सभ्यतागत अगुवा के रूप में Gen Z: संस्कृति, आस्था और पहचान की वापसी

मंदिर पर्यटन और भजन क्लबिंग से लेकर कैंपस राजनीति और डिजिटल आख्यानों तक—भारत की Gen Z आयातित ‘वोक’ नैरेटिव्स को एक-एक कर ढहाते हुए धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय निरंतरता में निहित सभ्यतागत आत्मविश्वास को पुनः मजबूती से स्थापित कर रही है।
  •  जहाँ ग्लोबल साउथ के कई हिस्सों में Gen Z को अशांति व अराजकता भड़काने के लिए तैयार किया जा रहा है, वहीं भारत का युवा वर्ग बिलकुल विपरीत दिशा में आगे बढ़ रहा हैअराजकता और वैचारिक विघटन को साफ़ तौर पर नकारते हुए।
  • भारत की Gen Z मंदिर पर्यटन, तीर्थयात्रा, भजन क्लबिंग, और आध्यात्मिक यात्राओं के ज़रिए धार्मिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण की अगुवाई कर रही है।
  • पश्चिमी उदारवादी और भोगवादी जीवन-शैलियों से दूरी बनाकर Gen Z युवा संस्कृति को नए सिरे से गढ़ रही हैशराब-मुक्त, आस्था-संगत सामाजिक और सांस्कृतिक रूपों को अपनाते हुए।
  • कैम्पसों और सांस्कृतिक स्थलों में लंबे समय से चला आ रहा वाम-उदारवादी वर्चस्व अब धीरे-धीरे कर नष्ट हो रहा है, क्योंकि Gen Z चरम-वामपंथी नैरेटिव्स को चुनौती दे रही है, और सोशल मीडिया के ज़रिए स्वघोषित वैचारिक निरीक्षकों को बायपास कर रही है।
  • औपनिवेशिक और मैकालेवादी ढाँचों को ठुकराकर भारत की Gen Z धर्म और सांस्कृतिक निरंतरता पर आधारित एक व्यापक सभ्यतागत पुनर्जागरण को आगे बढ़ा रही है।

“वोक” राजनीति के इस दौर में एक नया नैरेटिव फ्रेम धीरे-धीरे आकार ले रहा है। Gen Z को लगातार भड़काया जा रहा है ताकि वह अराजकता फैलाने और सत्ता परिवर्तन का औज़ार बन जाए। विश्व भर के जिस युवा वर्ग को कभी जनसांख्यिकीय क्षमता के दृष्टिकोण से देखा जाता था, केवल एक दशक के भीतर, वह वैचारिक टकरावों और बड़े-बड़े भूराजनीतिक षड्यंत्रों के खेल में मात्र एक मोहरा बन कर रह गया है।

ग्लोबल साउथ आज ‘वोक’ तंत्र की Gen Z टूलकिट की मुख्य प्रयोगशाला बन चुका है। नेपाल और बांग्लादेश से लेकर मेडागास्कर और केन्या तक, “क्रांति” के नाम पर Gen Z को आगे किया जा रहा है—एक ऐसा जुमला, जो अराजकता को वैचारिक सम्मान दे देता है।

लेकिन भारत का युवा अपनी कहानी कुछ अलग ढंग से लिख रहा है। पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग जहाँ लगातार भारतीय युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए उकसाता रहता है, वहीं भारत की Gen Z मंदिर पर्यटन को पुनर्जीवित करने, नए सांस्कृतिक प्रयोगों के ज़रिए अपनी धार्मिक जड़ों से पुनः जुड़ने, और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स के माध्यम से अपनी सभ्यतागत कहानी कहने में ज़्यादा रुचि दिखा रही है। अगर इस लिहाज़ से देखें तो भारत के संदर्भ में वोक तंत्र की Gen Z स्क्रिप्ट ज़रा भी फिट नहीं बैठ रही।

आगे के खंडों में यह विश्लेषण किया गया है कि किस तरह भारत की Gen Z देश के धार्मिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत पुनरुत्थान की अगुवाई कर रही है, और साथ-साथ भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों पर वामपंथी नैरेटिव्स के शिकंजे को कमजोर कर रही है।

भारत का युवा वर्ग और धार्मिक पर्यटन का उभार

अयोध्या राम मंदिर के उद्घाटन के बाद भारत में मंदिर पर्यटन में किस प्रकार से अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिली, इसकी विस्तृत कवरेज StopHindudvesha पहले ही कर चुका है।  इसके बाद के समय में मनाये गए नव वर्ष के उत्सवों का यदि सूक्ष्म निरीक्षण करें, तो हम पायेंगे कि एक आम भारतीय के सार्वजनिक व्यवहार में एक स्पष्ट बदलाव दिखाई दिया। कई लोगों ने पारंपरिक पश्चिमी शैली की न्यू ईयर पार्टियों से दूरी बनाते हुए मंदिर दर्शन और धार्मिक तीर्थयात्राओं को प्राथमिकता दी। इस बदलाव का असर पूरे देश में दिखा, जहाँ अयोध्या राम मंदिर, पुरी के जगन्नाथ मंदिर और दिल्ली के अक्षरधाम जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। अकेले अयोध्या राम मंदिर में ही दो लाख से ज़्यादा श्रद्धालु पहुंचे, जिनमें से बड़ी संख्या उन लोगों की थी, जो साल की पहली आरती के दर्शन के लिए घंटों कतार में खड़े रहे[1]

2026 के स्वागत के साथ ही धार्मिक पर्यटन की यह लहर और तेज़ हुई—ख़ासकर Gen Z के बीच। पश्चिमी अंदाज़ की न्यू ईयर शराब पार्टियों से दूरी बनाते हुए, बड़ी संख्या में युवा भारतीयों ने नए साल की शुरुआत मंदिर दर्शन और पूजा-अर्चना के साथ करना चुना।

भास्कर इंग्लिश की एक रिपोर्ट के अनुसार[2], नववर्ष 2026 के पहले ही दिन क़रीब 25 लाख श्रद्धालु अयोध्या, काशी और मथुरा पहुँचे, जिनमें सबसे बड़ा हिस्सा Gen Z का था। उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य के पर्यटन विभाग के आँकड़े भी बताते हैं कि 2026 के स्वागत के लिए काशी पहुँचने वाले युवाओं की संख्या पहले से कहीं अधिक रही। युवाओं ने गंगा घाटों पर समय बिताया, काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन किया, और अपने अनुभवों को सोशल मीडिया पर साझा किया[3]

भारत में आध्यात्मिक पर्यटन में आई हालिया बढ़ोतरी में Gen Z की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अयोध्या राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्विकास, और मंदिरों व अन्य हिंदू तीर्थस्थलों की बढ़ती मीडिया मौजूदगी—इन सभी कारणों ने युवाओं के बीच धार्मिक पर्यटन के प्रति रुचि को नई ऊर्जा दी है।

भारत की Gen Z आध्यात्मिक पर्यटन की परिभाषा को भी नए सिरे से गढ़ रही है—समकालीन युवा संवेदनाओं के अनुरूप उसे नए रूप में प्रस्तुत करते हुए, लेकिन तीर्थस्थलों की धार्मिक मर्यादा और सनातनी प्रकृति का सम्मान बनाए रखते हुए। युवा यात्री अब धार्मिक पर्यटन को लेज़र और वेलनेस ट्रैवल के साथ-साथ एडवेंचर टूरिज़्म से भी जोड़ रहे हैं। इसी मांग को देखते हुए ट्रैवल कंपनियाँ ऐसे पैकेज पेश कर रही हैं, जिनमें पारंपरिक मंदिर दर्शन के साथ योग रिट्रीट्स, चुने हुए भोजन अनुभव, और रिवर राफ्टिंग व बंजी जंपिंग जैसी आउटडोर गतिविधियाँ भी शामिल हैं। ऋषिकेश, बोधगया और केदारनाथ जैसे गंतव्य Gen Z के लिए खास तौर पर आकर्षक बनकर उभरे हैं, जहाँ मंदिर दर्शन के साथ प्रकृति भ्रमण, ध्यान सत्र, ट्रेकिंग और योग रिट्रीट्स को सहज रूप से जोड़ा जा सकता है।[4]

यात्रा रुझानों के विश्लेषण बताते हैं कि आज भारत में घरेलू पर्यटन का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आध्यात्मिक पर्यटन से जुड़ा है। यह क्षेत्र 16.2 प्रतिशत की वार्षिक दर (CAGR) से बढ़ रहा है, जिसमें Gen Z एक प्रमुख प्रेरक शक्ति के रूप में उभर रही है। कुल बुकिंग्स में Gen Z की हिस्सेदारी लगभग 12 प्रतिशत है, और इसमें साल-दर-साल 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। एक साफ़ पैटर्न सामने आ रहा है— Gen Z अब परिवार के साथ अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज, हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे धार्मिक स्थलों की यात्रा ज़्यादा कर रही है। जहाँ शहरी Gen Z धार्मिक पर्यटन की समग्र वृद्धि को आगे बढ़ा रही है, वहीं ग्रामीण Gen Z भी स्थानीय सेवाओं, होमस्टे मॉडल्स, और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएशन के ज़रिए उद्यमशील भूमिकाओं में कदम रख रही है[5]

लंबे समय तक भारत के युवाओं को औपनिवेशिक चश्मे से देखा जाता रहा है। उन्हें अक्सर या तो पूरी तरह पश्चिमी संस्कृति में डूबा हुआ दिखाया गया, या केवल पश्चिमी मूल्यों और आदर्शों को अपनाने हेतु अति आतुर के रूप में चित्रित किया गया। भारत के युवा वर्ग की आकांक्षाओं को आम तौर पर अंग्रेज़ी भाषा, पश्चिमी सिनेमा, संगीत, फैशन, लाइफस्टाइल, और संस्कृति के प्रति आकर्षण के लेंस से चित्रित किया जाता रहा है। लेकिन अब Gen Z इन धारणाओं को खुलकर चुनौती दे रही है। आधुनिकता की भाषा में पारंगत भारतीय युवा अब पश्चिम के प्रति अति आकर्षण के इस मिथक को तोड़ते हुए, आधुनिकता के साथ अपनी शर्तों पर सामंजस्य स्थापित कर रहे हैं—और साथ ही नित नवीन, गतिशील व रचनात्मक तरीक़ों के माध्यम से अपनी धार्मिक व सभ्यतागत जड़ों से पुनः जुड़ रहे हैं।

भजन क्लबिंग और भारत की Gen Z का सांस्कृतिक मोड़

जब millennials अपने 20s में थे, तब युवा संस्कृति का मतलब अक्सर पश्चिमी ढर्रे की पार्टियों में शामिल होना होता था—तेज़ शोर वाला संगीत, देर रात तक चलने वाले क्लब, या बॉलीवुड डिस्को बीट्स पर थिरकती भीड़। युवावस्था में अच्छा समय बिताने और मनोरंजन की परिभाषा बार और क्लबों में समय व्यतीत करने, व धूम्रपान और शराब के इस्तेमाल से जुड़ी था। यह मनोरंजन का एक ऐसा मॉडल था, जो खुले भोगवाद और पश्चिमी संस्कृति के अंधाधुंध अनुसरण पर टिका हुआ था।

पश्चिमी मीडिया द्वारा प्रकाशित ऐसे लेख, जो अक्सर भारत की “पितृसत्तात्मक संस्कृति” और यहाँ के “रूढ़िवादी समाज” की आलोचना करते नहीं थकते, आज भी परंपरा बनाम आधुनिकता के एक बेहद सरलीकृत विभाजन के विमर्श में अटके हुए हैं। पश्चिमी संस्कृति की श्रेष्ठता की धारणाओं और औपनिवेशिक सोच के मिथकों की लेंस से गढ़े गए ये नैरेटिव्स भारतीय समाज को इसलिए रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक ठहराते हैं, क्योंकि यहाँ नैतिक सीमाओं पर ज़ोर दिया जाता है—जैसे देर रात की शराब पार्टियों का विरोध, विवाह-पूर्व संबंधों और लिव-इन रिश्तों को लेकर संकोच, और पारंपरिक हिंदू पर्वों को महत्व देना। लेकिन Gen Z अब इस आधुनिक समय के अत्याचार साहित्य को सिरे से पलट रही है। भारत की Gen Z धार्मिक मूल्यों और समकालीन संवेदनाओं को सहज रूप से जोड़ने वाले नए सांस्कृतिक रूपों को अब खुलकर अपना रही है।

इसी बदलाव का एक सशक्त उदाहरण है भजन क्लबिंग, जो हाल के महीनों में Gen Z के बीच तेज़ी से लोकप्रिय हुई है। युवा भारतीय अब शराब पार्टियों से हटकर लाइव म्यूज़िक और जैमिंग सेशंस की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ पारंपरिक भजनों को इलेक्ट्रॉनिक बीट्स और गिटार के साथ नए अंदाज़ में प्रस्तुत किया जाता है। रॉक कॉन्सर्ट जैसा माहौल रचने वाले ये आयोजन उन युवाओं को बड़ी संख्या में आकर्षित कर रहे हैं, जो आधुनिक, ऊर्जावान और सहभागितापूर्ण तरीक़ों से अपनी धार्मिक जड़ों से जुड़ना चाहते हैं।

इस तरह भजन क्लबिंग को भारत की Gen Z की नई पार्टी संस्कृति कहा जा सकता है। शराब-केंद्रित मनोरंजन के पुराने घिसे-पिटे ढाँचों से अलग, ये कॉन्सर्ट्स इमर्सिव म्यूज़िक, मद्धम रोशनी और सामूहिक नृत्य के ज़रिए एक आधुनिक क्लब जैसा माहौल रचते हैं—बस फर्क इतना है कि यहाँ प्लेलिस्ट में भजन और मंत्र होते हैं।[6] “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी” और “राम राम जय राजा राम, राम राम जय सीता राम” जैसे लोकप्रिय भजनों पर आधारित परस्पर संवादात्मक जैमिंग सेशंस से लेकर मंत्रों और भक्ति-संगीत पर केंद्रित औपचारिक कार्यक्रमों तक, भजन क्लबिंग कई रूपों में सामने आ रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भजन क्लबिंग की बढ़ती लोकप्रियता भारतीय युवा वर्ग के तेज़ी से बदलते मानसिक परिवेश को दर्शाती है। देश का युवा वर्ग अब नववर्ष जैसे अवसरों को घिसी पिटी शराब और सिगरेट वाली पश्चिमी स्टाइल पार्टीज़ के बजाय ऐसे आयोजनों के माध्यम से मनाना चाहता है, जो आध्यात्मिक संस्कृति को आधुनिक परिवेश में पुनर्जीवित करते हों। Gen Z अब नया साल कुछ ऐसे रोचक और विशुद्ध भारतीय अंदाज़ में मनाना चाहती है, जहाँ पारंपरिक कीर्तन के स्वरूप को एक समकालीन मंच पर नए सिरे से रचा जाये। इन आयोजनों में शराब का सेवन पूरी तरह से वर्जित होता है।

दिल्ली और मुंबई से लेकर बेंगलुरु और पुणे तक, कैफ़ेज और ऑडिटोरियम में आयोजित भजन क्लबिंग नाइट्स आज Gen Z के बीच बेहद लोकप्रिय हो चुकी हैं। एक युवा-नेतृत्व वाले सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में उभरती भजन क्लबिंग व्यापक धार्मिक पुनर्जागरण में अपना योगदान दे रही है। अब यह प्रोफेशनल, टिकटेड कॉन्सर्ट्स के दायरे में भी प्रवेश कर चुकी है, जहाँ युवा दर्शक इन आयोजनों में शामिल होने के लिए अच्छी-खासी राशि चुकाने को तैयार हैं। गूगल ट्रेंड्स के आँकड़े इस बदलाव की पुष्टि करते हैं—2024 की शुरुआत से “मॉडर्न कीर्तन”, “भजन क्लबिंग” और “सोबर रेव इंडिया” जैसे शब्दों की सर्च में 400 से 600 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। भजन क्लबिंग को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाने वाली भाई-बहन की जोड़ी, प्राची और राघव अग्रवाल, ने शुरुआत छोटी-छोटी लिविंग रूम बैठकों से की थी। महज़ एक साल के भीतर, वे मुंबई में एक ही कॉन्सर्ट के लिए 1,500 से ज़्यादा टिकट बेचने लगे[7]

एक दशक पहले तक इस बात की कल्पना करना भी मुश्किल था कि युवा भारतीय नए साल का स्वागत शराब-मुक्त धार्मिक संगीत सभाओं के ज़रिए करेंगे। लेकिन बीते दस वर्षों में आए गहरे दृष्टिकोणात्मक बदलाव—जिसने भारत की आंतरिक आत्मछवि को बदला और सभ्यतागत चेतना के नए आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने उसकी प्रस्तुति को नया रूप दिया—ने इस परिवर्तन को संभव बनाया है। यह बदलाव परस्पर पोषक रहा है: जहाँ भारत के धार्मिक पुनरुत्थान ने Gen Z के मूल्यों और पसंद को आकार दिया, वहीं Gen Z ने स्वयं इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण को आगे बढ़ाने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।

पिछले कुछ वर्षों में युवाओं द्वारा रचे गए डिजिटल कंटेंट की बढ़ती लोकप्रियता—जो भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य का उत्सव मनाता है, उसके प्राचीन इतिहास को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करता है, और धार्मिक चेतना को केंद्र में रखता है—ने इस उभरती युवा संस्कृति को और ज़्यादा गहराई दी है। भजन क्लबिंग जैसे हाइब्रिड सांस्कृतिक रूपों को इसी डिजिटल तंत्र से ताक़त मिली है। इसी तरह इस्कॉन के युवा आयोजनों में होने वाले कीर्तन और आर्ट ऑफ़ लिविंग (Art of Living) के ध्यान सत्रों को भी सोशल मीडिया पर व्यापक दृश्यता मिली है।

अयोध्या राम मंदिर का निर्माण और उद्घाटन भारत की सभ्यतागत कथा में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर धार्मिक कंटेंट के उभार को भी तेज़ किया, जिसे आकार देने में Gen Z ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। युवा धार्मिक इन्फ्लुएंसर्स अब संगीत, कैप्शन और विज़ुअल स्टोरीटेलिंग के अद्वितीय समन्वय के माध्यम से हिंदू तीर्थस्थलों को एक ऐसे समकालीन सौंदर्य-बोध के लेंस से प्रस्तुत कर रहे हैं, जहाँ परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्पष्ट दिखाई देता है। 2024 में शुरू किए गए नेशनल क्रिएटर्स अवॉर्ड्स ने इस प्रवृत्ति को औपचारिक मान्यता भी दी, जहाँ कई धार्मिक इन्फ्लुएंसर्स को सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैदिक विरासत के प्रसार में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया[8]

कैंपस में चरम-वामपंथी वर्चस्व से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तक

भारत में कैंपस राजनीति लंबे समय तक वामपंथी तंत्र के प्रभाव में रही है, जहाँ असहमति और विरोध के नाम पर छात्रों को अक्सर परोक्ष रूप से अराजकता और राष्ट्रविरोध की दिशा में मोड़ा जाता रहा है।

कई भारतीय विश्वविद्यालयों में अकादमिक विमर्श पर अति-वामपंथी बयानबाज़ी का गहरा असर रहा है। हालात यहाँ तक पहुँच गये कि मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभागों के कुछ अध्यापक खुले तौर पर अलगाववादी सोच को बढ़ावा देते पाए गए, और कभी-कभी तो अकादमिक शोध के नाम पर आतंकवाद का महिमामंडन तक किया गया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों पर वामपंथ का लंबे समय से दबदबा रहा है, जिसके फलस्वरूप भारत के विश्वविद्यालय परिसरों में कट्टर वाम विचारधारा का आक्रामक प्रचार-प्रसार होना एक आम बात बन गयी।

हालाँकि हालिया रुझान, एक स्पष्ट बदलाव की ओर इशारा करते हैं। विश्वविद्यालय परिसरों में Gen Z अब वाम-उदारवादी राजनीति को तेजी से खारिज कर रही है। सितंबर 2025 में घोषित दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनावों के नतीजे इस बदलाव को साफ़ तौर पर रेखांकित करते हैं। आरएसएस समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने अध्यक्ष पद सहित चार में से तीन पदों पर जीत दर्ज की। देश के गृह मंत्री ने इस जीत का स्वागत करते हुए कहा कि यह “राष्ट्र प्रथम” विचारधारा में युवाओं के निरंतर विश्वास को दर्शाती है[9]

दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों में एबीवीपी ने अपने अभियान का केंद्र स्थानीय और छात्र-हित से जुड़े मुद्दों को बनाया—जैसे सांस्कृतिक और अकादमिक सोसाइटीज़ के लिए बढ़ा हुआ फंड, रियायती स्वास्थ्य बीमा, पूरे कैंपस में मुफ़्त वाई-फाई, और स्पेशल नीड्स वाले छात्रों के लिए एक्सेसिबिलिटी ऑडिट[10] इसके बावजूद, जीत का पैमाना एक गहरे वैचारिक बदलाव की ओर संकेत करता है। यह उस कैंपस में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बढ़ती स्वीकार्यता को दिखाता है, जहाँ लंबे समय तक चरम-वामपंथी नैरेटिव्स का दबदबा रहा—जो राष्ट्रवाद को खारिज करने और आरएसएस को व्यवस्थित रूप से बदनाम करने पर आधारित थे।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), जिसे लंबे समय से चरम-वामपंथी राजनीति का गढ़ माना जाता रहा है, अब वहाँ भी स्पष्ट बदलाव दिखाई देने लगे हैं। भले ही 2025 के छात्रसंघ चुनावों में एबीवीपी शीर्ष पद हासिल नहीं कर पाई, लेकिन उसके एक उम्मीदवार ने संयुक्त सचिव का पद जीता, जिससे उसने लगभग एक दशक बाद उल्लेखनीय वापसी दर्ज की[11] इसके अलावा, एबीवीपी ने 42 में से 24 काउंसलर सीटें हासिल कीं, जिससे छात्रसंघ में उसकी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक हो गई।[12]

दशकों तक, जेएनयू आक्रामक हिंदू-विरोधी राजनीति का केंद्र बना रहा है, जहाँ कट्टर वामपंथी छात्र संगठन कैंपस पर हावी रहे और लगातार हिंदू-विरोधी नैरेटिव्स को आगे बढ़ाते रहे। हिंदू देवी-देवताओं का खुल्लम खुला मज़ाक उड़ाने वाले आयोजनों[13] से लेकर ब्राह्मण समुदाय को निशाना बनाने वाले नारों तक,[14] चरम-वामपंथी कैंपस राजनीति ने लगातार यह छवि गढ़ी कि भारत का शिक्षित युवा वर्ग “हिंदुत्व” का घोर विरोधी है, और अपनी ही सभ्यतागत विरासत के प्रति तिरस्कार भाव रखता है। जेएनयू का चरम-वामपंथी तंत्र खुद को कैंपस संस्कृति का स्वयंभू संरक्षक बनाकर पेश करता रहा, जहाँ राष्ट्रवादी या गैर-वामपंथी विचार रखने वाले छात्रों को अक्सर या तो परेशान किया जाता था, या हाशिये पर धकेल दिया जाता था।

हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में एक साफ़ बदलाव देखने को मिला है। चरम-वामपंथ के वैचारिक वर्चस्व को संतुलित करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए ठोस कदमों ने कैंपस में विचारों की विविधता के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल माहौल बनाया है। इस परिवर्तन को विजयादशमी के अवसर पर कैंपस में आयोजित आरएसएस के पारंपरिक ‘पथ संचलन’ से बेहतर शायद ही कोई उदाहरण चित्रित करता हो। 2025 के पथ संचलन के वीडियो, जो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, उनमें छात्रों की बड़ी भागीदारी साफ़ दिखाई दी। आरएसएस ने जेएनयू में पहली बार पथ संचलन का आयोजन 2023 में किया था[15]

दिसंबर 2022 में जेएनयू में इस्कॉन के तत्वावधान में गीता जयंती का आयोजन भी किया गया। इस कार्यक्रम में शहर भर से क़रीब 500 लोग शामिल हुए, जिनमें छात्रों की भागीदारी उल्लेखनीय रही। कार्यक्रम में इस्कॉन भक्तों द्वारा प्रस्तुत फ़्यूज़न कीर्तन, जिसमें छात्रों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया, के साथ गीता की पारंपरिक व्याख्याओं पर पैनल चर्चा और समकालीन जीवन में उसकी प्रासंगिकता पर जीवंत संवाद भी शामिल था।[16]

स्वतंत्रता के बाद से, शहरी भारत का सांस्कृतिक और साहित्यिक सार्वजनिक क्षेत्र लगभग पूरी तरह से वामपंथी तंत्र के वर्चस्व में रहा है। चूँकि युवाओं की भागीदारी बड़े पैमाने पर प्रचलित सांस्कृतिक विमर्श से आकार लेती है, इसलिए युवा भारतीय अक्सर इन वैचारिक नैरेटिव्स के निष्क्रिय उपभोक्ता बनते चले गए। साहित्यिक उत्सवों, सांस्कृतिक आयोजनों, और अकादमिक मंचों पर वामपंथी दृष्टिकोण की निरंतर मौजूदगी ने पीढ़ी दर पीढ़ी युवाओं को सूक्ष्म रूप से चरम-वामपंथी विचारधाराओं की ओर धकेल दिया।

हालाँकि पिछले एक दशक में सोशल मीडिया के तेज़ उभार ने इस समीकरण को काफी हद तक बदल दिया है। Gen Z अब डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स का प्रयोग भारतीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति और समाज को लेकर प्रचलित वामपंथी नैरेटिव्स को चुनौती देने और उन्हें एक्सपोज़ करने करने के लिए कर रही है। इसके साथ ही, सोशल मीडिया ने उस पारंपरिक ‘एलीट’ सांस्कृतिक क्षेत्र के प्रभाव को कमज़ोर किया है, जिस पर लंबे समय से वामपंथ का नियंत्रण रहा है। नतीजतन, Gen Z का एक बड़ा हिस्सा अब उसके वैचारिक शिकंजे से बाहर निकल चुका है।

दरअसल, आज धार्मिक सार्वजनिक क्षेत्र का पुनरुत्थान स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है, जिसकी अग्रिम पंक्ति में Gen Z खड़ी है। जो दृश्य एक दशक पहले तक अकल्पनीय लगते थे—जैसे कैफ़े के बाहर युवा भारतीयों का हनुमान चालीसा का पाठ करना, या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स का खुले तौर पर भारत की वैदिक विरासत पर चर्चा करना—आज वे सामान्य होते जा रहे हैं। भारत का व्यापक सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण नैरेटिव को निर्णायक रूप से बदल चुका है, और इसी के साथ यह भी तय कर रहा है कि युवा अब पहचान, परंपरा और आधुनिकता से किस तरह से संवाद कर रहे हैं।

समापन टिप्पणी: मैकाले की औपनिवेशिक विरासत को ध्वस्त करना

भारत की Gen Z अब अपने व्यवहार, पसंद-नापसंद के मानदंड, और प्राथमिकताओं के ज़रिए मैकाले की औपनिवेशिक विरासत को खुली चुनौती दे रही है. वह ऐसे तरीक़ों के माध्यम से औपनिवेशिक आख्यानों को ध्वस्त कर रही है, जिन्हें पश्चिमी उदारवादी ढाँचों के अन्तर्गत आसानी से परिभाषित नहीं किया जा सकता। भारत की युवा पीढ़ी के वैचारिक रुझान, उनकी पसंद और सोच आयातित वैचारिक खाँचों में ज़बरन फिट नहीं बैठते।

यही कारण है कि वाम-उदारवादी तंत्र की झुंझलाहट लगातार बढ़ती जा रही है—ख़ासकर इसलिए क्योंकि भारत का युवा वर्ग उस चरम-वामपंथी अराजकतावादी मॉडल के अनुरूप चलने से साफ़ इनकार कर रहा है, जिसे मीडिया, अकादमिक जगत और नागरिक समाज के कुछ हिस्से आक्रामकता के साथ आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं।

StopHindudvesha पहले भी इस बात को रेखांकित कर चुका है कि पश्चिमी मीडिया किस तरह के हथकंडे अपनाकर गैर-पश्चिमी समाजों में अशांति और अस्थिरता का बेहद नाटकीय, अतिशयोक्तिपूर्ण और रोमांटिक चित्रण करता है। इस मुहिम में वह Gen Z का इस्तेमाल एक औज़ार की भाँति करता है, और भारत जैसे स्थिर लोकतंत्रों के युवाओं को सड़कों पर उतरने और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को कमजोर करने के लिए उकसाता है। 2025 के उत्तरार्ध में प्रकाशित कई लेखों में यह फ्रेमिंग साफ़ दिखाई दी, जहाँ भारतीय युवाओं को आसपास के देशों में चल रहे Gen Z आंदोलनों के बीच असामान्य रूप से “शांत” बताया गया[17] [18] यानी विरोध के एक तयशुदा पैमाने के तराज़ू पर भारत की Gen Z के व्यवहार-संबंधी रुझानों को तौला गया।

इस प्रकार का चित्रण घिसी पिटी औपनिवेशिक रूढ़ियों और अत्याचार साहित्य के उन्हीं चिर-परिचित ढाँचों पर आधारित होता है। लेकिन जो बात इस विमर्श को सबसे ज़्यादा उलझा देती है, वह यह है कि भारतीय युवा अब उस राह पर चल ही नहीं रहा, जिस पर चलने की पश्चिमी मीडिया उससे अपेक्षा करता है। उलटा भारत का युवा वर्ग पश्चिमी मीडिया आख्यानों को परोक्ष रूप से चुनौती देते हुए एकदम विपरीत दिशा में आगे बढ़ रहा है। बाहरी ताक़तों द्वारा तय किए गए विरोध के मॉडलों के अनुरूप ढलने के बजाय, भारत की Gen Z अब सांस्कृतिक निरंतरता और सभ्यतागत आत्मविश्वास के आधार पर अपनी अलग दिशा तय कर रही है।

ग्लोबल साउथ में लोकतंत्र को हमेशा कमज़ोर मानने और उसे विरोध व विघटन के ज़रिए निरंतर ‘सुधारने’ की पश्चिमी मीडिया की अंतर्निहित धारणा, उसी पुराने मैकालेवादी मानस की उपज है—जो स्वदेशी भाषाओं, संस्कृतियों, ज्ञान-परंपराओं और राजनीतिक परंपराओं को हेय दृष्टि से देखता है। भारत की Gen Z अब इस विश्वदृष्टि को खुले तौर पर खारिज कर रही है, और डी-कोलोनाइज़ेशन के विमर्श से प्रेरित एक सभ्यतागत और सांस्कृतिक घर-वापसी को अपना रही है।

यही परिवर्तन वाम-उदारवादी तंत्र के लिए लगभग पूरी तरह “कोर्स से बाहर” साबित हो रहा है।

सन्दर्भ सूची

[1] “Temples spark India’s cultural reset”; https://stophindudvesha.org/beyond-mausoleums-temples-tourism-drives-indias-cultural-reset/

[2] Gen-Z chooses faith over festivities on New Year, video surfaces 2.5 million devotees visit Ayodhya, Kashi and Mathura; signaling a cultural shift – Uttar Pradesh News | Bhaskar English; https://www.bhaskarenglish.in/local/uttar-pradesh/news/gen-z-chooses-faith-over-festivities-on-new-year-video-surfaces-25-million-devotees-visit-ayodhya-kashi-and-mathura-signaling-a-cultural-shift-136837162.html

[3] Kashi to Kumbh, how religious tourism attracts the young to Uttar Pradesh – India Today;   https://www.indiatoday.in/india-today-insight/story/kashi-to-kumbh-how-religious-tourism-attracts-the-young-to-uttar-pradesh-2846967-2026-01-05

[4] Shrinecations: How Gen Z and millennials are redefining pilgrimage with style | – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/travel/destinations/shrinecations-how-gen-z-and-millennials-are-redefining-pilgrimage-with-style/articleshow/120822760.cms

[5] Gen Z fuels surge in spiritual travel, brands allocate upto 30% of budgets;  https://www.exchange4media.com/marketing-news/gen-z-fuels-surge-in-spiritual-travel-brands-allocate-up-to-30-percent-of-budgets-146628.html

[6] Bhajan Clubbing Is The New Gen Z Party Trend Taking Spirituality Global – Hindu Press International ; https://www.hinduismtoday.com/hpi/2025/12/30/bhajan-clubbing-is-the-new-gen-z-party-trend-taking-spirituality-global/

[7] From nightclubs to ‘naam’: How Gen Z is turning bhajan clubbing into India’s hottest sober high | Art-and-culture News – The Indian Express;  https://indianexpress.com/article/lifestyle/art-and-culture/nightclubs-to-naam-how-gen-z-turning-bhajan-clubbing-india-hottest-sober-high-10418023/

[8] “Temples spark India’s cultural reset”; https://stophindudvesha.org/beyond-mausoleums-temples-tourism-drives-indias-cultural-reset/

[9] DUSU Election Results 2025 Highlights: Amit Shah hails ABVP’s win, highlights faith of youth in ‘nation first’ ideology | Mint;  https://www.livemint.com/elections/dusu-election-results-2025-live-updates-abvp-nsui-delhi-university-vote-counting-latest-news-19-september-2025-11758255625537.html

[10] DUSU elections 2025: ABVP, NSUI, Left alliance roll out manifestos | Check what are their key promises | Education News – India TV;  https://www.indiatvnews.com/education/news/dusu-elections-2025-abvp-nsui-left-alliance-roll-out-manifestos-check-what-are-their-key-promises-2025-09-14-1008089

[11] JNUSU elections: ABVP shatters decade | DD News;  https://ddnews.gov.in/en/jnusu-elections-abvp-shatters-decade-long-drought-with-joint-secretary-post/

[12] The Resurgence of Nationalism: ABVP’s historic rise in JNU – The Organiser; https://organiser.org/2025/04/28/289486/bharat/the-resurgence-of-nationalism-abvps-historic-rise-in-jnu/

[13] Fact Sheet on the JNU Mahishasura day Controversy | IndiaFactsIndiaFacts; https://indiafacts.org/fact-sheet-jnu-mahishasura-day-controversy/

[14] JNU campus defaced with anti-Brahmin slogans, admin condemns | Delhi News – The Indian Express; https://indianexpress.com/article/cities/delhi/jnu-campus-defaced-8301261/

[15] RSS organises ‘Path Sanchalan’ march at Delhi’s Jawaharlal Nehru University – ThePrint – PTIFeed;   https://theprint.in/india/rss-organises-path-sanchalan-march-at-delhis-jawaharlal-nehru-university/2754698/

[16] JNU Holds Event to Celebrate Gita Jayanti in Collaboration With ISKCON | Education and Career News – News18; https://www.news18.com/news/education-career/jnu-holds-event-to-celebrate-gita-jayanti-in-collaboration-with-iskcon-6532225.html

[17] The Gen Z Experiment: How Western Media Manufactures Revolt in India and Nepal – StopHinduDvesha.Org; https://stophindudvesha.org/the-gen-z-experiment-how-western-media-manufactures-revolt-in-india-and-nepal/

[18] “In India, youths are quiet as Gen Z protests rock South Asia” – DW – 12/31/2025;  https://www.dw.com/en/in-india-youths-are-quiet-as-gen-z-protests-rock-south-asia/a-75349517#:~:text=Gen%20Z%20protests%20have%20shaken,power%2C%20politics%20and%20the%20future.

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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