स्वतंत्रता के बाद भी गुलामी? भारत को कॉमनवेल्थ से बाहर क्यों निकलना चाहिए
- भारत की कॉमनवेल्थ में बनी हुई सदस्यता एक ऐसी औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाती है जो अब उसकी वैश्विक शक्ति की स्थिति से मेल नहीं खाती।
- यह संगठन ब्रिटेन की प्रतिष्ठा बनाए रखने के अलावा कोई ठोस आर्थिक, रणनीतिक या कूटनीतिक लाभ भारत को नहीं देता।
- इतिहास में ब्रिटेन ने कश्मीर विवाद, गोवा मुक्ति आंदोलन और 1965 के युद्ध जैसे मौकों पर भारत के हितों के खिलाफ काम किया है।
- कॉमनवेल्थ खेलों से शूटिंग जैसे खेलों को हटाना और ब्रिटिश मीडिया में बढ़ती हिन्दू-विरोधी सोच भारत के प्रति जारी अनादर को दर्शाते हैं।
- जब भारत के पास मज़बूत वैश्विक साझेदारियाँ, बढ़ती आर्थिक ताक़त और ‘कॉमएक्ज़िट‘ के लिए घरेलू समर्थन है — तो अब इस पुराने और अप्रासंगिक संबंध को समाप्त करने का समय आ गया है।
20 मार्च को मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि भारत ने गुजरात में 2030 कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन के लिए आधिकारिक बोली लगाई है।[1] अगर यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो भारत 2010 में दिल्ली में हुए विवादास्पद खेलों के दो दशक बाद एक बार फिर इस आयोजन की मेजबानी करेगा।[2] अगर आपने कभी ये खेल नहीं देखे हैं, तो खुद को सौभाग्यशाली समझिए। यह दुनिया का शायद इकलौता ऐसा खेल आयोजन है जिसमें आप झपकी ले सकते हैं, नाश्ता कर सकते हैं, और फिर भी कुछ खास मिस नहीं करेंगे।
ब्रिटिश टीवी शो ‘लास्ट वीक टुनाइट’ के होस्ट जॉन ओलिवर ने इस पर तंज कसते हुए कहा था: “कॉमनवेल्थ गेम्स क्या हैं? सोचिए एक ऐसा टूर्नामेंट जिसमें अमेरिका, चीन और रूस शामिल ही नहीं हैं। अब कल्पना कीजिए एक ऐसी रेस जहाँ वेल्स के धावक चमक रहे हों — बस वही हैं कॉमनवेल्थ गेम्स। ये खेल 1930 के दशक में शुरू हुए थे, जब ब्रिटिश साम्राज्य ढलान पर था — और किसी वजह से आज भी जारी हैं।”[3]
आज इन खेलों कि तरह, कॉमनवेल्थ संगठन भी एक अप्रासंगिक संस्था बन चुका है, जो बस नाम मात्र के लिए ज़िंदा है। ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास की परछाई लिए यह संगठन भारत के लिए लंबे समय से विवाद का कारण रहा है। यूरोपीय संघ, ओपेक और जी-20 जैसे संगठनों के पास जहां स्पष्ट उद्देश्य हैं, वहीं कॉमनवेल्थ की कोई ठोस भूमिका नहीं है, सिवाय इसके कि वह ब्रिटेन की खोती हुई प्रतिष्ठा को थोड़ा और खींचे। पिछले सत्तर वर्षों से यह संगठन जैसे-तैसे चलता आ रहा है, लेकिन अब समय आ गया है कि भारत इससे अपना संबंध समाप्त करे। ऐतिहासिक अन्याय, बदलते वैश्विक समीकरण, और इस संगठन की घटती उपयोगिता इस फैसले को पहले से कहीं अधिक उचित बनाते हैं।
ऐतिहासिक विश्वासघात
भारत ने ब्रिटिश शासन के दो सौ सालों तक अत्याचार और शोषण झेला। 1947 में आज़ादी मिलने तक 16.5 करोड़ से ज़्यादा भारतीय — जिनमें ज़्यादातर हिंदू थे — योजनाबद्ध अकालों, युद्धों, बदले की कार्रवाइयों और शासन की लापरवाही के कारण मारे गए।[4] भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी शुरु शुरु में कॉमनवेल्थ को उसके असली रूप में पहचाना, यानि कि साम्राज्यवादी नियंत्रण और नस्लभेद का प्रतीक। परंतु आश्चर्य की बात है कि 1949 में उन्होंने खुद भारत को इसमें शामिल करने की वकालत की। नेहरू ने ब्रिटेन और उसके सहयोगी देशों को नियम बदलने के लिए राज़ी किया। “ब्रिटिश कॉमनवेल्थ” से “ब्रिटिश” शब्द हटाकर इसे सिर्फ “कॉमनवेल्थ ” कहा जाने लगा। [5]
लेकिन नाम बदल देने से औपनिवेशिक ज़ुल्म की यादें और उनके ज़ख्म नहीं मिट नहीं जाते। नेहरू के इस फैसले पर देश में तीखा विरोध हुआ। पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने लिखा कि नेहरू को इस निर्णय पर लगभग सभी राजनीतिक दलों की आलोचना झेलनी पड़ी। जयप्रकाश नारायण ने तो इसे भारत की आत्मनिर्भरता पर सवाल बताते हुए कहा: “यह आत्मविश्वास की कमी और एक शक्ति समूह के प्रति निहित झुकाव का संकेत है।”[6] 1952 में, जनसंघ के सह-संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने साफ कहा: “हर ज़रूरी मौके पर, कॉमनवेल्थ देश भारत के साथ खड़े होने में असफल रहे हैं, जब कि भारत का रुख सही और न्यायोचित था।”[7] 1956 में, एक बार फिर संसद में सभी विपक्षी दलों ने कॉमनवेल्थ की सदस्यता की आलोचना की और नेहरू से इसे छोड़ने की मांग की। आचार्य कृपलानी ने कहा: “हमारी आज़ादी के बाद से इंग्लैंड ने हमेशा हमारा विरोध किया है।” कम्युनिस्ट नेता ए.के. गोपालन बोले: “कॉमनवेल्थ में भारत की सदस्यता ब्रिटेन को वह इज़्ज़त देती है जिसकी मदद से वह दुनिया की नज़रों में खुद को धोखे से बड़ा लोकतंत्र साबित कर सकता है।” सीपीआई नेता भूपेश गुप्ता ने कहा: “हमारे मित्र हमसे क्यों कहें कि हम उस संस्था में बने रहें जिसने हमारी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई है, हमारी अर्थव्यवस्था को नुकसान दिया है और हमारी आत्मा को अपमानित किया है?”[8]
दरअसल, नेहरू का यह निर्णय राष्ट्रीय हित से ज़्यादा, उनके निजी एजेंडे से प्रेरित था। माइकल एडवर्ड्स और जेफ्री टायसन जैसे जीवनीकारों का मानना है कि नेहरू कॉमनवेल्थ को एक ऐसा “वैश्विक मंच” मानते थे जिससे उनकी अंतरराष्ट्रीय चमक बरकरार रह सके।[9] उनके निर्णय पर निजी समीकरणों का भी असर था: भारत के आखिरी वायसराय लुइस माउंटबेटन और उनकी पत्नी एडविना के साथ नेहरू के चर्चित संबंध कोई रहस्य नहीं हैं। माउंटबेटन स्वयं चाहते थे कि भारत कॉमनवेल्थ में बना रहे। नेहरू के लिए यह संगठन एक तरह की आसान सा सौदा था: रेडीमेड सहयोगी, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का एहसास और बिना संघर्ष वाली एक ‘प्रगतिशील’ पहचान। उन्होंने हो ची मिन्ह जैसे नेताओं के रास्ते की उग्र स्वतंत्रता के बजाय, यह अपेक्षाकृत आरामदायक विकल्प चुना।
ब्रिटेन के असली इरादे
अन्य कारणों के अलावा, भारत का कॉमनवेल्थ सदस्यता बनाए रखने का निर्णय इसीलिए भी था ताकि ब्रिटेन की पाकिस्तान के प्रति अत्यधिक पक्षपातपूर्ण नीति को संतुलित किया जा सके। अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक कीथ बी. कॉलर्ड के अनुसार, भारत इस तथ्य की अनदेखी नहीं कर सकता था कि “कई अवसरों पर ब्रिटिश नीति को भारतीय मुसलमानों की राय को खुश करने के लिए बदला गया… और कई ब्रिटिश अधिकारी तथा सेना के अधिकारी व्यक्तिगत रूप से मुस्लिम भारतीयों को हिंदुओं की तुलना में अधिक पसंद करते थे।”[10]
भारत के कॉमनवेल्थ में बने रहने का एक और कारण नेहरू की नेतृत्व क्षमता की मूलभूत कमजोरी थी। नेहरू और उनके मंत्रिमंडल के साथियों ने कभी यह विचार ही नहीं किया कि कॉमनवेल्थ एक खोखला संगठन है और ब्रिटेन तथा पाकिस्तान के बीच कोई भी गुप्त साझेदारी ज़मीनी स्तर पर भारत के लिए कोई विशेष प्रभाव नहीं डाल सकती। नेहरू कभी अपने सेना प्रमुखों से सलाह नहीं लेते थे। इसके उलट, उनके फैसले—जो लगभग हमेशा भारत के रणनीतिक हितों को नुकसान पहुँचाते थे—अक्सर माउंटबेटन या एडविना की सलाहों से प्रभावित होते थे।[11]
यह भी याद रखना चाहिए कि ब्रिटिश भारत को उपनिवेश बनाने इसलिए नहीं आए थे कि वे एक दिन उसे छोड़ देंगे। उनका दीर्घकालिक, यद्यपि अप्रकट उद्देश्य, जर्मनी के ‘लेबेन्सराउम’ (सफेद लोगों के लिए जीवन-क्षेत्र) के समान था। उपनिवेशी शासन के आरंभिक वर्षों में ही ब्रिटिशों को यह समझ आ गया था कि भारत में असली प्रतिरोध मुसलमानों से नहीं, बल्कि हिंदुओं से मिल रहा है। इसलिए बहुसंख्यक हिंदुओं का उन्मूलन उनके लिए आवश्यक हो गया था। यद्यपि यह योजना अधिकांश हिंदू रियासतों के जबरदस्त प्रतिरोध के कारण सफल नहीं हो सकी, लेकिन निरंतर और कटु युद्धों ने ब्रिटिशों के भीतर हिंदुओं के प्रति गहरी नफ़रत भर दी। लेखक मिहिर बोस लिखते हैं: “200 वर्षों से भी अधिक समय तक, ब्रिटेन के कई प्रभावशाली लोगों के लिए हिंदुओं के प्रति घृणा एक सामान्य मानसिकता बन चुकी थी।” [12]
1940 के दशक तक, जब यह साफ हो गया था कि भारत की स्वतंत्रता अब टाली नहीं जा सकती, ब्रिटिश नेतृत्व में हिंदूफोबिया चरम पर था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने हिंदुओं को “गंदी जाति” कहा और यहां तक कि ये इच्छा ज़ाहिर की कि “आरएएफ (ब्रिटिश वायु सेना) के पास जो भी अतिरिक्त बमवर्षक विमान हों, वे हिंदुओं को नष्ट करने भेजे जाएं।”[13]
ब्रिटिश हुकूमत में सबसे ज़हरीले हिंदू विरोधियों में शामिल थे फील्ड मार्शल क्लाउड औचिनलेक, जो भारत में ब्रिटिश भारतीय सेना के आखिरी कमांडर-इन-चीफ थे। पाकिस्तान समर्थक और मुस्लिम-झुकाव वाले विचारों के लिए कुख्यात औचिनलेक ने भारत के भविष्य को लेकर यह भविष्यवाणी की थी, “भारत एक कृत्रिम इकाई है। अंग्रेजों ने इसे एक रखने की कोशिश की, लेकिन इसमें कुछ भी स्थायी नहीं हो सकता। कई राष्ट्रों का यह उपमहाद्वीप एक देश नहीं बन सकता।”[14]
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब ब्रिटेन अपनी सेनाएं घटा रहा था, औचिनलेक जैसे अधिकारी यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि भारत कॉमनवेल्थ में बना रहेगा, ताकि वे अपनी नौकरियाँ बचा सकें। सितंबर 1947 में उन्होंने लिखा, “मुझे नहीं पता कि भारत कॉमनवेल्थ में रहेगा या नहीं… लेकिन मैं, मेरे सीनियर कमांडर और स्टाफ अधिकारी सभी इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि राजनेता और कुछ वरिष्ठ भारतीय अधिकारी सेना के राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया को कितनी तेज़ी से आगे बढ़ा रहे हैं।”
भारत: ब्रिटेन की प्रतिष्ठा की आखिरी उम्मीद
यह बात ब्रिटिश शासक वर्ग बहुत पहले समझ चुका था कि युद्ध के बाद की दुनिया में भारत के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखना न सिर्फ फायदेमंद, बल्कि ज़रूरी होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, ब्रिटेन और, विस्तार से कहें तो, कॉमनवेल्थ की आर्थिक, औद्योगिक और वित्तीय रीढ़ भारतीय साम्राज्य की ताकत पर टिकी हुई थी। लंदन में जमा भारत के स्टर्लिंग बैलेंस ब्रिटेन की आर्थिक स्थिरता के लिए इतने ज़रूरी थे कि 1946 तक ब्रिटेन पर भारत का 1,300 मिलियन पाउंड से भी ज़्यादा बकाया था — जो उस समय भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 17 गुना था! इस विशाल कर्ज़ ने ब्रिटेन को न सिर्फ भारत को आज़ादी देने पर मजबूर किया, बल्कि उसे यह चिंता भी सताने लगी कि भारत की ‘सद्भावना’ कैसे बचाई जाए, ताकि पैसे की बात भी बन जाए।[15]
असल में, भारत के बिना ब्रिटेन ‘राजा’ तो रहता, लेकिन बिना राज्य के। जैसा कि वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने 1901 में भविष्यवाणी की थी: “जब तक हम भारत पर शासन करते हैं, हम दुनिया की सबसे बड़ी ताकत हैं। अगर भारत हाथ से गया, तो हम सीधे तीसरी श्रेणी की शक्ति बन जाएंगे।”[16] ब्रिटिश प्रधानमंत्री बेंजामिन डिज़रायली ने भी इस कड़वे सच को स्वीकार करते हुए कहा था: “ब्रिटेन, असल में, एक यूरोपीय देश कम और एशियाई शक्ति ज़्यादा है।”[17]
इसी भावना को माउंटबेटन ने और साफ़ शब्दों में लिखा: “अगर भारत कॉमनवेल्थ में बना रहा, तो इससे ब्रिटेन की वैश्विक प्रतिष्ठा में ज़बरदस्त इज़ाफा होगा — और साथ ही मौजूदा ब्रिटिश सरकार की भी साख बढ़ेगी।”[18] लेबर पार्टी के नेता स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स ने भी माना कि: “कॉमनवेल्थ में भारत की मौजूदगी, ब्रिटेन के भविष्य की वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक स्थिति के लिए बेहद अहम है।”[19]
और क्यों न हो? अमेरिका और रूस अपने-अपने सैन्य गुट बना रहे थे, और बेचारे ब्रिटेन को FOMO — यानी ‘Fear of Missing Out’ — का गंभीर दौरा पड़ा हुआ था। ऐसे में भारत जैसे विशाल देश को कॉमनवेल्थ में बनाए रखना उनके औपनिवेशिक मोहभंग का थोथा भ्रम बन सकता था। साथ ही, जब अमेरिका भारत को एक रणनीतिक सैन्य और आर्थिक साझेदार बनाने की कोशिश कर रहा था, तो धूर्त अंग्रेज़ जानते थे कि अगर भारत को राष्ट्रमंडल में बनाए रखा जाए, तो उसके अमेरिकी गठबंधन में शामिल होने की संभावना बहुत कम रह जाएगी।
अब बात करें सैन्य रणनीति की। ब्रिटेन जानता था कि वह सुदूर पूर्व में भारत पर ही टिका हुआ था; “अगर भारत कॉमनवेल्थ से बाहर हो गया, तो ब्रिटेन का हिंद महासागर पर नियंत्रण कमज़ोर पड़ जाएगा, और फारस की खाड़ी से तेल मिलना भी अनिश्चित हो जाएगा।” ब्रिटेन को उम्मीद थी कि भारत कॉमनवेल्थ के एक ढीले-ढाले रक्षा गठबंधन में केंद्रीय भूमिका निभाएगा —
कम से कम अपनी सीमाओं की रक्षा करेगा, और हो सकता है कि संगठन के किसी भविष्य के युद्ध में सक्रिय भागीदार भी बने। बदले में, भारत ब्रिटिश सैन्य और तकनीकी मदद पर निर्भर रहेगा, और ज़रूरत पड़ने पर आक्रामक अभियानों के लिए ब्रिटेन को सैन्य आधार देगा।
ब्रिटिश रक्षा प्रमुखों की सोच साफ थी : “भारत भले आज़ाद हो गया हो, लेकिन उसकी ज़मीन, सेना और संसाधनों का इस्तेमाल हम अपने हित में लंबे समय तक करते रहेंगे।”[20]
भारत को क्या मिला…हिंदूद्वेष के सिवा?
कॉमनवेल्थ में कुल 2.5 अरब लोग शामिल हैं, जिनमें से 1.5 अरब केवल भारतीय हैं। संख्या के लिहाज़ से यह दुनिया का सबसे बड़ा समूह है, और यही समूह ब्रिटेन की ग्लोबल प्रतिष्ठा को सबसे बड़ा आधार देता है। स्पष्ट है, अगर भारत इस संगठन से बाहर निकल जाए, तो कॉमनवेल्थ प्रासंगिक हो जाएगा।
लेकिन बदले में भारत को क्या मिलता है? सिर्फ अवमानना, और वह भी बिना किसी संकोच या शर्म के।
ब्रिटिश मीडिया, खासकर सरकार द्वारा वित्त पोषित BBC, अक्सर हिंदुओं को सांप्रदायिक, हिंसक और बर्बर के रूप में दिखाता है। यह न सिर्फ पक्षपाती पत्रकारिता है, बल्कि एक गहरे बैठे हिंदूफोबिया का प्रदर्शन भी है।[21] खालिस्तानी चरमपंथी लंदन में खुलेआम भारतीय दूतावास पर हमला करते हैं, ब्रिटिश पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है। कभी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती — मानो गुंडागर्दी की छूट हो।[22] ब्रिटेन में इस्लामी कट्टरपंथी भारत से आने वाले हिंदू नेताओं का विरोध करते हैं। 2022 में साध्वी ऋतंभरा के लंदन दौरे के दौरान उग्र प्रदर्शन इसका उदाहरण है।[23] उसी वर्ष, ऑक्सफोर्ड यूनियन की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष रश्मि सामंत को वामपंथियों और इस्लामवादियों के दबाव में अपना पद और देश — दोनों छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। जब एक वामपंथी प्रोफेसर ने उनके धार्मिक विश्वास का मज़ाक उड़ाया, तो 119 से अधिक ब्रिटिश हिंदू संगठनों ने 10 डाउनिंग स्ट्रीट को पत्र लिखकर कार्यवाही की मांग की — लेकिन बोरिस जॉनसन ने चुप्पी साध ली।[24]
असली समस्या यह है कि ब्रिटेन अभी भी अपने साम्राज्य के पतन को स्वीकार नहीं कर पाया है। वह आज भी एक कड़वे पूर्व सैनिक की तरह, अपने पुराने उपनिवेशों के आंतरिक मामलों में टांग अड़ाता रहता है, जैसे कि लोग आज भी उसके प्रजा हैं। कॉमनवेल्थ ही वह मंच है, जो ब्रिटिश संसद और राजनेताओं को भारत के लोकतंत्र, राष्ट्रवाद, शासन, कानून-व्यवस्था, लिंग-समानता, युवा नीति, प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार जैसे विषयों पर घड़ियाली चिंता जताने का बहाना देता है। यह सीधा-सीधा हस्तक्षेप है — और पूरी तरह अस्वीकार्य है।
आईआईएम रोहतक के प्रोफेसर धीरज शर्मा के शब्दों में: “भारत के लिए कॉमनवेल्थ सदस्यता में न व्यापार का कोई लाभ है, न यात्रा, न रक्षा, न ही कोई राजनयिक समर्थन। ब्रिटेन की सरकार उन तत्वों के प्रति उदासीन है जो भारत की संप्रभुता को चुनौती देते हैं। कॉमनवेल्थ सचिवालय भी कोई ठोस वकालत नहीं करता। इसके उलट, कॉमनवेल्थ चार्टर ब्रिटेन को भारत जैसे देशों के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का मंच देता है — और यही सबसे बड़ा नुकसान है।”[25]
अब किसे किसकी ज़रूरत है?
स्वतंत्रता के बाद के नाज़ुक वर्षों में, नेहरू ने कॉमनवेल्थ में बने रहने का जो तर्क दिया था, वह भारत की ब्रिटिश पूंजी, तकनीकी विशेषज्ञता और सैन्य मदद पर निर्भरता के नाम पर था। नेहरू एक कमज़ोर व्यक्तित्व के मालिक थे, जो अंग्रेज़ों से दोस्ती में सुरक्षा तलाशते थे — वो अंग्रेज़, जिन्होंने हर कठिन मौके पर भारत को धोखा दिया। चाहे वह 1948 और 1965 में पाकिस्तान से युद्ध हो या गोवा मुक्ति अभियान, ब्रिटेन ने कभी भारत का साथ नहीं दिया।
अब समय को 2025 तक तेजी से आगे बढ़ाइए — तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। अब भारत याचक नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति है। टाटा ग्रुप ने जगुआर, लैंड रोवर और कोरस (पहले ब्रिटिश स्टील) जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड खरीदकर औपनिवेशिक सत्ता-संबंधों को उल्टा कर दिया है। आज, भारत यूके में दूसरा सबसे बड़ा निवेशक है, जिसने सिर्फ 2022 में 8,600 से ज़्यादा नौकरियाँ पैदा कीं।[26] 2024 में ग्रांट थॉर्नटन की रिपोर्ट के अनुसार, यूके में 971 भारतीय कंपनियाँ थीं — जो एक साल पहले की तुलना में भी ज़्यादा थीं।[27]
ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन से लेकर ऋषि सुनक तक, सभी भारत आते हैं — कभी निवेश के लिए, कभी बाज़ार की तलाश में, कभी व्यापार समझौते की आस में। भारत को लड़ाकू विमान बेचने के लिए ब्रिटेन की बेताबी, विशेषकर 10-20 बिलियन डॉलर की यूरोफाइटर डील, इस नई निर्भरता का सबूत है।
मैडल जीतने की होड़ में छल-कपट
ब्रिटेन को भारत को कॉमनवेल्थ में बनाए रखना ही काफी नहीं — उसे भारत को नीचा दिखाने में भी आनंद आता है। 2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ खेलों में, ब्रिटेन ने जानबूझकर निशानेबाजी जैसे खेल को बाहर कर दिया, जिसमें भारत पारंपरिक रूप से शानदार प्रदर्शन करता आया है। इस फैसले पर भारतीय खिलाड़ियों और अधिकारियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। ओलंपिक पदक विजेता हीना सिद्धू ने सीधे आरोप लगाया कि “निशानेबाजी को हटाने का फैसला ब्रिटेन को पदक तालिका में फायदा पहुंचाने के लिए लिया गया है।” 2018 के गोल्ड कोस्ट खेलों में, भारत ने 66 में से 16 पदक सिर्फ निशानेबाजी में जीते थे। लेकिन अब इस खेल को बाहर करके भारत की सफलता की संभावनाओं को सीधे निशाना बनाया गया।[28]
यह अकेला मामला नहीं था। तीरंदाजी — एक और खेल जिसमें भारत मजबूत रहा है — उसे भी 2022 के खेलों से बाहर कर दिया गया। आईओए अध्यक्ष नरेंद्र बत्रा ने इसे भारत के साथ पूर्वाग्रहपूर्ण रवैया बताया, और यहां तक कहा कि भारत को इन खेलों का बहिष्कार करना चाहिए।
उन्होंने खेल मंत्री किरेन रिजिजू को लिखे पत्र में लिखा कि “जिन खेलों में भारत उत्कृष्ट है, उन्हें बार-बार हटाया जा रहा है — यह हमारे योगदान को कमज़ोर करने की सोची-समझी रणनीति है।”
हीना सिद्धू ने बत्रा के रुख का समर्थन करते हुए चेतावनी दी कि “निशानेबाजी के बिना भारत की पदक संख्या में बड़ी गिरावट आएगी। अब समय आ गया है कि भारत कॉमनवेल्थ को स्पष्ट संकेत दे — वह अब अनदेखी या तिरस्कार सहन नहीं करेगा।” उनकी बात सिर्फ उनकी नहीं — सैकड़ों भारतीय खिलाड़ियों की वह हताशा है, जो महसूस करते हैं कि भारत की ताकत को रणनीतिक रूप से दरकिनार किया जा रहा है।
COMEXIT: एक ऐतिहासिक निर्णय की ओर बढ़ता भारत
कॉमनवेल्थ आज भी एक लम्बे चले आ रहे औपनिवेशिक खुमारी का प्रतीक है, जो एक नई वैश्विक शक्ति के रूप में उभरते भारत की पहचान से सीधे टकराता है। इस संगठन की सदस्यता भारत को एक ऐसे क्लब से जोड़ती है, जिसका एकमात्र आधार ब्रिटिश शासन के अधीनता का इतिहास है, जो गौरव नहीं, शर्म का कारण है। आज जब भारत को बिना किसी झिझक के अपनी संप्रभुता का प्रदर्शन करना चाहिए। इस क्लब से चिपके रहना बीते ज़माने की मानसिक गुलामी को ज़िंदा रखना है।
COMEXIT से भारत अलग-थलग नहीं पड़ेगा — बल्कि और स्वतंत्र होगा। भारत पहले ही ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे कॉमनवेल्थ सदस्य देशों के साथ बिना किसी संस्था की जरूरत के मज़बूत द्विपक्षीय रिश्ते बनाए हुए है। भारत की आर्थिक ताकत, सॉफ्ट पावर, और रणनीतिक गहराई इस बात की गारंटी हैं कि कॉमनवेल्थ से बाहर जाने के बाद भी उसकी वैश्विक पकड़ कमजोर नहीं होगी — बल्कि और मज़बूत होगी। बाहर निकलने से, भारत वे संसाधन बचा सकेगा जो अभी कॉमनवेल्थ शुल्क और शिखर सम्मेलनों पर खर्च होते हैं —
और उन्हें ब्रिक्स, क्वाड, या अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे राष्ट्रीय हितों से जुड़े गंभीर मंचों में लगा सकेगा।
पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल कहते हैं: “अब कॉमनवेल्थ से बाहर निकलने से भावनात्मक संतोष भी मिलेगा — हम अब आगे बढ़ चुके हैं; हम ब्रिटेन से भी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके हैं।”[29] इस विचार को सिर्फ भावनात्मक नहीं, जनमत का भी समर्थन है। 2003 में भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में हुए एक सर्वेक्षण में 94.5% छात्रों ने कहा कि भारत को कॉमनवेल्थ से बाहर निकल जाना चाहिए। COMEXIT का समर्थन करने वाले छात्रों में 72% ने कहा कि भारत अब ब्रिटेन से ज़्यादा प्रभावशाली वैश्विक ताकत है, 62% ने भारत के पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने को कारण बताया, 60% ने भारत की आत्मनिर्भरता और संसाधनों को आधार माना, और 54% ने कॉमनवेल्थ को एक संकुचित, औपनिवेशिक युग की बासी संस्था बताया।[30]
अब सवाल “क्यों” का नहीं, “अब तक क्यों नहीं” का है।
1949 में जब दुनिया नेहरू के साथ चलने को तैयार थी, तो उनका यह निर्णय कुछ हद तक समझ में आता था। लेकिन 2025 में, यही निर्णय पूरी तरह अप्रासंगिक और आत्मघाती लगता है। कॉमनवेल्थ आज एक “कालभ्रम” है, एक ऐसा ढांचा जो मृत साम्राज्य के भ्रम को ज़िंदा रखने की नाकाम कोशिश है। अब समय आ गया है कि भारत इन गुलामी की बेड़ियाँ को हमेशा के लिए उतार फेंके। सवाल यह नहीं है कि भारत को COMEXIT क्यों करना चाहिए — बल्कि यह है कि उसने इतना लंबा इंतज़ार आखिर किया ही क्यों।
संदर्भ सूची
[1] India Submits Bid To Host 2030 Commonwealth Games: Report (NDTV Sdports); https://sports.ndtv.com/othersports/india-submits-bid-to-host-2030-commonwealth-games-report-7970708
[2] Commonwealth Games Scam (Times of India); https://timesofindia.indiatimes.com/miscellaneous/commonwealth-games-scam/articleshow/56032112.cms
[3] Last Week Tonight: Commonwealth Games (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=-Aj3KZa1ZCM
[4] How British colonialism killed 100 million Indians in 40 years (Al Jazeera); https://www.aljazeera.com/opinions/2022/12/2/how-british-colonial-policy-killed-100-million-indians
[5] [5] Sovereignty After the Empire and the Search for a New Order: India’s Attempt to Negotiate a Common Citizenship in the Commonwealth (1947–1949) (The Journal of Imperial and Commonwealth History, v. 49, 2021); https://www.tandfonline.com/doi/full/10.1080/03086534.2021.1950322#d1e215
[6] Jawaharlal Nehru: His Life, Work and Legacy (S. Chand & Co., 1990), p16; https://eparlib.nic.in/bitstream/123456789/57392/1/Jawaharlal_Nehru_life_English.pdf
[7] Ibid, p 16
[8] Ibid, p 17
[9] India’s Membership of the Commonwealth – Nehru’s Role (The Indian Journal of Political Science, V52, pp 43-53); https://www.jstor.org/stable/41855534
[10] India and the Commonwealth (SC Gangal, Shiva Lal Agarwala and Company, 1970, Page 28); https://ia802907.us.archive.org/20/items/in.ernet.dli.2015.219984/2015.219984.India-And_text.pdf
[11] A Media Expose Special (Thread) that throws light on the least discussed issues by the Darbari Media over the last 5 to 6 decades on the Love Affair between Pandit Nehru and Edwina Mountbatten (X); https://x.com/MediaExpose_/status/1868891675239543197
[12] A Hatred for Hindus – Long before the recent rise in Islamophobia, distrust of Hinduism was rife among Britain’s ruling class (History Today, Dec 2016); https://www.historytoday.com/hatred-hindus
[13] Steven Pinker’s Book Is An Antidote For The Growing Animosity Towards Science (Swarajya Magazine, 2018); https://swarajyamag.com/books/steven-pinkers-book-is-an-antidote-for-the-growing-animosity-towards-science
[14] Mountbatten, Auchinleck and the end of British Indian Army: August-November 1947 (Loughborough University Institutional Repository); https://pdfs.semanticscholar.org/0a55/f148ef0addea9a1f321d236e651fb577b892.pdf
[15] The ‘New Commonwealth’ 1947 – 49: A New Zealand perspective on India joining the Commonwealth(The Tandfonline, 2006); https://www.tandfonline.com/doi/pdf/10.1080/00358530600757276
[16] The Pinnacle of the Empire (The Breakup of the British Empire, Springer Nature); https://link.springer.com/chapter/10.1007/978-1-349-15307-7_1
[17] Britain is part of Europe: but how much a part? (Briefings for Britain, 2020); https://www.briefingsforbritain.co.uk/britain-always-differed-from-continental-europe/
[18] India’s Decision to Remain on the Commonwealth – 1949; A Major Landmark in Foreign Policy (Proceedings of the Indian History Congress, v 70, pp. 1134-1143); https://www.jstor.org/stable/44147757?read-now=1&seq=6#page_scan_tab_contents
[19] The ‘New Commonwealth’ 1947 – 49: A New Zealand perspective on India joining the Commonwealth(The Tandfonline, 2006); https://www.tandfonline.com/doi/pdf/10.1080/00358530600757276
[20] Keeping India in the Commonwealth: British Political and Military Aims, 1947-49 (Journal of Contemporary History, Vol. 20, No. 3, pp. 469-481); https://www.jstor.org/stable/260355?read-now=1&seq=5#page_scan_tab_contents
[21] ‘BBC On Trial’ Maker Pt. Satish Sharma Exposes BBC’s Anti-Hindu Agenda (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=yTVYgeWIrSw
[22] The NIA filed its first charge sheet in the twin violent attacks at the Indian high commission in London last year (Hindustan Times, Sept 2024);
[23] Sadhvi Ritambhara’s event cancelled in London after protests outside temple in Birmingham (India TV News, 2022);
[24] Oxford Hinduphobia row: Rashmi Samant vindicated as internal investigation confirms how she was vilified, harassed and forced to resign (OpIndia, 2021); https://www.opindia.com/2021/07/oxford-hinduphobia-row-rashmi-samant-internal-investigation-confirms-forced-to-resign/
[25] Understanding Commonwealth: Is it even relevant for a democracy like India? (India Narrative, 2023); https://www.indianarrative.com/opinion-news/understanding-commonwealth-is-it-even-relevant-for-a-democracy-like-india-129438.html
[26] India remains second largest investor in the UK as enhanced trade agreement progresses (Moore, Kingston Smith – Insights; 2022); https://mooreks.co.uk/insights/india-remains-second-largest-investor-in-the-uk-as-enhanced-trade-agreement-progresses/#:~:text=Moore%20Kingston%20Smith’s%20India%20Group,and%20expect%20this%20to%20continue
[27] Indian ownership of British companies (Reuters, 2024); https://www.reuters.com/business/indian-ownership-british-companies-2024-08-12/
[28] Because India is no cheap shot: Why we should shoot down the 2022 Commonwealth Games (Daiyo – Sports, 2019); https://www.dailyo.in/sports/commonwealth-games-2022-shooting-in-cwg-indian-shooters-britain-india-brexit-31909
[29] Because India is no cheap shot: Why we should shoot down the 2022 Commonwealth Games (The India Times; 2024); https://economictimes.indiatimes.com/news/india/high-time-india-quit-commonwealth-says-former-foreign-secretary-kanwal-sibal/articleshow/116081979.cms?utm_source=contentofinterest&utm_medium=text&utm_campaign=cppst
[30] Understanding Commonwealth: Is it even relevant for a democracy like India? (India Narrative, 2023); https://www.indianarrative.com/opinion-news/understanding-commonwealth-is-it-even-relevant-for-a-democracy-like-india-129438.html
Donate to HINDUDVESHA
Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.
SUPPORT US