IITs पर वैचारिक संकट: वोकिज़्म की घुसपैठ को कैसे रोकें
- पहले केवल विज्ञान और तकनीक पर केंद्रित IIT अब मानविकी और सामाजिक विज्ञान भी पढ़ा रहे हैं। इससे बहस शुरू हो गई है कि यह सुधार है या वामपंथी विचारधारा थोपने का साधन।
- IIT बॉम्बे और IIT गांधीनगर की हाल की घटनाएँ बताती हैं कि किस तरह प्रशिक्षण शिविर, प्रदर्शन और कुछ अध्यापक मार्क्सवाद, इस्लामवाद और भारत-विरोधी सोच को बढ़ावा दे रहे हैं तथा असहमति को दबा रहे हैं।
- आलोचकों का कहना है कि इस राजनीतिकरण से असहिष्णुता, हिंदू-विरोध और कैंपस में ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। इससे शोध और सहयोग प्रभावित होता है, छात्रों का मनोबल गिरता है और संस्थान की संस्कृति कमजोर होती है।
- यदि IITs को वैचारिक युद्धभूमि समझा जाने लगा तो उनकी वैश्विक प्रतिष्ठा, शैक्षणिक कठोरता और सार्वजनिक विश्वास—सभी पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
- सुझाव दिए जा रहे हैं कि मानविकी विषय वैकल्पिक बनाए जाएँ, भारतीय ज्ञान परंपराएँ शामिल की जाएँ, शिक्षकों में विचारधारात्मक विविधता लाई जाए, संस्थानों को तटस्थ रखा जाए और यदि यह सब संभव न हो तो मानविकी को हटाकर IITs की मूल पहचान—विज्ञान और तकनीक—को सुरक्षित रखा जाए।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और बदलती दिशा
पिछले कई दशकों से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) भारत में STEM—यानी विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित—की पढ़ाई के मजबूत स्तंभ रहे हैं। इन संस्थानों ने ऐसे इंजीनियर, प्रोग्रामर और शोधकर्ता तैयार किए हैं जिन्होंने न केवल भारत की प्रगति में, बल्कि सिलिकॉन वैली जैसी जगहों पर भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इनकी प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन मानी जाती है, इनके पूर्व छात्र विश्व-स्तरीय माने जाते हैं और इनके कैंपस प्रतिभा को निखारने के लिए बनाए गए हैं। लंबे समय तक इनका उद्देश्य बिल्कुल साफ था—बेहतरीन इंजीनियर और वैज्ञानिक तैयार करना।
लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। नई पढ़ाई में थर्मोडायनामिक्स और कैलकुलस के साथ-साथ “पोस्ट-कोलोनियल रेसिस्टेंस एंड सबऑल्टर्न एजेंसी” या “क्रिटिकल पर्सपेक्टिव्स ऑन कैपिटलिज़्म” जैसे कोर्स भी शामिल हो रहे हैं। यानी अब IIT में शुद्ध वैज्ञानिक शिक्षा और विचारधारा की राजनीति आमने-सामने खड़ी दिखाई देती है।[1] कुछ लोग इसे प्रगति मानते हैं, जबकि कुछ इसे वामपंथी सोच थोपने का तरीका बताते हैं।
बड़ा सवाल है—क्या इन मानविकी विषयों की वजह से IITs वैचारिक संघर्ष का मैदान बन जाएँगे? क्या छात्र “वोक” एजेंडे में फँसकर स्वतंत्र सोचने की क्षमता खो देंगे? और क्या ये संस्थान अपनी वैज्ञानिक श्रेष्ठता और वैश्विक साख बना रख पाएँगे?
राजनीति कैंपस में कैसे आई?
दुनिया के बड़े विश्वविद्यालयों में STEM के साथ मानविकी और सामाजिक विज्ञान पढ़ाना आम बात है। वहाँ Ethics in AI, Philosophy of Science और Sociology of Technology जैसे विषय ज़रूरी समझे जाते हैं। भारत की नई शिक्षा नीति (NEP) भी कहती है कि बहुविषयक शिक्षा से इंसान की बौद्धिक, शारीरिक, भावनात्मक और नैतिक क्षमताएँ विकसित होती हैं और इससे आलोचनात्मक सोच, विश्लेषण, संवाद और लचीलापन बढ़ता है।[2]
लेकिन भारतीय संदर्भ में, खासकर IITs में, यह प्रयोग विकृत रूप ले बैठा। धीरे-धीरे यहाँ वैचारिक पक्षपात बढ़ने लगा, जिसका नेतृत्व वे शिक्षक कर रहे थे जो खुलकर वामपंथी झुकाव रखते हैं। अब कैंपस में पूँजीवाद-विरोधी वर्कशॉप, पीएचडी प्रवेश में “हिंदुत्व” जैसे सवाल और जाति या धार्मिक राजनीति पर व्याख्यान आम हो चुके हैं।[3]
दूसरी ओर, STEM के प्रोफेसर अपने शोध कार्य में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे छात्रों को अलग दृष्टिकोण नहीं दिखा पाते। परिणामस्वरूप, छात्रों के सामने केवल एक ही विचारधारा हावी रहती है और धीरे-धीरे वे उसी को अपनाने लगते हैं। आज यही ‘वोकिज़्म’ कहलाता है।[4]
उदाहरण और विवाद
- उदाहरण A: IIT बॉम्बे का पोस्टर विवाद: IIT बॉम्बे के मानविकी विभाग पर वामपंथी एजेंडा फैलाने के आरोप तब लगे जब ‘साउथ एशियन कैपिटलिज़्म’ नामक कार्यशाला का पोस्टर सामने आया।[5] इस पोस्टर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्टून के साथ ‘We Fool You’ लिखा था, जबकि सुरक्षा बलों की तस्वीरों पर ‘We Shoot You’ अंकित था। ये चित्र सीधे मार्क्सवादी प्रचार सामग्री से उठाए गए थे। विवाद बढ़ने पर संस्थान ने सफाई दी और आयोजन से दूरी बना ली, लेकिन तब तक असर हो चुका था। यह घटना सोशल मीडिया पर तेजी से फैली और यह धारणा बनी कि IIT की मानविकी अब खुलकर राजनीतिक रंग ले रही है।[6]
- उदाहरण B: IIT गांधीनगर और फिलिस्तीन मार्च: IIT गांधीनगर में भी विवाद तब उठा जब मानविकी विभाग पर इस्लामी विचारधारा को बढ़ावा देने का आरोप लगा। 7 अक्टूबर 2023 को इस्लामी आतंकी संगठन हमास द्वारा इज़राइल पर हमले के केवल सात दिन बाद कैंपस में ‘शाम-ए-आज़ादी’ नामक मार्च निकाला गया, जिसमें फिलिस्तीन के समर्थन की बात कही गई।[7] आरोप यह भी लगे कि यहाँ हिंदू छात्रों की आवाज़ को दबाया गया, उनके सवाल उठाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी दी गई और छात्रों पर एकतरफा सोच थोपी गई। विडंबना यह रही कि पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें हिंदुओं की हत्या हुई थी, उस पर चर्चा की अनुमति नहीं दी गई[8], जबकि फिलिस्तीन के समर्थन में कैंडल मार्च आयोजित किया गया।
- उदाहरण C: प्रोफेसर अनुपम गुहा की सक्रियता: IIT मुम्बई के प्रोफेसर अनुपम गुहा का काम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नीति और श्रम से जुड़ा है, लेकिन वे खुले तौर पर राजनीतिक विचारधारा भी व्यक्त करते हैं। वे अक्सर धारा 370, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और अन्य मुद्दों पर वामपंथी या इस्लामी दृष्टिकोण से बयान देते हैं। आरोप है कि वे संस्थान की पहचान और टैक्स से मिलने वाले संसाधनों का इस्तेमाल वैचारिक सक्रियता के लिए कर रहे हैं।[9]
- उदाहरण D: एक पूर्व छात्र का अनुभव: आयुष्मान गोयल (बदला हुआ नाम), जो वर्तमान में दुनिया की एक शीर्ष सेमीकंडक्टर कंपनी में AI वैज्ञानिक हैं, 2018 बैच के IIT स्नातक हैं। उनका कहना है कि CAA विरोध प्रदर्शनों के दौरान वामपंथी छात्र और अध्यापक बाहरी उपद्रवियों को बुलाते थे, जिससे कैंपस संघर्ष का मैदान बन गया। वे यह भी आरोप लगाते हैं कि वामपंथी और मुस्लिम प्रोफेसर केवल मुस्लिम फैकल्टी की भर्ती करते हैं। उनके अनुसार, वामपंथियों का असली लक्ष्य IITs पर पूरा नियंत्रण पाना है ताकि इन्हें JNU, AMU और जादवपुर विश्वविद्यालय जैसे केंद्रों में बदला जा सके, जहाँ खुलेआम भारत-विरोधी गतिविधियाँ होती हैं।
यदि इन आरोपों और दावों में थोड़ी भी सच्चाई है तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। शैक्षणिक स्तर पर राजनीति के हावी होने से शोध और पढ़ाई की वैज्ञानिक उत्कृष्टता टिक नहीं पाएगी। सांस्कृतिक स्तर पर कैंपस में ध्रुवीकरण, असहिष्णुता और विशेषकर हिंदू छात्रों के खिलाफ भेदभाव बढ़ सकता है। वहीं प्रतिष्ठा के स्तर पर IITs की अंतरराष्ट्रीय छवि एक निष्पक्ष विज्ञान संस्थान की बजाय राजनीतिक विवादों के अड्डे के रूप में बनेगी, जिससे उनकी वैश्विक रैंकिंग और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
हिंदू-विरोध और असहिष्णुता
कई आलोचकों का कहना है कि IITs के मानविकी विभागों पर मार्क्सवादी और इस्लामी विचारधारा का असामान्य रूप से अधिक प्रभाव दिखाई देता है। इसका हाल का उदाहरण IIT बॉम्बे की पीएचडी प्रवेश परीक्षा में देखने को मिला, जहाँ छात्रों से पूछा गया:
‘एंटोनियो ग्राम्शी का हेजेमनी का सिद्धांत क्या है? क्या हिंदुत्व हेजेमनी है या काउंटर-हेजेमनी? इस पर चर्चा कीजिए।
ऊपरी तौर पर यह प्रश्न एक सामान्य अकादमिक अभ्यास जैसा लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह बड़ा सवाल उठता है कि आखिर हिंदुत्व को बार-बार मार्क्सवादी नजरिए से ही क्यों समझाया जाता है? क्यों इसे हमेशा सत्ता, वर्चस्व और दबाव की राजनीति के चश्मे से देखा जाता है? और क्यों ऐसे ही प्रश्न चर्च या इस्लामी धार्मिक संस्थाओं पर नहीं पूछे जाते, जबकि स्वयं ग्राम्शी ने चर्च को ‘सबसे बड़ी प्रतिक्रियावादी ताकत’ कहा था? [10]
समस्या यह है कि जब अकादमिक विमर्श केवल एक ही विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमता है तो छात्रों के लिए स्वतंत्र और संतुलित सोच विकसित करना मुश्किल हो जाता है। सच्ची आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking) तभी विकसित होती है जब छात्रों को विविध विचारधाराओं से परिचित कराया जाए, उन्हें मान्यताओं पर सवाल उठाने का अवसर दिया जाए और असहमतियों को सम्मानपूर्वक व्यक्त करने की अनुमति हो। लेकिन जब किसी विभाग में केवल एक ही दृष्टिकोण हावी हो जाता है, तो नतीजा होता है—इको-चैम्बर का बनना, असहमति की आवाज़ का दबना और छात्रों में आत्म-सेंसरशिप। चूँकि वामपंथ विभिन्न विचारों के प्रति बेहद असहिष्णु है और मार्क्सवाद वस्तुतः फासीवाद का ही एक रूप है[11], इसलिए असली नुकसान हिंदू छात्रों को झेलना पड़ता है, जिन्हें भेदभाव और प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके भविष्य के करियर पर असर पड़ सकता है।
कैंपस में ध्रुवीकरण और टकराव
जब शैक्षणिक संस्थान खुद को वैचारिक युद्धभूमि के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं, तो छात्रों और शिक्षकों के बीच विभाजन स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। कैंपस में “वामपंथी” और “दक्षिणपंथी” खेमों का टकराव आम हो जाता है। लेक्चर, अतिथि वक्ताओं के कार्यक्रम, विरोध-प्रदर्शन और बहस जैसी अकादमिक गतिविधियाँ भी विवाद और टकराव का कारण बनने लगती हैं।
ऐसे माहौल में छात्र संगठन अकादमिक लक्ष्यों की बजाय विचारधारा और पहचान के आधार पर संगठित होते हैं। पढ़ाई और शोध की प्राथमिकता पीछे छूट जाती है। सहयोग और आपसी समझदारी की जगह संदेह और अविश्वास ले लेता है। इसका असर छात्र-छात्राओं के मनोबल, सहपाठी संबंधों और कैंपस की समग्र शैक्षणिक संस्कृति पर पड़ता है।
इसके अलावा, प्रशासनिक बोझ भी बढ़ जाता है। अब संस्थानों को केवल शिक्षा और शोध पर ध्यान नहीं देना पड़ता, बल्कि आयोजनों की निगरानी, शिकायतों का निपटारा, अनुमतियों की प्रक्रिया और विवादों पर नियंत्रण जैसे अतिरिक्त कार्यों में समय और ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है।
प्रतिष्ठा और वैश्विक साख
IITs को विश्व-स्तर पर उच्च श्रेणी के संस्थान माना जाता है और वे निरंतर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में बने रहते हैं। छात्र और फैकल्टी की भर्ती, शोध अनुदान, औद्योगिक साझेदारी, अकादमिक प्रकाशन और अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग—ये सभी IITs की वैश्विक पहचान तय करते हैं।
लेकिन दुनिया भर के सहयोगी संस्थान IITs से केवल तकनीकी उत्कृष्टता की ही उम्मीद नहीं रखते, वे अकादमिक स्वतंत्रता, संतुलित शोध और स्थिर माहौल की भी अपेक्षा करते हैं। अगर IITs राजनीतिक विवादों, पक्षपाती पाठ्यक्रमों या अंदरूनी ध्रुवीकरण के लिए कुख्यात हो जाते हैं तो उनकी आकर्षण-शक्ति घट जाएगी। अंतरराष्ट्रीय सहयोगी ऐसे संस्थानों से दूरी बनाएंगे, शोध साझेदारियाँ प्रभावित होंगी और रैंकिंग पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
प्रतिभाशाली छात्र, खासकर अंतरराष्ट्रीय या दूसरे राज्यों से आने वाले, ऐसे संस्थानों की बजाय उन जगहों को चुन सकते हैं जहाँ वातावरण अधिक तटस्थ और स्थिर हो। इसका सीधा असर IITs की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर पड़ेगा और उन्हें कमजोर करेगा।
शैक्षणिक मानकों का गिरना
जब शिक्षक अकादमिक कठोरता की बजाय राजनीतिक या वैचारिक लक्ष्यों को प्राथमिकता देने लगते हैं, तो शैक्षणिक मानक गिरना तय है। प्रवेश परीक्षा में विचारधारा-आधारित झुकाव दिखने लगता है। शोधार्थियों का चयन केवल योग्यता और क्षमता की बजाय वैचारिक मेल के आधार पर होने लगता है।
पढ़ाई और मूल्यांकन भी निष्पक्षता से हटकर “लोकप्रिय” या “वैचारिक रूप से सही” प्रतीत होने वाले रुझानों पर आधारित हो सकते हैं। इससे अकादमिक संस्कृति धीरे-धीरे गहराई और आलोचनात्मक विश्लेषण की बजाय सतहीपन और राजनीतिक शोरगुल पर टिक जाती है।
संस्थागत वैधता
IITs बड़े पैमाने पर सार्वजनिक धन से चलते हैं। इनके हितधारक केवल छात्र और शिक्षक ही नहीं, बल्कि अभिभावक, सरकार, उद्योग और आम जनता भी हैं। अगर टैक्स देने वाले नागरिकों को लगे कि उनका पैसा विज्ञान और तकनीक की उत्कृष्टता की बजाय विचारधारात्मक सक्रियता पर खर्च हो रहा है, तो उनका विश्वास कमजोर होगा।
ऐसी स्थिति में सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। नीति में बदलाव, बजट कटौती, नियमों की सख्ती या बाहरी नियंत्रण जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। इससे IITs की संस्थागत वैधता और स्वायत्तता दोनों प्रभावित होंगी।
समाधान की ओर
IITs के सामने असली चुनौती यह है कि वे तकनीकी उत्कृष्टता की अपनी मूल पहचान को बनाए रखते हुए मानविकी और सामाजिक विज्ञान को भी संतुलित रूप से शामिल करें। इसके लिए कुछ उपाय सुझाए गए हैं:
- पाठ्यक्रम और कोर्स डिज़ाइन: मानविकी और लिबरल आर्ट्स के कोर्स STEM छात्रों के लिए वैकल्पिक होने चाहिए, अनिवार्य नहीं। केवल वही विषय अनिवार्य हों जिनका सीधा संबंध तकनीकी शिक्षा से हो—जैसे Ethics of Technology, Communication Skills या Science and Society। इससे जो छात्र मानविकी में गहरी रुचि रखते हैं वे उन्हें चुन सकें, जबकि बाकी छात्र तकनीकी फोकस बनाए रखें।
- भारतीय विषयों का समावेश: मानविकी विभागों में लगातार मार्क्सवादी और इस्लामी दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना संतुलित नहीं है। इसका उत्तर भारतीय परंपरा से जुड़े विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करना है। भारतीय दर्शन—वेदांत, न्याय, योग—शास्त्रीय ग्रंथ—उपनिषद, महाभारत, अर्थशास्त्र—और महान चिंतक जैसे चाणक्य, शंकराचार्य और रामानुज छात्रों के लिए नए दृष्टिकोण खोल सकते हैं।
उदाहरण के लिए, कौटिल्य का अर्थशास्त्र राज्य संचालन और अर्थनीति पर गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करता है, जबकि नाट्यशास्त्र संस्कृति और सौंदर्यशास्त्र के अध्ययन को समृद्ध बना सकता है। - फैकल्टी की भर्ती और विविधता: भर्ती केवल शोध-पत्रों और शिक्षण-क्षमता तक सीमित न रहे। यह भी देखा जाए कि उम्मीदवार अलग-अलग दृष्टिकोणों को स्वीकार कर सकता है या नहीं, असहमति का सम्मान करता है या नहीं और पढ़ाई में संतुलन बना सकता है या नहीं। विचारधारा, राजनीति, संस्कृति और सामाजिक पृष्ठभूमि में विविधता से एक ही सोच के वर्चस्व को रोका जा सकता है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि फैकल्टी की नियुक्ति में यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि उनकी निष्ठा भारत से बाहर के संगठनों या एजेंडों के प्रति न हो। सवाल यह उठता है कि जब IITs जनता के टैक्स से चलते हैं तो क्या यह उचित है कि उनके अध्यापक कम्युनिस्ट या मिशनरी संगठनों से जुड़े हों? क्या यह सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग नहीं होगा?
- प्रशासन और संस्थागत नीति: IIT प्रशासन को स्पष्ट मिशन स्टेटमेंट या चार्टर जारी करना चाहिए, जिसमें तकनीकी उत्कृष्टता, वैज्ञानिक खोज, विचार की स्वतंत्रता, बहुलता, पारदर्शिता और वैचारिक तटस्थता जैसे मूल्यों का उल्लेख हो। ऐसे दस्तावेज़ विवादों के समय दिशा-निर्देशक साबित हो सकते हैं। मान्यता देने वाली संस्थाएँ, सरकारी नियामक या स्वतंत्र शैक्षणिक पैनल भी समय-समय पर यह मूल्यांकन कर सकते हैं कि IITs अपने चार्टर पर टिके हैं या किसी विचारधारा का औजार बन रहे हैं।
- छात्रों की भागीदारी और अधिकार: छात्रों को अपनी राय रखने और असहमति जताने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसके लिए पारदर्शी फीडबैक सिस्टम बनाए जाएँ—जैसे सर्वे और कोर्स मूल्यांकन—जिनसे यह पता चल सके कि क्या छात्रों को बहुविध दृष्टिकोण मिल रहे हैं और उनकी राय का सम्मान हो रहा है या नहीं।
साथ ही, छात्रों को यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आयोजनों की अनुमति कैसे दी जाती है, गेस्ट लेक्चरर्स का चयन किस आधार पर होता है और शोध-प्रबंधों का मूल्यांकन किन मानकों से किया जाता है। शिकायत निवारण की प्रक्रिया निष्पक्ष, तेज और पारदर्शी होनी चाहिए। - STEM की मजबूती: IITs की पहचान इंजीनियरिंग, विज्ञान और तकनीकी नवाचार में उत्कृष्टता पर बनी है। अगर संस्थागत प्राथमिकताएँ मानविकी और सामाजिक विज्ञान की ओर अत्यधिक झुक गईं, तो इनकी असली ताकत कमजोर हो सकती है। इसलिए ज़रूरी है कि तकनीकी शोध, STEM फैकल्टी की भर्ती और विज्ञान पर संसाधनों का व्यय किसी भी हालत में प्रभावित न हो।
- कार्यान्वयन की चुनौतियाँ: यह तय करना आसान नहीं है कि कौन-सा विषय “राजनीतिक” है और कौन-सा “तटस्थ।” मानविकी विषय स्वभाव से ही सत्ता, न्याय और पहचान से जुड़े रहते हैं, इसलिए सीमाएँ खींचना जटिल और विवादास्पद है।
वैचारिक तटस्थता भी एक विवादित आदर्श है। जो बात एक पक्ष को संतुलित लगे, वही दूसरे को आलोचना दबाने का प्रयास लग सकती है। इसके अलावा, सरकारों की भी अपनी विचारधारा हो सकती है, जो यह तय करती है कि क्या स्वीकार्य है और क्या वर्जित। नतीजों को मापना भी कठिन है। क्या STEM की गुणवत्ता पर असर पड़ा? क्या छात्रों की आलोचनात्मक सोच सुरक्षित रही? ऐसे बदलावों के परिणाम अक्सर वर्षों बाद सामने आते हैं।
निष्कर्ष
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में मानविकी और सामाजिक विज्ञानों का प्रवेश शिक्षा की वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुविषयक अध्ययन को महत्व दिया जाता है, लेकिन IITs के संदर्भ में यह चिंता वास्तविक है कि मानविकी विभाग वैचारिक कब्ज़े और राजनीतिकरण का केंद्र न बन जाएँ। पिछले कुछ वर्षों में कई विवाद सामने आए हैं, जिन्होंने यह धारणा मज़बूत की है कि यहाँ विशेषकर हिंदू छात्रों के साथ पक्षपात और भेदभाव बढ़ रहा है।
स्थिति को संभालने के लिए सरकार को सबसे पहले राजनीतिकरण रोकने की ठोस नीति बनानी होगी और कम से कम 12 महीने तक उसके क्रियान्वयन की सख्ती से निगरानी करनी होगी। यदि इस अवधि में कोई सुधार न दिखे और वामपंथी गुट लगातार टालमटोल करता रहे, तो यह स्पष्ट संकेत होगा कि उनका उद्देश्य शिक्षा नहीं बल्कि संस्थानों पर कब्ज़ा करना है। ऐसी परिस्थितियों में उसी समूह को अभिव्यक्ति की आज़ादी देना व्यर्थ है, जो सत्ता हासिल होने पर इन्हीं स्वतंत्रताओं को समाप्त करना चाहता है।[12]
यही कारण है कि कई पर्यवेक्षक अंतिम विकल्प के रूप में IITs से मानविकी को पूरी तरह हटाने की बात करते हैं। भारत में वामपंथ पहले ही कई शैक्षणिक संस्थानों को कमजोर कर चुका है; अब वैज्ञानिक और तकनीकी विश्वविद्यालयों को उसी राह पर नहीं जाने दिया जा सकता।
पूर्व छात्र आयुष्मान गोयल का कहना है कि भले ही IITs में मानविकी पढ़ने वाले छात्र केवल 1% हों और लगभग 10% फैकल्टी वोक या इस्लामी झुकाव वाली हो, लेकिन मीडिया, सेक्युलर दलों और NGOs से उनके गठजोड़ की वजह से उन्हें असमान रूप से अधिक दृश्यता और प्रभाव मिलता है। यदि उनकी संख्या और बढ़ी, तो IITs “ब्रेकिंग इंडिया” का गढ़ बन सकते हैं।
IITs को वैश्विक उत्कृष्टता का केंद्र बनाए रखने के लिए यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि मानविकी केवल सहायक भूमिका निभाए, और संस्थानों की तकनीकी नेतृत्व की मूल विरासत को कभी कमजोर न करे।
सन्दर्भ सूची
[1] IITs focus on Humanities courses to promote synergistic thinking among students (Education Times, 2024); https://www.educationtimes.com/article/campus-beat-college-life/99735273/iits-focus-on-humanities-courses-to-promote-synergistic-thinking-among-students
[2] Multidisciplinary and Holistic Education (Ministry of Education, Government of India, 2022); https://www.education.gov.in/en/nep/multidisciplinary-holistic-education#:~:text=A%20multidisciplinary%20education%2C%20as%20envisaged,creative%20combinations%20of%20various%20disciplines.
[3] Communist Faculty, Pro-Terrorist Speakers: How IITs Are Turning Into Playgrounds For Radical Ideologues (Swarajya, 2025); https://swarajyamag.com/commentary/communist-professors-pro-terrorist-guest-speakers-how-iits-are-turning-into-playgrounds-for-radical-ideologues
[4] ibid
[5] Communist Faculty, Pro-Terrorist Speakers: How IITs Are Turning Into Playgrounds For Radical Ideologues (The Daily Californian, 2025); https://www.dailycal.org/news/campus/iit-bombay-withdraws-from-institute-for-south-asia-studies-conference-cites-offensive-flyer-the-institute/article_326cae47-45c1-4d98-b091-63a6df1ddab2.html
[6] Why is IIT Bombay organising an event on South Asian Capitalism(s)? (Kanwal Sibal on X, 2025); https://x.com/KanwalSibal/status/1966001749359198329
[7] Academic Jihad? IIT Gandhinagar Humanities Dept accused of promoting Islamic theology, Hindu students gagged for condemning Pahalgam attack (OpIndia, 2025); https://www.opindia.com/2025/05/iit-gandhinagar-humanities-dept-sparks-outrage-over-promoting-islamic-theology-under-the-garb-of-ai-project-deepfaith/
[8] From Paris to Pahalgam: Why the World Must Unite to Defeat Radical Islam (StopHindidvesha.Org, 2025); https://stophindudvesha.org/from-paris-to-pahalgam-why-the-world-must-unite-to-defeat-radical-islam/
[9] Humanities professor at IITB faces backlash for far-left activism: How India’s elite technical institutes are becoming breeding grounds for Marxist-Leftwing ideology (OpIndia, 2025); https://www.opindia.com/2025/06/humanities-professor-at-iitb-faces-backlash-for-far-left-activism-indias-elite-technical-institutes-becoming-breeding-grounds-for-leftwing-ideology/?utm_source=chatgpt.com
[10] From Gramsci to IIT Bombay: How India’s Academic left uses Marxist frameworks to target Hindutva but spares the Vatican (Organiser, 2025); https://organiser.org/2025/09/17/316151/bharat/from-gramsci-to-iit-bombay-how-indias-academic-left-uses-marxist-frameworks-to-target-hindutva-but-spares-the-vatican/
[11] Marxist historians are perpetrators, not victims of intolerance (Daily O, 2015); https://www.dailyo.in/politics/marxism-vedic-age-aryan-invasion-theory-romila-thapar-irfan-habib-indian-history-7183
[12] How Hitler Used Democracy to Take Power (Time, 2024); https://time.com/6971088/adolf-hitler-take-power-democracy/
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