लाल क़िला आतंकी घटना के बाद उठी ‘भेदभाव’ की पुकार: आतंकवाद से ध्यान हटाकर अपराधियों को सुरक्षित करने की कवायद

लाल क़िला धमाकों के बाद वही पुराना चक्र फिर सक्रिय हुआ, जहाँ कुछ एक्टिविस्ट-पत्रकार, राजनेता और वैचारिक समूह “इस्लामोफ़ोबिया” का आरोप लगाकर आतंकवाद से जुड़े स्पष्ट सबूतों को धुँधला करते हैं, जाँच पर अविश्वास पैदा करते हैं और चरमपंथी हिंसा को समुदाय-पीड़ित नैरेटिव में बदल देते हैं।
  • 2025 के पहलगाम हमले हों या 10–11 नवंबर का लाल क़िला धमाका, वाम-उदारवादी और कट्टर इस्लामिस्ट तंत्र हर बार वही पुराना फ़ॉर्मूला अपनाता है—सामुदायिक पीड़ितत्व की बढ़ा-चढ़ा कर पेश की गई कहानी।
  • लाल क़िला मामले में जिहादी नेटवर्क और डॉक्टर्स मॉड्यूल के खुलासे के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर वही ढोंग फिर शुरू हो गया। सबूत सामने आने के बावजूद यह तंत्र जांच को खारिज कर “इस्लामोफ़ोबिया” का शोर मचाने लगा।
  • हमले के तुरंत बाद कुछ कश्मीरी नेता और सिविल सोसायटी समूह जांच पूरी होने से पहले ही “प्रोफ़ाइलिंग” और “टार्गेटिंग” का आरोप लगाने लगे, जिससे इस्लामोफ़ोबिया वाला नैरेटिव और तेज़ हुआ।
  • हर बड़े हमले के बाद—चाहे पहलगाम हो या लाल क़िला—वामपंथी और कट्टर इस्लामिस्ट मीडिया का एक हिस्सा लगातार इस्लामोफ़ोबिया की बात करता है। ऐसे लेखों के सहारे चरमपंथ की जाँच को ही “इस्लामोफ़ोबिया” बताकर जनता का ध्यान असली मुद्दों से हटाया जाता है।
  • बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया पीड़ितत्व और अल्पसंख्यक-तुष्टिकरण की पुरानी राजनीति मिलकर जांच एजेंसियों के काम में रुकावटें पैदा करती है, जिससे देशभर में फैले स्लीपर सेल्स को पकड़ना और खत्म करना और भी कठिन हो जाता है।

वोक राजनीति का ढांचा कई आडंबरों पर टिका है, लेकिन इसकी असल पहचान तीन तरीकों से बनती है—पीड़ित होने का ढोंग, अत्यधिक अधिकार-दावा, और भिन्न मतों के प्रति असहिष्णु ‘कैंसल’ प्रवृत्ति। इनमें से “पीड़ित बनने का दिखावा” वोक रांजनीति की टूलकिट का सबसे ताक़तवर हथियार है। इसका इस्तेमाल सिर्फ़ झूठे नैरेटिव फैलाने के लिए ही नहीं होता, बल्कि उग्रवाद, कट्टरपंथ और आतंकवाद से जुड़े अहम मुद्दों को सामूहिक स्मृति से मिटाने के लिए भी इसका दुरुपयोग धड़ल्ले से किया जाता है।

9/11 से लेकर 2025 के पहलगाम हमलों और नवंबर 10-11 के लाल क़िले धमाकों तक, हर बार वही पुरानी पटकथा दोहराई जाती है। हर बार वाम-उदारवादी और इस्लामिस्ट समूह तथ्यों को किनारे रखकर खुद को जबरन पीड़ित दिखाने वाली वही पुरानी कहानी शुरू कर देते हैं। यह बनावटी पीड़ितभाव वास्तविकता से पूरी तरह कटा होता है और पहचान-आधारित राजनीति का एक परिचित तरीका भर है।

घटना चाहे कितनी भी गंभीर हो, उसका वैचारिक मक़सद कितना भी स्पष्ट हो, और घटना को अंजाम देने में कट्टर नेटवर्क्स की भूमिका को लेकर चाहे कितने भी सबूत मौजूद हों, यह पूरा तंत्र आम जनता से बस नज़रें फेर लेने की उम्मीद रखता है। जैसे ही कोई जिहादी हमला होता है, पीड़ितत्व की मशीन पूरे ज़ोर-शोर से चल पड़ती है। सोशल मीडिया “इस्लामोफ़ोबिया” की गूंज से भर जाता है, और इस छल-कपट से भरे शाब्दिक आडंबर के खेल में असली मुद्दे हाशिये पर रह जाते हैं। यानी आतंकवादी हमलों की हिंसा और बर्बरता के पीछे छिपी कट्टरवाद की विचारधारा पर ईमानदार चर्चा की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती।

यह तंत्र मीडिया से लेकर अकादमिक क्षेत्र, बौद्धिक संस्थानों, एक्टिविस्ट समूहों और लोकप्रिय संस्कृति की दुनिया तक मज़बूती से फैला हुआ है। यह पूरा तंत्र मिलकर आतंकवाद की लीपापोती करता है, यानी विभिन्न वैचारिक हथकंडों के माध्यम से उसे परोक्ष रूप से जायज़ ठहराता है। यह तंत्र “इस्लामोफ़ोबिया” के विमर्श को भी खूब भुनाता है, जिसका नतीजा यह निकलता है कि आतंकवाद के पक्ष में सहानुभूति पैदा करने के उद्देश्य से एक पूरी बौद्धिक इंडस्ट्री खड़ी हो जाती है। इस तरह कट्टरवादी समूहों के चारों ओर एक अनौपचारिक सुरक्षा कवच खड़ा हो जाता है। जैसे ही कोई आम नागरिक, पत्रकार, सामाजिक संगठन, या सरकारी एजेंसियाँ कट्टरपंथी इस्लामिस्ट नेटवर्क्स पर सवाल उठाती है, उन्हें “इस्लामोफ़ोबिया” के नाम पर निशाना बनाया जाने लगता है।

वैचारिक हेर फेर और शाब्दिक आडंबर के इस खेल के ज़रिये यह तंत्र कट्टर तत्वों के लिए सहानुभूति गढ़ता है और जांच-प्रक्रिया को कमज़ोर करता है। आगे के हिस्सों में हम देखेंगे कि 10 नवंबर के लाल क़िले आतंकी हमलों—जिनमे कम से कम दस लोग मारे गए और तीस से ज़्यादा घायल हुए—के बाद “इस्लामोफ़ोबिया” की वही चिर-परिचित स्क्रिप्ट किस तरह फिर से सामने आने लगी है।

सोशल मीडिया पर पीड़ित बनने का खेल

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संकटों को वाम-उदारवादी तथा इस्लामिस्ट समूह अक्सर एक ऐसा अवसर मानते हैं, जहाँ वे अपने पीड़ित-प्रधान नैरेटिव को आगे बढ़ा सकें।

लाल क़िले में हुए आतंकी धमाकों के कुछ ही दिनों बाद, और जिहादी नेटवर्क्स व डॉक्टर्स मॉड्यूल के खुलासे के बीच, सोशल मीडिया पर वही पुराना पाखंड फिर सक्रिय हो गया। छिपे हुए जिहादी और आतंक के मौन समर्थक “इस्लामोफ़ोबिया” का राग अलापने लगे: “स्कूलों, दफ़्तरों और ऑनलाइन स्पेस में मुसलमानों का जमकर अपमान किया जा रहा है और उन्हें आतंकवादी लेबल किया जा रहा है। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, और मुसलमान भी आतंकवाद के शिकार हैं—दिल्ली धमाकों में कई मुसलमान मरे हैं। मुसलमानों ने इस देश के लिए खून बहाया है, वे इस देश की एकता के लिए खड़े हुए हैं, और फिर भी शक व अत्याचार झेल रहे हैं। बस करो, मुस्लिम पहचान को अपराध मत बनाओ!” – अरफ़ा ख़ानम, X पर[1]

एक अन्य “पत्रकार” ने X पर पोस्ट डालकर भारत में मुस्लिम कट्टरपंथ का दोष मोदी सरकार की कश्मीर नीति पर डालने की कोशिश की। यह उसी पुरानी इस्लामिस्ट टूलकिट का हिस्सा है—जहाँ अपने समुदाय की आत्म-पीड़ित छवि को इतना बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता है कि हर समस्या किसी कल्पित “दमनकारी” पर थोप दी जाती है: “दिल्ली में हुई आतंकी घटना के बाद कई मुसलमान शिक्षित युवाओं के कट्टर होने को लेकर वाजिब रूप से चिंतित हैं। कट्टरपंथ हवा में नहीं बढ़ता, इसके राजनीतिक कारण होते हैं। कश्मीर-मुद्दे को अगर नज़रअंदाज़ भी कर दें, तो भी Article 370/35A के बाद शिक्षित मुस्लिम युवा पसोपेश की स्थिति में हैं, मानो उनसे सारी उम्मीदें छीन ली गयी हों। उन्हें एक इज़्ज़तदार भविष्य की कोई उम्मीद नहीं दिखती।” – ग़ज़ाला वहाब, X पर[2]

एक और पोस्ट में ग़ज़ाला वहाब ने जांच प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए—मानो जांच के दौरान जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे तथाकथित “हिंदुत्व स्टेट” की कोई साज़िश हों, जिन्हें आगे चलकर मुस्लिम “प्रोफेशनल क्लास” को परेशान करने में इस्तेमाल किया जाएगा:
“इससे भी बड़ी चिंता यह है कि राज्य और बड़ा हिंदुत्व ढांचा—जिसमें पास-पड़ोस के लोग और रोज़गार प्रदान करने वाले भी शामिल हो सकते हैं – इस घटना को बहाना बनाकर उस मुस्लिम प्रोफेशनल वर्ग को और ज़्यादा परेशान करेगा और हाशिए पर धकेल देगा, जो मुख्यधारा में रहकर भारत में भविष्य चाहते हैं।”[3]

सबा नक़वी ने भी X पर पोस्ट कर इस्लामोफ़ोबिया वाला पीड़ित नैरेटिव आगे बढ़ाया। उनका तर्क था कि भारतीय मुसलमानों को आतंकवाद की निंदा करने के लिए अनुचित रूप से single out किया जा रहा है: “सभी भारतीयों को आतंकवाद की निंदा करनी चाहिये, और वे करते भी हैं। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा करने के लिए मुसलमानों से अलग से क्यों उम्मीद की जाती है, जैसे वे तब तक दोषी हैं जब तक वे आतंकवाद के लिये माफ़ी न मांगें। सोचिए—गाँधी, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी की हत्या करने वाले किस समुदाय के थे? यह समझिए कि हर समुदाय में कट्टर लोग होते हैं, जो पूरे समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते।[4]

लाल क़िला धमाकों के बाद ऐसे कई सोशल मीडिया पोस्ट्स देखने को मिले—जहाँ कट्टर इस्लामिक आवाज़ें खुद को “नरमपंथी बुद्धिजीवी” दिखाते हुए सामने आईं। विडंबना यह है कि यह वही समूह है जो सालों तक “हिंदुत्व आतंकवाद” का राग अलापता रहा।[5] इस झूठे विमर्श की नींव सिर्फ़ एक मालेगांव ब्लास्ट के केस पर टिकी थी, लेकिन इस मामले में सभी आरोपियों को बरी किए जाने के बावजूद यह नैरेटिव अभी तक फैलाया जा रहा है। “हिंदुत्व आतंक” का झूठा नैरेटिव गढ़ने और फैलाने में तो यह तंत्र ज़रा भी नहीं हिचकिचाता, लेकिन जैसे ही कोई “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द का इस्तेमाल करे, तो यह तुरंत इस्लामोफ़ोबिया का शोर मचाने लगता है—जबकि इन हमलों के तार वैश्विक जिहादी नेटवर्क्स से जोड़ने वाले ढेरों प्रमाण मौजूद हैं।

दिलचस्प बात यह है कि लाल क़िला धमाकों के बाद इस्लामोफ़ोबिया का रोना रोने वाली कई “एक्टिविस्ट” आवाज़ों का हिंदू देवताओं का अपमान करने का अच्छा ख़ासा रिकॉर्ड रहा है। राना अय्यूब, जो हमेशा से हिंदूफ़ोबिक टिप्पणियों के लिए जानी जाती हैं, अपने मंच का इस्तेमाल हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने, भारत की एकता को चोट पहुँचाने, देश के ख़िलाफ़ माहौल बनाने, भारतीय सेना को बदनाम करने और यहाँ तक कि 2022 के कर्नाटक हिजाव-विरोधी प्रदर्शनकारियों को “हिंदू आतंकी” कहने तक के लिए करती रही हैं।[6]

एक अन्य चरम-वामपंथी टिप्पणीकार अरफ़ा ख़ानम लंबे समय से हिंदू धर्म और संस्कृति के खिलाफ़ ज़हरीले नैरेटिव फैलाने में सक्रिय रही हैं।[7] लेकिन जैसे ही जिहादी हिंसा की बात आती है, वे तुरंत इस्लामोफ़ोबिया का कार्ड दिखाकर पूरी बहस को पटरी से उतार देती हैं।

सफ़ेदपोश जिहाद नेटवर्क

लाल क़िला आत्मघाती कार बम हमले की जाँच में उजागर हुए व्हाइट-कॉलर आतंकी मॉड्यूल ने आतंकवाद का एक ऐसा हाइब्रिड मॉडल सामने रखा है, जिसकी रणनीति पारंपरिक आतंकवाद से बिल्कुल अलग है—और जिसे हमारी एजेंसियों ने पहले कभी इस रूप में नहीं देखा था।

फरीदाबाद की अल-फ़लाह यूनिवर्सिटी इस जिहादी नेटवर्क का केंद्र बनकर उभरी है, जहाँ से जुड़े कई डॉक्टरों से हमलों की साज़िश में उनकी संदिग्ध भूमिका को लेकर पूछताछ चल रही है।[8] लाल क़िला हमले का आत्मघाती हमलावर डॉ. उमर मोहम्मद खुलेआम आत्मघाती हमलों को “शहादत” बताता था। उसके शब्दों में: “जिस चीज़ को आत्मघाती हमला कहा जाता है, वह असल में एक शहादत मिशन है… इस्लाम में जाना-पहचाना।[9]

भारत भर में सक्रिय इस व्हाइट-कॉलर मॉड्यूल की जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे पीड़ितत्व का वह अतिश्योक्तिपूर्ण नैरेटिव फिर से उभरने लगा है। जैसे जैसे जाँच एजेंसियाँ प्रक्रिया में आगे बढ़ रही हैं और इस घटनाक्रम से जुड़े संदिग्ध व्यक्तियों की जाँच का दायरा बढ़ रहा है, वैसे वैसे वही पुराना विक्टिम कार्ड का खेल भी ज़ोर पकड़ रहा है।[10] जाँच एजेंसियों की बढ़ी हुई निगरानी को लेकर अब विरोध के स्वर सामने आने लगे हैं। अपनी पुरानी रणनीति दोहराते हुए, JKSA सहित कुछ समूह अब कह रहे हैं कि लाल क़िला धमाकों के बाद उत्तर भारत के कई हिस्सों में कश्मीरी छात्रों को “प्रोफाइलिंग” और “बेदख़ली” झेलनी पड़ रही है। साथ ही वे इस्लामिक आतंकवाद पर हो रही सार्वजनिक चर्चा को समुदाय की “बदनामी” के रूप में लेबल कर रहे हैं।[11]

यहाँ तक कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला—जिनके पिता के शासन में 1990 में लाखों कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार और पलायन हुआ—ने भी यह बयान दिया कि लाल क़िला धमाकों के बाद कश्मीरियों को “संदेह भरी नज़र से” देखा जा रहा है। उन्होंने एक स्थानीय कार्यक्रम में कहा: “दिल्ली में जो हुआ उसके लिए कुछ लोग ज़िम्मेदार हैं, लेकिन माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि सभी कश्मीरी शक के दायरे में आ जाएँ।[12]

पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती तो अपने वक्तव्य में इससे भी कहीं आगे बढ़ गईं। उन्होंने सरकारी नीति को हमले का दोषी ठहराया और डॉक्टरों के कट्टर होने का सारा दोष केंद्र सरकार पर मढ़ दिया। उनका कहना था कि सरकार ने “नफ़रत भरा माहौल” तैयार कर दिया है, जो युवाओं को “खतरनाक रास्ते” की ओर धकेल रहा है।[13]

वाम-उदारवादी तंत्र द्वारा फैलाया गया “हिंदुत्व फासीवाद” वाला ज़हरीला नैरेटिव और इस्लामोफ़ोबिया पीड़ित-कार्ड की राजनीति मिलकर कट्टर इस्लामिस्ट चरमपंथ की रोकथाम में लगी एजेंसियों के सामने बड़ी मुश्किलें खड़ी करते हैं। गढ़ा हुआ पीड़ितभाव—जिसे अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति और भी ज़्यादा मजबूत करती है—एजेंसियों के लिए देश में सक्रिय स्लीपर सेल्स का पर्दाफाश कर उन्हें खत्म करना और भी ज़्यादा चुनौतीपूर्ण बना देता है।

जैसे जैसे जांच एजेंसियाँ आतंकवाद के नए मॉड्यूल्स का पर्दाफ़ाश कर रही हैं, वैसे-वैसे  वाम-उदारवादी और कट्टर इस्लामिस्ट तंत्र नैतिकता का झूठा मुखौटा पहन जिहादी आतंक के पूरे ढांचे की लीपापोती करने में और भी तेज़ी से जुट गया है।

इस्लामोफ़ोबिया: जवाबदेही से बचने की ढाल

पहलगाम हमलों या लाल क़िला धमाके जैसी बड़ी आतंकी वारदातों के बाद, वाम-उदारवादी और कट्टर इस्लामिस्ट मीडिया का एक हिस्सा अक्सर वही पुराना इस्लामोफ़ोबिया वाला नैरेटिव सामने ले आता है। आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दों पर गहन और निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने के बजाय, या आतंकवादी हिंसा की वैचारिक जड़ तक पहुँचने का ज़रा सा भी प्रयास किए बिना, ऐसे मंच अक्सर इस बात को लेकर ज़्यादा चिंतित नज़र आते हैं कि एक समुदाय विशेष की “भावनायें” कहीं आहत न हो जायें। जाँच में सामने आये तथ्य भले ही किसी भी तरफ़ इशारा कर रहे हों, इन मीडिया आउटलेट्स का सारा ध्यान बस इस्लामोफ़ोबिया का नैरेटिव फैलाने पर केंद्रित रहता है।

Youth Ki Awaaz में हाल में प्रकाशित एक लेख—“Red Fort Blast’s Media Spectacle, Security Discourse, and Politics of Fear” (लाल क़िला ब्लास्ट का मीडिया तमाशा, सिक्योरिटी विमर्श और भय की राजनीति) इसका साफ़ उदाहरण है। लेख का लहजा भले गंभीर दिखता है, पर उसमें न तो तथ्यात्मक साक्ष्यों पर चर्चा है और न ही जांच के ठोस निष्कर्षों पर कोई विचार। पूरा लेख बस इस व्यापक आरोप पर टिका है कि लाल क़िला मामले की जांच “राज्य-चालित नैरेटिव” है जो मुसलमानों को निशाना बनाती है। इसमें हर घटनाक्रम को इस्लामोफ़ोबिया के केंद्रीय विमर्श से जोड़ा गया है: “लाल क़िले की घटना यह दिखाती है कि इस्लामोफ़ोबिया कैसे एक प्रतिनिधित्वपूर्ण ढांचे और राजनीतिक औज़ार की तरह काम करता है। मुस्लिम संदिग्धों पर जल्दबाज़ी में लगाए गए आरोप सांस्कृतिक विचलन और ग़द्दारी वाली पुरानी रूढ़ियाँ दोहराते हैं।[14]

Maktoob Media में प्रकाशित एक अन्य लेख—“When a comment calls for cleaning”—[15]लाल क़िला धमाकों के बाद सोशल मीडिया पर कथित रूप से बढ़ते इस्लामोफ़ोबिया पर विलाप करता है। लेखक मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ऑनलाइन नफरती टिप्पणियों के कुछ उदाहरण देता है। किसी भी समुदाय पर ऐसी भाषा अस्वीकार्य है, लेकिन लेख सिर्फ ऑनलाइन जुमलों तक सीमित रहता है और उपमहाद्वीप में फैले कट्टरपंथीकरण पर मौन रहता है। इस चयनात्मकता से एक स्पष्ट पूर्वनिर्धारित एजेंडा झलकता है। “हर जनसंहार पहले ज़हरीली भाषा से जन्म लेता है, हथियार तो सिर्फ़ उसका अगला चरण होते हैं,” लेखक कहता है। ये पंक्तियाँ लेख की मूल सोच उजागर करती हैं—वास्तविक आतंकवाद की चर्चा छोड़कर एक काल्पनिक और अतिशयोक्तिपूर्ण अत्याचार-कथा को हवा देना।

लाल क़िला ब्लास्ट के पश्चात के मीडिया विमर्श पर इस्लामोफ़ोबिया की यह फ्रेमिंग इस कदर हावी हो चुकी है कि “Islamophobia after Red Fort terror blasts” जैसी साधारण सर्च में भी कई लेख दिख जाते हैं, जिनमें मुस्लिम पीड़ितभाव वाला वही बार-बार इस्तेमाल किया गया तर्क मिलता है। खोज के साथ ही एक स्वचालित AI-सारांश भी देखने को मिलता है, जिसमे यहाँ तक दावा किया जाता है कि 10 नवंबर 2025 के हमले के बाद कई ऐसी रिपोर्टें सामने आये हैं, जो यह बताती हैं कि लाल क़िला ब्लास्ट्स के बाद भारत के कई हिस्सों में मुस्लिम-विरोधी भावनाएँ उफ़ान पर हैं।

इस्लामोफ़ोबिया का शुरुआती संदर्भ मध्यकालीन क्रूसेड्स तक जाता है, जब इस्लामिक शासन वाले क्षेत्रों पर कब्ज़े के प्रयासों ने शुरुआती मुस्लिम-विरोधी धारणाएँ गढ़ीं। एडवर्ड सईद का ओरिएंटलिज़्म सिद्धांत—जो पश्चिमी शोध में गैर-पश्चिमी समाजों के चित्रण की आलोचना करता है—भी इस्लामोफ़ोबिया की अवधारणा पर चर्चा करता है। सईद के अनुसार, पश्चिमी बुद्धिजीवियों ने इस्लामिक समाज को “exotic” यानी विचित्र और असभ्य के रूप में चित्रित किया, व इस्लामिक दुनिया की समृद्ध और बहुआयामी बौद्धिक विरासत को कम करके बताया।[16]

21वीं सदी में यह शब्द 9/11 के बाद तेज़ी से फैला। लेकिन जिस चीज़ की शुरुआत मुस्लिम समुदाय की टार्गेटेड प्रोफाइलिंग और बढ़ती निगरानी पर चिंता के रूप में हुई थी, वह धीरे-धीरे एक पूरे नैरेटिव उद्योग में बदल गई—जहाँ कट्टर नेटवर्कों की भूमिका को ढकने के लिए कई बार पहचान-आधारित राजनीति का इस्तेमाल किया जाने लगा।

आज इस्लामोफ़ोबिया की बहस में कट्टर इस्लामिस्ट तंत्र की ईमानदार आलोचना के लिए जगह ही नहीं बचती। यह तंत्र निरंतर “पीड़ितत्व” की मुद्रा में रह अपने पीड़ितभाव के नैरेटिव में नित नई-नई शिकायतों की परतें जोड़ता है— ताकि जिहादी विचारधारा पर सीधे सवालों से ध्यान हटाया जा सके।

भारत में, जहाँ हिंदुओं ने सदियों तक इस्लामिक आक्रमणों का दंश और लक्षित सांप्रदायिक हिंसा झेली है, इस्लामोफ़ोबिया का नैरेटिव और भी ज़्यादा उलझा हुआ रूप ले लेता है। भारत के संदर्भ में यह नैरेटिव मात्र जिहादी हिंसा की लीपापोती कर उसका सामान्यीकरण ही नहीं करता, बल्कि वास्तविकता को उलटकर “हिंदुत्व आधिपत्य” की झूठी कहानी गढ़ने का भी काम करता है। इस कथित आधिपत्य के नैरेटिव के सहारे ऐसा माहौल बनाया जाता है, जिसमें आतंक के कृत्यों को परोक्ष रूप से सही ठहराया जा सके।

UN का  दोहरा मानदंड

UN इस्लामोफ़ोबिया को कुछ यूँ परिभाषित करता है: “मुसलमानों के प्रति डर, पूर्वाग्रह और नफ़रत, जो उनके और गैर-मुसलमानों दोनों के खिलाफ़ दुश्मनी, असहिष्णुता, उत्पीड़न, गाली-गलौज, उकसावे और डराने-धमकाने के रूप में सामने आती है—फिर चाहे वह ऑनलाइन हो या ऑफ़लाइन। यह संस्थागत, वैचारिक, राजनीतिक और धार्मिक शत्रुता से प्रेरित होती है, जो आगे चलकर संरचनात्मक और सांस्कृतिक नस्लवाद में बदल जाती है और मुस्लिम पहचान के प्रतीकों और चिन्हों को निशाना बनाती है।”[17]

यह परिभाषा इतनी अस्पष्ट और विस्तृत है कि उग्रवादी इंडोctrination पर की गई जायज़ आलोचना भी इस्लामोफ़ोबिया करार दी जा सकती है। इसी तर्क के आधार पर तो सार्वजनिक स्थानों पर हिजाब को नियंत्रित करने के लिए बनाये गये नियम क़ानूनों को या फिर समान नागरिक संहिता लागू करने के फ़ैसले को भी इस्लामोफ़ोबिया की श्रेणी में डाला जा सकता है।

UN ने औपचारिक रूप से इस्लामोफ़ोबिया को मान्यता दी है और 15 मार्च को इससे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस के तौर पर घोषित किया है। लेकिन हिंदू धर्म सहित अन्य ग़ैर-अब्राहमिक धर्मों के ख़िलाफ़ व्याप्त नफ़रत और द्वेष पर UN की चुप्पी उसके साफ़ दोहरे मानदंड उजागर करती है।

UN अक्सर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ होने वाले भेदभाव पर कड़ी प्रतिक्रिया देता है, लेकिन कई इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यक अधिकारों के लगभग पूरी तरह अभाव पर शायद ही कभी कुछ कहता है।

समापन

भारत का राजनीतिक परिदृश्य बेहद जटिल है—कई तरह के स्वार्थ समूहों और वैचारिक दबावों से भरा हुआ। ऐसे माहौल में सरकार के लिए आतंकवाद के समर्थकों और उसके पक्ष में सफ़ाई देने वालों पर सख़्ती से कार्रवाई करना हमेशा सरल नहीं होता।

तुष्टिकरण की राजनीति एक लंबे समय से भारत के राजनीतिक परिदृश्य का हिसा रही है, और कुछ कश्मीरी नेताओं द्वारा आतंकवाद को कमतर बताने या उसका “औचित्य” खोजने की प्रवृत्ति इसी ढर्रे में फिट बैठती है।

लाल क़िला धमाकों के बाद हुए डॉक्टर्स मॉड्यूल के खुलासे, और गुजरात ATS द्वारा बायो-टेरर प्लॉट के पकड़े जाने से यह स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है कि जिहादी नेटवर्क्स किस हद तक समाज की परतों में घुसपैठ कर चुके हैं।

हालात चाहे जितने भी चुनौतीपूर्ण हों, एक बात तो तय है कि भारत को ऐसी ठोस और स्पष्ट राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता है जिसमें केवल आतंकवाद को लेकर ही नहीं, बल्कि आतंकवाद को सही ठहराने, उसे बढ़ावा देने, या उसका बचाव करने वालों के लिए भी शून्य सहनशीलता हो।

सन्दर्भ सूची

[1] Arfa Khanum Sherwani on X;  https://x.com/khanumarfa/status/1988841147574407334

[2] Ghazala Wahab on X;  https://x.com/ghazalawahab/status/1988805209859228051

[3] Ghazala Wahab on X;  https://x.com/ghazalawahab/status/1988886928104562863

[4] Saba Naqvi on X;  https://x.com/_sabanaqvi/status/1988892528435662861

[5] Karnataka Police | Karnataka: Journalist Rana Ayyub booked over ‘Hindu terrorists’ – Telegraph India;   https://www.telegraphindia.com/india/karnataka-journalist-rana-ayyub-booked-over-hindu-terrorists/cid/1854599

[6] Karnataka Police | Karnataka: Journalist Rana Ayyub booked over ‘Hindu terrorists’ – Telegraph India;   https://www.telegraphindia.com/india/karnataka-journalist-rana-ayyub-booked-over-hindu-terrorists/cid/1854599 https://www.telegraphindia.com/india/karnataka-journalist-rana-ayyub-booked-over-hindu-terrorists/cid/1854599

[7] Police complaint against The Wire’s Arfa Khanum Sherwani over Hinduphobic post replacing Shivling with a dustbin; https://www.opindia.com/2024/08/police-complaint-lodged-against-arfa-khanum-sherwani-over-hinduphobic-post-replacing-shivling-with-a-dustbin/

[8] Explained: Who Did What In White Collar Terror Module Behind Delhi Blast;   https://www.ndtv.com/india-news/explained-who-did-what-in-white-collar-terror-module-behind-delhi-blast-9663961

[9] Video: Delhi bomber Dr Umar Mohammad, Umar Nabi Talks About Suicide Bombing, Delhi i20  Car Blast, Red Fort Blast; https://www.ndtv.com/india-news/video-delhi-bomber-dr-umar-mohammad-umar-nabi-talks-about-suicide-bombing-delhi-i20-car-blast-red-fort-blast-9654215

[10] Delhi blast: Faridabad police question over 2,000 Kashmiri students, tenants for possible ‘white collar terror’ links | Today News;  https://www.livemint.com/news/india/delhi-blast-faridabad-police-question-over-2-000-kashmiri-students-tenants-for-possible-white-collar-terror-links-11763358853855.html

[11] JKSA alleges ‘collective suspicion’ of Kashmiri students after Delhi blast – The Hindu;  https://www.thehindu.com/news/cities/Delhi/jksa-alleges-collective-suspicion-of-kashmiri-students-after-delhi-blast/article70290099.ece

[12] All Kashmiris being looked at with suspicion after Delhi Red Fort blast, Omar says;    https://indianexpress.com/article/india/all-kashmiris-looked-suspicion-delhi-red-fort-blast-omar-abdullah-10374895/

[13] Troubles Of Kashmir Echoed At Red Fort’: Mehbooba Mufti’s Shocker On Delhi Car Blast, BJP Reacts | India News – News18; https://www.news18.com/india/mehbooba-mufti-delhi-red-fort-car-blast-remark-troubles-of-kashir-echoed-in-delhi-9712386.html

[14] Red Fort Blast’s Media Spectacle, Security Discourse, And Politics Of Fear;  https://www.youthkiawaaz.com/2025/11/trials-tribulation/

[15] When a comment calls for cleansing; https://maktoobmedia.com/opinion/when-a-comment-calls-for-cleansing/

[16] Islamophobia | Meaning, History & Portrayal of Muslims | Britannica; https://www.britannica.com/topic/Islamophobia

[17] International Day to Combat Islamophobia | United Nations;  https://www.un.org/en/observances/anti-islamophobia-day

 

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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