जातिगत राजनीति बनाम हिंदू एकता: भारत की सभ्यतागत आत्मा के लिये संघर्ष

एक जागरूक और उभरती हुई हिंदू पहचान आज उस एकता की मांग कर रही है, जो जाति से ऊपर उठकर हो — ऐसी एकता जिसका मार्गदर्शन भारत का आध्यात्मिक नेतृत्व करे, और जो उपनिवेशकालीन ढांचों और सोच को खुलकर चुनौती दे। लेकिन दूसरी ओर, चुनावी राजनीति अब भी जातिगत गणित की ज़ंजीरों में जकड़ी हुई है। ऐसे में सवाल है कि क्या भारतीय राजनीति अपने सबसे पुराने और सबसे ज़्यादा विभाजनकारी दोष से उबर पायेगी?
  • सांस्कृतिक राष्ट्रवादकी जो भावना आज भारत के सभ्यतागत पुनर्जागरण को दिशा दे रही है, उसमें जाति जैसे कृत्रिम ढांचे के लिए कोई स्थान नहीं है।
  • जहांहिंदू समाज एक ओर पहले से कहीं अधिक एकजुट हो रहा है और औपनिवेशिक दौर के विमर्श को चुनौती दे रहा है, वहीं दूसरी ओर भारतीय राजनीति अब भी जातिगत दलदल में फंसी हुई है।
  • संविधान में जाति आधारित आरक्षणपर दिया गया अत्यधिक ज़ोर चाहे वह अनजाने में ही क्यों न हो  भारत में जाति तुष्टिकरण की राजनीति के लिए एक मज़बूत आधार बन गया है।
  • मोदी सरकार काजाति जनगणना कराने का फ़ैसला इस सच्चाई को उजागर करता है कि जाति आधारित राजनीति की पकड़ अब भी इतनी अधिक मज़बूत है कि कोई भी पार्टी चाहे उसकी विचारधारा कुछ भी हो इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती।
  • वहीं दूसरी ओर,हिंदू आध्यात्मिक नेता लगातार उस जातिगत नैरेटिव को ध्वस्त करने का प्रयास कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल दशकों से हिंदू समाज में आपसी फूट  डालने के लिए किया जा रहा है।
  • साथ ही, वैश्विक स्तर पर फैल रहीवोकिज़्मकी विचारधारा, जो हिंदू जाति व्यवस्था को हर सामाजिक असमानता की जड़ के रूप में पेश करती है, भारत में जाति विमर्श के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को और भी ज़्यादा हवा दे रही है।

भारत में आज हिंदुओं की सांस्कृतिक और सभ्यतागत चेतना एक नये सिरे से विकसित हो रही है। यह परिवर्तन एक बड़े पैमाने पर होने वाले हिंदू पुनर्जागरण का स्पष्ट संकेत है। इस पुनर्जागरण के केंद्र में एक साझा पहचान और उद्देश्य की भावना है, जो दुनिया भर के हिंदुओं को जोड़ती है। संपूर्ण वैश्विक हिंदू समुदाय इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि भारतीय सभ्यता की आत्मा, यानी उसके आध्यात्मिक भाव को सुरक्षित रखा जाए।

अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से लेकर पवित्र मंदिरों और तीर्थस्थलों की पुनर्प्राप्ति तक, यह जागरण एक साहसिक और स्पष्ट घोषणा है — कि विश्व भर के हिंदुओं को अपने हिंदू होने पर गर्व है, और हिंदुत्व को फिर से जीने का समय आ गया है। सबसे अहम बात यह है कि आज जो हिंदू नवजागरण हो रहा है, वो जाति की सीमाओं से ऊपर उठ चुका है। इस सभ्यतागत पुनर्जागरण को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जो भावना प्रेरित कर रही है, उसमें अंग्रेज़ों द्वारा थोपी गई जातिवादी सोच के लिए कोई जगह नहीं है। राम मंदिर के लिए करसेवकों ने जो बलिदान दिया[1] और 2025 में त्रिवेणी संगम पर हुए महाकुंभ में जिस प्रकार की आध्यात्मिक एकता दिखाई पड़ी — उससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिंदुओं को आपस में जोड़ने वाली कड़ी सनातन धर्म है, न कि जातिगत भेदभाव।[2]

यदि ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो जिस सख्त जाति व्यवस्था की हम बात करते हैं, वह काफी हद तक ब्रिटिश शासन की देन थी। उन्होंने वेदों में वर्णित सहज और गुण-कर्म आधारित गतिशील वर्ण व्यवस्था को तोड़-मरोड़ कर पेश किया। असल में, वर्ण व्यवस्था व्यक्ति की प्रकृति, रुचियों और क्षमताओं पर आधारित थी—जन्म पर नहीं। इसमें इंसान को अपने गुणों के अनुसार आगे बढ़ने और व्यक्तिगत विकास की दिशा निर्धारित करने की पूरी आज़ादी थी।[3]

लेकिन अफ़सोस की बात है कि आज की भारतीय राजनीति, जो वोट-बैंक की सोच से चलती है, हिंदू धर्म को जाति की राजनीति में बांधने का काम कर रही है।

आज जब हिंदू समाज एकजुट हो अपनी सभ्यतागत जड़ों को फिर से अपनाने की कोशिश कर रहा है, तो उसे एक दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ़ उस पर भारतीय राजनीति में पनप रहे जातिगत विमर्श का प्रतिकार करने की ज़िम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ़ वैश्विक विमर्श में लगातार गढ़े जा रहे जाति-आधारित नैरेटिव का ज़ोरदार जवाब देने का दायित्व। वैश्विक संदर्भ में जो जातिगत विमर्श गढ़ा जा रहा है, वह सीधे तौर पर वोक विचारधारा से प्रेरित है।

लेख के आगे के भागों में हम इस विरोधाभास को समझने की कोशिश करेंगे—कैसे एक तरफ़  भारतीय राजनीति में पनपने वाले जाति-आधारित नैरेटिव और भी गहराते जा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर एक सशक्त हिंदू सभ्यतागत पुनर्जागरण उसी जातिवादी सोच की जड़ों को चुनौती दे रहा है, और उसका पुरज़ोर विरोध कर रहा है।

जाति-आधारित आरक्षण: सामाजिक न्याय या जातिगत तुष्टिकरण?

ऐतिहासिक अन्यायों को सुधारने और हाशिये पर पड़े समुदायों को ऊपर उठाने के इरादे से भारतीय संविधान ने जाति को कल्याण योजनाओं और संसाधनों की पहुँच का एक प्रमुख आधार बनाया। इसी सोच के तहत शिक्षा, नौकरियों, और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे अहम क्षेत्रों में जाति आधारित आरक्षण की व्यवस्था की गई।

शुरुआत में इसे एक प्रगतिशील और अस्थायी नीति के रूप में देखा गया था—ऐसी नीति जो ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को सशक्त बनाने में मदद करे।[4] लेकिन समय के साथ-साथ  इस व्यवस्था ने एक ऐसे सिस्टम का रूप ले लिया जो राजनीतिक हित साधने का एक ज़रिया मात्र बन कर रह गया। धीरे-धीरे जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था भारत के राजनीतिक सिस्टम का एक अभिन्न अंग बन गयी, जिसने समय के साथ भारतीय समाज में नए तरह के विभाजन को जन्म दिया और सामाजिक एकता को लगातार चुनौती दी।

भारत में जाति आधारित आरक्षण की जड़ें ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौर से जुड़ी हुई हैं। सबसे पहले 1882 में ब्रिटिश अफ़सर विलियम हंटर और भारतीय समाज सुधारक ज्योतिराव फुले ने सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए जाति आधारित सकारात्मक भेदभाव (affirmative action) का समर्थन किया था। इसके बाद 1933 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने “कम्युनल अवॉर्ड” (Communal Award) की शुरुआत की, जिसके तहत अलग-अलग धर्मों और जातियों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र (separate electorates) और कोटे तय किए गए। यही नीति भारत में जातीय पहचान की राजनीति और आरक्षण व्यवस्था की औपचारिक शुरुआत का आधार बनी।[5]

आज़ादी के बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने जाति आधारित वर्गीकरण और कोटा प्रणाली को, मोटे तौर पर, ब्रिटिश शासन की ही नीति की तरह जारी रखा। इसका उद्देश्य था—अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के साथ हुए ऐतिहासिक अन्यायों की भरपाई करना। लेकिन इस नीति की बुनियाद व्यक्तिगत अधिकारों के बजाय समूह आधारित अधिकारों पर केंद्रित रही। आज़ादी के बाद के समय में आरक्षण को एक अस्थायी उपाय के रूप में लागू किया गया था। इस व्यवस्था के अन्तर्गत हर दस साल में इसकी प्रासंगिकता की पुनः समीक्षा करने का प्रावधान था। इस प्रावधान का मकसद यह था कि जब किसी समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर्याप्त रूप से सुधर जाए, तो आरक्षण को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया जाए। आरक्षण की मूल संवैधानिक कल्पना में यह बात कभी भी शामिल नहीं थी कि पीढ़ी दर पीढ़ी को इसका लाभ मिलता रहे, भले ही उन्हें इसकी ज़रूरत इतनी न हो।[6]

लेकिन आरक्षण की जो व्यवस्था एक ‘अस्थायी उपाय’ के रूप में शुरू हुई थी, वह जल्द ही एक ताक़तवर राजनीतिक हथियार में बदल गयी। राजनीतिक दलों ने शीघ्र ही यह भाँप लिया कि जाति आधारित वोट बैंक उनके चुनावी गणित के लिए कितना उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इसके बाद आरक्षण नीतियों में कई संवैधानिक संशोधन किए गए—जिन्हें अक्सर कल्याणकारी योजनाओं के रूप में पेश किया गया, लेकिन ज़्यादातर मामलों में इनका असल उद्देश्य हाशिये पर जीवन जी रहे लोगों का उत्थान नहीं, बल्कि चुनावी सफलता सुनिश्चित करना था।

राजनीतिक स्वार्थ ने आरक्षण को एक ऐसे भावनात्मक मुद्दे का रूप दे दिया, जो लोगों की व्यक्तिगत और सामाजिक पहचान से गहराई से जुड़ा हो। नेताओं को लगा कि जाति को एक मुद्दे के तौर पर भुनाकर उन्होंने भारतीय मतदाता की दुखती रग पकड़ ली है। नतीजतन, जातिगत चेतना को मिटाने के बजाय राजनीति ने उसमें और जान फूंक दी।

जातिगत तुष्टिकरण और कोटा सिस्टम की राजनीति

1991 में सामाजिक उत्थान की राजनीति एक बेहद ख़तरनाक और विभाजनकारी सामाजिक इंजीनियरिंग के प्रयोग का साधन मात्र बन कर रह गयी। जो आरक्षण कभी केवल अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) जैसे सर्वाधिक वंचित समुदायों के लिए शुरू किया गया था, वह मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के ज़रिए पूरी तरह अपनी दिशा से भटक गया। आर्थिक स्थिति और व्यक्तिगत योग्यता को नज़रअंदाज़ करते हुए आयोग ने एक बेहद विविध और विशाल आबादी को एक वर्ग में समेट कर रख दिया। इस वर्ग को नाम दिया गया ओ बी सी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), और इसके अंतर्गत आने वाले लोगों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण दे दिया गया। इस एक फैसले ने वोट-बैंक राजनीति को सिर्फ़ गति ही नहीं दी, बल्कि जातीय पहचान को राजनीतिक रणनीति का प्रमुख साधन बना दिया। जाति अब केवल सामाजिक पहचान तक सीमित न रहकर सीधे-सीधे सत्ता हासिल करने की चाबी बन गई।[7]

आज राजनीति का यही रूप भारत के चुनावी परिदृश्य पर पूरी तरह से हावी है, जो किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं रहा। यहाँ तक कि भारतीय जनता पार्टी (BJP), जो परंपरागत रूप से खुद को जाति आधारित राजनीति से अलग रखती आई थी, उसने भी अंततः देशव्यापी जाति जनगणना की मांग के सामने घुटने टेक दिये। यह बदलाव साफ़ दिखाता है कि जातिगत समीकरण भारतीय राजनीति में कितनी गहरी पैठ बना चुके हैं। अब कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल—चाहे उसकी विचारधारा कुछ भी हो—इस प्रवृत्ति को चुनौती देने की हिम्मत नहीं करता, क्योंकि उसे डर है कि कहीं इसका नकारात्मक असर उसके वोट बैंक पर ना पड़े।

अगर संविधान निर्माताओं ने कल्याणकारी योजनाओं और संसाधनों के वितरण का आधार जाति के बजाय आर्थिक स्थिति को बनाया होता, तो शायद भारत एक अधिक समावेशी और न्यायसंगत रास्ते पर आगे बढ़ता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सामाजिक न्याय के नाम पर आज भी राजनीतिक दल लगातार इस कोशिश में लगे हैं कि कैसे ज़्यादा से ज़्यादा जातियों और समुदायों को OBC वर्ग में शामिल किया जाए—चाहे वे वास्तव में पिछड़े हों या नहीं। इन फैसलों में अक्सर उन मूल उद्देश्यों का ध्यान नहीं रखा जाता, जिनके लिए आरक्षण नीति की शुरुआत की गई थी। और जो बात और भी चिंताजनक है, वह यह कि आज़ादी के बाद से अब तक इस तरह का कोई भी व्यापक, सार्वजनिक, और निष्पक्ष अध्ययन नहीं हुआ है, जो इस बात का मूल्यांकन कर सके कि आरक्षण की ये नीतियाँ जिन समुदायों की मदद के लिए बनाई गई थीं, उन पर इनका वास्तविक असर क्या पड़ा है।

हालाँकि, 2019 में ‘आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग’ (EWS) की श्रेणी को आरक्षण में शामिल किया जाना एक बेहद महत्वपूर्ण फ़ैसला साबित हुआ। 103वां संविधान संशोधन उन लोगों के लिए 10% आरक्षण लेकर आया जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं, लेकिन पहले से मौजूद SC, ST या OBC कोटे के तहत नहीं आते।[8] सामान्य वर्ग (General category) के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण का लाभ देना सिर्फ संसाधनों के अधिक न्यायपूर्ण वितरण की दिशा में कदम नहीं है, बल्कि यह हिंदू समाज में जाति को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति को भी चुनौती देता है।

स्वाभाविक है कि इस बदलाव से ऐसे राजनीतिक दल और नेता असहज महसूस करते हैं, जिनकी चुनावी रणनीति जातीय विभाजन को बनाये रखने के आधार पर टिकी है। EWS आरक्षण इस सोच के ख़िलाफ़ जाता है कि सिर्फ जाति ही पिछड़ेपन का आधार हो सकती है—और यही वजह है कि कई राजनीतिक शक्तियाँ इस फ़ैसले से असहज महसूस करती हैं।

इस जटिल परिदृश्य को जो और भी ज़्यादा उलझा का रख देता है, वह है “वोकिज़्म” का वैश्विक उदय—खासकर पश्चिमी अकादमिक और नीति निर्धारण के हलकों में, जहाँ हिंदू जाति व्यवस्था को अक्सर भारतीय समाज में व्याप्त सभी असमानताओं की जड़ के रूप में पेश किया जाता है। इस तरह की एकतरफ़ा व्याख्याएँ, जो भारत की ऐतिहासिक और सामाजिक जटिलताओं को ठीक से नहीं समझतीं, भारतीय राजनीति में व्याप्त जाति आधारित विमर्श को और भी ज़्यादा भड़काती हैं।

स्नेक्स इन द गंगा: ब्रेकिंग इंडिया 2.0 में लेखक राजीव मल्होत्रा और विजया विस्वनाथन बताते हैं कि अमेरिकी शैली का वोकिज़्म किस तरह से भारत के शैक्षणिक और सामाजिक विमर्श में घुसपैठ कर चुका है। वे चेतावनी देते हैं कि इस विचारधारा की इक्विटी यानी  बराबरी और आइडेंटिटी पॉलिटिक्स यानी पहचान आधारित राजनीति के प्रति अंधभक्ति ने भारत में प्रतिभा आधारित व्यवस्था को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया है। लेखक आगे बताते हैं कि यह वैचारिक लहर अब भारत के प्रतिष्ठित संस्थानों—जैसे कि IITs—में भी तेज़ी से फैल रही है, जहाँ अब योग्यता को नजरअंदाज़ कर, जाति आधारित विचारों को प्राथमिकता दी जा रही है। राजीव मल्होत्रा एक लंबे समय से आरक्षण प्रणाली के आलोचक भी रहे हैं। उनका मानना है कि यह नीति वास्तविक उत्थान नहीं कर पाती, क्योंकि यह प्रतिभा से समझौता करती है, और समाज में विभाजन की भावना को बढ़ावा देती है। मल्होत्रा सुझाव देते हैं कि जाति आधारित आरक्षण के बजाय आर्थिक स्थिति आधारित लक्षित कल्याण की नीति अपनाई जाए—जो उनके अनुसार, न्याय, समावेशिता, और राष्ट्रीय प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए कहीं अधिक प्रभावी और टिकाऊ रास्ता हो सकता है।

जातिगत जनगणना 2025: रणनीतिक बदलाव या सभ्यतागत पिछड़ाव?

अप्रैल 2025 में भारत सरकार ने एक चौंकाने वाला कदम उठाया—आगामी राष्ट्रीय जनगणना में जातिगत आंकड़ों को शामिल करने की मंज़ूरी दे दी। यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की राजनीतिक मामलों की समिति (Cabinet Committee on Political Affairs) द्वारा लिया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस कदम से देश में पहले से चल रहे राज्य स्तर के जाति सर्वेक्षणों से पैदा हुई भ्रम की स्थिति को दूर किया जा सकेगा, और आंकड़ों में स्पष्टता और एकरूपता आएगी। सरकार का तर्क था कि कुछ राज्य स्तरीय सर्वेक्षण राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित दिख रहे थे, और ऐसे में एक राष्ट्रव्यापी जाति गणना से एक समग्र तस्वीर सामने लाई जा सकेगी।[9]

यह घोषणा और भी ज़्यादा चौंकाने वाली इसलिए बन गयी क्योंकि यह उस सरकार की तरफ़ से आई, जो लंबे समय से जाति आधारित जनगणना का विरोध करती रही है। जाति जनगणना की माँग अब तक विपक्षी दलों का प्रमुख मुद्दा रही थी, जबकि सत्तारूढ़ भाजपा ने इसे लगातार खारिज किया था। भाजपा की विचारधारा पारंपरिक रूप से एक एकीकृत अखिल-भारतीय हिंदू पहचान पर ज़ोर देती रही है—जो जाति, क्षेत्र और भाषा जैसे विभाजनों से ऊपर उठने की बात करती है। ऐसे में यह कदम न केवल अप्रत्याशित लगता है, बल्कि पार्टी की विचारधारा के विपरीत भी जाता दिखाई देता है।

भारत में पूर्ण जाति जनगणना आख़िरी बार साल 1931 में हुई थी—और वह भी ब्रिटिश शासन के दौरान। आज़ाद भारत में अब तक केवल अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए ही जातिगत आंकड़े जुटाए जाते रहे हैं। लेकिन सभी जातियों की व्यापक गणना स्वतंत्र भारत में अब तक कभी नहीं की गई।

पहली नज़र में देखे जाने पर जाति जनगणना का विचार उस हिंदू सभ्यतागत पुनर्जागरण की सोच से बिल्कुल उलट लगता है, जिसे मोदी सरकार ने पिछले एक दशक में आगे बढ़ाया है। चाहे वह अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो, या मंदिर पर्यटन का पुनरुत्थान, या फिर संभल जैसे प्राचीन स्थलों की सांस्कृतिक पुनर्प्राप्ति—इस पूरी प्रक्रिया की जो मूल भावना रही है, वह है एकता, गौरव, और हिंदू समाज का सामूहिक जागरण। इसमें जाति या तो पीछे छूट गई थी, या फिर उसका महत्व कम होता दिखाई दे रहा था। ऐसे माहौल में सरकार द्वारा फिर से जाति आधारित ढाँचे को सक्रिय करना, कई लोगों को इस विचारधारा से पलटाव जैसा लगता है।

इस अप्रत्याशित बदलाव के पीछे के कारण अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए सरकार के फ़ैसले को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं, जिनमे से दो प्रमुख व्याख्याएँ सबसे ज़्यादा चर्चा में हैं।

पहली व्याख्या यह है कि यह एक राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक है—एक ऐसी चाल जिसमें मोदी सरकार ने विपक्ष को चौंका कर मात देने की कोशिश की है। वर्षों से विपक्षी दल जाति आधारित जनगणना की माँग करते आ रहे थे, और भाजपा के विरोध को वे सामाजिक न्याय के विरोध के रूप में चित्रित करने की रणनीति अपनाते रहे। लेकिन अब जब मोदी सरकार ने खुद यह कदम उठा लिया है, तो संभव है कि उसका मकसद था विपक्ष से उसका मुख्य चुनावी हथियार ही छीन लेना। यह एक तरह का रणनीतिक विघटन (strategic disruption) है—विपक्ष के एजेंडे को खुद में समाहित करके उसकी राजनीतिक धार को कमज़ोर कर देना।[10]

एक दूसरी संभावित और व्यावहारिक व्याख्या यह है कि यह कदम चुनावी यथार्थवाद से प्रेरित है। इस साल के अंत में बिहार विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, और जाति जनगणना को मंज़ूरी देना संभवतः भाजपा की एक अहम सहयोगी पार्टी—जेडीयू (JDU) को साधने की रणनीतिक रियायत भी हो सकती है। जेडीयू बिहार में सत्ता में है और एनडीए (NDA) गठबंधन में उसकी भूमिका बेहद निर्णायक है। बिहार की राजनीति गहरे जातिगत समीकरणों पर टिकी हुई है, और इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ करना भाजपा के लिए एक गंभीर चुनावी भूल साबित हो सकता था। इसलिए, यह निर्णय एक व्यावहारिक  राजनीतिक कदम के रूप में भी देखा जा सकता है—जिसका उद्देश्य गठबंधन को मज़बूत बनाए रखना, और एक जाति-संवेदनशील राज्य में भाजपा की स्थिति को मज़बूती देना है।[11]

चाहे इसके पीछे वजह कोई भी हो, एक बात तो साफ़ है — बीजेपी, जो कभी जाति-आधारित राजनीति को सिरे से नकारती थी, अब कम से कम रणनीतिक तौर पर इस रास्ते से समझौता कर चुकी है। यह बदलाव भारत के वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष की एक गहरी सच्चाई को उजागर करता है — जाति का मुद्दा अब भारतीय राजनीति के तंत्र में इतनी गहराई से समा चुका है कि कोई भी पार्टी इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती, फिर चाहे वह  एकता या राष्ट्रवाद की कितनी भी बड़ी पैरोकार क्यों न हो।

सरकार का यह फ़ैसला बहुत से मुश्किल सवालों को जन्म देता है, जिनका जवाब ढूँढना अत्यंत आवश्यक है। इनमें से एक अहम सवाल यह है कि क्या यह फ़ैसला उस सांस्कृतिक पुनर्जागरण को कमज़ोर करता है, जिसे आगे बढ़ाने में ख़ुद सरकार ने एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है? फ़ैसले के समर्थकों के अनुसार ऐसा बिलकुल नहीं है। उनका कहना है कि आज का हिंदू समाज पहले से कहीं ज़्यादा एकजुट है, और जाति जनगणना उस एकता को तोड़ेगी नहीं। बल्कि, यह हिंदू समाज के लिए एक ईमानदार आत्ममंथन का मौका हो सकता है, जिसके माध्यम से वह सामाजिक प्रतिनिधित्व और शिक्षा, रोज़गार आदि क्षेत्रों में उपलब्ध होने वाले अवसरों की स्थिति का वास्तविकता की धरातल पर मूल्यांकन कर सके। अतः इस ईमानदार आत्ममंथन से हिंदू समाज का मुख्य मकसद कमज़ोर नहीं पड़ेगा, बल्कि इसे और ज़्यादा मज़बूती मिलेगी। अगर इस नज़रिए से देखा जाए तो जाति जनगणना कोई खतरा नहीं, बल्कि एक कसौटी है — यह जांचने की कि आज हिंदू समाज भीतर से कितना संतुलित और समरस है।[12]

स्वराज्य में प्रकाशित एक लेख इस मुद्दे से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालता है – कैसे जाति जनगणना जैसा अभ्यास भारतीय राजनीति में एक अहम मोड़ साबित हो सकता है। यह प्रक्रिया जाति के सवाल को सिर्फ़ ‘धर्मनिरपेक्ष’ वामपंथ के दायरे तक सीमित रखने के बजाय, उसे ‘हिंदू राइट’ यानी हिंदू दक्षिणपंथियों के लिए भी एक आत्ममूल्यांकन के  आईने में बदल सकती है।[13]

जातिगत विमर्श का तिलिस्म भेदते हुए

पिछले एक दशक में भारत में जो सांस्कृतिक और सभ्यतागत जागृति आई है, उसने आत्मचिंतन और आत्मविश्लेषण की एक गहरी प्रक्रिया को भी जन्म दिया है। जाति आधारित सोच को लेकर अब हिंदू समाज पहले से कहीं ज़्यादा सवाल उठा रहा है — और धीरे धीरे जातिवाद के विमर्श को हमेशा के लिए ख़ारिज भी कर रहा है।

हिंदू समाज के आध्यात्मिक प्रतिनिधि — खासकर वो जिनका Gen Z यानी नई पीढ़ी के बीच ख़ासा प्रभाव है — इस बदलाव में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ये आध्यात्मिक प्रतिनिधि पूरे भारत को जोड़ने वाले “सभ्यतागत एकता” के विचार को सामने रखकर समुदाय को एकजुट कर रहे हैं, और साथ ही उस जातिगत सोच को भी खुलकर चुनौती दे रहे हैं, जिसका इस्तेमाल लंबे समय तक हिंदुओं को परिभाषित और वर्गीकृत करने के लिए व उनमे आपसी फूट डालने के लिए किया गया।

पंडित धीरेंद्र शास्त्री, जिन्हें बागेश्वर बाबा के नाम से भी जाना जाता है, एक लोकप्रिय हिंदू आध्यात्मिक नेता हैं, जो जाति और पंथ से ऊपर उठकर हिंदू एकता के प्रबल समर्थक रहे हैं। बागेश्वर बाबा अक्सर सुर्खियों में रहते हैं — वजह है उनका बेबाक अंदाज़, जिसमें वो पूरे भारत में एक साझा हिंदू पहचान को मज़बूत करने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हैं, और साथ ही उस राजनीतिक चालबाज़ी को भी बेनकाब करते हैं, जो हिंदू समाज को जाति के नाम पर बाँटने की कोशिश करती है।

पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने हाल ही में सरकार द्वारा जाति जनगणना कराए जाने के फैसले की आलोचना की। उनका कहना है कि इस तरह का विभाजनकारी कदम देश की एकता को नुकसान पहुंचा सकता है। बागेश्वर बाबा ने साथ ही यह सुझाव भी दिया कि जाति से जुड़ी  जानकारी मांगने के बजाय, जनगणना लोगों की आर्थिक स्थिति के आधार पर की जानी चाहिए। पंडित धीरेंद्र शास्त्री का मानना है कि देश में केवल दो ही जातियां होनी चाहिए — अमीर और गरीब। उन्होंने ज़ोर देकर यह भी कहा कि हिंदू समाज को जाति और पंथ के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करने की दिशा में ठोस प्रयास करने चाहिए। उनके अनुसार, “हिंदू राष्ट्र” की दिशा में आगे बढ़ने के लिए पूरे समुदाय को एकजुट होकर काम करना होगा।[14] [15]

हिंदू आध्यात्मिक गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने भी जाति जनगणना का विरोध किया है। उनका तर्क है कि एक ओर तो समाज से जातिवाद मिटाने की बातें हो रही हैं, और दूसरी ओर जाति आधारित जनगणना की तैयारियाँ चल रही हैं — ये दोनों बातें एक-दूसरे के ख़िलाफ़ जाती हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जब बात “हिंदुस्तान” की हो, तो ध्यान जातिगत भेदभाव पर नहीं, बल्कि “हिंदू” समाज की एकता पर होना चाहिए।[16]

विश्व हिंदू परिषद (VHP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे प्रमुख हिंदू संगठन भी लंबे समय से जाति की संकीर्णता से ऊपर उठकर हिंदू समाज की एकता की बात करते रहे हैं। अक्टूबर 2024 में, RSS प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू समाज से जाति, भाषा, क्षेत्रीय संघर्ष जैसे आपसी मतभेदों को त्याग एकजुट होने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि भारत अपने ह्रदय की गहराइयों से एक हिंदू राष्ट्र है, और हिंदू समाज को अपनी सुरक्षा और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए एकता की दिशा में संगठित प्रयास करने चाहिए।[17]

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में हिंदू समाज से यह अपील भी की कि पूरे समुदाय के लिए एक मंदिर, एक कुआं और एक श्मशान की सोच को अपनाया जाए, ताकि समाज के भीतर गहरी पैठ बना चुके भेदभाव को खत्म किया जा सके, और एक साझा पहचान को मज़बूती मिल सके। उनका मानना है कि ऐसे कदम हिंदू समाज में समरसता बढ़ाने और एकता को मज़बूत करने की दिशा में बेहद ज़रूरी हैं।[18]

वर्ष 1983 में विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने एकात्मता यात्रा” का आयोजन किया — एक ऐसा अनोखा प्रयास, जिसका उद्देश्य था राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना, और हिंदू समाज को जाति-पंथ के बंधनों से ऊपर उठाकर एकजुट करना। यह अखिल भारतीय यात्रा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सहयोग से आयोजित की गई थी, और इसका मुख्य फोकस था — हिंदू समाज में एकता की भावना का निर्माण।[19]

इसके अलावा, VHP ने अपने विभिन्न अभियानों और आंदोलनों के माध्यम से लगातार हिंदू समाज की सभ्यतागत एकता को रेखांकित किया है — चाहे वह राम जन्मभूमि आंदोलन हो,
सरकारी नियंत्रण से हिंदू मंदिरों को मुक्त कराने का अभियान, युवाओं के बीच सनातन के सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्शों को बढ़ावा देना, या फिर हिंदुओं के जबरन या धोखे से किए जा रहे धर्मांतरण के ख़िलाफ़ जागरूकता फैलाना। VHP ने हिंदू समाज में फैली हुई अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराई के ख़िलाफ़ भी सक्रियता से काम किया है, और समाज को इसके ख़िलाफ जागरूक करने में अग्रणी भूमिका निभाई है।[20] [21] [22]

हिंदू राष्ट्र की अवधारणा, जो हिंदू राष्ट्रवाद की सोच से जुड़ी हुई है, भारत को एक ऐसी सभ्यता के रूप में देखती है जो सनातन धर्म के मूल्यों से बंधी हुई है।[23] इस विचार में जाति आधारित संकीर्ण पहचान के लिए कोई स्थान नहीं है। इसके विपरीत, यह पूरे भारतवर्ष के लिए एक साझा सभ्यतागत पहचान की बात करती है — ऐसी पहचान जो विभाजन नहीं, बल्कि एकता और समरसता को बढ़ावा दे।

समापन विचार

भारत के सभ्यतागत विमर्श को एक नये सिरे से गढ़ने की जो प्रक्रिया चल रही है, उसका औपनिवेशिक दौर की जाति-व्यवस्था से कोई खास लेना-देना नहीं है। बल्कि देखा जाए तो यह प्रक्रिया जातिगत सोच को चुनौती दे रही है, और उसे धीरे-धीरे खारिज कर रही है। आज वैश्विक हिंदू समुदाय एक सामूहिक जागृति के दौर से गुज़र रहा है — जहाँ हिंदू सभ्यता और संस्कृति के प्रतीकों को लेकर एक सार्वभौमिक गर्व पैदा करने पर ज़ोर दिया जा रहा है। यह बदलाव सिर्फ़ पहचान का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और सांस्कृतिक आत्मबोध का भी प्रतीक बनता जा रहा है।

वाम-उदारवादी ‘वोक’ तंत्र इस नई जागृति से स्वाभाविक रूप से असहज है। यही वजह है कि जाति का इस्तेमाल अब एक हथियार के तौर पर किया जा रहा है, ताकि हिंदू पुनर्जागरण की गति पर अंकुश लगाया जा सके। दरअसल, पश्चिमी अकादमिक जगत और बुद्धिजीवी संस्थानों के तंत्र में गहरी पैठ बना चुका जाति विमर्श और भारत की जाति आधारित राजनीति — ये दोनों आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। इन्हें अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

लेकिन जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह कि अब हिंदू समाज इस थोपे गए विमर्श को न केवल पहचान रहा है, बल्कि इसका जमकर विरोध भी कर रहा है। आज का हिंदू समाज जिस प्रकार से जातिगत विमर्श का न सिर्फ़ विरोध कर रहा है बल्कि इसकी सूक्ष्म पड़ताल भी कर रहा है, उसका भारत की जातिगत राजनीति पर कितना असर पड़ेगा, और क्या यह आने वाले समय में भारतीय राजनीति को जाति के प्रपंच से मुक्त करा पाएगा, यह तो समय ही बताएगा।

 इस खींचतान ने हिंदू समाज को एक अहम मोड़ पर ला खड़ा किया है—एक ओर जागती हुई साझा चेतना है, तो दूसरी ओर बाहर से थोपे गए पुराने और बंटवारे वाले नैरेटिव हैं जो पीछे खींचने की कोशिश कर रहे हैं।

सन्दर्भ सूची

[1] Sri Ram Janmabhumi Movement: Kothari Brothers & others who sacrificed lives for Ram Mandir;   https://organiser.org/2023/11/02/129690/bharat/kothari-brothers-and-other-karsevaks-who-laid-down-their-lives-for-ram-mandir/

[2] Maha Kumbh 2025: Uniting Voices to Uphold Sanatan Dharma”; https://stophindudvesha.org/maha-kumbh-2025-a-platform-for-collective-discourse-against-anti-sanatan-rhetoric/

[3] Why Varna is Not Caste | American Institute of Vedic Studies; https://www.vedanet.com/why-varna-is-not-caste/

[4] Reservation System in Education & Jobs Fair? Pros, Cons & Legal Perspective;  https://lawchakra.in/blog/reservation-education-jobs-legal/

[5] The Concept, Origin And Evaluation Of Reservation Policy in India;   https://www.legalserviceindia.com/legal/article-6526-the-concept-origin-and-evaluation-of-reservation-policy-in-india.html

[6] Reservation is the factor of social inequality;  https://timesofindia.indiatimes.com/readersblog/dr-shanker-suwan-singh/reservation-is-the-factor-of-social-inequality-52419/

[7] Reservation System in Education & Jobs Fair? Pros, Cons & Legal Perspective;  https://lawchakra.in/blog/reservation-education-jobs-legal/

[8] The new Economically Weaker Sections (EWS) Quota: The changing idea of affirmative action;  https://www.orfonline.org/expert-speak/the-new-economically-weaker-sections-ews-quota

[9] Press Release: Press Information Bureau;   https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2125526

[10] What’s behind Modi govt’s U-turn on caste census & how it targets Oppn ahead of  crucial Bihar polls;  https://theprint.in/politics/whats-behind-modi-govts-u-turn-on-caste-census-how-it-targets-oppn-ahead-of-crucial-bihar-polls/2610841/

[11] Ibid.

[12] Caste census: A litmus test for Hindu consciousness;   https://timesofindia.indiatimes.com/blogs/voices/caste-census-a-litmus-test-for-hindu-consciousness/

[13]Why The Right Must Own The Narrative Around Caste Census, Not Run From It;     https://swarajyamag.com/ideas/why-the-right-must-own-the-narrative-around-caste-census-not-run-from-it

[14] Chhatarpur Baba Bageshwar on caste census know what Pandit Dhirendra Shastri said – ‘हम कभी नहीं…’जातिगत जनगणना को लेकर ये क्या बोल गए बाबा बागेश्वर, सामने आया बड़ा बयान;  https://zeenews.india.com/hindi/india/madhya-pradesh-chhattisgarh/mp/chhatarpur-baba-bageshwar-statement-on-caste-census-know-what-pandit-dhirendra-shastri-said/2668349

[15] Chhatarpur Baba Bageshwar on caste census know what Pandit Dhirendra Shastri said – ‘हम कभी नहीं…’जातिगत जनगणना को लेकर ये क्या बोल गए बाबा बागेश्वर, सामने आया बड़ा बयान;  https://zeenews.india.com/hindi/india/madhya-pradesh-chhattisgarh/mp/chhatarpur-baba-bageshwar-statement-on-caste-census-know-what-pandit-dhirendra-shastri-said/2668349

[16] Swami Rambhadracharya Said talk about only hindu in Hindustan not caste census हिंदुस्तान में केवल हिंदू की बात हो, जाति जनगणना का विरोध कर बोले स्वामी रामभद्राचार्य, Bihar Hindi News – Hindustan;  https://www.livehindustan.com/bihar/swami-rambhadracharya-said-talk-about-only-hindu-in-hindustan-not-caste-census-201751868752450.html

[17] Hindu Society Must Unite for its Security: Mohan Bhagwat;  https://www.pgurus.com/rss-chief-mohan-bhagwat-calls-for-unity-among-hindus/

[18] RSS chief calls for ‘one temple, one well & one cremation ground’ in Hindu community | Agra News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/city/agra/rss-chief-calls-for-one-temple-one-well-one-cremation-ground-in-hindu-community/articleshow/120459762.cms

[19] From Ramjanambhumi movement to inauguration of Ram Mandir;  https://hindupost.in/dharma-religion/from-ramjanambhumi-movement-to-inauguration-of-ram-mandir/#

[20] Movements – Vishva Hindu Parishad – Official Website; https://www.vhp.org/movements/

[21] Celebrating 60 Years of Vishva Hindu Parishad: A look at the milestones and ongoing challenges;   https://organiser.org/2024/08/28/253811/bharat/celebrating-60-years-of-vishva-hindu-parishad-a-look-at-the-milestones-and-ongoing-challenges/

[22] Untouchability is against Hindu values, says Vishwa Hindu Parishad – India News | The Financial Express;  https://www.financialexpress.com/india-news/untouchability-is-against-hindu-values-says-vishwa-hindu-parishad/992488/

[23] Maha Kumbh 2025: Uniting Voices to Uphold Sanatan Dharma”; https://stophindudvesha.org/maha-kumbh-2025-a-platform-for-collective-discourse-against-anti-sanatan-rhetoric/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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