ब्रिटिश राज का सबसे वफ़ादार पिट्ठू: कांग्रेस की असली कहानी

कांग्रेस का इतिहास ब्रिटिश रणनीति की सफलता का प्रतीक है—एक ऐसी पार्टी जिसने जनता के गुस्से को दबाने का काम किया ताकि ब्रिटिशों की सत्ता को स्थिर रखा जा सके और बाद में सत्ता में पाकर औपनिवेशिक ढाँचा जस का तस जारी रखा।
  • 1857 की बगावत के बाद अंग्रेज़ों ने दो चालें चलीं: एक तरफ ज़बरदस्त दमन, और दूसरी तरफ ऐसी संस्थाएँ खड़ी करना जो “सेफ़्टी वाल्व” बनकर जनता की देशभक्ति को काबू में रखें।
  • 1885 में ए.ओ. ह्यूम की अगुवाई में कांग्रेस बनाई गई। इसका मक़सद था लोगों को थोड़ा-सा राजनीतिक हिस्सा देना, लेकिन साथ ही अंग्रेज़ों के “सभ्य बनाने वाले मिशन” को और मजबूत करना।
  • शुरुआती कांग्रेस नेता अपनी माँगें हमेशा उसी दायरे में रखते थे जो अंग्रेज़ मान सकते थे। ये बातें सिर्फ़ छोटे सुधारों तक सीमित थीं, असली आज़ादी की ओर नहीं।
  • 1928 में लाला लाजपत राय की मौत और उसके बाद हुए आंदोलनों से आंदोलन का एक हिस्सा ज़रूर उग्र हुआ, लेकिन कांग्रेस ज्यादातर अपनी शांतिप्रिय और क़ानूनी राह पर ही टिकी रही।
  • 1947 में सत्ता मिलने के बाद भी पार्टी ने अंग्रेज़ों की बनाई व्यवस्था को ही आगे बढ़ाया—केंद्र पर ज़ोर, अंग्रेज़ियत से भरी राजनीति और अफ़सरशाही की ताक़त उसी तरह कायम रही।

1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास का ऐसा मोड़ था जिसने अंग्रेज़ी सत्ता की नींव हिला दी। अंग्रेज़ इसे “सिपाही विद्रोह” कहकर छोटा साबित करना चाहते थे, लेकिन भारतीय इतिहासकारों ने इसे सही रूप से “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” कहा। इस आंदोलन का विस्तार, तीव्रता और लगभग सफल हो जाना अंग्रेजी सत्ता को बुरी तरह हिला गया। ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता की नींव हिल गई और उसके राजनीतिक व सैन्य ढांचे की कमजोरी उजागर हो गई। इसके बाद 1858 में ब्रिटिश क्राउन ने सीधे भारत पर नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया और राज का काल शुरू हुआ। यह सत्ता-हस्तांतरण केवल प्रशासनिक नहीं था; यह वैचारिक और मनोवैज्ञानिक भी था, क्योंकि इससे यह स्वीकारोक्ति प्रकट होती थी कि भारत पर शासन चलाने के लिए केवल दमनकारी मशीनरी ही नहीं, बल्कि सहमति बनाने के उपाय भी ज़रूरी थे।

1857 के बाद के नए औपनिवेशिक ढांचे में शासन की रणनीतियों को नए सिरे से गढ़ा गया। कठोर दमन के साथ-साथ चुनिंदा रियायतों की नीति भी अपनाई गई। एक ओर विद्रोह की पुनरावृत्ति रोकने के लिए दंडात्मक कदम उठाए गए, कड़े दमनकारी क़ानूनों को और मज़बूत करना और बगावत पर पैनी नज़र रखना, तो दूसरी ओर शिक्षित भारतीयों की बढ़ती आकांक्षाओं को नियंत्रित करने के लिए नए रास्ते बनाए गए। अंग्रेज़ समझ चुके थे कि यह नया पढ़ा-लिखा वर्ग, जिसे कुछ सीमित रोजगार मिलते थे, राज के लिए सहारा भी बन सकता है और मुसीबत भी। अगर उनके असंतोष को अनदेखा किया जाता, तो वह आंदोलन का रूप ले सकता था; लेकिन यदि उसे सही दिशा दी जाती, तो उसे राज की स्थिरता के पक्ष में इस्तेमाल किया जा सकता था।

यही वह सावधानी से रचा गया दमन और रियायत का वातावरण था, जिसके भीतर 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) की स्थापना हुई। यह किसी राष्ट्रवादी आंदोलन का परिणाम नहीं था, बल्कि ह्यूम जैसे साम्राज्यवादी प्रशासकों की सुनियोजित कोशिशों का हिस्सा था। ह्यूम ने कांग्रेस को एक ऐसा सेफ़्टी वाल्व माना जो भारतीयों की मांगों को बाहर निकलने का रास्ता दे, मगर अंग्रेज़ी राज को चुनौती न दे। इससे वे खुद को सभ्य और प्रगतिशील शासक साबित करना चाहते थे। नतीजतन कांग्रेस अपने शुरुआती दौर में राज की मददगार ही बनी रही।

1857 के बाद का परिदृश्य: ब्रिटिश नियंत्रण की रणनीति

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने अपनी हिल चुकी सत्ता को मज़बूत करने के लिए एक दोहरी रणनीति अपनाई। एक ओर उसने अपने दमनकारी तंत्र के विस्तार में भारी निवेश किया, क्योंकि उसके लिए साम्राज्यवादी शक्ति बनाए रखने में बल-प्रयोग अनिवार्य था।[1] कठोर क़ानूनों की एक श्रृंखला लागू की गई, ताकि जन-अभिव्यक्ति और असहमति पर कड़ा नियंत्रण रखा जा सके। 1878 का स्थानीय भाषाओं का प्रेस क़ानून (Vernacular Press Act) उन स्वदेशी अख़बारों को दबाने के लिए लाया गया, जो राष्ट्रवादी आलोचना के माध्यम बन चुके थे। वहीं, भारतीय दंड संहिता की धारा 124A के तहत राजद्रोह की धाराएँ लागू की गईं, जिससे औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बोले या लिखे गए शब्द तक को अपराध घोषित कर दिया गया।[2] इनके साथ-साथ अंग्रेजों ने एक संगठित खुफ़िया और निगरानी व्यवस्था बनाई, जहाँ पुलिस और गुप्तचर एजेंसियाँ राजनीतिक गतिविधियों पर चौकसी करतीं और किसी भी संभावित विद्रोह को शुरू होने से पहले कुचल देतीं।[3] अब शक करना और उस पर नज़र रखना सरकारी ढांचे का हिस्सा बन गया, ताकि फिर से कोई बड़ा विद्रोह न उठे।[4]

साथ ही, ब्रिटिशों को यह भली-भाँति समझ थी कि केवल दमन से उनकी वैधता कायम नहीं रह सकती। मैकाले की शिक्षा नीति से तैयार हुआ अंग्रेज़ी-शिक्षित भारतीय मध्यवर्ग, जो ब्रिटेन और यूरोप में प्रचलित उदारवादी और संवैधानिक विचारों से परिचित हो रहा था, अब राजनीतिक मंच की माँग करने लगा था। ऐसे वर्गों को मंच से वंचित करना उनके असंतोष और अशांति को बढ़ा सकता था; जबकि उन्हें नियंत्रित राजनीतिक ढाँचे में शामिल करना ब्रिटिश सत्ता के लिए सुविधाजनक सहकार का अवसर प्रदान करता था। ह्यूम ने इसे “एस्केप वाल्व[5] कहा—ऐसा मंच जहाँ भारतीयों को बोलने और सुधारों की बात करने की थोड़ी-बहुत आज़ादी हो, मगर राज की स्थिरता को छूने की इजाज़त न हो।[6]

अंग्रेज़ों की यह नीति असली स्वराज्य देने की नहीं, बल्कि दिखावटी भागीदारी की थी। उन्होंने लोगों को बोलने का छोटा मंच दिया, मगर फैसले हमेशा अपने हाथ में रखे। नतीजतन, उन्होंने विरोध की ऊर्जा को नियंत्रित कानूनी दायरों में समेटा और खुद को दयालु शासक दिखाया। असल में, उनका राज कठोर दमन और सीमित रियायतों के संतुलन से चलता रहा।

कांग्रेस पार्टी की स्थापना

1885 में कांग्रेस की स्थापना किसी स्वदेशी राष्ट्रवादी आंदोलन का नतीजा नहीं थी, बल्कि अंग्रेज़ी शासन की सोची-समझी योजना का हिस्सा थी। इंडियन सिविल सर्विस से रिटायर ए.ओ. ह्यूम ने इसकी शुरुआत की। कांग्रेस का मक़सद था अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे भारतीयों को शिकायत करने का एक सीमित मंच देना। ह्यूम इसे “सेफ़्टी वाल्व” मानते थे, यानी ऐसा साधन जिससे इस वर्ग की नाराज़गी हिंसक बग़ावत में न बदले, बल्कि याचिकाओं और संवैधानिक तरीक़ों तक ही सीमित रहे। इसलिए कांग्रेस की शुरुआत अंग्रेज़ों को चुनौती देने के लिए नहीं, बल्कि उनकी सत्ता बनाए रखने के लिए हुई थी।

शुरु शुरू में ब्रिटिश शासन ने कांग्रेस को सिर्फ़ सहन ही नहीं किया गया, बल्कि कई मायनों में औपनिवेशिक प्रशासन ने उसे प्रोत्साहित किया और परोक्ष संरक्षण भी दिया। इसके नेताओं में ए.ओ. ह्यूम जैसे अंग्रेज़ अधिकारी, एनी बेसेंट जैसी धर्म-तत्ववादी थियोसोफ़िस्ट, जिन्होंने संगठन को अंतरराष्ट्रीय रंग दिया, और बाद में मोतीलाल नेहरू जैसे नेता शामिल थे, जो उभरते भारतीय राजनीतिक अभिजात वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे। विचारों में भिन्नता होते हुए भी सभी नेता अंग्रेज़ों की अनकही शर्तों के अंदर ही काम करते थे। कांग्रेस का शुरुआती दौर इस बात पर आधारित था कि वह राज से खुला टकराव न करे।[7]

स्थापना के समय कांग्रेस एक राष्ट्रवादी आंदोलन कम और एक राजनीतिक प्रयोग थी। भारतीयों को यहाँ यह सिखाया जाता था कि संवैधानिक ढंग से कैसे माँगें रखी जाएँ। काम बस प्रस्ताव पारित करने, याचिकाएँ भेजने और सरकार से नैतिक गुहार लगाने तक सीमित था। असली मक़सद सदस्यों को अनुशासित और संयमी बनाना था। राज के “सभ्य बनाने” के मिशन से जुड़कर कांग्रेस ने खुद को वफ़ादार विपक्ष दिखाया, जो सत्ता तोड़ने के बजाय सुधार चाहता था।

दरअसल, उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध की कांग्रेस राज की सहायक संस्था की तरह काम कर रही थी: वह एक तरफ़ संकरे भारतीय अभिजात वर्ग की आकांक्षाओं को व्यक्त करती थी और दूसरी तरफ़ ब्रिटेन के इस दावे को वैधता देती थी कि वही भारत के राजनीतिक विकास का निर्णायक और हितैषी है।[8]

कांग्रेस – साम्राज्य का ‘सेफ़्टी वाल्व’

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ब्रिटिशों द्वारा भारतीयों को दी गई रियायतें कभी भी प्रभुसत्ता को मान्यता देने या वास्तविक स्वशासन की ओर बढ़ने के कदम नहीं थीं। बल्कि, ये सावधानी से नाप-तौलकर बनाई गई सुरक्षा व्यवस्थाएँ थीं, जिनका उद्देश्य असंतोष को पहले ही नियंत्रित करना और उभरती राजनीतिक चेतना की धाराओं को सीमित करना था। 1861 के इंडियन काउंसिल्स एक्ट से शुरू होकर 1892 और 1909 में धीरे-धीरे बढ़ाए गए सीमित प्रतिनिधित्व इसी रणनीति के प्रतीक थे। इन सुधारों ने शासन में भारतीय भागीदारी का आभास तो पैदा किया, लेकिन परिषदें ब्रिटिश अधिकारियों के प्रभुत्व में रहीं, जहाँ भारतीय केवल सलाहकार भूमिकाओं तक सीमित थे और असली सत्ता से वंचित।

इसी तरह, भाषण और प्रेस की दी गई सीमित स्वतंत्रता पर हर समय निगरानी और सेंसरशिप का पहरा था। ब्रिटिश थोड़े-बहुत सार्वजनिक आलोचना को सहन करते, लेकिन जैसे ही वह सीमा पार होती, वे 1878 के वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट या बाद में राजद्रोह संबंधी प्रावधानों जैसे क़ानूनों का इस्तेमाल कर देते। “इंडियनाइज़ेशन” की नीति के तहत प्रशासन और नौकरशाही में कुछ पदों पर भारतीयों की भर्ती भी इसी पैटर्न पर हुई, अधिकतर अंग्रेज़ी-शिक्षित अभिजात वर्ग से चुने गए लोग शामिल किए गए, लेकिन हमेशा अधीनस्थ भूमिकाओं में। इससे न केवल उभरते मध्यवर्ग की आकांक्षाएँ थोड़ी-बहुत शांत हुईं, बल्कि औपनिवेशिक शासन की पदानुक्रमित प्रकृति और मज़बूत हो गई।

ये नियंत्रित रियायतें दोहरे उद्देश्य पूरा करती थीं। देश के भीतर, वे राजनीतिक “सेफ़्टी वाल्व” की तरह काम करतीं, भारतीय अभिजात वर्ग को प्रतीकात्मक मान्यता देतीं, जबकि आम जनता को राजनीति से बाहर रखतीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, ये ब्रिटेन को एक प्रगतिशील और उदार शासक के रूप में प्रस्तुत करतीं, जो कथित तौर पर अपने उपनिवेशों के लोगों को धीरे-धीरे उन्नत कर रहा है। पर वास्तव में, इन सुधारों ने निर्भरता की संरचना को और गहरा किया, साम्राज्य के प्रति वफ़ादार मध्यस्थ वर्ग तैयार किया और वास्तविक स्वायत्तता की माँगों को आगे खिसका दिया।

इस तरह, नियंत्रित रियायतें ब्रिटिशों के लिए सुधार के मुखौटे तले साम्राज्यवादी प्रभुत्व बनाए रखने का सबसे कारगर हथियार बन गईं। लेकिन ये उपाय उतने प्रभावी नहीं हो सकते थे, अगर शुरुआती दशकों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का स्वेच्छापूर्वक सहयोग न मिला होता। आईएनसी, जिसे बाद में राष्ट्रवादी संघर्ष का अगुआ माना गया, शुरू में इन रियायतों को वैध ठहराने का मुख्य माध्यम थी। औपनिवेशिक ढाँचे के भीतर जो सीमित स्थान उसे दिया गया था, उसे स्वीकार कर कांग्रेस ने न केवल साम्राज्यवादी सत्ता की संरचनात्मक नींव को चुनौती देने से परहेज़ किया, बल्कि ब्रिटिश नीतियों को प्रतिनिधिक सहमति का आवरण भी प्रदान किया।

काउंसिलों में अधिक प्रतिनिधित्व की याचिकाएँ, नौकरशाही के भारतीयकरण की माँगें, और प्रभुत्व (डॉमिनियन स्टेटस) के समर्थन में पारित प्रस्ताव, ये सब राज द्वारा तय की गई सीमाओं के भीतर ही व्यक्त किए गए। स्पष्ट है कि कांग्रेस ने क्रमिक सुधार और संयम की अंग्रेज़ी नीति को ही मान लिया। उसने राज को गिराने के बजाय अंग्रेज़ों की इस छवि को मजबूत किया कि वे भारत को धीरे-धीरे आज़ादी की ओर ले जा रहे हैं। इस तरह कांग्रेस औपनिवेशिक “ट्रेनिंग सेंटर” की साझेदार बन गई, जो अभिजात वर्ग को संवैधानिक राजनीति की ओर ढालता था और जनता को आंदोलन से दूर रखता था।

इस प्रकार, जहाँ ब्रिटिश रियायतें नियंत्रण के औज़ार के रूप में बनाई गई थीं, वहीं कांग्रेस की इस ढाँचे के भीतर काम करने की तत्परता ने उन्हें एक स्थायी राजनीतिक रणनीति में बदल दिया। अपने शुरुआती वर्षों में आईएनसी साम्राज्य की चुनौती बनने के बजाय उसका सहायक बनी रही, औपनिवेशिक शासन को स्थिर बनाए रखते हुए, साथ ही भारतीय आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील दिखाने का माध्यम बनी। यही कांग्रेस का विरोधाभास है: वह एक ओर साम्राज्य का “सेफ़्टी वाल्व” थी और बाद में राष्ट्रीय मुक्ति का प्रतीक भी।

अंग्रेज़ों की सबसे भरोसेमंद “राष्ट्रीय” पार्टी

बीसवीं सदी की शुरुआत में कांग्रेस पूरी तरह मध्यमार्गी संवैधानिक ढर्रे में बंधी रही। गोपालकृष्ण गोखले और अन्य अंग्रेज़ी पढ़े नेताओं के प्रभाव में, उसने अपनी माँगें हमेशा ऐसी रखीं जो अंग्रेज़ों को स्वीकार्य हों। उसकी मुख्य माँगें थीं—विधायी परिषदें बढ़ाना, सिविल सेवाओं में भारतीयों की हिस्सेदारी, और कुछ प्रशासनिक सुधार। सबसे ज़्यादा आगे बढ़कर भी कांग्रेस सिर्फ़ डॉमिनियन स्टेटस तक ही पहुँची, यानी कनाडा या ऑस्ट्रेलिया जैसा दर्जा, जिसमें भारत ब्रिटिश क्राउन से जुड़ा रहता पर सीमित स्वशासन पाता। “पूर्ण स्वराज” उस समय कांग्रेस के एजेंडे में था ही नहीं।[9]

यहाँ तक कि 1919 का जलियांवाला बाग़ नरसंहार, जहाँ जनरल डायर के नेतृत्व में ब्रिटिश सैनिकों ने सैकड़ों निहत्थे भारतीयों को गोलियों से भून डाला, भी कांग्रेस की बुनियादी दिशा तुरंत नहीं बदल सका। यह घटना राष्ट्र की अंतरात्मा को झकझोर गई और जनता की नज़र में राज की नैतिकता को पूरी तरह बेनक़ाब कर दिया। फिर भी कांग्रेस की संस्थागत प्रतिक्रिया अजीब तरह से संयमित रही। प्रस्ताव पारित हुए, निंदा की गई, और गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन थोड़े समय के लिए चला, लेकिन पूर्ण स्वतंत्रता की औपचारिक माँग अब भी टाली गई।

इस हिचकिचाहट में कांग्रेस की असलियत झलकती है। जलियांवाला बाग़ ने बता दिया था कि अंग्रेज़ों से समझौता नामुमकिन है। लेकिन कांग्रेस सुधारों और याचिकाओं की अपनी पुरानी राह छोड़ न सकी और स्वतंत्रता की माँग टालती रही। दस साल बाद 1929 में उसने पूर्ण स्वराज को लक्ष्य बनाया। यह देरी इस बात का सबूत थी कि कांग्रेस अंग्रेज़ी ढाँचे को बनाए रखने में शामिल रही। कांग्रेस ने जलियांवाला बाग़ जैसी घटना को असली क्रांति में बदलने का मौका खो दिया, यह बताता है कि वह कितनी गहराई से अंग्रेज़ी तर्कशक्ति में बँधी हुई थी। नरसंहार के तुरंत बाद स्वतंत्रता की माँग न करके उसने जनता के गुस्से को अंग्रेज़ों के लिए खतरा बनने से रोका। इस मायने में कांग्रेस प्रतिरोध से ज़्यादा अंग्रेज़ों की साथी दिखी।

यह संयम केवल सोच तक सीमित नहीं था, बल्कि ढाँचे में भी था। कांग्रेस का सहारा ज़्यादातर शहरों के पढ़े-लिखे, पेशेवर मध्यवर्ग पर था, जिनके लिए राज के भीतर स्थिरता बनाए रखना फ़ायदेमंद था। वे याचिकाएँ और बहस को वैध मानते थे, जबकि बड़े आंदोलन और सीधा टकराव टालते थे। अंग्रेज़ों ने भी इस रवैये को बढ़ावा दिया ताकि यह दिखाया जा सके कि भारत को धीरे-धीरे “ज़िम्मेदारी” के साथ स्वराज दिया जाएगा।

लेकिन कांग्रेस की मध्यमार्गी निति के होते हुए भी एक और मज़बूत राष्ट्रवाद उभरा, जिसका नेतृत्व “लाल-बाल-पाल” यानी लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल ने किया।[10] उन्होंने स्वराज को बुनियादी अधिकार माना, अंग्रेज़ी शासन की अभिभावकता को ठुकराया और बहिष्कार, स्वदेशी व निष्क्रिय प्रतिरोध को अपनाया। उनका राष्ट्रवाद सिर्फ़ सुधारों तक सीमित नहीं था, बल्कि जनभावना और सांस्कृतिक गर्व पर आधारित था। लेकिन कांग्रेस में इन नेताओं को बार-बार दबाया गया। तिलक जेल भेजे गए, लाजपत राय को देश से निकाला गया और उनका आंदोलन अंदरूनी झगड़ों और अंग्रेज़ी दमन से कमजोर हो गया।

अंग्रेज़ों ने राष्ट्रवादी धड़ों के झगड़ों का फायदा उठाया। उन्होंने मध्यमार्गी नेताओं को मान्यता और छिपा समर्थन दिया, ताकि कांग्रेस हमेशा सीमित दायरे में रहे। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस जनता की आवाज़ तो बनना चाहती थी, पर असल में उसकी आकांक्षाओं को ऐसे मोड़ देती थी कि राज पर सीधी चोट न हो। इस तरह कांग्रेस अंग्रेज़ों के लिए भारत में राजनीति संभालने का असरदार औज़ार बन गई।

लाला लाजपत राय की शहादत: आज़ादी के आंदोलन का ऐतिहासिक मोड़

अक्टूबर 1928 में लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शनों के दौरान लाला लाजपत राय पर हुई पुलिस की बर्बर मारपीट ने राष्ट्रवादी संघर्ष की दिशा में निर्णायक मोड़ ला दिया। ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त साइमन कमीशन का उद्देश्य भारत में संवैधानिक प्रगति की समीक्षा करना था, लेकिन इसमें एक भी भारतीय सदस्य न होना भारतीय राजनीतिक आकांक्षाओं का खुला अपमान माना गया। “साइमन गो बैक” के नारों के साथ पूरे देश में विरोध भड़क उठा, जिसने औपनिवेशिक शासन की आधे-अधूरे और एकतरफा सुधारों से बढ़ती मोहभंग को प्रतीकात्मक रूप दिया।

लाहौर में “पंजाब केसरी” कहे जाने वाले प्रतिष्ठित राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय ने इसी प्रकार का एक विरोध नेतृत्व किया। सुपरिटेंडेंट जेम्स ए. स्कॉट के आदेश पर पुलिस ने शांतिपूर्ण जुलूस पर बेरहमी से लाठीचार्ज कर दिया। लाला जी गंभीर रूप से घायल हुए और नवंबर 1928 में उपचार के बावजूद चल बसे। उनकी मृत्यु, जिसे शहादत माना गया, पूरे उपमहाद्वीप में गूँज उठी। यह घटना औपनिवेशिक शासन की हिंसक जिद का प्रतीक बनी और यह साफ़ कर गई कि केवल संवैधानिक तरीक़ों से भारतीय अधिकार सुरक्षित नहीं किये जा सकते।

इस घटना के परिणामस्वरुप एक नई क्रांतिकारी पीढ़ी सामने आई, जिसे ऐसे दमन के सामने संवैधानिक आंदोलन अपर्याप्त लगा। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव और राजगुरु जैसे नेताओं ने राय की मृत्यु को कार्रवाई के आह्वान के रूप में लिया। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का गठन हुआ और इसके बाद कई क्रांतिकारी कार्रवाइयाँ हुईं, जैसे 1928 में स्कॉट समझकर जे.पी. सॉन्डर्स की हत्या और 1929 में केंद्रीय विधान सभा में बम फेंकना। ये कार्रवाइयाँ ब्रिटिश शासन को गिराने की सामर्थ्य तो नहीं रखती थीं, लेकिन उन्होंने जनता की कल्पना को जगाया, राष्ट्रवादी आंदोलन को नाटकीय रूप दिया और साम्राज्यवादी सत्ता की नैतिक दिवालियापन को उजागर किया।

क्रांतिकारी राष्ट्रवाद पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर उसकी अंग्रेज़ी सत्ता से नरम रवैया उजागर किया। 1931 में भगत सिंह की फाँसी पर हर ओर दया याचिकाएँ उठीं। कांग्रेस चाहती तो इस मौके पर मजबूती से खड़ी हो सकती थी। लेकिन गांधी ने इरविन समझौते में सज़ा कम करने की माँग से इनकार कर दिया। उन्होंने निजी सहानुभूति जताई, मगर कहा कि दबाव डालने से समझौता बिगड़ सकता है।

कांग्रेस का यह रुख उसकी मूल प्रवृत्ति को दिखाता है। क्रांतिकारी ऊर्जा राज को कमजोर कर सकती थी, पर कांग्रेस ने टकराव के बजाय समझौता चुना। गांधी ने भगत सिंह के लिए सख़्त दबाव नहीं बनाया, यह उनके अकेले का फ़ैसला नहीं था, बल्कि कांग्रेस की सोच का हिस्सा था। समकालीनों और आलोचकों ने इसे कांग्रेस की वह भूमिका माना, जहाँ उसने आंदोलन की अगुवाई करने की जगह उसे धीमा किया।

इसका असर ब्रिटिशों पर भी गहरा पड़ा। साइमन कमीशन विरोध और लाजपत राय की मौत ने दिखा दिया कि भारतीय राजनीति को हमेशा सीमित रास्तों में नहीं रखा जा सकता। युवाओं के आंदोलनों ने नया माहौल बना दिया। पर जहाँ क्रांतिकारी डटे थे, वहीं कांग्रेस बातचीत में अटकी रही। गांधी का भगत सिंह के लिए दया न माँगना इसी विरोधाभास की मिसाल था। इस तरह लाजपत राय की शहादत ने कांग्रेस की नियंत्रित राजनीति और कट्टर राष्ट्रवाद के बीच की दरार उजागर कर दी। यही दरार अंग्रेज़ों को आज़ादी की दिशा और रफ़्तार तय करने का मौका देती रही।

तिरंगे के नीचे ब्रिटिश राज 2.0 

1947 में जब आज़ादी मिली, तब तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कायाकल्प हो चुका था—कमाल यह कि “ब्रिटिश स्वीकृत संस्था” के रूप में उसकी पैदाइश का असर उसके स्वभाव से कभी गया ही नहीं। कांग्रेस भले ही स्वतंत्रता आंदोलन की आधिकारिक मशाल बनने लगी हो, लेकिन उसने अंग्रेज़ों की बनाई वैचारिक और संस्थागत जंजीरों को पूरे गर्व से पहनना जारी रखा। केंद्रीकृत प्रशासन, भारी-भरकम नौकरशाही और कठोर नियंत्रण—जो कभी साम्राज्य की ताक़त थे—आज़ादी के बाद भी बिल्कुल जस के तस रखे गए। सुधार करने का अवसर मिला भी तो कांग्रेस नेतृत्व ने बड़ी शालीनता से कहा, “धन्यवाद, हमें आपकी पुरानी व्यवस्था ही पसंद है।” नतीजा यह हुआ कि जो ढाँचे कभी औपनिवेशिक प्रभुत्व के आधार थे, वही नए तिरंगे के नीचे भी गर्व से चलते रहे।[11]

कांग्रेस नेतृत्व की मानसिकता भी ध्यान देने योग्य थी। वे अंग्रेज़ियत से प्रभावित, अभिजनवादी सोच वाले और भारतीय जीवन से अलग-थलग थे। इसलिए शासन का वही मॉडल बना रहा जो औपनिवेशिक काल में था। लोकतंत्र सिर्फ़ भाषा में था, लेकिन असल में सत्ता केंद्रीकृत रही और जनता की भूमिका सीमित। आज़ाद भारत ने भी राजद्रोह और प्रेस की पाबंदियों जैसे कड़े औज़ार अपना लिए।[12]

आज़ादी के बाद कांग्रेस ने औपनिवेशिक ढाँचे को खत्म करने के बजाय उसे ही तिरंगे के नीचे आगे बढ़ाया। योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था, नौकरशाही का असर और केंद्रीकरण इसकी पहचान बने। भारत ने राष्ट्रमंडल में रहते हुए ब्रिटिश सम्राट को प्रतीकात्मक प्रमुख माना, जिससे दिखा कि राज से पूरी दूरी बनाने की हिम्मत नहीं थी। इसे कूटनीति कहा गया, पर असल में यह औपनिवेशिक मनोवृत्ति की छाया थी। भारत की संप्रभुता और डीकोलोनाइज़ेशन दोनों अधूरे ही रहे।

आज़ादी के बाद डीकोलोनाइज़ेशन से उम्मीद थी कि राजनीति के साथ-साथ संस्कृति और सभ्यता की सोच बदलेगी और संस्थाएँ नए ढाँचे पाएँगी। लेकिन कांग्रेस की औपनिवेशिक मानसिकता के कारण यह वादा कभी पूरा नहीं हो पाया।

आज़ादी: नाम बदलकर वही पुरानी दुकान

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की यात्रा आधुनिक भारत के इतिहास में एक गहरे विरोधाभास को समेटे हुए है। 1885 में ब्रिटिश संरक्षण में एक संस्थागत “सेफ़्टी वाल्व” के रूप में इसकी परिकल्पना की गई थी, ताकि राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को संवैधानिक ढाँचों में क़ैद किया जा सके जो साम्राज्यवादी प्रभुसत्ता को चुनौती न दें। समय के साथ, कांग्रेस राजनीतिक लामबंदी का प्रमुख मंच बनी और अंततः 1947 में देश को स्वतंत्रता दिलाई। फिर भी, उसकी औपनिवेशिक उत्पत्ति की छाप उसके ढांचे, विचारधारा और कार्यशैली में गहराई से अंकित रही।[13]

कांग्रेस का रवैया शुरुआत से ही ब्रिटिश स्वीकृति पर निर्भर था और उसके नेता ज़्यादातर अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे अभिजात वर्ग से थे। इस कारण कांग्रेस ने क्रांति की जगह सुधार और संवैधानिक माँगों पर ज़ोर दिया। बाद में उसने पूर्ण स्वराज की बात तो की, लेकिन उसे हासिल करने के लिए जिन तरीक़ों और संस्थाओं का इस्तेमाल हुआ, वे औपनिवेशिक ढाँचे से ही लिए गए थे।

आज़ादी के बाद भी यही ढर्रा जारी रहा। कांग्रेस ने अंग्रेज़ों की बनाई नौकरशाही, केंद्रीकृत सत्ता और राजद्रोह जैसे कड़े क़ानूनों को बनाए रखा। इससे भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन शासन की बुनियादी संरचना औपनिवेशिक ही रही।

इतिहास में अक्सर कांग्रेस को स्वतंत्रता आंदोलन की नायक पार्टी के रूप में देखा जाता है। राष्ट्रवादी इसे एकजुटता का प्रतीक बताते हैं और उदारवादी उसकी लोकतांत्रिक सोच की तारीफ़ करते हैं। मगर सही मायनों में कांग्रेस ने औपनिवेशिक ढाँचों को तोड़ा नहीं, बल्कि उन्हें नया रूप देकर आगे बढ़ाया। इसलिए 1947 में सत्ता तो भारतीय हाथों में आई, लेकिन औपनिवेशिक संस्थाएँ और सोच क़ायम रहीं। यही अधूरापन आज भी भारत की राजनीति और समाज को प्रभावित करता है।

आख़िर में, कांग्रेस की कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि अंग्रेज़ों की बनाई संस्थाओं को जस का तस अपनाने की कीमत क्या रही? सत्ता तो मिल गई, पर सभ्यता और आत्मबोध का हिसाब कौन देगा? और हाँ, जब किसी देश की बुनियादी नींव उसी ताक़त ने रखी हो जिसे उसने गर्व से उखाड़ फेंकने का दावा किया था, तो क्या वह सच में “आज़ाद” कहलाने का हक़दार है? ये सवाल सिर्फ़ इतिहास की किताबों के पन्ने नहीं सजाते, बल्कि आज तक यह याद दिलाते हैं कि हमारा डीकोलोनाइज़ेशन अधूरा है—और शायद जानबूझ कर अधूरा रखा गया है।

सन्दर्भ सूची

[1] Thomas R. Metcalf. The Aftermath of Revolt: India, 1857–1870. Princeton: Princeton University Press, 1964; https://archive.org/details/aftermathofrevol0000metc

[2] S. Natarajan. A History of the Press in India. Bombay: Asia Publishing House, 1962; https://archive.org/details/dli.ernet.148434/page/85/mode/2up

[3] S.R. Mehrotra. The Emergence of the Indian National Congress. Delhi: Vikas Publishing, 1971; The emergence of the Indian National Congress : Mehrotra, S. R., 1931- : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive

[4] Rudrangshu Mukherjee. Awadh in Revolt, 1857–1858: A Study of Popular Resistance. Delhi: Oxford University Press, 1984; https://archive.org/details/awadhinrevolt1850000mukh/page/n5/mode/2up

[5] B.D. Mahajan. The Indian National Congress: An Historical Sketch. Agra: Lakshmi Narain Agarwal, 1969; https://archive.org/details/indiannationalco00madrrich

[6] Vinayak Damodar Savarkar. The Indian War of Independence of 1857. Bombay: Veer Savarkar Prakashan, 1909; https://dn790006.ca.archive.org/0/items/indianwarofindep00vina/indianwarofindep00vina.pdf

[7] Bipan Chandra. India’s Struggle for Independence, 1857–1947. Delhi: Penguin, 1989; https://archive.org/details/indias-struggle-for-independence_202106

[8] Anil Seal. The Emergence of Indian Nationalism: Competition and Collaboration in the Later Nineteenth Century. Cambridge: Cambridge University Press, 1968; https://archive.org/details/emergenceofindia0000seal

[9] Stanley Wolpert. Tilak and Gokhale: Revolution and Reform in the Making of Modern India. Berkeley: University of California Press, 1962; https://archive.org/details/tilakgokhalerevo0000wolp/page/n7/mode/2up

[10] Lala Lajpat Rai. Young India: An Interpretation and a History of the Nationalist Movement from Within. New York: Macmillan, 1916; https://archive.org/details/16RaiYoungindia

[11] Partha Chatterjee. Nationalist Thought and the Colonial World: A Derivative Discourse? London: Zed Books, 1986; https://archive.org/details/nationalistthoug0000chat

[12] Bipan Chandra. Indian National Movement: The Long-Term Dynamics. New Delhi: Vikas, 1988; https://annas-archive.org/oclc/925189530

[13] Shashi Tharoor. Inglorious Empire: What the British Did to India. London: Hurst, 2017; https://archive.org/details/inglorious-empire

Aditi Joshi
Aditi Joshi
Aditi Joshi is a Delhi-based history graduate, researcher, writer, content strategist, and cultural commentator focused on reclaiming Indic civilizational perspectives and historical accuracy. She is the Founder of Itihasdhir (इतिहासधीर), launched in 2023, a platform for thoughtful discussions on Indian history, historians’ influence, book reviews, scholar interviews, and forgotten aspects of Bharat’s past. Currently, she serves as Content Manager at Upword Foundation, contributing to content strategy and creation on cultural, historical, and societal topics aligned with Indic values. An aligned effort of the Upword Foundation and Itihasdhir is a bookclub namely, Bookmarkers. A passionate folklore enthusiast, she is also an artist and translator, blending creativity with scholarship to highlight India’s cultural depth and challenge misrepresentations. Her work addresses colonial distortions of Hindu Dharma, erasure of symbols, caste narratives, and Sanātana traditions’ survival.
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