मित्तल की 25 मिलियन डॉलर की भेंट: हार्वर्ड के हिंदू-विरोधी नैरेटिव उद्योग को मिला ईंधन
सारांश
यह लेख वैश्विक परोपकार के एक बढ़ते विरोधाभास पर प्रकाश डालता है। इसमें बताया गया है कि कई संपन्न भारतीय दानदाता पश्चिमी विश्वविद्यालयों को उदारतापूर्वक धन दे रहे हैं, जबकि उन्हीं संस्थानों में होने वाला शोध और विमर्श अक्सर हिंदू धर्म और भारत को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। हार्वर्ड के संस्कृत पाठ्यक्रम के एक विवादित प्रचार चित्र से शुरू हुई बहस ने दक्षिण एशियाई अध्ययन के क्षेत्र में मौजूद कुछ गहरे ढाँचागत सवालों को सामने ला दिया। मित्तल परिवार द्वारा हार्वर्ड के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट को दिया गया 25 मिलियन डॉलर का अनुदान इसका एक उदाहरण है। ऐसे अनुदान उन अकादमिक ढाँचों को सहारा देते हैं, जहाँ हिंदू परंपराओं को अक्सर एक सीमित वैचारिक दृष्टिकोण से देखा जाता है। चीनी परोपकार मॉडल से अलग, जहाँ दान के साथ स्पष्ट रणनीतिक शर्तें जोड़ी जाती हैं, भारतीय दानदाता प्रायः बिना किसी निगरानी या जवाबदेही के धन देते हैं। इस लेख का तर्क है कि प्रवासी भारतीयों की परोपकार परंपरा को अब अधिक जिम्मेदार और रणनीतिक रूप देना होगा, ताकि संतुलित और गंभीर शोध को बढ़ावा मिले और साथ ही सभ्यतागत हितों की भी रक्षा हो सके।
हार्वर्ड के ‘एलीमेंट्री संस्कृत’ पाठ्यक्रम के प्रचार चित्र में धुँधली रोशनी के बीच एक रहस्यमय आकृति दिखाई देती है। उसके माथे पर तिलक बना है—जो हिंदू परंपरा का एक पवित्र प्रतीक है—और उसके हाथों से कठपुतली जैसे पात्र लटक रहे हैं।[1] पूरा दृश्य किसी कठपुतली संचालक के नियंत्रण का आभास कराता है। इस चित्र का उद्देश्य छात्रों को वेदों की प्राचीन भाषा संस्कृत की ओर आकर्षित करना था, लेकिन इसके बजाय इसने तीखी प्रतिक्रिया और विवाद को जन्म दे दिया।
2026 की शुरुआत में, लक्ष्मी मित्तल एंड फैमिली साउथ एशिया इंस्टीट्यूट से जुड़े हार्वर्ड के साउथ एशियन स्टडीज़ विभाग द्वारा जारी इस चित्र पर खुले हिंदू-विरोधी संकेतों के आरोप लगे। आलोचकों ने इसकी तुलना नाजी काल के उन यहूदी-विरोधी कार्टूनों से की, जिनमें यहूदी बैंकरों को चालाक और षड्यंत्रकारी शक्ति के रूप में चित्रित किया जाता था। इतिहास में इस तरह की दृश्य शैली का उपयोग अक्सर किसी समुदाय को नकारात्मक और अमानवीय रूप में दिखाने के लिए किया जाता रहा है।[2] चित्र में नीले रंग की एक छायादार आकृति महाभारत के पांडवों से मिलते-जुलते पात्रों को कठपुतली की तरह नियंत्रित करती दिखाई देती है। इससे यह संकेत मिलता है कि कृष्ण, जो हिंदू धर्म में ज्ञान, नीति और दिव्य लीला के प्रतीक माने जाते हैं, मानो किसी गुप्त और चालाक संचालक की तरह सबको नियंत्रित कर रहे हों।
उल्लेखनीय है कि हार्वर्ड ने कुछ ही दिनों के भीतर इस पर माफी जारी करते हुए कहा, “हम अपने संस्कृत कार्यक्रम से जुड़े इस असंवेदनशील चित्र के प्रकाशन पर गहरा खेद व्यक्त करते हैं।” साथ ही यह भी बताया गया कि यह चित्र भारतीय कलाकार अनिरुद्ध साइनाथ द्वारा बनाया गया था और इसकी प्रेरणा कृष्ण की रासलीला जैसे हिंदू आख्यानों से ली गई थी।[3] लेकिन कई हिंदू प्रवासियों के अनुसार यह कोई अकेली भूल नहीं थी, बल्कि अमेरिकी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में मौजूद एक गहरी समस्या का संकेत थी, जहाँ मित्तल जैसे भारतीय अरबपतियों के दान अनजाने में ऐसे अकादमिक विमर्शों को सहारा दे रहे हैं जो हिंदू धर्म और भारत को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं।
बाद की एक टिप्पणी में CoHNA ने 2020 की एक घटना का भी उल्लेख किया जब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रोफेसर अजन्ता सुब्रमणियन की जाति पर लिखी पुस्तक के प्रचार के लिए एक और हिंदू-विरोधी कार्टून का उपयोग किया था। संगठन का कहना था कि हार्वर्ड में हिंदू-विरोधी दृष्टिकोण की “लंबी परंपरा” रही है।[4]
जैसा कि एक टिप्पणीकार ने व्यंग्य में कहा, “हमारे ही पैसों से चलने वाले संस्थानों में हमारे देवताओं को खलनायक बना दिया जाता है।”
मित्तल परिवार: बार-बार विवादों में
यह पहली बार नहीं है जब मित्तल परिवार से जुड़े साउथ एशिया इंस्टीट्यूट की गतिविधियों पर भारत के हितों के विरुद्ध जाने के आरोप लगे हों। वर्ष 2025 में पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों द्वारा किए गए आतंकी हमले के तुरंत बाद इसी संस्थान ने “पाकिस्तान कॉन्फ़्रेंस 2025” के आयोजन में सहयोग दिया। यह एक दिन का शैक्षणिक कार्यक्रम था, जिसे हार्वर्ड के पाकिस्तानी छात्रों ने अपने फैकल्टी सलाहकारों के साथ मिलकर आयोजित किया, जबकि संस्थान ने इसके लिए संस्थागत सहायता प्रदान की।[5]
इस सम्मेलन में कई ऐसे लोग शामिल हुए जिन्हें हिंदू-विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। इनमें पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगज़ेब, अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रिज़वान सईद शेख और पत्रकार हामिद मीर शामिल थे। कार्यक्रम के दौरान मीर ने बार-बार अमेरिकी अकादमिक जगत में “भारतीय प्रभाव” की शिकायत की। इस पर पाकिस्तानी राजदूत ने कहा कि इस्लामाबाद भी अपने अकादमिक चेयरों को फिर से सक्रिय करेगा।[6]
जब भारतीय छात्रों और कार्यकर्ताओं की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई—और यह आरोप लगाया गया कि यह कार्यक्रम ऐसे देश के प्रति अप्रत्यक्ष सहानुभूति दर्शाता है जो आतंकवाद को आश्रय देता है, तो मित्तल परिवार के एक प्रवक्ता ने संस्थान के बयान का हवाला देते हुए बताया कि इस कार्यक्रम के बारे में किसी भी दानदाता से सलाह नहीं ली गई थी और हार्वर्ड के पाकिस्तानी छात्रों ने अपने फैकल्टी सलाहकार के साथ मिलकर स्वतंत्र रूप से इसके विषय और वक्ताओं का चयन किया था।
प्रतिष्ठा के लिए दान, परिणामों से अनजान
2017 में मित्तल परिवार द्वारा दिया गया 25 मिलियन डॉलर का अनुदान हार्वर्ड के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट का नाम बदलकर “लक्ष्मी मित्तल एंड फैमिली साउथ एशिया इंस्टीट्यूट” रखने का कारण बना। आर्सेलरमित्तल के वैश्विक इस्पात समूह के प्रमुख लक्ष्मी मित्तल के इस दान की उस समय व्यापक चर्चा हुई थी। इसका उद्देश्य विज्ञान से लेकर मानविकी तक विभिन्न विषयों में दक्षिण एशिया से जुड़ी शैक्षणिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना बताया गया था।[7] उस समय हार्वर्ड की अध्यक्ष ड्रू फॉस्ट ने कहा था कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय केंद्र विश्वविद्यालय और अध्ययन किए जा रहे क्षेत्र के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का काम करते हैं।[8] स्वयं मित्तल ने भी इस दान को एक ऐसे सेतु के रूप में प्रस्तुत किया था, जो भारत की समृद्धि और वैश्विक सहभागिता को आगे बढ़ाने में सहायक होगा।
लगभग एक दशक बाद यही संस्थान बार-बार विवादों के केंद्र में आ गया है। आलोचकों का आरोप है कि यहाँ शैक्षणिक शोध के नाम पर हिंदू धर्म के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जाता है। यद्यपि विवादित संस्कृत चित्र का मित्तल इंस्टीट्यूट से सीधा संबंध नहीं था, फिर भी उसका अनुदान हार्वर्ड में दक्षिण एशियाई अध्ययन से जुड़े व्यापक अकादमिक ढाँचे को सहारा देता है। साउथ एशिया इंस्टीट्यूट और साउथ एशियन स्टडीज़ विभाग के बीच फैकल्टी, कार्यक्रमों और संस्थागत संरचना में घनिष्ठ जुड़ाव है।
वेंडी डोनिगर, शेल्डन पोलॉक और ऑड्रे ट्रश्के जैसे कुछ विद्वानों की व्याख्याओं पर भी हिंदू ग्रंथों को संकुचित या शत्रुतापूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने के आरोप लगते रहे हैं। 2021 में आयोजित “डिस्मैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व” सम्मेलन—जिसे अमेरिका के 50 से अधिक विश्वविद्यालय विभागों का समर्थन मिला था और जिसमें हार्वर्ड से जुड़े कार्यक्रम भी शामिल थे—इस प्रवृत्ति का एक प्रमुख उदाहरण माना गया। आलोचकों का कहना था कि इस सम्मेलन में हिंदू सांस्कृतिक पहचान को ही अतिवाद के बराबर ठहराने की कोशिश की गई।
मित्तल फंडिंग और कोलार गोल्ड फ़ील्ड्स का विवादित शोध
एक और चिंताजनक उदाहरण 2017 में रंजनी श्रीनिवासन द्वारा लिखा गया एक तथाकथित “शोध पत्र” है। श्रीनिवासन को कई लोग कट्टर वैचारिक दृष्टिकोणों को बढ़ावा देने वाली शोधकर्ता के रूप में देखते हैं। उनका शोधपत्र, “Gold & Cyanide: Family, Caste, and the Post-extractive Landscape at Kolar Gold Fields,” [9] अकादमिक जगत में उस प्रकार के काम का उदाहरण माना जाता है जिसे अक्सर सतही या उद्देश्यहीन शोध कहा जाता है, और जिसे मित्तल इंस्टीट्यूट से वित्तीय सहायता मिली थी।
यह लेख भारत के कोलार गोल्ड फ़ील्ड्स में खनन के बाद की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर चर्चा करता है। लेकिन इसकी मूल समस्या यह है कि इसके आधार और निष्कर्ष कमजोर और कृत्रिम प्रतीत होते हैं। लेख का मुख्य तर्क यह है कि सोने की खानों के “उच्च जाति” के मालिकों ने निम्न जाति के श्रमिकों का शोषण किया।
वास्तविकता यह है कि भारत की स्वतंत्रता से पहले कोलार गोल्ड फ़ील्ड्स पर ब्रिटिश शासन का नियंत्रण था और इन्हें औपनिवेशिक सरकार ही संचालित करती थी। श्रमिकों के साथ जो अन्याय हुआ, उसमें मुख्य भूमिका ब्रिटिश प्रशासन की थी, जिसने खदानों के पास रहने वाले गरीब मजदूरों के क्षेत्रों में सायनाइड जैसे जहरीले अपशिष्ट फेंके। इस ऐतिहासिक संदर्भ को सामने लाने के बजाय शोधपत्र में औपनिवेशिक शोषण को जाति-आधारित उत्पीड़न के रूप में प्रस्तुत किया गया।
मित्तल परिवार के दान के साथ न तो कोई शर्तें थीं और न ही निगरानी की व्यवस्था। परिणामस्वरूप ऐसा कोई दाता समीक्षा बोर्ड या सांस्कृतिक सलाहकार समूह मौजूद नहीं था जो ऐसी व्याख्याओं पर सवाल उठा सके। कई भारतीय-अमेरिकी कार्यकर्ताओं का कहना है कि यही ढीला ढाँचा हिंदू-विरोधी दृष्टिकोण वाले विमर्शों को बढ़ावा देता है।
इस संदर्भ में मित्तल परिवार के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। यदि कोई दानदाता किसी संस्था को बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता देता है, तो उसके कार्यों के नैतिक परिणामों से पूरी तरह अलग रहना कठिन होता है। केवल यह कहना कि कार्यक्रमों के आयोजन से पहले उनसे परामर्श नहीं किया गया, पर्याप्त नहीं है। कई लोगों का मानना है कि यदि किसी भारतीय धन से संचालित संस्थान में विषय और वक्ताओं का चयन पूरी तरह उन लोगों के हाथ में छोड़ दिया जाए जिनकी प्राथमिकताएँ भारत के विरुद्ध हो सकती हैं, तो यह स्थिति अपने आप में विरोधाभासी बन जाती है।
यही विरोधाभास कुछ असहज प्रश्न भी उठाता है। भारतीय दानदाता, अपने चीनी समकक्षों की तुलना में, अक्सर बिना किसी शर्त या रणनीतिक दिशा के दान क्यों देते हैं? और क्या इस उदार लेकिन ढीले दृष्टिकोण ने अनजाने में ऐसे विमर्शों को बढ़ावा दिया है जो हिंदुओं और भारत को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं—कभी-कभी उसी तरह जैसे औपनिवेशिक दौर में भारत को चित्रित किया जाता था?
इस प्रश्न को समझने के लिए अमेरिकी विश्वविद्यालयों के व्यापक अकादमिक तंत्र को देखना होगा। यहाँ विदेशी दान का प्रवाह लगातार बढ़ता रहा है। 1986 के बाद से अमेरिकी विश्वविद्यालयों को विदेशों से लगभग 57.97 अरब डॉलर का धन प्राप्त हुआ है, जिसमें से लगभग 29 अरब डॉलर केवल 2021 से 2024 के बीच आए।[10] भारतीय उद्योगपति भी इस प्रक्रिया में सक्रिय रहे हैं। टाटा समूह ने 2010 में हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल को 50 मिलियन डॉलर का दान दिया, जिसके परिणामस्वरूप “टाटा हॉल” का निर्माण हुआ।[11] उसी वर्ष आनंद महिंद्रा ने हार्वर्ड के ह्यूमैनिटीज़ सेंटर को 10 मिलियन डॉलर दिए, जिसे बाद में उनके परिवार के नाम पर रखा गया।[12] इसके बाद अजय पीरामल, नंदन निलेकणी और गोदरेज परिवार ने भी कई शैक्षणिक पहलों का समर्थन किया है।[13] इनमें से अधिकांश दान पूर्व छात्रों के भावनात्मक जुड़ाव या राष्ट्रीय गौरव की भावना से प्रेरित थे। लेकिन इन अनुदानों के साथ आम तौर पर ऐसी कोई स्पष्ट शर्त नहीं जुड़ी होती जो भारत या भारतीय सभ्यता के संतुलित प्रतिनिधित्व की अपेक्षा रखे। जैसा कि रतन टाटा ने अपने हार्वर्ड दान के संदर्भ में कहा था, यह उनके लिए उस संस्थान को लौटाने का एक छोटा सा प्रयास था जिसने उन्हें बहुत कुछ दिया था।[14] दूसरे शब्दों में, यह मुख्यतः अपने पुराने विश्वविद्यालय से जुड़ाव और कृतज्ञता की भावना का प्रतीक था।
चीनी मॉडल: शर्तों के साथ दान
इसकी तुलना में चीनी उद्योगपतियों की परोपकार गतिविधियाँ अक्सर रणनीतिक होती हैं और किसी न किसी रूप में बीजिंग के हितों से जुड़ी रहती हैं। उदाहरण के लिए, टेनसेंट के प्रमुख मा हुआतेंग ने प्रिंसटन और एमआईटी जैसे विश्वविद्यालयों को लाखों डॉलर का दान दिया। इन अनुदानों से “चाइना इम्पैक्ट प्रोजेक्ट” जैसे कार्यक्रमों को समर्थन मिला, जिनका उद्देश्य अमेरिकी मीडिया में चीन की छवि और उसके प्रति दृष्टिकोण का अध्ययन करना था।[15] इसी तरह डुआन योंगपिंग ने बीजिंग नॉर्मल यूनिवर्सिटी को लगभग 31 मिलियन डॉलर का दान दिया। ऐसे उदाहरण यह संकेत देते हैं कि चीनी दानदाता अक्सर अपने अनुदानों के साथ कुछ स्पष्ट अपेक्षाएँ या शर्तें भी जोड़ते हैं, ताकि शोध कार्य किसी न किसी रूप में चीन के हितों को मजबूत करे या अमेरिकी तकनीक तक पहुँच के नए रास्ते खोल सके।[16] 2024 में वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक जांच में यह भी सामने आया कि 2012 से 2024 के बीच लगभग 200 अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने चीनी कंपनियों के साथ कुल मिलाकर 2.32 अरब डॉलर के अनुबंध किए थे। इनमें से कई परियोजनाएँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों से जुड़ी थीं, जो चीन की सैन्य और तकनीकी महत्वाकांक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।[17] अमेरिकी सरकार ने भी इन संबंधों की जांच की है और कुछ मामलों में ऐसे वित्तीय प्रवाह का पता लगाया है जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए गए, जिनमें सेंसरशिप और जासूसी से जुड़े आरोप भी शामिल हैं।
इसके विपरीत, भारतीय दानदाता आम तौर पर ऐसी निगरानी या शर्तों से दूर रहते हैं। जहाँ चीनी उद्योगपति अपने अनुदानों से जुड़े शोध के परिणामों पर स्पष्ट अपेक्षाएँ रखते हैं, वहीं भारतीय उद्योगपति अक्सर संस्थानों को पूरी स्वतंत्रता दे देते हैं। यह दृष्टिकोण अक्सर कृतज्ञता से जुड़ा होता है, क्योंकि अनेक दानदाता स्वयं इन विश्वविद्यालयों के पूर्व छात्र रहे हैं। इसके साथ ही हिंदू सांस्कृतिक परंपरा में परोपकारी और निःस्वार्थ दान को विशेष महत्व प्राप्त है।[18]
लेकिन यही खुलापन कई बार समस्याओं का कारण बन जाता है। बिना किसी निगरानी या दिशा के दिया गया दान ऐसे शैक्षणिक वातावरण को जन्म दे सकता है जहाँ शोध और विमर्श ऐसे रूप ले लेते हैं जो दानदाता समुदाय के प्रति ही आलोचनात्मक या नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देते हैं। हार्वर्ड से जुड़े हालिया विवाद इसी व्यापक समस्या की ओर संकेत करते हैं।
हार्वर्ड — हिंदू-विरोधी नैरेटिव का एक केंद्र?
हार्वर्ड में हिंदू-विरोधी दृष्टिकोण को केवल कुछ घटनाओं तक सीमित नहीं माना जाता। आलोचकों के अनुसार यह कई बार अप्रत्यक्ष रूपों में भी दिखता है। प्रवेश आँकड़ों से संकेत मिलता है कि एशियाई-अमेरिकी छात्रों—जिनमें भारतीय भी बड़ी संख्या में हैं—को “व्यक्तित्व” जैसे व्यक्तिपरक मानकों पर कम अंक दिए जाते रहे हैं, जबकि उनके शैक्षणिक परिणाम उत्कृष्ट होते हैं।[19] ऐतिहासिक रूप से हार्वर्ड में एशियाई छात्रों का प्रतिशत लगभग 13 प्रतिशत के आसपास रहा, जबकि योग्यता-आधारित प्रवेश प्रणाली वाले कैलटेक जैसे संस्थानों में यह लगभग 45 प्रतिशत तक पहुँच गया। लेखक मैल्कम ग्लैडवेल ने इस अंतर को बहिष्करण की प्रवृत्ति बताते हुए इसकी तुलना उन औपनिवेशिक रणनीतियों से की है जिनका उद्देश्य भारतीय समाज को विभाजित करना था। कक्षाओं में भी कई बार हिंदू धर्म को मुख्यतः जाति-आधारित उत्पीड़न और हिंसा के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाता है, जबकि उसके दार्शनिक और आध्यात्मिक आयामों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। 2025 में ह्यूस्टन विश्वविद्यालय के एक छात्र ने हिंदू धर्म पर पढ़ाए जा रहे एक पाठ्यक्रम को लेकर शिकायत की थी। उसका कहना था कि पाठ्यक्रम की भाषा में “हिंदुत्व” को सीधे राष्ट्रवादी कट्टरता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।[20]
2021 में आयोजित “डिस्मैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व” सम्मेलन इस प्रवृत्ति का एक प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया। इस कार्यक्रम को 40 से अधिक विश्वविद्यालयों के विभागों का समर्थन मिला था, जिनमें हार्वर्ड से जुड़े कार्यक्रम भी शामिल थे। कई हिंदू संगठनों ने इसका विरोध किया और कहा कि इस सम्मेलन में हिंदू सांस्कृतिक पहचान को ही अतिवाद के बराबर ठहराने की कोशिश की गई।[21]
सम्मेलन के कई वक्ताओं ने “हिंदुत्व” को फासीवाद से जोड़ने वाली व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं, जबकि हिंदू-विरोधी भेदभाव या “हिंदूफोबिया” के अस्तित्व को ही नकार दिया गया। आलोचकों का कहना है कि ऐसे कार्यक्रम—जिन्हें अप्रत्यक्ष रूप से बड़े अनुदानों से मिलने वाली वित्तीय संरचना का सहारा मिलता है—एक ऐसा चक्र बना देते हैं जिसमें एकतरफा या विकृत शोध आगे और उसी प्रकार के विमर्श को जन्म देता है। समय के साथ यह प्रक्रिया स्थायी रूढ़ धारणाओं को और मजबूत करती जाती है।
हानि के तंत्र: रूढ़ धारणाएँ, प्रवेश में पक्षपात और भू-राजनीतिक प्रभाव
इन विवादों का प्रभाव केवल विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं रहता। बिना जवाबदेही के दिया गया वित्तपोषण कई स्तरों पर नुकसान पहुँचा सकता है।
सबसे पहले, सांस्कृतिक रूढ़ धारणाओं का प्रसार। जब कृष्ण भगवान को एक चालाक कठपुतली संचालक के रूप में दिखाया जाता है, तो धीरे-धीरे हिंदू देवताओं और महाकाव्यों को संदेह या षड्यंत्र की दृष्टि से देखा जाने लगता है। यह दृष्टिकोण कहीं न कहीं औपनिवेशिक “फूट डालो और राज करो” जैसी रणनीतियों या द्रविड़वादी आलोचनाओं की याद दिलाता है। ऐसे चित्रण उन छात्रों को प्रभावित कर सकते हैं जो आगे चलकर नीति-निर्माता, पत्रकार या व्यावसायिक नेता बनते हैं और जिन्होंने अपनी शिक्षा के दौरान ऐसे ही पाठ्यक्रम पढ़े होते हैं।
अमेरिका में रहने वाले लगभग 25 लाख हिंदुओं के लिए ऐसे विमर्श कई बार सामाजिक असहजता और सूक्ष्म भेदभाव का कारण बन सकते हैं। एफबीआई के आँकड़े बताते हैं कि हिंदू-विरोधी घृणा अपराध अक्सर कम रिपोर्ट किए जाते हैं, लेकिन कुछ वर्षों में उनकी संख्या मुस्लिम-विरोधी घटनाओं से भी अधिक रही है।[22] कई हिंदू छात्रों ने यह भी बताया है कि अपने धर्म का बचाव करने पर उन्हें आलोचना या असहज माहौल का सामना करना पड़ता है। कैलिफोर्निया में स्कूल पाठ्यपुस्तकों को लेकर हुए विवादों में भी हिंदू धर्म को अक्सर उत्पीड़न और असमानता से जोड़कर प्रस्तुत किए जाने की शिकायतें सामने आई थीं।[23]
दूसरा मुद्दा है प्रवेश और प्रतिनिधित्व का। हार्वर्ड के प्रवेश आँकड़ों पर हुए अध्ययनों से संकेत मिला कि एशियाई-अमेरिकी छात्रों—जिनमें कई उच्च प्रदर्शन करने वाले भारतीय छात्र भी शामिल हैं—को “व्यक्तित्व” और “पसंद किए जाने की क्षमता” जैसे व्यक्तिपरक मानकों पर अपेक्षाकृत कम अंक दिए जाते रहे। 2018 में Students for Fair Admissions नामक मुकदमे में भी इस प्रवृत्ति का उल्लेख किया गया था।[24] 2023 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पहले एशियाई छात्रों का प्रवेश प्रतिशत योग्यता के आधार पर अपेक्षित स्तर से कम माना जाता था। इसके विपरीत कैलटेक जैसे संस्थानों में, जहाँ प्रवेश प्रक्रिया अधिकतर शैक्षणिक योग्यता पर आधारित है, एशियाई छात्रों का प्रतिशत 40 प्रतिशत से अधिक रहा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हार्वर्ड में एशियाई-अमेरिकी छात्रों का प्रतिशत बढ़कर लगभग 41 प्रतिशत हो गया।[25] इसके बावजूद विरासत आधारित प्रवेश, खेल कोटा और दानदाताओं से जुड़े प्रभाव जैसे तत्व अभी भी बने हुए हैं, जो कुछ मामलों में भारतीय छात्रों के लिए प्रतिस्पर्धा को कठिन बना सकते हैं।
इसके साथ ही यह भी तर्क दिया जाता है कि यदि किसी संस्थान में “हिंदू राष्ट्रवाद” की आलोचना पर अत्यधिक जोर दिया जाता है, तो इससे अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश जा सकता है कि भारत या हिंदू पहचान के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण को ही अधिक स्वीकार्य माना जाता है। इससे कुछ छात्रों के लिए अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व व्यक्त करना भी कठिन हो सकता है।
तीसरा प्रभाव भू-राजनीतिक और सॉफ्ट-पावर के स्तर पर दिखाई देता है। जिन अकादमिक कार्यक्रमों को बड़े अनुदानों से अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता है, वहाँ से निकलने वाले विमर्श कई बार अमेरिका की नीति-चर्चाओं को भी प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे विमर्श भारत को मुख्यतः बहुसंख्यकवादी या जाति-आधारित उत्पीड़न से ग्रस्त समाज के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि उसके लोकतांत्रिक और बहुआयामी स्वरूप पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है।
“डिस्मैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व” जैसे कार्यक्रमों ने प्रवासी भारतीय समुदाय के भीतर मतभेदों को भी बढ़ाया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत से जुड़े विमर्शों को प्रभावित किया। कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि ऐसे वातावरण के कारण विदेशों में हिंदू मंदिरों और समुदायों को अतिरिक्त निगरानी या आलोचना का सामना करना पड़ता है, और कभी-कभी तोड़फोड़ की घटनाएँ भी सामने आती हैं। जब ऐसे अकादमिक दृष्टिकोणों से शिक्षित छात्र आगे चलकर थिंक टैंकों, मीडिया संस्थानों या सरकारी निकायों में जाते हैं, तो ये विचार व्यापक नीति विमर्श का हिस्सा बन सकते हैं।
अंततः एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—सांस्कृतिक क्षरण का। जब भारतीय उद्योगपति बड़ी मात्रा में धन पश्चिमी विश्वविद्यालयों को देते हैं, तो वही संसाधन भारतीय विश्वविद्यालयों को मजबूत करने, स्वतंत्र शोध संस्थान स्थापित करने या ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में भी लगाए जा सकते थे। इस दृष्टि से कभी-कभी ऐसी स्थिति बन जाती है जहाँ संपन्न हिंदू परिवार अनजाने में उन्हीं अकादमिक ढाँचों को वित्तीय सहायता दे रहे होते हैं जो उनकी अपनी सभ्यतागत परंपराओं की आलोचनात्मक व्याख्या पर केंद्रित रहते हैं।
सभ्यतागत आत्मघात से पीछे हटने का समय
शायद यह कहना उचित नहीं होगा कि मित्तल या उनके जैसे अन्य दानदाता किसी दुर्भावना से ऐसा कर रहे हैं। राजस्थान में जन्मे और ब्रिटेन द्वारा नाइटहुड से सम्मानित लक्ष्मी मित्तल वैश्विक भारतीय सफलता की एक प्रमुख मिसाल माने जाते हैं। उनका दान उस समय एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सराहा गया था।
लेकिन जब बड़े अनुदानों के साथ जवाबदेही या निगरानी नहीं होती, तो वही दान दोधारी तलवार बन सकते हैं। अकादमिक जगत में हिंदू-विरोधी प्रवृत्तियों की आलोचना करने वाले विचारकों में से एक राजीव मल्होत्रा का कहना है कि भारतीय दानदाताओं को केवल निष्क्रिय दान देने की परंपरा से आगे बढ़कर अधिक रणनीतिक और जागरूक दृष्टिकोण अपनाना होगा।[26]
समाधान असंभव नहीं हैं। भारतीय उद्योगपतियों और प्रवासी भारतीय समुदाय को प्रतिष्ठा-आधारित दान से आगे बढ़कर अधिक जिम्मेदार परोपकार की दिशा में कदम उठाने होंगे। इसके लिए कुछ व्यावहारिक सुझाव सामने रखे जा सकते हैं।
- शर्तों के साथ दान: दान के साथ ऐसी शर्तें जोड़ी जा सकती हैं जिनके तहत दानदाता सलाहकार समितियाँ बनाई जाएँ, जिनमें हिंदू अध्ययन के विद्वान और भारतीय प्रतिनिधि शामिल हों। ये समितियाँ उन कार्यक्रमों या सामग्री की समीक्षा कर सकती हैं जिनमें हिंदू धर्म या भारतीय परंपराओं से जुड़े विषय प्रस्तुत किए जाते हैं। साथ ही “हिंदू अध्ययन” या “धार्मिक सभ्यताओं” पर केंद्रित अकादमिक चेयर स्थापित किए जा सकते हैं, जिनमें मूल स्रोतों और संतुलित शोध को महत्व दिया जाए।
- सहयोग और संस्थागत नेटवर्क: हिन्दू संगठनों के साथ साझेदारी कर प्रशिक्षण, नीति समीक्षा और संवाद के कार्यक्रम विकसित किए जा सकते हैं। साथ ही हिंदू-विरोधी भेदभाव को औपचारिक रूप से मान्यता देने वाले विधायी प्रयासों का समर्थन किया जा सकता है, जैसा कि जॉर्जिया और ओहायो जैसे राज्यों में पारित प्रस्तावों से संकेत मिलता है। अमेरिकी प्रतिनिधि श्री थानेदार द्वारा 2024 में प्रस्तुत हाउस रेज़ोल्यूशन 1131 इस दिशा में एक प्रारंभिक कदम माना जा सकता है।
- जवाबदेही की व्यवस्था: ऐसी स्वतंत्र संस्थाएँ बनाई जा सकती हैं जो अनुदानों के उपयोग की समीक्षा करें और यह देखें कि कहीं उनमें वैचारिक पक्षपात तो नहीं है। विदेशी वित्तपोषण की पारदर्शिता से जुड़े कानूनों, जैसे कि अमेरिका के सेक्शन 117, के आधार पर संसदीय जांच या कानूनी प्रक्रियाओं का समर्थन भी किया जा सकता है। साथ ही हार्वर्ड जैसे संस्थानों से सीधे संवाद कर अधिक संतुलित शैक्षणिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
- वैकल्पिक बौद्धिक ढाँचे का निर्माण: केवल पश्चिमी संस्थानों में सुधार की अपेक्षा करने के बजाय भारतीय दानदाताओं को वैकल्पिक बौद्धिक ढाँचे भी विकसित करने चाहिए। इसमें थिंक टैंक, डिजिटल मंच और स्कूल स्तर के ऐसे पाठ्यक्रम शामिल हो सकते हैं जो भारतीय इतिहास और दर्शन को संतुलित दृष्टि से प्रस्तुत करें। CoHNA जैसे वैश्विक हिंदू संगठन विश्वविद्यालयों के साथ संवाद और निगरानी में भी भूमिका निभा सकते हैं।
- सांस्कृतिक आत्मविश्वास: भारतीय उद्योगपतियों को उन सफल मॉडलों से सीखना चाहिए जहाँ दान के साथ स्पष्ट सुरक्षा उपाय भी जोड़े जाते हैं। उदाहरण के लिए, यहूदी समुदाय के दानदाता होलोकॉस्ट अध्ययन या इस्राइल अध्ययन को समर्थन देते समय ऐसे ढाँचे बनाते हैं जो ऐतिहासिक तथ्यों और समुदाय की संवेदनाओं की रक्षा करते हैं। इसी तरह यदि हार्वर्ड जैसे संस्थान पाकिस्तान-केंद्रित कार्यक्रम आयोजित करते हैं, तो उन्हें भारत-केंद्रित कार्यक्रमों के लिए भी समान अवसर देने चाहिए।
- नीति स्तर पर पहल: अमेरिका में ऐसे कानूनों के लिए प्रयास किए जा सकते हैं जो विदेशी वित्तपोषित क्षेत्रीय अध्ययन कार्यक्रमों के लिए सांस्कृतिक संवेदनशीलता की समीक्षा अनिवार्य करें, ठीक उसी प्रकार जैसे विदेशी एजेंट पंजीकरण से जुड़े नियम लागू होते हैं। भारत में भी कर सुधारों के माध्यम से ऐसे दान को प्रोत्साहित किया जा सकता है जो देश के भीतर रणनीतिक और दीर्घकालिक संस्थागत निर्माण में योगदान दें।
- वैकल्पिक विमर्श को प्रोत्साहन: ऐसे विद्वानों और शोध परियोजनाओं को समर्थन दिया जा सकता है जो भारतीय इतिहास और सभ्यता के बारे में संतुलित और गंभीर अध्ययन प्रस्तुत करें। सम्मेलन, पुस्तकें और शैक्षणिक प्रकाशन इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
- दानदाताओं के लिए जागरूकता कार्यक्रम: Indiaspora जैसे मंच दानदाताओं के लिए चर्चा और कार्यशालाएँ आयोजित कर सकते हैं, ताकि वे समझ सकें कि अकादमिक संस्थानों का तंत्र कैसे काम करता है और उनके अनुदान किस प्रकार सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करते हैं।
- देश के भीतर प्राथमिकता: परोपकार का एक हिस्सा भारत के भीतर भी लगाया जा सकता है—जैसे प्राचीन मंदिरों और धरोहर स्थलों के पुनर्निर्माण में, काशी या मथुरा जैसे ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण में, भारतीय विश्वविद्यालयों (जैसे आईआईटी या केंद्रीय विश्वविद्यालयों) के विकास में, या स्वतंत्र शोध संस्थानों की स्थापना में। पश्चिम में अक्सर “साउथ एशिया” कहे जाने वाले भारतीय उपमहाद्वीप पर केंद्रित ऐसे शोध केंद्र भी बनाए जा सकते हैं जो वैचारिक पूर्वाग्रहों से मुक्त हों।
इस संदर्भ में एक उल्लेखनीय उदाहरण 2019 का है, जब फ्रांस के उद्योगपति फ्रांस्वा पिनो और बर्नार्ड अरनॉल्ट ने पेरिस के नोट्रे-डेम कैथेड्रल के पुनर्निर्माण के लिए लगभग 300 मिलियन यूरो का दान दिया था। यह दिखाता है कि जब परोपकार सांस्कृतिक संरक्षण के साथ जुड़ता है, तो वह केवल दान नहीं बल्कि सभ्यतागत उत्तरदायित्व भी बन जाता है।
समापन
मित्तल परिवार, कई अन्य भारतीय दानदाताओं की तरह, उदारता की भावना से प्रेरित होकर आगे आया। उनके दान के पीछे कई बार प्रतिष्ठा और वैश्विक पहचान की इच्छा भी जुड़ी रही। इन अनुदानों ने ज्ञान और संवाद के कुछ अवसर अवश्य पैदा किए। लेकिन यदि ऐसे दानों के साथ जवाबदेही और स्पष्ट दिशा न हो, तो वे अनजाने में ऐसे विमर्शों को भी सहारा दे सकते हैं जो उसी सभ्यता को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिससे दानदाता स्वयं आते हैं।
संस्कृत पाठ्यक्रम से जुड़े विवाद के बाद हार्वर्ड द्वारा जारी की गई माफी यह संकेत देती है कि संस्थान सार्वजनिक आलोचना और संवाद से पूरी तरह अछूते नहीं होते। निरंतर और संगठित सहभागिता के माध्यम से अकादमिक वातावरण को अधिक संतुलित दिशा में प्रभावित किया जा सकता है।
हिंदुओं और भारत को ऐसी परोपकार परंपरा की आवश्यकता है जो उनकी सांस्कृतिक विरासत को कमजोर करने के बजाय उसकी समझ और संरक्षण को मजबूत करे। यदि भारतीय उद्योगपति अपने दानों के साथ संतुलित और उचित सांस्कृतिक सुरक्षा उपाय जोड़ें—जो सेंसरशिप नहीं बल्कि जिम्मेदार निगरानी का रूप हों—तो वे अनजाने सहयोगी की भूमिका से आगे बढ़कर सचेत संरक्षक बन सकते हैं।
अन्यथा धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बन सकती है जहाँ उन्हीं संस्थानों में प्रशिक्षित अभिजात वर्ग वैश्विक विमर्श को आकार देगा, जिसमें कृष्ण को एक चालाक नियंत्रक, भारत को एक समस्या और हिंदुओं को हमेशा संदिग्ध बाहरी के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।
अंततः निर्णय और जिम्मेदारी दानदाताओं के हाथ में ही हैं।
सन्दर्भ सूची
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[24] The Guardian. “Harvard Sued for Discrimination Against Asian Americans.” https://www.theguardian.com/education/2018/jun/15/harvard-sued-discrimination-against-asian-americans
[25] WBUR. “Harvard Freshman Enrollment Data by Race.” https://www.wbur.org/news/2025/10/23/harvard-freshman-enrollment-data-race
[26] Rajiv Malhotra. “Dismantling Global Hindutva and the American Nexus of Hinduphobia.” https://rajivmalhotra.com/dismantling-global-hindutva-and-the-american-nexus-of-hinduphobia/
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