अल्पसंख्यक अधिकारों की नई समीक्षा: भारत के संवैधानिक संतुलन को फिर से गढ़ने की आवश्यकता
- कई राज्यों में जनसंख्या के आधार पर प्रमुख समुदाय भी अल्पसंख्यक लाभ प्राप्त कर रहे हैं, जबकि कई राज्यों में हिंदू समुदाय असुरक्षित और उपेक्षित रह जाता है।
- अदालती निर्देश स्पष्ट रूप से राज्य-आधारित मान्यता को उचित बताते हैं, परंतु राष्ट्रीय घोषणा जारी रहने से व्यवस्था में गहरी असमानताएँ उत्पन्न हो रही हैं।
- इन विकृतियों के कारण वास्तविक अल्पसंख्यक संसाधनों से वंचित होते हैं, पहचान-आधारित प्रोत्साहन बढ़ते हैं, और सामाजिक समरसता कमजोर पड़ती है।
- सच्ची समानता और संवैधानिक संतुलन बहाल करने के लिए पारदर्शी, क्षेत्र-आधारित अल्पसंख्यक नीति आवश्यक है।
K. Sindhu
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