मालेगांव केस: न्यायालय का निर्णय और ‘भगवा आतंकवाद’ मिथक का अंत

  • मालेगाँव केस में एनआईए अदालत का फैसला यह उजागर करता है कि किस तरह झूठे आरोप लगाकर पूरे हिंदू समाज को बदनाम करने के लिए“भगवा आतंकवाद” का झूठा विमर्श गढ़ा गया।
  • आरोपियों को केवल बरी कर देना पर्याप्त नहीं हैइसके साथ सार्वजनिक माफीन्यायपूर्ण मुआवज़ाऔर इस घटनाक्रम के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई बेहद जरूरी है।
  • उस समय की सरकार ने जाँच एजेंसियों और राष्ट्रीय संसाधनों का दुरुपयोग कियाजबकि असली गुनहगार आज भी नहीं पकड़े गए। इससे यह साफ़ पता चलता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने व बम धमाके में मारे गये लोगों और घायल पीड़ितों को न्याय दिलाने की बजाय राजनीतिक नैरेटिव को प्राथमिकता दी गयी।
  • धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के चुनिंदा उपयोग ने हमेशा हिंदुओं को निशाना बनायाजबकि दूसरों को उस प्रकार के जाँच-पड़ताल के दायरे से सुरक्षित रखा गया। इस तरह का भेदभाव संविधान द्वारा नागरिकों को गारंटीकृत समानता की आत्मा को खोखला करता है।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का अर्थ यह कदापि नहीं है कि पूरे हिंदू समाज को बदनाम किया जाये, या आरोपियों पर “आतंकवादी” होने का ठप्पा लगाकर उनके ख़िलाफ़ बाक़ायदा एक मीडिया ट्रायल चलाई जाए।
  • हिंदू धर्म आतंकवाद का बिलकुल उलट है। यह अहिंसाधर्माचरण और सृष्टि के नैसर्गिक संतुलन के मूल सिद्धांतों पर आधारित है , न कि आतंक या नफ़रत फैलाने की विचारधारा पर।

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