयोगी ढूंढता रहता है। हाल ही में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोआन ने UNGA में कश्मीरियों को “अपने भाई-बहन” कहकर संबोधित किया और इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता की बात कही। भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने तुरंत जवाब देते हुए कहा कि तुर्की को भारत के आंतरिक मामलों में बोलने का कोई अधिकार नहीं है। मंत्रालय ने तुर्की को यह भी याद दिलाया कि एर्दोआन को दूसरे देशों पर टिप्पणी करने के बजाय पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ़ राज्य नीति के तौर पर अपनाए जाने वाले सीमा-पार आतंकवाद की निंदा करनी चाहिए थी।[17]
दरअसल, पाकिस्तान कई बार यह कोशिश कर चुका है कि कश्मीर के तथाकथित ‘विवाद’ में संयुक्त राष्ट्र या अमेरिकी राष्ट्रपति को मध्यस्थ के रूप में शामिल किया जाए। भारत को ऐसी कूटनीतिक चालों से हमेशा सतर्क रहना होगा। रूस–यूक्रेन युद्ध पर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और पश्चिमी दबाव के बावजूद रूसी तेल आयात जारी रखने के उसके फैसले को देखते हुए, यह आशंका बनी रहती है कि भविष्य में कश्मीर मुद्दे को फिर से उठाकर या उसे एक कूटनीतिक ‘हथियार’ बनाकर संयुक्त राष्ट्र में भारत पर दबाव डालने की कोशिश की जा सकती है — ताकि कुछ देशों के रणनीतिक हित साधे जा सकें।
हिंदुत्व आतंक षड्यंत्र सिद्धांत
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने दावा किया कि “भारत का हिंदुत्व-प्रेरित उग्रवाद” पूरी दुनिया के लिए ख़तरा है।[18]
StopHindudvesha पहले ही ‘सैफ़्रन टेरर’ या ‘भगवा आतंकवाद’ के झूठे विमर्श पर विस्तार से रिपोर्टिंग कर चुका है। हमारी पिछली रिपोर्टों में यह विस्तार से बताया गया है कि 2006 से 2010 के बीच हुए कई बम धमाकों और आतंकी हमलों के संदर्भ में किस तरह ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ का मनगढ़ंत नैरेटिव खड़ा किया गया। 2002 के गुजरात दंगों के बाद शुरू हुआ यह ‘भगवा आतंकवाद’ का भ्रमजाल धीरे-धीरे एक संगठित साज़िश में बदल गया — जिसका असली उद्देश्य इस्लामी आतंकवाद को ढकना और हिंदू धर्म की छवि को कलंकित करना था।[19]
जुलाई 2025 में मुंबई की विशेष NIA अदालत द्वारा मालेगांव ब्लास्ट केस में सभी सात आरोपियों को बरी किए जाने के बाद, “भगवा आतंकवाद” का यह नैरेटिव पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। लेकिन फिर भी पाकिस्तान इस झूठे विमर्श का सहारा ले अभी भी “हिंदू उग्रवाद” का राग अलापता रहता है। [20]
दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान और तथाकथित ‘वाम-उदारवादी’ समूहों का हिंदुत्व-विरोधी नैरेटिव एक-दूसरे से मेल खाता है। पश्चिमी देशों के कुछ अभिजात्य शैक्षणिक संस्थान ‘हिंदू अतिवाद’ जैसे झूठे और भ्रामक सिद्धांत गढ़ते हैं। ‘हिंदू बहुसंख्यकवाद’, ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ और ‘हिंदुत्व सुप्रीमेसी’ जैसी पुरानी और पक्षपाती शब्दावली का सहारा लेकर वे इन सिद्धांतों को पुष्ट करने की कोशिश करते हैं। इसके बाद वैश्विक वामपंथी मीडिया इन्हीं झूठों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है, और भारत व हिंदू धर्म से जुड़ी हर खबर को तोड़-मरोड़कर नकारात्मक रूप में पेश करता है।
संयुक्त राष्ट्र अपनी पक्षपातपूर्ण नीतियों के ज़रिए ऐसे झूठे विमर्शों को परोक्ष रूप से बढ़ावा देता है। एक ओर वह इस्लामोफ़ोबिया पर खुलकर बयान देता है और इस विषय पर बार-बार वक्तव्य जारी करता है, वहीं दूसरी ओर हिंदूफोबिया के मुद्दे पर पूरी तरह चुप्पी साधे रहता है। यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र ने इस्लामोफ़ोबिया को आधिकारिक रूप से मान्यता दी है और इसके खिलाफ़ एक ‘अंतरराष्ट्रीय दिवस’ तक घोषित कर दिया है।[21] दूसरी ओर, हिंदू-विरोधी हिंसा और नरसंहार के अनगिनत प्रमाण मौजूद होने के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र ने हिंदूफोबिया के मुद्दे को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया है। भारत ने कई बार संयुक्त राष्ट्र से अपील की है कि वह गैर-अब्राहमिक आस्थाओं के खिलाफ फैली घृणा को भी आधिकारिक रूप से मान्यता दे, लेकिन UN ने इन अपीलों पर अब तक कोई ध्यान नहीं दिया। [22]
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर बढ़ते अत्याचार और पश्चिमी देशों में हिंदुओं के ख़िलाफ़ बढ़ रहे घृणा अपराधों के मुद्दे पर UN की चुप्पी बहुत कुछ बयान कर जाती है। जहाँ वह एक तरफ़ इस्लामोफोबिया पर बार-बार बयान जारी करता है, वहीं दूसरी तरफ़ उसने आज तक कश्मीरी पंडितों के 1989–1991 के नरसंहार जैसे भयावह घटनाक्रम को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है।
संयुक्त राष्ट्र की यह ‘चयनात्मक संवेदना’ और हिंदुओं के खिलाफ़ होने वाली इस्लामिक हिंसा की लगातार अनदेखी, चरमपंथी नेटवर्क्स को और मजबूत करती है। इस्लामोफ़ोबिया पर अत्यधिक ज़ोर देने की यह प्रवृत्ति अब एक सुविधाजनक परदा बन चुकी है — जिसके पीछे हिंदुओं के दर्द और उत्पीड़न को छिपा दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि जब कोई हिंदुओं को निशाना बनाने वाले इस्लामिक आतंकवाद की बात करता है, तो उसे तुरंत ‘इस्लामोफ़ोबिक’ कहकर खारिज कर दिया जाता है, और सच्चाई को दबा दिया जाता है।
इज़रायल–ग़ाज़ा संघर्ष में UN के दोहरे मानदंड
7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इज़रायल पर किए गए आतंकी हमलों के बाद, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने एक ऐसा बयान दिया जो ख़ासा विवादों में घिरा रहा। उन्होंने कहा — “यह भी समझना ज़रूरी है कि हमास के हमले यूँ अचानक ही नहीं हुए”।[23] यानी उन हमलों के पीछे एक पूरा ऐतिहासिक संदर्भ छिपा है।
हालाँकि, निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो महासचिव ने इस टिप्पणी से पहले हमास के आतंकी हमले की साफ़-साफ़ निंदा की थी, लेकिन उन्होंने बाद में जिस तरह से इन हमलों के तथाकथित “ऐतिहासिक संदर्भ” को रेखांकित किया, वह काफ़ी हद तक आतंकवाद को तर्कसंगत ठहराने जैसा लगता है, और शायद हमास-समर्थकों के विमर्श को दोहराता प्रतीत होता है।
इज़रायल–ग़ाज़ा संघर्ष में संयुक्त राष्ट्र की दोहरी नीति स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। इस मामले में उसके द्वारा दिये गये बयान स्पष्ट तौर पर पक्षपातपूर्ण लगते हैं, और उसका पूरा रवैया एकतरफ़ा जान पड़ता है। जहाँ एक तरफ़ वह हमास द्वारा इज़रायली नागरिकों पर किए गए बर्बर हमलों, या निर्दोष लोगों को हमास द्वारा बंदी बनाए जाने को लेकर कोई विशेष नैतिक आक्रोश नहीं दिखाता, वहीं दूसरी तरफ़ इज़रायल की जवाबी कार्रवाई की लगातार आलोचना करता रहता है।
जुलाई 2025 में इज़रायल के राजदूत डैनी डैनन ने संयुक्त राष्ट्र पर यह आरोप लगाया कि वह उस संकट के लिए इज़रायल को दोषी ठहरा रहा है, जिसकी शुरुआत खुद हमास ने की थी। इससे पहले, मार्च में, उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की भी आलोचना की थी कि उसने हमास द्वारा बंधक बनाए गए लोगों की रिहाई की तत्काल मांग तक नहीं की। इन घटनाओं से संयुक्त राष्ट्र की चयनात्मक सहानुभूति और नैतिक असंगति स्पष्ट रूप से उजागर होती है।[24]
यहाँ तक कि जब अमेरिका और यूके जैसे देशों ने हमास को आधिकारिक रूप से “आतंकी संगठन” घोषित कर दिया है, संयुक्त राष्ट्र ने अब तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है। इज़रायल ने संयुक्त राष्ट्र संघ में कई बार यह माँग उठाई है कि हमास को औपचारिक तौर पर एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया जाये,[25] लेकिन सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी और अस्थायी सदस्य देशों के बीच सहमति की कमी के चलते इज़रायल की यह माँग आज तक पूरी नहीं हो पायी। UN के इस रवैये से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक राजनीति में आतंकवाद और नैतिकता दोनों की परिभाषाएँ किस तरह सुविधानुसार बदल दी जाती हैं।
संयुक्त राष्ट्र का यह एकतरफ़ा नैतिक दिखावा और हमास आतंकवाद पर उसका नरम रवैया, एक ऐसे वैश्विक तंत्र को जन्म दे चुका है जो आतंकवाद को ‘जायज़’ ठहराने और उससे जुड़े विमर्श को तोड़-मरोड़कर पेश करने में लगा है। इस तंत्र का मकसद आतंकी संगठनों की छवि सुधारना और सच्चाई को छिपाना है — और यह सब एक सुनियोजित रणनीति के तहत किया जा रहा है।
समापन
भले ही संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक साख अब पहले जैसी न रही हो, फिर भी यह आज भी एकमात्र ऐसा अंतरराष्ट्रीय संस्थान है, जिसके पास नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखने और आतंकवाद, युद्ध, संघर्ष तथा जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से निपटने के औपचारिक ढाँचे मौजूद हैं।
जैसे-जैसे वैश्विक दक्षिण (Global South) के देश संयुक्त राष्ट्र में पारदर्शिता, व समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों को मज़बूत करने, और पश्चिमी वर्चस्व को कम करने की माँग कर रहे हैं, वैसे-वैसे यह भी ज़रूरी है कि आतंकवाद-रोधी प्रयासों को भी इन सुधारों के केंद्र में रखा जाए। दुनिया अब आतंकवाद को एक काल्पनिक चश्मे से नहीं देख सकती — ख़ासकर तब, जब जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संयुक्त राष्ट्र-सूचीबद्ध आतंकवादी संगठन अब भी खुलेआम सक्रिय हैं, और ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी UN के सदस्य देशों की पनाह में रह चुके हैं। यदि UN ऐसा कोई सुधार चाहता है जो वास्तव में विश्वसनीय हो और जिससे ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस असर दिखे, तो उसे आतंकवाद के वैचारिक स्रोतों और राज्य-प्रायोजकों के ख़िलाफ़ कोई सख़्त कदम उठाना ही होगा।
संयुक्त राष्ट्र के लिए अपनी विश्वसनीयता बनाए रखना तभी संभव है, जब वह खुद को उन ताक़तों का मंच न बनने दे जो तटस्थता या चयनात्मक नैतिकता की आड़ में आतंकवाद को वैध ठहराने की कोशिश करती हैं।
सन्दर्भ सूची
[1] Indian team to present in UN evidence on Pahalgam terror attack – The Hindu; https://www.thehindu.com/news/national/indian-team-to-present-in-un-evidence-on-pahalgam-terror-attack/article69576655.ece
[2] (22) India Takes Diplomatic Offensive Against Pakistan at UN Over Pahalgam Terror Attack| News18 – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=NrNbnkbdGKA
[3] Pakistan claims terror network ‘dismantled’, denies LeT link to Pahalgam attack – The Hindu; https://www.thehindu.com/news/international/pakistan-claims-terror-network-dismantled-denies-let-link-to-pahalgam-attack/article69830447.ece
[4] Operation Sindoor: What’s the significance of India’s Pakistan targets? | India-Pakistan Tensions News | Al Jazeera; https://www.aljazeera.com/news/2025/5/7/operation-sindoor-whats-the-significance-of-indias-pakistan-targets
[5] ‘Western media pro Pakistan, cannot be trusted’: British expert blasts anti-India narrative on Op Sindoor – BusinessToday; https://www.businesstoday.in/india/story/western-media-pro-pakistan-cannot-be-trusted-british-expert-blasts-anti-india-narrative-on-op-sindoor-476380-2025-05-15
[6] Pakistan got UNSC to drop mention of LeT offshoot TRF- The Economic Times; https://economictimes.indiatimes.com/news/defence/pakistan-got-unsc-to-drop-mention-of-let-offshoot-trf/articleshow/120674769.cms?from=mdr
[7] Security Council Press Statement on Terrorist Attack in Jammu and Kashmir | Meetings Coverage and Press Releases; https://press.un.org/en/2025/sc16050.doc.htm
[8] Pakistan train hijack: All hostages freed, 33 BLA militants killed, claims army – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/world/pakistan/pakistan-train-hijack-all-hostages-freed-33-bla-militants-killed-claims-army-jaffar-express/articleshow/118943997.cms
[9] Pakistan accuses India of sponsoring militant terror group after train hijacking | Pakistan | The Guardian; https://www.theguardian.com/world/2025/mar/14/pakistan-accuses-india-of-sponsoring-militant-terror-group-after-train-hijacking
[10] US, UK, France put on hold Pakistan bid to designate Baloch group as terrorists | India News – The Indian Express; https://indianexpress.com/article/india/us-uk-france-put-on-hold-pakistan-bid-to-designate-baloch-group-as-terrorists-10260372/
[11] Islamabad Accuses India of Using Afghan-Based Terror Groups to Destabilize Pakistan; https://kabulnow.com/2025/08/islamabad-accuses-india-of-using-afghan-based-terror-groups-to-destabilize-pakistan/
[12] Pakistan PM UNGA Address, September 26, 2025; https://gadebate.un.org/sites/default/files/gastatements/80/pk_en.pdf
[13] Pakistan Joins UN Anti-Terror Panel Farce; https://stophindudvesha.org/pakistan-joins-un-counter-terrorism-committee-a-diplomatic-farce-drenched-in-blood/
[14] Frivolous and pointless’: India tears into Pakistan for raising Kashmir issue at UN – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/india-slams-pakistan-frivolous-pointless-unga-special-session-ukraine-russia-2284708-2022-10-13
[15] Pakistan PM Shehbaz Sharif raises Kashmir issue in UNGA address; https://thefederal.com/category/international/pakistan-pm-shehbaz-shariff-raises-kashmir-issue-in-unga-address-147163
[16] Pakistan PM UNGA Address, September 26, 2025; https://gadebate.un.org/sites/default/files/gastatements/80/pk_en.pdf
[17] Turkey President Erdogan rakes up Kashmir Issue at the UN General Assembly; ‘We hope…’ | World News; https://www.hindustantimes.com/world-news/turkey-president-recep-tayyip-erdogan-rakes-up-kashmir-issue-at-un-general-assembly-we-hope-101758665566693.html
[18] Pakistan PM UNGA Address, September 26, 2025; https://gadebate.un.org/sites/default/files/gastatements/80/pk_en.pdf
[19] Saffron Terror Myth: A Manufactured Narrative; https://stophindudvesha.org/the-saffron-terror-myth-how-a-dangerous-narrative-was-manufactured/
[20] Malegaon Verdict: Truth Shatters the politics of ‘Saffron Terror’; https://stophindudvesha.org/malegaon-verdict-truth-shatters-the-politics-of-saffron-terror/
[21] International Day to Combat Islamophobia | United Nations; https://www.un.org/en/observances/anti-islamophobia-day
[22] Acknowledge ‘Hinduphobia’, India urges UN | India News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/india/acknowledge-hinduphobia-india-urges-un/articleshow/89028174.cms
[23] Secretary-General’s remarks to the Security Council – on the Middle East | United Nations Secretary-General; https://www.un.org/sg/en/content/sg/speeches/2023-10-24/secretary-generals-remarks-the-security-council-the-middle-east%C2%A0
[24] Danny Danon criticizes UN’s hypocrisy regarding Israel | The Jerusalem Post; https://www.jpost.com/israel-news/article-861917
[25] Israel Foreign Minister Demands UN Designate Hamas a Terror Organization; https://www.voanews.com/a/israel-s-foreign-minister-demands-un-designate-hamas-a-terror-organization/7523722.html
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