आंगन के सांप: खालिस्तानी उग्रवाद और पश्चिमी लोकतंत्रों की भूल की कीमत
सारांश
दशकों तक ब्रिटेन और उसके सहयोगी देशों ने खालिस्तान आंदोलन को एक दूर की राजनीतिक समस्या समझकर अपने यहां जगह दी। शीत युद्ध की रणनीति, प्रवासी राजनीति, चुनावी गणनाओं और बहुसांस्कृतिक संकोच के कारण खालिस्तान समर्थक नेटवर्कों को खुलकर सक्रिय रहने का अवसर मिला। समय के साथ यह केवल वैचारिक अभियान नहीं रहा, बल्कि भारतीय कूटनीतिक परिसरों पर हमलों, हत्या के प्रयासों, धमकियों और कट्टरपंथी नेटवर्कों में बदलता गया। 2012 में लंदन में जनरल कुलदीप सिंह बराड़ पर हमला और 2023 में भारतीय मिशनों पर समन्वित हिंसा गंभीर चेतावनियां थीं। 2025 में हेनरी नोवाक की हत्या ने पहली बार यह सवाल तीखे रूप में खड़ा किया कि जिस खतरे को पश्चिम दशकों तक “किसी और की समस्या” मानता रहा, उसकी कीमत अब वही क्यों चुका रहा है।
1971 में जगजीत सिंह चौहान नाम का एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति ब्रिटेन पहुंचा। पेशे से दंत चिकित्सक और कभी वामपंथी छात्र राजनीति से जुड़े रहे चौहान ने “खालिस्तान” नाम के अलग सिख राष्ट्र की अवधारणा को आगे बढ़ाना शुरू किया, जिसे उस समय अधिकांश लोग अव्यावहारिक कल्पना समझते थे। स प्रस्तावित राष्ट्र की सीमाएं केवल पंजाब तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उत्तर भारत के बड़े हिस्सों और पश्चिम भारत के कुछ क्षेत्रों तक फैली हुई मानी जाती थीं। [1]
मई 1980 में चौहान ने लंदन में तथाकथित “रिपब्लिक ऑफ खालिस्तान” की घोषणा की और स्वयं को उसका राष्ट्रपति घोषित कर दिया। उसने इस नाम से पासपोर्ट, डाक टिकट और मुद्रा तक जारी किए, और प्रेस सम्मेलन भी आयोजित किए। यह दुनिया भर के खालिस्तानी उग्रवादियों के लिए एक खुला संकेत था कि यूनाइटेड किंगडम उनके लिए सुरक्षित ठिकाना बन सकता है।
उस समय मार्गरेट थैचर की सरकार अपने शुरुआती दौर में थी और अर्जेंटीना, महंगाई तथा श्रमिक आंदोलनों जैसी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों में उलझी हुई थी। चौहान की गतिविधियों को गंभीरता से नहीं लिया गया। 1975 में भारत द्वारा उसका पासपोर्ट रद्द किए जाने के बाद भी ब्रिटेन ने उसे यात्रा दस्तावेज उपलब्ध कराए, जिससे उसे आने जाने में कोई रूकावट पेश न आऐ। [2]
जब खालिस्तान भू-राजनीति का औज़ार बना
चौहान और उसके “काउंसिल ऑफ खालिस्तान” को मिली इस छूट को शीत युद्ध की राजनीति के संदर्भ में समझना होगा। [3] उस समय इंदिरा गांधी का भारत सोवियत संघ के अधिक निकट माना जाता था। उस दौर की भू-राजनीतिक सोच में भारत के विरोधियों को मित्र भले न माना जाए, लेकिन उन्हें उपयोगी अवश्य समझा जाता था। खालिस्तानी अलगाववादी भारत-विरोधी थे, इसलिए पश्चिमी सत्ता प्रतिष्ठानों के कुछ हिस्सों को वे रणनीतिक दृष्टि से उपयोगी प्रतीत होते थे।
चौहान को अकाली दल ने ब्रिटेन में बसे सिखों के बीच समर्थन जुटाने के लिए भेजा था, लेकिन वह जल्दी ही अपनी मूल भूमिका से बहुत आगे निकल गया। [4] वह खालिस्तानी आंदोलन का प्रमुख अंतरराष्ट्रीय चेहरा बन गया और ब्रिटेन ने उसे ऐसा सुरक्षित आधार दे दिया जिससे वह भारत में तनावपूर्ण परिस्थितियों के दौरान भी सक्रिय रह सके। [5] लंदन से उसने धन जुटाया और प्रवासी सिख समुदायों में संगठित नेटवर्क तैयार किया। ब्रिटिश सरकार अधिकांश समय मूकदर्शक बनी रही।
फिर आया 1984। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारबंद उग्रवादियों को बाहर निकालने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया। उल्लेखनीय बात यह थी कि इस अभियान का नेतृत्व एक सिख सैन्य अधिकारी, लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बराड़, कर रहे थे। [6] लेकिन इस कार्रवाई ने खालिस्तानी आंदोलन में नई जान फूंक दी।
ब्लू स्टार्ट ऑपरेशन के कुछ ही महीनों बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा कर दी गयी। इसके बाद दिल्ली और अन्य स्थानों पर हुए विरोधी-सिख दंगों ने प्रवासी सिख समुदायों में गहरा आक्रोश पैदा किया। विदेशों में खालिस्तानी नेटवर्कों को अचानक आर्थिक संसाधन, भावनात्मक समर्थन और नए समर्थक मिलने लगे। आक्रोश धीरे-धीरे संगठित विचारधारा में बदल गया और ब्रिटेन में अलगाववादी गतिविधियों को और अधिक जगह मिलने लगी।
उस दौर को आज पीछे मुड़कर देखें, तो सबसे चौंकाने वाली बात यह लगती है कि हिंसा भड़काने वाले बयान कितनी खुलकर सामने आ रहे थे। 1984 में, इंदिरा गांधी की हत्या से कुछ समय पहले, बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में जब चौहान से पूछा गया कि क्या वह गांधी सरकार का पतन चाहता है, तो उसने स्पष्टता के साथ कहा: “कुछ ही दिनों में आपको खबर मिलेगी कि श्रीमती गांधी और उनका परिवार मार दिया गया है। सिख यह अवश्य कर के दिखायेंगे।” [7]
किसी भी सामान्य मानक से देखें तो यह खुला उकसावा था। कुछ ही सप्ताह बाद इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई, और उनके हत्यारों ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को उसका कारण बताया।
जब उग्रवाद “किसी और की समस्या” बना रहा
ब्रिटेन में खालिस्तानी उग्रवाद की कहानी केवल विचारधारा की नहीं, बल्कि उन कानूनी और राजनीतिक परिस्थितियों की भी है, जिनमें किसी दूसरे देश के खिलाफ काम करने वाले समूह अपेक्षाकृत सुरक्षित माहौल में सक्रिय रह पाते हैं। बाबर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआई) जैसे संगठन [8]— जिन्हें भारत और यूरोपीय संघ ने आतंकवादी संगठन घोषित किया और बाद में ब्रिटेन में भी प्रतिबंधित किया गया — वर्षों तक ब्रिटिश धरती पर सक्रिय रहे। प्रचार, धन संग्रह और संगठनात्मक गतिविधियां कानूनी अस्पष्टताओं का लाभ उठाते हुए चलती रहीं, जहां ब्रिटेन की आतंकवाद संबंधी परिभाषाएं और भारत की सुरक्षा चिंताओं के बीच स्पष्ट अंतर मौजूद था।
भारत लगातार यह मांग करता रहा कि आरोपियों को भारत भेजा जाए, लेकिन ब्रिटेन मानवाधिकार संबंधी चिंताओं या अपर्याप्त साक्ष्यों का हवाला देकर इन मांगों को ठुकराता रहा, जबकि नई दिल्ली कई मामलों में आतंकवाद, अपहरण और हत्याओं से जुड़े विस्तृत दस्तावेज सौंपती थी। यह व्यवहार केवल ब्रिटेन तक सीमित नहीं था। जहां-जहां पर्याप्त सिख प्रवासी समुदाय मौजूद थे, वहां इसी तरह के रुझान देखने को मिले। लेकिन ब्रिटेन में तस्वीर कुछ अलग थी, क्योंकि वहां सिख समुदाय का राजनीतिक असर काफी मजबूत था।
ब्रिटिश नेता सिख मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए सक्रिय रहते थे। पुलिस बल अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने के आरोपों से बचना चाहता था। और जब हिंसा हुई भी, तो उसका निशाना अक्सर भारतीय बने — चाहे वे हिंदू हों या खालिस्तान का विरोध करने वाले सिख। नतीजा यह निकला कि पश्चिमी सुरक्षा संस्थानों की प्राथमिकताओं में यह समस्या लंबे समय तक “किसी और की समस्या” बनकर रह गई।
लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग बार-बार हमलों का निशाना बना। 19 मार्च 2023 को लगभग दो हजार प्रदर्शनकारी खालिस्तानी झंडे लेकर इंडिया हाउस के बाहर जमा हुए। [9] खिड़कियां तोड़ी गईं, सुरक्षा कर्मियों पर हमला हुआ और भवन की बालकनी से भारतीय ध्वज उतार दिया गया। ब्रिटिश संसद में एक सांसद ने बताया कि छह वर्षों में यह ऐसा छठा हमला था। [10]
भारतीय जांचों में सामने आया कि मार्च 2023 की ये घटनाएं एक व्यापक साजिश का हिस्सा थीं। पंजाब में खालिस्तान समर्थक प्रचारक अमृतपाल सिंह के खिलाफ कार्रवाई के जवाब में लंदन, सिडनी और सैन फ्रांसिस्को स्थित भारतीय मिशनों को निशाना बनाया गया। [11] पंजाब में हुई एक पुलिस कार्रवाई के कुछ ही दिनों के भीतर अलग-अलग देशों में समन्वित हिंसक घटनाओं का सामने आना इस बात का संकेत था कि आंदोलन का अंतरराष्ट्रीय ढांचा कितना संगठित हो चुका था — और किस हद तक पश्चिमी देशों की जमीन उसके लिए संचालन केंद्र बन चुकी थी।
जनरल बराड़ पर हमला: एक अनसुनी चेतावनी
अगर कोई एक घटना जिसने ब्रिटेन को खालिस्तानी उग्रवाद के प्रति अपनी नरमी पर गंभीर पुनर्विचार के लिए मजबूर करना चाहिए था, तो वह 30 सितंबर 2012 की शाम लंदन में घटी घटना थी।
लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बराड़ उस समय 78 वर्ष के थे। वे सम्मानित सैन्य अधिकारी थे। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार का नेतृत्व उन्होंने ही किया था। वे अपनी पत्नी के साथ निजी यात्रा पर लंदन आए हुए थे।
ओल्ड क्यूबेक स्ट्रीट पर अचानक चार खालिस्तानी हमलावरों — जिनमें एक महिला भी शामिल थी — ने उन पर हमला कर दिया। हमलावरों ने उनकी पत्नी को दीवार की ओर धकेल दिया और जनरल बराड़ के गले पर चाकू से वार किया। उनके जबड़े और गर्दन पर लगभग 30 सेंटीमीटर लंबा गहरा घाव हुआ, साथ ही एक और गंभीर चोट लगी। [12] फिर भी बराड़ किसी तरह बच गए। शायद सैनिक प्रशिक्षण अब भी उनके भीतर जीवित था !
अदालती कार्यवाही ने इस घटना की गंभीरता स्पष्ट कर दी। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि हमला पूरी तरह पूर्वनियोजित था। [13] मकसद था अट्ठाईस वर्ष पुराने ऑपरेशन ब्लू स्टार का “बदला”। सभी हमलावर दोषी पाए गए और उन्हें दस से चौदह वर्ष तक की सजा सुनाई गई। [14]
लेकिन जिस प्रश्न पर गंभीरता से चर्चा नहीं हुई, वह कहीं अधिक महत्वपूर्ण था: आखिर ऐसा कैसे हुआ कि एक ऐसी विचारधारा, जो यूरोप की एक प्रमुख राजधानी में छुट्टी मना रहे, निहत्थे और वृद्ध सैन्य अधिकारी की हत्या का प्रयास करने के लिए लोगों को प्रेरित कर सकती थी, उसे ब्रिटिश धरती पर तीन दशकों तक पनपने, भर्ती करने और संगठित होने की खुली जगह मिलती रही?
कृपाण विवाद: आस्था बनाम सार्वजनिक सुरक्षा
ब्रिटिश कानून में एक प्रावधान ऐसा है, जिसे कई लोग अल्पसंख्यक समुदायों को दी गई छूट और सार्वभौमिक कानूनी मानकों के बीच बढ़ते तनाव का प्रतीक मानते हैं। क्रिमिनल जस्टिस एक्ट 1988 की धारा 139 के तहत इंग्लैंड और वेल्स में तीन इंच से अधिक लंबाई वाली धारदार वस्तु सार्वजनिक स्थान पर ले जाना सामान्यतः अवैध है। [15] हालांकि कुछ अपवाद मौजूद हैं, जिनमें “उचित कारण” और धार्मिक कारण भी शामिल हैं। अमृतधारी सिखों को धार्मिक प्रतीक के रूप में कृपाण धारण करने की कानूनी अनुमति प्राप्त है। [16]
2019 में बढ़ते चाकूबाजी अपराधों के बीच जब ऑफेंसिव वेपन्स एक्ट के जरिए हथियार संबंधी कानूनों को और कड़ा किया गया, तब संसद ने विशेष संशोधन कर यह सुनिश्चित किया कि ब्रिटिश सिख बड़ी कृपाण भी अपने पास रख सकें और सार्वजनिक रूप से ले जा सकें। सिख संगठनों ने इसका स्वागत किया। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) ने भी ब्रिटिश सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया।
कृपाण अपने आप में समस्या नहीं है। धार्मिक प्रतीक के रूप में उसका अपना महत्व है। नेशनल सेक्युलर सोसाइटी ने भी इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि अनेक सिख ऐसी कृपाण धारण करते हैं, जिन्हें कुंद कर दिया जाता है या म्यान में स्थायी रूप से जड़ दिया जाता है, ताकि उनका उपयोग हथियार के रूप में न हो सके। [17] यह सीधा संदेश देता है कि धार्मिक परंपराएं सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े कानूनों के अनुरूप ढल सकती हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब कानूनी छूट का दुरुपयोग होने लगे।
यह सवाल 3 दिसंबर 2025 की रात साउथहैम्पटन में डरावनी सच्चाई बनकर सामने आया।
एक हत्या जिसने बहस का रुख बदल दिया
हेनरी नोवाक एक अठारह वर्षीय छात्र था और साउथहैम्पटन विश्वविद्यालय में अकाउंटेंसी की पढ़ाई कर रहा था। [18] पोलैंड मूल के ब्रिटिश परिवार में पले-बढ़े हेनरी को जानने वाले उसे एक सामान्य, मिलनसार और खेलों से प्रेम करने वाला युवा बताते हैं। दिसंबर की उस रात वह अपने फुटबॉल साथियों के साथ बाहर गया था।
विक्रम डिगवा तेईस वर्षीय अमृतधारी सिख था। रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे साउथहैम्पटन के बेलमोंट रोड पर डिगवा और नोवाक के बीच कहासुनी हुई। मुकदमे के दौरान डिगवा ने दावा किया कि नोवाक ने नस्लीय टिप्पणियां की थीं और उसने आत्मरक्षा में कार्रवाई की। लेकिन जूरी ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया।
जो तथ्य विवादित नहीं है, वह यह है कि डिगवा ने हेनरी नोवाक पर पांच बार वार किया। अदालत में जिस हथियार का उल्लेख हुआ, उसे “बड़ी सिख कृपाण” कहा गया, जिसकी लंबाई इक्कीस सेंटीमीटर थी। पुलिस के पहुंचने पर डिगवा ने उल्टा नोवाक की ओर इशारा करते हुए उसे हमलावर बताया। अधिकारियों ने गंभीर रूप से घायल और खून से लथपथ नोवाक को हथकड़ी लगा दी। प्राथमिक उपचार मिलने के कुछ ही समय बाद उसकी मृत्यु हो गई।
28 मई 2026 को डिगवा को हत्या का दोषी ठहराया गया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, जिसमें कम से कम इक्कीस वर्ष जेल में बिताने होंगे। उसकी मां किरण कौर को अपराधी की सहायता करने का दोषी पाया गया।
अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि डिगवा को अपने कपड़ों के भीतर एक छोटी कृपाण पहनने का अधिकार था, लेकिन इसके अलावा उसने एक कहीं बड़ी धारदार कृपाण भी साथ रखी थी। धार्मिक हवाले से रखी गई इसी बड़ी कृपाण ने एक अठारह वर्षीय युवक की जान ले ली।
सिख धर्म या कृपाण की धार्मिक महत्ता के प्रति शत्रुता रखे बिना भी यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या धार्मिक प्रतीक के लिए बनाई गई कानूनी छूट ने इस मामले में एक ऐसे हथियार को संरक्षण दे दिया, जिसने एक किशोर की जान ले ली। क्या इक्कीस सेंटीमीटर लंबी धारदार कृपाण वास्तव में किसी ऐसे धार्मिक उद्देश्य की पूर्ति करती है, जो छोटी, कुंद या प्रतीकात्मक कृपाण से संभव नहीं? यह एक गहन विषय है जिस पर ब्रिटिश संसद लंबे समय तक गंभीर बहस से बचती रही है।
नेशनल सेक्युलर सोसाइटी ने भी यही तर्क दिया कि धार्मिक आस्थाओं का सम्मान जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सार्वजनिक सुरक्षा के लिए बने कानूनों में ऐसे अपवाद दिए जाएं, जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होने वाले मानकों को कमजोर कर दें। [19]
अंततः हेनरी नोवाक का मामला केवल एक हत्या की कहानी नहीं, बल्कि संस्थागत विफलता की कहानी भी है।
ब्रिटेन से कनाडा तक: एक साझा भूल
खालिस्तान आंदोलन के प्रति ब्रिटेन का नरम रुख केवल उसी तक सीमित नहीं रहा। पूरे अंग्रेजी भाषी देशों में — यानी कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड — अलग-अलग स्तरों पर खालिस्तान समर्थक संगठनों को उदार व्यवस्था की सुरक्षा और अधिकार तो दिए, लेकिन उन पर वैसी निगरानी नहीं रखी, जैसी किसी संभावित उग्रवादी खतरे पर सामान्यतः रखी जाती है।
इस कहानी का सबसे नाटकीय अध्याय कनाडा में दिखाई देता है। पंजाब के बाहर दुनिया का सबसे बड़ा सिख प्रवासी समुदाय कनाडा में बसता है, खासकर टोरंटो और वैंकूवर के उपनगरों में। वहां खालिस्तान से जुड़ी राजनीति लंबे समय से चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती रही है, विशेषकर लिबरल पार्टी के भीतर।
जून 2023 में ब्रिटिश कोलंबिया के सरे शहर स्थित एक गुरुद्वारे के बाहर हरदीप सिंह निज्जर की हत्या ने भारत और कनाडा के संबंधों को गंभीर संकट में डाल दिया। [20] भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने निज्जर को आतंकवादी घोषित किया था और वह कई आपराधिक मामलों में वांछित था। उस समय कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने सार्वजनिक रूप से भारतीय सरकार पर इस हत्या में संलिप्तता का आरोप लगाया। भारत ने इन आरोपों को सख्ती से खारिज किया, जिसके बाद दोनों देशों के बीच तीखा राजनयिक टकराव हुआ और दोनों पक्षों ने राजनयिकों को निष्कासित किया। [21]
यह प्रकरण एक बड़े प्रश्न को सामने लाता है: जिस व्यक्ति को भारत गंभीर सुरक्षा खतरा मानता था, उसे कनाडा ने वर्षों तक अपने यहां निर्बाध रूप से सक्रिय रहने दिया। और उसकी हत्या के बाद भी उससे जुड़े नेटवर्क को राष्ट्रीय संप्रभुता और लोकतांत्रिक अधिकारों की भाषा में संरक्षण मिलता रहा।
अमेरिका में भी खालिस्तान समर्थक गतिविधियां संगठित रूप लेती रही हैं। 1984 में एयर इंडिया बम विस्फोट मामले के दौरान आरोपियों में से एक ने न्यूयॉर्क में वर्ल्ड सिख ऑर्गनाइजेशन के स्थापना सम्मेलन में कहा था: “जब तक हम पचास हजार हिंदुओं को नहीं मार देंगे, हम शांत नहीं बैठेंगे।” [22]
हाल के वर्षों में “सिख्स फॉर जस्टिस” नामक संगठन, जिसने पश्चिमी शहरों में तथाकथित “खालिस्तान जनमत-संग्रह” आयोजित किए, अमेरिका से संचालित होता रहा है। [23] इसका संस्थापक गुरपतवंत सिंह पन्नू बार-बार भारत, उसकी संस्थाओं और राष्ट्रीय आयोजनों के खिलाफ धमकी भरे बयान देता रहा है। इनमें राष्ट्रीय आयोजनों को बाधित करने की धमकियां, विमानन क्षेत्र को चेतावनियां और अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देने की अपीलें शामिल रही हैं। [24]
ऑस्ट्रेलिया में भी स्थिति बहुत अलग नहीं रही। सिडनी और मेलबर्न स्थित भारतीय कूटनीतिक परिसरों पर खालिस्तान समर्थक प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ की। कई बार इन घटनाओं का समय लंदन और उत्तर अमेरिका में हुई समान गतिविधियों से मेल खाता था, जिससे इनके समन्वित होने की आशंका और मजबूत हुई। [25]
ऑस्ट्रेलिया को भी अपना “हेनरी नोवाक क्षण” देखने को मिला। मई 2021 में सिडनी के एक स्कूल में हुई झड़प के दौरान एक चौदह वर्षीय सिख छात्र ने कथित तौर पर कृपाण से सोलह वर्षीय छात्र पर हमला कर दिया। उसके शरीर के कई हिस्से गंभीर रूप से घायल हुए और उसकी जान लगभग चली गई। इसके बाद ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने स्कूलों में कृपाण पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन सिख समुदाय के तीव्र विरोध के बाद तीन महीने के भीतर यह फैसला वापस ले लिया गया। [26]
न्यूज़ीलैंड का अनुभव अपेक्षाकृत छोटा जरूर है, लेकिन वह यह समझने में महत्वपूर्ण है कि पश्चिमी लोकतंत्र अक्सर निष्क्रियता को कैसे उचित ठहराते हैं। 2025 में एक साक्षात्कार के दौरान प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्ज़न ने खालिस्तान समर्थक गतिविधियों पर कार्रवाई न करने को “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का मामला बताया। [27] यह अंतर साफ दिखाता है कि जिन गतिविधियों को भारतीय सुरक्षा एजेंसियां गंभीर खतरा मानती हैं, उन्हें पश्चिमी देशों में अक्सर वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति समझ लिया जाता है। नतीजतन, खालिस्तान आंदोलन को पश्चिमी दुनिया के बड़े हिस्से में सुरक्षित जगह मिलती रही है।
आंगन के सांप
अक्टूबर 2011 में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन पाकिस्तान की यात्रा पर थीं। इस्लामाबाद में एक संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने पाकिस्तान को तीखी चेतावनी दी: “आप अपने आंगन में सांप पालकर यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे सिर्फ आपके पड़ोसियों को ही डसेंगे। आखिरकार वे आपको भी डसेंगे।” [28]
वे पाकिस्तान द्वारा हक्कानी नेटवर्क जैसे उग्रवादी समूहों को दी जा रही शह की बात कर रही थीं। लेकिन यही बात ब्रिटेन और उसके सहयोगी देशों पर भी लागू होती है।
ब्रिटेन और उसके “फाइव आइज़” साझेदार देशों ने दशकों तक अपने यहां एक अलग तरह के “सांप” पाले। हालाँकि ऐसा नहीं है कि पश्चिमी सरकारें जानबूझकर इन्हें भारत के खिलाफ खड़ा करना चाहती थीं। अक्सर इसके पीछे शीत युद्ध की रणनीति, चुनावी गणनाएं, बहुसांस्कृतिक झिझक और प्रशासनिक निष्क्रियता काम करती थी। लेकिन उनकी निष्क्रियता के कारण ये नेटवर्क मजबूत होते गए, विचारधारा और कट्टर होती गई, और एक अनकही विचारधारा बनी रही कि हिंसा यदि हुई भी तो पश्चिम में नहीं होगी, इसलिए यह पश्चिम की सीधी समस्या नहीं है।
लेकिन यह धारणा हमेशा कायम नहीं रह सकती थी।
जनरल बराड़ पर हमला एक चेतावनी था। एल्डविच स्थित भारतीय उच्चायोग पर हमला एक चेतावनी थी। मार्च 2023 में अलग-अलग देशों में भारतीय मिशनों पर हुए समन्वित हमले भी चेतावनी थे। और अंततः, केवल अठारह वर्ष का हेनरी नोवाक वह कीमत बन गया, जिसका हिसाब पांच दशकों की उदारता और उपेक्षा से धीरे-धीरे जमा हो रहा था।
अधिकारों की आड़ में उग्रवाद
जब पश्चिमी सरकारों से पूछा जाता है कि वे खालिस्तान समर्थक गतिविधियों के प्रति इतनी नरमी क्यों बरतती रही हैं, तो उनका सबसे सामान्य जवाब लोकतांत्रिक मूल्यों की ओर इशारा करना होता है — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार, विधिसम्मत प्रक्रिया और कानून का शासन। निस्संदेह, यही सिद्धांत उदार लोकतंत्रों को दमनकारी व्यवस्थाओं से अलग करते हैं। लेकिन कई मामलों में यही सिद्धांत कार्रवाई टालने और समस्या को नजरअंदाज करने का सुविधाजनक आधार भी बन गए।
यह तर्क इसलिए असरदार लगता है क्योंकि खालिस्तान आंदोलन ने लंबे समय तक खुद को एक वैध “नागरिक” या “अधिकार-आधारित” अभियान के रूप में प्रस्तुत किया। “जनमत-संग्रह” लोकतांत्रिक सुनाई देते हैं। सामुदायिक संगठन सामान्य सामाजिक संस्थाओं की तरह दिखते हैं। धार्मिक छूटें सहिष्णुता का संकेत प्रतीत होती हैं। आत्मनिर्णय की भाषा भी सतही तौर पर वैध लगती है।
लेकिन पिछले पांच दशकों की घटनाओं को एक साथ देखें — चौहान की लंदन स्थित तथाकथित “सरकार-इन-एग्ज़ाइल”, जनरल बराड़ पर हमला, भारतीय मिशनों पर हिंसा और हेनरी नोवाक की हत्या — तो तस्वीर किसी सामान्य नागरिक आंदोलन की नहीं दिखती। यह ऐसे अंतरराष्ट्रीय ढांचे की कहानी लगती है, जिसने पश्चिमी लोकतंत्रों की कानूनी और राजनीतिक कमजोरियों का लाभ उठाकर कट्टरता और हिंसा को पनपने दिया।
जिस सच को सच कहने से पश्चिम कतराता रहा
हेनरी नोवाक की हत्या के बाद के हफ्तों में सबसे अधिक जिस चीज़ की कमी महसूस हुई, और जिसकी अब सबसे ज्यादा जरूरत है, वह है उन नीतिगत फैसलों, कानूनी छूटों, राजनीतिक समझौतों और संस्थागत नरमी की गंभीर समीक्षा, जिन्होंने इस स्थिति को जन्म दिया। दशकों तक ब्रिटेन और उसके सहयोगी देशों ने खालिस्तान आंदोलन को अपने यहां एक ऐसे समूह की तरह देखा, जिसे मुखर लेकिन मूलतः अहानिकर अलगाववादी समुदाय माना जा सकता था — ऐसा समूह, जिसकी शिकायतें भारत की आंतरिक समस्या हैं और जिनसे पश्चिम को बहुत अधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं।
लेकिन यह आकलन अंततः गलत साबित हुआ। यह आंदोलन केवल नारेबाजी तक सीमित नहीं रहा। इसने ब्रिटिश धरती पर हत्या के प्रयास आयोजित किए, भारतीय कूटनीतिक परिसरों पर समन्वित हमले किए और ब्रिटिश शहरों में युवाओं के कट्टरपंथीकरण के लिए जमीन तैयार की। समय के साथ ऐसी कानूनी और सामाजिक परिस्थितियां भी बनती गईं, जिनमें लगातार मिलती छूटों के कारण हथियार लेकर चलना असामान्य नहीं रह गया।
इन फैसलों की कीमत अब सामने आने लगी है। हेनरी नोवाक उस कीमत की सबसे हालिया और सबसे दर्दनाक मिसाल है। यदि कुछ नहीं बदला, तो शायद वह आखिरी नहीं होगा। हिलेरी क्लिंटन की “सांप” वाली चेतावनी का सार यही था: सांप हमेशा आंगन में नहीं रहते, समय के साथ वे घर के भीतर भी पहुंच जाते हैं।
सन्दर्भ सूची
[1] “Explainer: Khalistan Returns to Spook Punjab Again.” India Tribune. https://indiatribune.com/public/explainer-khalistan-returns-to-spook-punjab-again
[2] “How I Was Pushed to Khalistan Movement.” Punjab Monitor, April 2013. https://www.punjabmonitor.com/2013/04/how-i-was-pushed-to-khalistan-movement.html
[3] “Draft of the Constitution of Khalistan.” 1984 Tribute. https://1984tribute.com/draft-of-the-constitution-of-khalistan/
[4] “How I Was Pushed to Khalistan Movement.” Punjab Monitor, April 2013. https://www.punjabmonitor.com/2013/04/how-i-was-pushed-to-khalistan-movement.html
[5] “Jagjit Singh Chohan.” Grokipedia. https://grokipedia.com/page/Jagjit_Singh_Chohan
[6] “Khalistan Documentary/Video.” YouTube. https://www.youtube.com/watch?v=9CLR5-YIxN8
[7] “Explainer: Khalistan Returns to Spook Punjab Again.” India Tribune. https://indiatribune.com/public/explainer-khalistan-returns-to-spook-punjab-again
[8] “Babbar Khalsa International (BKI).” South Asia Terrorism Portal (SATP). https://www.satp.org/satporgtp/countries/india/states/punjab/terrorist_outfits/bki.htm
[9] “UK Officials Vow to Take Security of Indian Mission Seriously After Vandalism by Pro-Khalistani Protesters.” Deccan Herald. https://www.deccanherald.com/world/uk-officials-vow-to-take-security-of-indian-mission-seriously-after-vandalism-by-pro-khalistani-protesters-1201834.html
[10] “Vandalism at Indian High Commission in London Raised in UK Parliament.” NDTV. https://www.ndtv.com/india-news/vandalism-at-indian-high-commission-in-london-raised-in-uk-parliament-3887878
[11] “NIA Arrests Key Accused in 2023 Attack on Indian High Commission in London.” Deccan Herald. https://www.deccanherald.com/amp/story/india/nia-arrests-key-accused-in-2023-attack-on-indian-high-commission-in-london-2995033
[12] “Sikh Gang Guilty of UK Attack on India Temple, Assault on General.” Fox News. https://www.foxnews.com/world/sikh-gang-guilty-of-uk-attack-on-india-temple-assault-general
[13] “Sikhs Convicted in Indian General Stabbing.” Al Jazeera, July 31, 2013. https://www.aljazeera.com/news/2013/7/31/sikhs-convicted-in-indian-general-stabbing
[14] “4 Jailed in Britain Over Slashing Retired Indian General in Revenge Attack.” Fox News. https://www.foxnews.com/world/4-jailed-in-britain-over-slashing-retired-indian-general-in-revenge-attack
[15] “Henry Nowak, Sikh Exemptions and Knife Laws.” The Week. https://theweek.com/law/henry-nowak-sikh-exemptions-knife-laws
[16] “Article.” Hindustan Times (Patiala Edition), December 1, 2018. https://www.pressreader.com/india/hindustan-times-patiala/20181201/281590946630796
[17] “NSS Urges Government to Review Religious Exemptions to Knife Laws.” National Secular Society, June 2026. https://www.secularism.org.uk/news/2026/06/nss-urges-government-to-review-religious-exemptions-to-knife-laws
[18] “Live Coverage.” BBC News. https://bbc.co.uk/news/live/c794g7y3338t
[19] “NSS Urges Government to Review Religious Exemptions to Knife Laws.” National Secular Society, June 2026. https://www.secularism.org.uk/news/2026/06/nss-urges-government-to-review-religious-exemptions-to-knife-laws
[20] “From Nijjar’s Assassination to Diplomatic Strains Between Canada and India: A Timeline.” Outlook India. https://www.outlookindia.com/national/from-nijjars-assassination-to-diplomatic-strains-between-canada-and-india-a-timeline
[21] “How a Killing at a Sikh Temple Led to Canada and India Expelling Each Other’s Diplomats.” PBS NewsHour. https://www.pbs.org/newshour/world/how-a-killing-at-a-sikh-temple-led-to-canada-and-india-expelling-each-others-diplomats
[22] “Pakistan Has Been the Lifeline for the Khalistani Movement.” America Times. https://www.america-times.com/pakistan-has-been-the-lifeline-for-the-khalistani-movement/
[23] “Khalistan Video/Interview.” YouTube. https://www.youtube.com/watch?v=Pnkw5QPpBZ4
[24] “Designated Terrorist Pannun Issues Fresh Threats Ahead of Republic Day.” Business Standard. https://www.business-standard.com/india-news/designated-terrorist-pannun-issues-fresh-threats-ahead-of-republic-day-124011600291_1.html
[25] “Australia and India Should Collaborate to Counter Terrorism.” The Strategist (ASPI). https://www.aspistrategist.org.au/australia-and-india-should-collaborate-to-counter-terrorism/
[26] “18-Year-Old Stabbed by Sikh Man Wielding Ceremonial Blade, Handcuffed by Cops as He Bled to Death.” News.com.au. https://www.news.com.au/lifestyle/real-life/news-life/18yearold-stabbed-by-sikh-man-wielding-ceremonial-blade-handcuffed-by-cops-as-he-bled-to-death/news-story/aec4a2f34dcc850752c7c9a9640f68f7
[27] Instagram post. Instagram. https://www.instagram.com/p/DHWWoBPz2Y5/?img_index=3
[28] “Wisconsin Sikh Temple Shooting.” NBC News. https://www.nbcnews.com/id/wbna44988355
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