भारत को ग़ुलामी की मानसिकता से मुक्त कराने की मुहिम: लुटियंस-मैकॉले एलीट तंत्र में मचा हड़कंप
सारांश
राष्ट्रपति भवन से एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटाने के हालिया निर्णय ने भारत की औपनिवेशिक विरासत पर बहस को फिर से तेज कर दिया है। लुटियंस–मैकॉले सोच से प्रभावित कुछ आलोचक इसे इतिहास मिटाने की कोशिश के रूप में पेश कर रहे हैं। जबकि सच यह है कि यह कदम भारत में औपनिवेशिक विरासत के पुनर्विचार की चल रही राष्ट्रीय प्रक्रिया को प्रतिबिंबित करता है।। इस लेख का तर्क है कि बौद्धिक अभिजात वर्ग के कुछ हिस्से अब भी औपनिवेशिक हस्तियों का महिमामंडन करते हैं और स्वदेशी सभ्यतागत दृष्टियों व ज्ञान-परंपराओं को कमतर आंकते हैं। लुटियंस विवाद, औपनिवेशिक नामों के परिवर्तन और मैकॉले की विरासत पर प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना के संदर्भ में यह लेख दिखाता है कि भारत औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर अपनी सभ्यतागत जड़ों से जुड़े सांस्कृतिक आत्मविश्वास की ओर बढ़ रहा है।
भारतीय सार्वजनिक विमर्श में “लुटियंस एलीट” उस बौद्धिक वर्ग के लिए प्रयुक्त शब्द है, जो अक्सर भारत की सांस्कृतिक विरासत की अवहेलना करता है और उसकी सभ्यतागत चेतना का उपहास करता है। इसके विपरीत, पश्चिमी मूल्यों और परंपराओं के प्रति यही वर्ग अत्यधिक प्रशंसा व्यक्त करता है और उनका अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन करता रहता है। पश्चिमी सभ्यता को यह बिना किसी आलोचनात्मक दृष्टि के स्वीकार करता है और उसे आदर्श मानकर प्रस्तुत करता है। इस विचारधारा से जुड़े लोगों की एक और विशेषता यह है कि वे अक्सर भारत की उपलब्धियों, और यहाँ तक कि उसकी पहचान के कुछ तत्वों का श्रेय भी विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन को देते हैं—चाहे वे इस्लामी आक्रांता हों या यूरोपीय उपनिवेशवादी।
यद्यपि पिछले एक दशक में भारत सभ्यतागत और सांस्कृतिक स्तर पर उल्लेखनीय पुनर्जागरण का अनुभव कर चुका है, फिर भी औपनिवेशिक सोच से प्रभावित वह पुराना बौद्धिक तंत्र किसी न किसी रूप में अपना प्रभाव बनाए हुए है।
हाल ही में सरकार ने राष्ट्रपति भवन के वास्तुकार, ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटाकर उसकी जगह स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित की। इस निर्णय पर उसी परिचित बौद्धिक तंत्र से तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। विरोध के स्वर फिर उसी पुराने पैटर्न को दोहराते दिखे, जिसमें औपनिवेशिक विरासत के बचाव के साथ-साथ सरकार पर भारत के सभ्यतागत इतिहास को “राइट-विंग” अर्थात दक्षिणपंथी रंग देने का आरोप लगाया गया।
लेकिन लुटियंस की तथाकथित विरासत के केंद्र में वास्तव में क्या है? औपनिवेशिक भव्यता की चमकदार सतह के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है—गहरी जड़ें जमा चुका नस्लवाद, सुधार के नाम पर औपनिवेशिक शासन का औचित्यकरण, और सभ्यतागत विघटन को आधुनिक प्रगति के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति। यही तत्व इस तथाकथित विरासत की वास्तविक प्रकृति को उजागर करते हैं।
आगे के खंडों में यह देखा जाएगा कि किस प्रकार औपनिवेशिक ढाँचे के धीरे-धीरे क्षीण होने के बावजूद एक प्रभावशाली वर्ग अब भी उसके अवशेषों से भावनात्मक लगाव बनाए हुए है। यह वर्ग न केवल औपनिवेशिक विरासत का महिमामंडन करता है, बल्कि मैकॉले की आलोचना को भी अंग्रेज़ी भाषा के प्रति शत्रुता के रूप में प्रस्तुत करता है।
लुटियंस की विरासत और भारत का औपनिवेशिक बुख़ार
आज़ादी के कई दशक बाद भी भारत की औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था की संरचनाओं पर बनी निर्भरता—चाहे वह भौतिक रूप में हो या मानसिक स्तर पर—एक उल्लेखनीय परिघटना है। इसका एक कारण यह माना जा सकता है कि विभिन्न सरकारों ने स्वदेशी मूल्यों पर आधारित एक स्वतंत्र प्रशासनिक ढाँचा और नई अवसंरचना विकसित करने में अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई।
लेकिन यह सरलीकृत व्याख्या पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करती। स्वतंत्रता के बाद उभरे नेहरूवादी बौद्धिक परिवेश की जटिलताओं को समझे बिना इस स्थिति का सम्यक् आकलन संभव नहीं है। इस वैचारिक ढाँचे के भीतर अक्सर भारत की आधुनिक पहचान को पश्चिमी आदर्शों और मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित किया गया, मानो स्वतंत्रता के बाद की भारत की पहचान भी “औपनिवेशिक विरासत” की निरंतरता का ही एक विस्तार हो।
सन् 2007 में द लुटियंस ट्रस्ट ने नई दिल्ली में INTACH (Indian National Trust for Art and Cultural Heritage) के सहयोग से एक प्रदर्शनी और अध्ययन यात्रा आयोजित की। “Rashtrapati Bhavan in Context: The Work of Sir Edwin Lutyens O.M.” शीर्षक वाली इस प्रदर्शनी में लुटियंस के शुरुआती कार्यों के विकासक्रम, नई दिल्ली के उनके स्थापत्य-डिज़ाइन की कहानी, और दिल्ली की वास्तुकला के उनके बाद के प्रोजेक्ट्स पर पड़े प्रभाव को दर्शाया गया। द लुटियंस ट्रस्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस प्रदर्शनी के लिए भारत के राष्ट्रपति कार्यालय ने भी राष्ट्रपति भवन से कई वस्तुएँ उधार दी थीं।[1]
लुटियंस की विरासत का यह लगभग निर्विवाद महिमामंडन स्वतंत्रता के बाद के नेहरूवादी बौद्धिक परिवेश की एक चिंताजनक प्रवृत्ति को उजागर करता है। इस प्रवृत्ति के अंतर्गत भारतीयों के प्रति व्यक्त घोर नस्लवादी विचारों को या तो हल्का करके प्रस्तुत किया गया या पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया, जबकि पश्चिमी श्रेष्ठता के औपनिवेशिक आख्यानों को भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान के वैध मानदंड के रूप में स्वीकार किया गया।
आधुनिक भारत के स्थापत्य परिदृश्य को आकार देने के लिए जिन एडविन लुटियंस की कुछ हलकों में अत्यधिक प्रशंसा की जाती है, उनके विचार वास्तव में इतने तीव्र रूप से नस्लवादी थे कि पश्चिम में भी बहुत से लोग उनका बचाव करने में असहज महसूस करेंगे।
भारतीय मज़दूरों का उल्लेख करते हुए लुटियंस ने अपनी पत्नी एमिली ईडन को लिखे पत्रों में कहा था, “उन्हें गुलामी में धकेल देना चाहिए…उन्हें जंगली जानवरों की तरह पीटना चाहिए और नरभक्षियों की तरह गोली मार देनी चाहिए।” आम भारतीयों को लेकर भी उनके विचारों में भी कोई अस्पष्टता नहीं थी। उन्होंने कहा था, “परिचय बढ़ने से इनमें कोई सुधार नहीं होता…औसत भारतीय एक निराशाजनक प्राणी प्रतीत होता है।”[2]
हाल ही में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति भवन के केंद्रीय प्रांगण से लुटियंस की प्रतिमा हटाने की घोषणा की, तो उन्होंने कहा, “आज देश गुलामी के प्रतीकों को पीछे छोड़ रहा है और भारतीय संस्कृति से जुड़े प्रतीकों को महत्व देना शुरू कर चुका है।” प्रधानमंत्री की घोषणा के तुरंत बाद, अगले ही दिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा का अनावरण किया।[3]
लुटियंस की प्रतिमा हटाने को लेकर आक्रोश
राष्ट्रपति भवन से लुटियंस की प्रतिमा हटाने का निर्णय अचानक इतना विवादास्पद बन गया कि एडविन लुटियंस के परपोते मैट रिडली ने भी इस कदम की तीखी आलोचना की। उन्होंने X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा,
“यह पढ़कर दुख हुआ कि दिल्ली के उस राष्ट्रपति भवन से लुटियंस (मेरे परदादा) की प्रतिमा हटाई जा रही है, जिसे उन्होंने ही डिज़ाइन किया था। पिछले साल मैं यहाँ इसी प्रतिमा के साथ खड़ा था। उस समय ही मुझे आश्चर्य हुआ था कि इसके चबूतरे से उनका नाम क्यों हटा दिया गया था।”[4]
कई विपक्षी नेताओं ने भी इस निर्णय को राजनीतिक रंग देते हुए सरकार पर आरोप लगाया कि वह इतिहास और विरासत को जबरन मिटाने का प्रयास कर रही है और “राष्ट्र के जीवित इतिहास” की विरासत को समाप्त कर रही है।[5]
रिडली का अपने पूर्वज की प्रतिमा से भावनात्मक जुड़ाव समझ में आता है। लेकिन उनकी तीखी प्रतिक्रिया एक असहज सच्चाई की ओर भी संकेत करती है: स्वतंत्रता के बाद के नेहरूवादी तंत्र की औपनिवेशिक विरासत को बनाए रखने और उसका महिमामंडन करने की प्रवृत्ति। अगर बीते दशकों में अलग-अलग सरकारों ने धीरे-धीरे ब्रिटिश शासन के प्रतीकात्मक अवशेषों से दूरी बनाने की दिशा में कदम उठाए होते, तो शायद यह असहज विवाद पैदा ही नहीं होता।
इस पूरे प्रसंग में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात वाम-उदारवादी बौद्धिक वर्ग की वही परिचित प्रतिक्रिया थी जहां एक तरफ़ एक तंत्र-विशेष की मानसिकता को उजागर करती है, वही दूसरी तरफ़ औपनिवेशिक विरासत का यह खुला महिमामंडन कुछ-कुछ विचलित भी करता है। कुछ ही दिनों में भारतीय मीडिया में इस कदम की आलोचना करते हुए संपादकीय और लेखों की बाढ़ आ गई। The Indian Express द्वारा प्रकाशित एक लेख का शीर्षक था— “Edwin Lutyens’ bust is removed for ‘decolonisation’. Do we need to erase the past that shapes us? (‘डिकॉलोनाइजेशन’ के नाम पर लुटियंस की प्रतिमा हटाना—क्या हमें अपने अतीत से इस तरह नाता तोड़ना चाहिए?)[6]
इसी तरह ArchitectureLive! में प्रकाशित एक अन्य लेख ने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में यह दावा किया कि सरकार का यह कदम इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। लेख में कहा गया: “वर्तमान भारतीय सरकार ने राष्ट्रपति भवन में एडविन लुटियंस की प्रतिमा की जगह स्वतंत्रता सेनानी सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित की और इसे ‘डिकॉलोनाइजेशन’ के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन मात्र प्रतीकात्मक कदम शासन, जाति और संस्थानों में गहराई से जमे औपनिवेशिक मानसिक ढाँचों को समाप्त नहीं कर सकते।”[7]
लुटियंस की प्रतिमा हटाने के फैसले की आलोचना The Hindu में प्रकाशित एक लेख—“British Architect Sir Edwin Lutyens and His Madras Connection” (ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस और उनका मद्रास से जुड़ाव) में भी की गई। इसमें लेखक ने लिखा: “मैं राष्ट्रपति भवन में राजाजी की प्रतिमा स्थापित किए जाने का स्वागत करता हूँ, लेकिन परिसर से सर एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटाया जाना खेदजनक है। हाँ, वे निस्संदेह नस्लवादी थे। लेकिन इसमें भी कोई संदेह नहीं कि वे एक प्रतिभाशाली वास्तुकार थे, जिन्होंने हमारी राजधानी को एक विशिष्ट पहचान दी।” लेख आगे लुटियंस के चेन्नई से संबंधों को लेकर एक प्रकार की स्मृतिमूलक प्रशंसा में चला जाता है, मानो उनके तीखे नस्लवादी विचारों का उल्लेख केवल औपचारिकता भर हो, जिसे सहजता से स्वीकार कर चुपचाप किनारे कर दिया गया हो।[8]
इसी तरह Indian Currents में प्रकाशित एक अन्य लेख—“Modi’s New India – The Politics of Erasure” (मोदी का नया भारत – विलोपन की राजनीति) में भी यह दावा किया गया कि सरकार राष्ट्रपति भवन से लुटियंस की प्रतिमा हटाने जैसे कदमों के जरिए इतिहास को नया रूप दे रही है। इस लेख में लेखक ने लुटियंस के उग्र नस्लवाद को लगभग अनदेखा करते हुए यह तर्क दिया कि वे एक वास्तुकार थे, उपनिवेशवादी नहीं।[9]
विडंबना यह है कि जिसे सभ्यतागत आत्मसम्मान की एक आवश्यक और स्वागतयोग्य पहल के रूप में देखा जाना चाहिए था, वह केवल टीवी चैनलों की शोरगुल भरी बहसों का मुद्दा बन कर रह गया।[10] [11] इन बहसों में लुटियंस समर्थक पैनलिस्ट ब्रिटिश “औपनिवेशिक विरासत” के कथित गुणों का बचाव करते नज़र आए, मानो उन्हें इस विडंबना का एहसास ही न हो कि उनके ही कितने पूर्वजों ने इसी विरासत के ख़िलाफ़ संघर्ष करते हुए अपने प्राण न्योछावर किए थे।
StopHinduDvesha ने इस प्रवृति को “ब्राउन सिपाही सिंड्रोम” का नाम दिया है।[12] लुटियंस की प्रतिमा से जुड़े इस पूरे विवाद पर लुटियंस एलीट की प्रतिक्रिया इस प्रवृत्ति को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। अपनी ही सभ्यतागत विरासत का उपहास करने में तत्पर यह वर्ग औपनिवेशिक अवशेषों, यहाँ तक कि उनमें निहित नस्लवाद तक का बचाव करने से नहीं हिचकता। राष्ट्रपति भवन से लुटियंस की प्रतिमा हटाने की खबर के तुरंत बाद ही टीवी बहसों का दौर शुरू हो चला, जहाँ लुटियंस एलीट के प्रतिनिधि “श्वेत व्यक्ति के दायित्व” (white man’s burden) जैसे औपनिवेशिक मिथकों का नाटकीय रूपांतरण दोहराते हुए अपने ही देशवासियों को औपनिवेशिक विरासत के कथित गुणों पर उपदेश देते दिखाई दिए।
भारत का सभ्यतागत पुनर्जागरण
पिछले लगभग 10–12 वर्षों में भारत ने औपनिवेशिक ढाँचों को व्यवस्थित रूप से हटाने और उनकी जगह अपने प्राचीन सभ्यतागत एवं सांस्कृतिक परिवेश में निहित प्रतीकों और संरचनाओं को स्थापित करने की दिशा में सक्रिय कदम उठाए हैं। मई 2023 में भारत ने एक सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नए संसद भवन का उद्घाटन किया। इसके साथ ही ब्रिटिश वास्तुकार हरबर्ट बेकर और एडविन लुटियंस द्वारा डिज़ाइन किए गए पुराने संसद भवन की औपनिवेशिक विरासत को धीरे-धीरे भारतीय सभ्यतागत स्मृति के हाशिए पर पहुँचा दिया गया।
नए संसद भवन में सेंगोल की स्थापना भी एक महत्वपूर्ण सभ्यतागत क्षण था। सेंगोल एक स्वर्ण राजदंड, न्यायपूर्ण और धर्मसम्मत शासन का पारंपरिक प्रतीक है, जिसका उपयोग चोला राजाओं के समय निष्पक्ष शासन के प्रतीक के रूप में किया जाता था। यह सेंगोल मूल रूप से भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भेंट किया गया था, लेकिन इसे शासन-व्यवस्था के केंद्र में अपना उचित स्थान मिलने में लगभग सत्तर वर्ष लग गए। भारत के नये संसद भवन में सेंगोल की स्थापना का गहरा प्रतीकात्मक महत्व है। इस स्थापना के साथ ही भारत ने सांकेतिक रूप से पुराने औपनिवेशिक ढाँचों की परछाई से बाहर निकल अपनी मूल सभ्यतागत और धार्मिक चेतना की आधारशिला पर खड़े नये ढाँचों के माध्यम से अपनी शासन व्यवस्था को संचालित किया।[13]
इसी क्रम में फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का उद्घाटन किया। यह कदम पुराने पीएमओ, जिसे साउथ ब्लॉक के नाम से जाना जाता था और जिसे ब्रिटिश वास्तुकार हरबर्ट बेकर ने डिज़ाइन किया था, की औपनिवेशिक विरासत से आगे बढ़ने का संकेत था। नए पीएमओ, जिसे सेवा तीर्थ का नाम दिया गया है, का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश को औपनिवेशिक मानसिकता के हर अवशेष को पीछे छोड़ना होगा।[14]
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी उल्लेख किया कि स्वतंत्रता के बाद भी भारत लंबे समय तक औपनिवेशिक प्रतीकों से घिरा रहा, जैसे प्रधानमंत्री आवास का पता रेस कोर्स रोड और राष्ट्रपति भवन तक जाने वाले मार्ग का राजपथ, जो किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नाम नहीं था। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में आगे बढ़ते भारत के लिए विकसित राष्ट्र की छवि केवल नीतियों में ही नहीं, बल्कि उसके भवनों और सार्वजनिक स्थलों में भी दिखाई देनी चाहिए।[15]
“लुटियंस दिल्ली” शब्द यूँ ही प्रचलन में नहीं आया। यह शब्द दिल्ली की उस पहचान को दर्शाता है, जो लंबे समय तक औपनिवेशिक प्रतीकों से जुड़ी रही। सत्ता के केंद्र तक जाने वाली सड़कों के नाम कर्ज़न रोड, रेस कोर्स रोड, औरंगज़ेब रोड, किर्बी पैलेस और किचनर रोड सरीखे थे, मानो वे किसी नव-औपनिवेशिक शब्दावली की सूची से निकले हों। स्वतंत्र भारत के राजनीतिक केंद्र को कर्ज़न और औरंगज़ेब जैसे नामों से परिभाषित किया जाना स्वयं में एक सांस्कृतिक विसंगति था, फिर भी नई दिल्ली ने दशकों तक इसे सहज रूप से स्वीकार किए रखा। इस विडंबना को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था।
हालाँकि पिछले एक दशक में इनमें से कई नाम बदले गए हैं, जिससे तथाकथित “लुटियंस एलिट” को स्पष्ट असहजता हुई।
- रेस कोर्स रोडको 2016 में लोक कल्याण मार्ग नाम दिया गया।
- राजपथको 2023 में कर्तव्य पथ नाम मिला।
- उसी वर्षसेंट्रल सेक्रेटेरिएट भवन का नाम बदलकर कर्तव्य भवन रखा गया।[16]
इसी दिशा में भारतीय सेना ने भी हाल ही में एक बड़ा अभियान चलाया, जिसके तहत सैन्य क्षेत्रों में ब्रिटिश काल के 26 नामों को बदलने का निर्णय लिया गया। सेना प्रतिष्ठानों में मौजूद सड़कों, भवनों और सुविधाओं के औपनिवेशिक नाम हटाकर उनकी जगह भारतीय युद्ध-नायकों के नाम रखे गए।
दिल्ली कैंटोनमेंट में किर्बी प्लेस (ऑफिसर्स आवास) का नाम बदलकर केनुगुरुसे विहार रखा गया, जबकि मॉल रोड का नाम बदलकर अरुण खेत्रपाल मार्ग कर दिया गया।[17]
मैकॉले की विरासत पर छिड़ी बौद्धिक जंग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार मैकॉले की औपनिवेशिक विरासत को मानसिक दासता की मानसिकता से जोड़ते हुए उसकी आलोचना करते रहे हैं। उन्होंने बार-बार यह आग्रह किया है कि भारत को अपनी पहचान को अपने ही सांस्कृतिक और सभ्यतागत ढाँचों में पुनर्स्थापित करना चाहिए। हाल के कई भाषणों में उन्होंने उस मानसिकता से सचेत रूप से अलग होने की आवश्यकता पर बल दिया है, जिसे उन्होंने मैकॉले की नस्लवादी बौद्धिक विरासत बताया।
नवंबर 2025 में 6वें रामनाथ गोयनका व्याख्यान को संबोधित करते हुए उन्होंने इस मुद्दे पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि देश को यह संकल्प लेना होगा कि “मैकॉले ने भारत पर जो गुलामी की मानसिकता थोपी, उससे हमें स्वयं को मुक्त करना होगा।” यहाँ प्रधानमंत्री मैकॉले के 1835 के Minutes on Education की ओर संकेत कर रहे थे, जिसने भारत की शिक्षा-प्रणाली को औपनिवेशिक प्रोजेक्ट की आवश्यकताओं के अनुरूप ढाल दिया था। मोदी ने कहा, “मैकॉले ने हमारा आत्मविश्वास तोड़ दिया और हमारे भीतर हीनता की भावना भर दी। उसने एक झटके में हमारी पूरी जीवन-पद्धति को कूड़ेदान में फेंक दिया। यहीं से यह मानसिकता मजबूत हुई कि सफलता पाने के लिए भारतीयों को विदेशी रास्तों का अनुसरण करना होगा।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह मानसिकता स्वतंत्रता के बाद भी लंबे समय तक बनी रही।
प्रधानमंत्री का तर्क था कि मैकॉले की नीतियों ने व्यवस्थित रूप से भारत की स्वदेशी शिक्षा-परंपराओं को कमज़ोर कर दिया और उनकी जगह ब्रिटिश सोच और अंग्रेज़ी भाषा को स्थापित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप भारत ज्ञान, नवाचार और शासन के मॉडल के लिए अपनी सभ्यतागत परंपराओं से प्रेरणा पाने के के बजाय बाहर की ओर देखने लगा।[18]
भारतीय मनोवृत्ति के इस गहरे औपनिवेशीकरण पर टिप्पणी करते हुए प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत ने अपनी सभ्यतागत विरासत का तिरस्कार किया, जबकि दुनिया के अन्य देशों में लोग अपनी ऐतिहासिक धरोहर पर गर्व करते हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मैकॉले की विरासत ने एक ऐसा वातावरण तैयार किया, जिसमें हीनभावना से ग्रसित हो भारतीय अपनी ही भाषाओं का तिरस्कार करने लगे।[19]
मैकॉले की विरासत पर मोदी की तीखी आलोचना ने राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में तुरंत प्रतिक्रियाएँ भड़का दीं। लंबे समय तक लुटियंस एलीट से प्रभावित राजनीतिक परिवेश में किसी प्रधानमंत्री का खुले तौर पर मैकॉले की औपनिवेशिक विरासत को समाप्त करने का आह्वान करना नकारात्मक प्रतिक्रियाओं को खुले तौर पर आमंत्रित करने जैसा ही था। टीवी बहसों में कई पैनलिस्ट मैकॉले के बचाव में उतर आए और कुछ इस प्रकार के तर्क देने लगे कि प्रधानमंत्री अंग्रेज़ी भाषा और उसके परिणामस्वरूप भारतीयों को मिले अवसरों पर हमला कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने मैकालेवादी मानसिकता की जो आलोचना की थी, उसके मूल सार को समझने के बजाय बहस जल्दी ही अंग्रेज़ी भाषा के बचाव की दिशा में मुड गयी। कुछ चर्चाएँ तो फिर से उस चिर-परिचित औपनिवेशिक ढर्रे पर जाती दिखाई दीं, जहां ब्रिटिश शासन को तथाकथित सामाजिक सुधारों का श्रेय दिया जाता है और भारत में अंग्रेज़ी शिक्षा के माध्यम से “आधुनिकता” लाने हेतु उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है।[20] [21] [22]
प्रधानमंत्री के मैकॉले की विरासत को समाप्त करने के आह्वान के बाद मीडिया में तीखे और कई बार बेहद विषाक्त शीर्षकों वाले लेखों की बाढ़ आ गई। इनमें से अनेक लेखों में मैकॉले को “वंचितों के उद्धारक” के रूप में प्रस्तुत किया गया और पूरे विवाद को फिर से उसी चिर-परिचित “हिंदुत्व” के वैचारिक फ्रेम के भीतर रखकर देखा गया। कुछ शीर्षक इस प्रवृत्ति को स्पष्ट रूप से दिखाते हैं:
- “When RSS-Modi Attack Macaulay and English, They Attack Upward Mobility of Dalits, Shudras, Adivasis” ( जब आरएसएस-मोदी मैकॉले और अंग्रेज़ी भाषा पर प्रहार करते हैं, तो वे दलित, शूद्रों, आदिवासियों के समाज में आगे बढ़ने की प्रक्रिया पर चोट करते हैं),The Wire, दिसंबर 2025[23]
• “An inverted Macaulay” (मैकॉले के सिद्धांतों को उल्टा-पुल्टा कर के पेश करना),Frontline, दिसंबर 2025[24]
• “PM Modi’s ‘Macaulay Mindset’ Is a Myth, The Real Fight Is Over India’s Ideas”, (पीएम मोदी की ‘मैकॉले मानसिकता’ एक मिथक है, असली संघर्ष भारत से जुड़े विचारों को लेकर है), The Quint, दिसंबर 2025[25]
• “How Ambedkar and Nehru’s Words Debunk Modi’s Prejudiced Understanding of the ‘Macaulay Mindset’” ( कैसे अंबेडकर और नेहरू के शब्द ‘मैकॉले मानसिकता’ को लेकर मोदी की पूर्वाग्रह-ग्रसित समझ का पर्दाफाश करते हैं), The Wire, नवंबर 2025[26]
• “Macaulay and English Education: Where PM Modi’s Account Falls Short”, ( मैकॉले और अंग्रेज़ी शिक्षा: प्रधानमंत्री मोदी का ब्योरा कहाँ पूरी सच्चाई नहीं बयान कर पाता), Impact and Policy Research Institute, दिसंबर 2025[27]
• “Western Education Has Lifted India” (पश्चिमी शिक्षा ने भारत का उद्धार किया है), The Wall Street Journal, दिसंबर 2025[28]
भारतीय प्रधानमंत्री की मैकॉले-संबंधी टिप्पणियों पर तथाकथित “लुटियंस एलीट” की अधिकांश आलोचना इस बहस को एक बेहद सरलीकृत और सीमित फ्रेम, “मोदी बनाम मैकॉले”, तक समेट कर रख देती है। ऐसा करते हुए वे भारत के बौद्धिक डिकॉलोनाइजेशन के व्यापक प्रश्न को लगभग हाशिए पर धकेल देते हैं, और उसे केवल मोदी के “राजनीतिक प्रोजेक्ट” का एक हिस्सा बताने लगते हैं। इसके बाद वही चिर-परिचित आख्यान सामने आता है: भारत को उसकी अपनी सभ्यतागत और सांस्कृतिक दृष्टि के भीतर पुनर्स्थापित करने की किसी भी कोशिश को तुरंत “हिंदुत्व राजनीति” कहकर खारिज कर दिया जाता है।
इसी के साथ कई तर्क अंग्रेज़ी भाषा के अतार्किक महिमामंडन तक पहुँच जाते हैं। यह दावा किया जाता है कि अगर मैकॉले न होते तो भारत विश्व के हाशिए पर रह जाता। ऐसे दावे न केवल कल्पना के धरातल पर रचे गये प्रतीत होते हैं, बल्कि वे बौद्धिक ग़ुलामी की उसी मैकॉलेवादी मानसिकता को प्रतिबिंबित करते हैं, जिसकी आलोचना प्रधानमंत्री ने की थी।
अंततः मैकॉले की औपनिवेशिक विरासत पर गंभीर विमर्श सिकुड़कर एक सतही बहस बन जाता है—अंग्रेज़ी बनाम भारतीय भाषाएँ, सभ्यतागत मूल्य बनाम आधुनिकता। विडंबना यह कि यह बहस भी उसी वैचारिक ढाँचे में चलती है जिसे मैकॉले ने स्थापित किया था।
समापन
अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से भारत को आधुनिकता का “उपहार” देने की पश्चिमी धारणा का उपयोग अक्सर भारत में चल रही डिकॉलोनाइजेशन की प्रक्रिया और उसके व्यापक सभ्यतागत-सांस्कृतिक पुनर्जागरण को कमतर दिखाने के लिए किया जाता है। एक खास बौद्धिक वर्ग यह तर्क देता है कि यूरोपीय उपनिवेशवाद ने भारत को किसी न किसी रूप में लाभ पहुँचाया, मानो साम्राज्यवादी शासन दमन की व्यवस्था नहीं, बल्कि कोई रचनात्मक हस्तक्षेप रहा हो।
इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कई बार अतिशयोक्तिपूर्ण काल्पनिक परिदृश्य गढ़े जाते हैं, जिनमें यह संकेत दिया जाता है कि यदि मैकॉले का हस्तक्षेप न हुआ होता तो भारत बौद्धिक और राजनीतिक रूप से दिशाहीन रह जाता।
लेकिन भारत को अपनी औपनिवेशिक विरासत के अवशेष हटाने और अपनी सभ्यतागत पहचान पुनर्स्थापित करने के लिए न तो “लुटियंस एलीट” की मान्यता की आवश्यकता है और न ही पश्चिमी अनुमोदन की। इस दिशा में भारत अकेला भी नहीं है। अफ्रीका और कैरेबियन के कई देशों ने भी हाल के वर्षों में औपनिवेशिक प्रतीकों से दूरी बनाने के लिए संस्थानों के नाम बदलने, सार्वजनिक स्थलों का पुनर्संरचन करने और शासन व्यवस्था के कुछ पहलुओं को पुनर्गठित करने जैसे कदम उठाए हैं।
किसी भी राष्ट्र की ऐतिहासिक पहचान को उस पर थोपी गई औपनिवेशिक स्मृति तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह कहना कि आक्रमणों और उपनिवेशवाद से पहले भारत का कोई सार्थक इतिहास नहीं था, अपने आप में एक प्रकार का वैचारिक उपनिवेशीकरण है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि औपनिवेशिक प्रतीकों को हटाने का निर्णय इतिहास मिटाने का प्रयास नहीं होता, बल्कि इतिहास को उसके सही संदर्भ में समझने की प्रक्रिया का हिस्सा होता है।
सन्दर्भ सूची
[1] The Lutyens Trust New Delhi Exhibition and Study Tour – October 2007 – The Lutyens Trust; https://www.lutyenstrust.org.uk/portfolio-item/the-lutyens-trust-new-delhi-exhibition-and-study-tour-october-2007/
[2] Opinion | From Pride to ‘Bust’: The Congress Ecosystem’s Performative Wokeness | Opinion News – News18; https://www.news18.com/opinion/opinion-from-pride-to-bust-the-congress-ecosystems-performative-wokeness-ws-kl-9927516.html
[3] Lutyens’ bust gone: Why New Delhi’s British architect ended up on Modi’s anti-colonial purge list | India News; https://www.hindustantimes.com/india-news/lutyens-statue-removal-latest-in-modis-anti-colonial-project-know-who-he-was-and-how-his-name-came-to-spell-elitism-101771836346823.html
[4] Great-grandson of Edwin Lutyens in the UK criticises removal of Lutyens’ bust from Rashtrapati Bhavan – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/world/uk/great-grandson-of-edwin-lutyens-in-the-uk-criticises-removal-of-lutyens-bust-from-rashtrapati-bhavan/articleshow/128761558.cms
[5] Aurangzeb Zindabad Mindset’: BJP Slams Opposition For Criticising Lutyens’ Bust Removal | Politics News – News18; https://www.news18.com/politics/aurangzeb-zindabad-mindset-bjp-slams-opposition-for-criticising-lutyens-bust-removal-9925836.html
[6] Decoding Rashtrapati Bhavan: How Edwin Lutyens Created a Landmark of Cultural Synthesis; https://indianexpress.com/article/opinion/columns/edwin-lutyens-decolonisation-lutyens-delhi-rajaji-10548948/
[7] Changing The Statue Does Not Change the Room” – Geethu Gangadhar on Edwin Lutyens’ Bust Removal; https://architecture.live/on-edwin-lutyens-bust-removal-geethu-gangadhar/
[8] British Architect Sir Edwin Lutyens and his Madras connection – The Hindu; https://www.thehindu.com/news/cities/chennai/british-architect-sir-edwin-lutyens-and-his-madras-connection/article70672524.ece
[9] Modi’s New India The Politics of Erasure A.J. Philip: Indian Currents: Articles; https://www.indiancurrents.org/article-modis-new-india-the-politics-of-erasure-a-j-philip-2954.php
[10] Rajaji Replaces Lutyens: Decolonise or Delete History? – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=dn_CV6Ayxto
[11] Centre Replaces Lutyens’ Statue With Rajaji’s Bust; I.N.D.I.A – ns Can’t Erase ‘Macaulay Mindset’? – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=dUocVlDq754
[12] Indian-Origin Journalists’ Role in Fueling Anti-India bias; https://stophindudvesha.org/role-of-indian-origin-journalists-in-spreading-biased-narratives-against-india/
[13] India’s Civilizational Narrative Reshapes Global Image; https://stophindudvesha.org/indias-civilizational-narrative-reshaping-its-internal-image-and-external-positioning/
[14] ‘India must be free of colonial mindset’: PM Narendra Modi on new PMO inauguration | India News; https://www.hindustantimes.com/india-news/india-must-be-free-of-colonial-mindset-pm-narendra-modi-on-new-pmo-inauguration-seva-teerth-101771023775897.html
[15] PM addresses the inaugural event of Seva Teerth and Kartavya Bhavan – 1 & 2 in New Delhi | Prime Minister of India; https://www.pmindia.gov.in/en/news_updates/pm-addresses-the-inaugural-event-of-seva-teerth-and-kartavya-bhavan-1-2-in-new-delhi/
[16] PM Modi’s decolonisation odyssey: Complete catalog of colonial name changes since 2014 | India News – India TV; https://www.indiatvnews.com/news/india/pm-modi-decolonisation-odyssey-complete-catalog-of-colonial-name-changes-since-2014-2026-02-13-1030186
[17] Indian war heroes, gallantry awardees replace 246 British-era names in military zones | – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/defence/news/indian-war-heroes-gallantry-awardees-replace-246-british-era-names-in-military-zones/articleshow/128129287.cms
[18] Free India from Macaulay’s slavery mindset: PM Modi sets 10-year roadmap – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/free-india-from-macaulays-slavery-mindset-pm-modi-sets-10-year-roadmap-2821827-2025-11-18
[19] Ibid.
[20] (1) Modi vs Macaulay: Dalrymple, Tripathi Debate English Education and India’s ‘Slavery Mindset’ – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=-o2SS4bABV4&t=1099s
[21] (1) NewsToday Debate: PM Modi’s Attack On Macaulay Sparks ‘India vs Bharat’ Debate – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=UDOVjOKyyXo
[22] 1) PM Modi News | PM Modi’s War On Macaulay: Historian Faceoff – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=iSMXbldI0J8
[23] When RSS-Modi Attack Macaulay and English, They Attack Upward Mobility of Dalits, Shudras, Adivasis – The Wire; https://thewire.in/caste/when-rss-modi-attack-macaulay-and-english-they-attack-upward-mobility-of-dalits-shudras-adivasis
[24] Modi and Macaulay: The Politics Behind India’s English Debate – Frontline; https://frontline.thehindu.com/columns/modi-macaulay-debate-and-politics-of-english-education/article70345175.ece
[25] PM Modi’s ‘Macaulay Mindset’ is a Myth. The Real Fight Is Over India’s Ideas | Opinion; https://www.thequint.com/opinion/modi-macaulay-mindset-colonialism-claim-hindutva-narrative
[26] How Ambedkar and Nehru’s Words Debunk Modi’s Prejudiced Understanding of the ‘Macaulay Mindset’ – The Wire; https://thewire.in/history/how-ambedkar-and-nehrus-words-debunk-modis-prejudiced-understanding-of-the-macaulay-mindset
[27] Macaulay And English Education: Where PM Modi’s Account Falls Short – IMPRI Impact and Policy Research Institute; https://www.impriindia.com/insights/macaulay-and-english-education/
[28] Western Education Has Lifted India – WSJ; https://www.wsj.com/opinion/western-education-has-lifted-india-388889e5
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