The Economist का मुगल रोमांस: भारत के आक्रांताओं के पक्ष में खड़ा वैश्विक एलीट

मुगल विरासत के बचाव में The Economist का रुख उस व्यापक तंत्र को उजागर करता है, जिसने दशकों तक भारत में इस्लामी साम्राज्यवादी शासन का महिमामंडन किया, जबकि हिंदू सभ्यतागत पुनर्जागरण को वैश्विक एलीट की नजर में खतरनाक, प्रतिगामी और राजनीतिक रूप से संदिग्ध साबित करने की लगातार कोशिश की।
सारांश

हाल ही में The Economist ने मुगल विरासत की कथित उपेक्षा पर चिंता जताते हुए भारत पर आरोप लगाया। लेकिन यह सिर्फ इतिहास की चिंता नहीं है। असल में इसमें वैश्विक मीडिया और अकादमिक एलीट की वह गहरी असहजता झलकती है, जो भारत के सभ्यतागत पुनर्जागरण से पैदा हो रही है। दशकों तक चुनिंदा इतिहास-लेखन और गढ़ी हुई गंगा-जमुनी तहजीब की छवि द्वारा मुगल शासन का रोमानीकरण किया गया, जबकि मंदिरों के विध्वंस, धार्मिक उत्पीड़न और साम्राज्यवादी क्रूरता की सच्चाई को नजरअंदाज या कमतर बताया गया। अब जब भारत अपनी प्राचीन हिंदू सभ्यतागत पहचान को बढ़ावा देने का प्रयत्न कर रहा है, यह पूरा तंत्र अपनी बढ़ती नाराजगी और बेचैनी खुलकर व्यक्त कर रहा है। यह विरोध इतिहास बचाने के लिए नहीं, बल्कि उस वैचारिक नियंत्रण को बनाए रखने की कोशिश है, जिसके तहत भारत को अपने अतीत और आक्रमणकारियों की विरासत को देखने का एक खास नजरिया थोपा गया था।

The Economist लंबे समय से वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार और भू-राजनीति पर अपनी सशक्त रिपोर्टिंग के लिए प्रतिष्ठित रहा है। लेकिन हाल ही में इस पत्रिका ने एक ऐसा लेख प्रकाशित किया जिसमें भारतीयों को “महान” मुगल साम्राज्य की विरासत का सम्मान न करने पर तीखी आलोचना की गई। यह रुख बेहद अजीब और विरोधाभासी है।

भारत में मुगल शासन का इतिहास धार्मिक कट्टरता, बड़े पैमाने पर मंदिरों के विध्वंस, हिंसक अभियानों, विलासिता और देश की संपत्ति के विनाशकारी कुप्रबंधन से जुड़ा रहा है। यह काल स्वर्ण युग होने के बजाय, भारत के सांस्कृतिक और आर्थिक क्षरण की एक गहरी छाप छोड़ गया। पिछले कुछ वर्षों में भारत में जो सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण हो रहा है, उसने इतिहास के इस अध्याय को उसी अंधेरे कोने में धकेलना शुरू कर दिया है, जहाँ उसका वास्तविक स्थान है। लेकिन यही बदलाव उन बौद्धिक और सांस्कृतिक वर्गों को गहराई से असहज कर रहा है, जिन्होंने दशकों तक मुगल शासन के अतिरंजित महिमामंडन से लाभ उठाया।

आक्रमणकारियों को सांस्कृतिक प्रतीक बनाने का पूरा उद्योग खड़ा हो चुका था — चमकदार कॉफी टेबल किताबें, महिमामंडन करने वाले टीवी धारावाहिक और पक्षपाती इतिहास-लेखन, सब इसी परियोजना का हिस्सा रहे। The Economist का यह लेख भी उसी पुरानी सोच को दोहराता दिखाई देता है।

एक वैश्विक वित्तीय पत्रिका का विदेशी आक्रमणकारियों के अपराधों को चमकाने के लिए इतनी बेचैनी दिखाना अपने आप में विचित्र है। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि यह लेख एक परिचित पैटर्न को उजागर करता है। यह उन प्रभावशाली वर्गों की असहजता और नाराजगी को दर्शाता है, जो भारत को अपनी इस्लाम-पूर्व सभ्यतागत विरासत को फिर से अपनाते और उसका गर्व से उत्सव मनाते देखना सहन नहीं कर पाते।

जो बात वस्तुतः सामान्य ऐतिहासिक पुनर्मूल्यांकन होनी चाहिए, उसे “प्रतिगामी” और “खतरनाक” बताकर पेश किया जाता है। जब भारत अपनी प्राचीन सभ्यतागत पहचान को फिर से केंद्र में लाने की कोशिश करता है, तो एक खास तंत्र इसे ऐसे चित्रित करता है मानो देश अंधकार की ओर लौट रहा हो। जबकि सच्चाई सिर्फ इतनी है कि भारत अब अपने इतिहास को अपनी शर्तों पर याद करना, समझना और उसका मूल्यांकन करना चाहता है।

मुगल महिमामंडन का उद्योग

भारत पर हुए मुस्लिम आक्रमणों का इतिहास बड़े पैमाने पर हिंदू मंदिरों के विध्वंस और पवित्र धार्मिक प्रतीकों के खंडन से भरा पड़ा है। कई जगहों पर मंदिरों को तोड़कर उन्हीं के खंडहरों पर मस्जिदें, मदरसे और अन्य इस्लामिक ढाँचे खड़े किए गए। इतना ही नहीं, टूटे मंदिरों की सामग्री का भी इन निर्माणों में इस्तेमाल किया गया। ऐतिहासिक अभिलेखों और विवरणों में इस बात का विस्तृत ब्यौरा मिलता है कि किस प्रकार एक के बाद एक आने वाले इस्लामिक आक्रमणकारियों और वंशों ने — जिनमें मुगल भी शामिल थे — हजारों हिंदू मंदिरों को नष्ट किया।

भारत में मुगल वंश की स्थापना करने वाले बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में बड़े पैमाने पर हुई हिंसा, विनाश और नरसंहार की घटनाओं का स्पष्ट उल्लेख किया है। मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने इस असहिष्णुता और मूर्ति-खंडन की घृणात्मक परंपरा को चरम स्तर तक पहुँचाया। उसने काशी, उज्जैन, मथुरा जैसे हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थानों में स्थित मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया। इनमें से कई जगहों पर मुगल साम्राज्य की विजय का प्रतीक बनाते हुए मस्जिदें बनवाई गईं[1]

इसके बावजूद The Economist ने बड़ी सहजता से एक लेख प्रकाशित किया[2], जिसमें हल्के-फुल्के अंदाज में भारतीय राज्य को मुगल विरासत का सम्मान न करने के लिए आड़े हाथों लिया गया और अफसोस जताया गया कि “साम्राज्य की स्थापना की 500वीं वर्षगांठ बिना किसी विशेष उल्लेख के गुजर गई।” भारत शायद दुनिया का इकलौता देश है, जहाँ हिंदू-विरोधी सोच और औपनिवेशिक मानसिकता का एक प्रभावशाली वर्ग मौजूद होने के बावजूद, प्रभावशाली मीडिया संस्थान खुलेआम उन आक्रमणकारियों और लुटेरों का महिमामंडन कर सकते हैं, जिन्होंने इस देश के मूल निवासियों की हत्या की, उन्हें प्रताड़ित किया और उनके धार्मिक स्थलों को नष्ट किया।

दिलचस्प बात यह है कि The Economist का लेख तब भी व्यंग्यात्मक नहीं लगता, जब वह सहजता से स्वीकार करता है कि सत्तारूढ़ दल द्वारा मुगलों पर मंदिर तोड़ने के आरोप सही हैं। लेकिन इस तथ्य को मानने के तुरंत बाद लेख उसे महत्वहीन बताकर खारिज कर देता है। यहीं पर लेख में मौजूद हिंदू-विरोधी दृष्टिकोण साफ दिखाई देने लगता है।

मुगल काल को लेकर यह अतार्किक आकर्षण केवल The Economist तक सीमित नहीं है। कई अन्य प्रकाशनों — जिनमें भारतीय मीडिया संस्थान भी शामिल हैं — ने आक्रमणकारियों के आगमन की 500वीं वर्षगांठ पर अत्यधिक प्रशंसात्मक लेख प्रकाशित किए। इनमें से कई लेख अपने पसंदीदा ऐतिहासिक पात्रों की उपलब्धियों को लेकर किशोर-उत्साह से भरे दिखाई देते हैं।

जहाँ The Hindu ने अपने एक लेख में “अनदेखी” मुगल विरासत पर अफसोस जताया[3], वहीँ हिंदुस्तान टाइम्स ने मुगलों की अत्यंत नरम और रोमानी छवि पेश की। उन्हें इतिहास के उन दुर्लभ नायकों और महान कला-प्रेमी शासकों के रूप में दिखाया, जिन्हें हमेशा गलत समझा गया। लेख में उन्हें “इतिहास के सबसे उत्साही कला संरक्षकों” में से एक बताया गया, जिन्होंने आभूषण, पांडुलिपियाँ, चित्रकला, वास्तुकला और सजावटी कलाओं के अद्भुत नमूने तैयार करवाए[4] इस तरह South Asia Journal ने मुगल साम्राज्य को “अब तक अस्तित्व में रहे सबसे महान साम्राज्यों में से एक” करार दिया[5] इस लेख में इस्लामिक आक्रमणकारियों के हिंसक और बर्बर पहलू पर सुविधाजनक ढंग से पर्दा डाल कर, मुगलों को “दक्षिण एशिया” की सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्तंभ के रूप में चित्रित किया गया।

भारत हिंदू राष्ट्रवाद के लिए मुगलों का ऋणी है? सचमुच?

मुगलों को लेकर The Economist के लेख में किए गए सबसे हास्यास्पद दावों में से एक यह है कि भारत अपने हिंदू राष्ट्रवाद के लिए खुद मुगलों का ऋणी है, और सत्तारूढ़ दल का उभार मुगलों को खलनायक के रूप में पेश करने पर आधारित है। लेख में राम जन्मभूमि आंदोलन पर भी तंज कसा गया है और बाबरी मस्जिद ढहाए जाने को लेकर वही पुराना एकतरफा आख्यान दोहराया गया है। साथ ही, उन व्यापक पुरातात्विक प्रमाणों और ऐतिहासिक अभिलेखों को सुविधाजनक ढंग से नजरअंदाज कर दिया गया है, जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू पक्ष के पक्ष में फैसला सुनाया था।

भारतीय संस्कृति, भाषा, संगीत, भोजन और अन्य क्षेत्रों में मुगलों के कथित योगदानों पर लंबी चर्चा करने के बाद लेखक अंत में ज़ोर देकर लिखते हैं कि मुगलों ने “राजनीतिक हिंदुत्व को उसका स्थायी और अपरिहार्य खलनायक दिया।” [6]

यह प्रस्तुति मीडिया, अकादमिक जगत और नागरिक समाज के कुछ वर्गों में लंबे समय से चल रहे “हिंदुत्व” विरोधी नैरेटिव का हिस्सा है। इसमें मुसलमानों को हमेशा हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा प्रताड़ित और पीड़ित समुदाय के रूप में दिखाया जाता है।

इस पूरे तर्क की विडंबना बेहद स्पष्ट है। “हिंदुत्व” और “हिंदू राष्ट्रवाद” को हर हाल में खलनायक साबित करने की कोशिश में यह लेख मध्यकालीन भारत के मुस्लिम शासकों — यानी उन विदेशी आक्रमणकारियों को, जिन्होंने भारत पर हमला किया और यहाँ के लोगों पर शासन किया — वर्ष 2026 के भारत की “हिंदू-बहुसंख्यक राजनीति” का बेबस पीड़ित बनाकर पेश करता है। यह फ्रेमिंग इतनी हास्यास्पद है कि प्रोपेगैंडा और हास्य की सीमा धुंधली हो जाती है।

एलीट वर्ग की बेचैनी

गंगा-जमुनी तहज़ीब का सॉफ्ट प्रोपेगैंडा लंबे समय से भारत के सांस्कृतिक विमर्श पर हावी रहा है। उत्तर भारत, खासकर दिल्ली और अवध जैसे क्षेत्रों की जिस तथाकथित मिश्रित और साझा संस्कृति का गुणगान किया जाता है, वह दरअसल मुगल साम्राज्य की कठोर वास्तविकताओं पर डाला गया एक मुलायम पर्दा भर है। इन आख्यानों में मंदिरों के बड़े पैमाने पर हुए विध्वंस, हिंदुओं पर हुए असंख्य अत्याचार, हिंदू आबादी के खिलाफ हुई हिंसा और मुगल शासन के दौरान हुए जबरन धर्मांतरण जैसे भयावह घटनाक्रमों की सच्चाई को अक्सर दबा दिया जाता है। इसके बजाय उर्दू भाषा, सूफ़ी संगीत, ग़ज़ल, मुगल खानपान और वास्तुकला की बढ़-चढ़कर प्रशंसा की जाती है।

जब कोई देश लंबे समय तक उपनिवेशवाद का दंश झेलता है और आक्रमणकारी वहीं बस जाते हैं, तो कुछ हद तक सांस्कृतिक आदान-प्रदान होना और मिश्रित सांस्कृतिक रूपों का उभरना स्वाभाविक है। लेकिन किसी प्राचीन सभ्यता की सांस्कृतिक, कलात्मक और साहित्यिक पहचान को लगभग पूरी तरह उसके आक्रमणकारियों की विरासत के नज़रिए से परिभाषित करना कहीं से भी न्यायोचित नहीं है। किसी भी देश के आक्रांताओं को उसकी संस्कृति व सभ्यता के निर्माताओं के रूप में पेश करना एक पूर्व-निर्धारित एजेंडे का आभास दिलाता है। जो तंत्र तथाकथित मुगल सांस्कृतिक विरासत का उत्सव मनाते हुए नहीं थकता, वही भारत की प्राचीन सभ्यतागत और सांस्कृतिक चेतना का लगातार मज़ाक उड़ाता और उसे नीचा दिखाता आया है।

आधुनिक भारत में लंबे समय तक मुगलों के ब्रांड एंबेसडर की तरह काम करने वाले वामपंथी इतिहासकारों से लेकर लुटियंस एलीट वर्ग तक — जो अकबर की तथाकथित “धार्मिक सहिष्णुता” का लगातार महिमामंडन करते हैं, जबकि औरंगज़ेब जैसे शासक के अत्याचारों को नरम करके पेश करते हैं — एक पूरा तंत्र दशकों से इस्लामिक साम्राज्यवादी शासन का बेहद भावनात्मक और रूमानी चित्रण करता आया है। यही प्रवृत्ति दिल्ली की हेरिटेज वॉक इंडस्ट्री और ग़ज़ल-शेरो-शायरी-सूफीवाद के उस सांस्कृतिक दायरे में भी दिखाई देती है, जहाँ मुगल सौंदर्यबोध का महिमामंडन किया जाता है, जबकि भारत की प्राचीन हिंदू सभ्यतागत पहचान को उनकी “गंगा-जमुनी तहज़ीब” के सुगंधित बगीचे में बिना इजाज़त खिले एक अनचाहे फूल की तरह दिखाया जाता है।

स्वतंत्रता के बाद से ही यह एकतरफ़ा नैरेटिव भारत के एलीट सांस्कृतिक ढाँचे का एक केंद्रीय स्तंभ बना रहा।

अब जबकि भारत के सभ्यतागत इतिहास में मुगलों को धीरे-धीरे केवल हाशिये तक सीमित किया जा रहा है और भारत की हिंदू विरासत पर एक नये सिरे से पुनः ध्यान केंद्रित हो रहा है, तब ज़ाहिर है कि यह पूरा तंत्र अपनी नाराज़गी और खीझ खुलकर ज़ाहिर कर रहा है। अयोध्या राम मंदिर का निर्माण, संभल जैसे प्राचीन हिंदू विरासत-स्थलों की पुनर्प्राप्ति, और काशी-ज्ञानवापी तथा मथुरा-शाही ईदगाह जैसे मुद्दों पर बढ़ती जन-जागरूकता ने दशकों के पक्षपातपूर्ण विमर्श को झकझोर कर रख दिया है[7] [8]

दरअसल, ऐसे मीडिया आख्यान पूरी तरह प्रतिक्रियात्मक हैं — एक ऐसे दौर में मुगलों को प्रासंगिक बनाए रखने की बेचैन कोशिश, जो अब आगे बढ़ चुका है। यही कारण है कि पिछले एक दशक में मुख्यधारा के प्रकाशनों से लेकर लघु साहित्यिक पत्रिकाओं तक, इस तरह के लेखों में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है।

आमतौर पर ऐसे लेख “ओपिनियन” piece यानी राय-स्तंभ के नाम पर प्रकाशित किए जाते हैं। यह एक सुविधाजनक तरीका है, जिसके ज़रिये मीडिया संस्थान वैचारिक एजेंडा आगे बढ़ाते हैं और साथ ही संपादकीय जवाबदेही से भी बच निकलते हैं। इस प्रकार के लेखों में एक आम प्रवृत्ति यह देखने को मिलती है कि भारत के सभ्यतागत पुनर्जागरण को अक्सर इस्लामिक सांस्कृतिक विरासत के ख़िलाफ़ चल रही साज़िश के रूप में पेश किया जाता है। जैसा कि The Economist के लेखक ने लिखा: “2024 की शुरुआत तक, जब मोदी ने वादा किए गए मंदिर का उद्घाटन किया, उनकी पार्टी के पास 56% सीटें थीं। पिछले एक दशक से उनकी सरकार मुगल शहरों के नाम बदल रही है, मुगल खानपान को खारिज कर रही है और इतिहास की किताबों से मुगलों को हटाने में लगी है।” [9]

अगर “Mughal Legacy in India” (भारत में मुग़लों की विरासत) लिखकर साधारण गूगल सर्च किया जाए, तो ऐसे लेखों की भरमार दिखाई देती है, जो भारत के प्राचीन अतीत पर बढ़ते फोकस के बीच मुगल संस्कृति की कथित उपेक्षा पर अफसोस जताते हैं। Frontline में “The Mughals and the making of India” (मुग़ल और भारत का निर्माण) जैसा शीर्षक दिखाई देता है[10], जबकि Engelsberg Ideas दावा करता है कि “मुगल साम्राज्य की गहरी विरासतें अब भारत के अतीत की एक काल्पनिक दृष्टि के हमले का सामना कर रही हैं।” [11] वहीं The Conversation ने “Tampering with history: how India’s ruling party is erasing the Muslim heritage of the nation’s cities” शीर्षक से लेख प्रकाशित किया[12]

इन सभी लेखों को जोड़ने वाली कड़ी बिल्कुल स्पष्ट है — मुगल विरासत के अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन के साथ-साथ लगभग हमेशा भारत की प्राचीन सभ्यतागत और सांस्कृतिक विरासत को खलनायक की तरह पेश किया जाता है।

वैश्विक मीडिया का एजेंडा

The Economist की स्थापना 1843 में एक स्कॉटिश टोपी निर्माता ने मुक्त व्यापार के समर्थन के उद्देश्य से की थी। लेकिन आज इसके रुख में दिखाई देने वाला वैचारिक विरोधाभास नजरअंदाज करना मुश्किल है। 21वीं सदी के दूसरे दशक में वही प्रकाशन अब लगातार “हिंदुत्व”, “जाति” और “हिंदू राष्ट्रवाद” जैसे विषयों पर वैचारिक आख्यान गढ़ने में लगा दिखाई देता है, जबकि मध्यकालीन इस्लामिक आक्रमणकारियों को भारत की सभ्यतागत विरासत के प्रमुख निर्माता के रूप में पेश कर उनकी प्रशंसा के पुल बाँधते नहीं थकता।

पिछले कुछ वर्षों में भारत से जुड़े मुद्दों पर The Economist की कवरेज पर यदि नजर डालें, तो “हिंदुत्व” के खिलाफ उसका आक्रामक रुख साफ दिखाई देता है। मार्च 2024 में उसने “What is Hindutva, the ideology of India’s ruling party?” शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया।[13] इसके बाद अप्रैल 2024 में एक और लेख आया, जिसमें पाठकों को इस “खतरनाक विचारधारा” को समझने के लिए किताबों की सूची सुझाई गई[14] सितंबर 2024 में The Economist ने एक और आलोचनात्मक लेख प्रकाशित किया, जिसमें दावा किया गया कि भारत टेक्नोलॉजी और हिंदू राष्ट्रवाद के खतरनाक मेल का सामना कर रहा है[15]

हिंदू धर्म और हिंदुत्व को लेकर The Economist की यह व्यग्रता लगातार बनी हुई दिखाई देती है। 2015 में ही उसने “The Hindutva rate of growth” शीर्षक से एक तीखा आलोचनात्मक लेख प्रकाशित किया था[16] इस विषय पर उसके कई शीर्षक इतने स्पष्ट रूप से हिंदू-विरोधी स्वर वाले रहे हैं कि उनमें संतुलन या जटिलता के लिए लगभग कोई जगह नहीं बचती। उदाहरण के लिए, 2022 के एक लेख का शीर्षक था: “Hindu bigots are openly urging Indians to murder Muslims.” (हिंदू कट्टरपंथी खुल्लम खुल्ला भारतीयों को मुसलमानों की हत्या करने के लिए उकसा रहे हैं)।[17]

पिछले एक दशक में इन विषयों पर पत्रिका की कवरेज को देखें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है कि क्या The Economist ने जानबूझकर या अनजाने में खुद को उन आवाज़ों का प्रमुख मंच बना लिया है, जो हिंदू सरोकारों के प्रति गहरी शत्रुता रखती हैं।

भारत को लेकर The Economist की संपादकीय नीति को और अधिक विवादास्पद बनाने वाली बात यह है कि उसमें वैकल्पिक दृष्टिकोण लगभग पूरी तरह अनुपस्थित दिखाई देते हैं। ऐसे लेख शायद ही कभी देखने को मिलते हैं, जो हिंदू संगठनों या समूहों के दृष्टिकोण को सामने रखें, या हिंदू चिंताओं को संतुलित अथवा ज़रा भी सकारात्मक नजरिए से प्रस्तुत करें। यह निरंतर दिखाई देने वाला पैटर्न स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न खड़ा करता है कि क्या हिंदूफोबिया धीरे-धीरे इस प्रकाशन की संपादकीय सोच का स्थायी हिस्सा बन चुका है।

अकादमिक क्षेत्र में मुगल क्रूरता की लीपापोती 

मुगल विरासत का खुलकर महिमामंडन करने वाले मीडिया आख्यान दरअसल एक बड़े अकादमिक हिंदू-विरोधी तंत्र का हिस्सा हैं। ऑड्री ट्रश्के जैसे विद्वानों ने[18] भारत पर हुए इस्लामिक आक्रमणों की क्रूरता को नरम करके पेश करने और लगातार हिंदुओं को कटघरे में खड़ा करने के आधार पर ही अपना पूरा करियर खड़ा कर लिया है। भारत में भी वामपंथी इतिहासकारों के एक प्रभावशाली तंत्र ने मुगलों को “बौद्धिक फंतासी” का स्थायी विषय बना दिया, जबकि हिंदू शासकों को हाशिए पर धकेलते हुए देश के प्राचीन इतिहास को व्यवस्थित तरीके से विकृत किया गया।

लेकिन भारत में जारी सभ्यतागत पुनर्जागरण के साथ अब इन गहराई से जड़ें जमा चुके अकादमिक आख्यानों को खुली चुनौती मिल रही है। तथ्यों और तर्कों के आधार पर सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग अब लुटियंस तंत्र से जुड़े हिंदू-विरोधी अकादमिक एलीट वर्ग की तीखी आलोचना कर रहे हैं। लंबे समय तक प्रभावशाली रहे वामपंथी इतिहासकारों का वर्चस्व धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है, क्योंकि अधिक से अधिक भारतीय अब मीनाक्षी जैन जैसे गैर-वामपंथी इतिहासकारों के लेखन की ओर रुख कर रहे हैं।

इसके साथ ही आर.सी. मजूमदार, जदुनाथ सरकार, राधा कुमुद मुखर्जी और राखालदास बनर्जी जैसे इतिहासकारों के लेखन में भी नई रुचि दिखाई दे रही है[19] वहीं सीता राम गोयल की कृतियाँ, जिन्होंने इस्लामिक आक्रमणकारियों द्वारा हिंदू मंदिरों के विध्वंस का विस्तार से दस्तावेजीकरण किया था, अब मुख्यधारा की सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुकी हैं। इससे प्रमुख वामपंथी इतिहासकारों के चुनिंदा और पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण का और भी अधिक पर्दाफाश हो रहा है।

हाल ही में एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में किए गए बदलावों ने इस पूरे तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। कक्षा 8 की नई इतिहास पुस्तक में बाबर को “निर्दयी और क्रूर आक्रमणकारी” बताया गया है, जिसने “शहरों की पूरी आबादी का नरसंहार किया।” अकबर के शासन को अब “क्रूरता और सहिष्णुता का मिश्रण” बताया गया है, जिससे पहले की तरह उसकी धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की प्रवृत्ति से दूरी बनाई गई है। नई पुस्तक में दिल्ली सल्तनत और मुगल शासन के दौरान मंदिर विध्वंस, क्रूरता और धार्मिक उत्पीड़न का तथ्यात्मक विवरण दिया गया है। साथ ही औरंगज़ेब द्वारा मंदिरों और गुरुद्वारों को तोड़े जाने का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है[20]

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एनसीईआरटी ने कक्षा 7 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों से दिल्ली सल्तनत और मुगलों से जुड़े अध्याय भी हटा दिए हैं। उनकी जगह अब प्राचीन भारतीय राजवंशों, पवित्र तीर्थस्थलों और महाकुंभ से जुड़ी सामग्री जोड़ी गई है। हालांकि यह अनुमान लगाया जा रहा है कि ये विषय पुस्तक के दूसरे भाग में शामिल हो सकते हैं, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है[21]

दशकों तक भारतीय युवाओं ने ऐसी इतिहास की किताबें पढ़ीं, जिनमें मुगलों और टीपू सुल्तान को भारत के एकमात्र महान शासकों के रूप में प्रस्तुत किया गया। इन पुस्तकों में अकबर की धार्मिक समन्वय की नीति और उसके दीन-ए-इलाही के सिद्धांत का लगातार महिमामंडन किया गया, जबकि हिंदू शासकों को केवल औपचारिक या संक्षिप्त उल्लेख तक सीमित कर दिया गया। इसका असर यह हुआ कि युवा मनों में यह धारणा घर कर गई कि हिंदू शासक या तो महत्वहीन थे, या फिर इतिहास में उनकी कोई विशेष भूमिका ही नहीं थी।

अकादमिक आख्यानों में आया यह बदलाव — जिसमें भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं और हिंदू शासकों की विरासत को नये सिरे से रेखांकित किया जा रहा है — स्पष्ट रूप से गंगा-जमुनी तहज़ीब वाले तंत्र को असहज कर रहा है।

The Economist जैसे प्रकाशनों द्वारा आगे बढ़ाए जा रहे मीडिया आख्यानों को “अकबर द ग्रेट” वाली छवि को बचाए रखने की बेचैन कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत के अभूतपूर्व सभ्यतागत पुनर्जागरण ने इस पूरे तंत्र के पैरों तले ज़मीन खिसका दी है। इसके बावजूद, व्यापक मीडिया प्रभाव और अकादमिक वर्चस्व के सहारे यह तंत्र अब भी भारत के सभ्यतागत मूल्यों के खिलाफ अपना अभियान जारी रखे हुए है, इस उम्मीद में कि वह नई पीढ़ी की सोच को प्रभावित करता रहेगा।

सन्दर्भ सूची

[1] Payback for Plunder: India’s Case for War Reparations; https://stophindudvesha.org/payback-for-plunder-indias-case-for-war-reparations/#_ftn3

[2] What have the Mughals ever done for us? https://www.economist.com/asia/2026/04/19/what-have-the-mughals-ever-done-for-us

[3] Mughal empire legacy in India: forgotten monuments to visit now – The Hindu; https://www.thehindu.com/life-and-style/travel/500-years-mughals-forgotten-monuments-to-visit-india/article70863716.ece

[4] The Mughal Legacy 500 Years On; https://www.hindustantimes.com/specials/The-Mughal-Legacy-500-Years-On-101777553545934/index.html

[5] 2026: Celebrating 500 Years of the Mughal Empire | South Asia Journal; https://southasiajournal.net/post/india/60893/2026-celebrating-500-years-of-the-mughal-empire

[6] What have the Mughals ever done for us?; https://www.economist.com/asia/2026/04/19/what-have-the-mughals-ever-done-for-us

[7] Reclaiming India’s Heritage: Sambhal’s Key Discoveries”; https://stophindudvesha.org/reclaiming-indias-hindu-heritage-sambhal-discoveries-leading-the-way/

[8] Temples spark India’s cultural reset.”; https://stophindudvesha.org/beyond-mausoleums-temples-tourism-drives-indias-cultural-reset/

[9] What have the Mughals ever done for us?; https://www.economist.com/asia/2026/04/19/what-have-the-mughals-ever-done-for-us

[10] How the Mughals Shaped Modern India’s Identity – Frontline; https://frontline.thehindu.com/society/mughal-legacy-india-impact/article70915886.ece

[11] India’s war on the Mughal Empire – Engelsberg Ideas; https://engelsbergideas.com/essays/indias-war-on-the-mughal-empire/

[12] Tampering with history: how India’s ruling party is erasing the Muslim heritage of the nation’s cities; https://theconversation.com/tampering-with-history-how-indias-ruling-party-is-erasing-the-muslim-heritage-of-the-nations-cities-116160

[13] What is Hindutva, the ideology of India’s ruling party?: https://www.economist.com/the-economist-explains/2024/03/07/what-is-hindutva-the-ideology-of-indias-ruling-party

[14] What to read about Hindutva; https://www.economist.com/the-economist-reads/2024/04/05/what-to-read-about-hindutva

[15] Technology and Hindu nationalism have transformed India; https://www.economist.com/culture/2024/09/05/technology-and-hindu-nationalism-have-transformed-india

[16] The Hindutva rate of growth; https://www.economist.com/asia/2015/01/15/the-hindutva-rate-of-growth

[17] Hindu bigots are openly urging Indians to murder Muslims; https://www.economist.com/leaders/2022/01/15/hindu-bigots-are-openly-urging-indians-to-murder-muslims

[18] Tracing Anti-India Anti-Hindu Aurangzeb Lover Audrey Truschke’s Institutional Link And Campaigns Targeting India | Dailyhunt; https://m.dailyhunt.in/news/india/english/the+commune-epaper-thecom/tracing+antiindia+antihindu+aurangzeb+lover+audrey+truschkes+institutional+link+and+campaigns+targeting+india-newsid-n709883237

[19] Left historians have distorted Indian history. Young minds must bring back nationalist spirit; https://theprint.in/opinion/left-historians-have-distorted-indian-history-young-minds-must-bring-back-nationalist-spirit/1865191/

[20] Left historians have distorted Indian history. Young minds must bring back nationalist spirit; https://theprint.in/opinion/left-historians-have-distorted-indian-history-young-minds-must-bring-back-nationalist-spirit/1865191/

[21] NCERT Class 7 books drop Mughals, Delhi Sultanate, introduce Maha Kumbh chapter – India Today; https://www.indiatoday.in/education-today/news/story/ncert-class-7-books-drop-mughals-delhi-sultanate-introduce-maha-kumbh-chapter-2716120-2025-04-28

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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