ऑपरेशन सिंदूर के बाद: राष्ट्रवाद का उभार और वामपंथी प्रपंचों की पोल

  • ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत में एक अहम बदलाव दिख रहा है। अब भारतीय लोग अपने निजी और व्यावसायिक हितों को देशहित से जोड़ने लगे हैं।
  • यह नई राष्ट्रवादी भावना वामपंथी के लिए बड़ी चुनौती बन गई है, जिसने वर्षों से राजनीति, समाज, शिक्षा और संस्कृति को नुकसान पहुँचाया है।
  • सोशल मीडिया पर #BoycottTurkey और #BoycottAzerbaijan जैसे ट्रेंड छाए हुए हैं, और लोग टर्की के उत्पादों और सेवाओं का जोर शोर से विरोध कर रहे हैं।
  • यह उभरता राष्ट्रवाद उन भारतीय अरबपतियों के लिए भी एक चेतावनी है, जिन्होंने अनजाने या जानबूझकर भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी एजेंडा चलाने वालों को आर्थिक मदद दी है।
  • भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत चेतना का यह पुनर्जागरण नागरिकों को “राष्ट्र प्रथम” की भावना के साथ एक अनौपचारिक रणनीतिक प्रतिनिधि बनने की प्रेरणा दे रहा है।

 ऑपरेशन सिंदूर स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित हो रहा है। यह कई ऐसी ऐतिहासिक घटनाओं की शुरुआत है जो पहले कभी नहीं हुईं। 1947 के बाद पहली बार भारत ने सीमा पार आतंकवाद का सीधा और सख्त सैन्य जवाब दिया। इससे भी ज़्यादा अहम बात यह थी कि भारत ने अब साफ़ कर दिया कि आतंकवाद को युद्ध की तरह माना जाएगा, और इसका जवाब भी उसी तरह दिया जाएगा।

लेकिन इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी बात यह रही कि इसने पूरे देश को एक साथ जोड़ दिया। हर क्षेत्र के लोग राष्ट्रवाद के विचार पर एकजुट हुए। यह भारत के सांस्कृतिक सोच में एक बड़ा बदलाव दिखाता है। आम तौर पर किसी देश पर खतरे के समय जनता का एकजुट होना स्वाभाविक है, लेकिन भारत में यह खास है क्योंकि लंबे समय से यहाँ वामपंथी सोच ने सार्वजनिक बहसों को चलाया है, जो अक्सर राष्ट्रवाद पर सवाल उठाती रही है। इन विचारों ने देशभक्ति को संदेह से देखा है, और युवाओं में इसे लेकर भ्रम फैलाया है। उन्होंने राष्ट्रवाद को कट्टर सोच, पुरुषवादी रवैया या ‘हिंदुत्व वर्चस्ववाद’ बताकर मज़ाक उड़ाया है।[1] ऐसे माहौल में ऑपरेशन सिंदूर के बाद नागरिकों में राष्ट्र के लिए जो भावनात्मक उछाल आया है, वह बहुत मायने रखता है।

अब लोग अपने निजी और व्यावसायिक फैसले भी देश हित को ध्यान में रखकर लेने लगे हैं। यह बदलाव वामपंथी समूह के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, जिसने सालों से राजनीति, शिक्षा, संस्कृति और समाज में अपनी गहरी पकड़ बनाई हुई थी। पिछले दशक में हिंदू पुनर्जागरण और भारत की प्राचीन सभ्यता के मूल्यों की वापसी ने “राष्ट्र प्रथम” पर आधारित एक नया सांस्कृतिक राष्ट्रवाद खड़ा किया है। यह सोच अब उस उपनिवेशी मानसिकता को पीछे छोड़ रही है, जो कभी भारतीय पहचान को नियंत्रित करती थी। इस नए राष्ट्रवाद ने लोगों में भारतीय संस्कृति और विरासत के प्रति गर्व पैदा किया है। अब नागरिक खुद को राष्ट्र के हितों के लिए जिम्मेदार मानने लगे हैं। इसलिए यह स्वभाभिक सी बात है कि यह राष्ट्रवादी जागरूकता वामपंथी वर्ग को परेशान कर रही है। अब सवाल यह है—क्या यह राष्ट्रवाद सिर्फ एक तात्कालिक भावना है, या यह भारत-विरोधी सोच को चुनौती देने वाली एक स्थायी शक्ति बनकर उभरेगा?

आगे हम देखेंगे कि किस तरह भारतीय समाज में लोग राष्ट्र की एकता और संप्रभुता के समर्थन में खड़े हो रहे हैं—और कैसे यह जागरूकता भारत विरोधी आख्यानों को जड़ से मिटा सकती है।

जब भारतीय उपभोक्ता खड़े हुए राष्ट्र के साथ

 भारत में इस समय एक नया, मज़बूत राष्ट्रवादी आंदोलन उभर रहा है, जो तुर्की और अज़रबैजान से आने वाली वस्तुओं और सेवाओं के बहिष्कार की मांग कर रहा है। यह आंदोलन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को तुर्की द्वारा दिए गए खुले समर्थन के विरोध में खड़ा हुआ है। भारतीयों ने इसे अपमान के रूप में लिया है, और अब देश भर में कंपनियाँ, व्यापारी और उपभोक्ता इस बहिष्कार में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रहे हैं।

इस राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया का सबसे तेज़ असर पर्यटन उद्योग पर पड़ा है। तुर्की और अज़रबैजान, जो पहले भारतीय यात्रियों के बीच लोकप्रिय थे, अब बड़े पैमाने पर रद्दीकरण और बुकिंग में गिरावट का सामना कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मेकमायट्रिप को सिर्फ एक हफ्ते में तुर्की और अज़रबैजान के लिए की गई बुकिंग्स में 60 प्रतिशत तक गिरावट देखने को मिली, जबकि रद्दीकरण 250 प्रतिशत तक बढ़ गए। इसके जवाब में कंपनी ने दोनों देशों से जुड़े सभी प्रचार बंद कर दिए हैं। EaseMyTrip ने भी यही रुझान देखा, जहाँ तुर्की की यात्रा बुकिंग में 22 प्रतिशत और अज़रबैजान के लिए 30 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। कंपनी ने दोनों देशों के लिए अपनी सभी फ्लाइट और होटल बुकिंग्स अस्थायी रूप से बंद कर दी हैं और ग्राहकों को सलाह दी है कि जब तक बहुत ज़रूरी न हो, इन जगहों की यात्रा से बचें। इसी तरह, ट्रैवल प्लेटफ़ॉर्म इक्सिगो ने भी तुर्की, अज़रबैजान और चीन के लिए सभी बुकिंग्स रोक दी हैं। इक्सिगो के सीईओ आलोक बाजपेयी ने इस भावना को X (पूर्व में ट्विटर) पर व्यक्त करते हुए लिखा: “बस बहुत हो गया! खून और बुकिंग एक साथ नहीं बह सकते। हम इक्सिगो पर तुर्की, चीन और अज़रबैजान के लिए सभी उड़ान और होटल बुकिंग्स निलंबित कर रहे हैं।”

यह आंदोलन अब सिर्फ एक आर्थिक बहिष्कार नहीं रह गया है। यह उस बदलते भारत का संकेत है जहाँ आम नागरिक भी अब अपने फैसलों में देशहित को सर्वोपरि मानने लगे हैं। यह राष्ट्रवादी चेतना धीरे-धीरे एक शक्तिशाली जन-आंदोलन का रूप लेती जा रही है।[2] [3] कई भारतीय ट्रैवल प्लेटफॉर्म्स ने तुर्की और अज़रबैजान के लिए नई बुकिंग्स को या तो अस्थायी रूप से रोक दिया है या यात्रियों को सलाह दी है कि वे इन देशों की यात्रा तभी करें जब वह बेहद ज़रूरी हो। उल्लेखनीय बात यह है कि ये फ़ैसले किसी सरकारी आदेश के तहत नहीं, बल्कि स्वयं प्लेटफॉर्म्स द्वारा लिए गए हैं। यह कदम उन विदेशी नीतियों के विरोध में उठाया गया है जिन्हें भारत विरोधी माना जा रहा है, और यह एक स्वैच्छिक, राष्ट्रवादी सोच को दर्शाता है जिसमें व्यावसायिक हितों से ऊपर राष्ट्रीय सम्मान को प्राथमिकता दी जा रही है।[4]

भारतीय व्यवसायों का यह राष्ट्रवादी रुख केवल कंपनियों का निर्णय नहीं है, बल्कि वह व्यापक जनभावना का भी प्रतिबिंब है जो इस समय पूरे देश में उफान पर है। सोशल मीडिया पर #BoycottTurkey और #BoycottAzerbaijan जैसे ट्रेंड तेजी से फैल रहे हैं, जिनमें उपभोक्ताओं और व्यवसायों से अपील की जा रही है कि वे तुर्की और अज़रबैजान से आने वाले उत्पादों और सेवाओं का पूरी तरह से बहिष्कार करें। यह जनआंदोलन दर्शाता है कि भारत में राष्ट्रवाद की एक नई और अभूतपूर्व लहर उठ चुकी है, जिसकी तीव्रता ने वामतंत्र को स्पष्ट रूप से असहज कर दिया है।

इस लहर की गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महसूस की जा रही है। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने अपने एक लेख में भारत में बढ़ते बहिष्कार आंदोलन पर चिंता जताई है। लेख में बताया गया है कि किस तरह तुर्की और अज़रबैजानी वस्तुओं और पर्यटन सेवाओं के खिलाफ देश भर में विरोध तेज़ हो गया है। विश्लेषकों के हवाले से यह भी कहा गया कि यह बहिष्कार, पाकिस्तान को दिए गए दोनों देशों के हालिया समर्थन के जवाब में, उपभोक्ता-नेतृत्व वाली कूटनीति के रूप में देखा जा रहा है, जो एक नया और सशक्त राजनीतिक-सांस्कृतिक संकेत है कि अब भारतीय जनमत अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात मनवाने के लिए आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भी निर्णायक भूमिका निभाने लगा है।”[5]

आर्थिक राष्ट्रवाद के एक प्रभावशाली और संगठित प्रदर्शन में, भारत के 125 से अधिक प्रमुख व्यापार नेताओं ने तुर्की और अज़रबैजान के साथ सभी प्रकार की यात्रा, व्यापारिक और सांस्कृतिक भागीदारी का पूर्ण बहिष्कार करने की घोषणा की है। यह फैसला कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय व्यापार सम्मेलन में सर्वसम्मति से पारित एक प्रस्ताव के बाद लिया गया। CAIT ने केवल व्यापारिक रिश्तों तक सीमित न रहते हुए भारतीय फिल्म उद्योग से भी अनुरोध किया है कि वह इन दोनों देशों में शूटिंग से परहेज करे। यह आह्वान आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में एकजुटता का सीधा संकेत है। CAIT के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने बयान दिया, “यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि तुर्की और अज़रबैजान, जो पहले भारत की मित्रता, सहायता और रणनीतिक समर्थन से लाभान्वित होते रहे हैं, अब संकट के समय पाकिस्तान का साथ दे रहे हैं—ऐसे देश का, जिसकी पहचान वैश्विक आतंकवाद के समर्थक के रूप में स्थापित है।” खंडेलवाल ने यह भी स्पष्ट किया कि इन देशों का यह रुख न सिर्फ भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है, बल्कि यह 140 करोड़ भारतीयों की भावनाओं का भी अपमान है।[6]

तुर्की के उत्पादों की एक लंबी सूची अब भारतीय बाजारों में सवालों के घेरे में है, क्योंकि व्यापारी संगठनों ने बहिष्कार के आह्वान पर ठोस कार्रवाई शुरू कर दी है। All-India Consumer Products Distributors Federation ने तुर्की से आयातित उपभोक्ता वस्तुओं का “अनिश्चितकालीन और पूर्ण बहिष्कार” घोषित किया है। इस बहिष्कार में चॉकलेट, जैम, वेफ़र, चाय, कॉफ़ी, कुकीज़ और पैकेज्ड मिठाइयाँ जैसी रोज़मर्रा की चीज़ें शामिल हैं, जो भारतीय बाजारों में पहले काफ़ी लोकप्रिय थीं। इस अभियान से सबसे अधिक असर तुर्की से आयात किए जाने वाले सेबों पर पड़ा है। देश भर के फल व्यापारियों ने सामूहिक रूप से इन सेबों को बाजार से हटा दिया है। इसके परिणामस्वरूप उपभोक्ताओं की मांग अब वैकल्पिक स्रोतों जैसे वाशिंगटन, न्यूज़ीलैंड और ईरान के सेबों की ओर मुड़ रही है, ताकि आयातित गुणवत्ता की अपेक्षाएँ बनी रहें। यह केवल आर्थिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि एक संगठित और स्पष्ट संदेश है कि भारत अब उन देशों के उत्पादों को स्वीकार नहीं करेगा, जो उसकी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों के विरोध में खड़े होते हैं।[7] [8] मार्बल एक और तुर्की आयात है जिस पर बहिष्कार से गंभीर असर पड़ने की उम्मीद है। 125 मार्बल फर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले उदयपुर मार्बल प्रोसेसर्स एसोसिएशन ने सरकार से तुर्की के मार्बल आयात को तुरंत रोकने की मांग की है। वर्तमान में भारत द्वारा आयात किए जाने वाले मार्बल का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा तुर्की से आता है।[9]

तुर्की के उत्पादों और सेवाओं का बहिष्कार करने का आंदोलन शिक्षा क्षेत्र में भी ज़ोर पकड़ रहा है। आईआईटी बॉम्बे, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, आईआईटी रुड़की और कानपुर विश्वविद्यालय सहित कई भारतीय विश्वविद्यालयों ने तुर्की संस्थानों के साथ अपनी शैक्षणिक साझेदारी को निलंबित या समाप्त कर दिया है।[10]

एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन सिक्योरिटी (BCAS) ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के मद्देनज़र सेलेबी और उसकी सहयोगी कंपनियों की सुरक्षा मंजूरी रद्द कर दी है। सेलेबी एविएशन भारत भर में नौ प्रमुख हवाई अड्डों पर ग्राउंड हैंडलिंग सेवाएँ प्रदान करता है, जिनमें मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, गोवा, हैदराबाद, अहमदाबाद और चेन्नई शामिल हैं।[11] भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान तुर्की द्वारा पाकिस्तान को दिये गये रक्षा और रणनीतिक समर्थन को देखते हुए, प्रमुख भारतीय शहरों में हवाई अड्डों के संचालन के प्रबंधन में तुर्की की कंपनी की भागीदारी गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को जन्म देती है।

हालांकि भारत सरकार ने अभी तक तुर्की के साथ व्यापार पर कोई आधिकारिक रुख नहीं अपनाया है, लेकिन छोटे किराना स्टोरों से लेकर बड़ी कंपनियों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स तक के सभी व्यवसाय स्वतंत्र रूप से तुर्की के आयातों का बहिष्कार कर रहे हैं। All-India Consumer Products Distributors Federation (AICPDF) — जो देशभर में करीब 1.3 करोड़ किराना दुकानों को उत्पादों की आपूर्ति करता है — ने तुर्की के सामानों का “अनिश्चितकालीन और पूर्ण बहिष्कार” घोषित कर दिया है। यह फैसला सिर्फ प्रतीकात्मक विरोध नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक और व्यापक आर्थिक दबाव बनाने की रणनीति है। AICPDF का अनुमान है कि इस खुदरा प्रतिबंध से तुर्की से आयातित खाद्य उत्पादों की बिक्री पर लगभग 234 मिलियन डॉलर का सीधा असर पड़ेगा। चूंकि भारत हर साल तुर्की से करीब 2.7 बिलियन डॉलर का सामान आयात करता है, यह बहिष्कार तुर्की के व्यापारिक हितों पर गहरी चोट पहुंचा सकता है।[12]

न्यूज़18 के एक ताज़ा लेख से संकेत मिलता है कि तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तय्यप एर्दोआन भी जल्द ही मालदीव के राष्ट्रपति मुइज़ू जैसी स्थिति का सामना कर सकते हैं, क्योंकि भारत में #BoycottTurkey आंदोलन तेज़ी से ज़ोर पकड़ रहा है। लेख में मौजूदा तुर्की-विरोधी भावना और हाल ही में मालदीव के खिलाफ हुए बहिष्कार अभियान के बीच स्पष्ट समानताएं बताई गई हैं। मालदीव के मामले में बहिष्कार की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी की लक्षद्वीप यात्रा के बाद हुई थी, जब मालदीव के कुछ नेताओं द्वारा की गई नस्लवादी और भारत-विरोधी टिप्पणियों से भारतीयों में आक्रोश फैल गया था। इसके जवाब में भारतीय उपभोक्ताओं और ट्रैवल प्लेटफॉर्म्स ने मालदीव के पर्यटन उद्योग का तीखा बहिष्कार किया था, जिससे द्वीप राष्ट्र की अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ा और वहां की सरकार को झटका लगा।

लेख में यह अंदेशा जताया गया है कि तुर्की भी अब उसी राह पर बढ़ रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की द्वारा पाकिस्तान को दिए गए समर्थन के बाद भारतीय नागरिक अपने आर्थिक फैसलों को राष्ट्रहित से जोड़ते हुए तुर्की के पर्यटन, उत्पादों और सेवाओं से दूरी बना रहे हैं। यह उभरता हुआ आर्थिक राष्ट्रवाद न केवल तुर्की की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुँचा सकता है, बल्कि इसके व्यापारिक हितों पर भी सीधा असर डाल सकता है।[13]

राष्ट्रवाद की लहर पर वामपंथी बेचैनी

“अंगूर खट्टे हैं” वाली कहावत को बिल्कुल सटीक ढंग से चरितार्थ करते हुए, वामपंथी गुट भारत में उभरते राष्ट्रवाद और जनता के गर्वपूर्ण स्वाभिमान से visibly असहज दिखाई दे रहा है। #BoycottTurkey जैसे आंदोलनों की तेज़ लहर ने न केवल विदेशी हितों को झटका दिया है, बल्कि देश के भीतर उन विचारधाराओं को भी बेनकाब कर दिया है जो हर राष्ट्रवादी कदम को संदेह की नज़र से देखती हैं।

इस असहजता का एक मज़ेदार उदाहरण तब देखने को मिला जब कांग्रेस नेता जयराम रमेश और पवन खेड़ा से मीडिया ने तुर्की के बहिष्कार पर उनकी राय पूछी। दोनों नेता सवाल से बचने की हड़बड़ी में इतने उलझे कि कैमरे के सामने एक-दूसरे को माइक पकड़ाते नज़र आए—एक ऐसा दृश्य जो न केवल हास्यास्पद था बल्कि यह भी दर्शाता है कि राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर इन नेताओं के पास कहने को कुछ ठोस नहीं होता।[14]

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारत भर में #BoycottTurkey आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा था, तब वामपंथी और उदारवादी गुटों की बेचैनी साफ़ दिखाई देने लगी। पाकिस्तान को तुर्की के समर्थन पर भारतीय जनता ने जहाँ कड़ा विरोध दर्ज किया, वहीं वामपंथी वर्ग ने इसे राष्ट्रवाद का “अत्यधिक प्रदर्शन” कहकर खारिज करने की कोशिश की। कुछ ने तो खुलकर अपने “नवोदित तुर्की प्रेम” का प्रदर्शन शुरू कर दिया—किसी ने तुर्की के व्यंजन पोस्ट किए, तो किसी ने वहाँ के पर्यटन स्थलों की तारीफ़ करते हुए इस आर्थिक राष्ट्रवादी बहस को हल्का दिखाने का प्रयास किया। दूसरी ओर, कुछ वामपंथियों ने चतुराई से विषय को भटकाने के लिए यह तर्क दिया कि “अगर आप सच्चे राष्ट्रवादी हैं तो फिर चीनी उत्पादों का भी बहिष्कार क्यों नहीं कर रहे?” इस तरह की तुलना तर्कहीन और रणनीतिक थी—जिसका उद्देश्य तुर्की के बहिष्कार की वैधता को कमजोर करना और जनभावनाओं का उपहास उड़ाना था।

ऑपइंडिया द्वारा प्रकाशित एक लेख में इन प्रतिक्रियाओं की गहराई से पड़ताल की गई है। लेख में कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स का उल्लेख किया गया है, जो वाम-उदारवादी सोच की दोहरी मानसिकता को उजागर करती हैं—एक तरफ़ वे पाकिस्तान समर्थक देशों के खिलाफ उठ रही जनता की आवाज़ को दबाना चाहते हैं, और दूसरी ओर राष्ट्रवाद को हमेशा शंका की निगाह से देखते हैं।[15]

“तुर्की का बहिष्कार करने वाले सभी लोगों को चीन के बारे में भी याद दिलाना चाहती हूँ, जिसकी पाकिस्तान में बड़ी भूमिका और प्रभाव है। कृपया सभी चीनी सामानों का बहिष्कार करें और सुनिश्चित करें कि आप केवल वही सामान खरीदें जो चीन में नहीं बना है। बस यूँ ही कह रही हूँ”। (सबा नकवी ‘X’ पर)

इसी तरह एमनेस्टी इंडिया के पूर्व प्रमुख आकार अहमद पटेल ने ‘X’ पर लिखा: “सोच रहा हूं कि टर्की की यात्रा करूं”।

एक अन्य ‘X’ यूज़र ने तुर्की के उत्पादों और सेवाओं का बहिष्कार करने वाले भारतीयों को शर्मिंदा करने के लिए “बॉयकॉट चाइना” का नारा लगाया: “तुर्की और चीन दोनों ने पाकिस्तान का समर्थन किया। चीन ने लड़ाकू विमान, ड्रोन, और भारतीय लड़ाकू विमानों से जुड़ी ख़ुफ़िया जानकारी और उपग्रह डेटा सप्लाई किया, लेकिन भक्त केवल तुर्की का बहिष्कार करना चाहते हैं, चीन का नहीं। क्या कारण है??” (‘X’ पर सुरभि)

वामपंथी-उदारवादी गुट ने #BoycottTurkey और #BoycottAzerbaijan जैसे आंदोलनों को चालाकी से एक “दक्षिणपंथी कट्टरता” के रूप में चित्रित किया है। लेकिन यह प्रतिक्रिया खुद में एक गहरे वैचारिक पूर्वाग्रह को उजागर करती है—एक ऐसा दृष्टिकोण जो राष्ट्रवाद, देशभक्ति और सांस्कृतिक गौरव को लगातार असहिष्णुता, फासीवाद या युद्धोन्माद के रूप में प्रस्तुत करता आया है। हकीकत यह है कि इन बहिष्कार आह्वानों को समर्थन केवल किसी एक राजनीतिक वर्ग से नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने से मिला है—उन भारतीयों से जो चाहे जिस भी वैचारिक पृष्ठभूमि से हों, पर राष्ट्रीय स्वाभिमान और संप्रभुता के मुद्दों पर एकजुट खड़े हैं। यह बात शायद उस वैचारिक तंत्र को सबसे ज़्यादा खल रही है, जो भारत-विरोधी आख्यानों को स्थापित करने और राष्ट्रवाद को बदनाम करने की वर्षों से कोशिश करता रहा है। अब जब एक सशक्त और आत्मविश्वासी राष्ट्रवादी विमर्श जड़ें जमा रहा है, तो यह वर्ग खुद को असहाय महसूस कर रहा है।

इसी विमर्श में सबसे बड़ा पाखंड बॉलीवुड की ओर से देखने को मिला है। देश के कई ए-लिस्ट अभिनेता और अभिनेत्री ऑपरेशन सिंदूर जैसे ऐतिहासिक सैन्य अभियान के दौरान पूरी तरह चुप रहे। उन मुट्ठीभर हस्तियों ने जो सोशल मीडिया पर कुछ कहा भी, उनकी पोस्ट्स अधिकतर जनता की प्रतिक्रिया और ट्रोलिंग के दबाव में की गई प्रतीत हुईं—जैसे कि यह कोई ईमानदार देशप्रेम नहीं, बल्कि छवि बचाने का प्रयास हो। एक विशेष उदाहरण आमिर खान का है, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर पर एक शब्द तक नहीं कहा। लेकिन जैसे ही उनकी फिल्म सितारे ज़मीन पर की रिलीज़ नज़दीक आई, उनकी सोशल मीडिया टीम ने अचानक सेना की तारीफ़ में पोस्ट डालने शुरू कर दिए। यह स्पष्ट रूप से एक रणनीतिक कदम था, न कि सच्ची देशभक्ति।[16]

सितारे ज़मीन पर  इस समय आलोचना के घेरे में है, और भारत में कई नेटिज़न्स ने इसके बहिष्कार का आह्वान शुरू कर दिया है। यह गुस्सा अचानक नहीं आया, बल्कि उनके पुराने व्यवहार और हालिया चुप्पी का नतीजा है—खासकर तुर्की को लेकर उनकी संदिग्ध नरमी के संदर्भ में। भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव के दौरान खान की चुप्पी, और तुर्की के पाकिस्तान के पक्ष में खड़े होने पर उनका कोई स्पष्ट बयान न देना, कई लोगों को खटक गया है। इसी बीच, 2020 में तुर्की की प्रथम महिला एमीन एर्दोआन के साथ उनकी मुलाकात का एक पुराना वीडियो फिर से सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। यह मुलाकात उस समय लाल सिंह चड्ढा के प्रचार के दौरान हुई थी, जब तुर्की ने कश्मीर पर भारत-विरोधी रुख अपनाया था और भारत-तुर्की संबंध बेहद तनावपूर्ण थे। उस समय भी आमिर खान को आलोचना झेलनी पड़ी थी कि वे ऐसे समय में एक ऐसे देश की मेज़बानी क्यों स्वीकार कर रहे हैं, जो भारत के संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर पाकिस्तान का समर्थन कर रहा है। अब, ऑपरेशन सिंदूर के बाद देश में जो राष्ट्रवादी माहौल बना है, उसमें यह पुराना प्रकरण फिर से लोगों के गले नहीं उतर रहा।

सितारे ज़मीन पर अब सिर्फ एक फिल्म नहीं रही—यह उस बड़ी बहस का प्रतीक बन गई है जिसमें जनता उन चेहरों और संस्थाओं को जवाबदेह ठहराना चाहती है जो देश के आत्मसम्मान पर चुप्पी साधे रहते हैं लेकिन संकट के समय “छवि प्रबंधन” के लिए देशभक्ति का चोंगा पहन लेते हैं।[17]

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि अधिकांश बॉलीवुड हस्तियों – विशेष रूप से ए-लिस्टर्स को – #BoycottTurkey और #BoycottAzerbaijan आंदोलनों के संदर्भ में मानो साँप सूँघ गया हो। यह वही समूह है जो गाजा जैसे वैश्विक मुद्दों पर आक्रामक सोशल मीडिया अभियान चलाता है, लेकिन जब अपने ही देश में या पड़ोस में हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ अत्याचार होते हैं तो यह स्पष्ट रूप से चुप्पी साध लेता है। कड़े प्रतिरोध की बात तो भूल ही जाइए – ऐसे समय में एक फुसफुसाहट तक भी मुश्किल ही सुनने को मिलती है।

ऑपरेशन सिंदूर के प्रति बॉलीवुड की ठंडी और लगभग उदासीन प्रतिक्रिया ने उस लंबे समय से चले आ रहे ढोंग को उजागर कर दिया है, जिसे हम “देशभक्ति-मुनाफ़े के लिए” मॉडल कह सकते हैं। ए-लिस्टर्स और बड़े प्रोडक्शन हाउस बार-बार देशभक्ति को एक भावनात्मक टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं—फिल्मों के ट्रेलर से लेकर संवादों और गानों तक, सब कुछ राष्ट्रप्रेम की भावना को भुनाने के लिए सजाया जाता है। फिल्म रिलीज़ से पहले ये स्टार्स सुनियोजित इमेज-मेकओवर से गुज़रते हैं—सेना के जवानों से मुलाकात, राष्ट्रध्वज के सामने फोटोशूट, और सोशल मीडिया पर ‘जय हिंद’ जैसे पोस्ट। लेकिन जब देश को सच में नैतिक समर्थन और एकजुटता की ज़रूरत होती है—जैसे पहलगाम हमले या ऑपरेशन सिंदूर जैसे ऐतिहासिक पल—तब यही सितारे रहस्यमय चुप्पी ओढ़ लेते हैं।

सबसे अहम बात यह है कि अब भारतीय जनता इस बनावटी देशभक्ति को पहचानने लगी है। सोशल मीडिया पर आम नागरिक इन तथाकथित सितारों की चुप्पी और पाखंड को बेनकाब कर रहे हैं, और अब ध्यान असली नायकों—हमारे सशस्त्र बलों—की ओर केंद्रित हो रहा है, जो बिना प्रचार के, बिना पुरस्कारों की उम्मीद के, सच में देश के लिए जान की बाज़ी लगाते हैं। यदि यह ज़मीनी स्तर पर उठती जन-जागरूकता इसी गति से आगे बढ़ती रही, तो यह केवल एक सांस्कृतिक बदलाव नहीं, बल्कि एक नैतिक पुनर्जागरण का संकेत हो सकता है—एक ऐसा भारत, जो अब भावनाओं की मार्केटिंग से नहीं, बल्कि सच्चे मूल्यों से प्रेरित होता है।

अरबपतियों के लिए राष्ट्रवाद की अग्निपरीक्षा

जब भारत के व्यापारी—चाहे वे छोटे हों या बड़े—पहलगाम में हिंदुओं पर हुए आतंकी हमले जैसे गंभीर घटनाक्रमों के बाद राष्ट्र और सभ्यता के हितों के साथ अधिक खुलकर खड़े हो रहे हैं, तब यह देश और दुनिया भर में फैले भारतीय मूल के अरबपतियों के लिए एक गहरी आत्मचिंतन की घड़ी है। यह केवल आर्थिक जिम्मेदारी की बात नहीं है—यह उस नैतिक जवाबदेही की भी बात है, जो एक शक्तिशाली वर्ग होने के नाते भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता और सभ्यतागत हितों के प्रति होनी चाहिए।

राजीव मल्होत्रा और विजया विश्वनाथन द्वारा लिखित पुस्तक Snakes in the Ganga: Breaking India 2.0 इस संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। इस पुस्तक में यह स्पष्ट रूप से दिखाया गया है कि किस तरह कई भारतीय अरबपति—चाहे जानबूझकर या अनजाने में—पश्चिमी संस्थानों और विचारधाराओं को भारी मात्रा में फंडिंग देकर ऐसे नैरेटिव्स को बढ़ावा दे रहे हैं जो भारत और हिंदू पहचान के खिलाफ खुला मोर्चा बनाते हैं। इन लेखकों के अनुसार, यह सिर्फ भारत-विरोधी रिसर्च तक सीमित नहीं है, बल्कि इन निधियों का इस्तेमाल भारतीय शिक्षा तंत्र में “वोक” पश्चिमी विचारधाराओं के घातक प्रवेश के लिए भी किया जा रहा है—प्रगतिशीलता के नाम पर ऐसे विमर्श को स्थापित किया जा रहा है जो न तो भारत की ज़मीनी सच्चाइयों से जुड़ा है और न ही उसकी सांस्कृतिक संवेदनाओं से।

एक विशेष उदाहरण के रूप में गोदरेज इंडिया कल्चर लैब  का नाम सामने आता है, जिसे अक्सर LGBTQ+ जागरूकता के लिए सराहा जाता है। लेकिन पुस्तक इस लैब की भी आलोचना करती है कि किस तरह इसने बिना आलोचनात्मक मूल्यांकन के, अमेरिकी शैली के जेंडर और सेक्सुअलिटी विमर्श को भारत में स्थापित किया। और इससे भी गंभीर बात यह है कि इसी मंच पर ऐसे एक्टिविस्ट्स को बढ़ावा मिला है, जिनके रिकॉर्ड में CAA विरोधी आंदोलन का समर्थन और कश्मीर अलगाववाद को खुला मंच देना शामिल है। यह सब सिर्फ “ब्रांड वैल्यू” या “कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी” का सवाल नहीं है—यह उन विचारों को ताकत देने का मामला है जो भारत की एकता, अखंडता और सभ्यतागत निरंतरता को सीधी चुनौती देते हैं। यदि छोटे व्यापारी राष्ट्रहित में स्पष्ट और निर्णायक रुख ले सकते हैं, तो यह उम्मीद करना अनुचित नहीं कि अरबपति वर्ग भी अब बिना शर्त आत्मपरीक्षण करे—कि वे अपना धन किन विचारों, संस्थानों और लक्ष्यों को सौंप रहे हैं। राष्ट्रवाद केवल नारे नहीं—अब यह व्यवहार, निवेश और प्राथमिकताओं के ज़रिये परखा जा रहा है।[18]

जब मुकेश अंबानी और गौतम अडानी जैसे देश के प्रमुख उद्योगपतियों ने तुर्की की कंपनियों और उत्पादों से दूरी बनाकर राष्ट्रीय हितों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई, तो यह एक सकारात्मक उदाहरण था कि किस तरह कॉर्पोरेट नेतृत्व राष्ट्र के साथ खड़ा हो सकता है। लेकिन इसके बावजूद, एक गहरा और अब तक अनसुलझा सवाल बना हुआ है—क्यों अधिकांश भारतीय अरबपति अब भी व्यापारिक निर्णयों को राष्ट्रीय और सभ्यतागत हितों से अलग मानते हैं?

ऑपरेशन सिंदूर के बाद जो राष्ट्रवादी चेतना पूरे देश में उभरी है, वह इस एलीट वर्ग के लिए एक स्पष्ट चेतावनी होनी चाहिए। यह याद दिलाने का समय है कि कोई भी—even the richest—is not above the nation. जिन लोगों के पास संसाधनों और प्रभाव की भरपूर शक्ति है, उन्हें समझना होगा कि हिंदू हित और भारत की अखंडता केवल “वैकल्पिक” प्राथमिकताएं नहीं हैं, बल्कि वे अब व्यापारिक नैतिकता के केंद्र में आने चाहिए। जब छोटे टूर ऑपरेटर, छोटे व्यापारी और स्टार्टअप्स अपने कारोबार को खतरे में डालकर देश के सम्मान के लिए खड़े हो सकते हैं, तो क्या अरबपतियों की चुप्पी, उदासीनता या “तटस्थता” स्वीकार्य है?

यह भी कड़वी सच्चाई है कि इन अरबपतियों में से कई प्रतीकात्मक इशारों में निपुण हैं—कभी मंदिर दर्शन, कभी धर्मार्थ अनुदान, और कभी भारतीय संस्कृति के समर्थन में बयान। लेकिन अब समय बदल चुका है। यह दौर सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट और सोशल मीडिया इमेज बिल्डिंग का नहीं है। अगर उनकी पूंजी या उनके ट्रस्ट्स जाने-अनजाने उन संस्थानों को फंड कर रहे हैं जो हिंदू संस्कृति को बदनाम करते हैं या भारत की संप्रभुता के खिलाफ काम करते हैं—तो फिर वह “संस्कृति प्रेम” केवल दिखावा है।

लेकिन भारत अब ऐसे दिखावटी राष्ट्रवाद से आगे बढ़ चुका है। आज ज़रूरत है नीतिगत राष्ट्रवाद की—ऐसे राष्ट्रवाद की जो सिर्फ बातों में नहीं, फैसलों, निवेशों और रणनीतियों में झलके। अरबपतियों के लिए अब यह सिर्फ नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सभ्यतागत चेतना के प्रति एक ऐतिहासिक परीक्षा बन चुकी है।

निष्कर्ष

पिछले एक दशक में भारत ने जिस सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ओर कदम बढ़ाया है, वह केवल प्रतीकात्मक या भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक गहरी सभ्यतागत पुनर्पहचान की प्रक्रिया है। यह एक ऐसा डिकोलोनाइज़ेशन प्रोजेक्ट है, जो भारत की आत्मा को पुनः प्राप्त करने का कार्य कर रहा है—उस आत्मा को जो सदियों की गुलामी, औपनिवेशिक शिक्षा और वैचारिक आक्रमणों से दबा दी गई थी।

इस परिवर्तन की झलक हर जगह दिख रही है—राम मंदिर का निर्माण अयोध्या में केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक अन्याय के सुधार का प्रतीक है। काशी, उज्जैन, केदारनाथ जैसे तीर्थ स्थलों का पुनरुद्धार एक सांस्कृतिक जागरण की वापसी है। वहीं, काशी-तमिल संगमम जैसी पहलें यह स्पष्ट करती हैं कि भारत अब केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि एक गहराई से जुड़ी सांस्कृतिक सभ्यता है। यह सांस्कृतिक पुनरुत्थान केवल धार्मिक सीमाओं में बंधा नहीं है—यह भारत की विदेश नीति में भी झलकता है, जहाँ अब रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों के ज्ञान और दृष्टिकोण को संवाद और रणनीति का आधार बनाया जा रहा है। भारत अब “नरेंद्र मोदी की विदेश नीति” से आगे बढ़कर “भारत की सभ्यता-आधारित कूटनीति” की ओर बढ़ रहा है।

2025 का भारत आत्म-संदेह से मुक्त है। यह नया भारत न केवल अपनी परंपराओं पर गर्व करता है, बल्कि आधुनिक विज्ञान, तकनीक और वैश्विक संबंधों में भी उसी गर्व के साथ खड़ा है। इस सांस्कृतिक चेतना ने भारतीय नागरिकों को केवल देशभक्त नहीं, बल्कि भारत के अनौपचारिक ब्रांड एम्बेसडर में बदल दिया है—जो अब नारे से परे जाकर, अपने व्यवहार, उपभोग, संवाद और डिजिटल सक्रियता में राष्ट्र प्रथम को जी रहे हैं।

यह बदलाव अब एक क्षणिक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक सभ्यतागत पुनरुद्धार है—जिसमें भारत न केवल अपने अतीत को सम्मान के साथ देख रहा है, बल्कि उसी से ऊर्जा लेकर भविष्य की दिशा तय कर रहा है।

Citations

[1] Vilification of Hindu Dharma Through Misguided Gender Narratives – Hindu Dvesha;   https://stophindudvesha.org/vilification-of-hindu-dharma-through-misguided-gender-narratives/

[2] How Much Money India Boycotting Turkey And Azerbaijan Travel Will Cost Them;   https://www.ndtv.com/lifestyle/on-turkey-and-azerbaijan-travel-how-much-money-do-indian-tourists-spend-every-year-8419372

[3] Ixio CEO says ‘enough is enough’ as firm halts flight and hotel bookings to Turkey, Azerbaijan and China | Trending – Hindustan Times;  https://www.hindustantimes.com/trending/ixigo-halts-flight-and-hotel-bookings-to-turkey-azerbaijan-and-china-ceo-says-enough-is-enough-101746875577969.html

[4] Indian travel sites suspend bookings to Turkey, Azerbaijan – Times of India;   https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/spotlight/indian-travel-sites-suspend-bookings-to-turkey-azerbaijan/articleshow/121075317.cms

[5] In India, boycott calls against Turkey, Azerbaijan reflect growing ‘consumer-led diplomacy’ – South China Morning Post;  https://www.scmp.com/week-asia/economics/article/3310592/india-boycott-calls-against-turkey-azerbaijan-reflect-growing-consumer-led-diplomacy

[6] Backlash over backing Pakistan: Turkey and Azerbaijan face full trade boycott from Indian traders – BusinessToday;  https://www.businesstoday.in/india/story/backlash-over-backing-pakistan-turkey-and-azerbaijan-face-full-trade-boycott-from-indian-traders-476596-2025-05-16

[7] Boycott Turkey gains momentum: From aviation to chocolates, list of Turkish products and services shunned by India | Today News; https://www.livemint.com/news/india/boycott-turkey-gains-momentum-from-aviation-to-chocolates-list-of-turkish-products-and-services-shunned-by-india-11747658753508.html

[8] Why Turkey’s Erdoğan May Be Reduced To Maldives’ Muizzu Amid Boycott Calls By Indians – News18;  https://www.news18.com/india/treacherous-turkey-as-india-mulls-boycott-why-erdogan-may-be-reduced-to-maldives-muizzu-ws-kl-9336279.html

[9] Boycott Turkey Impacts India-Turkey Trade: Travel drops 60%, Apple & Marble Imports Affected | Economy News | The Financial Express;  https://www.financialexpress.com/policy/economy/boycott-turkey-hits-business-check-impact-on-india-turkey-trade-as-travel-slumps-60-apple-and-marble-imports-feel-the-heat/3847327/

[10] These Indian universities suspended academic ties with Turkish educational institutions | Education News – The Indian Express;  https://indianexpress.com/article/education/indian-universities-suspension-agreements-turkey-universities-10013469/

[11] Turkey’s Celebi sues India: Who’s representing the firm in Delhi HC? A look at timeline and legal team | Today News; https://www.livemint.com/news/india/turkeys-celebi-sues-india-who-s-representing-the-firm-in-delhi-hc-a-look-at-timeline-and-legal-team-11747643960149.html

[12] Turkey’s Celebi sues India: Who’s representing the firm in Delhi HC? A look at timeline and legal team | Today News; https://www.livemint.com/news/india/turkeys-celebi-sues-india-who-s-representing-the-firm-in-delhi-hc-a-look-at-timeline-and-legal-team-11747643960149.html

[13] Why Turkey’s Erdoğan May Be Reduced To Maldives’ Muizzu Amid Boycott Calls By Indians – News18; https://www.news18.com/india/treacherous-turkey-as-india-mulls-boycott-why-erdogan-may-be-reduced-to-maldives-muizzu-ws-kl-9336279.html

[14] Jairam Ramesh, Pawan Khera pass mic to each other after question on Turkey boycott | Video | India News – India TV; https://www.indiatvnews.com/news/india/jairam-ramesh-pawan-khera-pass-mic-to-each-other-after-question-on-turkey-boycott-bjp-criticism-pours-in-amit-malviya-shares-video-on-x-2025-05-15-990483

[15] Secular Liberals of India suddenly develop love for Turkey and Azerbaijan after Indians call for a tourism boycott against those nations;  https://www.opindia.com/2025/05/after-pro-pakistan-aman-ki-asha-liberals-are-simping-over-turkey-boycott-calls-against-turkey-and-azerbaijan/#google_vignette

[16] How Bollywood failed to stand up for India during Operation Sindoor; https://www.opindia.com/2025/05/how-bollywood-failed-to-stand-up-for-india-during-operation-sindoor/

[17] Aamir Khan’s ‘Sitaare Zameen Par’ Faces Boycott Calls Over Turkey Ties and Silence on India-Pakistan Conflict;  https://www.indianewsnetwork.com/en/20250515/aamir-khan-s-sitare-zameen-par-faces-boycott-calls-over-turkey-ties-and-silence-on-india-pakistan-conflict

[18] Snakes in the Ganga Breaking India 2.0 by Rajiv Malhotra and Vijaya Viswanathan p. 572 – 583.

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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