शोक से वैचारिक विकृति तक: पैहलगाम हमले को तोड़-मरोड़ने की मानसिकता पर सवाल

पैहलगाम हत्याकांड के बाद शोक की कई रूपों में अभिव्यक्ति देखने को मिली। लेकिन जैसे-जैसे परिवार अपने प्रियजनों की मृत्यु पर दुख मना रहे हैं, एक खतरनाक नैरेटिव सामने आ रहा है जो 26 हिंदू पर्यटकों की सुनियोजित हत्या के पीछे के धार्मिक उद्देश्य को कमज़ोर दिखाने का प्रयास कर रहा है। शोक भले ही निजी हो, लेकिन तथ्य सार्वजनिक होते हैं — और उन्हें धर्मनिरपेक्षता या भावनात्मक सांत्वना के नाम पर विकृत नहीं किया जा सकता।
  • पैहलगाम हत्याकांड एक पूर्व-नियोजित, धर्म-संप्रेरित हमला था, जिसका स्पष्ट उद्देश्य हिंदुओं को निशाना बनाना था
  • कुछ पीड़ितों और मीडिया संस्थानों ने इस हमले की मंशा को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और इस्लामी कट्टरपंथ की भूमिका को जानबूझकर नजरंदाज करके आंका।
  • शोक को धर्मनिरपेक्ष नैरेटिव के समर्थन में एक राजनीतिक उपकरण बना दिया गया, जिससे या तो हत्यारों की विचारधारा पर से ध्यान भटका दिया गया या उन्हें परोक्ष रूप से माफ कर दिया गया।
  • ऐसी प्रतिक्रियाएँ भारत के शैक्षणिक और मीडिया वर्गों में गहराई से जड़ जमा चुकी वैचारिक विकृति और नैतिक दिशाहीनता को उजागर करती हैं।
  • जब कोई पीड़ित अपने ही हत्यारों के लिए सहानुभूति प्रकट करने लगे, तो वह करुणा नहीं होती, बल्कि यह सांस्कृतिक आत्मगौरव और नैतिक स्पष्टता के पतन का संकेत है।

शोक एक निजी अनुभव है। आपको यह स्वतंत्रता है कि आप चुपचाप शोक मनाएँ, सबके सामने रोएँ, या एक आँसू भी न बहाएँ। शोक हर व्यक्ति को अलग तरह से प्रभावित करता है, और किसी को यह अधिकार नहीं कि वह तय करे कि कोई अपने प्रियजन की मृत्यु के दुख को कैसे अनुभव करे। लेकिन जहाँ शोक व्यक्तिगत होता है, वहीं सत्य सार्वजनिक होता है — और सत्य से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

जब कोई राष्ट्र एक भयानक त्रासदी से गुजर रहा हो, तब यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उस त्रासदी के तथ्यों को किसी भावनात्मक राहत या सुविधाजनक कथा के अनुसार तोड़ा-मरोड़ा जाए। पैहलगाम आतंकी हमले की सच्चाई स्पष्ट है: चार सशस्त्र मुस्लिम आतंकवादियों ने 26 निर्दोष हिंदू पर्यटकों की हत्या की। उन्होंने पहले उनके नाम पूछे, फिर उन्हें पैंट उतरवाकर यह जाँचा कि वे खतना किए गए हैं या नहीं, और अंत में उनसे इस्लामी कलमा पढ़ने को कहा।[1] जब यह निश्चित हो गया कि वे मुस्लिम नहीं हैं, तभी उन्होंने गोलियाँ चलाईं।[2]

यह कोई अनियोजित हिंसा नहीं थी। यह उन वामपंथी बुद्धिजीवियों के दावों की तरह नहीं था जो इसे ग़रीबी या भटके हुए युवकों की प्रतिक्रिया बताकर पेश करते हैं। यह एक सोच-समझकर की गई, सुनियोजित और मजहबी उद्देश्य से प्रेरित आतंकवादी कार्रवाई थी। यहाँ मजहब कोई संयोग नहीं था — बल्कि वही कसौटी थी, जिसके आधार पर तय किया गया कि कौन मरेगा और कौन बचेगा।

नैरेटिव का विकृतिकरण

पैहलगाम की त्रासदी के बाद के भावनात्मक माहौल में यह स्वाभाविक है कि बचे हुए पीड़ित लोग कोई अर्थ तलाशें या ऐसा नैरेटिव अपनाएँ जो उन्हें मानसिक सहारा दे। लेकिन कुछ लोग इससे भी एक कदम आगे बढ़ गए – या शायद उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित किया गया – जब उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि इस हमले का मजहब से कोई संबंध नहीं था, और हमलावर केवल गुमराह युवक थे, जिन्हें धोखे से भटकाया गया था, या जो ग़रीब स्कूल अध्यापकों के बेटे थे और किसी बड़े राजनीतिक षड्यंत्र में फँस गए थे।

यह न केवल तथ्यात्मक रूप से ग़लत है — बल्कि यह एक जानबूझकर फैलाया गया झूठ है – एक बहुत खतरनाक झूठ !

ऐसे चित्रण हत्यारों को मानवीय दिखाने की कोशिश करते हैं। साथ ही उस वैचारिक नफरत को भी कमज़ोर करके पेश करते हैं जो वास्तव में इस हिंसा का मूल कारण थी। ये नैरेटिव उस मजहबी कट्टरता से ध्यान हटाते हैं जो पहचान के आधार पर हत्या को वैध ठहराती है। ऐसा करके वे जनता को भ्रमित करते हैं, नीति-निर्माण को भटका देते हैं, और पीड़ितों की स्मृति का अपमान करते हैं।

किसी को भी व्यक्तिगत शोक की आड़ लेकर देश को गुमराह करने का अधिकार नहीं है।

सुविधाजनक संवेदना

लेकिन कुछ पीड़ित सच में यही कर रहे हैं — चाहे जानबूझकर या अनजाने में। कोच्चि की निवासी आरती आर. मेनन, जिनके 65 वर्षीय पिता एन. रामचंद्रन की आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी, ने कहा कि संकट के समय दो स्थानीय मुस्लिम पुरुषों — जिनमें से एक उनका ड्राइवर था — ने उनकी मदद की और उन्हें शवगृह तक पहुँचाया। मेनन ने कहा, “उन्होंने मेरी देखभाल एक बहन की तरह की।” श्रीनगर से रवाना होते हुए उसने ने यह भी कहा: “अब मेरे दो भाई कश्मीर में हैं। अल्लाह उन्हें सुरक्षित रखे।”[3]

कितनी बेतुकी बात है! क्या एक पिता की हत्या का दुख दो तथाकथित “भाइयों” की सहानुभूति से पूरा हो सकता है? अपने इन हल्के और अनावश्यक बयानों से आरती मेनन ने अपनी ही त्रासदी को बेमतलब बना दिया। क्या वह 3,000 किलोमीटर दूर अपने केरल स्थित घर पहुँचने तक रुक नहीं सकती थीं, ताकि उनका मन स्थिर हो पाता? क्या वह अपने पिता के अंतिम संस्कार के बाद तक प्रतीक्षा नहीं कर सकती थीं? इतनी जल्दी धर्मनिरपेक्षता का सार्वजनिक प्रदर्शन क्यों आवश्यक हो गया था? जॉर्ज ऑरवेल के शब्दों में कहें तो एक बेटी ने अपने पिता की हत्या की सच्चाई से ध्यान हटाकर, उन्हें एक ‘न-व्यक्ति’ (unperson) बना दिया: ऐसा व्यक्ति जिसकी पहचान या अस्तित्व को जानबूझकर नकारा गया हो, विशेषकर राजनीतिक कारणों से।[4]

अब बात करें ऐशन्य द्विवेदी की, जिन्होंने प्रारंभ में भारतीय मीडिया को बताया था कि आतंकियों ने हिंदुओं को — जिनमें उनके पति शुभम द्विवेदी भी शामिल थे — मुस्लिम पर्यटकों से अलग कर गोली मारी। लेकिन बाद में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा: “आतंकवादी किसी जाति के नहीं होते। वे इंसान नहीं हैं। तो हम क्यों बात कर रहे हैं कि वे हिंदू थे या मुस्लिम?”[5]

क्या बीबीसी ने उनके विचारों को किसी प्रकार से प्रभावित किया?

सबसे चौंकाने वाला मामला भारतीय नौसेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट विनय नारवाल की पत्नी हिमांशी का है। वह इस त्रासदी का प्रतीक बन गईं जब उनकी एक तस्वीर वायरल हुई जिसमें वह अपने मृत पति के शव के पास अकेली बैठी थीं। हमले के कुछ ही मिनटों बाद उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा: “उन्होंने कहा कि तुम मुस्लिम नहीं हो और उन्हें गोली मार दी।”[6] उस समय उन्होंने साफ़ तौर पर स्वीकार किया कि यह हमला हिंदुओं को निशाना बनाकर किया गया था। लेकिन बाद में, जब उन्होंने विभिन्न मीडिया चैनलों को इंटरव्यू दिए, तो उन्होंने इस हत्याकांड को कम करके बताने का प्रयास किया और ज़ोर देकर कहा कि कश्मीरियों या मुसलमानों के प्रति कोई नफ़रत नहीं होनी चाहिए।[7]

यह लेख सभी कश्मीरी मुसलमानों को दोषी नहीं ठहराने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह समझने का प्रयास है कि अपनी निजी त्रासदी के बीच हिमांशी ने अपने पति के लिए न्याय की माँग से पहले धर्मनिरपेक्षता की दुहाई क्यों दी। सच तो यह है कि रिपोर्टरों के पूछने पर ही उन्होंने “न्याय” शब्द का प्रयोग किया — और वह भी जैसे एक औपचारिकता निभाने के लिए। और भी चौंकाने वाली बात यह थी कि अपने पति के अंतिम संस्कार के समय उनका व्यवहार किसी शोकसंतप्त पत्नी जैसा नहीं, बल्कि किसी सामाजिक समारोह जैसा प्रतीत हो रहा था।[8]

हिमांशी के सोशल मीडिया की समीक्षा से उनके सोचने के ढंग की एक अलग ही तस्वीर सामने आई है। वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की उपज हैं — वह संस्थान जो हिंदू-विरोधी गतिविधियों का केंद्र बन चुका है, जहाँ कम्युनिस्ट और अन्य राष्ट्रविरोधी विचारधाराएँ समाज के नैरेटिव पर प्रभाव डालती हैं। उनके कई पोस्ट इस बात का संकेत देते हैं कि वह कश्मीरी मुस्लिम पुरुषों, मुस्लिम संस्कृति और मुस्लिम खानपान के प्रति गहराई से आकर्षित थीं।

यह आकर्षण इतना अधिक था कि वह अपने मुस्लिम दोस्तों में मौजूद कट्टरपंथ को नजरंदाज करती रहीं। एक पोस्ट में उन्होंने 2018 में एक मंदिर में एक मुस्लिम लड़की के साथ हुए बलात्कार के लिए पूरे हिंदू समाज और मंदिरों को दोषी ठहराया।[9] लेकिन जब मुस्लिम आतंकवादियों ने उनके पति की हत्या की, तब उन्होंने हिंदुओं से अपील की कि वे कश्मीरियों और मुसलमानों को दोष न दें। यह विरोधाभास हैरान करने वाला है।

हिमांशी का राष्ट्रीय एकता का आह्वान सराहनीय हो सकता है, लेकिन जब वह सत्य, जवाबदेही और न्याय की कीमत पर आए, तब वह धर्मनिरपेक्षता नहीं बल्कि एक प्रकार का चयनात्मक अंधापन बन जाता है।

नैतिक पतन

शल मीडिया पर कुछ महिलाओं के वीडियो सामने आए, जिनमें वे कह रही थीं कि उन्होंने कश्मीर में “बेहतरीन समय” बिताया और “स्थानीय लोगों से कोई खतरा नहीं लगा।” ऐसा एक वीडियो होटल स्टाफ द्वारा रिकॉर्ड किया गया प्रतीत होता है, संभवतः तब जब टूर ऑपरेटरों ने रिफंड दिए होंगे; उसमें पर्यटक अपनी यात्रा से संतुष्टि जताते दिखे। एक अन्य वीडियो में केरल की एक महिला ने भी ऐसे ही विचार व्यक्त किए, यह कहते हुए कि उनकी पूरी यात्रा सुखद रही और स्थानीय लोग बेहद मिलनसार थे। यह प्रतिक्रियाएँ उस खूनी हमले के केवल 48 घंटे बाद आईं। उसकी यह प्रतिक्रिया कई लोगों को बहुत बेहूदा और संवेदनारहित लगीं।[10]

ऐसे मामलों से यह सवाल उठता है कि मीडिया नैरेटिव और व्यावसायिक हित किस हद तक जनमत को प्रभावित करने का कार्य कर रहे हैं। जब आराम, पर्यटन और ग्राहक संतुष्टि को एक राष्ट्रीय शोक से ऊपर रखा जाने लगे, तो ऐसा लगता है कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच एक गहरी मानसिक दूरी बन चुकी है।

वैचारिक विकृति

डर, दबाव, और ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ जैसी स्थितियाँ भारतीय आतंक पीड़ितों के इस विचित्र व्यवहार का आंशिक कारण हो सकती हैं। लेकिन इसकी असली जड़ शायद और भी ज़्यादा ख़तरनाक है: वैचारिक विकृति (Ideological Subversion)।

इस मानसिक बदलाव को समझने के लिए यूरी बेज़मेनोव के विचारों को समझना होगा। वह एक पूर्व केजीबी एजेंट थे, जो 1970 के दशक में भारत में कार्यरत थे। बाद में वे पश्चिमी देशों में भाग गए और उन्होंने सोवियत संघ की मनोवैज्ञानिक युद्ध नीति को उजागर किया, विशेषकर वैचारिक विघटन को — यानी एक राष्ट्र की सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों को धीरे-धीरे, योजनाबद्ध ढंग से कमजोर करना।[11]

बेज़मेनोव ने बताया था कि वैचारिक विघटन का उद्देश्य किसी देश की सामाजिक संरचना को एक-दो साल में नहीं, बल्कि पीढ़ियों में तोड़ना होता है। यह तात्कालिक विजय की कोशिश नहीं होती, बल्कि यह लोगों की सोच, उनकी व्याख्या और उनकी प्रतिक्रियाओं को धीरे-धीरे बदलने की प्रक्रिया होती है। समय के साथ, इस प्रक्रिया के शिकार लोग ऐसे नैरेटिव से सहानुभूति रखने लगते हैं, जो उनके अपने हितों के विरुद्ध होता है और उनकी अपनी पहचान को कमजोर करता है — चाहे उनके सामने कितना भी ठोस सबूत क्यों न हो।

भारत में यह प्रक्रिया सोवियत प्रभाव से बहुत पहले ही शुरू हो चुकी थी। 1835 में लागू की गई मैकॉले की शिक्षा नीति ब्रिटिश शासन की एक सोच-समझी कोशिश थी — एक ऐसा वर्ग तैयार करने की जो ब्रिटिश सोच के प्रति अधिक वफादार हो, बजाय अपनी खुद की सांस्कृतिक विरासत के। बाद में नेहरूवादी नीतियों ने इसी ढाँचे को आगे बढ़ाया, जिसमें अंग्रेज़ी-केंद्रित आधुनिकीकरण को अपनाया गया और भारतीय (Indic) विचारधारा को हाशिये पर डाल दिया गया।[12]

1970 के दशक तक आते-आते केजीबी ने भारत में अपने मनोवैज्ञानिक अभियानों को और तेज कर दिया था। इसका मुख्य निशाना था — शिक्षा व्यवस्था, मीडिया और राजनीतिक संस्थाएँ। इसका उद्देश्य था एक ऐसा दृष्टिकोण स्थापित करना जो हिंदू धर्म के प्रति संदेहपूर्ण हो, उसकी सांस्कृतिक मान्यताओं को तुच्छ समझे, और वैश्विकतावादी व वामपंथी विचारधाराओं को सहज रूप से अपनाए।

एक व्यापक युद्ध के शिकार

इस पृष्ठभूमि में शुभम द्विवेदी की पत्नी और हिमांशी नारवाल के बयानों में देखा गया विरोधाभास कोई संयोग नहीं, बल्कि एक गहरे मानसिक विकृति का संकेत है। जिस तरह उन्होंने शुरू में स्वीकार किया कि यह हमला हिंदुओं को लक्ष्य बनाकर किया गया था, लेकिन बाद में इसे एक अमूर्त, सार्वभौमिक पीड़ा के रूप में प्रस्तुत किया — वह केवल व्यक्तिगत शोक नहीं बल्कि दीर्घकालिक वैचारिक प्रोग्रामिंग का परिणाम लगता है, जो किसी भी हिंदू चिंता से स्वयं को जोड़ने से रोकती है।

हिमांशी की पृष्ठभूमि इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करती है। उनके पुराने सोशल मीडिया पोस्टों में हिंदू समुदाय को सामाजिक समस्याओं के लिए दोषी ठहराया गया है। इस प्रकार के विचार आज भारत के कई शैक्षणिक और मीडिया हलकों में आम हैं, जहाँ उत्तर-आधुनिकतावादी और मार्क्सवादी नैरेटिव प्रमुख हैं, और हिंदू धर्म को बार-बार एक उत्पीड़क या पिछड़ी हुई व्यवस्था के रूप में चित्रित किया जाता है।

जब ऐसी विचारधाराएँ किसी व्यक्ति के भीतर गहराई से बैठ जाती हैं, तो पीड़ित भी स्वयं को दोषी मानने लगते हैं या अपनी ही सच्चाई से मुँह मोड़ लेते हैं। जब कोई व्यक्ति ऐसे नैरेटिव्स का समर्थन करने लगे जो उसके हितों के विरुद्ध हो, तो समझ लेना चाहिए कि वैचारिक विघटन अंतिम सफलता के चरण पर पहुँच चुका है।

चेतना का संकट

भारत में लंबे समय से एक संगठित वामपंथी इकोसिस्टम — जिसमें शैक्षणिक संस्थाएँ, मुख्यधारा मीडिया और कुछ राजनीतिक ताकतें शामिल हैं — जनचर्चा को दिशा देता रहा है। यह इकोसिस्टम एक वैश्विकतावादी, धर्मनिरपेक्ष सोच को बढ़ावा देता है, जिसमें हिंदू पीड़ा को स्वीकारना या तो संप्रदायवाद माना जाता है या एक प्रकार की ‘विक्टिम मानसिकता’। ऐसे वातावरण में किसी आतंकी की धार्मिक पहचान उजागर करना भड़काऊ माना जाता है, जबकि उसे नकारना प्रगतिशीलता की निशानी बन जाता है।

यह केवल राजनीतिक औपचारिता नहीं — बल्कि एक मनोवैज्ञानिक युद्ध है। यह हिंदुओं की ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक पहचान और समाज में उनके स्थान को देखने के नज़रिए को ही विकृत कर देता है। समय के साथ यह ऐसी पीढ़ियाँ तैयार करता है जो या तो अपनी जड़ों से कट चुकी होती हैं या उनसे शर्मिंदगी महसूस करती हैं।

अदृश्य युद्ध

वैचारिक विघटन कोई उद्घोष नहीं करता। यह धीरे-धीरे, चुपचाप काम करता है — पाठ्यपुस्तकों, मीडिया नैरेटिव्स और सावधानी से चुनी गई भाषा के माध्यम से। यह सिखाता है कि अपनी पहचान की रक्षा करना पिछड़ापन है, ऐतिहासिक अन्याय को याद रखना सांप्रदायिकता है, और आत्मरक्षा करना उग्रवाद है।

यह केवल विचारों की लड़ाई नहीं — बल्कि एक पूरी सभ्यता के अस्तित्व की लड़ाई है।

हिमांशी नारवाल और शुभम द्विवेदी की पत्नी जैसे लोगों के बयान केवल आतंकवाद की भयावहता को नहीं दर्शाते — वे उस वैचारिक युद्ध की गहराई को उजागर करते हैं, जो भारतीय समाज की चेतना में गहराई तक समा चुका है। अगर वे लोग, जिन्होंने सब कुछ खो दिया, सच्चाई को नाम देने में हिचकिचा रहे हैं, तो समझ जाइए कि असली नुकसान कुछ लोगों की हत्या से बहुत बड़ा है, और वो है स्पष्ट सोच, पहचान, और आत्मबल का पतन।

हमें सोचना होगा कि क्या हम केवल कुछ बिखरी घटनाओं को देख रहे हैं, या एक लम्बे वैचारिक युद्ध का परिणाम, जो एक पूरे राष्ट्र के मानस में लड़ा जा रहा है?

तथ्य साहस माँगते हैं

आतंकवाद के पीछे की विचारधारा को स्पष्ट रूप से पहचानना — नैतिक स्पष्टता और साहस दोनों की माँग करता है। पैहलगाम हमला इसी साहस की कसौटी पर खड़ा है। इसमें जो विचारधारा सक्रिय थी, वह थी इस्लामी कट्टरपंथ। ये हमलावर ग़ुस्से में नहीं थे; उन्होंने पूरी योजना के तहत, मजहबी पहचान के आधार पर हिंदुओं को निशाना बनाया।

यह हमला आस्था के नाम पर की गई सुनियोजित नफ़रत का परिणाम था।

इस सच्चाई को स्वीकार करना कट्टरता को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि ईमानदारी और चेतना की माँग है। यदि हमें भविष्य में अपनी सभ्यता को बचना हैं, तो पहले यह ईमानदारी से समझना होगा कि ये हत्याएं क्यों हुईं।

निष्कर्ष
आप जैसे चाहें, वैसे शोक मना सकते हैं — चुपचाप या सार्वजनिक रूप से, आँसुओं के साथ या मौन धैर्य से। लेकिन आप तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश नहीं कर सकते। किसी प्रियजन को आतंकवाद में खोने का दुख अपार है, लेकिन उससे भी अधिक भयावह है उस त्रासदी की सच्चाई को दफ़न करना।

हमारा कर्तव्य केवल यह याद रखना नहीं कि वे मारे गए — बल्कि यह भी याद रखना है कि क्यों मारे गए।

 

संदर्भ सूची 

[1] What Is Kalima? The Sacred Islamic Verse Cited By Pahalgam Survivors (NDTV News, 2025); https://www.ndtv.com/india-news/what-is-kalima-the-sacred-islamic-verse-cited-by-pahalgam-survivors-8242366

[2] ‘Terrorists fired after asking tourists’ names’: Pahalgam attack victim’s cousin (Hindustan Times, 2025); https://www.hindustantimes.com/india-news/firing-began-after-terrorists-asked-tourists-names-pahalgam-terror-attack-victim-s-cousin-death-toll-shubham-dwivedi-101745369738426.html

[3] ‘I have two brothers in Kashmir now’; Kochi native who lost father to Pahalgam attack recounts being helped by locals (New Indian Express, 2025); https://www.newindianexpress.com/nation/2025/Apr/24/i-have-two-brothers-in-kashmir-now-kochi-native-who-lost-father-to-pahalgam-attack-recounts-being-helped-by-locals#:~:text=’I%20have%20two%20brothers%20in%20Kashmir%20now’%3B%20Kochi%20native,May%20Allah%20protect%20you%20both.%22

[4] Unperson 1984 (Book Analysis); https://bookanalysis.com/1984/unperson/

[5] Both the statements given by Shubham Dwivedi’s wife are completely contrasting to each other (Diksha Kanpal on X, 2025); https://x.com/DikshaKandpal8/status/1918204110064762983

[6] She is the same girl who earlier said “Muslim ni hai bol ke goli maar di’ (Diksha Kanpal on X, 2025); : https://x.com/DikshaKandpal8/status/1918195098401296688

[7] Himanshi, the wife of Lieutenant Vinay Narwal Blames Kashmiri Hindus and temples for Asifa. But she says don’t blame Kashmir and Muslims Even when Islamist terrorists killed her husband (Yanika_Li on X, 2025); https://x.com/LogicLitLatte/status/1918237802191311320

[8] Himanshi Swami, the wife of Vinay Narwal. This is a Shraddhanjali ceremony, not Aashirwad ceremony (Lady Khabri on X, 2025); https://x.com/KhabriBossLady/status/1919372730102595922

[9] Himanshi, the wife of Lieutenant Vinay Narwal Blames Kashmiri Hindus and temples for Asifa. But she says don’t blame Kashmir and Muslims Even when Islamist terrorists killed her husband (Yanika_Li on X, 2025); https://x.com/LogicLitLatte/status/1918237802191311320

[10] Kerala women says “Acha Lagra hai bohot maja mar rahe hai humlog” in Kashmir despite Pahalgam Attack (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=y8-Lze5_wr8

[11] Yuri Bezmenov on India (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=XgHkJLaxBno

[12] Demerits Of Macaulay Education System (LivingSmartly.com); https://living-smartly.com/2022/08/demerits-macaulay-education-system/

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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