हिन्दू समाज को तोड़ने की एक और साज़िश: सरना धर्म की माँग का पर्दाफाश
- संथाल, मुंडा, उराँव जैसे आदिवासी हिन्दू धर्म का अभिन्न हिस्सा हैं। उनकी परंपराएँ—प्रकृति पूजा, कुल व ग्राम देवताओं की आराधना और सामुदायिक अनुष्ठान—धार्मिक संस्कृति में गहराई से रचे-बसे हैं।
- अलग “सरना धर्म” की माँग असल में राजनीतिक स्वार्थ, चुनावी रणनीति और धर्मांतरण की योजनाओं से प्रेरित है, न कि आदिवासी हितों से।
- आदिवासियों की विशिष्ट संस्कृति व रीति-रिवाज पहले से ही संविधान और अनेक क़ानूनों द्वारा संरक्षित हैं, जिससे उनकी परंपराएँ सुरक्षित बनी रहती हैं।
- भारत के वनवासी सदैव हिन्दू धर्म परंपरा के भीतर रहे हैं। वानप्रस्थ आश्रम, आरण्यक और अन्य ग्रंथ स्पष्ट करते हैं कि उनका जीवन व पूजा-पद्धति सनातन धर्म का ही हिस्सा है।
- “सरना धर्म” को अलग मान्यता देने से आदिवासी समाज बँट जाएगा, क्योंकि सभी जनजातियाँ सरना परंपरा नहीं मानतीं। नागा, खासी, भील जैसी अन्य जातियाँ भी अलग पहचान की माँग करेंगी, जिससे और अधिक बिखराव होगा।
K. Sindhu
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