अंडमान संघर्ष: भारत की अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति के खिलाफ खड़ा गठजोड़
सारांश
भारत ₹81,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना पर काम कर रहा है, जिसे उसकी सबसे महत्वाकांक्षी रणनीतिक पहलों में गिना जा रहा है। इस परियोजना का केंद्र गलाथिया बे में प्रस्तावित एक विशाल गहरे पानी का बंदरगाह है, जिसे दुनिया के सबसे बड़े कंटेनर जहाजों को संभालने के लिए विकसित किया जा रहा है। उद्देश्य मलक्का जलडमरूमध्य के पास एक ऐसा दोहरे उपयोग वाला समुद्री केंद्र बनाना है, जो भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत करे और चीन की “मलक्का दुविधा” नामक कमजोरी को चुनौती दे सके। भारत के लिए बड़े आर्थिक लाभ और मजबूत नौसैनिक क्षमता का वादा करने वाली यह परियोजना फिलहाल कानूनी चुनौतियों, अंतरराष्ट्रीय अभियानों और राजनीतिक विरोध से घिरी हुई है — ठीक वैसे ही जैसे पहले विजिंजम बंदरगाह परियोजना के साथ हुआ था।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की मंजूरी और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के बावजूद, यह विरोध राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस परियोजना में देरी पैदा कर सकता है। सवाल है कि क्या भारत अपनी रणनीतिक महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ाएगा, या फिर एक और बड़ा अवसर विवादों में उलझ जाएगा?
“जिसके हाथ में समुद्रों का नियंत्रण होता है, वही व्यापार की दिशा तय करता है; और जो विश्व व्यापार को नियंत्रित करता है, वही दुनिया की समृद्धि और अंततः दुनिया की शक्ति पर भी प्रभाव स्थापित करता है”— वॉल्टर रैले, अंग्रेज़ राजनेता और सैनिक (1553–1618)[1]
मलक्का जलडमरूमध्य में कंटेनर जहाजों का आवागमन कभी थमता नहीं। लगभग हर बीस मिनट में एक विशाल जहाज — तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो पार्ट्स या अन्य सामान से लदा — इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप और मलय प्रायद्वीप के बीच स्थित इस संकरे समुद्री मार्ग से गुजरता है। अपनी सबसे संकरी जगह पर यह जलडमरूमध्य केवल 2.8 किलोमीटर चौड़ा है, फिर भी दुनिया के समुद्री व्यापार का लगभग 30 प्रतिशत और चीन के तेल आयात का करीब 38 प्रतिशत इसी रास्ते से होकर गुजरता है। [2]
हर साल लगभग 150 अरब डॉलर मूल्य की ऊर्जा आपूर्ति — जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को चलाती है — ऐसे समुद्री मार्ग पर निर्भर है, जिस पर बीजिंग का नियंत्रण नहीं है और जिसे किसी संघर्ष की स्थिति में सुरक्षित रखना आसान नहीं होगा।
चीनी रणनीतिकार इस कमजोरी को “मलक्का दुविधा” कहते हैं। पिछले दो दशकों से यह चीन की सबसे बड़ी रणनीतिक चिंताओं में से एक रही है। [3]
अब इसी समुद्री मार्ग से केवल 40 समुद्री मील दूर भारत कुछ ऐसा विकसित कर रहा है, जिसने बीजिंग की चिंता और बढ़ा दी है।
ग्रेट निकोबार: बीजिंग की चिंता का नया केंद्र
भारत की ₹81,000 करोड़ (लगभग 10 अरब डॉलर) की ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना देश के सबसे दक्षिणी द्वीप को एक बड़े रणनीतिक समुद्री और वाणिज्यिक केंद्र में बदलने की योजना है। इसे स्वतंत्र भारत की सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में गिना जा सकता है, हालांकि इसके बारे में अब भी बहुत कम लोग जानते हैं।
परियोजना का केंद्र गलाथिया खाड़ी में प्रस्तावित गहरे पानी का इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) है, जिसकी क्षमता सालाना 1.42 करोड़ TEU होगी। इसके साथ एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, 450 MVA गैस और सौर ऊर्जा संयंत्र तथा आधुनिक नगर बसाने की योजना भी शामिल है। पूरी परियोजना 2025 से 2047 के बीच तीन चरणों में विकसित होगी। [4]
ग्रेट निकोबार का रणनीतिक महत्व स्पष्ट है। मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश मार्ग के पास स्थित यह द्वीप भारत को दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों की निगरानी का मजबूत आधार देगा। यदि यहां नौसैनिक और वाणिज्यिक ढांचा पूरी तरह विकसित हो गया, तो भारत चीन की समुद्री आपूर्ति लाइनों पर नजर रखने और संकट की स्थिति में उन्हें बाधित करने की क्षमता हासिल कर सकता है — एक संभावना जो बीजिंग के लिए हिमालयी मोर्चे से भी बड़ी चिंता मानी जाती है। [5]
चीन की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है। इस कमजोरी को कम करने के लिए उसने पाइपलाइन, ग्वादर बंदरगाह और वैकल्पिक गलियारों पर काम किया है, लेकिन कोई भी समाधान पूरी तरह कारगर नहीं रहा। ऐसे में ग्रेट निकोबार परियोजना सफल होने पर चीन के इन प्रयासों की रणनीतिक उपयोगिता काफी कमजोर पड़ सकती है।
भारत की समुद्री शक्ति का नया आधार
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर के बीच लगभग 700 किलोमीटर तक फैली रणनीतिक द्वीप श्रृंखला है। [6] ग्रेट निकोबार इस भूगोल को भारत के लिए बड़े रणनीतिक लाभ में बदल सकता है। मलक्का जलडमरूमध्य के पास एक बड़े बंदरगाह और दोहरे उपयोग वाले हवाई अड्डे के विकास से भारत को दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक पर निगरानी रखने, प्रभाव डालने और जरूरत पड़ने पर आवागमन बाधित करने की क्षमता मिल सकती है।
द्वीप पर विकसित नौसैनिक और हवाई ढांचा भारत को पूर्वी हिंद महासागर में अधिक प्रभावी उपस्थिति देगा। युद्धपोत बिना लंबा रास्ता तय किए ईंधन और आपूर्ति हासिल कर सकेंगे, जबकि निगरानी विमान और ड्रोन समुद्री गतिविधियों पर लगातार नजर रखेंगे। किसी संघर्ष की स्थिति में ग्रेट निकोबार एक स्थायी समुद्री सैन्य अड्डे की तरह काम कर सकता है, जिसे निष्क्रिय करना बेहद कठिन होगा।
भौगोलिक स्थिति के कारण ग्रेट निकोबार मलक्का मार्ग पर भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक नियंत्रण बिंदु बन सकता है। जलडमरूमध्य के पश्चिमी प्रवेश द्वार के पास स्थित यह द्वीप लगभग हर गुजरने वाले जहाज की परिचालन सीमा में आता है। भारत पहले से ही यहां सैन्य मौजूदगी रखता है; यह परियोजना उस नेटवर्क को और मजबूत करेगी। इससे विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता घटेगी और नौसेना की रसद व्यवस्था बेहतर होगी।
द्वीपों का रणनीतिक महत्व 2001 में अंडमान और निकोबार कमांड (ANC) की स्थापना के साथ ही स्पष्ट हो गया था। यह भारत का पहला संयुक्त त्रि-सेवा थिएटर कमांड है, जिसमें सेना, नौसेना और वायुसेना एकीकृत नेतृत्व में काम करती हैं। [7] तब से इसकी क्षमताओं में लगातार विस्तार हुआ है — नौसैनिक संचार नेटवर्क, आधुनिक निगरानी प्रणाली और समुद्री गश्ती क्षमताएं मजबूत की गई हैं। सैन्य दृष्टि से ये द्वीप भारत के लिए स्थायी अग्रिम सैन्य अड्डे की तरह काम करते हैं। [8]
फिर भी मौजूदा ढांचे की कुछ सीमाएं है क्योंकि ये मुख्यतः सैन्य चौकियां हैं, व्यापक रणनीतिक केंद्र नहीं। ग्रेट निकोबार परियोजना का उद्देश्य एक ऐसा नागरिक-सैन्य-समुद्री केंद्र बनाना है, जिसमें मजबूत रसद, भंडारण, ईंधन, मरम्मत और तेज सैन्य तैनाती की क्षमता हो। दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा सामान्य समय में यात्रियों और माल ढुलाई को संभालेगा, जबकि संघर्ष की स्थिति में सैन्य परिवहन और समुद्री निगरानी का प्रमुख केंद्र बन सकता है।
चीन के लिए संकेत स्पष्ट है। मध्य पूर्व से आने वाले उसके अधिकांश ऊर्जा और व्यापारिक मार्ग भारतीय समुद्री क्षेत्र के निकट से गुजरते हैं। यदि भारत की इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए चीन के पास पर्याप्त नौसैनिक क्षमता नहीं हुई, तो उसे वैकल्पिक और कहीं लंबी समुद्री राह अपनानी पड़ सकती है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति की लागत काफी बढ़ जाएगी।
समुद्री व्यापार का अरबों डॉलर वाला खेल
निकोबार परियोजना का आर्थिक पक्ष उसके रणनीतिक महत्व जितना ही प्रभावशाली है।
दशकों से भारत एक समुद्री विडंबना का सामना कर रहा है। दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों के बीच होने के बावजूद, उसके पास ऐसे गहरे पानी वाले बंदरगाह सीमित हैं जो बड़े पैमाने पर वैश्विक व्यापार संभाल सकें। यही कारण है कि भारत के समुद्री माल का एक बड़ा भाग आज भी कोलंबो और सिंगापुर जैसे विदेशी बंदरगाहों से होकर गुजरता है। अर्थात, भारत को अपना ही व्यापार चलाने के लिए विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर रहना पड़ता है। [9] इस बीच, म्यांमार, चीन और श्रीलंका इस लाभदायक व्यापार को आकर्षित करने के लिए आधुनिक गहरे पानी के बंदरगाह विकसित कर रहे हैं।
निकोबार का बंदरगाह इस स्थिति को बदल सकता है। [10] गलाथिया खाड़ी में दुनिया के सबसे बड़े कंटेनर जहाज बिना विशेष समुद्री खुदाई के आ-जा सकेंगे। प्रस्तावित इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) की इतनी क्षमता होगी कि यह सिंगापुर, दुबई और हांगकांग जैसे प्रमुख ट्रांसशिपमेंट केंद्रों की श्रेणी में आ सकता है।
पर्यटन की भी बड़ी संभावनाएँ हैं। परियोजना के मास्टर प्लान में इसे द्वीपों के दीर्घकालिक विकास का प्रमुख आधार माना गया है। [11] लग्जरी रिसॉर्ट, क्रूज टर्मिनल और बेहतर हवाई संपर्क के जरिए अंडमान-निकोबार को फुकेट या बाली जैसे पर्यटन केंद्रों के समकक्ष विकसित करने की योजना है। नया हवाई अड्डा और अंतरराष्ट्रीय संपर्क पर्यटन राजस्व बढ़ाने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर सकते हैं।
हर साल मलक्का जलडमरूमध्य से 90,000 से भी अधिक मर्चेंट जहाज गुजरते हैं, जो वैश्विक व्यापार का करीब 30 प्रतिशत ढोते हैं। ग्रेट निकोबार परियोजना इस विशाल और निरंतर समुद्री व्यापार धारा का लाभ उठाने के लिए बिल्कुल सही जगह पर स्थित है। [12] अगर क्षेत्रीय ट्रांसशिपमेंट कारोबार का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा भी गलाथिया बे की ओर आ जाए, तो बंदरगाह राजस्व, लॉजिस्टिक्स सेवाओं, पर्यटन और डाउनस्ट्रीम रोजगार से होने वाला आर्थिक लाभ कुछ ही दशकों में परियोजना की निर्माण लागत से कई गुना ज्यादा हो जाएगा।
चीन का अदृश्य युद्ध
सवाल यह है कि यदि निकोबार परियोजना इतनी महत्वपूर्ण है, तो इसका इतना संगठित विरोध क्यों हो रहा है?
पर्यावरणीय चिंताएँ वास्तविक हैं और उन्हें गंभीरता से लिया जाना भी चाहिए। ग्रेट निकोबार एक असाधारण द्वीप है — यूनेस्को मान्यता प्राप्त बायोस्फियर रिजर्व, जहां दुर्लभ प्रजातियाँ, प्राचीन कोरल रीफ और लेदरबैक कछुओं के महत्वपूर्ण प्रजनन स्थल मौजूद हैं। [13] कुछ सौ लोगों की आबादी वाली शोम्पेन जनजाति, जो हजारों वर्षों से द्वीप के भीतर रह रही है, दुनिया के सबसे अलग-थलग समुदायों में गिनी जाती है। [14] इसलिए परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का कोई भी गंभीर मूल्यांकन इन वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता।
लेकिन विरोध का मौजूदा स्वरूप — समन्वित कानूनी चुनौतियाँ, अंतरराष्ट्रीय मीडिया अभियान और राजनीतिक समर्थन — सामान्य पर्यावरणीय आंदोलन से कहीं अधिक संगठित दिखाई देता है। इसकी झलक भारत की सुरक्षा एजेंसियाँ पहले भी देख चुकी हैं।
2014 में खुफिया ब्यूरो (IB) की एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि विदेशी फंडिंग प्राप्त कुछ गैर-सरकारी संगठन खनन, बिजली, बांध और परमाणु ऊर्जा जैसी रणनीतिक परियोजनाओं को व्यवस्थित रूप से निशाना बना रहे हैं। रिपोर्ट का अनुमान था कि ऐसी देरी भारत की जीडीपी वृद्धि को हर साल लगभग 3 प्रतिशत तक प्रभावित कर सकती है। [15] आज के संदर्भ में यह लगभग 120 अरब डॉलर वार्षिक नुकसान के बराबर है, एक ऐसा अदृश्य बोझ, जो प्रतिबंधों से नहीं बल्कि मुकदमेबाजी, आंदोलनों और लगातार विवादों के जरिए विकास पर पड़ता है।
आलोचकों ने इस रिपोर्ट को असहमति दबाने की कोशिश बताया, जबकि समर्थकों ने इसे इस आशंका की पुष्टि माना कि आधुनिक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बुनियादी ढांचा परियोजनाएँ भी सैन्य मोर्चों जितनी महत्वपूर्ण हो चुकी हैं।
विडम्बना यह है कि एक ओर भारत में रणनीतिक महत्व की परियोजनाएँ वर्षों तक पर्यावरणीय मंजूरियों और अदालती विवादों में उलझी रहती हैं, वहीं चीन जिबूती, हम्बनटोटा और ग्वादर तक “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” के तहत बंदरगाहों का नेटवर्क तेजी से खड़ा कर चुका है। [16] बेल्ट एंड रोड पहल के जरिए हिंद महासागर में चीन की बढ़ती पहुँच के सामने मलक्का जलडमरूमध्य के पास भारत की मजबूत उपस्थिति एक बड़ा संतुलनकारी कारक बन सकती है। [17] ऐसे में ग्रेट निकोबार में देरी बीजिंग के लिए केवल कूटनीतिक लाभ नहीं, बल्कि रणनीतिक राहत भी हो सकती है।
क्या बीजिंग सीधे तौर पर इस विरोध को धन देता है? सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है। आधुनिक प्रभाव अभियान अक्सर अप्रत्यक्ष होते हैं: विदेशी फंडिंग, स्थानीय नागरिक समूह, कानूनी कार्यकर्ता, सहानुभूतिपूर्ण अकादमिक और राजनीतिक हित मिलकर विवाद को बढ़ा सकते हैं। अंततः लाभ उसी शक्ति को मिलता है, जिसके रणनीतिक हित भारत की धीमी गति और निर्णयहीनता से पूरे होते हैं।
केरल के बंदरगाह युद्ध से सबक
भारत के पास इस तरह के संगठित अवरोध का एक स्पष्ट उदाहरण पहले से है — विजिनजम।
तिरुवनंतपुरम के पास स्थित विजिनजम बंदरगाह को भारत की समुद्री कमजोरी के समाधान के रूप में देखा गया था, जहां ट्रांसशिपमेंट व्यापार का बड़ा हिस्सा अब तक कोलंबो और सिंगापुर के हाथों में रहा है। प्राकृतिक गहराई और कम तटीय अवसादन वाला यह बंदरगाह दुनिया के सबसे बड़े कंटेनर जहाजों को संभालने के लिए विकसित किया गया था। इसकी अनुमानित क्षमता 70 लाख TEU से अधिक है। [18]
इस परियोजना का उद्देश्य वही था, जो आज ग्रेट निकोबार का है — भारत का समुद्री व्यापार वापस लाना, ताकि उससे होने वाला लाभ देश के भीतर रहे।
लेकिन अदानी समूह द्वारा संचालित इस परियोजना को लैटिन कैथोलिक चर्च और उससे जुड़े मछुआरा समूहों के नेतृत्व में लंबे संगठित विरोध का सामना करना पड़ा। 138 दिनों तक निर्माण कार्य ठप रहा। सड़कें रोकी गईं, नावों से घेराव हुआ और एक अवसर पर पुलिस थाने पर हमला भी हुआ। चर्च-समर्थित समूहों पर हाईकोर्ट को दिए गए शांतिपूर्ण आचरण के आश्वासन का उल्लंघन करने के आरोप लगे। [19] केवल निर्माण रुकने से लगभग 200 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया गया।
ग्रेट निकोबार बहस को समझने के लिए यह मिसाल महत्वपूर्ण है। केरल में मुख्यतः आर्थिक महत्व वाला बंदरगाह, जिसका कोई सैन्य पक्ष नहीं था, चार महीने से अधिक समय तक संगठित विरोध के कारण रुका रहा। अब कल्पना करें ग्रेट निकोबार जैसी कहीं बड़ी परियोजना की — जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा का पहलू जुड़ा है और जो दूरस्थ द्वीपसमूह में स्थित है। यदि विजिनजम जैसी रणनीति यहां दोहराई गई, तो इसके परिणाम कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा या राजनीतिक रंगमंच?
28 अप्रैल 2026 को ग्रेट निकोबार परियोजना अचानक राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई, जब देश के प्रमुख विपक्षी नेता ने द्वीप समूह का दौरा किया।
इसके बाद वही राजनीतिक विवाद शुरू हुआ, जिससे भारत की रणनीतिक संस्थाएँ लंबे समय से चिंतित रही हैं। विपक्षी नेताओं ने आदिवासी प्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों से मुलाकात कर परियोजना को पर्यावरण और मूल निवासियों के लिए गंभीर खतरे के रूप में प्रस्तुत किया। [20]
सरकार की प्रतिक्रिया तेज थी। कुछ ही दिनों में नई दिल्ली ने परियोजना के रणनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पक्ष को विस्तार से रखा। [21] सत्ताधारी दल ने आलोचना को राजनीतिक बताया और आरोप लगाया कि विपक्ष के कुछ संदेश, जानबूझकर या अनजाने में, विदेशी हितों को लाभ पहुंचाने वाले नैरेटिव को मजबूती दे रहे हैं। विपक्ष ने सरकार पर “डैमेज कंट्रोल” का आरोप लगाया और संसद में व्यापक बहस की मांग की, जबकि कुछ रक्षा विशेषज्ञों ने सुरक्षा जरूरतों को परियोजना के वाणिज्यिक पहलुओं से अलग देखने की सलाह दी। [22]
यह केवल राजनीतिक टकराव नहीं था; इसने भारत की रणनीतिक राजनीति की एक गहरी समस्या उजागर की। सिद्धांततः संसद को ₹81,000 करोड़ (8.38 अरब डॉलर) की इस परियोजना पर गंभीर बहस करनी चाहिए। व्यवहार में चर्चा परिचित राजनीतिक खींचतान में बदलती दिखी — एक पक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर देता है, दूसरा पर्यावरणीय नुकसान और कथित कॉर्पोरेट पक्षपात पर।
असल चिंता इरादे से अधिक परिणाम की है। रणनीतिक परियोजनाएँ अक्सर अल्पकालिक राजनीतिक हितों की भेंट चढ़ जाती हैं। किसी दल को भारत की स्थिति कमजोर करने का इरादा न भी हो, फिर भी उसके कदम ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर सकते हैं जो परियोजना को जटिल बना दें। महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को लेकर संदेह और अनिश्चितता उन योजनाओं को धीमा कर सकती है, जिन्हें भारत की सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक मानती है।
इरादा और प्रभाव हमेशा एक जैसे नहीं होते। भू-राजनीति में कई बार किसी संवेदनशील क्षण पर विवाद को बढ़ावा मिल जाना ही प्रतिद्वंद्वी शक्ति के हितों के लिए पर्याप्त साबित होता है।
बहस खत्म, अब निर्माण का समय
इस पूरे विवाद के बीच यह समझना जरूरी है कि भारत की अपनी नियामक संस्थाओं ने क्या निष्कर्ष निकाला है।
फरवरी 2026 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की विशेष पीठ ने ग्रेट निकोबार परियोजना के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि पर्यावरणीय मंजूरी में हस्तक्षेप का “कोई ठोस आधार” नहीं है। ट्रिब्यूनल ने माना कि परियोजना की मंजूरी प्रक्रिया में “पर्याप्त सुरक्षा उपाय” पहले से शामिल हैं। [23]
सरकार ने जैव-विविधता निगरानी, कोरल रीफ संरक्षण, समुद्री पारिस्थितिकी और आपदा प्रबंधन सहित 42 पर्यावरणीय शर्तों के पालन का वचन दिया है। परियोजना के लिए कुल वन क्षेत्र का केवल 1.82 प्रतिशत हिस्सा उपयोग में लाया जाएगा, जिसकी भरपाई प्रतिपूरक वनीकरण से की जाएगी।
परियोजना को 2025 से 2047 के बीच तीन चरणों में लागू किया जाएगा। पहले चरण (2025–2035) में 72.12 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र विकसित होगा। चरणबद्ध व्यवस्था का उद्देश्य निरंतर निगरानी और जरूरत पड़ने पर सुधार सुनिश्चित करना है। वन्यजीवों के आवागमन के लिए विशेष गलियारे प्रस्तावित हैं, जबकि शोम्पेन समुदाय के विस्थापन की कोई योजना नहीं है; उलटे आदिवासी आरक्षित क्षेत्र को बढ़ाने की बात कही गई है।
इन उपायों से आलोचक संतुष्ट हों या न हों, एक तथ्य स्पष्ट है: भारत की अदालतों, पर्यावरणीय नियामकों और रणनीतिक नीति-निर्माताओं ने विस्तृत समीक्षा के बाद निष्कर्ष निकाला है कि परियोजना को आगे बढ़ना चाहिए।
ऐसे में जब इस निर्णय को घरेलू कानूनी प्रक्रिया के बजाय अंतरराष्ट्रीय मीडिया अभियानों, विदेशी फंडिंग वाले दबाव समूहों और राजनीतिक प्रचार के जरिए चुनौती दी जाती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इससे लाभ किसे मिल रहा है। विपक्षी नेतृत्व को इस पर गंभीर जवाब देना चाहिए।
इतिहास ने दरवाजा खोला है — क्या भारत तैयार है?
भारत लंबे समय तक ऐसी रणनीतिक सोच से संचालित रहा, जिसमें हिमालयी सीमाओं और स्थल सुरक्षा को प्राथमिकता मिली, जबकि समुद्री अवसरों को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया। स्वतंत्रता के बाद का विकास मॉडल भी समुद्री किनारों और बंदरगाहों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दे सका। नतीजतन, दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक धारा के बीच स्थित होने के बावजूद भारत की रणनीतिक सोच लंबे समय तक जमीन-केंद्रित बनी रही।
इस हिचकिचाहट की कीमत भारत ने खोए हुए ट्रांसशिपमेंट राजस्व, कोलंबो और सिंगापुर जैसे विदेशी बंदरगाहों को गए आर्थिक लाभ, और हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव के रूप में चुकाई है। [24]
2014 की आईबी रिपोर्ट, अपनी सीमाओं के बावजूद, एक गंभीर समस्या की ओर इशारा करती थी। उसके अनुसार संगठित विरोध और परियोजनाओं में देरी से भारत को भारी आर्थिक नुकसान हुआ, जिसकी कीमत दशकों में खरबों डॉलर तक पहुंच सकती है। लेकिन यह केवल आंकड़ों का नुकसान नहीं है। इसका अर्थ है वे सड़कें, स्कूल, अस्पताल और बिजली परियोजनाएँ जो समय पर पूरी नहीं हो सकीं। विकास की यह धीमी गति वैचारिक आंदोलनों, विदेशी फंडिंग और भू-राजनीतिक हितों के जटिल मेल से और प्रभावित हुई।
अंडमान का मौजूदा विवाद इसी सिलसिले का नया अध्याय है, लेकिन इस बार दांव कहीं बड़ा है।
भू-राजनीति में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब एक अकेली बुनियादी ढांचा परियोजना पूरे क्षेत्र का शक्ति-संतुलन बदल देती है। ग्रेट निकोबार परियोजना ऐसा ही क्षण हो सकती है। गलाथिया बे का बंदरगाह, दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा और मजबूत अंडमान-निकोबार कमांड केवल आर्थिक संपत्ति नहीं होंगे; वे भारत को इंडो-पैसिफिक प्रतिस्पर्धा का दर्शक नहीं, बल्कि उसे आकार देने वाली शक्ति बना सकते हैं।
चीन के लिए यह बदलाव स्वीकार करना आसान नहीं होगा। भारत के लिए यह लंबे समय से प्रतीक्षित अवसर है।
कंटेनर जहाज मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरते रहेंगे। सवाल यह है कि क्या भारत खुद को ऐसी स्थिति में लाएगा, जहां वह इस समुद्री मार्ग के शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सके, या फिर मुकदमेबाजी, राजनीतिक अवरोध और पर्यावरणीय विवाद एक बार फिर इस ऐतिहासिक अवसर को टाल देंगे?
संदर्भ सूची
[1] United Kingdom Parliament. “Navy Estimates, 1910–11.” Hansard, March 14, 1910. https://hansard.parliament.uk/%E2%80%8CCommons/1910-03-14/debates/2a7d9fe5-c716-41b1-a8fa-047b5d6660e1/NavyEstimates1910%E2%80%9311
[2] Visual Capitalist. “Charted: Oil Trade Through the Strait of Hormuz by Country.” https://www.visualcapitalist.com/charted-oil-trade-through-the-strait-of-hormuz-by-country/
[3] “Indian Ocean Chokepoints: Is China Still Vulnerable?” Observer Research Foundation. https://www.orfonline.org/expert-speak/indian-ocean-chokepoints-is-china-still-vulnerable
[4] Government of India, Press Information Bureau. “Government Clarifies Strategic, Economic, and Environmental Aspects of Great Nicobar Project.” https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2257174®=3&lang=2
[5] “The Malacca Kill Switch: How India Is Turning Great Nicobar into China’s Strategic Nightmare.” Sarkari Finance. https://sarkari.finance/blogs/the-malacca-kill-switch-how-india-is-turning-great-nicobar-into-chinas-strategic-nightmare/
[6] “India’s ‘Unsinkable Aircraft Carrier’: Great Nicobar as Strategic Weapon Against China in the Indian Ocean.” Defence Security Asia. https://defencesecurityasia.com/en/india-unsinkable-aircraft-carrier-great-nicobar-strategic-weapon-against-china-indian-ocean/
[7] Andaman and Nicobar Command Official X Account
[8] “The Role of Andaman and Nicobar Islands to Enhancing India’s Maritime Security Surveillance Architecture.” ResearchGate. https://www.researchgate.net/publication/401033740_The_Role_of_Andaman_and_Nicobar_Islands_to_Enhancing_India’s_Maritime_Security_Surveillance_Architecture
[9] Government of India, Press Information Bureau. “Government Clarifies Strategic, Economic, and Environmental Aspects of Great Nicobar Project.” https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2257174®=3&lang=2
[10] “Great Nicobar Project: Key Facts.” Asian Mirror, May 4, 2026. https://www.asianmirror.us/2026/05/04/great-nicobar-project-key-facts/
[11] “Great Nicobar Master Plan.” Next IAS, April 11, 2026. https://www.nextias.com/ca/current-affairs/11-04-2026/great-nicobar-master-plan
[12] “India’s Great Nicobar Project: A Strategic Hub for Trade, Maritime Security and Sustainable Growth in the Indo-Pacific.” Organiser, May 1, 2026. https://organiser.org/2026/05/01/351436/bharat/indias-great-nicobar-project-a-strategic-hub-for-trade-maritime-security-and-sustainable-growth-in-the-indo-pacific/
[13] Government of India, Press Information Bureau. “Government Response Following Criticism of Great Nicobar Project.” https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2257323®=3&lang=2
[14] Andaman and Nicobar Administration. “People of Nicobar District.” https://db.and.nic.in/nicobars/Profile/People.php
[15] “Foreign-Funded NGOs Stalling Development: IB Report.” The Times of India, June 12, 2014. https://timesofindia.indiatimes.com/india/Foreign-funded-NGOs-stalling-development-IB-report/articleshow/36411169.cms
[16] “China’s String of Pearls Policy: Implications for India.” Swadeshi Shodh Sansthan. https://swadeshishodh.org/chinas-string-of-pearls-policy-implications-for-india/
[17] “Great Nicobar Mega Project: How India Could Reshape Indo-Pacific Power and Challenge China’s Malacca Strategy.” TFI Global News, May 3, 2026. https://tfiglobalnews.com/2026/05/03/great-nicobar-mega-project-how-india-could-reshape-indo-pacific-power-and-challenge-chinas-malacca-strategy/
[18] “Vizhinjam Port: Church-Led Protestors Block Road to Port Site, Stop Construction Vehicles, Pelt Stones.” Swarajya. https://swarajyamag.com/amp/story/infrastructure/vizhinjam-port-church-led-protestors-block-road-to-port-site-stop-construction-vehicles-pelt-stones
[19] “Vizhinjam Port: Church Announces Temporary Halt to Protests After Talks with Kerala CM.” Swarajya. https://swarajyamag.com/infrastructure/vizhinjam-port-church-announces-temporary-halt-to-protests-after-talks-with-kerala-cm
[20] “Rahul Gandhi Opposes the Great Nicobar Project During Visit to Andaman and Nicobar Islands.” OpIndia. https://www.opindia.com/news-updates/congress-rahul-gandhi-opposes-the-great-nicobar-project-during-his-visit-to-the-andaman-and-nicobar-islands/
[21] BJP Tamil Nadu Facebook Post on Great Nicobar Project
[22] “Congress Accuses Centre of ‘Damage Control’ over Great Nicobar Project after Rahul Gandhi Visit.” ANI News, May 3, 2026. https://www.aninews.in/news/national/politics/congress-accuses-centre-of-damage-control-over-great-nicobar-project-after-rahul-gandhi-visit20260503125157/
[23] “India’s Great Nicobar Project: A Strategic Hub for Trade, Maritime Security and Sustainable Growth in the Indo-Pacific.” Organiser, May 1, 2026. https://organiser.org/2026/05/01/351436/bharat/indias-great-nicobar-project-a-strategic-hub-for-trade-maritime-security-and-sustainable-growth-in-the-indo-pacific/
[24] “India’s Dependence on Foreign Ports for Container Transhipment Has Ended with Opening of Vizhinjam Port, Says PM Modi.” The Economic Times, May 2026. https://infra.economictimes.indiatimes.com/news/ports-shipping/indias-dependence-on-foreign-ports-for-container-transhipment-has-ended-with-opening-of-vizhinjam-port-says-pm-modi/120824462
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