नाथम कनवाई युद्ध (1755): धर्म की रक्षा और विस्मृत योद्धाओं की स्मृति
- १७५५ का नाथम कनवाई युद्ध स्वदेशी प्रतिरोध का एक संगठित उदाहरण था, जिसमें मेलूर कल्लर योद्धाओं ने लूटे गए मंदिर मूरतियों को पुनः प्राप्त किया और औपनिवेशिक लूट के विरुद्ध पवित्र संस्थाओं की रक्षा की।
- यह प्रतिरोध व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा या राजनीतिक लाभ से नहीं, बल्कि धार्मिक कर्तव्य, मंदिरों की रक्षा, सामुदायिक सम्मान और सभ्यतागत निरंतरता की भावना से प्रेरित था।
- इस प्रतिरोध के ऐतिहासिक महत्व को मद्रास उच्च न्यायालय ने औपचारिक रूप से स्वीकार किया, जिसने ऐसे स्वदेशी वीरतापूर्ण कृत्यों के स्मरण को वैध ठहराया।
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि निजी पट्टा भूमि पर स्मारक निर्माण के लिए राज्य की अनुमति आवश्यक नहीं है, जिससे ऐतिहासिक स्मृति की पुनर्स्थापना में न्यायपालिका की भूमिका रेखांकित होती है।
- यह प्रकरण फिर भी सार्वजनिक स्मरण में विद्यमान असंगतियों को उजागर करता है और स्वदेशी प्रतिरोध की तथ्यपरक, सिद्धांतनिष्ठ मान्यता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
K. Sindhu
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