न्यायपालिका का पतन: कॉलेजियम कैसे बना भ्रष्टाचार और पक्षपात का प्रतीक
- भारत की कोलेजियम प्रणाली, जो “तीन जजों के फैसलों” के ज़रिए बनी थी, अब अपारदर्शी और स्वार्थी होती जा रही है। इसमें भाई-भतीजावाद, पक्षपात और भ्रष्टाचार पनप रहे हैं, जबकि पारदर्शिता और जनता की निगरानी पूरी तरह गायब है।
- सुप्रीम कोर्ट के लगभग 38% जज ऐसे हैं जिनके पारिवारिक संबंध न्यायपालिका या राजनीति से जुड़े हैं। इससे जजों की नियुक्तियाँ एक तरह की “वंशानुगत व्यवस्था” बन गई हैं, जिसे आम लोग “अंकल जज सिंड्रोम” कहते हैं।
- भ्रष्टाचार के कई मामले, जैसे 2025 का न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा प्रकरण, दिखाते हैं कि कैसे गोपनीयता और जवाबदेही की कमी ने अनैतिक आचरण, रिश्वतखोरी और लेन-देन आधारित नियुक्तियों को बढ़ावा दिया है।
- कोलेजियम की एकाधिकारवादी व्यवस्था ने जनता का भरोसा कमजोर किया है। न्याय मिलने में देरी और पक्षपातपूर्ण फैसलों के कारण लोग अदालतों को अब अभिजात और पक्षधर संस्थान के रूप में देखने लगे हैं।
- अगर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को सुधार कर दोबारा लागू किया जाए, तो यह न्यायपालिका में स्वतंत्रता के साथ पारदर्शिता भी लाएगा — जिससे योग्यता, विविधता और जवाबदेही की भावना दोबारा स्थापित की जा सकेगी।
Som Misha
Som Misha is an investment banker. After hours, he sometimes wears his writer's hat and writes on current affairs topics. He has a passion for crafting compelling narratives that impact people's lives.
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