ऑक्सफोर्ड यूनियन से पश्चिमी अकादमिक दुनिया तक: स्वतंत्र विचार या हिंदुओं के ख़िलाफ़ तयशुदा विमर्श

ऑक्सफोर्ड यूनियन विवाद को केंद्र में रखते हुए, यह लेख पश्चिमी विश्वविद्यालयों में व्याप्त उस गहरे बौद्धिक पतन को उजागर करता है, जहाँ संवाद की जगह हिंदू पहचान पर पूर्वनिर्धारित कथाएँ गढ़ी जा रही हैं।
  •  पश्चिमी दुनिया के प्रतिष्ठित अकादमिक मंच भारत और हिंदू पहचान को लगातार वैचारिक पूर्वाग्रह से भरे, निर्देशात्मक ढाँचों के तहत पेश कर रहे हैं।
  • ऑक्सफोर्ड यूनियन का प्रकरण दिखाता है कि बहसें संवाद स्थापित के लिए नहीं, बल्कि पहले से तय नतीजों तक पहुँचने के लिए रची जा रही हैं।
  • हिंदू पक्ष और आवाज़ों को नियमित रूप से हाशिये पर रखा जाता है, जिससे बौद्धिक मंच एकतरफ़ा अभियोग में बदल गये हैं।
  • अकादमिक अधिकार का इस्तेमाल एक समुदाय के प्रति संदेह, शत्रुता और अवैध ठहराने की मानसिकता को वैध बनाने के लिए किया जा रहा है।
  • ये रुझान पश्चिमी अकादमिक संरचना में निहित गहरे पक्षपात को दर्शाते हैं, जो बौद्धिक ईमानदारी और सार्वजनिक भरोसेदोनों को खोखला कर रहे हैं।

पिछले लगभग एक दशक से, पश्चिमी दुनिया के प्रतिष्ठित अकादमिक मंचों पर एक साफ़ पैटर्न उभरता दिख रहा है। वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ हों, कॉन्फ़्रेंस हों, या फिर शोध-संबंधी पहल—सब धीरे-धीरे भारत और हिंदू समाज को लेकर कुछ गिने-चुने, तयशुदा नैरेटिव्स पर आकर सिमटती जा रही हैं। जिसे अक्सर गंभीर अकादमिक शोध या स्वतंत्र बौद्धिक जिज्ञासा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, ज़रा गहराई से पड़ताल करने पर वह हिंदू सभ्यतागत पहचान को वैचारिक पूर्वाग्रहों के चश्मे से गढ़ने की परेशान करने वाली प्रवृत्ति मालूम पड़ती है। ये तथाकथित अकादमिक हस्तक्षेप एक पूरे समाज और संस्कृति को गहरी क्षति पहुँचाता है। यह पूर्वाग्रह-ग्रसित अकादमिक विमर्श सार्वजनिक मत को आकार देता है, नीतिगत बहसों को प्रभावित करता है, और पश्चिम में एक अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति संदेह और शत्रुता की भावना को सामान्य बना देता है।

भारत की पाकिस्तान नीति पर ऑक्सफोर्ड यूनियन में हुई बहस को लेकर हालिया विवाद को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह कोई मामूली प्रक्रिया-गत चूक या छात्रों की नासमझी नहीं थी, बल्कि नैरेटिव को नियंत्रित करने की एक सोची-समझी कवायद थी। प्रस्ताव के निर्देशात्मक ढाँचे से लेकर ज़रूरी पक्षकारों को बाहर रखने तक, और आख़िरी समय में किए गए बदलावों से लेकर गंभीर आरोपों के बावजूद संस्थागत चुप्पी तक—यह पूरा प्रकरण इस बात को उजागर करता है कि इस डिबेट का उद्देश्य संवाद स्थापित करना नहीं, बल्कि नतीजों को पहले से ही निर्धारित करना था। जब एक अकादमिक डिबेट के मंच पर इस प्रकार के अनैतिक हथकंडे एक सामान्य चलन बन जाते हैं, तो अकादमिक मंच ईमानदार विचार-विमर्श के स्थान नहीं रह जाते। इसके विपरीत वे एक विचारधारा-विशेष मनवाने के औज़ार मात्र बन के रह जाते हैं, जिसकी वजह से वाद-विवाद और प्रोपेगंडा के बीच की विभाजन रेखाएँ धुंधली पड़ती जाती हैं।

यह लेख इसी प्रक्रिया की पड़ताल करता है—कि किस तरह छात्र-स्तरीय डिबेटिंग सोसाइटीज़ से लेकर बड़े विश्वविद्यालयों तक, प्रतिष्ठित अकादमिक मंचों का इस्तेमाल भारत और हिंदू पहचान पर चुनिंदा नैरेटिव्स आगे बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। ऑक्सफोर्ड यूनियन की घटना को वैचारिक एजेंडा से संचालित कॉन्फ़्रेंसों और रिपोर्टों जैसे व्यापक घटनाक्रमों के साथ जोड़ते हुए, यह दिखाया गया है कि आज के समय में किस प्रकार से अकादमिक अभिव्यक्ति का दुरुपयोग किया जा रहा है। अकादमिक विमर्श का वास्तविक उद्देश्य होता है – जटिल मुद्दों के सभी पक्षों का निष्पक्ष आकलन करते हुए एक बौद्धिक संवाद स्थापित करना। लेकिन इसके उलट, आज एक पूरे समुदाय को अवैध ठहराने और शत्रुता को ‘शोध’ की आड़ में सामान्य बनाने के लिए अकादमिक अभिव्यक्ति का इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर किया जा रहा है।

ऑक्सफोर्ड यूनियन: एक छात्रडिबेट के पीछे की राजनीति

हाल ही में ऑक्सफोर्ड यूनियन में एक बेहद चिंताजनक प्रकरण सामने आया—वही संस्थान जो लंबे समय से गंभीर बहस और बौद्धिक विश्वसनीयता का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन हाल ही में जो कुछ भी वहाँ घटित हुआ, वह किसी सार्थक अकादमिक अभ्यास से कम और एक सुनियोजित राजनीतिक नाटक से ज़्यादा मिलता-जुलता था। छात्रों द्वारा संचालित इस डिबेटिंग सोसाइटी ने बहस का विषय रखा: “यह सदन मानता है कि पाकिस्तान के प्रति भारत की नीति, सुरक्षा नीति के रूप में पेश की गई एक लोकलुभावन रणनीति है।” मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह आयोजन ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन के अध्यक्ष मूसा हर्राज के प्रतिनिधित्व में संपन्न हुआ, जो पाकिस्तान मूल के छात्र नेता हैं और पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री मुहम्मद रज़ा हयात हर्राज के पुत्र हैं।

भारतीय पक्ष की ओर से धार्मिक विचारक और लेखक पं. सतीश के. शर्मा, जम्मू-कश्मीर की सामाजिक कार्यकर्ता मनु खजूरिया, और वरिष्ठ वकील व लेखक जे. साई दीपक को आमंत्रित किया गया था। भारतीय वक्ताओं के अनुसार, ऑक्सफोर्ड यूनियन के प्रबंधन ने उन्हें जानबूझकर डिबेट से दूर रखने के लिए गुमराह किया। जैसा कि जे. साई दीपक ने सार्वजनिक रूप से साझा किया, उन्हें यूनियन की ओर से व्यक्तिगत फ़ोन कॉल कर यह बताया गया कि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल अभी तक पहुँचा ही नहीं है। इसके बाद भारतीय वक्ताओं को छात्रों के ख़िलाफ़ बहस करने का विकल्प दिया गया, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया और ऑक्सफोर्ड न जाने का फ़ैसला किया। कुछ ही देर बाद लंदन स्थित पाकिस्तान हाई कमीशन ने सोशल मीडिया पर “जीत” की घोषणा कर दी और यह दावा किया कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल प्रतियोगिता से पीछे हट गया[1]

इसके बाद भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने एक्स (X) पर पोस्ट्स और विभिन्न मीडिया इंटरव्यूज़ के ज़रिए इस पूरे घटनाक्रम का विस्तृत विवरण साझा किया। उनके अनुसार, उन्हें एक ऐसे शर्मनाक तमाशे में खींच लिया गया था, जिसका उद्देश्य गंभीर संवाद स्थापित करना नहीं, बल्कि पाकिस्तान के पक्ष में एक प्रचारात्मक नैरेटिव खड़ा करना था। वक्ताओं ने व्यंग्य के साथ यह भी बताया कि पाकिस्तान की ओर से की गई “जीत” की आधिकारिक घोषणाएँ पूरी तरह मनगढ़ंत थीं और ज़मीनी हकीकत से उनका कोई लेना-देना नहीं था।[2]

इस पूरे प्रकरण पर ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन की चुप्पी ने इस विवाद को और भी ज़्यादा गहरा किया। पूरे घटनाक्रम के दौरान संस्थान की ओर से न तो कोई स्पष्टीकरण जारी किया गया, न सार्वजनिक रूप से कोई जवाब दिया गया और न ही भारतीय प्रतिनिधिमंडल के बयान को चुनौती देने के लिए कोई ठोस या विश्वसनीय साक्ष्य पेश किया गया। पारदर्शिता की इस कमी को महज़ प्रशासनिक लापरवाही करार दे ख़ारिज कर देना ज़रा कठिन है। जब यूनियन के अध्यक्ष का संबंध सीधे तौर पर पाकिस्तानी सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री से जुड़ा हो, तो प्रस्ताव का चयन और उसके बाद के घटनाक्रम को महज़ संयोग बताकर टालना मुश्किल हो जाता है। यदि इस घटनाक्रम का आकलन सर्वाधिक उदार मानकों के आधार पर भी किया जाये, तो भी यह प्रकरण हितों के टकराव और संस्थागत निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।

लेकिन जो बात सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली रही, वह थी इस डिबेट के विषय का चुनाव। जिस क्षण आतंकवाद के निर्यात के लिए कुख्यात देश के प्रति किसी राष्ट्र की सुरक्षा नीति को एक अकादमिक डिबेट का विषय बना दिया गया, उसी क्षण यह मंच अकादमिक न रह मात्र एक प्रोपेगंडा का औज़ार बनके रह गया। हालाँकि ऑक्सफोर्ड यूनियन अपनी सभी पुरानी डिबेट्स को सार्वजनिक तौर पर साझा नहीं करता, जिसकी वजह से व्यवस्थित रूप से तुलनात्मक अध्ययन करना तो कठिन है, लेकिन फिर भी यह कल्पना करना मुश्किल है कि किसी बड़े पश्चिमी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों को लेकर —ख़ासकर आतंकवाद-रोधी प्रयासों के संदर्भ में कभी कोई ऐसी ही डिबेट ऑर्गनाइज़ की गयी हो, जिसमे उस देश को इतने सरलीकृत और आरोपात्मक ढंग से कटघरे में खड़ा किया गया हो।

द संडे गार्जियन में प्रकाशित एक लेख इस प्रस्ताव के भीतर छिपे पूर्वाग्रह को सटीक ढंग से सामने रखता है। लेख में कहा गया है“भारत के रक्षात्मक कदमों, जिनमें सर्जिकल स्ट्राइक और आतंकवाद के संरक्षक देशों को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करना शामिल है, को सुरक्षा नीति के रूप में बेची गई एक लोकलुभावन रणनीतिबताकर पेश करना, पहले से ही भारत को दोषी ठहराने की धारणा को मान लेता है, जबकि सीमा-पार आतंकवाद में पाकिस्तान की भली भाँति दर्ज भूमिका को नज़रअंदाज़ कर देता है। ऐसी भाषा तटस्थ नहीं है; यह साफ़ तौर पर इस्लामाबाद और विदेशों में उसके समर्थकों द्वारा आगे बढ़ाए जाने वाले नैरेटिव को दोहराती है, जहाँ पीड़ित और हमलावर की भूमिकाएँ उलट दी जाती हैं”। [3]

विश्वविद्यालयी बहसें आमतौर पर ऐसे विषयों पर आयोजित की जाती हैं, जिन पर “पक्ष” और “विपक्ष”—दोनों के लिए बोलने की पर्याप्त गुंजाइश हो। ऐसे मुद्दे अक्सर थोड़े धुँधले, व्याख्या-आधारित और असमंजस भरे होते हैं, जहाँ किसी एक पक्ष को स्पष्ट रूप से सही या ग़लत ठहराना आसान नहीं होता। यही कारण है कि अमूर्त नैतिक दुविधाएँ या विवादित सामाजिक प्रश्न बहस के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। इसके उलट, आतंकवाद से निपटने और अपने नागरिकों की जान की रक्षा के लिए अपनाई गई किसी देश की सुरक्षा नीति बहस का विषय नहीं हो सकती—ख़ासकर तब, जब पड़ोसी देश द्वारा सीमा-पार आतंकवाद के सहज और लगातार “निर्यात” के ठोस प्रमाण मौजूद हों। ऐसी “बहस” आयोजित करना दरअसल एक तयशुदा नैरेटिव गढ़ने और आतंकवाद को सफ़ेदपोश बनाने के बराबर है।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन की पूर्व निर्वाचित अध्यक्ष और लेखिका-एक्टिविस्ट रश्मि सामंत ने भी ऑक्सफोर्ड यूनियन में भारतीय सुरक्षा नीति पर हुई इस बहस को लेकर अपना पक्ष सामने रखा है। उन्हें उनकी हिंदू पहचान को निशाना बनाते हुए चलाए गए एक आक्रामक षड्यंत्र अभियान के बाद पद छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। सीएनएन न्यूज़18 पर आयोजित एक पैनल चर्चा में उन्होंने तर्क दिया कि पाकिस्तान की सत्ता-व्यवस्था और ऑक्सफोर्ड यूनियन के बीच एक स्पष्ट संबंध दिखाई देता है। उनका यह भी आरोप है कि जब-जब यूनियन की कमान किसी पाकिस्तानी मूल के अध्यक्ष के हाथों में रही है, तब-तब ऐसे विवाद पहले भी सामने आते रहे हैं। कुल मिलाकर, सामंत का कहना है कि यूके  की राजनीति में पाकिस्तानी मूल के नेताओं के प्रभाव को देखते हुए, ऑक्सफोर्ड यूनियन तेज़ी से पाकिस्तानी राज्य का मुखपत्र बनता जा रहा है[4]

ईमानदार पड़ताल या नैरेटिव सेटिंग?

यह पहली बार नहीं है जब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में ऐसी कोई डिबेट आयोजित की गयी हो जो भारत की राज्य नीतियों को सीधे तौर पर निशाना बनाती हो। वर्षों से ऑक्सफोर्ड यूनियन में भारत से जुड़े विषयों पर ऐसी ही बहसों का एक पैटर्न बनता दिख रहा है, जिनका स्वर उकसाने वाला और ढाँचा पहले से तय निष्कर्षों की ओर ले जाने वाला होता है—चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो या मोदी सरकार का आकलन।

नवंबर 2024 में ऑक्सफोर्ड यूनियन ने यह सदन एक स्वतंत्र कश्मीर राज्य में विश्वास करता है” शीर्षक से एक डिबेट आयोजित की थी। इस प्रस्ताव ने कैंपस में मौजूद भारतीय छात्रों के बीच तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी, जिनमें से कई ने आयोजन के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन भी किए। उनका विरोध सिर्फ़ प्रस्ताव से राजनीतिक असहमति तक सीमित नहीं था। छात्रों के एक समूह ने विश्वविद्यालय प्रशासन को औपचारिक पत्र लिखकर इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि मुझम्मिल अय्यूब ठाकुर और ज़फ़र ख़ान जैसे वक्ताओं को मंच दिया जा रहा है, जिनको लेकर छात्रों का आरोप था कि उनके संबंध हिंसक उग्रवाद और आतंकवाद से जुड़े संगठनों से रहे हैं[5]

इससे पहले द कश्मीर फ़ाइल्स के निदेशक विवेक अग्निहोत्री ने इस बहस में शामिल होने का न्योता ठुकरा दिया था। एक्स (X) पर अपने फ़ैसले की सार्वजनिक घोषणा करते हुए उन्होंने इस विषय को “भारत-विरोधी” और “आपत्तिजनक” बताया और ऑक्सफोर्ड यूनियन से मिला आमंत्रण पत्र भी साझा किया था।[6]

जून 2023 में ऑक्सफोर्ड यूनियन ने “यह सदन मानता है कि मोदी का भारत सही रास्ते पर है” शीर्षक से एक डिबेट आयोजित की थी। वक्ताओं की सूची में मीडिया और राजनीति से जुड़े कई नाम शामिल थे, जिनमें जानी-मानी भारतीय पत्रकार पालकी शर्मा भी थीं, जिन्होंने प्रस्ताव के पक्ष में अपनी बात रखी। ऑक्सफोर्ड यूनियन के अनुसार, बहुमत ने इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ मतदान किया[7]

करीब एक साल बाद जब पालकी शर्मा का डिबेट में दिया गया भाषण वायरल हुआ, तो उन्होंने BeerBiceps के एक पॉडकास्ट में ऑक्सफोर्ड यूनियन में अपने अनुभव साझा किए। उनके अनुसार डिबेट का माहौल “लगभग शत्रुतापूर्ण” था और श्रोताओं के मन में भारत को लेकर पहले से ही अनेकों प्रकार की कठोर धारणाएँ मौजूद थीं। इससे भी ज़्यादा चिंताजनक यह था कि प्रस्ताव का विरोध करने वाले कुछ वक्ता, जो ख़ुद भारतीय थे, ऐसे सनसनीख़ेज़ दावे करने लगे जिनका कोई भी ठोस प्रमाणिक आधार नहीं था। पालकी शर्मा के अनुसार कुछ वक्ताओं ने तो यहाँ तक दावा कर डाला कि उन्हें भारत लौटने में डर लगता है, क्योंकि उन्हें गिरफ़्तार किया जा सकता है, या परेशान किया जा सकता है—जबकि ऐसे आरोपों के समर्थन में कोई प्रमाण नहीं दिया गया[8]

शर्मा का विवरण उस चिर-परिचित “अत्याचार साहित्य” (atrocity literature) वाले ढाँचे की ओर इशारा करता है, जिसके तहत पश्चिमी अकादमिक मंचों पर भारत या हिंदुओं से जुड़ी चर्चाएँ अक्सर पेश की जाती हैं। ऐसे माहौल में प्रभावी बहस का पैमाना तथ्य, तर्क या संतुलित विश्लेषण नहीं रह जाता, बल्कि अतिरंजित, वैचारिक बारूद से लैस, एक्टिविस्ट-शैली की पोज़िशनें बन जाती हैं, जो खुले तौर पर भारत-विरोधी बयानबाज़ी में लिप्त होती हैं।

ग़ौरतलब है कि भाजपा नेता वरुण गांधी को भी 2023 की इस बहस में आमंत्रित किया गया था, जिसे उन्होंने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि चुना गया विषय किसी सार्थक और ईमानदार बहस की गुंजाइश ही नहीं छोड़ता[9]

यूके में रह रहे भारतीय प्रवासी समुदाय और भारतीय छात्रों के कड़े विरोध के बावजूद, ऑक्सफोर्ड यूनियन भारत के आंतरिक राजनीतिक और सुरक्षा मामलों में दख़ल देने वाली डिबेट्स का आयोजन करने में जरा भी नहीं हिचकी। हालाँकि छात्र मंचों पर किसी बात को लेकर विवाद खड़ा होना अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं है, लेकिन जिस प्रकार से इन मंचों का धीरे-धीरे भू-राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने के अड्डों में बदला जा रहा है, वह वाक़ई गंभीर चिंता का विषय है। इससे भी ज़्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि ऐसे आयोजनों में, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, उग्रवादी विमर्श के प्रति सहानुभूति रखने वाले व्यक्तियों की मौजूदगी बार-बार सामने आती है।

हिंदू आवाज़ों का अकादमिक अवैधीकरण

पश्चिमी अकादमिक जगत के कुछ हिस्सों द्वारा भारत को निशाना बनाए जाने के साथ-साथ, लगभग हमेशा हिंदू धर्म, उसके अनुयायियों और समुदाय से जुड़े सांस्कृतिक मुद्दों पर भी व्यापक हमला देखने को मिलता है। अकादमिक दुनिया ने हिंदुओं के सरोकारों को नज़रअंदाज़ करने के लिए मानो एक पूरी काटेज इंडस्ट्री खड़ी कर दी हो—जहाँ “हिंदू बहुसंख्यकवाद”, “हिंदुत्व फ़ासीवाद”, “हिंदुत्व आतंक”, “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसे जुमलों का धड़ल्ले से प्रयोग कर पक्षपाती सिद्धांत गढ़े जाते हैं।

यह प्रवृत्ति नई नहीं है। फर्क बस इतना है कि औपनिवेशिक दौर का वही अत्याचार साहित्य, जिसका इस्तेमाल कभी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप को नैतिक रूप से उचित ठहराने के लिए किया जाता था, अब समकालीन अकादमिक भाषा में नए सिरे से पैकेज किया जा चुका है। नतीजन एक दोगला नैतिक ढाँचा खड़ा कर दिया गया है, जिसमें हिंदू धर्म को “हिंदूइज़्म” के अपेक्षाकृत सौम्य और अराजनीतिक लेबल में समेट दिया गया है, और उसके विपक्ष में “हिंदुत्व” यानी हिंदू होने के सार को हिंदू धर्म के राजनीतिक विकृतीकरण  के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस मनगढ़ंत नैतिक ढाँचे के अन्तर्गत, जिसका सच्चाई से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है, “हिंदुत्व” को एक मनघडंत शत्रु में परिवर्तित कर दिया गया है, जो स्वभावतः हिंसक, बहिष्कारी और सत्तावादी है। यह कृत्रिम विभाजन बुद्धिजीवियों और विद्वानों को तटस्थ होने का दावा करने की सुविधा देता है, जबकि असल में हिंदू पहचान की राजनीतिक और सार्वजनिक अभिव्यक्ति को योजनाबद्ध ढंग से अवैध ठहराया जाता है।

पिछले एक दशक में पश्चिमी अकादमिक जगत का एक वर्ग “हिंदुत्व” के उभार पर विलाप करने वाले कान्फ्रेंसेज आयोजित करने में असामान्य रूप से गहरी दिलचस्पी दिखाता रहा है। 2021 में Dismantling Global Hindutva (वैश्विक हिंदुत्व का उन्मूलन) नामक कॉन्फ़्रेंस कई प्रतिष्ठित अमेरिकी विश्वविद्यालयों के समर्थन से आयोजित की गई थी। इस आयोजन में अधिकतर वक्ता कट्टर वामपंथी वैचारिक हलकों से आए थे—जिनमें उग्रवादी आंदोलनों के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग, भारत के सभ्यतागत पुनर्जागरण के प्रति खुले तौर पर शत्रु भाव का प्रदर्शन करने वाले टिप्पणीकार, और ऐसे कई तथाकथित विद्वान शामिल थे, जिनका हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी का अच्छा ख़ासा ट्रैक रिकॉर्ड रहा है।

इस पूरे आयोजन में गहरी विडंबना साफ़ नज़र आती थी। एक ओर सम्मेलन तथाकथित “हिंदुत्व इकोसिस्टम” पर फ़ासीवाद और सर्वसत्तावादी प्रवृत्तियों के आरोप लगा रहा था, वहीं दूसरी ओर सम्मेलन के प्रचार में खुले तौर पर ऐसे दृश्य प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया, जो उन्हीं विचारधाराओं की याद दिलाते हैं, जिनका वह विरोध करने का दावा कर रहा था। प्रचार सामग्री में एक उल्टा हथौड़ा दिखाया गया था, जो ज़ोर-ज़बरदस्ती से एक मानव आकृति को जड़ से उखाड़ रहा था—वह आकृति केसरिया वस्त्र पहने एक आरएसएस स्वयंसेवक से काफ़ी मिलती-जुलती थी[10] सम्मेलन के एजेंडे और वक्तव्यों को अगर नज़रअंदाज़ भी कर दिया जाये, तो भी सिर्फ़ आयोजकों की घोर हिंदू-विरोधी विचारधारा का पर्दाफाश करने के लिए यह एक अकेला पोस्टर ही काफ़ी था। इस पोस्टर ने एक ऐसे समुदाय का बेहद अमानवीय चित्रण प्रस्तुत किया, जो विश्व के एकमात्र देश में बहुसंख्यक है, और दुनिया के अधिकांश देशों में एक बेहद छोटी अल्पसंख्यक आबादी है।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पश्चिमी अकादमिक जगत कट्टर इस्लामिक उग्रवाद को “उखाड़ फेंकने” जैसे विषय पर इसी तरह का कोई सम्मेलन स्वीकार करता। यदि ऐसा कोई आयोजन प्लान भी किया जाता तो यह लगभग तय है कि वह मीडिया, नागरिक समाज संगठनों और राजनीतिक वर्ग की ओर से तुरंत इस्लामोफ़ोबिया के आरोपों की चपेट में आ जाता। संभव है कि उसे या तो रद्द कर दिया जाता, या शुरुआत में ही मंज़ूरी न मिलती। यह तुलना बहुत कुछ उजागर करती है। हिंदू समुदाय के मामले में सार्वजनिक हिंदू पहचान और राजनीतिक अभिव्यक्ति के अपराधीकरण को न सिर्फ़ स्वीकार्य, बल्कि कई बार नैतिक रूप से श्रेष्ठ बताकर पेश किया जाता है। यही रवैया हिंदुओं के प्रति शत्रुता को सामान्य बनाने के लिए वैचारिक ज़मीन तैयार करता है।

इसी पैटर्न की एक और झलक 27 अक्टूबर 2025 को देखने को मिली, जब रटगर्स यूनिवर्सिटी ने “Hindutva in America: An Ethnonationalist Threat to Equality and Religious Pluralism” (अमेरिका में हिंदुत्व: समानता और धार्मिक बहुलवाद के लिए एक एथनोनेशनलिस्ट ख़तरा) शीर्षक वाली रिपोर्ट पर आधारित एक पैनल चर्चा आयोजित की। अकादमिक विश्लेषण के रूप में प्रस्तुत की गई इस रिपोर्ट में अमेरिका के हिंदू संगठनों पर व्यापक और बेहद गंभीर आरोप लगाए गए। रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि हिंदू अमेरिकी संगठन आरएसएस के प्रॉक्सी के तौर पर काम करते हैं और व्यवस्थित रूप से इस्लामोफ़ोबिया, जातिगत भेदभाव, और अल्पसंख्यक-विरोधी राजनीति को बढ़ावा देते हैं। ये दावे किसी ठोस प्रमाणिक आधार पर नहीं, बल्कि वैचारिक अनुमान और guilt by association की रूढ़ि पर टिके हुए थे[11] [12]

हिंदू अमेरिकी संगठनों, समुदाय के सदस्यों और कई अमेरिकी सांसदों—जिनमें भारतीय मूल के सांसद भी शामिल थे, के कड़े विरोध के बावजूद, विश्वविद्यालय ने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया[13]

सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि जिस कार्यक्रम में हिंदू धर्म और हिंदू मुद्दों की सार्वजनिक व राजनीतिक अभिव्यक्ति पर बड़े-बड़े अतार्किक आरोप लगाये गये जो कि न सिर्फ़ सतही थे, बल्कि पूरी तरह से बेबुनियाद थे और जिनका वास्तविकता से लेश मात्र भी सरोकार न था, उसी पैनल पर एक भी ऐसा व्यक्ति मौजूद नहीं था, जो स्वयं एक आस्थावान हिंदू हो। इतना ही नहीं, कार्यक्रम में शामिल हिंदू अमेरिकी संगठनों के अनुसार, चर्चा के दौरान असहमति जताने वाली आवाज़ों को दबा दिया गया।

अकादमिक स्वतंत्रता की आड़ में हिंदू-विरोधी नैरेटिव

रटगर्स लॉ स्कूल के Center for Security, Race and Rights (CSRR) द्वारा जारी की गई रिपोर्ट “Hindutva in America” पश्चिमी समाजों में एक धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय  को निशाना बनाने के लिए अकादमिक अधिकार के दुरुपयोग का एक बेहद चिंताजनक उदाहरण है। शोध के आवरण में पेश की गई यह रिपोर्ट एक बेहद ख़तरनाक मिसाल कायम करती है—जिसमें एक छोटे और असुरक्षित समुदाय को संदेह और वैचारिक शत्रुता की नज़र से देखा जाता है।

यह दरअसल अकादमिक जगत को हथियार बनाकर एक खलनायक गढ़ने और सभ्यतागत उन्मूलन को उचित ठहराने का क्लासिक मामला है।[14] हिंदू संगठनों को फ़ासीवादी या उग्रवादी करार देकर, और उनके ख़िलाफ़ सख़्त निगरानी या कार्रवाई की माँग करते हुए, यह रिपोर्ट सीधे तौर पर हिंदू अमेरिकियों के उस अधिकार को कमज़ोर करती है, जिसके तहत वे संगठित हो सकते हैं, सार्वजनिक रूप से अपनी बात रख सकते हैं, और नागरिक जीवन में भाग ले सकते हैं। यह चिंता तब और भी ज़्यादा गंभीर हो जाती है, जब हम इसे पश्चिमी देशों में तेज़ी से बढ़ते हिंदू-विरोध (हिंदूफ़ोबिया) के मामलों के वृहत् संदर्भ में देखते हैं।  पश्चिमी देशों में चिंताजनक रूप से बढ़ रहे हिंदू-विरोधी मामलों में मंदिरों पर तोड़फोड़ और हमले, घृणास्पद भाषणों में इज़ाफ़ा, और भारतीयों के ख़िलाफ़ नस्लीय हिंसा की घटनाएँ शामिल हैं। ऐसे माहौल में, हिंदू संगठनों को बहुलवाद और सामाजिक सौहार्द के लिए ख़तरा बताने वाला “शोध” महज़ अकादमिक बहस तक सीमित नहीं रहता। वह संदेह का ऐसा वातावरण रचता है, जो पश्चिम में रह रहे एक छोटे से अल्पसंख्यक समुदाय को और भी ज़्यादा ख़तरे में डाल देता है।

यह रिपोर्ट चिर-परिचित भाषाई ढाँचों पर काफ़ी हद तक आश्रित प्रतीत होती है—सबसे प्रमुख दावा यही है कि हिंदू धर्म एक विशुद्ध रूप से ग़ैर-राजनीतिक आस्था है, जबकि “हिंदुत्व” उससे अलग और स्वभावतः ख़तरनाक राजनीतिक विचारधारा है। आगे यह आरोप लगाया गया है कि हिंदुत्व अपनी वैचारिक प्रेरणा बीसवीं सदी के शुरुआती दौर के यूरोपीय फ़ासीवाद से लेता है, और फिर उसे बहिष्कारी, सत्तावादी तथा लोकतांत्रिक मूल्यों से मूलतः असंगत बताया गया है। इसी आधार पर रिपोर्ट यह निष्कर्ष निकालती है कि हिंदुत्व भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका में भी बहुलवाद, धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के लिए एक गंभीर ख़तरा है। इस तर्क के केंद्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का नकारात्मक चित्रण है। इस शोध रिपोर्ट में आरएसएस को हिंदुत्व का वैचारिक तंत्रिका-केंद्र बताया गया है, व उसे एक सैन्यवादी और सत्ताधारी व तानाशाह संगठन के रूप में पेश किया गया है। वीएचपीए, एचएसएस, एकल विद्यालय, इन्फ़िनिटी फ़ाउंडेशन और सेवा इंटरनेशनल जैसे कई हिंदू अमेरिकी संगठनों पर भी कुछ इसी प्रकार के आरोप लगाये गये हैं, और उन्हें एक व्यापक “हिंदुत्व इकोसिस्टम” का हिस्सा बताया गया है[15]

इन आरोपों को आगे बढ़ाने का तरीक़ा भी कई सवाल खड़े करता है। इस रिपोर्ट पर आधारित अकादमिक कॉन्फ़्रेंस और पैनल चर्चाएँ किसी भी हिंदू विद्वान, आस्थावान व्यक्ति, या आलोचना झेल रहे संगठनों के प्रतिनिधियों की भागीदारी के बिना ही संपन्न हुईं। हिंदू दृष्टिकोणों का यह पूर्ण बहिष्कार तथाकथित बौद्धिक संवाद को एकतरफ़ा अभियोग में बदल देता है। जब प्रतिवाद या वास्तविक संवाद की कोई गुंजाइश ही न छोड़ी जाए, तो ऐसे मंच ईमानदार संवाद की बजाय एक तयशुदा नैरेटिव को मज़बूत करने के लिए रचे गए अभ्यास ज़्यादा प्रतीत होते हैं। व्यावहारिक रूप से ये अकादमिक प्रतिष्ठा की आड़ में हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी के वैध मंच बन जाते हैं।

StopHindudvesha द्वारा प्रकाशित एक विस्तृत प्रत्युत्तर इस दृष्टिकोण के गहरे निहितार्थों को सामने लाता है। आलोचना में तर्क दिया गया है कि यह रिपोर्ट ऐतिहासिक रूप से पहचाने जा सकने वाले अमानवीकरण के पैटर्न का अनुसरण करती है—जिसमें किसी सामूहिक पहचान का दानवीकरण, उसके संस्थानों को अवैध ठहराना, उसकी संस्कृति का विखंडन, और आत्म-परिभाषा के उसके अधिकार को पूरी तरह से नकारना शामिल होता है। जब ऐसे मानक  अकादमिक विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं, तो वे नैतिक अधिकार का आवरण ओढ़ लेते हैं, जिससे पक्षपातपूर्ण और पूर्वाग्रही नतीजे भी उचित प्रतीत होने लगते हैं।[16]

अत्याचार नैरेटिव पर टिकी एक इवेंट्स इंडस्ट्री

यह प्रवृत्ति किसी इक्का दुक्का घटना तक सीमित नहीं है। समय के साथ पश्चिमी अकादमिक जगत ने हिंदू-विरोधी अत्याचार साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए एक पूरी की पूरी “इवेंट्स इंडस्ट्री” खड़ी कर दी है। जाति, हिंदू राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और तथाकथित ब्राह्मणवादी पितृसत्ता जैसे विषयों पर कॉन्फ़्रेंस, वर्कशॉप्स और सेमिनार अब आम होते जा रहे हैं।[17] [18] [19]

इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी संस्कृति या आस्था का आलोचनात्मक अवलोकन अकादमिक शोध का एक जायज़ हिस्सा है। लेकिन जब एक ही धार्मिक समुदाय को असमान रूप से बार बार टारगेट किया जाये, तो ऐसे में मंशा और निष्पक्षता—दोनों पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है। और यह असंतुलन स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। अन्य धार्मिक परंपराओं या उनके अनुयायियों की आस्थाओं को लेकर इस तरह की कठोर, आक्रामक और शत्रुतापूर्ण निगरानी शायद ही कभी देखने को मिलती है। इसके उलट, हिंदुओं को बार-बार— “हिंदुत्ववादी” के रूप में लेबल कर शर्मसार करने की कोशिश की जाती है। जो हिंदू अपने धर्म और संस्कृति से जुड़े मुद्दों को सार्वजनिक मंच पर उठाते हैं, उन पर “हिन्दुत्ववादी” होने का ठप्पा लगा उन्हें वैश्विक नैतिक नैरेटिव्स के अन्तर्गत मूल उत्पीड़क के रूप में पेश किया जाता है। यह फ़्रेमिंग न सिर्फ़ वास्तविकता को बुरी तरह से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करती है, बल्कि पश्चिमी देशों में रहने वाले हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और सामाजिक स्थिति के लिए भी एक ख़तरनाक मिसाल कायम करती है, क्योंकि यह उनके नागरिक जीवन और धार्मिक जीवन के प्रति संदेह को सामान्य बना देती है।

समापन

इन तमाम घटनाओं को अगर साथ जोड़कर देखें, तो पश्चिमी अकादमिक जगत के कुछ हिस्सों में मौजूद एक गहरे संकट की तस्वीर उभरकर सामने आती है—जहाँ पड़ताल और जिज्ञासा की भाषा का इस्तेमाल अब पहले से तय वैचारिक नतीजों को आगे बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। जब बहसों का ढाँचा निर्देशात्मक हो, प्रभावित समुदाय की आवाज़ों को बाहर रखा जाए, और असहमत पक्षों से संवाद स्थापित करने के बजाय असहमति को ही ‘प्रबंधित’ किया जाए, तो अकादमिक स्वतंत्रता सत्य की खोज का साधन नहीं रह जाती, बल्कि नैरेटिव थोपने की एक ढाल मात्र बन जाती है। इसका समग्र असर सिर्फ़ बौद्धिक विकृति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ज़मीनी स्तर पर नुकसान पहुँचाता है—क्योंकि ‘शोध’ के अधिकार की आड़ में हिंदू पहचान और संस्थाओं के प्रति संदेह को सामान्य बना दिया जाता है।

यदि अकादमिक मंचों को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखनी है, तो उन्हें संतुलन, पारदर्शिता और समावेशन के बुनियादी सिद्धांतों के प्रति दोबारा प्रतिबद्ध होना होगा। इसका अर्थ है जटिल सभ्यतागत प्रश्नों को नैतिक अभियोग में बदलने के प्रलोभन का विरोध करना, और आलोचना तथा भौंडे व अमानवीय चित्रण के बीच के फ़र्क़ को स्वीकार करना। ऐसे सुधार के बिना, प्रतिष्ठित संस्थान सार्वजनिक भरोसे को खोने और सामाजिक विभाजनों को और गहरा करने का ख़तरा उठाते हैं—जहाँ संवाद के लिए बने मंच वैचारिक बहिष्कार के अखाड़ों में परिवर्तित हो जाते हैं। ऑक्सफोर्ड यूनियन का प्रकरण और इससे मिलती-जुलती घटनाएँ इस बात की चेतावनी हैं कि जब निष्पक्षता और बौद्धिक श्रेष्ठता के मानकों को प्रभाव और एजेंडे के आगे गौण कर दिया जाता है, तो इसके क्या दुष्परिणाम निकलते हैं।

सन्दर्भ सूची

[1] India-Pakistan Oxford Union debate: Pak claims false victory after shambolic Oxford Union debate gets cancelled | World News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/world/uk/pak-claims-false-victory-after-shambolic-oxford-union-debate-gets-cancelled/articleshow/125644588.cms

[2] Manu Khajuria & Satish Sharma Slam Pakistan’s Claim of India’s ‘Walkout’ From Oxford Union debate – YouTube;  https://www.youtube.com/watch?v=fav3Bpv6mdE

[3] Fall of the Oxford Union: Bastion of free speech to pawn of the Pakistani deep state; https://sundayguardianlive.com/editors-choice/fall-of-the-oxford-union-bastion-of-free-speech-to-pawn-of-the-pakistani-deep-state-161893/

[4] Oxford Union Debate: Pakistan Delegation No-Show Sparks Tension | India’s Policy or Populism? – YouTube;  https://www.youtube.com/watch?v=oCZ9hWcE4y8

[5] UK: Indian Students Hold Protest Outside Oxford Union Against Kashmir Debate featuring Speakers With Terror Links;  https://swarajyamag.com/news-brief/uk-indian-students-hold-protest-outside-oxford-union-against-kashmir-debate-featuring-speakers-with-terror-links

[6] Vivek Agnihotri declines Oxford Union debate on Kashmir, labels the theme as ‘offensive, anti-Indian’ | Hindi Movie News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/hindi/bollywood/news/vivek-agnihotri-declines-oxford-union-debate-on-kashmir-labels-the-theme-as-offensive-anti-indian/articleshow/113102620.cms

[7] Oxford Union doesn’t believe Modi’s India is on the right path – Cherwell;  https://cherwell.org/2023/06/09/oxford-union-doesnt-believe-modis-india-is-on-right-path/

[8] Defending India In England – Palki’s BOLD Oxford Union Debate Experience – YouTube;  https://www.youtube.com/watch?v=feVXB_OElVk

[9] Varun says no to Oxford debate, amid Rahul Cambridge Row; https://www.thestatesman.com/india/varun-says-no-to-oxford-debate-on-this-house-believes-modis-india-is-on-the-right-path-1503163415.html

[10] Dismantling Global Hindutva Event: Hate to justify genocide of Hindus;  https://www.opindia.com/2021/08/dismantling-global-hindutva-event-nazi-propaganda-justify-genocide-hindus/

[11] Hit Job: Rutgers Fuels Anti-Hindu Hate with Dubious Report;  https://stophindudvesha.org/hit-job-rutgers-fuels-anti-hindu-hate-with-dubious-report/

[12] Rebuttal to Rutgers’ Hindutva Report;  https://stophindudvesha.org/a-hindu-american-rebuttal-to-the-genocidal-subtext-of-rutgers-hindutva-in-america-report/

[13] US varsity holds Hindutva debate, faces backlash for excluding Hindus from it – India Today;   https://www.indiatoday.in/world/us-news/story/rutgers-universtiy-hindutva-event-sparks-student-protests-draws-criticism-from-us-lawmakers-america-new-jersey-2810351-2025-10-29

[14] A Hindu American Rebuttal to the Genocidal Subtext of Rutgers Law School’s Center for Security, Race and Rights (RCSRR)’s report; https://stophindudvesha.org/wp-content/uploads/2025/06/Rebuttal-to-RCSRR-Report-on-Hindutva.pdf

[15] A Hindu American Rebuttal to the Genocidal Subtext of Rutgers Law School’s Center for Security, Race and Rights (RCSRR)’s report;   https://stophindudvesha.org/wp-content/uploads/2025/06/Rebuttal-to-RCSRR-Report-on-Hindutva.pdf

[16] Ibid.

[17] The Sixth International Caste Conference – Center for Global Development and Sustainability | The Heller School; https://heller.brandeis.edu/gds/conferences/caste-conference/index.html

[18] The Global Research Conference on Caste, Business and Society; https://www.bath.ac.uk/case-studies/the-global-research-conference-on-caste-business-and-society/

[19] ‘Caste Beyond South Asia: Diaspora and the Internet’ Conference | indox; https://www.india.ox.ac.uk/event/caste-beyond-south-asia-diaspora-and-internet-conference

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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