बिना प्रमाण के आरोप: BAPS स्वामीनारायण संस्था के ख़िलाफ़ मीडिया का षड्यंत्र अभियान
सारांश
यह लेख हाल के वर्षों में BAPS स्वामीनारायण संस्था को निशाना बनाने वाली मीडिया कवरेज की पड़ताल करता है और तर्क देता है कि यह पश्चिम में उभरते एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा है, जिसमें हिंदू संस्थाओं को लेकर नैरेटिव-आधारित रिपोर्टिंग बढ़ती दिखाई देती है। लेख विशेष रूप से The Guardian की उस रिपोर्ट पर केंद्रित है, जिसमें न्यू जर्सी स्थित BAPS मंदिर के निर्माण से जुड़े श्रमिकों की बीमारी और मौत के आरोप लगाए गए हैं। लेख का तर्क है कि इतने गंभीर दावे मुख्यतः अनाम स्रोतों और सीमित सत्यापित प्रमाणों पर आधारित हैं। साथ ही, यह दिखाया गया है कि कैसे मीडिया फ्रेमिंग, जाति-आधारित व्याख्याएं और वैचारिक दृष्टिकोण स्थानीय विवादों को व्यापक हिंदू पहचान से जोड़ देते हैं। सिस्को मामले जैसे पूर्ववर्ती जाति-संबंधी विवादों से तुलना करते हुए, लेख यह भी बताता है कि एकतरफा जांच और सरलीकृत कथानक न केवल जन-समझ को प्रभावित करते हैं, बल्कि हिंदू समुदायों और संस्थाओं के बारे में पहले से मौजूद रूढ़ियों को भी मजबूत करते हैं।
“यदि आप सतर्क नहीं रहेंगे, तो अख़बार आपको इस हद तक प्रभावित कर देंगे कि आप पीड़ितों से ही नफरत करने लगेंगे और अत्याचार करने वालों के प्रति सहानुभूति महसूस करने लगेंगे,” यह बात कभी Malcolm X ने कही थी। यद्यपि यह कथन एक अलग सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में दिया गया था, फिर भी आज की परिस्थितियों में यह हिंदू समुदाय की स्थिति को काफी हद तक सटीक रूप से दर्शाता है।
हाल के वर्षों में पत्रकारिता धीरे-धीरे नैरेटिव गढ़ने का माध्यम बनती जा रही है। तथ्य, डेटा, निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता जैसे पारंपरिक मानकों को पीछे धकेला जा रहा है। उनकी जगह अब तेज़ व्यक्तिपरकता, पीड़ित-केंद्रित कहानियाँ, आक्रामक वैचारिक रुख और घटनाओं की मनचाही व्याख्या ने ले ली है। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से वैश्विक स्तर पर हिंदू समुदाय की छवि प्रस्तुत करने के तरीके में दिखाई देती है, जहाँ उसे अक्सर संभावित खतरे के आधार पर उत्पीड़क के रूप में दिखाया जाता है, जबकि हिंदुओं को निशाना बनाने वाले कट्टर इस्लामिस्ट उग्रवाद के वास्तविक खतरे को या तो कम करके आँका जाता है या पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
मीडिया तंत्र अब संतुलित और प्रमाण-आधारित रिपोर्टिंग की तुलना में ऐसे कंटेंट को अधिक बढ़ावा देते हैं, जो पाठकों की भावनाओं को प्रभावित कर उनकी सोच को दिशा देने का प्रयास करे। BAPS स्वामीनारायण संस्था के Robbinsville (New Jersey) मंदिर को निशाना बनाने वाला अभियान इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा की गई जाँच में किसी प्रकार की गंभीर अनियमितता सामने न आने के बावजूद BAPS के ख़िलाफ़ मीडिया अभियान निरंतर जारी रहा।
हाल ही में The Guardian ने एक अत्यंत विवादास्पद लेख प्रकाशित किया, जिसमें न्यू जर्सी मंदिर के निर्माण के दौरान मज़दूरों के साथ चिकित्सकीय लापरवाही और दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप लगाए गए। इस रिपोर्ट में वही परिचित पैटर्न दिखाई दिया, जिसमें अनाम स्रोतों, ठोस प्रमाणों के बिना प्रस्तुत भावनात्मक पीड़ित-कथाओं और अपुष्ट व्यापक आरोपों का सहारा लिया गया।
आगे के हिस्सों में हम देखेंगे कि BAPS को लेकर इस तरह का नकारात्मक नैरेटिव किस प्रकार तैयार किया गया, और कैसे मीडिया, नागरिक समाज के कुछ वर्गों तथा एक्टिविस्ट नेटवर्कों के मेल से एक पूरे समुदाय की छवि को नुकसान पहुँचाने की संगठित कोशिशें की गईं।
सिलिकोसिस दावे और प्रमाण का अभाव
हाल ही में प्रकाशित हुए लेख में The Guardian ने BAPS Swaminarayan Sanstha पर कई गंभीर आरोप लगाए, और वो भी बिना ठोस सबूतों के।[1]
लेख में दावा किया गया है कि 2015 से 2023 के बीच BAPS Shri Swaminarayan Mandir Robbinsville के निर्माण के दौरान दो मज़दूरों की मृत्यु सिलिकोसिस जैसी गंभीर फेफड़ों की बीमारी के कारण हुई, जो सिलिका धूल के कणों को लंबे समय तक साँस के साथ भीतर लेने से होती है। लेख में कठिन कार्य परिस्थितियों, अपर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था और सीमित चिकित्सा सुविधाओं का भी उल्लेख किया गया है।हालाँकि, इन दावों के समर्थन में प्रस्तुत अधिकांश बयान अनाम स्रोतों पर आधारित है। एक मृतक मज़दूर के बेटे को छोड़कर किसी भी श्रमिक की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई, जिससे आरोपों और उनसे जुड़ी परिस्थितियों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना कठिन हो जाता है।
रिपोर्ट में दो मज़दूरों, Ramesh Meena और Devi Lal, को सिलिकोसिस के कथित पीड़ितों के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन इन दावों के समर्थन में कोई सार्वजनिक मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट या स्वतंत्र दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। जैसा कि लेख में कहा गया:
“मजदूरों का मानना है कि कम से कम दो श्रमिकों, रमेश मीणा और देवी लाल, की मौत सिलिकोसिस नाम की एक ऐसी फेफड़ों की बीमारी से हुई, जिसे काफी हद तक रोका जा सकता था, लेकिन यह लाइलाज है। यह बीमारी पत्थर तराशते समय बारीक सिलिका धूल के सांस में जाने से होती है, ऐसा कोर्ट के दस्तावेजों और मामले से जुड़े श्रम कार्यकर्ताओं के अनुसार बताया गया है। लाल की मौत तब हुई जब वह फेफड़े के प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे थे।”[2]
लेख आगे चलकर टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) और क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों को भी इस प्रोजेक्ट से जोड़ता है, और साथ ही यह आरोप भी लगाता है कि पर्याप्त PPE (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट) किट्स उपलब्ध नहीं थीं और कामकाज के तरीके असुरक्षित थे। ये आरोप गंभीर अवश्य हैं, लेकिन इन्हें मुख्यतः सुनी-सुनाई बातों, व्यक्तिगत अनुभवों और अनाम स्रोतों के आधार पर पेश किया गया है, न कि ठोस, सत्यापित दस्तावेजों के आधार पर।
नतीजतन, यह लेख एक ठोस और साक्ष्य-आधारित जाँच रिपोर्ट की तुलना में अधिक भावनात्मक नैरेटिव जैसा प्रतीत होता है, जिसमें पहले से तय निष्कर्षों को स्थापित करने का प्रयास दिखाई देता है। यदि इसमें मेडिकल रिकॉर्ड, पहचान वाले गवाह या स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य शामिल होते, तो इन आरोपों पर कहीं अधिक गंभीर और तथ्यपरक चर्चा संभव होती। फिलहाल, यह रिपोर्ट प्रमुख पश्चिमी मीडिया में साक्ष्यों के मानकों और नैरेटिव-प्रधान पत्रकारिता को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करती है।
BAPS मामले को फिर से हवा देता मीडिया नैरेटिव
BAPS स्वामीनारायण संस्था को लेकर छिड़ा विवाद किसी एक लेख तक सीमित नहीं रहा। The Guardian की रिपोर्ट के बाद, इसी तरह के लेखों की झड़ी लग गई । वैचारिक रूप से समान रुख़ रखने वाले प्लेटफॉर्म्स पर इसी तर्ज़ पर लिखे गए लेख देखने को मिले, जिनमें The Wire[3] और The Siasat Daily[4] जैसे पब्लिकेशंस भी शामिल हैं। सोशल मीडिया के एक्टिविस्ट नेटवर्क्स पर भी यह मुद्दा ज़ोर-शोर से फैलाया गया, जहां जाति-आधारित उत्पीड़न और श्रमिक शोषण के आरोपों को इस तरह बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया कि आरोप और स्थापित तथ्यों के बीच का फर्क लगभग समाप्त हो गया।
यह पैटर्न 2021 में शुरू हुए उस मीडिया चक्र की याद दिलाता है, जब एक सिविल मुकदमे में BAPS पर भारत से मज़दूरों को लाने, उन्हें कठिन परिस्थितियों में काम कराने और उनके पासपोर्ट ज़ब्त करने जैसे आरोप लगाए गए थे। उसी वर्ष मई में, अमेरिका की केंद्रीय जांच एजेंसियों ने न्यू जर्सी के अक्षरधाम निर्माण स्थल पर एक हाई-प्रोफाइल कार्रवाई की। इसके बाद मीडिया कवरेज कानूनी दावों से आगे बढ़कर “ह्यूमन ट्रैफिकिंग”, “फोर्स्ड लेबर” और “गुलामी” जैसे शब्दों के माध्यम से पूरे मामले को प्रस्तुत करने लगी। कई रिपोर्टों में इसे अमेरिका में बसे हिंदू प्रवासी समुदाय की व्यापक आलोचना से भी जोड़ा गया।
सितंबर 2025 में, जब अमेरिकी न्याय विभाग ने जांच बंद करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि तस्करी, जबरन मज़दूरी या किसी आपराधिक गतिविधि के पर्याप्त सबूत नहीं मिले, तब इस पूरे मामले की कानूनी दिशा बदल गई।[5] इसके बावजूद सार्वजनिक नैरेटिव में पहले से बने आरोप और धारणाएँ लगभग वैसी ही बनी रहीं। जांच बंद हुए एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि BAPS संस्था को फिर से आरोपों के घेरे में लाते हुए The Guardian का यह लेख प्रकाशित हो गया। इस कारण यह लेख पहले से खारिज हो चुके आरोपों को दोबारा जीवित करने के जल्दबाज़ी में किए गए प्रयास जैसा प्रतीत होता है।
The New York Times[6] और NBC News[7] जैसे बड़े मीडिया संस्थानों ने भी इस मुकदमे को बार-बार जाति व्यवस्था और श्रम शोषण के दृष्टिकोण से ही प्रस्तुत किया है। इस तरह की निरंतर फ्रेमिंग यह संकेत देती है कि यह मामला अब सिर्फ एक कानूनी विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पश्चिम में हिंदू संस्थाओं के ख़िलाफ़ चल रहे एक व्यापक नकारात्मक नैरेटिव का हिस्सा बन चुका है।
इस फ्रेमिंग के केंद्र में “जाति” को बार-बार व्याख्या के मुख्य आधार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। वेदों की वर्ण व्यवस्था जैसी जटिल ऐतिहासिक अवधारणाओं को अक्सर “ऊंची जाति” और “नीची जाति” जैसे सरल विभाजन में बदल दिया जाता है। कई बार इन्हें यूरोपीय नस्ली सिद्धांतों के दृष्टिकोण से देखा जाता है, जहां समाज को प्रभुत्व और अधीनता की कठोर श्रेणियों में बांटकर समझा जाता था। इससे ऐसा नैरेटिव बनता है, जिसमें हिंदू संस्थाओं को मुख्य रूप से असमानता और उत्पीड़न के नजरिये से देखा जाता है। इस तरह के चित्रण में दलित पहचान को अक्सर हिंदू धर्म के स्थायी विरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि हिंदू समाज की विविध और जटिल वास्तविकताओं को एक सीमित ढांचे में समेट दिया जाता है।
The Guardian का लेख भी इसी पैटर्न को आगे बढ़ाता है, जिसमें मंदिर निर्माण परियोजना को जाति-आधारित शोषण के स्थल के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेख में दावा किया गया है कि लगभग दो सौ दलित श्रमिक राजस्थान से न्यू जर्सी पहुंचे थे। साथ ही, भारत के ‘बॉन्डेड लेबर सिस्टम (उन्मूलन) अधिनियम, 1976’ के कथित रूप से कमजोर क्रियान्वयन को भी इस मामले से जोड़ने का प्रयास किया गया है। इस प्रकार, एक स्थानीय श्रम विवाद को जातिगत उत्पीड़न पर आधारित व्यापक सभ्यतागत नैरेटिव के भीतर फिट करने की कोशिश दिखाई देती है। [8]
अत्याचार साहित्य फ्रेम के ज़रिये हिंदू अमेरिकियों को निशाना बनाना
BAPS स्वामीनारायण संस्था को लेकर छिड़ा विवाद एक बड़े पैटर्न का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसके तहत पश्चिम में हिंदू पहचान को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की जा रही है। यहां आरोपों को अलग-अलग तथ्यों और दावों के आधार पर जांचने के बजाय, कुछ एक्टिविस्ट और मीडिया तंत्र हिंदू संस्थाओं को पहले से तय एक “अत्याचार खाँचे” में फिट कर देते हैं, जहां जाति, उत्पीड़न और पीड़ितत्व हिंदू पहचान को समझाने का प्रमुख माध्यम बन जाते हैं। जब यह फ्रेम मीडिया और बौद्धिक नैरेटिव में स्थापित हो जाता है, तो व्यक्तिगत तथ्यों की अहमियत अक्सर कम हो जाती है और नैरेटिव को बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण बन जाता है।
अमेरिका में जाति पर होने वाली चर्चा अक्सर इस तरह प्रस्तुत की जाती है, मानो भारत में जातिगत भेदभाव एक निर्विवाद और स्थायी सच्चाई हो, जिस पर बहस या वैकल्पिक दृष्टिकोण की बहुत कम गुंजाइश हो। इस ढांचे में दलित पहचान को कई बार एक ऐसी समरूप राजनीतिक श्रेणी के रूप में दिखाया जाता है, जो स्वाभाविक रूप से हिंदू संस्थाओं और सामाजिक संरचनाओं के विरोध में खड़ी हो। लेकिन दलित और बहुजन समुदायों के भीतर मौजूद विविध विचारों और अनुभवों को मुख्यधारा की कवरेज में शायद ही समान स्थान मिलता है।
जैसा कि हमने 2023 में The Sunday Guardian के लिए अपनी रिपोर्टिंग में दर्ज किया था, कैलिफोर्निया के एंटी-कास्ट कानून का विरोध केवल हिंदू संगठनों ने ही नहीं किया, बल्कि दलित और बहुजन समुदाय के कुछ लोगों ने भी इसका विरोध किया। Ambedkar Phule Network of American Dalits and Bahujans जैसे समूहों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि यह कानून हिंदू पहचान और जाति को लेकर अत्यधिक सामान्यीकृत धारणाओं पर आधारित है। इसके प्रमुख आलोचकों में मिलिंद मकवाना भी शामिल थे, जो अमेरिका में रहने वाले एक दलित एक्टिविस्ट थे और जुलाई 2023 में अपने निधन से पहले इस बिल के खिलाफ सक्रिय अभियान चला रहे थे। सिलिकॉन वैली में पेशेवर जीवन के साथ-साथ वे हिंदू शैक्षणिक और सामुदायिक पहलों से भी जुड़े हुए थे।
ऐसे उदाहरण यह दिखाते हैं कि अमेरिका में रहने वाला दलित और बहुजन समुदाय न तो राजनीतिक रूप से एकरूप है और न ही जाति या हिंदू पहचान को लेकर किसी एक दृष्टिकोण में सीमित है। कई बहुजन हिंदू अपनी धार्मिक पहचान को बनाए रखते हुए पेशेवर, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। परंतु इस तरह के अनुभव उस प्रमुख नैरेटिव में आसानी से समाहित नहीं होते, जो हिंदू धर्म को मुख्यतः दमनकारी सामाजिक संरचना के रूप में प्रस्तुत करता है। परिणामस्वरूप, मीडिया और नागरिक समाज के नैरेटिव में उन्हीं आवाज़ों को अधिक महत्व मिलता है, जो दलित पहचान को हिंदू पहचान के स्पष्ट विरोध में परिभाषित करती हैं। इससे जटिलता और विविधता की जगह टकराव, शिकायत और वैचारिक निश्चितता को प्राथमिकता मिलने लगती है।
यह चुनिंदा फ्रेमिंग “अन्यीकरण” (othering) की एक जटिल प्रक्रिया को जन्म देती है, जिसमें हिंदू अमेरिकियों की केवल आलोचना नहीं होती, बल्कि उन्हें स्थायी रूप से असमानता और बहिष्कार के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हिंदू अमेरिकी पहचान को बार-बार जाति के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति एक सरल नैतिक द्वंद्व तैयार करती है, जिसमें एक पक्ष को पीड़ित और दूसरे को उत्पीड़क के रूप में स्थापित कर दिया जाता है। कुछ हद तक यह दृष्टिकोण उन वैचारिक ढांचों से मिलता-जुलता है, जो समाज को प्रभुत्व और संघर्ष की निश्चित श्रेणियों में बांटकर देखते हैं। परिणामस्वरूप, जटिल सामाजिक वास्तविकताओं को तयशुदा वैचारिक भूमिकाओं में सीमित कर दिया जाता है।
ऐसा ही पैटर्न CISCO से जुड़े चर्चित मामले में भी देखने को मिला। कैलिफोर्निया सिविल राइट्स डिपार्टमेंट द्वारा सिस्को के कर्मचारियों सुंदर अय्यर और रमण कम्पेला के खिलाफ दायर मुकदमे को अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत में जाति-भेदभाव के एक बड़े उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लेकिन समय के साथ इस मामले के कई महत्वपूर्ण पहलू कमजोर पड़ते गए, जिनमें शिकायतकर्ता के रोजगार संबंधी दावों पर उठे सवाल और एडवोकेसी समूहों द्वारा प्रस्तुत जातिगत भेदभाव के प्रमाणों पर संदेह भी शामिल था।[9]
CISCO मामले का वास्तविक महत्व उसके कानूनी नतीजे से अधिक उस नैरेटिव में है, जो उसने स्थापित किया। जाति-भेदभाव के आरोपों को तेज़ी से एक बड़े सभ्यतागत पैटर्न के प्रमाण के रूप में पेश किया गया, जहां किसी एक कार्यस्थल के विवाद को पूरे हिंदू समाज और प्रवासी पहचान से जोड़ दिया गया।
BAPS विवाद में भी वही रुझान दिखाई देता है, पर यह CISCO मामले की तुलना में कहीं बड़े प्रतीकात्मक संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता है। जहां सिस्को मामला एलीट टेक स्पेसेज़ में तथाकथित जातिगत वर्चस्व के मुद्दे तक सीमित था, वहीं मंदिर से जुड़ा नैरेटिव इसे धर्म, श्रम, और सार्वजनिक नैतिकता जैसे व्यापक मुद्दों तक फैला देता है। चूंकि श्रमिक भारत से आए थे, इसलिए जाति को लेकर पहले से मौजूद धारणाएं इस पूरे मामले की व्याख्या में शामिल हो गईं, और एक हिंदू मंदिर परियोजना को सिर्फ एक निर्माण स्थल के रूप में नहीं, बल्कि प्रणालीगत उत्पीड़न के प्रतीक के रूप में पेश किया जाने लगा।
प्रवासी हिंदू समाज में BAPS की भूमिका
न्यू जर्सी में निर्मित BAPS मंदिर एक व्यापक संस्थागत उपस्थिति और लंबे समय से चल रही मंदिर-निर्माण परंपरा का हिस्सा है। BAPS के मंदिर उत्तरी अमेरिका के कई प्रमुख शहरों, जैसे ह्यूस्टन, शिकागो, अटलांटा, लॉस एंजिलिस, सैन जोज़े, क्लीवलैंड, ऑस्टिन और मियामी, में स्थापित हैं। BAPS संस्था दशकों से मंदिर निर्माण और विभिन्न सामुदायिक गतिविधियों में सक्रिय रही है, लेकिन अब तक उसके अन्य प्रोजेक्ट्स से जुड़े मजदूरों के साथ दुर्व्यवहार जैसे आरोपों के उल्लेखनीय मामले सामने नहीं आए हैं।
ऐसे समय में, जब अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों में हिंदू मंदिरों पर बढ़ते हमले समुदाय के लिए चिंता का विषय बन रहे हैं, BAPS स्वामीनारायण संस्था प्रवासी हिंदू समुदाय की सबसे संगठित और प्रमुख हिंदू संस्थाओं में गिनी जाती है। 1971 में न्यूयॉर्क सिटी में अपना पहला मंदिर स्थापित करने के बाद से यह संस्था 35 राज्यों और लगभग 100 कांग्रेसनल जिलों में 100 से अधिक मंदिरों का निर्माण कर चुकी है।[10] इस लंबे इतिहास के दौरान BAPS का नाम शायद ही किसी बड़े विवाद से जुड़ा रहा हो। व्यापक पृष्ठभूमि में देखें, तो 2021 का मुकदमा BAPS के भीतर किसी प्रणालीगत समस्या का संकेत कम और एक प्रमुख हिंदू संस्था पर पूर्वनिर्धारित नैरेटिव थोपने के प्रयास के रूप में अधिक दिखाई देता है।
BAPS पर केंद्रित ध्यान हिंदू पहचान और भारत की बदलती सभ्यतागत छवि को लेकर चल रही व्यापक बहसों से भी जुड़ता है। भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में हिंदू विषयों की बढ़ती प्रमुखता, जैसे Ram Mandir का निर्माण या प्राचीन हिंदू परंपराओं के प्रति नए सिरे से जुड़ाव, ने मीडिया, अकादमिक और वैचारिक क्षेत्रों में तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। “हिंदुत्व”, जाति और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर बन रहा नैरेटिव अब यह तय करने लगा है कि विदेशों में सक्रिय हिंदू संस्थाओं को किस दृष्टिकोण से देखा जाएगा। इसके परिणामस्वरूप एक ऐसा पैटर्न उभरता दिखाई देता है, जिसमें विदेशों में काम कर रही हिंदू संस्थाओं का आकलन उनके कार्यों के तत्काल दायरे से आगे बढ़कर, उनके प्रतीकात्मक अर्थों और वैचारिक व्याख्याओं के आधार पर किया जाता है।
इस व्यापक संदर्भ में, प्रवासी हिंदू समुदाय की संस्थाएं अक्सर बड़े राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्षों का प्रतीक बन जाती हैं। पश्चिम में सक्रिय हिंदू संस्थाओं का मूल्यांकन केवल उनके सामाजिक या धार्मिक कार्यों से नहीं, बल्कि पहचान की राजनीति, सत्ता संघर्ष और ऐतिहासिक शिकायतों से जुड़े व्यापक नैरेटिव के आधार पर भी किया जाता है। BAPS की प्रमुखता इसे ऐसे वैचारिक विवादों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है। इसके मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं हैं; वे स्थायित्व, संस्थागत सफलता और अमेरिकी समाज में एक स्पष्ट हिंदू उपस्थिति के प्रतीक भी हैं।
साथ ही, BAPS नई पीढ़ियों तक हिंदू मूल्यों को पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। एक विस्तृत स्वयंसेवी नेटवर्क के माध्यम से संस्था युवाओं को धार्मिक शिक्षा, सांस्कृतिक भागीदारी और सामुदायिक सेवा से जोड़ती है। BAPS मंदिर पारंपरिक धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ International Women’s Day और Earth Day जैसे अवसरों से जुड़े सामाजिक कार्यक्रम भी आयोजित करते हैं, जिससे आधुनिक सार्वजनिक जीवन में हिंदू धर्म की उपस्थिति और अधिक दिखाई देती है। संस्था अंतरधार्मिक संवाद, धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े नैरेटिव और विभिन्न सामाजिक संगठनों के साथ साझेदारी में भी सक्रिय रहती है।
समर्थकों के दृष्टिकोण से, यही व्यापक पहुंच और प्रभाव यह समझाने के लिए पर्याप्त है कि BAPS आलोचना का प्रमुख केंद्र क्यों बनता जा रहा है। एक बड़ी, शांतिपूर्ण और संगठित हिंदू संस्था, जो सांस्कृतिक निरंतरता को आगे बढ़ाती है, कुछ वैचारिक समूहों की दृष्टि में केवल धार्मिक संगठन नहीं, बल्कि पश्चिम में हिंदू आत्मविश्वास और स्थायित्व के स्पष्ट प्रतीक के रूप में दिखाई देती है।
समापन – हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ मीडिया पक्षपात पर सवाल उठाना ज़रूरी
BAPS के मंदिर निर्माण को श्रमिकों की मौत से जोड़ने वाला The Guardian का लेख उस विवाद को फिर से जीवित करने की कोशिश जैसा प्रतीत होता है, जो अमेरिकी केंद्रीय एजेंसियों की जांच के बाद काफी हद तक शांत हो चुका था। यह मामला केवल एक लेख या किसी संस्था की मंशा तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक पैटर्न की ओर संकेत करता है, जिसमें हिंदू संगठनों को ऐसे वैचारिक दृष्टिकोण से देखा जाता है, जहां कई बार प्रमाण से अधिक नैरेटिव और आरोपों को महत्व मिलता है।
मत-आधारित लेखन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है, लेकिन पत्रकारिता से अधिक कठोर मानकों की अपेक्षा की जाती है। क्योंकि पत्रकारिता सत्य की खोज, तथ्यों की पुष्टि और निष्पक्षता का दावा करती है, इसलिए उसका दायित्व है कि वह आरोप और प्रमाण, एक्टिविज़्म और जांच, तथा फ्रेमिंग और तथ्य के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखे।
जब किसी समुदाय की मीडिया कवरेज लगातार चुनिंदा स्रोतों, भावनात्मक कथाओं और पहले से बने वैचारिक ढांचों पर आधारित होती है, तो सवाल केवल आलोचना का नहीं रह जाता। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या जांच समान और संतुलित मानकों के आधार पर की जा रही है, और क्या वही साक्ष्य-मानदंड अपनाए जा रहे हैं, जो अन्य मामलों में अपेक्षित होते हैं।
हिंदू संस्थाओं को बार-बार केवल जातिगत उत्पीड़न, कट्टरता या ऐतिहासिक दोषभावना के सीमित नजरिये से देखना एक ऐसी प्रवृत्ति को दर्शाता है, जो औपनिवेशिक सोच की याद दिलाती है। इस तरह की फ्रेमिंग जटिल समाजों और संस्कृतियों को सरल नैतिक श्रेणियों में बांट देती है, जहां किसी समुदाय को स्थायी रूप से उत्पीड़क या पीड़ित के रूप में परिभाषित कर दिया जाता है।
हालांकि आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। वैश्विक स्तर पर हिंदू समुदायों की संस्थागत उपस्थिति और सार्वजनिक अभिव्यक्ति पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुई है। वे अब केवल बाहरी व्याख्याओं के विषय नहीं हैं, बल्कि अपने दृष्टिकोण को सामने रखने और उन चित्रणों को चुनौती देने की स्थिति में हैं, जिन्हें वे चयनात्मक, पक्षपातपूर्ण या अपनी सभ्यतागत पहचान का अधूरा प्रतिनिधित्व मानते हैं।
सन्दर्भ सूची
[1] Workers carved the largest modern Hindu temple in the west. Now, some have incurable lung disease | New Jersey | The Guardian; https://www.theguardian.com/us-news/2026/apr/02/new-jersey-hindu-temple-lung-disease
[2] Ibid.
[3] Conditions at BAPS’s New Jersey Temple Contributed to His Suicide’: What Family of Worker Told Media – The Wire; https://thewire.in/rights/baps-new-jersey-worker-suicide-family-allegations
[4] Lung diseases among workers who built major US Hindu temple: Report; https://www.siasat.com/lung-diseases-among-workers-who-built-major-us-hindu-temple-report-3446208/
[5] Tried by Media Now Cleared by DOJ Verdict; https://stophindudvesha.org/tried-by-the-media-vindicated-by-doj-the-baps-forced-labor-case-and-a-failure-of-fairness/#_ftn1
[6] A $96 Million Hindu Temple Opens Amid Accusations of Forced Labor – The New York Times; https://www.nytimes.com/2023/10/21/nyregion/nj-hindu-temple.html
[7] Hindu temple in New Jersey accused of ‘shocking violations’ in forced-labor lawsuit; https://www.nbcnews.com/news/us-news/hindu-temple-new-jersey-accused-shocking-violations-forced-labor-lawsuit-n1267041
[8] Workers carved the largest modern Hindu temple in the West. Now, some have incurable lung disease | New Jersey | The Guardian; https://www.theguardian.com/us-news/2026/apr/02/new-jersey-hindu-temple-lung-disease
[9] Cisco’s Engineering Role: Caste Discrimination Claim; https://stophindudvesha.org/head-of-engineering-position-at-cisco-john-doe-claims-caste-discrimination-for-was-first-offered-to-another-dalit-candidate/
[10] BAPS in the United States – BAPS Public Affairs; https://www.bapspublicaffairs.org/about-us/baps-in-the-united-states/
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