न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की ओर: वैश्विक दक्षिण का सांस्कृतिक पुनर्जागरण
- “तीसरी दुनिया” जैसी उपेक्षात्मक सोच को पीछे छोड़ते हुए, शीत युद्ध के बाद “वैश्विक दक्षिण” शब्द ने एक नई, गरिमापूर्ण पहचान बनानी शुरू की।
- ग्लोबल साउथ को केवल उसकी गरीबी या आर्थिक स्थिति से नहीं समझा जा सकता, बल्कि उसके उपनिवेशवादी अतीत को भी ध्यान में रखना ज़रूरी है।
- पिछले 10 सालों में ग्लोबल साउथ ने तेजी से उभर कर दिखाया है कि वह अपने उपनिवेश काल के पुराने नैरेटिव को चुनौती दे रहा है। वह अपनी सभ्यतागत पहचान से शक्ति ले रहा है और एक न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, जिसमें पश्चिमी देशों का वर्चस्व कम हो।
- ग्लोबल साउथ अपनी साझा संस्कृति और इतिहास के आधार पर पश्चिमी दबदबे वाले विचारों का सामना कर सकता है।
- ग्लोबल साउथ के लिए सभ्यता और भू-राजनीति दो अलग चीज़ें नहीं हैं—ये दोनों गहराई से जुड़ी हुई हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं।
लंबे समय तक पश्चिमी मीडिया ने विकासशील और गरीब देशों को जिस नजर से दिखाया, उसे “Third World Gaze” कहना गलत नहीं होगा। उनकी रिपोर्टिंग में इन देशों की सिर्फ़ कुछ खास तरह की खबरें ही दिखाई देती थीं — जैसे गरीबी, भूख, बीमारी, मौत, और अंधविश्वास। इन बातों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर और सनसनीखेज़ अंदाज़ में पेश किया जाता था। कुल मिलाकर, पश्चिमी मीडिया का रवैया नकारात्मक और पूर्वाग्रह से भरा होता था। वह इन देशों को अब भी उनके औपनिवेशिक अतीत और ग़ुलामी की छाया में देखता था। यही वजह थी कि उनकी असली समस्याओं को गहराई से नहीं दिखाया गया, बल्कि उन्हें सतही रूप से और पुराने रूढ़िवादी सोच के साथ “एक्सॉटिक” यानी अजीब और रहस्यमय तरीके से पेश किया गया।
“तीसरी दुनिया” (Third World) शब्द की उत्पत्ति शीत युद्ध के दौर में हुई थी। शुरूआत में इस शब्द का कोई नकारात्मक अर्थ नहीं था। इसका इस्तेमाल उन देशों के लिए किया जाता था जो न तो नाटो (NATO) और न ही वारसा संधि (Warsaw Pact) के गुट में शामिल थे। यह शब्द मूल रूप से फ्रांसीसी इतिहासकार अल्फ्रेड सॉवी द्वारा 1952 में गढ़ा गया था। इसका प्रयोग उन विकासशील देशों के लिए किया गया था, जो उस समय तक भी उपनिवेशवाद के अधीन थे। बाद में समाजशास्त्री पीटर वॉर्सले ने इस शब्द का दायरा बढ़ाते हुए इसका इस्तेमाल गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) से जुड़े देशों के संदर्भ में किया।[1] [2]
लेकिन धीरे-धीरे “तीसरी दुनिया” शब्द की छवि खराब होती चली गई। पश्चिमी मीडिया ने इसका विकृतीकरण कर इसे ग़लत तरीक़े से तोड़ मरोड़ कर पेश किया। और फिर थर्ड वर्ल्ड एक ऐसा शब्द बन गया जिसके माध्यम से विकासशील देशों को ग़रीब, गंदे, गंदगी से भरे और अस्थिर “बनाना रिपब्लिक्स” (यानि खोखले व भ्रष्ट राष्ट्र) के रूप में पेश करने का ट्रेंड शुरू हो गया।[3]
1969 में अमेरिकी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कार्ल ओगेल्सबी ने “वैश्विक दक्षिण” (Global South) शब्द का प्रयोग पहली बार किया। उन्होंने इसका इस्तेमाल उन देशों के लिए किया, जिनका साझा इतिहास उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद से जुड़ा था। वियतनाम युद्ध के दौरान कैथोलिक जर्नल Commonweal में प्रकाशित एक लेख में ओगेल्सबी ने कहा था कि “ वैश्विक दक्षिण पर उत्तर का प्रभुत्व एक अन्यायी और असहनीय वैश्विक व्यवस्था को जन्म दे रहा है”।[4]
किन्तु “ग्लोबल साउथ” शब्द को व्यापक मान्यता शीत युद्ध के अंत और सोवियत संघ के विघटन के बाद ही मिलनी शुरू हुई। विकासशील और अविकसित देशों को संदर्भित करने के लिए इसे एक ज़्यादा संतुलित और तटस्थ शब्द के रूप में देखा गया, जबकि “थर्ड वर्ल्ड” शब्द में एक तरह का हीनता और उपेक्षा का भाव झलकता था, जो विकाशशील और अविकसित देशों को आपत्तिजनक लगता था।[5] [6]
आज की बदलती दुनिया में वैश्विक दक्षिण की भूमिका लगातार बढ़ रही है। पिछले दस सालों को इसके उभार का दौर कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। आज ग्लोबल साउथ उन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं—जैसे संयुक्त राष्ट्र—से ज़्यादा जवाबदेही की मांग कर रहा है। ये वही संस्थाएं हैं जो अब भी उपनिवेशकाल की बनाई हुई ताकतों के असर को दिखाती हैं, या कहें कि “वैश्विक उत्तर” के वर्चस्व को ही सही मानती हैं।
भारत जैसे देशों की कोशिशों से ग्लोबल साउथ का उभार सिर्फ़ भूराजनीति तक सीमित नहीं रह गया है। इसकी असली ताकत है एक गहरी सभ्यतागत और सांस्कृतिक जागरूकता, और एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था की कोशिश, जो सबके लिए न्यायपूर्ण और समान हो। ग्लोबल साउथ की एकता एक ऐसी दुनिया की मांग करती है जो उपनिवेशवादी सोच और ग़ुलामी की मानसिकता से पूरी तरह आज़ाद हो।
अगले कुछ भागों में हम ग्लोबल साउथ के सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को और विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।
ग्लोबल साउथ की परिभाषा: भूगोल नहीं, इतिहास
वैश्विक दक्षिण कोई पारंपरिक समूह नहीं है, न ही यह कोई ऐसा गुट है जो स्पष्ट रूप से परिभाषित हो। ग्लोबल साउथ की ग्रुपिंग भूगोल पर आधारित नहीं है, और इसके अंतर्गत कौन-कौन से देश आते हैं, इसे लेकर भी कोई विशेष सहमति नहीं है। इस शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरेबियन और पश्चिम एशिया के देशों के लिए किया जाता है। इन भिन्न-भिन्न क्षेत्रों को जो पहलू एक सूत्र में जोड़ता है, वह है—उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का साझा इतिहास।
इन देशों ने एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था का सामना किया है, जिसे पश्चिमी ताकतों ने बनाया था—एक ऐसी व्यवस्था जो औपनिवेशिक शोषण, अत्याचार, सांस्कृतिक बदनाम करने, इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने, और संसाधनों की लूट पर टिकी थी।
इसलिए वैश्विक दक्षिण को केवल आर्थिक स्थिति से समझना पर्याप्त नहीं है। इसे सही तरीके से समझने के लिए उसके उपनिवेशवादी अतीत को देखना ज़रूरी है।
इस संदर्भ में चीन की भूमिका बेहद दिलचस्प और विरोधाभासी है। भले ही वह सीधे तौर पर कभी भी औपनिवेशिक शासन के अधीन नहीं रहा, लेकिन उसने आर्थिक साम्राज्यवाद के दंश को बखूबी झेला है। यह चीन के इतिहास का एक ऐसा काला अध्याय था, जिसने उसके राष्ट्रीय स्वाभिमान को छलनी करके रख दिया। इतिहास में मिले अपमान और लगातार हुए प्रतिरोध ने चीन के सामूहिक मनोविज्ञान पर गहरा असर डाला है, जो आज उसकी आक्रामक वैश्विक भूमिका में साफ़ दिखता है। पश्चिमी प्रभुत्व के ख़िलाफ़ चीन का खुला विरोध, और पश्चिमी मानकों को सिरे से ख़ारिज करने की उसकी प्रवृत्ति चीन को वैश्विक दक्षिण के भीतर एक महत्वपूर्ण शक्ति बनाते हैं
19वीं सदी में ब्रिटिश साम्राज्य की नीतियों के कारण चीन में अफ़ीम बड़े पैमाने पर फैली, जिससे समाज में गिरावट और असंतोष फैल गया। इस शोषण के खिलाफ चीन ने विरोध किया, जिससे अफ़ीम युद्ध हुए। लेकिन इन युद्धों में चीन को हार का सामना करना पड़ा, जो उसके लिए बहुत अपमानजनक था। उसे हांगकांग खोना पड़ा, अपने बंदरगाह जबरन विदेशी सामानों के लिए खोलने पड़े, और विदेशियों को कई तरह के विशेष अधिकार देने पड़े।[7] [8] यह घटनाएँ चीन की संप्रभुता के गहरे ह्रास का प्रतीक बनीं, जो आज भी उसकी राष्ट्रीय सामूहिक स्मृति में गहराई से दर्ज हैं।
चीन का इतिहास में झेला गया अपमान आज उसकी वैश्विक शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को दिशा देता है। हालांकि उसके कई तौर-तरीके—जैसे बहुपक्षीयता से दूरी, ऋण-जाल रणनीति और मानवाधिकारों की उपेक्षा—ग्लोबल साउथ के न्यायसंगत और समावेशी विश्व के आदर्शों से मेल नहीं खाते, फिर भी उसका पश्चिमी वर्चस्व का विरोध उसे इस समूह के साथ एकजुट करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन का उदय मुख्यतः उसी मानसिकता से प्रेरित है जो वैश्विक व्यवस्था में पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देना चाहती है।
भारत भी वैश्विक दक्षिण का एक प्रमुख स्तंभ है—एक ऐसा देश जिसने आज़ादी के बाद भी अपनी पहचान को काफी समय तक औपनिवेशिक नजरिए से ही देखा। स्वतंत्रता के बाद नेहरूवादी सोच ने भारत की आंतरिक छवि और उसकी वैश्विक भूमिका को तय करने में बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन यह सोच ब्रिटिश शासन और इस्लामी आक्रमणों की विरासत को महिमा देने पर टिकी थी। इससे पश्चिमी मूल्यों के प्रति एक तरह की मानसिक गुलामी को बढ़ावा मिला, और भारत की अपनी सभ्यतागत और सांस्कृतिक जड़ों को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया गया।
लेकिन पिछले एक दशक में स्थितियाँ बदलने लगी हैं। भारत में अब एक ऐसा सांस्कृतिक और सभ्यतागत पुनर्जागरण उभर रहा है, जिसकी जड़ें उसकी प्राचीन हिंदू विरासत में निहित हैं। यह पुनर्जागरण भारत पर पड़े सदियों पुराने औपनिवेशिक प्रभावों को पीछे छोड़ते हुए, देश की राष्ट्रीय पहचान को नए सिरे से गढ़ रहा है।
अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन के देशों की स्थिति भी कुछ हद तक भारत जैसी ही है। इन क्षेत्रों ने उपनिवेशवाद के गहरे घाव सहे हैं, और आज भी कई देश नव-उपनिवेशवाद और आर्थिक साम्राज्यवाद जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
हालाँकि 20वीं सदी में ज़्यादातर उपनिवेशों ने राजनीतिक स्वतंत्रता पा ली थी और एक हद तक वैश्विक मंच पर भागीदारी भी बढ़ाई, लेकिन पिछले 10–15 वर्षों में वैश्विक दक्षिण एक संगठित ताकत के रूप में सामने आया है। उपनिवेशवादी सोच और प्रभाव अब भी मौजूद हैं पर उन्हें खुलकर चुनौती देने की कोशिश हाल के वर्षों में ज़ोर पकड़ने लगी है।
आज, ग्लोबल साउथ के नाम पर एकजुट होकर इनमें से कई देश अपने स्वदेशी इतिहासों और सांस्कृतिक विरासतों को पुनः प्राप्त करने की मुहिम में लगे हैं। और वे इस प्रयास में पहले से कहीं ज़्यादा मुखर और संगठित हैं।
वैश्विक दक्षिण का सांस्कृतिक पुनर्जागरण और भारत की भूमिका
इस समय वैश्विक दक्षिण में एक गहरा सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण ज़ोरों पर है, और यह प्रक्रिया पिछले एक दशक में तेज़ी से आगे बढ़ी है।
कैरेबियन देशों में यह बदलाव धीरे-धीरे, लेकिन साफ़ और ठोस रूप से दिखने लगा है। अब वहाँ कई देश ब्रिटिश राजशाही से अपने पुराने रिश्ते तोड़ने की ओर बढ़ रहे हैं। सितंबर 2022 में क्वीन एलिज़ाबेथ द्वितीय के निधन के बाद यह प्रक्रिया और तेज़ हो गई, क्योंकि अब ब्रिटिश राजतंत्र की प्रतीकात्मक सत्ता से पूरी तरह आज़ाद होने की इच्छा और भी मज़बूत हो चुकी है।[9]
नवंबर 2021 में बारबेडोस ने खुद को औपचारिक रूप से ब्रिटिश राजशाही से अलग करके एक गणराज्य घोषित कर दिया। डेम सैंड्रा मेसन को बारबेडोस की पहली राष्ट्रपति के रूप में शपथ दिलाई गई।[10] दिसंबर 2024 में जमैका की सरकार ने संसद में एक विधेयक पेश किया, जिसका उद्देश्य संवैधानिक राजशाही को समाप्त कर जमैका को एक गणराज्य में बदलना है।[11] वहीं एंटिगुआ और बरमुडा जल्द ही एक जनमत संग्रह कराने की योजना बना रहा है, ताकि यह तय किया जा सके कि ब्रिटिश सम्राट को वहां के राष्ट्राध्यक्ष के पद से हटाया जाए या नहीं।[12]
जनवरी 2025 में बेलीज़ ने उपनिवेशवाद से मुक्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। उसने अपनी मुद्रा से क्वीन एलिज़ाबेथ II की तस्वीर हटाकर, उसकी जगह पर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े स्थानीय नायकों के चित्र छापने शुरू कर दिये। जमैका में एक आंदोलन तेज़ी से उभर रहा है, जिसमें स्थानीय पाटोआ भाषा को अंग्रेज़ी के स्थान पर आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की माँग की जा रही है। सेंट लूसिया और डोमिनिका ने भी अपने स्कूलों के पाठ्यक्रम में स्वदेशी भाषाओं को शामिल करके औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।[13]
वैश्विक दक्षिण के सभ्यतागत और सांस्कृतिक विमर्श को उपनिवेशवाद से मुक्त करने में भारत की भूमिका को संक्षेप में रेखांकित करना बेहद ज़रूरी है। भारत न केवल इस समूह का एक सदस्य है, बल्कि इसकी एकजुटता और सामूहिक पहचान को आकार देने वाली एक प्रमुख शक्ति भी है।
भारत जिस तरह से अपनी प्राचीन हिंदू विरासत और मूल्यों के माध्यम से अपने सभ्यतागत विमर्श को एक नये सिरे से परिभाषित कर रहा है, वह सांस्कृतिक डिकॉलोनाइज़ेशन (decolonization) का एक ऐसा उत्तम मॉडल बन सकता है, जो वैश्विक दक्षिण के अन्य देशों के लिए मार्गदर्शक बन सके— विशेष तौर पर उन देशों के लिए जो औपनिवेशिक विरासत के महिमामंडन, अंग्रेज़ी भाषा के प्रभुत्व, और स्थानीय संस्कृति, परंपरा, ज्ञान और भाषाओं की उपेक्षा जैसे संकटों से जूझ रहे हैं।
भारत का वैश्विक दक्षिण के साथ जुड़ाव भी सभ्यतागत दृष्टिकोण से ही प्रेरित है। भारत का लक्ष्य उपनिवेशवाद से मुक्ति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साझा विमर्श के आधार पर इस समूह को एकजुट करना है। प्रधानमंत्री मोदी की घाना, अर्जेंटीना, ब्राज़ील, त्रिनिदाद और टोबैगो, और नामीबिया की हालिया यात्रा, इस सोच का एक सटीक उदाहरण है। उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ साझा संघर्ष, लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता, और समावेशी विकास का संकल्प – इन सभी देशों में दिये गये भाषणों के साझा केंद्रबिंदु बन कर उभरे।[14] [15] प्रधानमंत्री ने भारत और वैश्विक दक्षिण के बीच की साझा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का भी ज़िक्र किया। त्रिनिदाद और टोबैगो में उन्होंने विशेष रूप से गिरमिटिया संस्कृति की साझी सभ्यतागत कड़ी को रेखांकित किया, और बताया कि भारत अब गिरमिटिया समुदाय का एक समग्र डेटाबेस तैयार करने की दिशा में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है।[16] यह वही गिरमिटिया समुदाय है जो यूरोपीय उपनिवेशवाद के दौर में बंधुआ मज़दूर (bonded labor) के रूप में भारत से त्रिनिदाद की धरती पर लाया गया था, और आज वहाँ की भारतीय प्रवासी आबादी का मुख्य हिस्सा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत सभ्यतागत दृष्टिकोण और भू-राजनीतिक लक्ष्यों को साथ जोड़कर वैश्विक दक्षिण को साझा मुद्दों पर एकजुट करने का प्रयास कर रहा है—ताकि एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था की स्थापना की जाये, जो वर्तमान व्यवस्था की तुलना में कहीं ज़्यादा न्यायसंगत हो, और सभी देशों को बराबरी के अवसर प्रदान करे। यह दृष्टिकोण कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है:
- उग्रवाद और आतंकवाद का विरोध।
- संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान।
- विस्तारवाद का विरोध।
- लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा।
- समावेशी विकास का समर्थन।
- और सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम सेदेश के आंतरिक विमर्श और उसकी बाहरी छवि, दोनों को पुनः परिभाषित करना।
उपनिवेशवाद के मुआवज़े की माँग
पिछले एक दशक में वैश्विक दक्षिण की एकजुटता ने जैसे जैसे ज़ोर पकड़ा है, वैसे वैसे ऐसे कई मुद्दे, जिन्हें अब तक दबा दिया गया था, तेज़ी से सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आ रहे हैं। ग्लोबल साउथ के देश अब न केवल अपनी सामाजिक व्यवस्थाओं को उपनिवेशीकरण के शाप से मुक्त कर रहे हैं, बल्कि पूर्व उपनिवेशवादी शक्तियों से जवाबदेही की भी मांग कर रहे हैं—उस लूट और शोषण के लिए, जिसका दंश उन्होंने दशकों तक झेला।
इनमें से जो सबसे ज़्यादा विवादास्पद और तेज़ी से उभरने वाली मांग है, वह है Colonial Reparations यानी उपनिवेशवाद के मुआवज़े की माँग। कैरेबियन और अफ्रीका के कई देश अब फ्रांस और ब्रिटेन जैसे पूर्व साम्राज्यवादी देशों से खुलकर मुआवज़े की माँग कर रहे हैं। सीधी भाषा में कहें तो, ये पूर्व उपनिवेश अब उस शारीरिक, मानसिक और आर्थिक क्षति के लिए वित्तीय मुआवज़ा मांग रहे हैं, जो उनके नागरिकों और अर्थव्यवस्थाओं पर ग़ुलामी के दौरान थोपी गई थी।[17]
कैरेबियन देशों और अफ़्रीकी संघ (African Union) की एक प्रमुख योजना यह भी है कि वे मिलकर एक “united front” का गठन करें, जिससे यूरोपीय देशों पर इस बात को लेकर दबाव बनाया जा सके कि वे गुलामी और उपनिवेशवाद की बर्बरताओं के लिए वित्तीय हर्जाना चुकायें। इस दिशा में ऐतिहासिक पहल नवंबर 2023 में घाना में प्रथम Reparations Conference (पुनरावृत्ति सम्मेलन) के आयोजन से हुई। इस सम्मेलन की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसमें भाग लेने वाले देशों ने मिलकर एक वैश्विक पुनरावृत्ति कोष (Global Reparations Fund) स्थापित करने पर सहमति जताई—जिसका उद्देश्य अफ़्रीकियों को दासत्व का व्योपार (slave trade) की क्षतिपूर्ति हेतु मुआवज़ा प्रदान करना है।[18]
पिछले कुछ वर्षों में उपनिवेशवाद के मुआवज़े के आंदोलन को जो ज़ोर मिला है, उसने ब्रिटेन—जो प्रमुख औपनिवेशिक शक्तियों में से एक था—पर भारी दबाव डाला है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीयर स्टारमर और किंग चार्ल्स III से अब 261 बिलियन डॉलर की चौंका देने वाली राशि के मुआवज़े की माँग की जा रही है, ख़ासतौर पर अटलांटिक दासत्व के व्योपार में ब्रिटेन की भूमिका को लेकर। वैश्विक दक्षिण के कई नेताओं, विशेष रूप से बारबेडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली, ने पूर्व औपनिवेशिक ताकतों से इस “बर्बर इतिहास” के लिए खुलकर मुआवज़े की माँग की है। मिया मोटली लगातार यह कहती आई हैं कि पुनरावृत्ति “वैश्विक पुनर्संतुलन” का एक अनिवार्य हिस्सा होनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन में उन्होंने यह भी ज़ोर देकर कहा कि आज की वैश्विक कूटनीति में हमें गुलामी और उपनिवेशवाद की विरासत का खुलकर सामना करने की ज़रूरत है।[19]
नवंबर 2024 में सामोआ में हुए कॉमनवेल्थ शिखर सम्मेलन में औपनिवेशिक मुआवज़े की माँग को लेकर माहौल काफी गर्म रहा। इस मुद्दे ने ब्रिटेन को असहज कर दिया, क्योंकि कई देशों ने प्रधानमंत्री कीयर स्टारमर और किंग चार्ल्स III की मौजूदगी में ही साफ़ शब्दों में मुआवज़े की मांग रखी। ब्रिटेन ने इन माँगों को पूरी तरह से खारिज कर दिया और हमेशा की तरह वही पुराने तर्क दोहराए—कि अतीत को पीछे छोड़कर हमें अब जलवायु परिवर्तन जैसे वर्तमान मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए, जिनमें वह कुछ “सहायता” देने को तैयार है। यह रवैया सम्मेलन में मौजूद देशों के लिए एक तरह से टालमटोल और दिखावटी सहानुभूति जैसा लगा।[20]
भले ही भारत ने अब तक औपचारिक रूप से ब्रिटेन से मुआवज़े की मांग नहीं की है, लेकिन उसने उपनिवेशवाद की आलोचना करने में कभी संकोच नहीं दिखाया। भारतीय नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसे मुद्दे खुलकर उठाए हैं। कुल मिलाकर, भारत ने पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती देने और वैश्विक दक्षिण के साझा मुद्दों पर एकजुटता बनाने में अहम भूमिका निभाई है।[21]
साँझी परंपराएँ, साँझा प्रतिरोध
ग्लोबल साउथ को एकजुट करने में उसकी साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत की भी अहम भूमिका है। ध्यान से देखने पर हिंदू धर्म और अफ्रीका व लैटिन अमेरिका की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं के बीच कई चौंकाने वाली समानताएँ मिलती हैं—खासतौर पर उन परंपराओं में जो ईसाई धर्म के आने से पहले वहाँ मौजूद थीं। इन देशों की एक समृद्ध बौद्धिक विरासत भी रही है। उदाहरण के लिए, ग्लोबल साउथ का साहित्य उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का एक सशक्त माध्यम बना। साथ ही, इनके सांस्कृतिक मूल्य, नैतिक सोच, दर्शन, कला, और स्थानीय ज्ञान परंपराओं में भी आपसी मेलजोल साफ़ देखा जा सकता है।
उदाहरण के तौर पर, अफ़्रीकी जनजातीय संस्कृतियों में कई देवताओं की मान्यता होती थी—हर देवता किसी न किसी विशेष कार्य या प्राकृतिक तत्व से जुड़ा होता था, जैसे पवन देवता या वर्षा देवता। प्रकृति और जीवन के अलग-अलग पहलुओं को दर्शाने वाली यह देवता-प्रथा हिंदू धर्म की परंपराओं से काफी हद तक मेल खाती है। लेकिन बाद में ईसाई मिशनरियों के ज़रिए चलाए गए ज़ोरदार धर्मांतरण अभियानों ने अफ़्रीका की कई मूल सांस्कृतिक परंपराओं को नष्ट कर दिया, और वहाँ की सांस्कृतिक चेतना पर एक अब्राहमिक सोच थोप दी गई।[22]
इसी तरह दक्षिण-पूर्व एशिया—जो वैश्विक दक्षिण का एक अहम हिस्सा है—भी अपनी सभ्यतागत विरासत के बल पर एक सांस्कृतिक सूत्र में बंधा हुआ है। रामायण इस साझा विरासत की एक प्रमुख कड़ी है। चाहे थाईलैंड हो, मलेशिया या कंबोडिया, विविध स्थानीय परंपराएँ होने के बावजूद, रामकथा की परंपरा एक ऐसा सांस्कृतिक धागा है, जो इन्हें आध्यात्मिक और सभ्यतागत रूप से एक दूसरे से जोड़ता है।
मौखिक परंपराएँ भी ग्लोबल साउथ को जोड़ने वाला एक मजबूत सांस्कृतिक सेतु हैं। लोककथाओं और कहानियों की मौखिक परंपरा ने लैटिन अमेरिका की सभ्यता और समाज को प्राचीन समय से ही समृद्ध और जीवंत बनाए रखा है।[23] उपनिवेशवाद के भारी दबाव के बावजूद, स्थानीय विश्वासों और सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने में मौखिक परंपराओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। भारत में भी मौखिक संस्कृति की एक जीवंत और समृद्ध परंपरा है। यहाँ की लोक कलाएँ—जैसे संगीत, नृत्य, कविता, अभिनय और नाट्य—अक्सर एक साथ जुड़ी होती हैं। इन परंपराओं ने ऐसे कला-रूपों को जन्म दिया है, जिनमें कई विधाओं का सुंदर मेल देखने को मिलता है। इन लोक परंपराओं में बदलाव को अपनाने की अद्भुत क्षमता होती है, और हर प्रस्तुति पारंपरिक कला की सीमाओं से आगे बढ़कर एक नई और मौलिक अभिव्यक्ति का रास्ता खोलती है।
वैश्विक दक्षिण आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ वह अपनी साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान के बल पर न सिर्फ़ आपसी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को और ज़्यादा मज़बूत कर सकता है, बल्कि पश्चिमी वर्चस्व वाले विमर्श को सशक्त चुनौती भी दे सकता है। इन देशों के पास अपनी स्थानीय ज्ञान परंपराओं, सांस्कृतिक रीति-रिवाजों और परंपरागत जीवन दृष्टियों को सहेजने और आगे बढ़ाने का एक सुनहरा मौक़ा है। यदि वैश्विक दक्षिण के देश मिलकर ऐसे संयुक्त मंचों का निर्माण करें जहाँ इस साँझा सांस्कृतिक विरासत को फलने फूलने के पर्याप्त अवसर मिलें, तो न सिर्फ़ ग़ुलामी के इतिहास के अंधेरे पन्नों को पलटा जा सकता है, बल्कि इन राष्ट्रों की पहचान और अस्मिता को भी पुनः प्रतिष्ठित किया जा सकता है। इसके अलावा शिक्षा प्रणाली और पाठ्यक्रम को औपनिवेशीकरण की छाप से मुक्त कराने में भी वैश्विक दक्षिण निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
पश्चिमी वर्चस्व के खिलाफ आंदोलन
वैश्विक दक्षिण की एकता केवल उसके साझा इतिहास या सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है। आज ग्लोबल साउथ पूरी ऊर्जा के साथ समकालीन वैश्विक मुद्दों के केंद्र में संगठित हो रहा है। उसका साझा एजेंडा एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की कल्पना करता है जो न्यायसंगत हो, जहाँ सभी देशों को समान अधिकार और अवसर मिलें। सबसे अहम बात यह है कि वह ऐसी व्यवस्था की वकालत करता है जो पश्चिमी प्रभुत्व से मुक्त हो।
BRICS, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों के ज़रिए ग्लोबल साउथ उन मुद्दों को उठाता है, जो न केवल उसके अपने लिए अहम हैं, बल्कि पूरी दुनिया की व्यवस्था को एक नई दिशा देने की क्षमता रखते हैं। चाहे बात जलवायु न्याय की हो, हरित ऊर्जा में सहयोग की, आतंकवाद के खिलाफ साझेदारी की, या निष्पक्ष व्यापार और तकनीक हस्तांतरण की—ये सभी विषय उन ऐतिहासिक अन्यायों को संतुलित करने में मदद कर सकते हैं, जो कभी औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा ग्लोबल साउथ पर थोपे गए थे। साथ ही, ये मुद्दे एक ऐसी नई वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में भी योगदान करते हैं, जो बहुपक्षीयता और नियम-आधारित ढांचे पर आधारित हो—जहाँ हर राष्ट्र को समान अवसर और न्यायपूर्ण मंच मिले।
भारत द्वारा शुरू की गयी वॉइस ऑफ़ द ग्लोबल साउथ समिट इस दिशा में एक अहम कदम है। वैश्विक दक्षिण की एकता को मज़बूत करने में यह समिट महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं, खासकर उन मुद्दों को लेकर जो सभी देशों के लिए ज़रूरी हैं — जैसे कि संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार। वॉइस ऑफ़ द ग्लोबल साउथ समिट की शुरुआत जनवरी 2023 में हुई थी। इसके बाद दूसरा सत्र नवंबर 2023 में और तीसरा सत्र अगस्त 2024 में आयोजित हुआ।[24]
हालांकि अभी यह समिट सिर्फ वर्चुअल (ऑनलाइन) रूप में ही हो रही है, फिर भी यह एक नई वैश्विक व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभा सकती है — ऐसी व्यवस्था जो लोकतांत्रिक और समावेशी मूल्यों (inclusive values) पर आधारित हो।
समापन टिप्पणी
अंततः यह समझना ज़रूरी है कि वैश्विक दक्षिण के संदर्भ में सभ्यतागत और भू-राजनीतिक विमर्श एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।
ग्लोबल साउथ अगर अपनी साझा सभ्यतागत और सांस्कृतिक विरासत के बल पर औपनिवेशिक विमर्श को चुनौती दे, तो वह भू-राजनीतिक हालात को वाक़ई में अपने पक्ष में मोड़ सकता है।
सन्दर्भ सूची
[1] The Global South is on the rise – but what exactly is the Global South?; https://theconversation.com/the-global-south-is-on-the-rise-but-what-exactly-is-the-global-south-207959
[2] Third World – Overview, Definitions, and Controversies; https://corporatefinanceinstitute.com/resources/economics/third-world/
[3] The Global South is on the rise – but what exactly is the Global South?; https://theconversation.com/the-global-south-is-on-the-rise-but-what-exactly-is-the-global-south-207959
[4] The Term “Global South” Is Surging. It Should Be Retired. | Carnegie Endowment for International Peace; https://carnegieendowment.org/posts/2023/08/the-term-global-south-is-surging-it-should-be-retired?lang=en
[5] Ibid.
[6] The Global South is on the rise – but what exactly is the Global South?; https://theconversation.com/the-global-south-is-on-the-rise-but-what-exactly-is-the-global-south-207959
[7] British Imperialism in China | Guided History; https://blogs.bu.edu/guidedhistory/moderneurope/tao-he/
[8] The Opium Wars in China | Asia Pacific Curriculum; https://asiapacificcurriculum.ca/learning-module/opium-wars-china
[9] Is it time for the colonizers to pay back trillions of dollars they looted?; https://hindupost.in/history/is-it-time-for-the-colonizers-to-pay-back-trillions-of-dollars-they-looted/
[10] Barbados becomes a republic and parts ways with the Queen; https://www.bbc.com/news/world-latin-america-59470843
[11] Jamaica tables bill to oust King Charles as head of state and become a republic | Jamaica | The Guardian; https://www.theguardian.com/world/2024/dec/13/jamaica-king-charles-republic
[12] Antigua and Barbuda to vote on whether to remove British monarch as head of state, PM says | CNN; https://edition.cnn.com/2022/09/11/americas/antigua-barbuda-referendum-republic-king-charles-intl
[13] The long Wave: Why more countries are ditching the British monarchy | Race | The Guardian; https://www.theguardian.com/news/2025/feb/05/heir-today-gone-tomorrow-why-more-countries-are-ditching-the-uk-monarchy
[14] PM addresses the Parliament of Ghana | Prime Minister of India; https://www.pmindia.gov.in/en/news_updates/pm-addresses-the-parliament-of-ghana/
[15] India Proud To Have Stood With Namibia During Freedom Struggle, Says PM Modi | Republic World; https://www.republicworld.com/india/breaking-india-proud-to-have-stood-with-namibia-during-freedom-struggle-says-pm-modi
[16] India building comprehensive database of Girmitiya community: PM Modi | India News – Business Standard; https://www.business-standard.com/india-news/oci-cards-for-6th-gen-indian-origin-citizens-of-trinidad-125070400077_1.html
[17] Is it time for the colonizers to pay back trillions of dollars they looted?; https://hindupost.in/history/is-it-time-for-the-colonizers-to-pay-back-trillions-of-dollars-they-looted/
[18] Ibid.
[19] King Charles III and Keir Starmer to face $240 billion slavery reparations demand – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/world-news/us-news/king-charles-iii-and-keir-starmer-to-face-240-billion-slavery-reparations-demand-101728864351745.html
[20] India To Africa, Calls For Britain To Pay Reparations Are Growing;https://www.ndtv.com/opinion/india-to-africa-calls-for-britain-to-pay-reparations-are-growing-6939422
[21] Is it time for the colonizers to pay back trillions of dollars they looted?; https://hindupost.in/history/is-it-time-for-the-colonizers-to-pay-back-trillions-of-dollars-they-looted/
[22] Could cultural and religious affinity between Hindus and African religions be an effective antidote to the woke lobby’s propaganda of pitting Blacks vs Hindus?; https://hindupost.in/society-culture/could-cultural-and-religious-affinity-between-hindus-and-african-religions-be-an-effective-antidote-to-the-woke-lobbys-propaganda-of-pitting-blacks-vs-hindus/
[23] Humanities Institute – Latin American Oral Narratives; https://humanitiesinstitute.org/__static/401eb99b44872547eb6a9300a934da92/lamerica-oralnarrative.pdf?dl=1#:~:text=Not%20only%20did%20the%20oral,force%20in%20maintaining%20cultural%20identity.
[24] The UN’s Future in a Multipolar World: Change or Perish; https://stophindudvesha.org/the-uns-future-in-a-multipolar-world-change-or-perish/
Donate to HINDUDVESHA
Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.
SUPPORT US