रटगर्स में Demystifying Hinduism सेमिनार का आयोजन: अकादमिक हिंदूफोबिया के ख़िलाफ़ उभरा प्रतिरोध का स्वर
सार
रटगर्स यूनिवर्सिटी, जो हाल के वर्षों में अकादमिक हिंदूफोबिया का प्रमुख केंद्र बन गई है, उसी कैंपस में CoHNA और CYAN ने “Demystifying Hinduism” सेमिनार का सफल आयोजन किया। इस कार्यक्रम में 75 से अधिक विद्वान, छात्र और हिन्दू समुदाय के सदस्य शामिल हुए। सेमिनार का उद्देश्य हिंदू धर्म को लेकर फैली गलतफहमियों और रूढ़ियों को चुनौती देना, हिंदू साधकों के दृष्टिकोण को सामने लाना और हिंदू धर्मग्रंथों में महिलाओं के विकृत चित्रण का अकादमिक प्रतिरोध करना था। वक्ताओं डॉ. लावण्या वेमसानी और डॉ. जेफ्री डी. लॉन्ग ने बताया कि हिंदू धर्म पर अकादमिक विमर्श में गैर-हिंदू विद्वानों का वर्चस्व रहा है।
यह कार्यक्रम अकादमिक हिंदूफोबिया के खिलाफ एक महत्वपूर्ण प्रतिरोध के रूप में उभरा और हिंदू दृष्टिकोण से होने वाले शोध तथा स्वतंत्र शैक्षणिक संस्थानों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
पश्चिमी अकादमिक जगत में हिंदूद्वेष (हिन्दूफोबिया) इस हद तक सामान्यीकृत हो चुका है कि हिंदू धर्म, संस्कृति और समाज को हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह के चश्मे से देखना लगभग एक प्रवृत्ति बन गया है। हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों के तोड़-मरोड़कर किए गए चित्रण को लोग पहचानते तो हैं, लेकिन वोक विचारधारा के दबाव में उसके विरुद्ध खुलकर बोलने से कतराते हैं। उन्हें आशंका रहती है कि हिंदूफोबिया पर सवाल उठाने से कहीं उन्हें बौद्धिक जगत में प्रभावशाली वोक समूहों के निशाने पर न आना पड़े।
आलोचकों के अनुसार, रटगर्स यूनिवर्सिटी इस प्रवृत्ति का एक बड़ा प्रतीक बन चुकी है और अकादमिक जगत में हिंदू-विरोधी नैरेटिव को वैधता देने का एक प्रमुख केंद्र मानी जाती है।
ऐसे वातावरण में, उसी संस्थान में हिंदूफोबिया को खुली चुनौती देने वाला सेमिनार आयोजित करना कोई साधारण बात नहीं थी। Coalition of Hindus of North America (CoHNA) और उसके युवा विंग CYAN ने यह कठिन कार्य संभव कर दिखाया। रटगर्स हिंदू स्टूडेंट्स काउंसिल और विश्वविद्यालय की हिंदू चैप्लेंसी के सहयोग से रटगर्स यूनिवर्सिटी में “Demystifying Hinduism” सेमिनार आयोजित किया गया।
इस सेमिनार का उद्देश्य हिंदू धर्म से जुड़ी प्रचलित भ्रांतियों और रूढ़ धारणाओं को चुनौती देना तथा हिंदू धर्म, संस्कृति और पहचान को लेकर अधिक संतुलित और तथ्याधारित समझ विकसित करना था।
इस पूरे घटनाक्रम की विडंबना भी कम उल्लेखनीय नहीं है। यही रटगर्स यूनिवर्सिटी अक्टूबर 2025 में उस विवादित पैनल की अगुवाई कर चुकी है, जो “Hindutva in America: An Ethnonationalist Threat to Equality and Religious Pluralism” नामक रिपोर्ट पर आधारित थी। इस रिपोर्ट की लेखिका विश्वविद्यालय की फैकल्टी सदस्य ऑड्रे ट्रश्के थीं। इससे पहले, 2021 में आयोजित Dismantling Global Hindutva सम्मेलन को भी रटगर्स का समर्थन प्राप्त था।
ऐसे संस्थान में हिंदूफोबिया को चुनौती देने वाला जवाबी सेमिनार आयोजित हो पाना अपने आप में एक महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक घटना है।
रटगर्स में हिंदू धर्म पर फैली भ्रांतियों के विरुद्ध बौद्धिक प्रतिरोध
CoHNA और उसके सहयोगियों द्वारा आयोजित इस सेमिनार में कई प्रमुख शिक्षाविदों ने भाग लिया। इनमें शॉनी स्टेट यूनिवर्सिटी में भारतीय इतिहास और धर्मों की प्रोफेसर डॉ. लावण्या वेमसानी तथा एलिज़ाबेथटाउन कॉलेज में भारतीय दर्शन के प्रोफेसर डॉ. जेफ्री लॉन्ग प्रमुख थे। इस कार्यक्रम में 75 से अधिक विद्वानों, शिक्षकों, छात्रों और समुदाय के सदस्यों ने हिस्सा लिया।
वक्ताओं ने अकादमिक हिंदूफोबिया की प्रकृति और उसके विभिन्न रूपों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि यह पूर्वाग्रह किस तरह शैक्षणिक संस्थानों से निकलकर धीरे-धीरे समाज में सामान्य सोच का हिस्सा बन जाता है और लोगों के भीतर हिंदू-विरोधी धारणाओं को मजबूत करता है। हाई स्कूल इतिहास शिक्षक नील देसाई ने बताया कि हिंदूफोबिया लंबे समय से अकादमिक संस्थानों में गहराई से मौजूद है और आज भी उन संस्थागत ढाँचों में दिखाई देता है, जो अमेरिका के युवाओं की सोच को आकार देते हैं।
सेमिनार का एक प्रमुख आकर्षण छात्रों द्वारा संचालित पैनल चर्चा रही, जिसमें अमेरिका में हिंदू पहचान से जुड़े कई संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बातचीत हुई। चर्चा में हिंदू धर्मग्रंथों की प्रस्तुति, जाति को लेकर प्रचलित भ्रांतियाँ, हिंदू धर्म को स्वभावतः महिला-विरोधी बताने की प्रवृत्ति, और माहवारी से जुड़ी हिंदू परंपराओं को लेकर फैली गलतफहमियाँ शामिल थीं।[1]
सेमिनार से जुड़े हिंदू छात्रों के अनुसार, उनका उद्देश्य हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों को लेकर फैली गलत जानकारियों को दूर करना था — जैसे अनेक देवी-देवताओं की पूजा के पीछे का दर्शन, हिंदुओं के लिए गाय का महत्व, और ऐसी परंपराएँ जिन्हें पश्चिमी नज़रिए से अक्सर रहस्यमय या असामान्य समझ लिया जाता है।[2]
हिंदू विमर्श पर गैर-हिंदुओं का वर्चस्व
सेमिनार में उठाए गए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक था — हिंदुओं और हिंदू धर्म की अकादमिक प्रस्तुति में स्वयं साधकों और अनुयायियों के दृष्टिकोण की कमी।
आयोजकों ने इस बात पर जोर दिया कि अकादमिक हिंदूफोबिया के बढ़ते माहौल में हिंदू धर्म और संस्कृति से जुड़े विमर्श को गैर-हिंदुओं द्वारा परिभाषित करना लगभग सामान्य बात बन चुका है। उनका कहना था कि इस वर्चस्व का परिणाम अक्सर हिंदू परंपराओं की पक्षपातपूर्ण व्याख्या, रूढ़िबद्ध चित्रण और उन्हें रहस्यवादी या पिछड़ा बताने के रूप में सामने आता है। कई मामलों में तो हिंदू संस्कृति और परंपराओं को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है, मानो पूरा हिंदू धर्म ही मानवीय मूल्यों के विरुद्ध खड़ा हो। आयोजकों ने इस बात की आवश्यकता भी रेखांकित की कि हिंदू समुदाय स्वयं हिंदू धर्म से जुड़े अकादमिक विमर्श को आकार देने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाए। [3]
वास्तव में, गैर-अनुयायियों के इस वर्चस्व के कारण हिंदू धर्म की अनेक मूल अवधारणाओं को तोड़-मरोड़कर समझाया गया है। अपनी पुस्तक What is Hinduism में डेविड फ्रॉले लिखते हैं कि शायद हिंदू धर्म ही ऐसा प्रमुख धर्म है, जिसमें अंदरूनी दृष्टिकोण को व्यवस्थित रूप से हाशिए पर रखा गया है। उनके अनुसार, हिंदू धर्म पर केंद्रित अधिकांश अकादमिक लेखन गैर-हिंदुओं — ईसाई मिशनरियों, इस्लामवादी दृष्टिकोण रखने वाले लेखकों और वामपंथी बुद्धिजीवियों — द्वारा किया गया है। फ्रॉले इसकी तुलना इस्लाम और ईसाई धर्म पर होने वाले अध्ययनों से करते हैं, जहाँ आलोचनात्मक दृष्टिकोण के साथ-साथ अनुयायियों की सकारात्मक समझ को भी पर्याप्त स्थान मिलता है।
Ten Heads of Ravana: A Critique of Hinduphobic Scholars नामक शोध-संकलन में कई विद्वानों ने हिंदू इतिहास, धर्मग्रंथों और भारतीय सभ्यता को लेकर कुछ चर्चित अकादमिक हस्तियों द्वारा प्रस्तुत पक्षपातपूर्ण व्याख्याओं का व्यवस्थित प्रतिवाद किया है। पुस्तक यह दिखाने का प्रयास करती है कि अकादमिक जगत में गैर-अनुयायियों का वर्चस्व किस प्रकार अनेक मिथकों और गलत धारणाओं को बढ़ावा देता है — जैसे यह दावा कि हिंदू धर्म कोई स्वायत्त परंपरा नहीं, बल्कि पश्चिमी व्याख्याओं की उपज है, या रामायण और महाभारत मूलतः हिंदू ग्रंथ नहीं हैं।
हिंदू महिला पात्रों को समझने में अकादमिक भूलें
जब हिंदू धर्म को समझने और उसकी व्याख्या का दायित्व केवल गैर-अनुयायी दृष्टिकोणों पर छोड़ दिया जाता है, तो अक्सर अब्राहमिक सोच और यूरोकेन्द्रित नज़रिए को हिंदू धर्मग्रंथों पर जबरन आरोपित कर दिया जाता है। इसका परिणाम गंभीर विकृतियों के रूप में सामने आता है। हिंदू संस्कृति को सतही, सनसनीखेज़ और एकांगी ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, जबकि पूरे हिंदू समाज को स्त्री-विरोधी और पितृसत्तात्मक ठहराकर दिया जाता है।
हिंदू देवियों और धार्मिक ग्रंथों की प्रमुख महिला पात्रों की प्रस्तुति में यह पक्षपातपूर्ण नज़रिया सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। पश्चिमी नारीवाद की सीमित और एकरेखीय परिभाषाओं को एक बिल्कुल अलग सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ पर थोप दिया जाता है। नतीजतन, हिंदू परंपराओं की जटिलता और विविधता को नज़रअंदाज़ कर उन्हें सरल और पूर्वाग्रहपूर्ण निष्कर्षों में समेट दिया जाता है।
इस तरह की व्याख्याएँ कई बार हिंदू धर्म का उपहास बनाकर रख देती हैं। माता सीता और द्रौपदी को तथाकथित “हिंदू पितृसत्ता” के प्रतीक चेहरों के रूप में पेश किया जाता है, जबकि सावित्री जैसी सशक्त महिला पात्रों को स्वतंत्र इच्छा और आत्मबल से रहित, असहाय स्त्रियों की तरह चित्रित किया जाता है।
डॉ. लावण्या वेमसानी ने विस्तार से बताया कि द्रौपदी, कुंती, सावित्री, गंगा, उर्वशी और सत्यवती जैसी महत्वपूर्ण महिला पात्रों को अकादमिक जगत में अक्सर संकुचित और पूर्वनिर्धारित दृष्टिकोणों के तहत समझा और प्रस्तुत किया जाता है। अकादमिक लेखन, मीडिया और लोकप्रिय संस्कृति में हिंदू महिलाओं की छवि का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा कि इन असाधारण महिलाओं की कहानियों को आज की प्रस्तुतियों में अत्यधिक सपाट बना दिया गया है, यहाँ तक कि कई बार उन्हें केवल यौन आकर्षण की वस्तु तक सीमित कर दिया जाता है। लावण्या वेमसानी के अनुसार, संकुचित और सतही लेबलों के माध्यम से इन महिला पात्रों की गहराई, जटिलता और व्यक्तिगत सामर्थ्य को कमजोर किया जाता है। ऐसे पक्षपातपूर्ण चित्रणों का असर युवा हिंदुओं पर भी पड़ता है, जो धीरे-धीरे अपने इतिहास और परंपराओं को उसी नज़रिए से देखने लगते हैं। [4] [5]Top of Form
अमेरिकी समाज पर हिंदू विचारों की गहरी छाप Bottom of Form
मीडिया, अकादमिक जगत और नागरिक समाज के कुछ वर्ग अक्सर हिंदू धर्म को इस तरह प्रस्तुत करते हैं, मानो वह कोई अजीब, रहस्यमयी और बाहरी तत्व हो, जो अमेरिकी संस्कृति और मूल्यों से मेल नहीं खाता। यह पूर्वाग्रहपूर्ण और अमानवीय नैरेटिव उन संकीर्ण धारणाओं पर आधारित है, जो हिंदू धर्म को अमेरिका की सभ्यतागत यात्रा से अलग, बल्कि कई बार उसके विपरीत खड़ा दिखाने की कोशिश करती हैं।
लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। हिंदू दर्शन और संस्कृति ने अमेरिकी समाज को गहराई से प्रभावित किया है — योग और शाकाहार की बढ़ती लोकप्रियता से लेकर वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों तक। इसका प्रभाव केवल जीवनशैली तक सीमित नहीं रहा। [6] अद्वैत वेदांत के “एक सर्वव्यापी चेतना” के दर्शन ने एर्विन श्रॉडिंगर और निकोला टेस्ला जैसे वैज्ञानिकों को प्रेरित किया। हिंदू विचारों ने डॉ. डीन ऑर्निश और डॉ. हर्बर्ट बेंसन जैसे चिकित्सकों की सोच और उपचार पद्धतियों को प्रभावित किया। पश्चिमी कला और लोकप्रिय संस्कृति पर भी इसका गहरा प्रभाव दिखाई देता है — चाहे ऋषिकेश में बीटल्स का चर्चित प्रवास हो या एलन गिन्सबर्ग और वॉल्ट व्हिटमैन जैसे कवियों के लेखन में हिंदू दर्शन की झलक। [7]
इस सेमिनार में डॉ. जेफ्री डी. लॉन्ग ने अमेरिकी बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन पर हिंदू विचारों के प्रभाव की ऐतिहासिक यात्रा को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि अमेरिका के शुरुआती दौर से लेकर आज तक हिंदू दर्शन का प्रभाव अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। इस संदर्भ में उन्होंने जॉर्ज हैरिसन, जे.डी. सैलिंजर और जूलिया रॉबर्ट्स जैसी हस्तियों का उल्लेख किया, साथ ही Star Wars और MASH जैसी लोकप्रिय सांस्कृतिक कृतियों का भी उदाहरण दिया। [8] [9]
रटगर्स में हिंदू-विरोधी विमर्श का केंद्र
2025 में रटगर्स लॉ स्कूल के अंतर्गत आने वाले Center for Security, Race and Rights (CSRR) ने “Hindutva in America” नामक सेमिनार आयोजित किया था। कई हिंदू संगठनों ने इसे घोर हिंदू-विरोधी बताते हुए इसकी तीखी आलोचना की थी। [10]
जिस केंद्र के तहत यह कार्यक्रम आयोजित हुआ, उसके सार्वजनिक कार्यक्रमों और घोषित प्राथमिकताओं को देखने से स्पष्ट होता है कि वह एक निष्पक्ष अकादमिक संस्थान से अधिक एक खास वैचारिक एजेंडे से प्रेरित एक्टिविस्ट मंच की तरह कार्य करता है। यह केंद्र निष्पक्षता का कोई दिखावा भी नहीं करता। अपने शोध और कार्यक्रमों में यह इस्लामोफोबिया को प्रमुख चिंता के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि हिंदू संगठनों की सक्रियता और हिंदूफोबिया के विरुद्ध उठने वाली आवाज़ों को अक्सर “हिंदुत्व वर्चस्व” के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति रखता है।
केंद्र की वेबसाइट भी लगभग पूरी तरह फिलिस्तीनी एक्टिविज़्म और हिंदू-विरोधी विमर्श का मंच बन चुकी है। निष्पक्ष अकादमिक विमर्श के बजाय इसके कार्यक्रम और प्रकाशन लगातार हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी नैरेटिव को “शोध” और “अध्ययन” के नाम पर आगे बढ़ाते दिखाई देते हैं। “Hostile Homelands: The New Alliance Between India and Israel” और “Coming Out as Dalit: A Memoir of Surviving India’s Caste System” जैसे कार्यक्रम उसके वैचारिक झुकाव को साफ़ उजागर करते हैं। इनसे यह संकेत मिलता है कि वैचारिक संतुलन या विभिन्न दृष्टिकोणों वाले विमर्श के लिए वहाँ कोई स्थान नहीं है। [11]
मार्च 2024 में अमेरिकी House Committee on Education and the Workforce ने रटगर्स यूनिवर्सिटी की जांच की थी। उस समय समिति के अध्यक्ष ने CSRR को “यहूदी-विरोधी, अमेरिका-विरोधी, इज़राइल-विरोधी और आतंकवाद समर्थक गतिविधियों का केंद्र” बताया था।
CSRR की संस्थापक, मिस्र में जन्मी सहर अज़ीज़, पर भी लंबे समय से फिलिस्तीनी पक्ष के एकतरफा समर्थन और यहूदियों के खिलाफ हिंसा व आतंकवाद पर चुप्पी साधने को लेकर यहूदी-विरोधी रुझान फैलाने के आरोप लगते रहे हैं। Middle East Forum की एक रिपोर्ट में अज़ीज़ और एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी के लॉ प्रोफेसर खालिद बेयदून को ‘इस्लामोफोबिया उद्योग’ के मुनाफाखोर चेहरे बताया गया था। [12] [13] [14]
“Hindutva in America” रिपोर्ट जारी करने में केंद्र की प्रत्यक्ष भूमिका, अमेरिका में हिंदू संगठनों की एडवोकेसी को संदिग्ध या आपराधिक गतिविधि जैसा चित्रित करने की उसकी प्रवृत्ति, तथा दूसरी ओर कट्टर इस्लामिस्ट चरमपंथ व आतंकवाद को “इस्लामोफोबिया” के आवरण में ढकने की कोशिशें, उसके कामकाज और वित्तीय स्रोतों को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।
रटगर्स यूनिवर्सिटी की सबसे चर्चित हिंदूफोबिक फैकल्टी सदस्य ऑड्रे ट्रश्के अकादमिक जगत में हिंदुत्व-विरोधी विमर्श का प्रमुख चेहरा मानी जाती हैं। उनकी वेबसाइट अमेरिका में तथाकथित “Hindu Far-Right” पर उनके शोध को प्रमुखता से प्रदर्शित करती है। [15] उनके लेखन और प्रकाशनों की समीक्षा से हिंदू संगठनों को बदनाम करने और अकादमिक जगत में हिंदूफोबिया को सामान्य बनाने की एक स्पष्ट प्रवृत्ति दिखाई देती है।
ट्रश्के मुगल शासकों, विशेषकर औरंगज़ेब, के अतिरंजित महिमामंडन के लिए भी जानी जाती हैं। एक ओर उनके लेखन में मुग़ल शासन का महिमामंडन दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर मंदिरों के विध्वंस और हिंदुओं के खिलाफ हुए अत्याचारों जैसे मुद्दों को या तो कमतर करके प्रस्तुत किया जाता है या पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।
ट्रश्के के हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह का एक कम चर्चित लेकिन अत्यंत विवादास्पद पहलू यह भी है कि उन्होंने अकादमिक स्वतंत्रता की आड़ में हिंदू देवी-देवताओं को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की हैं। एक X पोस्ट में उन्होंने लिखा था: “सीता राम को मूलतः महिला-विरोधी और अशिष्ट बताती हैं।” [16]
मार्च 2021 में 8,000 से अधिक छात्रों, शिक्षकों और समुदाय के सदस्यों ने एक खुला पत्र जारी कर कक्षा और सोशल मीडिया में ऑड्रे ट्रश्के द्वारा फैलाए जा रहे कथित हिंदूफोबिया की निंदा की थी और विश्वविद्यालय से कार्रवाई की मांग की थी। लेकिन रटगर्स प्रशासन तुरंत “अकादमिक स्वतंत्रता” का हवाला देते हुए उनके बचाव में उतर आया।
इस पूरे मामले में रटगर्स यूनिवर्सिटी का दोहरा रवैया साफ़ दिखाई देता है। जहाँ विश्वविद्यालय ने यहूदी-विरोधी और इज़राइल-विरोधी टिप्पणियों के लिए एक फैकल्टी सदस्य के खिलाफ़ तुरंत कार्रवाई की, वहीं ट्रश्के के मामले में “अकादमिक स्वतंत्रता” का तर्क आगे कर दिया गया। इतना ही नहीं, विश्वविद्यालय ने “Hindutva in America” जैसे कार्यक्रमों को समर्थन दिया, लेकिन अपने ही परिसर में आयोजित “Demystifying Hinduism” सेमिनार के लिए न कोई समर्थन व्यक्त किया और न ही कोई औपचारिक बयान जारी किया। [17]
अब केवल संस्थान निर्माण की ज़रूरत है
अकादमिक हिंदूफोबिया की गहरी पकड़ को तभी चुनौती दी जा सकती है, जब हिंदू धर्म और संस्कृति को अधिक संतुलित, गंभीर और साधक-आधारित दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाली स्कॉलरशिप को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया जाए।
रटगर्स यूनिवर्सिटी में हाल ही में आयोजित “Demystifying Hinduism” सेमिनार इस दिशा में एक आशाजनक शुरुआत माना जा सकता है। लंबे समय से हिंदू-विरोधी कार्यक्रमों को मंच देने वाले इसी संस्थान में हिंदू संगठनों द्वारा एक जवाबी सेमिनार आयोजित कर पाना अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अब असली चुनौती इस पहल को आगे बढ़ाने की है। समय की मांग है कि अन्य विश्वविद्यालयों में भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ, पक्षपातपूर्ण और एकतरफा अकादमिक पैनलों की पक्षधरता उजागर करने के लिए निरंतर अभियान चलाए जाएँ, और हिंदू धर्म से जुड़े विमर्श में साधक-आधारित दृष्टिकोण को अधिक स्थान देने की मांग मजबूत की जाए।
लेकिन केवल विरोध या जवाबी प्रतिक्रिया से स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होगा। दीर्घकालिक बदलाव के लिए हिंदू समुदाय को अपने आधुनिक शैक्षणिक संस्थान भी खड़े करने होंगे — ऐसे संस्थान जो उच्चस्तरीय शोध और बौद्धिक गंभीरता को हिंदू दृष्टिकोण और मूल्यों से जोड़ सकें। केवल पश्चिमी अकादमिक ढाँचे में सुधार की उम्मीद पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि इसके कई हिस्से संस्थागत रूप से हिंदू-विरोधी विमर्श से गहरे प्रभावित दिखाई देते हैं।
हिंदूफोबिक नेटवर्क्स और उनके प्रभाव को उजागर करना आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है ऐसे स्वतंत्र मंचों का निर्माण, जो हिंदू सभ्यतागत विरासत को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत कर सकें और लंबे समय तक हिंदू पहचान, विचार और संस्कृति को दीर्घकालिक बौद्धिक आधार प्रदान कर सकें।
संदर्भ सूची
[1] Landmark Academic Event at Rutgers Challenges Misconceptions about Hinduism – Coalition of Hindus of North America; https://cohna.org/landmark-academic-event-at-rutgers-challenges-misconceptions-about-hinduism/
[2] Rutgers Students Speak on “Demystifying Hinduism” Conference Aimed at Education and Dialogue – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=f4EN4bhbTYE
[3] CoHNA’s Seminar Examines Hinduism Through a Scholarly Lens – South Asian Herald; https://southasianherald.com/cohnas-seminar-examines-hinduism-through-a-scholarly-lens/
[4] Ibid.
[5] Demystifying Hinduism’: Hindu Students Host a Landmark Conference at Rutgers University – American Kahani; https://americankahani.com/perspectives/demystifying-hinduism-hindu-students-host-a-landmark-conference-at-rutgers-university/
[6] Hinduism Influences U.S. Culture, Customs | The Pluralism Project; https://pluralism.org/news/hinduism-influences-us-culture-customs
[7] How Hindu Dharma Transformed America | HUA Perspectives; https://www.hua.edu/blog/how-hindu-dharma-transformed-america-a-reflective-essay/
[8] Demystifying Hinduism’: Hindu Students Host a Landmark Conference at Rutgers University – American Kahani; https://americankahani.com/perspectives/demystifying-hinduism-hindu-students-host-a-landmark-conference-at-rutgers-university/
[9] CoHNA’s Seminar Examines Hinduism Through a Scholarly Lens – South Asian Herald; https://southasianherald.com/cohnas-seminar-examines-hinduism-through-a-scholarly-lens/
[10] Hindutva in America – Rutgers Center for Security, Race and Rights; https://csrr.rutgers.edu/issues/hindutva-america/
[11] Ibid
[12] Editorial: It’s Time for Sahar Aziz to Resign; https://www.goleader.com/2023/10/11/time-sahar-aziz-resign/
[13] The ‘islamophobia’ Industry Shills for Hamas – Middle East Forum; https://www.meforum.org/campus-watch/the-islamophobia-industry-shills-for-hamas
[14] Rutgers University’s Anti-Israel Bunch – Middle East Forum; https://www.meforum.org/campus-watch/rutgers-universitys-anti-israel-bunch
[15] Research on the US Hindu Far Right – Audrey Trushcke; https://www.audreytruschke.com/ushindutvaresearch
[16] Rutgers Punishes Jew-Hater while Defending Hindu-Hater; https://stophindudvesha.org/rutgers-punishes-jew-hater-while-defending-hindu-hater/
[17] Ibid
Donate to HINDUDVESHA
Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.
SUPPORT US