सन 2075: विखंडित भारत में महिलाओं की दुर्दशा   

  • एक समय पर शक्तिशाली रहा भारत देश छोटे-छोटे युद्धरत राज्यों में विभक्त हो गया है, जहाँ अधिकांश क्षेत्रों में, विशेष रूप से इस्लामी धर्मतंत्रों के अंतर्गत, महिलाओं के अधिकारों में भारी कमी आई है।
  •  इस्लामिक फेडरेशन ऑफ हिंदुस्तान और अन्य इस्लामी राज्यों ने शरिया कानून लागू कर दिया है, जिससे महिलाओं के मूल अधिकार छीन लिए गए हैं और तालिबान के अधीन अफगानिस्तान में देखी गई दमनकारी प्रथाओं के समान दमनकारी प्रथाएँ लागू की गई हैं।
  •  21वीं सदी की शुरुआत में उदारवादी नारीवादियों द्वारा हिजाब का बचाव करने से अनजाने में दमनकारी इस्लामी प्रथाओं के सामान्यीकरण को बढ़ावा मिला, जिसके कारण 2075 में हिजाब को अनिवार्य कर दिया गया।
  •  जबकि रिपब्लिक ऑफ़ हिंदुस्तान में महिलाओं के पास कुछ अधिकार हैं, लेकिन इस्लामी राज्यों और द्रविडीयन कनफ़ेडरेशन जैसे अराजक क्षेत्रों में स्थिति गंभीर है, जहाँ महिलाओं के खिलाफ हिंसा व्याप्त है।
  •  उदारवादी नारीवादियों और वैश्विक नेताओं द्वारा कट्टरपंथी इस्लामी प्रथाओं के खिलाफ शुरू में ही कोई कदम उठाने के मामले में विफलता के कारण 2075 के खंडित, निराशाजनक भारत में महिलाओं की व्यापक अधीनता हो गई है।

वर्ष 2075 है और भारत, जो कभी विश्व गुरु (पूरी दुनिया को सही राह दिखाने वाला आध्यात्मिक नेता) बनने की आकांक्षा रखने वाला शक्तिशाली राष्ट्र था, अब अपने पूर्व स्वरूप की एक धुंधली छाया मात्र रह गया है। पूरा उपमहाद्वीप छोटे छोटे टुकड़ों में खंडित हो चुका है। एक समय में भारत कहलाने वाला यह महान देश ऐसे टुकड़ो के एक दुखद संग्रह में सिमट कर रह गया है, जो निरंतर टकराव और वैमनस्य की स्थिति से जूझते रहते हैं। भारत अब इन छोटे छोटे देशों में बंट चुका है जो परस्पर विरोधी पहचानों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

 भारत के विखंडन की ये कहानी अत्यंत मार्मिक और दुखदाई है। यूँ तो इसका असर कई क्षेत्रों में देखने को मिलता है, लेकिन इसका  सबसे गहरा प्रभाव महिला अधिकारों के क्षेत्र पर पड़ा है। वह देश जो कभी राजनीति, शिक्षा, व्यवसाय, स्वास्थ्य, सौंदर्य आदि क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रभावशाली और सशक्त महिला शख़्सियतों के लिए जाना जाता था, अब एक ऐसा देश बन गया है जहाँ महिलाओं को उनके बुनियादी मानवाधिकारों से भी व्यवस्थित रूप से वंचित किया जाता है।

ये कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि महिलाओं की सबसे खराब स्थिति इस्लामिक फेडरेशन ऑफ हिंदुस्तान में है। वहाँ शरिया कानून का बोल बाला  है, जो 2020 के दशक के अफगानिस्तान की याद दिलाता है। इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ कश्मीर और खालिस्तान में भी महिलाओं के अधिकारों की स्थिति समान रूप से बदतर है। द्रवीडियन कनफ़ेडरेशन में सैद्धांतिक रूप से तो महिलाओं को बुनियादी अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन व्यवहार में, कानून और व्यवस्था के पतन का मतलब है कि इन अधिकारों की कोई अहमियत है। रिपब्लिक ऑफ़ हिंदुस्तान एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ महिलाओं को वही अधिकार प्राप्त हैं जो उन्हें 50 साल पहले उपलब्ध थे। लेकिन यह छोटा सा देश लगातार डर के साये में जीता है, क्यूंकि ये ऐसे पड़ोसी देशों से घिरा हुआ है जो इस्लामिक कट्टरवाद की गिरफ़्त में हैं।

2075 के विखंडित भारत में महिलाओं की दयनीय दुर्दशा का पता 50-60 साल पहले शुरू हुए रुझानों से लगाया जा सकता है। यह वह समय था जब दुनिया भर में उदारवादी नारीवादियों ने अपनी आवाज़ बुलंद कर इस्लामिक कट्टरपंथ को अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर हरी झंडी दिखाई। उस समय विश्व की उदारवादी नारीवादियों ने इस्लामिक परिधान “हिजाब” का समर्थन किया, यह तर्क देकर कि हिजाब पहनने का एक महिला का निर्णय उसकी पसंद की स्वतंत्रता का मामला है। 21वीं सदी के दूसरे दशक में उदार हिंदू महिलाओं के बीच “हिजाब” के समर्थन में आना एक फैशन सा बन गया था। हिंदू महिलाओं द्वारा मुस्लिम महिलाओं के तथाकथित “हिजाब पहनने के अधिकार” के समर्थन में प्रदर्शन करना आम बात हो गयी थी।  अक्सर इन प्रदर्शनों के माध्यम से कुछ इस प्रकार के विमर्श को हवा दी जाती थी कि “दक्षिणपंथी हिंदू संगठन” मुस्लिम महिलाओं को उनके सबसे बुनियादी अधिकारों से भी वंचित करने पर आमादा हैं और उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाओं को निशाना बना रहे हैं।[1][2]

उस समय इन तथाकथित नारीवादी महिलाओं को इसका ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि केवल 50 साल बाद, वे उस “प्रगतिशील” मंच को वे खो देंगी जिस पर कभी खड़ी हो वो बड़ी ही बेबाक़ी से अपने विचार सामने रखती थीं। उन्हें शायद इस बात का ज़रा भी आभास नहीं था कि 50 साल बाद उन्हें सिर से पैर तक अपने शरीर को ढकने के लिए मजबूर कर दिया जाएगा। उदार हिंदू महिलाएँ और पश्चिमी कट्टरपंथी नारीवादी यह समझने में विफल रहीं कि जब आप अपनी खुद की “प्रगतिशील” जीवनशैली के आरामदायक नज़रिए से किसी दमनकारी प्रथा का समर्थन करते हैं, तो वही दमनकारी प्रथा अंततः आपकी खुद की वास्तविकता को नष्ट कर सकती है। अंत में, आपके पास बाहरी व्यक्ति होने का विशेषाधिकार नहीं रह जाता।

विश्व की उदारवादी महिलाओं के साथ हुआ यह विश्वासघात अंग्रेज़ी साहित्य से प्रचलन में आये एक जाने माने मुहावरे ‘Frankenstein Monster” की याद दिलाता है, यानि आप यदि अपनी सहूलियत या स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी दमनकारी व्यक्ति या प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं, तो ये राक्षस अंततः आपको भी निगल कर रहता है। यानि आप अपने बनाये हुए जाल में ख़ुद ही फँस जाते हैं और वो विनाशकारी शक्तियाँ आपको भी नहीं बख्शतीं।  21वीं सदी की शुरुआत की उदारवादी भारतीय महिलाएँ यह नहीं समझ पाईं कि वोकिज़्म के बैनर तले महिला-विरोधी इस्लामिक प्रथाओं का महिमामंडन करना अपनी खुद की कब्र खोदने के बराबर था। 50 साल की छोटी सी अवधि में, कई हिंदू महिलाएँ और प्रगतिशील मुस्लिम महिलाएँ – खुद को कई इस्लामिक  धर्मतंत्रों में फँसा हुआ पाती हैं जो अब खंडित भारत पर शासन करते हैं। केवल रिपब्लिक ऑफ़ हिंदुस्तान में रहने वाली महिलायें ही भाग्यशाली हैं, जो उस भयावह दावानल से बच पाई हैं। लेकिन इस नये हिंदू-बहुल राष्ट्र की भी अपनी समस्याएँ हैं।

2075 के विखंडित भारत में महिलाओं की स्थिति पर विचार करते समय, मार्गरेट एटवुड के शक्तिशाली उपन्यास, द हैंडमेड्स टेल के बारे में सोचने को मन विवश को जाता है। यह भयावह, गहरा, विलक्षण, और प्रभावशाली उपन्यास पहली बार 1985 में कनाडाई लेखक एटवुड द्वारा प्रकाशित किया गया था। जबकि पुस्तक की कहानी का कथानक निकट भविष्य के न्यू इंग्लैंड में ईसाई कट्टरपंथी शासन को दर्शाता है, एटवुड ने जिस समाज को चित्रित किया है, वह इस्लामी शासनों के तहत महिलाओं के साथ किए जाने वाले व्यवहार से काफी मिलता-जुलता है।

कहानी इस भयावह दुनिया में क़ैद एक युवा महिला, ​​ऑफ्रेड द्वारा सुनाई गई है (जो एक हैंडमैड यानी बच्चे पैदा करने के लिए नियुक्त की गई दासी है), जहाँ महिलाओं को सिर से पैर तक खुद को ढकने के लिए मजबूर किया जाता है और अगर वे नियमों का उल्लंघन करने की हिम्मत करती हैं तो उन्हें कड़ी सजा दी जाती है। इस निराशाजनक जगत में, महिलाओं को उनकी भूमिकाओं के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, और हैंडमैड्स की स्थिति सबसे निचले दर्जे की होती है। उनका एकमात्र कार्य धनी दंपतियों के लिए बच्चे पैदा करना है, जो उन्हें खरीदे गए दासों के समान बनाता है। द हैंडमेड्स टेल की दुनिया ऐसे सत्तावादी शासनों में महिलाओं के उत्पीड़न का एक भयावह प्रतिबिंब है, जो कि एक खंडित भविष्य के भारत के इस्लामी राज्यों के वीभत्स और मनहूस समाजों की तरह है।

आइए 2075 के विखंडित भारत में महिलाओं की दुर्दशा पर करीब से नज़र डालें।

इस्लामिक फेडरेशन ऑफ़ हिंदुस्तान

मुस्लिम बहुल इस्लामिक फेडरेशन ऑफ़ हिंदुस्तान सख्त शरिया कानून द्वारा शासित है। इस नवगठित राष्ट्र में, महिलाओं को शिक्षा, रोज़गार या बोलने, इकट्ठा होने या संगठन बनाने की स्वतंत्रता का कोई अधिकार नहीं है। उन्हें पुरुष अभिभावक के बिना सार्वजनिक स्थानों पर जाने की भी अनुमति नहीं है। इसके अलावा महिलाओं को सख्त ड्रेस कोड का पालन करना होता है, खुद को सिर से पैर तक ढीले कपड़ों में ढकना अनिवार्य है, जिससे केवल उनकी आँखें दिखाई दें। महिलाओं के लिए सभी तरह की शिक्षा वर्जित है, सिवाय कुरान के  अध्ययन के, और यह अध्ययन भी घर की चारदीवारी के भीतर ही किया जाना चाहिए। इस्लामिक फेडरेशन ऑफ़ हिंदुस्तान में महिलाओं को केवल घरेलू काम करने और बच्चे पैदा करने की अनुमति है।

इस्लामिक फेडरेशन ऑफ़ हिंदुस्तान में महिलाओं की भयानक स्थिति 21वीं सदी की शुरुआत में अफ़गानिस्तान में तालिबान शासन के तहत महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली स्थितियों से काफी मिलती-जुलती है। इस नव स्थापित मुस्लिम बहुल राष्ट्र ने अफगानिस्तान में तालिबान की व्यवस्था के अनुरूप एक सदाचार और दुराचार मंत्रालय भी स्थापित किया है। महिलाओं को लक्षित करने वाले कानून न केवल सार्वजनिक रूप से बल्कि निजी तौर पर भी उनके व्यवहार की बारीकी से निगरानी करते हैं। महिलाओं को गाने, किसी भी तरह की कला का अभ्यास करने या यहां तक ​​कि संगीत सुनने से भी मना किया जाता है। उन्हें पुरुषों के साथ बहस करने या सार्वजनिक या निजी मामलों पर व्यक्तिगत राय व्यक्त करने की भी आज़ादी नहीं है। सदाचार और दुराचार मंत्रालय सख्त ड्रेस कोड लागू करता है और यह सुनिश्चित करता है कि महिलाएं अपने जीवन के हर पहलू में शरिया कानून का पालन करें। इन नियमों का उल्लंघन करने पर सार्वजनिक रूप से कोड़े मारे जा सकते हैं या पत्थर मारे जा सकते हैं।

दुख की बात है कि अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस्लामी चरमपंथ के खतरे को अधिक गंभीरता से लिया होता तो इस भयावह वास्तविकता से बचा जा सकता था। 2020 के दशक में, जब तालिबान ने महिलाओं पर अपने क्रूर उत्पीड़न को पूरी तरह से लागू किया, तो वैश्विक नेताओं ने उन अत्याचारों की केवल हल्की आलोचना की। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार के खिलाफ़ निर्णायक कार्रवाई करने या उसकी वैधता को चुनौती देने का साहस नहीं दिखाया।

एटवुड की द हैंडमेडेंस टेल की युवा नायिका की तरह, जो पलक झपकते ही एक आधुनिक, प्रगतिशील जीवन जीने वाली महिला से एक भयावह, महिला-विरोधी समाज में बच्चे पैदा करने वाली दासी बन जाती है, अफ़गानिस्तान में भी अचानक से एक बड़ा बदलाव आया। 1960 के दशक में, महिलाओं के अधिकारों के मामले में अफ़गानिस्तान अपेक्षाकृत प्रगतिशील राष्ट्र था। लेकिन 1992 के बाद, तालिबान के शासन के तहत, यह एक इस्लामी धर्मतंत्र में बदल गया, जहाँ टेलीविज़न और सैटेलाइट डिश नष्ट कर दिए गए, महिलाओं को काम करने से प्रतिबंधित कर दिया गया, और सार्वजनिक रूप से फांसी देना एक नियमित घटना बन गई। इन दो कथाओं के बीच समानताएँ इस बात की कड़ी याद दिलाती हैं कि स्वतंत्रता कितनी तेज़ी से खोई जा सकती है।[3]

2001 में, अमेरिका ने तालिबान शासन को नष्ट करने के लिए अफ़गानिस्तान पर आक्रमण किया, लेकिन तालिबान 2021 में सत्ता में वापस आ गया और इस बार उसने एक ऐसी सरकार बनाई जिसे पश्चिम ने लगभग मान्यता दे दी थी। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने चेतावनी के संकेतों को गंभीरता से नहीं लिया, और परिणाम अब लगभग 50 साल बाद सभी के सामने हैं।

इस्लामिक फेडरेशन ऑफ़ हिंदुस्तान में, बाहरी दुनिया से मीडिया की पहुँच को सख़्ती से नियंत्रित किया जाता है, इसलिए महिलाओं की स्थिति के बारे में बहुत कम जानकारी इसकी सीमाओं से परे पहुँचती है। इसके अतिरिक्त, दुनिया भर में कट्टरपंथी इस्लामी समूहों के उदय के साथ, पश्चिमी मीडिया की स्वतंत्रता गंभीर रूप से कमज़ोर हो चुकी है। 21वीं सदी की शुरुआत में, हमने देखा कि कैसे पश्चिमी मीडिया “वोक” विचारधाराओं से तेज़ी से प्रभावित हुआ और कैसे कुछ कट्टरपंथी नारीवादी शरिया कानून या इस्लामी शासन का अतिशोक्तिपूर्ण तरीक़े से बचाव करने में लग गये।

2075 तक इस परिवर्तन का पश्चिमी मीडिया पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है, जिसे अब बड़े पैमाने पर इस्लामवादी हित समूहों द्वारा नियंत्रित और वित्त पोषित किया जाता है। पश्चिम में पत्रकारों को अक्सर धमकाया जाता है, परेशान किया जाता है, या यहाँ तक कि मार भी दिया जाता है, यदि वे इस्लामी शासन के अत्याचारों को उजागर करने का प्रयास करते हैं। परिणामस्वरूप, पश्चिमी मीडिया, जो कभी वैश्विक मुद्दों के लिए एक “महत्वपूर्ण आवाज़” होने का दावा करता था, अब अपने पुराने स्वरूप का मौन संस्करण बन का रह गया है। अब यह इस्लामिक फेडरेशन ऑफ़ हिंदुस्तान में महिलाओं की पीड़ा पर रिपोर्टिंग करने से बचता है।

इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ कश्मीर

इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ कश्मीर में महिलाओं की स्थिति इस्लामिक फेडरेशन ऑफ हिंदुस्तान के समान ही बदतर है। इस मुस्लिम बहुल धर्मतंत्र में शरिया कानून का एक समान संस्करण लागू किया गया है, जिसमें महिलाओं के सभी नागरिक और व्यक्तिगत अधिकार छीन लिए गए हैं।

जबकि क्षेत्र के अधिकांश हिंदू भागकर रिपब्लिक ऑफ़ हिंदुस्तान चले गए, जो बचे रह गये, वे उत्पीड़न के निरंतर भय में जी रहे हैं। हिंदू महिलाओं को भयावह स्थितियों का सामना करना पड़ता है। उनका अक्सर अपहरण कर लिया जाता है, व उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है और जबरन मुस्लिम पुरुषों से उनकी शादी करा दी जाती है। कईयों को अन्य इस्लामी देशों में सेक्स गुलाम के रूप में बेच दिया जाता है, और कश्मीर की अल्पसंख्यक महिलाएँ एक सेक्स तस्करी उद्योग का शिकार बन जाती हैं। कुछ को आतंकवादी गैंगस्टरों की दुल्हन बनने के लिए भी मजबूर किया जाता है, जिनके बचने की कोई उम्मीद नहीं होती।

जब भारत ने 2019 में जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निरस्त किया, तो इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता लौटने के कारण आशावाद का एक संक्षिप्त दौर आया। हालाँकि, कट्टरपंथी इस्लामवादी पृष्ठभूमि में काम करना जारी रखते रहे। चुनाव होने के बाद, स्थानीय राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता की लालसा में कट्टरपंथी इस्लामी भावनाओं को हवा देने के कारण स्थिति तेजी से बिगड़ गई। 2050 तक कश्मीर बहुत हद तक तालिबान जैसा राज्य बन चुका था। 2060 तक स्थानीय जिहादी समूहों ने स्थापित इस्लामी आतंकवादी संगठनों के समर्थन से इस क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया। भारत के विखंडन की इस अवधि के दौरान, कश्मीर ने न केवल स्वतंत्रता की घोषणा की, बल्कि लद्दाख के बौद्ध-बहुल क्षेत्र पर भी कब्ज़ा कर लिया, जिससे वर्तमान इस्लामिक गणराज्य कश्मीर का गठन हुआ।

आज इस पर विश्वास करना मुश्किल है, लेकिन 21वीं सदी के शुरुआती दशकों में कश्मीरी महिलाएँ उच्च शिक्षा में आगे बढ़ रही थीं, अपना खुद का व्यवसाय शुरू कर रही थीं और खेलों में अपनी पहचान बना रही थीं। जैसे-जैसे भारत के बाकी हिस्सों के साथ संबंध सामान्य हुए और पर्यटन बढ़ा, कश्मीरी महिलाओं की प्रगति बढ़ती रही। रूढ़िवादी ड्रेस कोड में ढील दी गई और अधिक से अधिक महिलाएँ काम करने के लिए घर से बाहर निकलने लगीं और आत्मविश्वास के साथ सार्वजनिक जीवन को अपनाने लगीं। लेकिन स्थानीय नेताओं के सत्ता के  लालच और बाहरी भारत-विरोधियों के प्रभाव के कारण घाटी में धीरे-धीरे कट्टरपंथीकरण की शुरुआत हुई। जिसे कभी “धरती पर स्वर्ग” कहा जाता था, वह क्षेत्र जल्द ही महिलाओं के लिए जीवित नरक में बदल गया।

प्रसिद्ध लेखिका और सामाजिक टिप्पणीकार, अर्शिया मलिक ने एक कश्मीरी मुस्लिम महिला के रूप में शरिया कानून के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा किया। वह याद करती हैं कि कैसे तीन तलाक की इस्लामी प्रथा ने उनकी माँ की शादी को खत्म कर दिया, जिससे उनके पास कोई आय नहीं बची और वे बिना किसी आर्थिक सुरक्षा के दो छोटी बेटियों की देखभाल करने हेतु मजबूर हो गयीं। तलाक का कारण चौंकाने वाला था – जब अर्शिया के दादा ने उनकी बहन से छेड़छाड़ करने का प्रयास किया तो अर्शिया की माँ ने विरोध किया था।

परंतु मामला यहीं ख़त्म नहीं हुआ। अर्शिया बताती हैं कि कैसे कश्मीर के शरिया अदालतों ने उनकी माँ को “परिवार की गंदी बातें उजागर करने” के लिए दोषी ठहराया और उनसे आग्रह किया कि अगर वह अपने आरोपों को वापस ले लेती हैं तो वे अर्शिया के पिता के साथ सुलह कर सकती हैं। दबाव के बावजूद, अर्शिया की माँ दृढ़ रहीं और गुजारा भत्ता या रखरखाव के किसी भी समर्थन के बिना अपनी बेटियों की परवरिश करने के लिए दृढ़ संकल्पित रहीं। आखिरकार, स्थिति तब कुछ सुधरी जब अर्शिया एक लेखिका और शिक्षिका बन गईं और उनकी बहन एक चिकित्सक बन गईं।

लेकिन अर्शिया और उनकी माँ के साथ अन्याय में कमी नहीं आई। जब उनके पिता ल्यूकेमिया से बीमार पड़ गए, तो अर्शिया और उनकी बहन ने उनकी मृत्यु तक उनकी देखभाल की। लेकिन जब उनकी विरासत की बात आई, तो उनके रिश्तेदारों ने बहनों को उनका हक छीनने के लिए “शरिया कानून में हर खामी का इस्तेमाल किया”। अर्शिया को एक बार फिर मुश्किलों का सामना करना पड़ा जब उनके पति की 40 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गइ। उनके पति की मौत के बाद, शरिया कानून ने अर्शिया को उनकी संपत्ति के उत्तराधिकार से भी वंचित कर दिया।[4]

अर्शिया मलिक की दुखद व्यक्तिगत कहानी कश्मीर के अतीत की एक भयावह याद दिलाती है, जिसमें पहले से ही इस बात के साफ संकेत थे कि आगे क्या होने वाला है। 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने से पहले, कश्मीर एक इस्लामिक धर्मतंत्र की तरह काम करता था, जिसकी सबसे बुरी शिकार महिलाएँ थीं। भारत सरकार ने 2019 में तीन तलाक की प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन मुस्लिम मौलवियों और कट्टरपंथी इस्लामी समूहों ने पूरे देश में यह दावा करते हुए इसका विरोध किया कि यह उनके धर्म अधिकार का उल्लंघन है।

स्थानीय कश्मीरी राजनेताओं के लालच और स्थानीय लोगों की गुमराह करने वाली हरकतों के परिणाम, जिन्होंने जिहादियों का समर्थन किया और इस्लाम के नाम पर उन्हें भावनात्मक रूप से बरगलाया, अब दर्दनाक रूप से स्पष्ट हैं। नवगठित इस्लामिक गणराज्य कश्मीर एक धर्मशासित राज्य बन गया है, जो शरिया कानून के सबसे चरम संस्करणों में से एक द्वारा शासित है। इस देश में महिलाओं को न केवल उनके नागरिक और व्यक्तिगत अधिकारों से वंचित किया जाता है, बल्कि उन्हें गैर-अनुपालन या प्रतिरोध के लिए सार्वजनिक रूप से कोड़े मारे जाते हैं, और पत्थरों से मारा जाता है।

खालिस्तान

नए नए बने खालिस्तान में, सिख समुदाय, जो ऐतिहासिक रूप से अपने प्रगतिशील जीवनशैली के लिए जाना जाता है, ने एक घिनौना मोड़ ले लिया है। खालिस्तान एक तालिबान शैली का सिख धर्मतंत्र है, जहाँ नैतिक पुलिस सड़कों पर घूमती है और उन महिलाओं पर हमला करती है जो अपना सिर ढकना भूल जाती हैं।

हालांकि सिख महिलाएँ बिना किसी पुरुष अनुरक्षक के सार्वजनिक रूप से बाहर जा सकती हैं, लेकिन उन्हें हमेशा सख्त ड्रेस कोड का पालन करना होता है। ढीले कपड़े पहनना और सिर ढकना महिलाओं के लिए अनिवार्य है। पश्चिमी कपड़े और जीवनशैली ख़ालिस्तान की महिलाओं के लिए वर्जित हैं। हालाँकि सिख महिलाओं को पढ़ने और काम करने की अनुमति है, लेकिन इसके लिए भी सख्त निर्देश हैं। पुरुषों और महिलाओं के बीच सार्वजनिक बातचीत को सख्ती से नियंत्रित किया जाता है, और महिलाओं को शिक्षा या रोज़गार प्राप्त करने के लिए परिवार के किसी पुरुष की अनुमति लेनी पड़ती है।

महिलाओं के अधिकारों का यह ह्रास विशेष रूप से चौंकाने वाला है, क्योंकि सिर्फ़ 50 साल पहले, सिख महिलाएँ मुक्ति और स्वतंत्रता का प्रतीक थीं। इसी तरह के धर्मतंत्रों में मुस्लिम महिलाओं के विपरीत, सिख महिलाएँ हमेशा आधुनिक, प्रगतिशील और बेहद आत्मनिर्भर रही हैं। सिख समुदाय अपनी गतिशीलता के लिए जाना जाता था, और इसकी महिलाएँ भी अपवाद नहीं थीं।

लेकिन 21वीं सदी की शुरुआत में कट्टरपंथी इस्लामवादी-खालिस्तानी गठबंधन के उदय ने सब कुछ बदल दिया। कई युवा सिख इसके आने वाले भयावह परिणामों से अनजान, उत्सुकतावश अलगाववादी आंदोलन में शामिल हो गए। आधुनिक और प्रगतिशील सिख महिलाओं ने भी उस समय खालिस्तान के समर्थन में भूमिका निभाई, बिना यह सोचे कि उनके साथ भविष्य में क्या होने वाला है।[5] उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि केवल 50 साल में, इस “वोक आंदोलन” में की जाने वाली उनकी भागीदारी एक भयावह जाल में बदल जाएगी, जिससे निकल पाना लगभग असंभव होगा। अब वे खुद को ऐसे देश में पाती हैं जहाँ उन्हें महिलाओं के रूप में सबसे बुनियादी अधिकारों से भी व्यवस्थित रूप से वंचित किया जाता है।

इस नए बने देश में फंसे उन सिखों के लिए स्थिति और भी खराब है जो पहले से ही खालिस्तान के समर्थन में नहीं थे। कई सिख महिलाएँ हिंदुस्तान गणराज्य में जाने की कोशिश करती हैं, लेकिन तालिबान-शैली के सिख धर्मतंत्र खालिस्तान में यह लगभग असंभव हो गया है।

रिपब्लिक ऑफ़ हिंदुस्तान

हिंदू बहुसंख्यक होने और उदार कानूनों के कारण, रिपब्लिक ऑफ़ हिंदुस्तान महिलाओं को राहत प्रदान करता है। यहाँ महिलाओं को वे सभी अधिकार प्राप्त हैं जो उन्हें 50 साल पहले प्राप्त थे – शिक्षा का अधिकार, काम करने का अधिकार, स्वतंत्र रूप से कपड़े पहनने का अधिकार, आदि। लेकिन सवाल यह है कि कब तक?

रिपब्लिक ऑफ़ हिंदुस्तान बाहरी हस्तक्षेप और आंतरिक अशांति के निरंतर खतरों का सामना करने को बाध्य है। इस्लामिक फेडरेशन ऑफ हिंदुस्तान के साथ साझा सीमा होने की वजह से, यह हिंदू महिलाओं की सीमा पार तस्करी और अपहरण की वारदातों से निरंतर जूझता है। यह समस्या रिपब्लिक ऑफ़ हिंदुस्तान में महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में एक बड़ा मुद्दा बन गयी है, क्योंकि हिंदू महिलाएं हर साल एक खतरनाक दर से गायब हो रही हैं, जिससे हिंदू आबादी में और गिरावट आ रही है।

इसके अलावा, “लव जिहाद” के मामले, जहां हिंदू महिलाओं को सीमा पार के  व्यक्तियों द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से लक्षित किया जाता है, तेज़ी से बढ़ रहे हैं। कई महिलाएं गायब हो जाती हैं, और आख़िर में वे ख़ुद को या तो इस्लामिक फेडरेशन ऑफ हिंदुस्तान या इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ कश्मीर में पाती हैं। यह बढ़ता संकट, रिपब्लिक ऑफ़ हिंदुस्तान में हिंदू महिलाओं की सुरक्षा और अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है।

द्रवीडियन कनफ़ेडरेशन

द्रवीडियन कनफ़ेडरेशन में महिलाओं के अधिकारों पर कोई औपचारिक प्रतिबंध नहीं हैं। हालाँकि, सशस्त्र ईसाई, मुस्लिम और हिंदू गुटों के बीच संघर्षों के कारण यह देश लगातार टूट रहा है और यहाँ महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा आम हो गई है। महिलाएँ अपनी सुरक्षा को लेकर लगातार डर के माहौल में जीती हैं। 2075 तक द्रवीडियन कनफ़ेडरेशन में एक सामंती मानसिकता फिर से उभर आई है, जहाँ युद्धरत गुट अक्सर अपने दुश्मनों से बदला लेने के लिए उनकी महिलाओं का अपहरण, बलात्कार या यहाँ तक कि उनकी हत्या तक कर देते हैं।

द्रवीडियन कनफ़ेडरेशन की स्थिति एक Banana Republic जैसी हो गयी है, जहाँ एक शक्तिहीन सरकार लोकतंत्र की झलक बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। हिंसक तख्तापलट तेजी से आम हो गए हैं, जिससे महिलाओं के लिए हमेशा डर का माहौल बना रहता है।

एक चेतावनी भरी कहानी

2075 के विखंडित भारत में महिलाओं की भयावह स्थिति को शायद रोका जा सकता था, अगर कट्टरपंथी पश्चिमी और भारतीय नारीवादियों ने हिंदू धर्म जैसे प्रगतिशील धर्मों में महिलाओं के उत्पीड़न की काल्पनिक कथाएँ बनाने और इस्लाम जैसे अब्राहमिक धर्मों में महिलाओं के उत्पीड़न की मौजूदा कथाओं को महिमामंडित करने और उनकी लीपा पोती करने की इस वोक-इस्लामिक परियोजना में इतनी उत्साहपूर्वक भागीदारी न की होती।

21वीं सदी के शुरुआती दशकों में पश्चिमी दुनिया के पास चेतावनी के पर्याप्त संकेत थे, क्योंकि ब्रिटेन जैसा शक्तिशाली देश इस्लामी शरिया अदालतों के चंगुल में फंस चुका था। 21वीं सदी के शुरुआती हिस्सों में ब्रिटेन में प्रचलित शरिया परिषदों ने ब्रिटिश मुस्लिम महिलाओं के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया, क्योंकि ये एक समानांतर कानूनी व्यवस्था बन गई, जिसके कारण कमज़ोर महिलाएँ अत्याचार के कुचक्र में फंस कर रह गईं।[6] साथ ही, पश्चिम ने यूरोप और अन्य जगहों पर ख़तरनाक रूप से बढ़ती मुस्लिम आबादी पर आँखें मूंद लीं। प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) की रिपोर्ट ने 2017 में भविष्यवाणी की थी कि भविष्य में कोई प्रवास न होने पर भी, यूरोप की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी में वृद्धि होना तय है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे मुख्य रूप से मुस्लिम देशों में संघर्ष-ग्रस्त परिदृश्यों से भागकर शरणार्थियों की रिकॉर्ड आमद ने यूरोप में मुस्लिम आबादी में खतरनाक वृद्धि की है।[7]

भारत में उदारवादी नारीवादियों ने अक्सर इस्लामी समाजों में महिलाओं के सामने आने वाले गंभीर उत्पीड़न को कम करके आंका। जब ईरान की 20 वर्षीय महसा अमिनी, जिसे हिजाब जनादेश की अवहेलना करने के लिए गिरफ्तार किया गया था, की पुलिस की हिरासत में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई, तो दुनिया भर की महिलाओं ने ईरानी शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। परंतु भारत में उदारवादी नारीवादी समूह लगभग चुप रहे। इसी तरह जब भारत सरकार ने 2019 में तीन तलाक की इस्लामी प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया, जो लंबे समय से मुस्लिम महिलाओं के लिए शोषणकारी थी, तो भारतीय उदारवादी नारीवादियों ने इसका अपनी जीत के रूप में सत्कार नहीं किया। इसके बजाय उनमें से कई ने उसी प्रथा का समर्थन किया जो महिला अधिकारों का दमन करती थी। जब 2020 के दशक में अफगानिस्तान में तालिबान शासन के तहत महिलाओं को सार्वजनिक रूप से कोड़े मारे जा रहे थे और उन पर पत्थर फेंके जा रहे थे, उस समय भारतीय उदारवादी नारीवादी रक्षाबंधन और करवाचौथ जैसे हिंदू त्योहारों की आलोचना करने में जूटे हुए थे, और उन्हें पितृसत्तात्मक करार दे रहे थे। अगर ये प्रभावशाली आवाज़ें इस्लामी समाजों में महिलाओं के गहरे उत्पीड़न के खिलाफ़ ज़्यादा जोश से बोलतीं, तो शायद आज स्थिति अलग होती।

2021 में अफ़गानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा और उसके बाद शरिया कानून लागू होना भारत के “वोक” कार्यकर्ताओं के लिए एक चेतावनी होनी चाहिए थी। लेकिन उनकी मूर्खता तब स्पष्ट हुई जब भारतीय मुस्लिम महिलाएँ, जो सालों से बिना हिजाब के आराम से रह रही थीं, अचानक इसे पहनने लगीं और अपने “हिजाब पहनने के अधिकार” को प्रदर्शित करने हेतु रैलियाँ निकालने लगीं। भारतीय नारीवादियों को तब चिंतित होना चाहिए था जब हिजाब, एक दमनकारी परिधान जिसके कारण ईरान में इसके लागू होने का विरोध करने वाले कई लोगों की मौत हो गई थी, को भारत में “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” के प्रतीक के रूप में फिर से पेश किया जा रहा था। लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने कभी ठंडे दिमाग से सोचने की कोशिश नहीं की कि इसका अंजाम क्या हो सकता है।  पचास साल पहले भारतीय नारीवादी आंदोलन ने कट्टरपंथी इस्लामी विचारधाराओं का महिमामंडन किया, जिसमें महिलाओं के हिजाब पहनने के अधिकार पर ज़ोर दिया गया। आज, 2075 के विखंडित भारत में, हिजाब पहनना उनकी एक मजबूरी है, जहां केवल दो ही विकल्प हैं: जीवन पर्यंत क़ैद या मृत्यु।

संदर्भ 

[1] Why it is time to show support with our Muslim sisters in India – Hindus for Human Rights;     https://www.hindusforhumanrights.org/en/blog/why-it-is-time-to-show-support-with-our-muslim-sisters-in-india

[2] Wearing the Hijab in Solidarity – What Do We, as Muslim Women, Think About This?   https://blog.hautehijab.com/post/wearing-the-hijab-in-solidarity

[3]  The Handmaid’s Tale is a Reminder of How Fast Everything Can Change;      https://www.vice.com/en/article/the-handmaids-tale-is-a-reminder-of-how-fast-everything-can-change/

[4] Sharia: The Legalized Oppression of Women Under Medieval Islamic Laws – Hindu Dvesha;    https://stophindudvesha.org/sharia-the-legalized-oppression-of-women-under-medieval-islamic-laws/

[5] Khalistani supporter Canadian poet Rupi Kaur declines White House Diwali invite to protest the pro-Israel stance of the US;  https://hindupost.in/world/khalistani-supporter-canadian-poet-rupi-kaur-declines-white-house-diwali-invite-to-protest-the-pro-israel-stance-of-the-us/

[6] Inside Britain’s Sharia councils: hardline and anti-women – or a dignified way to divorce? | Sharia law |The Guardian; https://www.theguardian.com/law/2017/mar/01/inside-britains-sharia-councils-hardline-and-anti-women-or-a-dignified-way-to-divorce

[7] Muslim Population Growth in Europe | Pew Research Center;    https://www.pewresearch.org/religion/2017/11/29/europes-growing-muslim-population/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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