सिंधु जल संधि: नेहरू टीम ने कैसे भारत के हितों को पानी में बहा दिया
- 1960 की विश्व बैंक-प्रायोजित संधि में नेहरू ने भारत की ज़रूरतों के बावजूद सिंधु घाटी का 82% पानी पाकिस्तान को दे दिया।
- कश्मीर युद्ध के बीच भी नेहरू ने पाकिस्तान को पानी देना जारी रखा, जबकि यही दबाव उसे पीछे हटने पर मजबूर कर सकता था।
- नेहरू ने संधि को कश्मीर से अलग कर तीसरे पक्ष की दखल को मंज़ूरी दी, जिससे पाकिस्तान को राजनयिक बढ़त मिली।
- इस संधि से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में जल संकट है, जबकि करोड़ों एकड़-फुट पानी पाकिस्तान में व्यर्थ बहता है।
- पाकिस्तान की बढ़ती आतंकवाद नीति के बीच भारत अब इस संधि को खत्म करने के लिए कानूनी और रणनीतिक रूप से सक्षम है।
“अगर पाकिस्तान को हिंदुओं के पानी पर निर्भर रहना पड़े, तो मुझे ऐसा पाकिस्तान नहीं चाहिए — इस से रेगिस्तान बेहतर होगा “- मुहम्मद अली जिन्ना, पाकिस्तान के संस्थापक[1]
भारत में विश्व की कुल आबादी का लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा निवास करता है, लेकिन इसके पास केवल 4 प्रतिशत जल संसाधन हैं। इसी असंतुलन के कारण भारत के कई क्षेत्रों में जल संकट देखने को मिलता है।[2] जनसंख्या वृद्धि, आय में बढ़ोत्तरी, तेज़ी से होता शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के चलते पानी की खपत और माँग लगातार बढ़ रही है। ताज़ा जल की कमी अब भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति और संघर्ष का प्रमुख कारण बनती जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में सिंधु जल संधि एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। 23 अप्रैल 2025 को भारत ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए घोषणा की कि यह संधि अब स्थगित की जा रही है।[3] यह निर्णय पहलगाम में हुए एक भीषण आतंकवादी हमले के कुछ ही दिनों बाद लिया गया, जिसमें 26 निर्दोष नागरिकों की जान गई थी।[4]
1960 में भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तानी तानाशाह अयूब खान द्वारा हस्ताक्षरित, तथा विश्व बैंक की मध्यस्थता से बनी सिंधु जल संधि को इतिहास का सबसे पक्षपातपूर्ण द्विपक्षीय समझौता माना जा सकता है। इस संधि के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी प्रणाली का बँटवारा किया गया, जिसमें पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों (सिंधु, चिनाब और झेलम) का पूर्ण नियंत्रण दिया गया, जबकि भारत को केवल पूर्वी नदियाँ (सतलुज, ब्यास और रावी) मिलीं।
भारत की आबादी पाकिस्तान से दस गुना अधिक है और इसकी सिंचाई आवश्यकताएँ भी कहीं अधिक हैं, फिर भी भारत ने सिंधु नदी घाटी के 80 प्रतिशत से अधिक जल पर पाकिस्तान के अधिकार को मान्यता दे दी।[5] इतना ही नहीं, भारत ने पाकिस्तान की नहरों और सिंचाई प्रणाली को पश्चिमी नदियों से जोड़ने हेतु जल मोड़ने का खर्च भी स्वयं उठाया, ताकि वे भारत की पूर्वी नदियों पर निर्भर न रहें।[6] सिंधु जल संधि विश्व की एकमात्र ऐसी संधि है जो ऊपरी हिस्से वाले देश को नीचे स्थित देश के हितों को प्राथमिकता देने के लिए बाध्य करती है।[7]
कुपात्र पर उदारता की महा भूल
यह संधि एक अत्यंत उदार कदम था — और वह भी उस देश के लिए जिसने 1948 में भारत पर आक्रमण किया और जम्मू-कश्मीर राज्य के दो-तिहाई हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया। फिर भी, जैसा कि जिन्ना के कट्टरपंथी और नकारात्मक शब्दों से स्पष्ट है, पाकिस्तान संतुष्ट नहीं था। उस कि मांग 90 प्रतिशत की थी। पाकिस्तान का यह अधिकार जताने वाला रवैया भारत की ग़लत उदारता के बिल्कुल विपरीत था। यदि सिंधु नदी घाटी के जल का बँटवारा जनसंख्या, जल निकासी क्षेत्र (ड्रेनेज एरिया) और कृषि योग्य भूमि के आधार पर होता, तो भारत को कम से कम 42.8 प्रतिशत जल मिलना चाहिए था।[8]
भारत द्वारा ऐसी संधि स्वीकार करना एक गंभीर भूल थी, विशेष रूप से जब यह तथ्य सामने हो कि पश्चिमी नदियों का वार्षिक जल प्रवाह पूर्वी नदियों की तुलना में कहीं अधिक है। इसका मुख्य कारण यह है कि पश्चिमी नदियाँ — विशेषकर सिंधु और झेलम — ऐसे क्षेत्रों से निकलती हैं जहाँ बड़े पैमाने पर हिमनद (ग्लेशियर) हैं, जिससे उनमें साल भर स्थायी जल प्रवाह बना रहता है।[9] इसके विपरीत, पूर्वी नदियाँ मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर निर्भर हैं और उनमें मौसमी उतार-चढ़ाव अधिक होता है। पूर्वी नदियों में ब्यास एक छोटी नदी है जो सतलुज की सहायक नदी के रूप में कार्य करती है, जबकि रावी की धारा भारत में बहुत ही सीमित है।
इस असंतुलन को लेकर लंबे समय से इस संधि की न्यायसंगतता पर बहस होती रही है, खासकर इसके आर्थिक और रणनीतिक प्रभावों को देखते हुए, जो भारत के उत्तरी राज्यों पर पड़ते हैं। पाकिस्तान को न केवल अत्यधिक जल प्राप्त होता है — जबकि उसकी वास्तविक आवश्यकता कहीं कम है — बल्कि यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि हर साल लगभग 4 करोड़ एकड़-फुट पानी अरब सागर में व्यर्थ बह जाता है।[10] यदि भारत को इन जल संसाधनों की उपलब्धि हो जाती तो हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में जल संकट को आंशिक रूप से कम किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त, इस संधि से सबसे अधिक प्रभावित राज्य जम्मू और कश्मीर है।
विडंबना यह है कि विश्व बैंक द्वारा नियुक्त मध्यस्थ ने भारत की मज़बूत स्थिति को ठीक से समझा, जिसे नेहरू कभी समझ नहीं पाए। अमेरिका की टेनेसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लीलिएंथल ने कहा, “जितनी तबाही बम और गोलों से कोई सेना नहीं कर सकती, उतनी तबाही पाकिस्तान में सिर्फ इस एक कदम से हो सकती है — अगर भारत वह पानी हमेशा के लिए रोक दे जिससे पाकिस्तान के खेत और लोग ज़िंदा रहते हैं।”[11]
नेहरू: गंभीर भूलों का एक अक्षय स्रोत
‘वॉटर बम’ भारत के पास पाकिस्तान के खिलाफ सबसे प्रभावशाली रणनीतिक हथियार है। ऊपरी हिस्से में स्थित देश होने के नाते, भारत के पास उन सात नदियों के प्रवाह को नियंत्रित करने की शक्ति है जो सिंधु नदी घाटी में जाती हैं। लेकिन नेहरू ने इस स्थिति का कोई उपयोग नहीं किया और पाकिस्तान को कश्मीर का बड़ा हिस्सा हड़पने का मौका दे दिया।
नेहरू ने अपने जीवन में इतनी अधिक गलतियाँ कीं कि उन्हें गिनने के लिए एक पूरी विश्वकोश की आवश्यकता होगी।[12] और दुखद बात यह है कि ये गलतियाँ उनकी मृत्यु के छह दशक बाद भी हिंदुओं और भारत को नुकसान पहुँचा रही हैं। सिंधु जल संधि उनकी सबसे बड़ी भूलों में से एक थी।
1 अप्रैल 1948 को, जब भारत और पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर पर युद्ध में उलझे हुए थे, भारतीय पंजाब के इंजीनियरों ने फिरोज़पुर हेडवर्क्स से देपालपुर नहर और लाहौर की ओर जाने वाली जल आपूर्ति को बंद कर दिया। उस समय खरीफ की बुआई का मौसम था और इस कदम से पाकिस्तान के लगभग 8 प्रतिशत कृषि योग्य क्षेत्र पर असर पड़ा। लाहौर शहर की नगरपालिका जल आपूर्ति भी बाधित हुई और मंडी हाइड्रोइलेक्ट्रिक योजना से बिजली की आपूर्ति रुक गई। पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े शहर में पानी की राशनिंग लागू करनी पड़ी।[13]
1940 के दशक से 1960 के दशक तक पाकिस्तान भारत की जल आपूर्ति रोकने की क्षमता के सामने बेहद असुरक्षित था, क्योंकि बँटवारे के बाद मुख्य सिंचाई नहरों के हेडवर्क्स भारत के पास थे। भारत के पास पूरा नियंत्रण था और वह जब चाहे तब पानी रोक सकता था, खासकर उस समय जब पाकिस्तान ने 1947–48 का युद्ध शुरू कर जम्मू-कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा कब्ज़े में ले लिया — जो आज भी उसके पास है।
लेकिन भारत ने वह कड़ा कदम नहीं उठाया। जब भारत के पास पाकिस्तान को पानी के लिए तरसाने का पूरा मौका था, जब भारतीय सैनिक युद्ध के मैदान में भारत की ज़मीन को मुक्त कराने के लिए लड़ रहे थे, और जब थोड़ा और दबाव पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर कर सकता था — तब नेहरू ने पाकिस्तान पर भारत की पकड़ ढीली कर दी। पानी छोड़ दिया गया और पाकिस्तान बिना एक इंच ज़मीन लौटाए बच निकला। चाहे इसे सांस्कृतिक झिझक कहें या रणनीतिक दृष्टिहीनता, लेकिन भारत की सुरक्षा नीति और राष्ट्रीय रणनीति के बीच की यह असंगति देश को बार-बार भारी नुकसान उठाने के लिए मजबूर करती रही है।
नेहरू के नेतृत्व में ही भारत ने सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए और कुल जल का 82 प्रतिशत पाकिस्तान को सौंप दिया। भारत के मुख्य वार्ताकार नीरंजन डी. गुलहाटी ने भारत की उलझन भरी सोच को स्पष्ट करते हुए कहा: “हमें दूसरी तरफ के हितों का भी ध्यान रखना था: उन्हें भी जीने का हक़ है, हमें भी। उन्हें भी पानी चाहिए, हमें भी।”[14]
नेहरू ने इन बातों का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “नहरों के पानी का विवाद कश्मीर मुद्दे से कोई संबंध नहीं रखता। हम कश्मीर के पानी को पाकिस्तान में जाने से नहीं रोक सकते; यह एक इंजीनियरिंग का मामला है और उसे वैसे ही सुलझाया जाना चाहिए।”[15]
नेहरू: भारत के प्रधान मंत्री ने पक्ष लिया पाकिस्तान का
अपनी किताब Indus Waters Treaty: An Exercise in International Media में नीरंजन डी. गुलहाटी लिखते हैं कि जब पानी की आपूर्ति रोकी गई, तो नेहरू की प्रतिक्रिया आलोचनात्मक थी। उन्होंने उल्लेख किया: “औपचारिक रूप से, प्रांतीय सरकार ने केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना यह कदम उठाया था, और केंद्र सरकार के कुछ वर्गों से उन्हें विशेष सहानुभूति नहीं मिली। माना जाता है कि नेहरू ने सितंबर 1949 में ईस्ट पंजाब सरकार और वहाँ के इंजीनियरों को इस बात के लिए फटकार लगाई थी कि उन्होंने यह निर्णय स्वेच्छा से क्यों लिया।”[16]
हालाँकि, भारतीय पंजाब के इंजीनियरों द्वारा पानी रोकने का एक ठोस और तार्किक कारण था। जब ब्रिटिश शासन ने भारत को छोड़ा और भारतीय नौसेना विद्रोह की पृष्ठभूमि में सीमाएँ खींची गईं, तब जल संसाधनों के बँटवारे पर कोई ठोस समझौता नहीं हुआ था। इस अंतराल को भरने हेतु भारत और पाकिस्तान ने 20 दिसंबर 1947 को एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य 31 मार्च 1948 तक यथास्थिति बनाए रखना था।
इंजीनियरों का तर्क था कि किसी औपचारिक समझौते के अभाव में यदि ईस्ट पंजाब ने अस्थायी रूप से पानी की आपूर्ति नहीं रोकी होती, तो वेस्ट पंजाब उस जल पर भविष्य में कानूनी अधिकार का दावा कर सकता था। इस दृष्टिकोण से ईस्ट पंजाब की चिंता सही थी कि कोई भी ऐसा उदाहरण दीर्घकालिक रूप से उसके हितों के विरुद्ध सिद्ध हो सकता है।
दिल्ली समझौता: पाकिस्तान ने पैंतरा बदला
जब लाहौर पानी के लिए तड़प रहा था, तब पाकिस्तान ने मई 1948 में दिल्ली समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत जल आपूर्ति बहाल की गई — लेकिन कुछ शर्तों के साथ। पहली शर्त यह थी कि पाकिस्तान को भारत से होकर बहने वाले पानी के परिवहन का खर्च उठाना होगा। दूसरी, भारत को धीरे-धीरे इस जल आपूर्ति को घटाने की अनुमति दी गई। भारत का तर्क था कि ब्रिटिश शासन ने पश्चिम पंजाब में तो सिंचाई प्रणाली का विकास किया, लेकिन पूर्वी पंजाब की पूरी तरह अनदेखी की गई। आज़ादी के बाद यह असंतुलन जारी नहीं रह सकता था, इसलिए पूर्वी पंजाब को भी उस पानी से हिस्सा मिलना चाहिए जो अब तक पश्चिम पंजाब को जा रहा था।
दिल्ली समझौते की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि पाकिस्तान ने फिरोज़पुर हेडवर्क्स को दरकिनार करने के लिए सतलुज नदी से एक वैकल्पिक नहर खोदनी शुरू कर दी। उसने इस कदम को यह कहकर उचित ठहराया कि भविष्य में भारत द्वारा जल आपूर्ति रोके जाने की आशंका के चलते यह एक एहतियाती उपाय है। भारत ने चेतावनी दी कि यदि पाकिस्तान ऐसा करेगा, तो वह जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान की नहर से भी ऊपर, नदी के ऊपरी हिस्से में एक और नहर खुदाई करेगा।[17]
बाद में पाकिस्तान ने दावा किया कि दिल्ली समझौता उसने दबाव में किया था, और 23 अगस्त 1950 को भारत सरकार को एक नोट भेजकर इस समझौते की समाप्ति की सूचना दे दी। जब दोनों देश अपने-अपने जल मोड़ने की योजनाओं में उलझ गए — जो परस्पर विरोधी थीं — तब नेहरू ने लियाकत अली खान को एक पत्र लिखकर यह प्रस्ताव दिया कि दोनों देश संयुक्त रूप से यह घोषणा करें कि वे किसी भी आपसी विवाद को लेकर युद्ध नहीं करेंगे।
यह नेहरू की वही पुरानी कार्यशैली थी जिसे उन्होंने बार-बार दोहराया, और जिसके चलते भारत के हितों को लगातार नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत और पाकिस्तान अपने मतभेदों को शांतिपूर्ण तरीकों से सुलझाएँ, जिसमें मध्यस्थता के रूप में किसी तीसरे पक्ष की दखलंदाज़ी, विशेष रूप से गठित एजेंसियाँ, या दोनों देशों द्वारा मान्यता प्राप्त कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था शामिल हो। यह पाकिस्तान के लिए मानो स्वर्ग से टपकी मुफ्त की सौगात थी, जिसे उन्होंने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया।
विश्व बैंक की भूमिका
अकस्मात विश्व बैंक, जो नाम से ‘वर्ल्ड’ है पर असल में अमेरिका की ही एक संस्था है, इस विवाद में शामिल हुआ। पाकिस्तान ने राहत की साँस ली, लेकिन भारत को विश्व बैंक की भूमिका पर संदेह था, विशेषकर इसलिए क्योंकि 1950 के दशक में अमेरिका और पाकिस्तान के बीच कई रक्षा समझौते हो चुके थे। और उनकी आशंकाएँ सही साबित हुईं।
विश्व बैंक ने संकेत दिया कि भाखड़ा-नांगल परियोजना के लिए वित्तीय सहायता — जो भारत की आगामी हरित क्रांति की नींव बनने जा रही थी — तभी दी जाएगी जब भारत-पाक जल विवाद का समाधान हो जाएगा। बैंक के प्रतिनिधियों ने यह भी स्पष्ट किया कि विश्व बैंक के बॉन्ड निवेशक ऐसे देश में निवेश करने में रुचि नहीं दिखाएँगे जो युद्ध की स्थिति में हो।
यह दबाव प्रभावी साबित हुआ। भारत ने विश्व बैंक की मध्यस्थता स्वीकार कर ली और एक ऊपरी हिस्से वाले देश के रूप में जो भी रणनीतिक लाभ उसे प्राप्त था, वह त्याग दिया। आश्चर्य की बात यह रही कि नेहरू ने सिंधु नदी विवाद को कश्मीर मुद्दे से जोड़ने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। विश्व बैंक को भेजे अपने पत्र में प्रधानमंत्री ने लिखा: “भारत और पाकिस्तान के बीच नहरों के जल का विवाद कश्मीर से संबंधित नहीं है; यह विवाद ईस्ट और वेस्ट पंजाब की सिंचाई प्रणालियों से जुड़ा है और वहीं तक सीमित है।”[18]
पाकिस्तान को अपनी किस्मत पर यकीन नहीं हो रहा था। लियाक़त अली ख़ान ने भी सहमति जताते हुए कहा कि दोनों देशों को किसी एक विवाद की बातचीत को दूसरे मुद्दे को रोकने के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।[19] यह कितना सुविधाजनक तर्क था!
मूर्खतापूर्ण उदारता
नेहरू की नरमी को भाँपते हुए, विश्व बैंक की योजना ने पाकिस्तान को 82 प्रतिशत और भारत को केवल 18 प्रतिशत जल देने का प्रस्ताव रखा। नेहरू ने इस योजना को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
नेहरू द्वारा नियुक्त किए गए वार्ताकारों का मानना था कि पूरे सिंधु घाटी क्षेत्र में इतना पानी उपलब्ध है कि भारत की आवश्यकताएँ पूरी की जा सकती हैं। नेहरू ने भी इस विचार का समर्थन करते हुए कहा: “हम पूरी तरह आश्वस्त हैं कि सिंधु घाटी में इतना पानी अवश्य है कि यदि उसका उचित ढंग से उपयोग किया जाए तो भारत और पाकिस्तान — दोनों की ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं।”[20]
चीन से शांति की आशा में दी पानी की कुर्बानी
एक और महत्वपूर्ण कारण था जिसकी वजह से नेहरू ने सिंधु नदी घाटी का अधिकांश हिस्सा इतनी जल्दी पाकिस्तान को सौंप दिया। 1950 के दशक की शुरुआत में, चीन ने पहले तिब्बत और फिर भारत की सीमाओं में घुसपैठ शुरू कर दी थी। लगभग दो दशकों तक नेहरू ने चीन के ख़तरे और सरदार पटेल की चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया, यहाँ तक कि उन वफादार सैन्य अधिकारियों को भी दरकिनार कर दिया या डांटा जिन्होंने नेहरू की चीन समर्थक नीति की भूल को उजागर किया था। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता भी यह कहते हुए अस्वीकार कर दी कि वह सीट चीन की है। जब चीनी सैनिक हिमालयी सीमा पर उकसावे भरी घुसपैठ करने लगे, तब नेहरू को एहसास हुआ कि अब उन्हें सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, चीन की ओर से भी ख़तरे का सामना करना पड़ेगा। उन्हें लगा कि शायद पानी देकर पाकिस्तान के साथ शांति “खरीदी” जा सकती है।
पाकिस्तान की मानसिकता
यह संधि पाकिस्तान की मानसिकता को समझने का एक माध्यम भी है। पाकिस्तान के लिए भारत से जुड़ा हर मसला बँटवारे का अधूरा एजेंडा है, जो मूलतः कट्टरपंथी भारतीय मुसलमानों का वह सपना है — जिसमें भारत में जिहाद छेड़कर या तो हिंदुओं का सफाया किया जाए या उन्हें धर्मांतरित किया जाए। यह उपमहाद्वीप के उन मुसलमानों का सपना है जो ‘मुग़ल भारत’ की पुनर्स्थापना करना चाहते हैं।
इस्लामाबाद की लगातार की जाने वाली शिकायतें इसी मानसिकता का हिस्सा हैं। पाकिस्तान के दृष्टिकोण से, जब उसकी सिंचित भूमि 90 प्रतिशत है, तो उसे “सिर्फ” 82 प्रतिशत पानी मिलना “स्पष्ट नुकसान” के सिद्धांत का उल्लंघन था — ऐसा कहना है पाकिस्तान नौसेना के पूर्व अधिकारी मोइन अंसारी का, अपनी पुस्तक India’s Aqua Bomb में।[21]
अब पानी बनेगा रणनीति
दशकों से भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) को पूरी निष्ठा और भावना के साथ निभाया है, जबकि पाकिस्तान ने इसका बार-बार उपयोग भारत के विकास में अड़चन डालने के लिए ही किया है। पाकिस्तान ने प्रमुख बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को रोकने से लेकर भारत को महंगे और समय बर्बाद करने वाले अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता विवादों में घसीटने तक इस संधि को एक राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया है, ताकि भारत की विकास योजनाओं को बाधित किया जा सके।
भारत के अधिकार क्षेत्र में आने वाली कई जलविद्युत परियोजनाएँ पाकिस्तान की आपत्तियों के कारण वर्षों तक रुकी रहीं। इसी दौरान, अनुमानित 20 से 30 लाख एकड़-फुट पानी बिना किसी रोक-टोक के पाकिस्तान में बहता रहा, केवल इसलिए क्योंकि भारत को अपने हिस्से का जल उपयोग करने हेतु आवश्यक बुनियादी ढाँचा विकसित करने की अनुमति नहीं दी गई।
पंजाब के एक वरिष्ठ अधिकारी राहुल भंडारी के अनुसार, भारत के पास इस संधि पर पुनर्विचार करने या इसे समाप्त करने के लिए ठोस कानूनी आधार हैं। वियना संधि कानून की धारा 62 के तहत, यदि परिस्थितियों में मूलभूत परिवर्तन होता है, तो किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते को समाप्त किया जा सकता है। पाकिस्तान द्वारा लगातार सीमा पार आतंकवाद फैलाने और उसकी शत्रुतापूर्ण कूटनीति को देखते हुए भारत यह तर्क दे सकता है कि इस संधि का मूल आधार — शांतिपूर्ण सहयोग — अब बहुत पहले ही समाप्त हो चुका है।[22]
इस बात के बावजूद कि नेहरू ने पाकिस्तान की हर संभव तरीके से मदद की और पश्चिमी ताकतों से सराहना पाने की भरपूर कोशिश की, उन्होंने अंततः एक ऐसा रुख अपनाया जिसमें न तो भारत और न ही पाकिस्तान को कोई अधिकार छोड़ने की बात कही गई — और इस निर्णय को भविष्य के लिए टाल दिया गया।[23]
अब समय आ गया है कि भारत अपने जल अधिकारों को फिर से दृढ़ता से लागू करे — पाकिस्तान को पानी पूरी तरह बंद किए बिना, बल्कि जो पानी भारत को वैध रूप से मिला है, उसका पूरा और प्रभावी उपयोग करके। वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप एक नई या पुनर्गठित जल-वितरण व्यवस्था भारत के हितों और क्षेत्रीय स्थिरता — दोनों के लिए अधिक अनुकूल हो सकती है।
पश्चिमी मीडिया और शिक्षाविद — और भारत में मौजूद उनके ‘ब्राउन सिपाही’ — निश्चित रूप से “वह संधि जो चार युद्धों के बावजूद भी बनी रही” की दुहाई देते रहेंगे। वे यह चेतावनी देंगे कि पाकिस्तान दुनिया का छठा सबसे अधिक आबादी वाला देश है, जिसके पास परमाणु हथियार और एक बड़ी स्थायी सेना है, और इसलिए ऐसे देश को अस्थिर करना खतरनाक हो सकता है। जैसा कि एनाटोल लीवेन ने अपनी पुस्तक Pakistan – A Hard Country में लिखा है: “वे भारतीय जो पाकिस्तान के पतन पर खुश होना चाहें, उन्हें यह समझना चाहिए कि शायद भारत भी उस पतन में साथ घसीटा जाएगा।”[24]
लेकिन अब ये चेतावनियाँ हास्यास्पद लगती हैं — क्योंकि पाकिस्तान आज आतंकवाद का ‘आईवी लीग यूनिवर्सिटी’ बन चुका है।
समापन
अगर भारत इस संधि से बाहर निकलता है, तो पाकिस्तान के लिए स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है। सिंधु नदी घाटी में पानी की प्रचुरता के बावजूद, पाकिस्तान एक अर्ध-शुष्क देश है, जहाँ सूखे की मार कई क्षेत्रों को झेलनी पड़ रही है। वहाँ का भूजल स्तर लगातार और तेज़ी से गिर रहा है। पाकिस्तानी पंजाब — जहाँ दुनिया की सबसे अधिक नहर घनत्व है — जलभराव की विकराल समस्या से जूझ रहा है। उसके विशाल जलाशय — जो भारत से पूर्वी नदियों के नुकसान की भरपाई के लिए बनाए गए थे — अब तेजी से सिल्ट (मिट्टी) से भरते जा रहे हैं।
भारत, जिसने कभी जम्मू-कश्मीर में बाँध और जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण पूरी तरह नहीं रोका, अब इस स्थिति में है कि वह जल प्रवाह को अपने सूखाग्रस्त क्षेत्रों की ओर मोड़ सके — और यह सब संधि की भावना और प्रावधानों के दायरे में रहकर किया जा सकता है।
‘एक्वा बम’ का प्रभाव कई परमाणु विस्फोटों से भी अधिक हो सकता है। भारत को इस रणनीतिक हथियार का विवेकपूर्ण और निर्णायक उपयोग करना चाहिए ताकि पाकिस्तान को मजबूर किया जा सके कि वह अपने आतंकवाद के उद्योग को बंद करे। अगर पाकिस्तान ऐसा नहीं करता, तो फिर उसके लिए कोई अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति नहीं बचती।
संदर्भसूची
[1] India’s Approach To Indus Water Treaty: National Security Perspective (Centre for Joint Warfare Studies, 2024); https://cenjows.in/indias-approach-to-indus-water-treaty-national-security-perspective/
[2] India has 16% of the Global Population but Only 4% of Total Water Resources, Resulting in Water Scarcity in Many Regions (Climate Scorecard, 2023); https://www.climatescorecard.org/2023/09/india-has-16-of-the-global-population-but-only-4-of-total-water-resources-resulting-in-water-scarcity-in-many-regions/
[3] India has 16% of the Global Population but Only 4% of Total Water Resources, Resulting in Water Scarcity in Many Regions (Hindustan Times, 2025); https://www.hindustantimes.com/cities/bengaluru-news/bengaluru-bjp-mp-claims-indus-water-treaty-halt-is-drying-up-pakistans-chenab-river-shares-images-101746004586066.html
[4] From Paris to Pahalgam: Why the World Must Unite to Defeat Radical Islam (StopHinduDvesha, 2025); https://stophindudvesha.org/from-paris-to-pahalgam-why-the-world-must-unite-to-defeat-radical-islam/
[5] Indus Water Treaty: An Appraisal (Vivekananda International Foundation, 2018); https://www.vifindia.org/sites/default/files/indus-water-treaty-an-appraisal.pdf
[6] Indus Waters Treaty 1960 : Present Status of Development in India (Ministry of Water Resources, River Development and Ganga Rejuvenation, 2019); https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1565906
[7] India and Pakistan (The Atlantic, 1960); https://www.theatlantic.com/magazine/archive/1960/11/india-and-pakistan/306376/
[8] Indus Waters Treaty is unfair on India, scrapping it can’t be ruled out (Rishihood University, 2024); https://rishihood.edu.in/indus-waters-treaty-is-unfair-on-india-scrapping-it-cant-be-ruled-out/
[9] Guest column | Indus water treaty inherently unfair on India (Hindustan Times, 2025); https://www.hindustantimes.com/cities/chandigarh-news/guest-column-indus-water-treaty-inherently-unfair-on-india-101745522097587.html
[10] Glacial melt in Indus raises water concerns (Hindustan Times, 2023); https://www.hindustantimes.com/india-news/glacial-melt-in-indus-raises-water-concerns-101678094974028.html
[11] Indus Waters Treaty is unfair on India, scrapping it can’t be ruled out (Rishihood University, 2024); https://rishihood.edu.in/indus-waters-treaty-is-unfair-on-india-scrapping-it-cant-be-ruled-out/
[12] Puranik, Rajnikant ; Nehru’s 97 Major Blunders, First Kindle Digital Edition: July, 2016; https://nestambuy.com/wp-content/uploads/2020/06/BOOKs-nehrus-major-97-blunders.pdf
[13] India’s Approach To Indus Water Treaty: National Security Perspective (Centre for Joint Warfare Studies, 2024); https://cenjows.in/indias-approach-to-indus-water-treaty-national-security-perspective/
[14] Azhar Ahmad, Indus Waters Treaty A Dispassionate Analysis (JSTOR, 2011); https://www.jstor.org/stable/42909289?seq=3
[15] India and Pakistan (The Atlantic, 1960); https://www.theatlantic.com/magazine/archive/1960/11/india-and-pakistan/306376/
[16] Undala Z. Alain, WATER RATIONALITY: Mediating the Indus Waters Treat, University of Durham Doctoral thesis, 1998; http://etheses.dur.ac.uk/1053/1/1053.pdf
[17] India’s Approach To Indus Water Treaty: National Security Perspective (Centre for Joint Warfare Studies, 2024); https://cenjows.in/indias-approach-to-indus-water-treaty-national-security-perspective/
[18] Ibid
[19] Muhammad Imran Mehsud, Retrospecting the Indus Mediation through Waltz’s levels of analysis, Official Journal of World Water Council, V 24, 2022; https://iwaponline.com/wp/article/24/9/1450/90165/Retrospecting-the-Indus-Mediation-through-Waltz-s
[20] Undala Z. Alain, WATER RATIONALITY: Mediating the Indus Waters Treat, University of Durham Doctoral thesis, 1998; http://etheses.dur.ac.uk/1053/1/1053.pdf
[21] Azhar Ahmad, Indus Waters Treaty A Dispassionate Analysis (JSTOR, 2011); https://www.jstor.org/stable/42909289?seq=3
[22] Guest column | Indus water treaty inherently unfair on India (Hindustan Times, 2025); https://www.hindustantimes.com/cities/chandigarh-news/guest-column-indus-water-treaty-inherently-unfair-on-india-101745522097587.html
[23] Undala Z. Alain, WATER RATIONALITY: Mediating the Indus Waters Treat, University of Durham Doctoral thesis, 1998; http://etheses.dur.ac.uk/1053/1/1053.pdf
[24] Kashmir: A Water War in the Making? (The Diplomat, 2016); https://thediplomat.com/2016/06/kashmir-a-water-war-in-the-making/
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