त्योहार या तमाशा? सेक्युलरता की आड़ में हिंदू त्योहारों का सांस्कृतिक अपहरण

अब भारत में पारंपरिक अनुष्ठानों की जगह छुट्टियाँ, हैशटैग्स और कॉर्पोरेट प्रमोशन ने ले ली है। यह लेख बताता है कि कैसे सेक्युलर सोच और वैश्विक उपभोक्तावाद ने मिलकर हिंदू त्योहारों को पवित्र अनुष्ठानों से बदलकर सिर्फ़ जीवनशैली और मनोरंजन का हिस्सा बना दिया है।
  •  वोक और सेक्युलर सोच ने हिंदू त्योहारों को उनके असली मूल्यों और परंपराओं से दूर करके उनकी सस्ती नकल बना दिया है।
  • ज़रूरत से ज़्यादा बाज़ारीकरण और वोकिज़्म का मिलन हिंदू परंपराओं को कमजोर कर रहा है और समाज की सांस्कृतिक एकता को नुकसान पहुँचा रहा है।
  • अब कई शहरी भारतीय “फेस्टिव सीज़न” की चमक-दमक में खो गए हैं। वे त्योहारों को परिवार के साथ मनाने के बजाय उस समय छुट्टियाँ बिताने के लिए घूमने जाना ज़्यादा पसंद करते हैं।
  • हिंदू समाज को सतर्क रहना होगा, ताकि बाज़ार संस्कृति त्योहारों की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आत्मा को पूरी तरह न निगल ले।
  • जैसे-जैसे पारंपरिक ज्ञान मिटता जा रहा है, वैसे-वैसे अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों का रिकॉर्ड बनाना ज़रूरी हो गया है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से न कटें।

पिछले दस साल भारत के “डी-मैकॉलाईज़ेशन” (De-Macaulization), यानी औपनिवेशिक मानसिकता की बेड़ियों से धीरे-धीरे मुक्त होने के दौर की शुरुआत माने जा सकते हैं। जो भारत एक समय में अंग्रेज़ी और पश्चिमी ज्ञान प्रणालियों के महिमामंडन में लीन था, उसी भारत में अब स्वदेशी ज्ञान परंपराओं, प्राचीन वैदिक संपदा, और सांस्कृतिक परंपराओं को वह मान-सम्मान और पहचान मिल रही है, जिसकी वह वास्तविकता में हक़दार हैं। आज के समय में भारतीय अपने प्राचीन सभ्यतागत और सांस्कृतिक ज्ञान के विशाल भंडार पर गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं। इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण की झलक अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण, प्राचीन तीर्थस्थलों के पुनरुद्धार, धार्मिक पर्यटन की बढ़ती लोकप्रियता, और भारत की विदेश नीति व राष्ट्रीय पहचान में उसकी सभ्यतागत आत्मा के पुनर्स्थापन में साफ दिखाई देती है।

लेकिन इन बड़े बदलावों के बीच भारत का समाज और संस्कृति के लिए कई नयी चुनौतियाँ भी उभर कर आ रही हैं। देश पर वामपंथी और “वोक” विचारधाराओं की जकड़ लगातार मजबूत होती जा रही है, जिसके चलते बहुत से भारतीय अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। 2025 के यह विरोधाभास हमें बहुत कुछ सोचने को विवश करता है। एक तरफ देश एक अप्रत्याशित सभ्यतागत पुनर्जागरण से गुज़र रहा है, लेकिन  दूसरी तरफ एक आम शहरी मध्यमवर्गीय भारतीय के पैरों तले उसकी सांस्कृतिक और सभ्यतागत ज़मीन खिसकती चली जा रही है।

हिंदू त्योहार इस तनाव को सबसे स्पष्ट रूप में प्रतिबिंबित करते हैं। जो त्योहार कभी गहन दार्शनिक ज्ञान और सामूहिक जुड़ाव के प्रतीक थे, वे अब तेज़ी से उपभोक्तावाद के तमाशे में बदलते जा रहे हैं। पूजा-पाठ, धार्मिक परंपराओं और आत्मचिंतन की जगह अब मौज-मस्ती  और दिखावे ने ले ली है। जो तंत्र भारत के पारंपरिक परिधानों को “एथनिक” लेबल कर एक जीवंत विरासत को म्यूजियम में टिकट लेकर देखी जाने वाली वस्तु में बदल कर रख देता है, वही तंत्र अब हिंदू त्योहारों को “ट्रेंडी” या “सेक्युलर” के रूप में पैकेज करता है, और इस बेहूदा प्रस्तुतीकरण में त्योहारों से जुड़ी भावनाएँ और गहरे अर्थ धीरे-धीरे मिटते जा रहे हैं।

परिणाम स्वरूप हमें हिंदू त्योहारों की समृद्ध पारंपरिक और धार्मिक विरासत की बजाय एक रंगबिरंगा उत्सव देखने को मिलता है, जो चकाचौंध से तो भरा है, लेकिन जिसकी आत्मा खोखली है। त्योहारों की यह बढ़ती रिक्तता शहरी भारत की एक ऐसी चिंताजनक प्रवृत्ति को दर्शाती है जो ऊपर से तो बेहद शांत प्रतीत होती है, लेकिन अपने भीतर न जाने कितने ही तूफ़ान समेटे हुए है। अगर सीधे शब्दों में कहें तो भारत का शहरी वर्ग धीरे धीरे सांस्कृतिक विस्मृति की ओर बढ़ रहा है।

यह लेख इसी बढ़ते तनाव का गहराई से विश्लेषण करता है, और यह समझने की कोशिश करता है कि कैसे भारत का सभ्यतागत पुनर्जागरण और मौन सांस्कृतिक पतन साथ-साथ चल रहे हैं।

वोकिज़्म और अंधाधुंध बाज़ारीकरण का गठजोड़

StopHinduvesha अपने पिछले लेखों में इस बात पर विस्तार से चर्चा कर चुका है[1] कि किस तरह वोकिज़्म (wokeism) हिंदू त्योहारों को निशाना बना उन्हें जबरन सेक्युलरिज़्म का जामा पहनाने की कोशिश करता है। दीपावली पर पटाखे जलाने के इर्द गिर्द बुने गए वामपंथी अभियान से लेकर तनिष्क ऐड जैसे विज्ञापनों के[2] परोक्ष हिंदू-विरोधी एजेंडे तक, हिंदू त्योहारों को हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा रहा है। हिंदूफोबिया फैलाने के इस षड्यंत्र में हिंदू त्योहारों का इस्तेमाल एक हिंदू-विरोधी यन्त्र के तौर पर किया जा रहा है, यानी इन त्योहारों का स्वरूप कुछ इस तरह से बदला जा रहा है, जिससे ये अपनी परंपरागत और धार्मिक ज़मीन से पूरी तरह से कट जायें।

हिंदू त्योहारों पर वोकिज़्म के दुष्प्रभाव के अलावा एक और मुद्दा है जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है – त्योहारों का बाज़ारीकरण। वोक विचारधारा और आक्रामक मार्केटिंग संस्कृति का गठजोड़ लोगों को अपनी ही धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से काटने का काम कर रहा है।

आज दीपावली “दिवाली कॉकटेल्स[3] [4] से लेकर “दिवाली पार्टीज़” और “क्लब नाइट्स” तक, हर तरह के कमर्शियल उत्पाद बेचने का बहाना बन चुकी है। ऐसा नहीं है कि कॉकटेल्स या क्लब पार्टियों की मार्केटिंग करना ग़लत है, लेकिन सवाल यह है कि इस तरह के प्रमोशंस में हिंदू त्योहारों को क्यों घसीटा जा रहा है?

होली से लेकर दीवाली तक, हर त्योहार को “ट्रेंडी” और “कूल” बनाकर बाज़ार में उतारा जा रहा है। बाज़ारवाद हिंदू त्योहारों पर इस कदर हावी है कि इनका मूल स्वरूप धीरे धीरे कर लुप्त होता जा रहा है, और अब ये महज़ उपभोक्तावादी संस्कृति के उत्पाद बनके रह गये हैं, जिन्हें बेचने के लिए रोज़ नये नये मार्केटिक तिकड़म लगाये जाते हैं। होली अब पारंपरिक उत्सव से ज़्यादा रेव पार्टीज़ और उन्मादी जश्न का प्रतीक बन गई है, जबकि दीवाली “ethnic glam” कपड़े पहनकर रोशनी में पोज़ कर इंस्टाग्राम फोटोज़ लेने का मौका बन चुकी है।

सच तो ये है कि होली जैसा त्योहार जो हिंदुओं की धार्मिक आस्था से जुड़ा है, अब महज़ एक कार्निवल बनकर रह गया है, और दीपावली, जिस में संपूर्ण हिंदू दर्शन समाहित है, अब एक “नाईट पार्टी” में तब्दील हो चुका है। चिंताजनक बात यह है कि इन त्योहारों को मनाने वाले लोग भी अब धीरे-धीरे परंपराओं और रीति-रिवाजों को छोड़कर केवल “मौज-मस्ती” और “रिलैक्सेशन” के नाम पर त्योहार मनाने लगे हैं।

दीवाली और नवरात्रि पर स्पा ऑफर्स, या रक्षाबंधन को हॉलीडे पैकेज और कपल डिनर बेचने के बहाने में बदल देना, ये सब साफ संकेत दे रहे हैं कि हिंदू त्योहार बड़े ब्रांड्स के लिए केवल मार्केटिंग टूल बन चुके हैं। नतीजतन, हिंदू समाज खुद अपनी परंपराओं से भटक रहा है।

शहरी भारत का वह मध्यमवर्ग, जो हमेशा तथाकथित एलीट क्लास का लाइफस्टाइल कॉपी करने की होड़ में रहता है, और जिसे सालों से “सेक्युलर” सोच में ढाला गया है, अब सोशल मीडिया और विज्ञापनों में दिखाई देने वाली “फील-गुड” तस्वीरों के प्रभाव में आकर अपनी जड़ों से और भी ज़्यादा दूर होता जा रहा है। दीवाली शॉपिंग, राखी डिनर, और लक्ज़री क्लब्स में नवरात्रि डांडिया नाइट्स, हिंदू त्योहारों के नाम पर बेचे जाने वाली इन चमकदार डील्स और पैकेजेज की दुनिया में वह उलझ कर रह गया है। ये चमकदार झलकियाँ ही अब उसकी नई सांस्कृतिक पहचान बन गई हैं।

इंस्टाग्राम पर diwalicelebration हैशटैग के अंतर्गत करीब 15 लाख पोस्ट्स हैं — लेकिन इस कंटेंट में दीवाली के परंपरागत उत्सव या उसके धार्मिक अर्थ की झलक शायद ही कहीं देखने को मिले। Diwalicelebration के नाम पर सिर्फ़ सोशल मीडिया इंफ्ल्युएंसर्स की बेहिसाब पोस्ट्स दिखती हैं, और वह भी अनेक तरह के कमर्शियल उत्पाद प्रमोट करते हुए, जो इस पावन हिंदू त्योहार के नाम पर ज्वैलरी, साड़ी, होम डेकॉर का सामान, से लेकर केक और कुकीज़ तक बेचते दिखाई देते हैं।

इसी तरह, बाज़ारवाद के चलते धीरे-धीरे अब नवरात्रि भी अपना पारंपरिक अर्थ खोता चला जा रहा है। जो उत्सव कभी देवी पूजन, सात्त्विक जीवनशैली और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक था, वह अब नवरात्रि थाली और नवरात्रि मॉकटेल्स[5] जैसे मार्केटिंग ट्रेंड्स तक सिमट कर रह गया है। मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना अब विज्ञापनों और सेल ऑफर्स में बदल गई है — एक ऐसा बदलाव जो न केवल परंपरा को सतही बना रहा है, बल्कि उसकी आत्मा का भी ह्रास कर रहा है।

हिंदू त्योहारों को “सेक्युलर” बना उनकी विविधताओं को मिटा उन्हें एक सपाट रूप में ढालने की कोशिश ने त्योहारों को उनके मूल धार्मिक और सांस्कृतिक सार से बिलकुल अलग-थलग  कर दिया है। जब दीपावली केवल दीये जलाने, डिज़ाइनर गिफ्ट हैंपर बाँटने, और “एथनिक वियर” पहनकर तस्वीरें खिंचवाने तक सिमट जाए, तो उस उत्सव से जुड़ी समृद्ध क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराएँ धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगती हैं।

उदाहरण के तौर पर, उत्तराखंड जैसे पहाड़ी प्रदेश में दीवाली की कई रूप हैं — राज बगवाल (टिहरी ज़िले में), इगास, मंगसीर बगवाल दीवाली, कुमाऊनी दीवाली आदि। हर जगह अपनी अलग-अलग लोककथाएँ, रीति-रिवाज और प्रतीक प्रचलित हैं, जो त्योहार को एक विविध स्थानीय स्वरूप देते हैं। कुमाऊनी दिवाली में घर की बालकनी से गन्ने लटकाए जाते हैं ताकि “देवता उनका उपयोग सीढ़ी के रूप में कर घर में प्रवेश करने हेतु कर सकें।” माँ लक्ष्मी की पूजा में रखे जाने वाले कलशों पर कुमाऊँ, उत्तराखण्ड की पारंपरिक ऐपन कला से डिज़ाइन बनाए जाते हैं — जो इस पर्व को और भी ज़्यादा विशिष्ट बनाते हैं।[6]

इसी तरह, वाराणसी की देव दीपावली अपने आप में अद्वितीय है — यह मुख्य दीपावली के पंद्रह दिन बाद मनाई जाती है। उस दिन गंगा किनारे और घरों में असंख्य दीये जगमगाते हैं, देवी- देवताओं की शोभायात्राएँ निकलती हैं, और पूरा शहर भक्ति संगीत और आतिशबाज़ी से गूंज उठता है। हर मंदिर की अपनी अलग परंपरा और विधि होती है, जिससे इस उत्सव का  गहन धार्मिक अर्थ और भी ज़्यादा प्रबल हो उठता है।[7]

हिंदू त्योहारों की तिथियाँ और परंपराएँ सिर्फ रस्में नहीं हैं, बल्कि ये हमारे पूर्वजों से चली आ रही सांस्कृतिक यादों का प्रतीक हैं। हिंदू धर्म की खासियत उसका लचीलापन है—वह समय के साथ बदलता रहता है, लेकिन अपनी मूल भावना को नहीं खोता। हर क्षेत्र और परिवार की अपनी परंपराएँ होती हैं, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से पहुँचती हैं। जैसे होलिका दहन की विधियाँ हर परिवार में थोड़ी अलग होती हैं, या दीवाली की लक्ष्मी-गणेश पूजा के तरीके हर घर में अलग-अलग होते हैं। यही विविधता और निरंतरता हिंदू जीवन दृष्टि की असली पहचान है।

आज के समय में शहरी मध्यमवर्ग पारंपरिक त्योहारों के बजाय उनके आधुनिक और दिखावटी रूपों को अपनाने लगा है। इसके कारण एक तरह की सांस्कृतिक भूल पैदा हो रही है। अब बहुत कम लोग बचे हैं जो जानते हैं कि इन त्योहारों की परंपराओं का असली अर्थ क्या है। भक्ति से सजावट और भावना से बाज़ार तक का यह बदलाव सिर्फ जीवनशैली का नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक यादों के खोने का संकेत है। अगर यही चलन रहा, तो आने वाली पीढ़ियाँ भारतीय त्योहारों की सांस्कृतिक और सभ्यतागत गहराई से पूरी तरह कट जाएँगी।

जब पारिवारिक पर्व बन जाये विदेशी छुट्टियाँ

हिंदू त्योहारों की विशिष्टता और उनका गहरा सांस्कृतिक अर्थ अब “फेस्टिव सीज़न” की एकरूप सोच में खोते जा रहे हैं। नवरात्रि, दुर्गा पूजा, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहार अब अपने धार्मिक और सभ्यतागत सार से दूर होकर क्रिसमस–न्यू ईयर जैसी वैश्विक उपभोक्तावादी संस्कृति का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जहाँ हर उत्सव बस बिक्री और दिखावे का माध्यम बन गया है। यह बदलाव संयोग नहीं है, बल्कि हिंदू त्योहारों को सेक्युलर बनाकर उनकी आत्मा मिटाने की एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा है। दुख की बात है कि आज का हिंदू समाज बिना सोचे-समझे इस बाज़ारी संस्कृति को अपना रहा है और अपनी परंपराओं से दूर होता जा रहा है।

चिंता की बात यह है कि आज बहुत से हिंदू अब त्योहारों को परिवार के साथ मनाने वाले पारंपरिक अवसर की बजाय छुट्टियाँ मनाने का मौका मानने लगे हैं। दशहरा और दीपावली जैसे त्योहार, जो कभी धर्म और संस्कृति की गहरी अभिव्यक्ति थे, अब “हॉलिडे सीजन” या “लॉन्ग वीकेंड” बनकर रह गए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल फेस्टिव सीज़न में भारतीय यात्रियों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई, जिनमें ज़्यादातर युवा पीढ़ी के लोग हैं। वे अब त्योहारों को परिवार के साथ नहीं, बल्कि solo trips के रूप में मनाना पसंद कर रहे हैं। सबसे लोकप्रिय जगहों में यूएई, वियतनाम, थाईलैंड, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया और जर्मनी रहे — जहाँ जर्मनी के अधिकतर वीज़े बीयर फेस्टिवल Oktoberfest के लिए जारी हुए।रिपोर्ट ने यह भी बताया कि अब त्योहारों में परिवार का एक साथ मिलना कम होता जा रहा है, और उसकी जगह अकेले घूमने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह दर्शाता है कि त्योहार अब हमारी संस्कृति को जीने के अवसर नहीं रहे, बल्कि उससे दूर जाने के बहाने बनते जा रहे हैं।[8]

एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक अब ‘फेस्टिव ब्रेक’ का मतलब बदल गया है। बढ़ती आमदनी, विदेशी संस्कृति का असर और यात्रा के आसान साधनों ने त्योहारों को सिर्फ पूजा या पारिवारिक मिलन का नहीं, बल्कि जश्न और यात्रा का मिश्रण बना दिया है। अब लोग त्योहारों को मनाने के साथ-साथ घूमने-फिरने का भी मौका मानते हैं। [9]

टाइम्स ऑफ इंडिया की 2024 की रिपोर्ट में छपे अमेरिकन एक्सप्रेस सर्वे के अनुसार, भारत में 97% लोगों ने कहा कि वे इस फेस्टिव सीज़न में यात्रा पर जाने की योजना बना रहे हैं। इनमें से 33% लोग पहले ही अपनी यात्राएँ बुक कर चुके हैं। सर्वे में यह भी पाया गया कि 63% लोगों के लिए यात्रा का मुख्य उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन और मौज-मस्ती था।[10]

यह रिपोर्ट जब त्योहारों को “लॉन्ग फेस्टिव वीकेंड कैलेंडर” के रूप में दिखाती है, तो यह हमारे समाज की एक गहरी विडंबना उजागर करती है। भारत का हिंदू समाज अब ऐसा समुदाय बनता जा रहा है जो बहुसंख्यक होते हुए भी अपनी ही सांस्कृतिक पहचान से दूर हो रहा है। जो त्योहार कभी हमारी सभ्यता और एकता का प्रतीक थे, वे अब केवल छुट्टियाँ मनाने का बहाना बन गए हैं। यह सिर्फ जीवनशैली का बदलाव नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना के कमजोर पड़ने की कहानी है। जब लोग घर पर पूजा और परिवार के साथ त्योहार मनाने की बजाय सस्ते विदेशी ट्रिप्स को प्राथमिकता देने लगें, तो यह उस समाज के पतन का संकेत है।

“फेस्टिव सीज़न” जैसी शब्दावली अब एक मार्केटिंग हथकंडा बन चुकी है — जिसे इस तरह से बनाया गया है कि भारत के उपभोक्ताओं को आकर्षित किया जा सके, भले ही इसके कारण हिंदू त्योहारों की धार्मिक भावना और सांस्कृतिक आत्मा खो जाए। जो त्योहार कभी भक्ति भाव से जुड़े हुए धार्मिक और सांस्कृतिक महा उत्सव हुआ करते थे, जो कि परिवार और समुदाय के वृहत अनुभवों से जुड़े हुए थे , वे आज बस एक मार्केटिंग कैटेगरी बन के रह गये हैं, जिनकी लुभावनी पैकेजिंग कर उन्हें बाज़ार में परोसा जाये। यह बदलाव सिर्फ़ त्योहारों के मायने ही नहीं बदल रहा, बल्कि उस भारत की आत्मा को भी मौन रूप से विस्थापित कर रहा है, जो कभी अपने आँगन में दीपों की रोशनी से जगमगाता था।

आज के दौर में “ग्लोबल सिटिजनशिप” की अवधारणा यानी वैश्विक नागरिक होने की परिकल्पना एक बेहद चर्चित विचार बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, “ग्लोबल सिटिजनशिप” उस विशाल छतरी की तरह है, जिसकी छाया तले वे सभी सामाजिक, राजनीतिक, पर्यावरणीय और आर्थिक ऐक्शंस आते हैं जो वैश्विक सोच रखने वाले व्यक्तियों और समुदायों के क्रियाकलापों को दर्शाते हैं।[11]

कई लोगों का मानना है कि त्योहारों के मौसम में भारतीयों में अन्य संस्कृतियों को जानने और अनुभव करने की बढ़ती इच्छा ग्लोबल सिटीज़नशिप के इसी आदर्श को दर्शाती है। लेकिन वैश्विक नागरिक बनने की किसी को इतनी भारी क़ीमत चुकानी पड़े कि उसे अपनी सांस्कृतिक धरोहर और स्थानीय ज्ञान परंपराओं को जड़ से नष्ट करना पड़े, यह भला कहाँ से न्यायसंगत जान पड़ता है।

आज की वैश्विक व्यवस्था, जहाँ पश्चिमी प्रभुत्व और अब्राहमिक विचारधारा का दबदबा है, उसमें हिंदुओं के लिए ग्लोबल सिटिजन बनना अपनी सांस्कृतिक और सभ्यतागत जड़ों से लगभग कट जाने के बराबर है। जब वोक विचारधारा और आधुनिकता मिलकर “ग्लोबल सिटिजनशिप” यानी वैश्विक नागरिकता की सोच को बढ़ावा देती हैं, तो इसका असर उन संस्कृतियों पर सबसे ज़्यादा पड़ता है जो पहले ही कमजोर या लुप्त होने की स्थिति में हैं। यह सोच उनके पारंपरिक विश्वास, जीवनशैली और पहचान को और तेजी से मिटा देती है।

हिंदुओं के साथ इस समय कुछ ऐसा ही हो रहा है, परन्तु हिन्दू समाज उसे देख नहीं पा रहा है।

उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में परंपराओं की पहरेदारी

त्योहारों का बाज़ारीकरण आज के समय की कड़वी सच्चाई है, जिसे पूरी तरह से खत्म करना शायद संभव नहीं। लेकिन यदि हिंदू समाज चाहे तो इस प्रवृत्ति को अपने पक्ष में मोड़ सकता है, बशर्ते वह यह सुनिश्चित करे कि यह व्यावसायिकता हमारी सांस्कृतिक परंपराओं और मूल्यों के सार को निगल न जाए।

नीचे कुछ सुझाव दिए गए हैं जिनके माध्यम से हिंदू समुदाय वोकिज़्म और छद्म-सेक्युलरिज़्म की बढ़ती लहर जो भारत की सभ्यतागत जड़ों को कमजोर कर रही है, का मुकाबला कर सकता है:

  • मंदिर तंत्र का पुनरुद्धार: प्रसिद्ध लेखक स्टीफन नैप (Stephen Knapp) ने आधुनिक समय में वैदिक संस्कृति के प्रचार पर कई लेख लिखे हैं। उनका मानना है कि मंदिरों को सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि वैदिक ज्ञान के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि मंदिरों में ऐसी कक्षाएँ चलनी चाहिए जहाँ लोग हिंदू धर्म और सनातन परंपराओं की शिक्षा ले सकें। नैप का सुझाव है कि वयस्कों के लिए नियमित कक्षाएँ आयोजित की जाएँ, ताकि वे अपनी परंपराओं और अनुष्ठानों को गहराई से समझ सकें, न कि केवल उन्हें निभाएँ।[12]

अगर स्थानीय मंदिरों को इस तरह से फिर से जीवंत किया जाए, तो हिंदू त्योहारों के बढ़ते बाज़ारीकरण से हुआ नुकसान काफी हद तक सुधर सकता है। मंदिरों को दोबारा ऐसे सामाजिक और धार्मिक केंद्रों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जहाँ त्योहार सिर्फ़ रस्में न होकर सामूहिक भक्ति, आनंद और एकता का प्रतीक बनें।

ऐसे सार्वजनिक आयोजन उन लोगों को भी हिंदू त्योहारों से जोड़ सकते हैं जो घर पर पूजा नहीं कर पाते या परंपराओं को ठीक से नहीं जानते। आने वाली पीढ़ियों को पारंपरिक तरीके से त्योहार मनाना सिखाने के लिए अभी से इस सांस्कृतिक और धार्मिक आंदोलन की नींव रखना ज़रूरी है। क्योंकि जैसे-जैसे हिंदू समाज अपनी संस्कृति से दूर होता जा रहा है, यह खतरा बढ़ रहा है कि अगली पीढ़ियाँ अपने त्योहारों की परंपराओं से बिल्कुल अनजान रह जाएँ। इसलिए मंदिरों को केवल पूजा के स्थान न मानकर, उन्हें हिंदू समाज की सांस्कृतिक और सभ्यतागत चेतना के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

मंदिरों को युवाओं को आकर्षित करने के लिए रचनात्मक और दिलचस्प तरीके अपनाने चाहिए — जैसे इंटरैक्टिव प्रोग्राम, भजन संध्या, कहानी सुनाने के सत्र और बच्चों के लिए वर्कशॉप्स — ताकि परंपरा आधुनिक रूप में भी जीवित और प्रासंगिक बनी रहे।

  • मीडिया पर कड़ी नज़र: हिंदू समुदाय को एक अनौपचारिक प्रहरी (informal ombudsman) की तरह काम करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि मीडिया और लोकप्रिय संस्कृति में हिंदू त्योहारों और परंपराओं को सम्मानपूर्वक दिखाया जाए। आज सोशल मीडिया इस काम का एक मज़बूत माध्यम बन गया है। हाल के वर्षों में कई लोगों ने विज्ञापनों और मनोरंजन जगत में दिखाई देने वाली हिंदू-विरोधी सामग्री का खुलकर विरोध किया है। कई बार इस सामूहिक विरोध के कारण बड़ी कंपनियों को अपने विवादास्पद अभियान वापस लेने पड़े हैं। इसका एक उदाहरण अक्टूबर 2020 का तनिष्क विज्ञापन है। दिवाली के समय जारी इस विज्ञापन में एक मुस्लिम सास अपनी हिंदू बहू के लिए गोदभराई रस्म आयोजित करती दिखी थी। कई हिंदुओं ने इसे “लव जिहाद” के महिमामंडन के रूप में देखा और इसका विरोध किया। बढ़ते आक्रोश के बाद तनिष्क को यह विज्ञापन हटाना पड़ा।[13]
  • परंपरा को फिर से जीवंत करने के लिए नवाचारपूर्ण मार्केटिंग: अब समाज को यह समझना होगा कि परंपरा को बचाने के लिए सिर्फ़ उपदेश देना काफी नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को आकर्षित करने के लिए त्योहारों को रोचक और आधुनिक तरीके से पेश करना भी ज़रूरी है। अगर आधुनिक मार्केटिंग और रचनात्मक तरीकों का उपयोग किया जाए, तो हिंदू त्योहारों के पारंपरिक पहलुओं को इस तरह दिखाया जा सकता है कि लोग उन्हें गर्व और आनंद से मनाएँ। जैसे, नवरात्रि के समय स्कूलों या कैफ़े में देवी-थीम वाले क्विज़ कराए जा सकते हैं, दशहरा और दिवाली पर रामायण से जुड़ी नाट्य प्रस्तुतियाँ आयोजित की जा सकती हैं, और बच्चों के लिए दीया बनाने की वर्कशॉप रखी जा सकती है। आज के सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। वे मज़ेदार और शिक्षाप्रद कंटेंट बनाकर लोगों को होली, दिवाली, दशहरा और रक्षाबंधन जैसे त्योहारों की परंपराओं, अनुष्ठानों और उनके मूल अर्थ से जोड़ सकते हैं।

प्रज्ञता (Pragyata) में छपे एक लेख[14] ने इसका अच्छा उदाहरण दिया है। लेख में बताया गया कि सोशल मीडिया पर छठ पूजा से जुड़े वीडियोज़ ने कैसे छठी मइया को समर्पित भक्ति गीतों के ज़रिए उस अनुष्ठान की गहराई और भावना को सुंदर ढंग से दिखाया। लेखक ने लिखा—“साधारण ऑनलाइन कंटेंट के बीच, छठी मइया के भजन और गीतों पर बने ये वीडियो ताज़ी हवा के झोंके जैसे हैं।”

  • हिंदू एक्टिविज्म: हिंदू समुदाय को यह समझना चाहिए कि सिर्फ़ भावनात्मक जुड़ाव पर्याप्त नहीं है। त्योहारों की पवित्रता और गरिमा की रक्षा के लिए संगठित प्रयास ज़रूरी हैं। समाज को एकजुट होकर सरकार पर यह दबाव बनाना चाहिए कि वह ऐसे ठोस कदम और नियम बनाए, जो हिंदू त्योहारों के गलत चित्रण या दुरुपयोग को रोक सकें। पिछले कुछ वर्षों में गरबा-डांडिया कार्यक्रमों में “लव जिहाद” के खतरे को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने 2025 की नवरात्रि से पहले महाराष्ट्र में एक एडवाइजरी जारी की। इसमें आयोजकों से कहा गया कि वे इन कार्यक्रमों में गैर-हिंदुओं की भागीदारी सीमित करें, क्योंकि गरबा और डांडिया सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि देवी की उपासना के रूप हैं। हर आयोजन की शुरुआत देवी को अर्पण से होती है, इसलिए यह मूल रूप से एक पवित्र धार्मिक अनुष्ठान है, न कि किसी बाहरी दर्शक के मनोरंजन का मंच।[15]

हिंदू समुदाय में सेक्युलरिज़्म को लेकर कई गलतफहमियाँ हैं, जिनके कारण हमारे त्योहार अक्सर हिंदू-विरोधी प्रचार का निशाना बन जाते हैं। सेक्युलरिज़्म का मतलब यह नहीं है कि कोई समुदाय अपनी धार्मिक परंपराओं में बाहरी लोगों को शामिल करे। लेकिन हिंदुओं की अतिशय “सेक्युलर सहिष्णुता” के चलते कई बार उनके त्योहार ही हिंदू-विरोधी बहसों का केंद्र बन जाते हैं। जब तक पूरा समुदाय संगठित होकर अपनी आवाज़ नहीं उठाएगा और अपने सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाएगा, तब तक हिंदू त्योहारों पर इस तरह के विरोधी विमर्शों का खतरा बना रहेगा।

  • हिंदू अरबपतियों की भूमिका: कई हिंदू अरबपति पहले से ही त्योहारों और धार्मिक आयोजनों को सहयोग देते हैं, लेकिन अब उन्हें अपनी भूमिका को और समझदारी से निभाना होगा। उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका पैसा अनजाने में ऐसे “समावेशी” या “सेक्युलर” अभियानों में न जाए, जो वास्तव में हिंदू-विरोधी विचारों को बढ़ावा देते हैं। अगर वे यह देखें कि उनका धन किस तरह इस्तेमाल हो रहा है, और उसे ऐसे प्रोजेक्ट्स की ओर मोड़ें जो हिंदू परंपराओं के अध्ययन, शिक्षा और जन-जागरूकता को बढ़ाएँ, तो वे त्योहारों की मौलिकता और हिंदू धर्म की आत्मा की रक्षा में बड़ा योगदान दे सकते हैं। शैक्षणिक पहलों, मंदिर-आधारित आयोजनों और पारंपरिक मूल्यों पर आधारित मीडिया कंटेंट को समर्थन देना भारत की सभ्यतागत निरंतरता बनाए रखने की दिशा में एक ठोस और दीर्घकालिक कदम हो सकता है।
  • परंपराओं और अनुष्ठानों का दस्तावेज़ीकरण: हमारे त्योहारों, परंपराओं और अनुष्ठानों की परंपरा अब तक मौखिक रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रही है। लोग अपने घर के बड़ों से रीति-रिवाज सीखते थे, और यही ज्ञान आगे चलता रहता था। लेकिन अब यह मौखिक परंपरा तेजी से कमजोर हो रही है, और इसे आधुनिक माध्यमों में ठीक से दर्ज भी नहीं किया गया है। मंदिरों के पुजारी और पंडित सदियों से इस धार्मिक ज्ञान के संरक्षक रहे हैं, लेकिन ब्राह्मण-विरोधी सोच और पंडिताई के पेशे के घटते सम्मान के कारण उनकी स्थिति बहुत कठिन हो गई है। जैसे-जैसे यह पेशा कम होता जा रहा है, वैसे-वैसे हमारे धार्मिक अनुष्ठानों की जीवित स्मृति भी मिटती जा रही है। इसलिए अब ज़रूरत है कि इन परंपराओं का व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण किया जाए। त्योहारों, प्रार्थनाओं और अनुष्ठानों को किताबों, फिल्मों, डिजिटल आर्काइव्स और शैक्षणिक अभियानों के ज़रिए इस तरह दर्ज किया जाए कि नई पीढ़ी उनसे जुड़ाव महसूस करे। तभी आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों से न सिर्फ भावनात्मक रूप से, बल्कि ज्ञान और समझ के स्तर पर भी जुड़ी रह सकेंगी।
समापन

आज हिंदू धर्म उन कुछ परंपराओं में से एक है जो अब्राहमिक प्रभाव से बचे रहकर भी जीवित हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि हिंदू समाज धीरे-धीरे अपने त्योहारों की धार्मिक भावना से दूर होता जा रहा है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में हम सांस्कृतिक विस्मृति के शिकार हो सकते हैं — जहाँ हमें न अपनी परंपराओं का अर्थ याद रहेगा, न अपनी सभ्यता की वह निरंतरता जो हमें हजारों वर्षों से जोड़ती आई है।

इसलिए अब ज़रूरत है जागरूकता और पुनर्जागरण की, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ हिंदू धर्म को सिर्फ किताबों में न पढ़ें, बल्कि अपने जीवन में उसे जी सकें।

सन्दर्भ सूची

[1] Hindu Identity Under Siege: global Assault on Festivals & Temples; https://stophindudvesha.org/hindu-festivals-and-temples-under-siege-a-systemic-global-assault-on-hindu-identity/

[2] Ad controversy: After internet backlash, Tanishq pulls plug on latest ad – the controversy around ‘Ekatvam’, explained | India News; https://www.timesnownews.com/india/article/after-internet-backlash-tanishq-pulls-plug-on-latest-ad-the-controversy-around-ekatvam-explained/666883

[3] 11 two-minute cocktail recipes for your Diwali party, according to bartenders and experts | GQ India;   https://www.gqindia.com/content/10-two-minute-cocktail-recipes-for-your-diwali-party-according-to-bartenders-and-experts

[4] Make Diwali All About These 7 Desi Cocktails | magicpin blog;  https://magicpin.in/blog/best-desi-cocktails/?srsltid=AfmBOoovT4QtpBLn-IscgtrbLJf9EPXsu6QECqvZx8gM-TNliPL8R8VD

[5] fizzibomb on Instagram; https://www.instagram.com/p/DPJ2XRpElT1/

[6] Tradition of Bagwal Festival in U’khand | Garhwal Post;  https://garhwalpost.in/tradition-of-bagwal-festival-in-ukhand/

[7] Dev Deepawali | Kashmi Official Web portal; https://kashi.gov.in/event/dev-deepawali

[8] More Indians travel solo this festive season, Atlys data shows – The Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/more-indians-travel-solo-this-festive-season-atlys-data-shows/articleshow/124370134.cms

[9] Festive Holiday Travel Trends: How Indians Are Redefining Their Vacation Plans | Travel News – News18; https://www.news18.com/lifestyle/travel/festive-holiday-travel-trends-how-indians-are-redefining-their-vacation-plans-9532265.html

[10] Indians Favor Domestic Travel This Festive Season with Broader Trends Revealed | – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/travel/indians-favor-domestic-travel-this-festive-season-with-broader-trends-revealed/articleshow/114727314.cms

[11] Global Citizenship | United Nations;  https://www.un.org/en/academic-impact/global-citizenship

[12] Without Promotion Vedic Culture Cannot be Protected;  https://www.stephen-knapp.com/without_promotion_vedic_culture_cannot_be_protected.htm

[13] Tanishq Ad Pulled Amid Trolling; Boycott Call Divides Internet; https://www.ndtv.com/india-news/after-boycotttanishq-trend-shashi-tharoor-asks-why-dont-they-boycott-india-2309248

[14] Bharat’s Festivals: A Celebration of Timeless Devotion; https://pragyata.com/bharats-festivals-a-celebration-of-timeless-devotion/

[15] Don’t allow non-Hindus at garba-dandiya during Navratri festivals in Maharashtra: VHP | Mumbai News – The Indian express; https://indianexpress.com/article/cities/mumbai/dont-allow-non-hindus-at-garba-dandiya-navratri-festivals-maharashtra-vhp-10261252/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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