भाषा की आड़ में सच की हत्या: जिहादी आतंक और प्रगतिशील मीडिया का दोहरा खेल
- आतंकी हमलों के बाद मुख्यधारा मीडिया अक्सर पहचान और विचारधारा को धुंधला करता है, खासकर जब हमलावर इस्लाम से जुड़े हों।
- भाषा का चयन और देरी पीड़ितों से ध्यान हटाकर ज़िम्मेदारी को हल्का करने का काम करती है।
- “मुस्लिम भले आदमी” की कहानियों से मूल प्रश्न यानी वैचारिक प्रेरणा पर चर्चा टाली जाती है।
- दोष स्थानांतरण कर हिंदुओं, श्वेतों या यहूदियों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति दिखती है।
- इस चयनात्मक पत्रकारिता से जनता कम सूचित रहती है और वास्तविक जोखिम समझने में चूक होती है।
Som Misha
Som Misha is an investment banker. After hours, he sometimes wears his writer's hat and writes on current affairs topics. He has a passion for crafting compelling narratives that impact people's lives.
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