बच्चों का आपत्तिजनक यौन चित्रण: भारत की पॉप संस्कृति नैतिकता और शालीनता की सारी सीमायें लाँघती हुई
सारांश
भारत की लोकप्रिय संस्कृति में बच्चों के अभद्र व आपत्तिजनक चित्रण में चिंताजनक वृद्धि दिख रही है। यह रुझान म्यूजिक वीडियोज़, फिल्मों, ओटीटी और सोशल मीडिया में स्पष्ट है। जो बातें पहले इशारों में कही जाती थीं, अब खुलकर भड़काऊ अंदाज़ में पेश हो रही हैं। नाबालिगों को भी अश्लील यौनिक संदर्भों में दिखाया जा रहा है। एल्गोरिदम ऐसे कंटेंट को बढ़ावा देकर व्यूज़ और इंगेजमेंट बढ़ाते हैं। टटीरी जैसे विवाद अपवाद नहीं, बल्कि बड़े रुझान का हिस्सा हैं। सोशल मीडिया इस खतरे को और बढ़ाता है। यह कम उम्र के यूज़र्स को खुद को यौनिक रूप में पेश करने के लिए प्रोत्साहित करता है – अक्सर बिना किसी ठोस नियमन के। साथ ही, बदलता सांस्कृतिक और शैक्षिक परिवेश बचपन और यौनिकता की पुरानी मान्यताओं को नया रूप दे रहा है। इन सबके कारण व्यावसायिक लाभ नैतिकता पर भारी पड़ रहे हैं। नतीजतन, बच्चे शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहे हैं और उनकी सुरक्षा के पारंपरिक तंत्र कमजोर पड़ रहे हैं।
भारतीय रैपर बादशाह पूरे देश में ज़बरदस्त लोकप्रियता रखते हैं। उनके गानों में अक्सर महिलाओं का भद्दा वस्तुकरण, ज़्यादा से ज़्यादा दर्शकों को लुभाने के लिए बेहद सस्ती और कुछ-कुछ अश्लील भाषा का प्रयोग, और पारंपरिक लोक धुनों पर चढ़ाया गया एक सतही ‘मॉडर्न’ रंग देखने को मिलता है।
उनका हालिया गाना “टटीरी” शालीनता और सार्वजनिक नैतिकता की हर हद पार करता नज़र आता है। इसमें स्कूल यूनिफॉर्म पहनी लड़कियों को अश्लील हरियाणवी बोलों पर आपत्तिजनक अन्दाज़ में डांस करते दिखाया गया है, जो सीधे तौर पर child sexualization यानी बच्चों के कामुक चित्रण का मामला प्रतीत होता है। यह कोई इक्का दुक्का घटना नहीं है। बॉलीवुड फिल्मों में नाबालिग लड़कियों की कास्टिंग से लेकर “सोलह बरस” जैसी अश्लील कल्पनाओं को बढ़ावा देने वाले गीतों तक, किशोरियों का यौन वस्तुकरण लंबे समय से भारत की एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का एक शर्मनाक हिस्सा रहा है।
सोशल मीडिया ने इस विकृति को और भी ज़्यादा खतरनाक स्तर तक पहुँचा दिया है। बच्चों की इन प्लेटफॉर्म्स तक पहुँच और उनके इस्तेमाल को लेकर कोई ठोस नियम-कायदे नहीं हैं, और ऐसे में एल्गोरिद्म भी उसी कंटेंट को आगे बढ़ाते प्रतीत होते हैं, जिसमें बच्चे और किशोर खुद को चिंताजनक ढंग से यौन रूप में प्रस्तुत करते नजर आते हैं। यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब भारत की स्कूल शिक्षा प्रणाली में पश्चिमी ‘वोक’ विचारधारा की घुसपैठ होने लगती है, जो मासूम बच्चों को समय से पहले ही यौन व्यवहार की ओर धकेलती है। इन सभी प्रवृत्तियों ने मिलकर भारतीय युवाओं को एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर लाकर खड़ा किया है।
जब डिजिटल दुनिया तेजी से फैल रही है और बाल शोषण के जोखिम बढ़ रहे हैं, तब भारत की लोकप्रिय संस्कृति में बच्चों और किशोरों के यौनिकरण को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह एक योजनाबद्ध प्रक्रिया लगती है, जिसमें भारतीय समाज को वैश्विक ‘वोक’ मॉडल में ढालते हुए धर्म और सांस्कृतिक मूल्यों के उस सुरक्षा कवच को कमजोर किया जा रहा है जिसने बच्चों की रक्षा की है।
पॉपुलर कल्चर में स्कूली बच्चों का आपत्तिजनक चित्रण
जहाँ बॉलीवुड में स्कूली बच्चों के आपतिजनक चित्रण की प्रवृत्ति कोई नई बात नहीं है, वहीं ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने तो नैतिकता और शालीनता की सारी हदें ही पार कर दी हैं। Rasbhari जैसी एडल्ट वेब-सीरीज़, जो शिक्षक-छात्र प्रेम संबंध की फैंटसी के जरिए सॉफ्ट-पॉर्न परोसती है [1], से लेकर Haramkhor जैसी फिल्म तक, जो एक 14 साल की स्कूली छात्रा और उसके शिक्षक के बीच ‘रोमांटिक’ रिश्ते को चित्रित करती है [2], मनोरंजन उद्योग लगातार ऐसे कंटेंट को बढ़ावा देता रहा है, जो बच्चों के आपत्तिजनक चित्रण को परोक्ष रूप से महिमामंडित करता है।
म्यूजिक वीडियोज़ में बच्चों के संकेतात्मक कामुक चित्रण की प्रवृत्ति नई नहीं है। हालांकि, हाल में बढ़ी सार्वजनिक जागरूकता के चलते अब इन प्रवृत्तियों पर खुलकर बात हो रही है और संबंधित प्राधिकरण भी कार्रवाई कर रहे हैं। अगस्त 2025 में मशहूर पंजाबी गायक गुरु रंधावा का एक म्यूजिक वीडियो रिलीज़ हुआ। “अज़ूल” नाम का ये वीडियो, जिसमे महिला मॉडल्स को स्कूल यूनिफार्म पहने दिखाया गया था, रिलीज़ होते ही विवादों में घिर गया। स्कूली बच्चों के कथित यौनिक चित्रण को लेकर इस वीडियो का कड़ा विरोध हुआ। इस म्यूजिक वीडियो के एक सीन विशेष की सबसे ज़्यादा आलोचना हुई, जिसमे स्कूल यूनिफार्म पहने एक मॉडल गुरु रंधावा के किरदार के लिए डांस परफॉर्म करती नज़र आई, जो कि एल्बम में एक फोटोग्राफी टीचर के किरदार में थे।[3]
बादशाह के “टटीरी” गाने को लेकर व्यापक जन आक्रोश सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा। इसका असर वास्तविक दुनिया में भी दिखा। हालाँकि इस वीडियो के ज़्यादातर वर्जन अब यूट्यूब से हटा दिए गए हैं, लेकिन मूल वीडियो में स्कूल यूनिफॉर्म पहनी लड़कियों को हरियाणा रोडवेज़ की बस पर बेहद आपत्तिजनक तरीके से डांस करते हुए दिखाया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हरियाणा राज्य महिला आयोग ने बादशाह को पुलिस हिरासत में लेने का निर्देश जारी किया और साथ ही पुलिस को उनका पासपोर्ट ज़ब्त करने के लिए भी निर्देशित किया।[4]
कई संगठनों और एक्टिविस्ट समूहों ने ततीरी की कड़ी आलोचना की है। “Gems of Bollywood” के लिए जानी जाने वाली हिंदू अधिकार कार्यकर्ता स्वाति गोयल शर्मा ने X पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा [5]:
“बीमार मानसिकता वाले लोग। यह बादशाह का नया गाना है जिसमें स्कूली लड़कियों को बैग और किताबें फेंकते हुए दिखाया गया है, और वह गा रहा है— ‘आया बादशाह टोली चढ़ाने, इन सबकी घोड़ी बनाने।’ हरियाणा में FIR दर्ज हो चुकी है, लुक-आउट सर्कुलर जारी हो गया है। क्या आप समझ सकते हैं कि सहमति की उम्र घटाने की वकालत करने वाले लोग भारतीय परिवारों के साथ क्या करेंगे, जब मीडिया और मनोरंजन में स्कूली लड़कियों का सेक्सुएलिज़ेशन कानूनी हो जाएगा?”
बादशाह जैसे कलाकार उस इंडस्ट्री को दर्शाते हैं, जहां महिलाओं का वस्तुकरण और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया मर्दाना वर्चस्व आम बात है। गानों के बोल अक्सर बेतुके और स्त्री-विरोधी होते हैं, फिर भी वे हर उम्र के दर्शकों को आकर्षित करते हैं। “स्कूलगर्ल” फैंटसी का प्रयोग स्पष्ट रूप से लोकप्रियता बटोरने का एक आसान तरीका है।
जब ऐसे कलाकार सवालों के घेरे में आते हैं, तो उनके दोहरे मापदंड सामने आने लगते हैं। वे माफी मांग लेते हैं और अपनी मंशा को निर्दोष बताते हैं। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका कंटेंट बच्चों के लिए असुरक्षित माहौल पैदा कर रहा है। सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए आपत्तिजनक सामग्री का सहारा लेना उनकी माफी को बेमानी बना देता है। दरअसल, ये प्रोडक्शंस अब एक खास जॉनर का हिस्सा बन चुके हैं जो इसी तरह के फॉर्मूले पर चलकर व्यावसायिक सफलता हासिल करता है। जब तक विरोध नहीं होता, कलाकार रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर ऐसे कंटेंट पेश करते रहते हैं। लेकिन जैसे ही विरोध शुरू होता है, वे रक्षात्मक रुख अपनाकर अपने ही कंटेंट से दूरी बनाने लगते हैं।
सोशल मीडिया की भूमिका
भारत में बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने वाले ठोस नियमों के अभाव में 12 साल तक के बच्चे भी वायरल होने के चक्कर में आपत्तिजनक कंटेंट बनाने लगे हैं। यह रुझान तेजी से बढ़ रहा है और गंभीर चिंता का विषय बन चुका है।
अक्टूबर 2022 में एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने भारत में नाबालिगों के सोशल मीडिया उपयोग पर व्यापक बहस छेड़ दी। 12 वर्षीय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और बाल कलाकार रिवा अरोड़ा [6] 45 वर्षीय गायक मीका सिंह के साथ एक रोमांटिक डांस वीडियो में नजर आईं। इंटरनेट यूज़र्स ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे पूरी तरह अनुचित बताया कि 40 वर्ष से अधिक आयु का व्यक्ति किसी बच्चे के साथ इस तरह का अंतरंग डांस करे। इस मामले में रिवा अरोड़ा के माता-पिता भी आलोचना के घेरे में आए, जिन पर ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए अपनी बेटी को प्रोत्साहित करने के आरोप लगे।
हालाँकि उनके परिवार ने यह कहा कि वह 12 वर्ष की नहीं हैं, लेकिन उनकी वास्तविक उम्र बताने से इनकार किया। रिवा को पहले भी उम्र के हिसाब से अनुपयुक्त कंटेंट में काम करने को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा है। कई यूज़र्स ने दावा किया कि उनके कुछ पुराने वीडियो में उनका आपत्तिजनक चित्रण किया गया था। [7]
वैश्विक अध्ययनों के अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स यौन शोषण और ऑनलाइन वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देने में भूमिका निभा रहे हैं, जहां कमजोर पृष्ठभूमि की किशोर लड़कियां विशेष रूप से असुरक्षित हैं। [8] यद्यपि ये निष्कर्ष भारत-विशेष नहीं हैं, फिर भी यहां किशोर इन्फ्लुएंसर्स द्वारा आपत्तिजनक और भड़काऊ रील्स बनाने का बढ़ता चलन चिंताजनक है।
सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के लिए एक भयावह चक्रव्यूह बन चुका है, जिससे निकलना आसान नहीं दिखता। वे धीरे-धीरे ऐसे जटिल तंत्र में फँसते जा रहे हैं, जहां एल्गोरिद्म सनसनीखेज कंटेंट को बढ़ावा देते हैं। इसके परिणामस्वरूप कम उम्र के बच्चे जल्दी प्रसिद्धि पाने के लिए रील्स के माध्यम से स्वयं के अश्लील और कामुक चित्रण वाले कंटेंट की ओर आकर्षित होने लगते हैं। बच्चों और टीन इन्फ्लुएंसर्स के सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने के लिए ठोस नियम-क़ानूनों का अभाव इस खतरे को और बढ़ाता है।
दिसंबर 2025 में राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति ने सोशल मीडिया पर बच्चों की प्रस्तुति को लेकर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने सरकार से कड़े नियम बनाने की मांग की। उन्होंने कहा कि बच्चों से जुड़े विज्ञापनों पर तो कुछ नियंत्रण है, लेकिन सोशल मीडिया के लिए ऐसे नियम लगभग नहीं हैं। मूर्ति ने यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे तय करें उनके बच्चे ऑनलाइन किस रूप में प्रस्तुत होते हैं। उन्होंने कहा, “बच्चे किसी भी तरह के कपड़े नहीं पहन सकते, न ही किसी भी तरह का डांस कर सकते हैं या विज्ञापनों में वैसे दिखाए जा सकते हैं। क्योंकि इस तरह हम अगली पीढ़ी का सही पालन-पोषण नहीं कर सकते।” [9]
उनकी यह बात सिर्फ उन टीन इन्फ्लुएंसर्स पर ही लागू नहीं होती जो आपत्तिजनक कंटेंट बनाते हैं, बल्कि उन माता-पिता पर भी उतनी ही लागू होती है, जो लापरवाही से अपने छोटे बच्चों और शिशुओं की निजी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कर देते हैं। निजी कंटेंट के इस सार्वजनीकरण के चलते बच्चे शोषण और इन तस्वीरों के दुरुपयोग के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाते हैं।
वोकिज़्म का आयात और बच्चों की सेक्सुअल ग्रूमिंग
राजीव मल्होत्रा और विजया विस्वनाथन अपनी पुस्तक Who is Raising Your Children? में चेताते हैं कि पश्चिमी शिक्षा मॉडल को भारत में अपनाना एक गंभीर जोखिम बन सकता है। उनका कहना है कि पश्चिमी वोकिज़्म धीरे-धीरे भारतीय शिक्षा प्रणाली में प्रवेश कर रहा है और ऐसे विचार ला रहा है जो पारंपरिक सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्यों के विपरीत हैं।
पुस्तक में एक महत्वपूर्ण बात बताई गई है। पश्चिम में बच्चों की सूक्ष्म ग्रूमिंग कैसे हो रही है। वहां सेक्स एजुकेशन को अब “कॉम्प्रिहेंसिव सेक्सुअलिटी एजुकेशन” के नाम से प्रस्तुत किया जा रहा है। पहले संयम और जिम्मेदारी पर जोर दिया जाता था। अब फोकस सेक्स के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण पर शिफ्ट हो गया है। इसके अंतर्गत “शारीरिक इच्छा” और “दैहिक आनंद” जैसे विषयों पर खुली चर्चा, गर्भपात का सामान्यीकरण और कम उम्र में LGBTQ+ विषयों का परिचय शामिल है।[10] किताब साफ चेतावनी देती है। यदि इन वोक मॉडल्स और वैचारिक ढांचों को भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बिना गहरी सोच-समझ के अपनाया गया, तो इससे बच्चों को कम उम्र में ही यौन गतिविधियों की ओर परोक्ष रूप से प्रेरित करने की स्थिति बन सकती है।
भारत के कुछ एलीट पब्लिक स्कूलों में इसके प्रभाव के संकेत भी देखने को मिले हैं। जुलाई 2020 में Tagore International School उस समय विवादों में आया, जब वहां जेंडर आइडेंटिटी पर एक सत्र आयोजित किया गया, जिसमें बच्चों को “शिक्षित” करने के नाम पर कथित रूप से स्पष्ट यौन चित्रण का उपयोग किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह सत्र Nazariya – Queer Feminist Resource Group (Nazariya QFRG) द्वारा संचालित था। इस पुस्तक में एक नग्न महिला का चित्र था, और नीचे के हिस्से में एक अन्य महिला को निजी यौन क्रिया में दर्शाया गया था।[11]
फरवरी 2024 में Shiv Nadar School अभिभावकों की आलोचना के केंद्र में आ गया। स्कूल ने एक फीडबैक फॉर्म में बच्चों के जेंडर के लिए “Male”, “Female” और “Non-binary” जैसे विकल्प शामिल किए। “Non-binary” शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग होता है, जो खुद को पारंपरिक जेंडर ढांचे में सीमित नहीं मानते। हालांकि, इस पहल को लेकर कई अभिभावकों ने आपत्ति जताई और इसे छात्रों व अभिभावकों पर वोक विचारधारा थोपने की कोशिश बताया।[12]
माना कि छात्रों में LGBTQ+ समुदाय के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना सकारात्मक है, लेकिन कम उम्र के बच्चों को जेंडर फ्लुइडिटी जैसे जटिल विचारों से अवगत कराना गंभीर चिंताएँ पैदा कर सकता है। पश्चिमी शिक्षा में वोकिज़्म से प्रेरित ऐसे प्रयोगों के सामाजिक और पारिवारिक प्रभावों को लेकर व्यापक बहस हो रही है। कई मामलों में कम उम्र के बच्चों द्वारा हार्मोन उपचार और जेंडर-परिवर्तन प्रक्रियाओं को अपनाने पर भी सवाल उठे हैं, जिनके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।
पश्चिम में माता-पिता अब इस वोक एजेंडे का खुलकर विरोध कर रहे हैं, जो उनके बच्चों को एक ऐसे बाजार का हिस्सा बना देता है, जो “वैकल्पिक यौन पहचानों” को बढ़ावा देने के आधार पर टिका है।
भारत, जहां मजबूत पारिवारिक ढांचा और सांस्कृतिक मूल्य बच्चों को कम उम्र में अनावश्यक यौनिकरण से बचाने का काम करते हैं, अभी अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। लेकिन इसे लेकर लापरवाह नहीं हुआ जा सकता। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि जिस तेजी से वोकिज़्म भारतीय शिक्षा व्यवस्था में जगह बना रहा है, वह एक गंभीर खतरे की घंटी है।
सहमति की उम्र घटाने के लिए कानूनी एक्टिवज़्म
अगस्त 2025 में वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट से POCSO अधिनियम, 2012 के तहत तय सहमति की उम्र पर पुनर्विचार की मांग की। उन्होंने इसे 18 से घटाकर 16 वर्ष करने का सुझाव दिया और कहा कि मौजूदा कानून “आपसी सहमति वाले संबंधों में किशोरों को असंगत रूप से दंडित करता है।” उन्होंने यह भी बताया कि POCSO लागू होने से पहले भारतीय दंड संहिता में सहमति की उम्र 16 वर्ष थी, जिसे 2012 में बढ़ाकर 18 कर दिया गया। उनके अनुसार, यह परिवर्तन “अत्यधिक अभिभावकवादी दृष्टिकोण” का परिणाम था, जिसमें वास्तविक परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं मिला। जयसिंह ने कहा कि 16–18 वर्ष के किशोरों को अपने यौन निर्णयों में स्वायत्तता और निजता का अधिकार होना चाहिए। [13]
उनके तर्क उस भाषा और दृष्टिकोण से मेल खाते हैं, जो वोक प्रगतिशील विमर्श में अक्सर दिखाई देता है, जहां नाबालिगों के यौन शोषण जैसे गंभीर मुद्दों को हल्के रूप में पेश किया जाता है और निजता व सेक्सुअल पसंद के नाम पर बच्चों को कम उम्र में ही यौन संबंधों की ओर अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित किया जाता है। इसमें किशोरों के साथ लगभग वयस्क जैसा व्यवहार करने की प्रवृत्ति भी शामिल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सहमति की उम्र घटाने से बच्चों की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। इससे किशोर गर्भधारण के मामलों में वृद्धि हो सकती है, और “सहमति” के नाम पर बड़ी उम्र के पुरुषों द्वारा नाबालिग लड़कियों के शोषण का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा, 16 साल की उम्र में किसी भी लड़की के पास यौन संबंधों और गर्भावस्था के प्रभावों को समझने की पर्याप्त परिपक्वता नहीं होती। ऐसे में सहमति की उम्र घटाना नाबालिगों को और अधिक जोखिम में डाल सकता है।[14]
सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सहमति की उम्र 18 वर्ष ही बनी रहनी चाहिए और इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए, ताकि बच्चों के अधिकार सुरक्षित रहें और उनका शोषण रोका जा सके। सरकार के अनुसार, उम्र घटाने से ध्यान आरोपी के आचरण से हटकर बच्चे की “सहमति” पर आ जाएगा, जिससे विक्टिम-ब्लेमिंग का खतरा बढ़ेगा और बाल-केंद्रित न्याय व्यवस्था कमजोर होगी। अपने आधिकारिक जवाब में सरकार ने यह भी दोहराया कि अलग-अलग कानूनों में सहमति की उम्र 18 वर्ष रखना जरूरी है, ताकि दबाव, धोखे और शोषण से नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। साथ ही, यह भी माना गया कि बच्चे यौन संबंधों जैसे मामलों में “सार्थक और सूचित सहमति” देने में सक्षम नहीं होते। [15]
लव जिहाद और युवा हिंदू लड़कियों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति
भारत में कथित “लव जिहाद” (जहां एक मुस्लिम पुरुष अपनी पहचान छुपाकर खुद को हिंदू बताकर किसी हिंदू लड़की के साथ संबंध बनाता है और अंततः धर्म परिवर्तन का लक्ष्य रखता है) के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। वहीं, मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इसे “साजिश सिद्धांत” बताकर खारिज करता है और इसे सहमति वाले अंतरधार्मिक संबंधों को बदनाम करने वाला शब्द मानता है। लेकिन ऐसे मामलों में एक समान पैटर्न देखने को मिलता है, जहां अंततः पीड़िता पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जाता है और उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। हालिया घटनाओं में नाबालिग हिंदू लड़कियों को निशाना बनाए जाने की प्रवृत्ति भी सामने आई है।
उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में एक आरोपी को लव जिहाद से जुड़े मामले में विशेष POCSO अदालत ने 20 साल की सज़ा सुनाई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उसने खुद को हिंदू बताकर एक नाबालिग लड़की को फंसाया, उसका अपहरण किया और उसे कई जगहों पर ले गया, जिसके बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया।[16] इसी तरह प्रयागराज से सामने आए एक और गंभीर मामले में एक नाबालिग हिंदू अनाथ लड़की को तीन साल तक कैद में रखा गया, उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया और उसे धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया।[17]
एक अन्य मामला हरियाणा में सामने आया, जहां एक स्थानीय अदालत ने एक मुस्लिम व्यक्ति को एक नाबालिग हिंदू लड़की का यौन शोषण करने और उसे डराने-धमकाने का दोषी पाया। आरोप था कि उसने लड़की को एक मुस्लिम नाबालिग के साथ संबंध बनाने के लिए मजबूर करने की कोशिश की। अदालत ने यह भी कहा कि भले ही लव जिहाद भारतीय दंड संहिता के तहत कोई अपराध नहीं है, लेकिन इसे “ऐसा कथित अभियान” बताया जा सकता है, जिसमें मुस्लिम पुरुष प्रेम का स्वाँग रच गैर-मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम में परिवर्तित करने की कोशिश करते हैं।[18] मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मध्य प्रदेश में जनवरी 2020 से 15 जुलाई 2025 के बीच ऐसे कथित “लव जिहाद” के 283 मामले दर्ज हुए, जिनमें 71 मामलों में नाबालिग लड़कियां शामिल थीं।[19]
मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इन मामलों को कवर करने के प्रति अक्सर उदासीन रहता है, जिसके कारण अधिकतर खबरें सीमित पहुँच वाले राष्ट्रवादी प्लेटफॉर्म्स के जरिए सामने आती हैं। इससे कई मामलों के सार्वजनिक विमर्श से बाहर रह जाने की आशंका भी बढ़ती है। इसी संदर्भ में, सहमति की उम्र घटाने की दिशा में सक्रिय कानूनी पहल चिंता को और गहरा करती है, क्योंकि इससे कम उम्र की लड़कियों के शोषण का खतरा बढ़ सकता है।
वोक तंत्र और लोकप्रिय संस्कृति का एक हिस्सा अप्रत्यक्ष रूप से बच्चों को कम उम्र में ही यौन गतिविधियों की ओर प्रेरित कर रहा है। जब अभिभावक भी इस प्रभाव से अछूते नहीं हैं, तो पारंपरिक मूल्यों पर आधारित भारतीय परिवार व्यवस्था कमजोर पड़ती दिखती है, जिससे बच्चों के वोक ग्रूमिंग के प्रति संवेदनशील होने का जोखिम और बढ़ जाता है।
समापन
भारत की लोकप्रिय संस्कृति में बच्चों का लगातार किया जाने वाला आपत्तिजनक कामुक चित्रण एक गंभीर चिंता का विषय है। फिर चाहे वह बादशाह के अश्लील गाने “टटीरी” के रूप में हो, बॉलीवुड में नाबालिगों की कास्टिंग को लेकर, OTT पर सॉफ्ट-पोर्न फ़ार्मूलों के इस्तेमाल को लेकर, या स्कूलगर्ल फैंटेसी पर आधारित म्यूजिक वीडियोज के परिपेक्ष्य में, इसे सिर्फ घटिया पसंद या इक्का-दुक्का चूक मानकर नहीं टाला जा सकता। यह दरअसल एक वृहत सुनियोजित पैटर्न का हिस्सा है।
इस पैटर्न को और भी ज़्यादा खतरनाक बनाते हैं अनियंत्रित सोशल मीडिया एल्गोरिद्म, जो नाबालिगों के बीच खुद के अश्लील चित्रण वाले कंटेंट को बढ़ावा देते हैं। इसके साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में पश्चिमी वोक विचारधारा की बढ़ती घुसपैठ, जो स्वायत्तता और समावेशिता के नाम पर कम उम्र के बच्चों को जल्दी यौनिक व्यवहार की ओर धकेलती है, भी बच्चों की सुरक्षा को ख़तरे में डालती है।
जब इसमें सहमति की उम्र घटाने की मांग करने वाला कानूनी एक्टिविज़्म भी जुड़ जाता है, तो स्थिति और गंभीर हो जाती है। साथ ही नाबालिग हिंदू लड़कियों को निशाना बनाने वाले “लव जिहाद” जैसे मामलों में बढ़ोतरी का पैटर्न भी दिख रहा है। ये सभी मिलकर उस सुरक्षा कवच को कमज़ोर करते हैं, जो अब तक हमारे धर्म, पारिवारिक मूल्यों और सभ्यतागत परंपराओं ने बच्चों के चारों ओर बना रखा था।
ऐसे समय में अभिभावकों, शिक्षकों, नीति-निर्माताओं और पूरे समाज को निर्णायक कदम उठाने होंगे। समय की माँग है कि बच्चों से जुड़े कंटेंट और इन्फ्लुएंसर्स के लिए सख्त नियम लागू किए जाएं। भारतीय मूल्यों से टकराने वाली बाहरी विचारधाराओं को बिना सोचे-समझे अपनाने से बचा जाए। साथ ही अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को फिर से मजबूत किया जाए।
सतर्कता, जागरूकता और धर्म-आधारित मूल्यों पर टिके सामूहिक प्रयासों के ज़रिये ही हम अगली पीढ़ी को इस सुनियोजित खतरे से बचा सकते हैं, और अपने बच्चों की मासूमियत व नैतिक सत्यनिष्ठा को सुरक्षित रख सकते हैं।
सन्दर्भ सूची
[1] OTT vs Culture: India’s New Dilemma; https://stophindudvesha.org/when-entertainment-gets-weaponized-against-cultural-norms-indias-ott-challenge/
[2] Haraamkhor movie trailer: Nawazuddin Siddiqui, Shweta Tripathi are in a brilliant form; https://www.firstpost.com/entertainment/watch-haraamkhor-trailer-has-nawazuddin-siddiqui-shweta-tripathi-in-brilliant-form-3175826.html
[3] Guru Randhawa FINALLY breaks silence on ‘Azul’ controversy; drops cryptic post: ‘ When God…’ | – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/hindi/music/news/guru-randhawa-finally-breaks-silence-on-azul-controversy-drops-cryptic-post-when-god-/articleshow/123588734.cms
[4] Tateeree’ song controversy: Women’s panel orders Badshah’s arrest after rapper skips hearing | Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/cities/chandigarh-news/tateeree-song-controversy-women-s-panel-orders-badshah-s-arrest-after-rapper-skips-hearing-101773428477432.html
[5] Swati Goel Sharma on X; https://x.com/swati_gs/status/2030239328560128155
[6] Mika comes under fire for dancing with 12-year-old Riva Arora, netizens burst in anger | Hindi Movie News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/hindi/bollywood/news/mika-comes-under-fire-for-dancing-with-12-year-old-riva-arora-netizens-burst-in-anger/articleshow/95003816.cms
[7] Riva Arora claims she is not 12, yet does not divulge her age, says ‘it will be revealed soon’ | Hindi Movie News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/hindi/bollywood/news/riva-arora-claims-she-is-not-12-yet-does-not-divulge-her-age-says-it-will-be-revealed-soon/articleshow/98196502.cms
[8] Social Media’s Toxic Mix: Wokeism, Sensationalism & Hinduphobia; https://stophindudvesha.org/social-medias-toxic-cocktail-how-wokeism-sensationalism-and-anti-hindu-sentiment-corrupt-youth/
[9] Sudha Murthy Warns: “Social Media is Like a Knife” – Calls for Regulation on Child Influencers – Storyboard 18; https://www.storyboard18.com/how-it-works/sudha-murthy-warns-social-media-is-like-a-knife-calls-for-regulation-on-child-influencers-85484.htm
[10] Hidden dangers of Western education models | Vijaya Viswanathan | Who Is Raising your Children? – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=FO1f_NMqxco&t=8s
[11] Nazariya QFRG sells colouring books with vulgar sex content to students; https://www.opindia.com/2020/07/nazariya-qfrg-tagore-international-school-gender-identity-politics-queer/
[12] Shiv Nadar School introduces ‘non-binary’ as child’s gender, parents say, ‘don’t shove woke politics down our throat’; https://www.opindia.com/2024/02/shiv-nadar-school-non-binary-child-gender-feedback-form-parents-outraged/
[13] Pocso ( The Protection of Children from Sexual Offences Act) | Indira Jaisingh urges Supreme Court to lower age of consent for sex to 16; Centre opposes – Telegraph India; https://www.telegraphindia.com/india/indira-jaising-urges-supreme-court-to-lower-age-of-consent-for-sex-to-16-centre-opposes/cid/2115111#goog_rewarded
[14] Sixteen And Illusion of Maturity: A Collision of Consent, Health, and Vulnerability; https://www.livelaw.in/articles/supreme-court-hearing-reducing-age-of-consent-case-pocso-act-analysis-309761
[15] Lowering age of consent will undermine child safety: Govt | India News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/india/lowering-age-of-consent-will-undermine-child-safety-govt/articleshow/128006608.cms
[16] Exclusive | UP POSCO court jails Love Jihad accused Shehensha, posed as Rajkumar to trap Minor Hindu girl, for 20 years; https://organiser.org/2025/10/20/321828/bharat/exclusive-up-pocso-court-jails-love-jihad-accused-shehensha-posed-as-rajkumar-to-trap-minor-hindu-girl-for-20-years/
[17] Minor Hindu girl held captive for 3 years, gang-raped, forced religious conversion in Prayagraj: Mohammad Alam, Atif, Mumtaz arrested, identity changed on Aadhaar card as well; https://hindupost.in/crime/minor-hindu-girl-held-captive-for-3-years-gang-raped-forced-religious-conversion-in-prayagraj-mohammad-alam-atif-mumtaz-arrested-identity-changed-on-aadhaar-card-as-well/
[18] Haryana court sentences a Muslim man to 7 years in jail for Love Jihad against a minor Hindu girl; https://www.opindia.com/2025/07/cases-of-love-jihad-are-a-potential-threat-to-national-integrity-haryana-court-while-convicting-shahbaj/
[19] 283 ‘love jihad’ cases lodged in MP since 2020, assembly told | Bhopal News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/city/bhopal/283-love-jihad-cases-lodged-in-mp-since-2020-assembly-told/articleshow/123127042.cms
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