सेक्युलरिज़्म का मुखौटा, हिन्दू धर्म पर वार: एक कानूनी विश्लेषण (भाग 1)

धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर भारत में एकपक्षीय नीतियाँ चलाई जा रही हैं, जिनमें हिन्दू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण है, हिन्दू संस्थाओं को दबाया जाता है, उनके धार्मिक अधिकारों का हनन किया जाता है, और दूसरे धर्मों को खुली छूट देता है। यह धार्मिक स्वतंत्रता नहीं, सरासर धोखा है।
  • भारत की आत्मा पश्चिमी देशों की तरह कृत्रिम सेक्युलरिज़्म पर नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी धर्म-आधारित बहुलतावादी सभ्यता पर टिकी है, जहाँ विविधता स्वाभाविक है और किसी एक ईश्वर या विचार की निरंकुश श्रेष्ठता नहीं थोपी जाती।
  • भारत में धार्मिक सौहार्द और विविधता कोई संविधान की देन नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म और अन्य देशी परंपराओं के साथ हजारों सालों की सह-अस्तित्व की यात्रा का परिणाम है।
  • आज़ादी के बाद भारत ने एक पश्चिमी सेक्युलर मॉडल अपनाया जिसमें चर्च और राज्य के अलगाव की बात होती है, लेकिन विडंबना यह है कि यह मॉडल हिन्दू संस्थाओं पर तो सरकारी नियंत्रण को जायज़ मानता है, पर अल्पसंख्यक धर्मों को पूरी स्वायत्तता देता है।
  • निष्पक्षता के नाम पर राज्य हिन्दू मंदिरों का प्रशासन अपने हाथ में लेता है, धार्मिक शिक्षा पर नियंत्रण रखता है, और हिन्दू क़ानूनों में मनचाहा संशोधन करता है — जबकि ईसाई और इस्लामी संस्थाओं को बिना रोकटोक मज़बूती से बढ़ने देता है।
  • भारतीय सेक्युलरिज़्म सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार का दावा करता है, लेकिन व्यवहार में यह अपने ही सांस्कृतिक आधार — यानी हिन्दू समाज — को कानूनी असमानताओं में जकड़ चुका है, जबकि अल्पसंख्यक समुदायों को संविधान के नाम पर विशेषाधिकार मिलते हैं।

भारत में लगभग 80% लोग खुद को हिन्दू मानते हैं, इसलिए ऐसा सोचना स्वाभाविक ही है कि हिन्द समुदाय सांस्कृतिक रूप से सुरक्षित और संस्थागत रूप से सशक्त होगा। बल्कि पश्चिमी अकादमिक संस्थानों और भारत के तथाकथित सेक्युलर वर्ग ने तो मिलकर एक ऐसी वैश्विक धारणा बना दी है जिसमें हिन्दुओं को एक वर्चस्ववादी बहुसंख्यक दिखाया जाता है, जो अल्पसंख्यकों — विशेषकर मुसलमानों और ईसाइयों — के अधिकारों का दमन करता है।

धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर भारत में एकपक्षीय नीतियाँ चलाई जा रही हैं, जिनमें हिन्दू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण है, हिन्दू संस्थाओं को दबाया जाता है, उनके धार्मिक अधिकारों का हनन किया जाता है, और दूसरे धर्मों को खुली छूट देता है। यह धार्मिक स्वतंत्रता नहीं, सरासर धोखा है।

लेकिन जब हम भारत के संवैधानिक और क़ानूनी ढांचे को गहराई से देखते हैं, तो तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई देती है। जिस सभ्यता ने इस राष्ट्र को उसकी पहचान दी, उसी के विरुद्ध ऐसे ऐसे कानून गढ़ दिए गए हैं जो वर्चस्व नहीं, बल्कि योजनाबद्ध तरीक़े से उसके अधिकारों का गला घोंटते हैं — और इस प्रक्रिया को “संतुलन” कहा जाता है।

आज़ादी के बाद भारत ने धर्मनिरपेक्ष दिखने के चक्कर में एक अजीबोगरीब मॉडल अपनाया, जहाँ हिन्दू मंदिरों को तो सरकार नियंत्रित करती है, लेकिन मस्जिदें और चर्च स्वतंत्र हैं; जहाँ अल्पसंख्यक स्कूलों को धार्मिक शिक्षा की छूट है, लेकिन हिन्दू स्कूलों को नहीं; और जहाँ ‘प्रगति’ के नाम पर केवल हिन्दू निजी कानून बदले गए, जबकि अल्पसंख्यकों के कानूनों को किसी की भावना आहत न हो इसलिए हाथ तक नहीं लगाया गया। हिन्दू पर्सनल लॉ में “प्रगतिशीलता” के नाम पर बदलाव कर दिए गए, लेकिन अल्पसंख्यकों के क़ानूनों को आज तक नहीं छेड़ा गया — क्योंकि उनकी “धार्मिक भावनाएं” आहत न हों। यहां तक कि भारतीय संविधान में दिया गया ‘धर्म प्रचार का अधिकार’ जो दिखने में मासूम लगता है, आज मिशनरी संगठनों के लिए एक उपकरण बन गया है, जिससे वे आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर हिन्दुओं को संगठित रूप से धर्मांतरित कर रहे हैं।

इस दो-भाग वाली सीरीज़ में हम उन क़ानूनों पर बात करेंगे — कुछ जो अंग्रेजों के ज़माने से चले आ रहे हैं, और कुछ जो आज़ादी के बाद बनाए गए — जिनकी वजह से हिन्दू समाज के अधिकार, स्वायत्तता और संस्थाएँ लगातार कमजोर हुईं। समानता की रक्षा करने के नाम पर एक ऐसा सिस्टम बना दिया गया है जिसमें हिन्दू समाज को अपने ही देश में शक की निगाह से देखा जाता है — और ये सब “सेक्युलरिज़्म” के नाम पर होता है।

 धर्म प्रचार या धर्मांतरण की छूट? अनुच्छेद 25 और उसका असर

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25(1) हर नागरिक को “अंतरात्मा की स्वतंत्रता और अपने धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार”[1] देता है। सुनने में ये बहुत आदर्श बात लगती है, लेकिन इसमें एक शब्द है — “प्रचार” — जो अब सिर्फ़ एक शब्द न रह कर हिंदु धर्म  के विरुद्ध एक हथियार बन गया है।

भारत में बहुत बड़ी आबादी ग़रीबी, अशिक्षा और सामाजिक असुरक्षा से जूझ रही है। ऐसे में यही “प्रचार” विदेशी फंड से चलने वाले ईसाई मिशनरियों और इस्लामी संगठनों के लिए धर्म परिवर्तन का रास्ता बन गया है।

ये चिंता आज की नहीं है। संविधान सभा में 1948 में ही कई सदस्यों ने चेतावनी दी थी कि “प्रचार” शब्द जबरन या धोखे से धर्मांतरण का जरिया बन सकता है।[2] परंतु जवाब में कहा गया था कि इस शब्द का मतलब बस अपने धर्म की बात करना है, न कि किसी को मजबूर करना। लेकिन शायद ही किसी ने सोचा था कि यही प्रचार शब्द एक दिन इतने बड़े और संगठित अभियान का रूप ले लेगा।

भारत सरकार की 2019-2020 की रिपोर्ट दिखाती हैं कि विदेश से आने वाला पैसे का 70% से ज़्यादा भाग ईसाई संगठनों को मिल रहा है।[3] दिखाने के लिए ये पैसा आदिवासी इलाकों में “सामाजिक सेवा” के नाम पर लगता है, लेकिन इसका असली मक़सद केवल धर्मांतरण होता है।

इसका सांविधानिक भूल का असर अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे कुछ राज्यों में साफ़ दिखता है। अरुणाचल में 1951 में ईसाई आबादी सिर्फ़ 0.7% थी, जो 2011 में 30% से ज़्यादा हो गई। ये सब अचानक नहीं हुआ। बल्कि जवाहरलाल नेहरू ने उत्तर-पूर्व भारत का पूर्ण विलय न करके और विदेशी मिशनरियों को बिना रोकटोक प्रवेश देकर यह स्पष्ट कर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 25(1) में ‘प्रचार करने’ (propagate) को शामिल करने के पीछे असली मंशा क्या थी। ‘लिबर्टी’ और ‘सेक्युलरिज़्म’ के नाम पर नेहरू की हिन्दू विरोधी नीतियों ने न केवल हिन्दू सभ्यता की जड़ों को खोखला किया, बल्कि संवेदनशील सीमावर्ती और जनजातीय क्षेत्रों में धार्मिक असंतुलन को संस्थागत रूप से बढ़ावा दिया।[4]

पिछले छः दशकों में किसी भी सरकार ने इस विषय पर ध्यान देना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझ। जब भी सवाल उठते हैं, “धर्मनिरपेक्षता” की बात कहकर टाल दिया जाता है। सरकार की इसी उदासीनता के कारण मिशनरियों को अनुचित तरीकों से धर्मांतरण करने का खुला मैदान मिल रहा है। कुछ राज्यों ने धर्मांतरण रोकने के कानून बनाए भी हैं, पर न तो नियमों को कठोर रूप से लागू नहीं किया जा रहा है, और न ही न्यायिपालिका स्पष्ट रूप से हस्तक्षेप कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने 1977 में साफ़ फैसला दिया था कि प्रचार का मतलब जबरन धर्म बदलवाना नहीं है[5], पर ज़मीनी हकीकत यह है कि अनुसूचित जनजाति और दलित जैसे ग़रीब और कमज़ोर समुदायों का पैसे का लालच देकर धर्म परिवर्तन किया जा रहा है।

कहने को तो अनुच्छेद 25 का मकसद व्यक्तिगत आस्था की रक्षा करना था। लेकिन असल में ये कानून एक ऐसा कवच बन गया है जिसका इस्तेमाल शक्तिशाली मिशनरी संगठन ग़रीबों को अपना निशाना बनाने में कर रहे हैं। अगर सरकार ने अब भी साहस नहीं दिखाया, तो ये मुद्दा सिर्फ़ धर्म या जनसंख्या का नहीं रहेगा — ये हमारे गांव-गांव में फैलता एक सभ्यतागत संकट बन जाएगा।

 अनुच्छेद 28 और 30: कक्षा में धर्मग्रंथ पढ़ाए जा सकते हैं, यदि वे हिन्दू धर्म के न हों

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28(1) कहता है कि जो स्कूल सरकार के पैसे से चलते हैं, उनमें किसी भी तरह की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती।[6] मतलब, सरकारी स्कूलों में धार्मिक तटस्थता बनाए रखनी चाहिए। वैसे यह बात ठीक लगती है, लेकिन जब इसी को अनुच्छेद 30(1) के साथ जोड़ा जाए — जो अल्पसंख्यक समुदायों को अपने स्कूल खोलने और चलाने की पूरी आज़ादी देता है[7] — तो एक बहुत बड़ा विरोधाभास सामने आता है।

पहली बात तो ये है कि अनुच्छेद 28 का सब से ज्यादा असर हिन्दू बच्चों पर पड़ता है, क्योंकि ज़्यादातर बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते हैं। इस का नतीजा ये है कि हिन्दू बच्चों को ना भगवद गीता, ना उपनिषद और ना ही अपने धर्म और संस्कृति की बुनियादी बातों की कोई औपचारिक जानकारी मिलती है।

दूसरी तरफ़, अदालती और सरकारी व्याख्याओं के अनुसार, अनुच्छेद 30 के तहत ईसाई मिशनरी स्कूलों और इस्लामी मदरसों को धार्मिक शिक्षा की खुली छूट मिलती है, भले ही वे सरकारी फंडिंग प्राप्त कर रहे हों। अनुच्छेद 30 का हवाला देकर मिशनरी स्कूल न केवल सरकारी फंडिंग पाते हैं, बल्कि अपने संस्थानों में खुलेआम धार्मिक प्रतीकों और शिक्षाओं का प्रयोग भी करते हैं। ये स्कूल क्रॉस लगाते हैं, ईसाई त्योहार मनाते हैं और बाइबिल को शिक्षा का हिस्सा बनाते हैं—और यह सब ‘सेक्युलर भारत’ में वैध माना जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के T.M.A. Pai केस (2002)[8] में ये साफ़ कर दिया गया कि अल्पसंख्यक संस्थानों को अपने स्कूलों को अपने तरीक़े से चलाने का पूरा हक़ है, जिसमें धार्मिक पढ़ाई भी शामिल है। लेकिन ये हक़ हिन्दू बहुसंख्यकों को नहीं दिया गया। बाद के फैसलों — जैसे P.A. इनामदार (2005) [9] और अशोक ठाकुर केस (2008)[10] — में भी यही स्थिति बनी रही, और इस भेदभाव को ठीक करने की कोई कोशिश नहीं की गई।

इसके अतिरिक्त, NCERT की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या (2005 और 2023) [11][12]  में भी हिन्दू धर्म और दर्शन की पढ़ाई को “धर्मनिरपेक्षता” के नाम पर बाहर रखा गया है। सरकार की नीतियों का दोहरापन इस बात से स्पष्ट है कि, कई राज्यों में मदरसा शिक्षा को SPQEM जैसी योजनाओं के तहत प्रत्यक्ष सब्सिडी दी जाती है—जबकि हिन्दू धर्मशिक्षा को सार्वजनिक क्षेत्र से बाहर धकेला जाता है।

सरकार की इन नीतियों का असर हिन्दू समाज पर बहुत गहरा पड़ा है। एक तरफ़ उनकी संस्कृति को स्कूलों से धीरे-धीरे हटा दिया गया है, दूसरी तरफ़ अल्पसंख्यकों को अपनी परंपराएं पढ़ाने और फैलाने की पूरी छूट है। इसका नतीजा यह है कि हिन्दू युवाओं का अपनी जड़ों से जुड़ाव कम होता जा रहा है, और वे अपनी ही सभ्यता को लेकर हीन भावना महसूस करने लगे हैं।

अनुच्छेद 28 और 30 के बीच जो टकराव है, वह सिर्फ़ क़ानूनी नहीं है — यह सीधा देश की सांस्कृतिक समानता और पहचान से जुड़ा सवाल है। अगर किसी लोकतंत्र में “सेक्युलरिज़्म” का मतलब सिर्फ़ कुछ समुदायों को छूट देना और बहुसंख्यकों को रोकना है, तो ये भेदभाव की एक गहरी व्यवस्था बन जाती है। अगर हम वाक़ई सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं, तो ज़रूरी है कि धार्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा पर सभी को बराबर का अधिकार मिले — न कि किसी को विशेष सुविधा और किसी को पूरी तरह वंचित रखा जाए।

राज्य का हिन्दू मंदिरों पर नियंत्रण — लेकिन मस्जिदों या चर्चों पर नहीं

आज़ादी के बाद भारत में हिन्दू मंदिरों पर सरकार का सीधा नियंत्रण शायद सबसे बड़ा भेदभावपूर्ण कदम रहा है, जिसे “सेक्युलर शासन” का नाम देकर सही ठहराया जाता है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों ने Hindu Religious and Charitable Endowments (HRCE) क़ानूनों के ज़रिए सरकार को मंदिरों की संपत्ति और प्रशासन का पूरा अधिकार हड़पा लिया है। जैसा कि Stop Hindu Dvesha की एक रिपोर्ट में बताया गया है, ये कोई नया मॉडल नहीं है।[13]

ये ठीक उसी नीति का आधुनिक रूप है जो ब्रिटिशों ने 1817 में Madras Regulation VII के तहत शुरू की थी[14], ताकि हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को कमज़ोर किया जा सके और मंदिरों की संपत्ति पर नियंत्रण पाया जा सके। विडंबना ये है कि भारत ने, स्वतंत्रता के बाद इन औपनिवेशिक क़ानूनों को हटाने के बजाय, और अधिक मज़बूत कर दिया। 1951 में बना Madras HRCE Act पहला बड़ा कानून था, जो बाद में बाकी राज्यों में भी लागू हुआ। इसके तहत सरकार ने हिन्दू मंदिरों को “सरकारी संपत्ति” मान लिया और वहां ऐसे अफ़सर भेजे जो कई बार हिन्दू धर्म की परंपराओं से बिल्कुल अनजान होते हैं — कई बार तो वो हिन्दू भी नहीं होते। ये अफ़सर मंदिरों की आय, पुजारियों की नियुक्ति, पूजा-पद्धति और त्योहारों तक को नियंत्रित करते हैं।

इसका बहुत गंभीर असर हुआ। 2015 की Comptroller and Auditor General (CAG) रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु के मंदिरों की 5,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की आय या तो ग़लत तरीक़े से खर्च हुई या उसका कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। हज़ारों मंदिरों में स्थायी पुजारियों भी नहीं हैं, और कई मंदिर तो प्रशासनिक उदासीनता व फंड के दुरुपयोग के कारण जर्जर अवस्था में पहुँच चुके हैं। पूजा और पर्व महज़ कागज़ी बनकर रह गए हैं, और मंदिर की ज़मीनें अवैध रूप से लीज़ पर दी जा रही हैं या उन पर अवैध क़ब्ज़ा हो चुका है, और हिन्दू समाज कुछ कर भी नहीं सकता।

दूसरी तरफ़, ईसाई और मुस्लिम संस्थानों के साथ ऐसा कुछ नहीं होता। चर्च और मस्जिदें पूरी तरह खुद के लोगों द्वारा चलती हैं। ईसाई संस्थानों का प्रशासन मिशनरी बोर्ड्स करते हैं, और मुस्लिम संपत्तियां वक्फ़ बोर्ड के अधीन होती हैं, जो Waqf Act, 1995 के तहत काम करता है। ये वक्फ़ बोर्ड न सिर्फ़ पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं, बल्कि वे किसी भी ज़मीन को “वक्फ़ संपत्ति” घोषित करके क़ब्ज़ा कर सकते हैं — और इसे कोर्ट में चुनौती देना भी आसान नहीं होता।

यह दोहरा रवैया सीधा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन है, जो हर धर्म को अपने धार्मिक संस्थान और व्यवस्थाएं खुद चलाने का अधिकार देता है। लेकिन हकीकत में यह अधिकार सिर्फ़ अल्पसंख्यकों को मिलता है। भारत में केवल हिन्दू धर्म को ही ऐसी स्थिति में रखा गया है, जहाँ उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संस्थाएं सरकारी हस्तक्षेप और प्रबंधन के अधीन हैं।

अदालतों ने भी इस व्यवस्था को अक्सर सही माना है। 1955 में सुंदरराजा अयंगर बनाम मद्रास राज्य केस में मद्रास हाई कोर्ट ने HRCE एक्ट को वैध बताया[15] और कहा कि मंदिर का प्रशासन “धर्मनिरपेक्ष गतिविधि” है। 2015 में आदि सैव शिवाचार्य केस में सुप्रीम कोर्ट ने पुजारियों के अधिकार तो माने, लेकिन मंदिरों पर सरकार के नियंत्रण को नहीं रोका।[16]

तस्वीर बिल्कुल साफ़ है: भारत जैसे “सेक्युलर लोकतंत्र” में हिन्दू धार्मिक संस्थाएं सरकार के लिए खुला मैदान हैं, जिन्हें वो चला भी सकती है और बदल भी सकती है। लेकिन अल्पसंख्यक संस्थाओं को हाथ भी नहीं लगाया जा सकता। जो नीति कभी ब्रिटिशों ने हिन्दू धर्म को कमजोर करने के लिए बनाई थी, आज भी “सुधार” और “न्याय” के नाम पर चल रही है। पर असल में ये केवल हिन्दू सभ्यता को जड़ों से काटने की एक धीमी, पर योजनाबद्ध प्रक्रिया है।

व्यक्तिगत क़ानूनों में सुधार — लेकिन सिर्फ़ हिन्दुओं के लिए

1955 से 1958 के बीच, भारत सरकार ने हिन्दू समाज के लिए कुछ बड़े क़ानूनी बदलाव किए, जिन्हें ‘हिन्दू कोड बिल्स’ कहा जाता है। इनमें चार मुख्य कानून शामिल थे — हिन्दू विवाह अधिनियम (1955)[17], हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम (1956)[18], हिन्दू नाबालिगता और संरक्षकता अधिनियम (1956)[19], और हिन्दू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम (1956)[20]। ये सभी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में लागू किए गए, और इनका मकसद हिन्दू पर्सनल लॉ को आधुनिक बनाना था।

इन क़ानूनों से बेटियों को संपत्ति में अधिकार मिला, एक विवाह की बाध्यता आई, और तलाक़ को कानूनी रूप से मान्यता दी गई। लेकिन यह “सुधार” सिर्फ़ हिन्दू समुदाय पर लागू हुआ।

दूसरी ओर, मुस्लिम और ईसाई समुदायों के पर्सनल लॉ में कोई बदलाव नहीं किया गया। मुसलमान आज भी 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अधिनियम के तहत चलते हैं[21], जिसमें बहुविवाह और एकतरफा तलाक़ जैसी प्रथाएं आज भी वैध हैं। ईसाइयों के लिए अब भी 19वीं सदी के Indian Christian Marriage Act (1872)[22] और Indian Divorce Act (1869)[23] लागू हैं, जिनमें अब तक बस हल्के-फुल्के संशोधन हुए हैं।

नेहरू ने खुद माना था कि हिन्दू कोड बिल को लेकर ज़बरदस्त विरोध था। 5 मई 1955 को लोकसभा में उन्होंने कहा, “यह विधेयक हमारे देश के लिए सबसे अहम क़दम है।”[24] कई हिन्दू संगठन और उनकी पार्टी के नेता भी इसके ख़िलाफ़ थे, फिर भी उन्होंने इसे एक ज़रूरी सभ्यतागत बदलाव मानते हुए आगे बढ़ाया। लेकिन जब मुस्लिम, इसाई और दूसरे अल्पसंख्यकों के क़ानूनों को छूने की बात आई, तो उन्होंने “धार्मिक संवेदनशीलता” और “राजनीतिक जोखिम” की वजह से चुप्पी साध ली।

यह ध्यान से सोचने की बात है। यानि कि हिन्दुओं पर तो समान कानून थोप दिए गए, लेकिन मुस्लिम और ईसाई समुदायों को अपने पारंपरिक, और कई बार पितृसत्तात्मक नियमों को बनाए रखने की आज़ादी मिल गई, और ये सब हुआ “धार्मिक आज़ादी” के नाम पर। यह दोहरापन  आज भी वैसे का वैसा है। मुस्लिम महिलाओं को आज भी बराबरी के अधिकार नहीं मिले हैं, और सरकारें इस पर चुप रहती हैं, क्योंकि उन्हें वोटबैंक के नाराज़ होने का डर रहता है।

कई न्यायविदों और कोर्ट ने भी इस असंतुलन की ओर ध्यान दिलाया है। 1997 के Ahmedabad Women’s Action Group बनाम भारत सरकार मामले में[25] सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल देना उसका काम नहीं है, और इसे संसद पर छोड़ दिया। इस तरह अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ को बार-बार न्यायिक समीक्षा से बाहर रखा गया है, जिससे भारत में कानूनी बहुलता (एक देश में कई अलग-अलग कानून) को स्थायी मान लिया गया है। और इसका सबसे बड़ा नुकसान महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता को हुआ है।

सच ये है कि हिन्दू पर्सनल लॉ में राष्ट्रीय स्तर पर कड़े सुधार किए गए, लेकिन मुसलमानों और ईसाइयों के नियम उनके धार्मिक संस्थानों के हवाले छोड़ दिए गए। यह सिर्फ़ क़ानूनी विरोधाभास नहीं है, यह दिखाता है कि भारत का राज्य तंत्र अल्पसंख्यकों की परंपराओं से टकराने की हिम्मत नहीं करता। लेकिन हिन्दुओं के मामले में, उसी राज्य ने अपनी पूरी ताक़त से दखल दिया और उनके धार्मिक-सामाजिक ढांचे को कानून के ज़रिए पूरी तरह से बदल डाला।

एक देश, एक कानून — 1950 से सिर्फ़ वादा

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 यह कहता है कि सरकार पूरे देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करने की कोशिश करे।[26] इसका मकसद यह था कि शादी, तलाक़, विरासत और गोद लेने जैसे निजी मामलों में सभी के लिए एक जैसे, धर्म-निरपेक्ष कानून हों। लेकिन आज़ादी के 70 साल बाद भी ये सिर्फ़ एक अधूरा सपना बनकर रह गया है।

संविधान बनाते समय डॉ. भीमराव आंबेडकर और कई अन्य नेताओं ने यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड का समर्थन किया था। लेकिन इसे मौलिक अधिकार न बनाकर केवल “निदेशक सिद्धांत” की सूची में रखा गया। मतलब यह सरकार के लिए निर्देश तो है, लेकिन ज़रूरी नहीं। इसका कारण साफ़ था: अल्पसंख्यकों की नाराज़गी और राजनीतिक विरोध का डर। इसी डर ने इस मुद्दे को हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया।

इस मामले की सबसे चौंकाने वाली मिसाल 1985 का शाह बानो केस है।[27] इसमें सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि तलाक़शुदा मुस्लिम महिला को भी धारा 125 के तहत गुज़ारा भत्ता मिलना चाहिए, क्योंकि यह कानून सभी पर लागू होता है। लेकिन इस फैसले के बाद कई मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं ने विरोध किया और कहा कि यह उनके पर्सनल लॉ में दखल है। इसके दबाव में राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सुरक्षा) कानून, 1986 पास किया, जिसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और महिलाओं के अधिकारों का गल घोंट दिया। राज्य ने समानता और न्याय के बजाय तुष्टिकरण और वोटबैंक की राजनीति को चुना।

इसके साथ ही अनुच्छेद 44 बस एक दिखावटी वादा बनकर रह गया। आज राजनीतिक पार्टियाँ UCC की बात अक्सर हिन्दू वोटरों को लुभाने के लिए करती हैं, लेकिन जब असली काम करने की बात आती है — यानी सबके लिए एक जैसे कानून लाने की — तो वे “धार्मिक आज़ादी” का हवाला देकर पीछे हट जाती हैं।

इस दोहरे रवैये की वजह से भारत में एक असमान कानूनी ढांचा बन गया है। हिन्दुओं के लिए तो कानून पहले से ही समान और सख़्त बनाए गए हैं, लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय आज भी अपने धार्मिक नियमों को मानते हैं — चाहे वो कितने भी पुराने या महिलाओं के लिए अन्यायपूर्ण क्यों न हों। इसका सबसे बड़ा नुकसान महिलाओं को होता है, और यह संविधान के अनुच्छेद 14 — “सभी के लिए क़ानून के समक्ष समानता” — का साफ़ उल्लंघन है।[28]

सुप्रीम कोर्ट भी कई बार यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की ज़रूरत पर ज़ोर दे चुका है। 1995 में सरला मुद्गल केस[29] और 2003 में जॉन वल्लमट्टम केस[30] में कोर्ट ने साफ़ कहा कि अलग-अलग पर्सनल लॉ से समस्याएं पैदा होती हैं। लेकिन हर बार कोर्ट ने आख़िरी फैसला संसद पर छोड़ दिया — और संसद ने अब तक कोई ठोस क़दम नहीं उठाया।

आज की हालत यह है कि अनुच्छेद 44 संविधान की किताब में तो है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में इसका कोई असर नहीं दिखता। एक ओर इसका हवाला देकर हिन्दू समाज से सुधार की उम्मीद की जाती है, और दूसरी ओर अल्पसंख्यक प्रथाओं को हाथ भी नहीं लगाया जाता।

जब तक यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड को ईमानदारी से, बिना भेदभाव और बिना तुष्टिकरण के लागू नहीं किया जाता — तब तक यह बस एक नारा बना रहेगा, जिसे राजनीति में इस्तेमाल तो किया जाएगा, लेकिन न्याय की दृष्टि से कभी पूरा नहीं किया जाएगा।

समापन टिप्पणी

जैसा कि हमने इस लेख के पहले हिस्से में देखा, आज़ाद भारत का क़ानूनी और संवैधानिक ढांचा हिन्दू बहुसंख्यकों के अधिकारों की सिर्फ़ अनदेखी नहीं करता, बल्कि उन्हें धीरे धीरे कमज़ोर बना रहा है। हिन्दू पर्सनल लॉ में चुनिंदा सुधार, सरकारी स्कूलों में सिर्फ़ हिन्दू धार्मिक शिक्षा पर रोक, मंदिरों पर सरकारी क़ब्ज़ा और अल्पसंख्यक संस्थाओं को पूरी आज़ादी — ये सब मिलकर एक ऐसा पैटर्न बनाते हैं जो साफ़ दिखाता है कि ‘सेक्युलरिज़्म’ के नाम पर एकतरफा और पक्षपाती व्यवस्था बनाई गई है।

अब ये भेदभाव छुपा नहीं रह गया है। इसका असर हिन्दू समाज के भीतर गहराई से महसूस हो रहा है। आज बहुत से हिन्दू अपने ही देश में खुद को ‘दूसरे दर्जे का नागरिक’ मानने लगे हैं — जिन पर ऐसे कानून लागू होते हैं जिनसे बाकी समुदायों को छूट मिलती है। और ये तो सिर्फ़ शुरुआत है — असली तस्वीर इससे कहीं ज़्यादा गंभीर और चिंताजनक है।

इस लेख के दूसरे भाग में हम कुछ और ऐसे कानूनों पर नज़र डालेंगे — जैसे वक्फ़ अधिनियम और प्लेसेज़ ऑफ वर्शिप एक्ट — जो न सिर्फ़ धार्मिक विशेषाधिकारों को और मजबूत करते हैं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय पर परदा डालते हैं और भारत में सभ्यतागत असंतुलन को और गहरा करते हैं।

इस पूरे कानूनी पक्षपात की सच्चाई हमें एक ईमानदार और साहसिक राष्ट्रीय आत्ममंथन की ओर बुला रही है — जिसे अब टाला नहीं जा सकता।

संदर्भ सूची 

[1] Constitution of India – Article 25, Freedom of conscience and free profession, practice and propagation of religion; https://www.constitutionofindia.net/articles/article-25-freedom-of-conscience-and-free-profession-practice-and-propagation-of-religion/

[2] Constituent Assembly Debates, Vol. 7, December 6, 1948;  https://eparlib.nic.in/bitstream/123456789/762992/1/cad_06-12-1948.pdf

[3] Annual Report 2019–2020 (Ministry of Home Affairs); https://www.mha.gov.in/sites/default/files/AnnualReport_19_20.pdf

[4] Sanjaly Pandey, Alienation of India’s Northeast: Reaping the Fruit of Nehruvian Blunders; https://stophindudvesha.org/alienation-of-indias-northeast-reaping-the-fruit-of-nehruvian-blunders/

[5] Rev. Stainislaus v. State of Madhya Pradesh & Ors. (Civil Appeal Nos. 1489 & 1511 of 1974);
https://indiankanoon.org/doc/1308071/

[6] Constitution of India – Article 28; Freedom as to attendance at religious instruction or religious worship in certain educational institutions; https://www.constitutionofindia.net/articles/article-28-freedom-as-to-attendance-at-religious-instruction-or-religious-worship-in-certain-educational-institutions/

[7] Constitution of India – Article 30; Right of minorities to establish and administer educational institutions; https://www.constitutionofindia.net/articles/article-30-right-of-minorities-to-establish-and-administer-educational-institutions/

[8] T.M.A. Pai Foundation & Ors. v. State of Karnataka & Ors; https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s3ec0490f1f4972d133619a60c30f3559e/documents/aor_notice_circular/18.pdf

[9] P. A. Inamdar & Ors. v. State of Maharashtra & Ors. (12 August 2005); https://indiankanoon.org/doc/1390531/

[10] Ashoka Kumar Thakur v. Union of India; https://indiankanoon.org/doc/1219385/

[11] National Curriculum Framework (2005) — The foundational policy document that guided the 2005 edition of NCERT textbooks; https://ncert.nic.in/pdf/nc-framework/nf2005-english.pdf

[12] 2023 Edition: NCERT Textbooks (Class I–XII); https://ncert.nic.in/textbook.php?iemh1=13-15

[13] Rati Agnihotri, State control of Hindu temples in India: A Historical Perspective; https://stophindudvesha.org/state-control-of-hindu-temples-in-india-a-historical-perspective/

[14] The Madras Hindu Religious & Charitable Endowments Act, 1951;
https://latestlaws.com/wp-content/uploads/2015/07/Madras-Hindu-Religious-and-Charitable-Endowments-Act-19511.pdf

[15] T.V. Sundram Iyengar & Sons (formerly “Sundararaja Iyengar”) v. State of Madras (1955);
https://indiankanoon.org/doc/1594000/

[16] Adi Saiva Sivachariyargal Nala Sangam & Ors. v. Government of Tamil Nadu & Anr. (Dec 16, 2015); https://indiankanoon.org/doc/143215272/

[17] The Hindu Marriage Act, 1955 (India Code); https://indiacode.nic.in/handle/123456789/1560?locale=en

[18] The Hindu Succession Act, 1956 – India Code; https://indiacode.nic.in/handle/123456789/1713?locale=en

[19] The Hindu Minority and Guardianship Act, 1956; https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/1649/1/195632.pdf

[20] Hindu Adoptions and Maintenance Act, 1956; https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/1638/1/AA1956____78.pdf

[21] Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 – India Code,
https://indiacode.nic.in/bitstream/123456789/2303/1/A1937-26.pdf

[22] The Indian Christian Marriage Act, 1872** (Act No. XV of 1872); https://ncwapps.nic.in/acts/TheIndianChristianMarriageAct1872-15of1872.pdf

[23] The Divorce Act, 1869 (Act No. 4 of 1869);
https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/2280/1/A1869-04.pdf

[24] Lok Sabha Debates – May 5, 1955 (Third Reading of the Hindu Marriage Bill);
https://ignca.gov.in/Asi_data/59309.pdf

[25] Ahmedabad Women’s Action Group v. Union of India (AIR 1997, 3 SCC 573);
https://indiankanoon.org/doc/1743680/ pahujalawacademy.com+9indiankanoon.org+9scribd.com+9

[26] Article 44 – Uniform Civil Code for the citizens; “The State shall endeavour to secure for the citizens a uniform civil code throughout the territory of India;” https://www.constitutionofindia.net/articles/article-44-uniform-civil-code-for-the-citizens/

[27] Wikipedia; Mohd. Ahmad Khan v. Shah Bano Begum (1985); https://en.wikipedia.org/wiki/Mohd._Ahmed_Khan_v._Shah_Bano_Begum?utm_source=chatgpt.com

[28] Constitution of India – Article 14, “The State shall not deny to any person equality before the law or the equal protection of the laws within the territory of India.” https://www.constitutionofindia.net/articles/article-14-equality-before-law/

[29] Sarla Mudgal & Ors. v. Union of India (AIR 1995 SC 1531; decided 11 May 1995); https://indiankanoon.org/doc/1593775/

[30] John Vallamattom & Anr. v. Union of India (Writ Petition (Civil) No. 242 of 1997, decided 21 July 2003); https://indiankanoon.org/doc/49064693/

Aditi Joshi
Aditi Joshi
Aditi Joshi is a Delhi-based history graduate, researcher, writer, content strategist, and cultural commentator focused on reclaiming Indic civilizational perspectives and historical accuracy. She is the Founder of Itihasdhir (इतिहासधीर), launched in 2023, a platform for thoughtful discussions on Indian history, historians’ influence, book reviews, scholar interviews, and forgotten aspects of Bharat’s past. Currently, she serves as Content Manager at Upword Foundation, contributing to content strategy and creation on cultural, historical, and societal topics aligned with Indic values. An aligned effort of the Upword Foundation and Itihasdhir is a bookclub namely, Bookmarkers. A passionate folklore enthusiast, she is also an artist and translator, blending creativity with scholarship to highlight India’s cultural depth and challenge misrepresentations. Her work addresses colonial distortions of Hindu Dharma, erasure of symbols, caste narratives, and Sanātana traditions’ survival.
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